मिथिलाक परिचय
वेद-वेदान्त, पुराण, उपनिषद, धर्मशास्त्र आ तंत्र-मंत्र विद्या एवं संसारक मानव चिन्तनक इतिहासमे ई अपन महत्त्वपूर्ण भूमिकाक लेल सुविख्यात अछि। एतबे नहि एक दिस जँ सामवेदक प्रथम मंत्रद्रष्टा आ ऋगवेदक मरूत्सूक्तक प्रणेता- ऋषि गौतम, शुक्लवेदक प्रणेता- महर्षि याज्ञवल्क्य, भीजल धोती आकाशमे सुखबएवला साधक-मदन उपाध्याय, षड्दर्शन टीकाकार वृद्ध वाचस्पति मिश्र, भगवान जनदिनोकेँ चुनौती तक दऽ देबएवला उदयनाचार्य, आयाची- भवनाथ मिश्र, परमाचार्यवर्य मण्डन मिश्र आदि लोकनिक अविच्छिन्न परम्परा सभसँ मिथिला सदा अलंकृत रहल अछि तँ दोसर दिस मित्रऋषिक आत्मजा मैत्रेयी, ऋषिगर्ग तनया गार्गी, भारद्वाजसुता कात्यायिनी, ऋषि अत्री- कलत्र सती-अनुसूया, जनकनन्दिनी जानकी, भारती, भामती, लखिमा आदि मनस्विनी-विदुषी लोकनिसँ महनीय तथा वन्दनीय रहल अछि। ई भूमिजा जगज्जननी जगदम्बा लक्ष्मीस्वरूपा विदेह नन्दिनी वैदेहीक वसुधा रहल अछि।
12वीं शदीक बंगाली महाकवि कर्णपुर परिजातहरणमे श्री कृष्ण- सत्यभामाक विमानकेँ मिथिलामे प्रवेशक वर्णनक क्रममे लिखैत छथि जे-
“जानकी- जनन- भूमिरीक्ष्यातामम्बुजाक्षि मिथिलेयमग्रत।।
यत्र विज्ञवदनेष्ज्ञु दर्पिता नृत्यति
प्रतिगृहं सरस्वती।”
जाहिठाम प्रत्येक घरमे सरस्वती सोल्लास नृत्य करैत होथि, ओहिठामक विद्वत परम्परा अनिवार्य रूपसँ अद्भुत हएत, संगहि जाहि क्षेत्रक राजाकेँ ऐश्वर्य आओर राज वैभवसँ असम्पृक्त रहि कऽ वीतरागी विदेहक योगस्थ कर्णमीमांसकक दृष्टान्त रूपमे आनन्दकन्द भगवान श्री कृष्ण द्वारा अभिहित कएल गेल हो।
श्रीमद्भागवतमे 57 मैथिल जनकक नामक उल्लेखक पश्चात् कहल गेल अछि जे एतेक जनक कर्मयोग विद्याक विशारद भेलाह आओर योगीश्वर- महर्षि- गौतमक प्रभाव सँ घरमे रहितहुँ ओ सुख आ दु:ख आदि द्वन्द्व सभसँ विमुख छलाह। अर्थात् घरेमे जीवनमुक्त भऽ कऽ अन्तमे पब्रह्ममे लीन भऽ गेलाह।
वेद, पुराण, उपनिषद्, स्मृति आदि ग्रन्थमे मिथिलाकेँ मोक्षक नगरी कहल गेल अछि। एहि सम्बन्धमे शास्त्र-पुराणक निम्नलिखित वचन द्रष्टव्य अछि-
“अयोध्या, मुथुरा, माथ, काशी, काञ्ची, अवन्तिका।
पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्ष दायिका।”
शास्त्रक उपर्युक्त वचनमे कहल गेल अछि जे अयोध्या, मथुरा, माया (मिथिला), काशी, काञ्ची, अवन्तिका आ द्वारिकापुरी ई सातटा मोक्षक धाम अछि।
अनादिकालहिसँ जगज्जननी मॉं जानकी जन्मभूमि आओर राजा जनकक राज्य मिथिला तपोमय एवं तपोवन रूपमे सुविख्यात अछि। जतए वेदान्तक मूल ज्ञानकाण्ड एवं कर्मकाण्ड समन्वित रूपसँ प्रचलित अछि।
मिथिला महात्म्यक गूढ़ रहस्यक ज्ञान प्राप्त करबामे महाभारतक निर्माता भगवान वेदव्यासोकेँ तेना ने बुझि पड़लन्हि जे हुनको लिखऽ पड़लन्हि जे- यदि दूरहुँ सँ मिथिलाकेँ नमन कऽ लेल जाए तँ मुक्ति भेटत सुनिश्चिते बूझू- एहिमे कोनो प्रकारक संशय नहि-
“मिथिला ये नमस्यन्ति देशान्तरगता अपि।
तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च जायते, नात्र संशय:।।”
खास कऽ जगज्जननी जगदम्बा जानकीक एहि मिथिलाक, पावन भूमि पर अवतरित भेलसँ एकर महत्त्व आओरो बढ़ि गेल। वेद-वेदाङ्ग, धर्मशास्त्र उपनिषद्, स्मृति, पुराण, काव्य आदि समस्त वाङ्मयमे भिन्न-भिन्न ढंगे एहि मिथिलाक महत्ताक प्रतिपादन उपलब्ध होइत अछि। संगहि प्राचीनता, संस्कृति, धर्मानुकूल आचरण, अध्यात्म ज्ञानक प्रमुखता आदिक दृष्टिऍं एकर महत्ता स्वत: स्पष्ट भऽ जाइत अछि।
मिथिलाक भूमि एक दिस अपन स्वर्णिम संस्कृति, इतिहास, आलिंपनकला, विद्वता पुरातत्व, मनस्विनी, नारी, युद्धवीर पुरुष लोकनि तथा मिथिलाक लोकदेवीसँ भरल पड़ल अछि तँ दोसर दिस सारस्वत पुत्र लोकनि गौतम, याज्ञवल्क्य, मदन उपाध्याय, धीरेन्द्र उपाध्याय, कालिदास, भवभूति, वृद्ध वाचस्पति मिश्र, आयाची- भवनाथ मिश्र मिथिला विभूति मण्डन मिश्र, उदयनाचार्य महाकवि विद्यापति, कवीश्वर चन्दा झा प्रभृति नरपुंगवर रत्नक सुरभिसँ मँह-मँह करैत अछि तँ तेसर दिस क्रांतिकारी शहीदक त्याग बलिदानमे अग्रगण्य गणेशी, अकलू सूरजनारायणक जीवटतासँ चतुर्दिक मिथिलाक भूमि त्रिवेणीक सदृश पूजनीय, वन्दनीय, अभिनन्दनीय ओ महनीय बनल अछि।
एहिठाम सनातन कालहिसँ एकहि संग शाक्त, शैव ओ वैष्णव आदि सभ पन्थक उपासक निवास करैत आबि रहल छथि। सभ गाममे ग्रामदेवता आ ग्रामदेवी प्रतिष्ठित छथि। लोकक आस्था अविकल-अविचल ओहि देवतासँ जुड़ल अछि। फलत: गाममे धार्मिक तनावक अभाव देखल जाइत अछि। एतबे नहि एतए बहएवला धार आ पोखरि सभ सदानीरा रहल अछि, जकरा पानिसँ गृहस्थ पटौनीक अतिरिक्त पान, मखान, माछ, आम आदिक उत्पादन कऽ अपन जीविका ‘सादा जीवन उच्च विचार’क आदर्शक अन्तर्गत जीबैत आबि रहल छथि। एतुक्का लोकक लेल मॉंछ-भात तँ प्रसिद्ध अछिए संगहि कतेको शाकाहारी छथि। एहिठामक पारम्परिक वेष-भूषामे सॉंचीवला धोती-कुरता, पाग-डोपटा, चानन-ठोप आ मुँहमे गुलाबी खिल्ली पानक संगहि खान-पानमे मुख्य रूपसँ दही-चूड़ा-चीनी, अमोट, माढ़, मखान, तरूआ, तिलकोड़, खम्हारू, साग, अरिकोंच, ओल, अदौड़ी, वर-बड़ी, कुम्हरौड़ी, अँचार, खट्मिट्ठी, ठकुआ, भुसबा, लाइ-चुड़लाइ, तिलबा, केहुनियॉं खाजा आ मुङबा आदि पर्याप्त मात्रामे खएबाक तथा अतिथि लोकनिकेँ खुअएबाक प्रथा रहल अछि। मिथिलाक बेसी लोक शक्तिक उपासक छथि तेँ कबुला-पाती आ परिस्थिति विशेष पर छागरक बलिप्रदानक प्रथा सेहो प्रचलित अछि।
एहिठामक पावनि-तिहारमे दुर्गापूजा, दियाबाती, छठि, तिलासंक्रान्ति, भ्राद्वितिया, जूड़शीतल आदि बेसी प्रसिद्ध अछि। संगहि एकर अतिरिक्त अनेक पर्व मिथिलावासी लोकनिक जीवनक आस्थ्ज्ञा-विश्वासकेँ सनातन धर्मक प्रति दृढ़ता प्रदान करैत अछि। मिथिलामे जे धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान अछि से आनठाम देखबामे नहि अबैछ। एत एक समुदायक लोक दोसर समुदायक पावनि-तिहारमे सम्मिलित होइत रहल अछि।
मिथिलामे अनेक सिद्धपीठ- तीर्थ ओ देवालय तथा ऋषि-मुनिक आश्रम वद्यमान अछि, जाहिमे जनकपुर, सीतामढ़ी, शिलानाथ, श्रीजलेश्वर, श्रीकामदानाथ तथा श्री दुर्गा उच्चैठ, श्री भैरव, श्री यामुण्डास्थान, राजेश्वरी, श्रीकपिलेश्वर, अहल्यास्थान, भद्रकालिका, भुवनेश्वर, भुवनेश्वरी, कुशेश्वरस्थान, जयमंगला, उग्रतारास्थान, सिंहेश्वरस्थान, मुक्तेश्वर स्थान, छिन्नमस्तिका, विदेश्वरस्थान, एवं वाल्मीकीआश्रम, डोकहर, गौतमाश्रम आदि प्रसिद्ध अछि।
एहिठाम अनेक वंशक शासन रहल अछि। जाहिमे जनक वंश, पाल वंश, सेन वंश, कर्णाट वंश, ओइनबार वंश एवं खण्डवाला वंश प्रमुख अछि।
गीतमे लोककथा गीत, लोकगीत, सोहर, समदाउनि, फागु भगैत झिझिया, नचारी महेशवाणी, पराती आदि वद्याक स्वर लहरी सनातन कालहिसँ मिथिलामे अनेक पावनि-तिहार पर निनादित होइत आबि रहल अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिसँ चमकैत-दमकैत हमर मिथिला सम्पूर्ण संसारक संस्कारक मुख्य स्रोतास्वनी रहल अछि।
सन्दर्भ सूची-
1. वेदभूमि- मिथिला- संस्कृति दर्शन- श्री हरिदेव झा
2. मिथिला की धरोहर- पं. श्री सहदेव झा
3. मिथिला माहात्म्य, दरभंगा
4. मिथिला के वेद वेदान्त- पं. श्री सहदेव झा