विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलामे गीत नादक महत्व

डॉ. चित्रलेखा · 2020-10-15 · अंक 308

मिथिलामे गीत नादक महत्व
मनुष्यक जन्मक पूर्वसँ मृत्यु पर्यन्त अनेकानेक अवसरपर पावनि ओ उत्सव मनाओल जाइत अछि आ से सभ गीतमय भेल रहैत अछि, जाहिमे व्यवहारजन्य भाव भेटैछ। गीतक संगहि संग अवसर विशेषपर व्यवहारजन्य, अराधना एवं वंशक अभिवृद्धिजन्य पौराणिक कथा ओ व्रतादिक विषय वर्णित अछि, जकर रक्षा मैथिलानी लोकनि करैत आबि रहल छथि। अवसर परक व्यवहारिक गीतक रसामाधुर्य, ताहि संगे जातीय गीतक रागात्क धार्मिक औद्रार्यक अतिरिक्त गीतक अनुपमेयतामे पौराणिक देवचरित्र स्पष्टत: दृष्टिगोचर होइछ।
गीतक द्वारा पितरक स्मरण, देवी-देवताक अराधना, लौकिक आचार-विचार ओ वैदिक परम्पराक विधि-व्यवहारक लिक्षणता, तन्त्र-मन्त्रक महत्ता, विधि सामग्री सभक वस्तुजन्य ओ अवसरजन्य गुणक विशेषता भेटैछ, जाहिमे व्यक्तिकेँ परिवारसँ, परिवारकेँ कुटुम्ब ओ आस-पड़ोसक समाजसँ वर्त्तमान आनन्दमे सौहार्द्र भाव परिलक्षित होइछ, ओ तेँ तदनुरूपेँ सांस्कृतिक रक्षा सतत स्वत: सिद्धे थिक।
‘धर्मपराणता, आनन्दकारिता, लौकिकता, हृदयग्राहिता, सामयिकता, अवसरोपयोगिता व्यवहारपटुता कलानिपुणता आदि अनेकानेक जीवनोपयोगी ओ लोकोपयोगी मनोरम भावसामग्री मिथिलाक निर्मल पावन क्षेत्रक हरीतिमा मध्य ओ सामयिक गीत सभमे पाबि अनतत: ई बुझना जाइछ जेना संगीतक माध्यमे भाव साधनक संयोगसँ चित्रित कऽ वर्त्तमानक स्वरूपमे परम्परया अतीतकेँ समक्ष आनि भविष्यक संस्कारकेँ चमत्कृत ओ उज्जीवित करैछ, जे स्वभावत: श्लाधनीय, पठनीय, स्मरणीय ओ स्तुत्य अछि।
शास्त्रक हेतु तँ प्रत्यक्ष मंत्र प्रमाण होइछ अछि, किन्तु विधि तँ परम्परासँ चलैत आबि रहल अछि। ‘गीत आ कथा’जीवनक संग उपर्युपरि अभिमिश्रित आ स्वरूपित अछि।
जतए मिथिला क्षेत्रक विभिन्न स्थानीय विशेषताक अन्त: स्वरूपसँ परिचित होएबाक अवसर भेटत, ओतए विभिन्न विधि व्यवहारसँ समानता ओ भिन्नताक बोध सेहो होएत। अनेक जातिक सम्पर्कमे अएबाक अवसर भेटल। कोनो गॉंवमे कोनो जातिक प्रधानता ओ कोनोमे कोनो आन जातिक। मुदा सर्वत्र एक बात दर्शनीय अछि आओर ओ अछि एकर परस्पर सहय्य भाव। एहि विभिन्न जातिक फराक साहित्य, संस्कार, विचार, आदर्श आदिक अध्ययनमे सुविधा पाओल। कथावाचक ओ गायक रूपमे यद्यपि स्त्री पुरुष दुहू भेटल ओ सेहो सभ अवस्थाक लोक, मुदा बालगीत, चकचन्दा गीत आदिक गायक प्राय: बालक अछि, गाथा गीतक गायक प्राय: पौढ़, पुरुष, होली, चैती, कजरी आदि उल्लासक गीत युवक वर्गक बीच बेसी लोकप्रिय अछि। महिलामे अवस्थाक नियन्त्रणपर कककरो ध्यान नहि अछि। सभ अवस्थाक महिला सोल्लास लोकगीत गबैछ, कथा कहैछ ओ सुनैत अछि। तखन सामयिक लोकगीतमे विशेषत: नव वयसक महिला बेसी अभिरूचि रखैत अछि।
गीतगाइनि दू प्रकारक भेटलीह- (1) सभक संग स्व मिला कऽ गओनिहारि आ (2) स्वतंत्र रूपसँ गओनिहारि।
कोनो पावनिक अवसरपर सभक संग मिलिकऽ गएबाक व्यवहार अछि। किदु व्यावसायिक गायिका सेहो होइछ जे विविध मांगलिक अवसरपर गीत गाबि पारिश्रमिक लैत अछि- यथा, वक्खौ- बरवौनी, नट-नटी आ पमरिया आदि।
एहि ग्रामीण स्त्री-पुरुषमे अनेकानेक लोकक लग अपार साहित्य वैभव अछि। अधिकांश निरक्षर वा मात्र साधारण साक्षर रहितहुँ श्रुति परम्परासँ सम्पूर्ण साहित्यकेँ कंठाग्र कएलन्हि अछि। साहित्य कोशकेँ समृद्ध करबाक हेतु कोनो कार्य व्यापार छोड़ैत नहि छथि तथापि अपन कार्यक बीच क्रमश: ई साहित्य-भंडारी बनि जाइत छथि।
मिथिलामे परम्परासँ प्रचलित व्यवहारसँ सम्पृक्त बालक आ बालिका लोकनिक जन्मसँ द्विरागमन पर्यन्त सभ पावनिक पुनीत अवसर परक गीत पुरातन संस्कृतिक स्वरूपकेँ उत्जीवित रखैत भविष्यक संस्कृति रक्षामे सहाय्य बनैछ।
अवसर परक व्यवहारिक गीतक जीनोपयोगी स्वरूप, सौन्दर्य, समय विशेषक सामयिक गीतक रसमाधुर्य, ताहि संगे जातीय गीतक रागात्मक धर्मिक औदार्यक अतिरिक्त गीतक अनुपमेयतामे पौराणिक देव चरित्र स्पष्टत: दृष्टिगोचर होइछ।
गीतहि द्वारा पितरक स्मरण, देवी-देवताक आराधना, लौकिक आचार-विचार ओ वैदिक परम्पराक विधि-व्यवहारक विलक्षणता, तन्त्र-मन्त्रक महत्ता, विधि सामग्री सभक वस्तुजन्य ओ अवसरजन्य गुणक विशेषता भेटैछ, जाहिमे व्यक्तिकेँ परिवारसँ, परिवारकेँ कुटुम्ब ओ आस-पड़ोसक समाजसँ वर्त्तमानक आनन्दमे सौहार्द्र भाव परिलक्षित होइछ, स्वत: सिद्धे थिक।
सन्तानक हेतु स्त्री-पुरुषक आन्तरिक लालसा, साधना ओ दव-स्पप्न, गर्भवती जननीक आकुलपीड़ा पुत्रोत्पत्तिजन्य उल्लास, सम्बन्धी ओ परिजनक परस्पर बधाई आ शुभकामना संग आनन्द विभोर भए कतहु- सोहर गबैछ, तँ अक्षरम्भ काल भविष्यक आशामे रत, कखनहुँ मुण्डन कराए नव संस्कार ओ विशुद्धि करबएमे मग्न, तँ पुन: उपनयनक सविधि संस्कारसँ ब्रह्मतत्व ज्ञानक प्राप्ति प्रक्रियामे लागल ओ तहिना सृष्टिक रक्षार्थ स्त्री पुरुषक सामाजिक गेठबन्धक वैवाहिक कृतिकर्म द्वारा कराबए मे डेग-‘डेगपर, घड़ी-घड़ीमे भावकेँ स्वर दए अभिव्यंजित करैत अछि।
एहि प्रकारेँ जन्मक पूर्वसँ लए मरण पर्यन्त अनेकानेक अवसरपर पावनि ओ उत्सव मनाओल जाइछ आ से सभ गीतमय भेल रहैछ, जाहिमे व्यवहारजन्य-भाव भेटैछ। गीतक संगहि संग अवसर विशेषपर व्यवहारजन्य, आराधनाजन्य, उपदेशजन्य, विस्मयजन्य सामाजिक स्वरूप रक्षा एवं वंशक अभिवृद्धिजन्य पौराणिक कथा ओ व्रतादिक विषय वर्णित अछि, जकर रक्षा महिला लोकनि करैत आबि रहल छथि।

Suggested citation: डॉ. चित्रलेखा. “मिथिलामे गीत नादक महत्व.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/मिथिलामे-गीत-नादक-महत्व.htm

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