विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

यात्रीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व

अनुपम रैना · 2020-10-15 · अंक 308

यात्रीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व
यात्रीक सामान्य परिचय :-
कविशेखर ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापति युगसँ अविच्छिन्न रूपेँ प्रवाहित मैथिली काव्यधारामे मोड़ देनिहारमे मनबोध, चन्दा झा, सीताराम झा प्रभृति अनेक महाकविलोकनिक नाम लेल जाइछ, मुदा ओकर गतिकेँ तीव्रतम कऽ ओकरा आधुनिक युगक कोनो अन्य समृद्ध भाषाक काव्य प्रवाहक समानान्तर लऽ अनबाक श्रेय जाहि एक मात्र कविकेँ देल जाइछ, ओ थिकाह ‘यात्री’क उपनामसँ सुविध्यात श्री वैद्यनाथ मिश्र। हिनक लेखनीसँ नि:स(त मैथिली कविता अपन ओहेन सुच्चा सुवाससँ सम्पूर्ण वातावरणकेँ महमहा देलक जकर सुगन्ध लेबाक लेल दूर-दूरक लोक स्वत: आकृष्ट भऽ गेल। वस्तुत: आकृष्ट करऽवला हिनक व्यक्तित्वो अछि। अपन गाम-घरक भारसँ अपनाकेँ सतत फराक रखबाक चेष्टामे रत रहऽवला फक्कड़ व्यक्तित्व; सतत भ्रमणशील, समाज-संसारक रग-रगकेँ परखऽवला पारखी व्यक्तित्व; रूढ़िभंजक, श्रम-शक्तिक पूजक, व्यवस्थाक विद्रोही, नवीन पीढ़ीक प्रति आवेशी व्यक्तित्वक लोक छथि यात्रीजी। अपन जीवने जकॉं मैथिली कविताकेँ ई संकीर्ण छन्दक बन्धनसँ मुक्त कऽ सर्वहाराक प्रशस्त बाटपर उन्मुक्त विचरण करबाक हेतु छोड़ि देलनि।
यात्रीजी आधुनिक मैथिली साहित्य मध्य एकटा एहन देदिव्यमान नक्षक रूपमे अवतीर्ण भेलाह जे सम्पूर्ण मैथिली साहित्येक धाराकेँ मोड़ि देलनि। मैथिली साहित्यक आधुनिक जनक कवीश्वर चन्दा झा जँ नव प्रयोग कऽ पूर्वक रूढ़िक परम्पराकेँ तोड़लनि तँ भुवनेश्वर सिंह भुवन ओहिमे प्रगतिवादक वीजारोपण कएलन्हि। मुदा यात्रीजी ने केवल भुवनजी द्वारा स्थापित प्रगतिवादकेँ एकटा वटवृक्ष सदृश विशालकाय वनस्पति ठाए़ कएलन्हि अपितु ओहिमे पानिढारि-ढारि ओकरा यथार्थवादक सघन सुन्दर, आकर्षक आ मनोरम वाटिका बना देलनि।
आधुनिक मैथिली साहित्यमे वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक विशिष्ट स्थान छनि। ई मैथिली काव्यगगनमे अपन असाधारण प्रतिभा तथा काव्यक सर्वांगपूर्ण प्रसाद-माधुर्ययुक्त कवितासँ अक्षुण्ण आभाक आभास नहि दैत छथि, अपितु साहित्य-मर्मज्ञकेँ रसास्वादन करयबामे सुक्ष्मगतिक प्रदर्शक छथि। जाहि भावक वर्णन आन-आन कविगण पैघ-पैघ छन्दमे कएने छथि आ ओकर अभिव्यक्तिक लेल ध्वनि तथा अलंकारक बोझसँ दबि गेल छथि, तकरा यात्रीजी ग्रामीण भाषाक माध्यमसँ छोटसँ छोट छन्दमे अभिव्यक्त करबामे पूर्ण सफल भेल छथि। यात्रीजी अपन रचनासभमे मैथिली बोलीक ठेंठक ढाठ बन्हैत छथि। मैथिलीक ठेंठ शब्द सभपर हिनक पूर्ण अधिकार छनि। हिनका प्रसंग डॉ. शैलेन्द्र मोहन झाक कहब छनि :-
“यात्रीजीक कवितामे एक विचित्र विविधताक दर्शन होयत। रूढ़ि-जर्जर एवं आत्मविश्वाससँ ग्रसित जीवन, शोषण उत्पीड़नक दारूण ज्वालामे दग्ध होइत जनताक दुख-दर्द, समाजमे अन्तर्निहित वर्गसंघर्षक भावना, जीवनक सरल सात्विक वर्णन, प्रकृतिक एकसँ एक रमनगर रूपक अतिरिक्त ‘प्राचीन’, मध्यकालीन आ आधुनिक मिथिलाक माटि-पानिकेँ-हर-जनकेँ- कोसी लखिमाकेँ नहि विसरि सकलाह अछि।”[1]
बहुमुखी प्रतिभासँ सम्पन्न, सामाजिक परिवेशक निपुण तथा अपन भाषा व्यवस्थाक कारणेँ वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’आधुनिक मैथिली साहित्यमे अपन उपलब्धिमे बहुचर्चित रचनाकार थिकाह। कवीश्वर चन्दा झाक लोकवादी भावना ओ भाषा व्यवस्था, महाकवि सीताराम झाक व्यंग शैली ओ ठेंठ भाषाक ठाठ तथा भुवनजीक प्रगतिशीलताक नवोन्मेष यात्रीजीक काव्य व्यक्तित्वमे एकाकार भऽ गेल अछि।
हिनक रचना सभमे विशेष कए कवितामे देश प्रेमसँ उत्पन्न आत्मवेदना, साम्राज्यवादक भयंकर स्वरूपक विरूद्ध कान्ति, जनवादी परम्पराकेँ संगठित रूपसँ प्रकट करब समाजमे प्रचलित कला रूपकेँ अपनायब आ जनभाषाक सरस, सरल स्वरूप दिस झुकान देखैत छी। एतबे नहि हिनक रचनामे मार्क्सवादी प्रभाव देखबामे अबैत अछि, जाहिमे आर्थिक विषमता, समिष्टिक भावना, भावक गहराइ, पलायनवादी प्रवृत्तिक अभाव, समिष्टिक चेतनापर बल आ निम्न स्तरक जीवनपर प्रकाश भेटैत अछि।
मिथिला मध्य यात्रीक परिचय एकटा फक्कर, घुमक्कर बाबाक रूपमे छनि मुदा इतिहासकारलोकनि मैथिली साहित्यक हिनक रचना आ ओकर भाषाकेँ परेखि करैत छथि। आधुनिक मैथिली साहित्य मध्य दूटा महामानव एहन छथि जनिक भाषा हुनक परिचय दऽ दैत अछि। ओहिमे एकटा छथि प्रो. हरिमोहन झा जनिका आँगुरपर भाषा नचैत छल तँ दोसर महामानव छथि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जनिक प्रत्येक साहित्यक रचनाक भाषा हुनक परिचय स्वत: करा दैत अछि। एहि प्रसंग दुर्गानाथ झा श्रीशक अभिमत छनि :-
“अभिव्यक्ति शैलीमे तँ ई कान्ति उपस्थित कऽ देल। मैथिली साहित्यमे हिनकहिटा भाषा यथार्थ रूपमे लोकभाषा थिक। मुदा अपन प्रतिभावक स्पर्शसँ ओ ग्राम्य भाषाकेँ साहित्यकता प्रदान कएल। हिनक रचनाकेँ जे सर्वाधिक मार्मिकता प्रदान करैत अछि से थिक यैह स्वाभाविक भाषाक प्रयोग ओ वक्रतापूर्ण कहबाक रीति जाहिमे व्यंगार्थ बेस चमकऽकारक होइत अछि।”[2]
मैथिली साहित्यक प्रत्येक विद्वान यात्रीजीकेँ अपना-अपना ढंगसँ परिचय करबैत छथि। कियो हुनक भाषा-शैलीसँ तँ कियो सुच्चा ठेंठ बोलीक ठाठसँ। किछु विद्वान हुनका प्रगतिवादसँ चिन्हैत छथि तँ किछु यथार्थवादसँ। कियो घुम्कर-फक्कर झोड़ा ढंगने साहित्यकार बुझैत छथि तँ कियो मार्क्सवादी विचारधारक समर्थक। कतहुँ ई वौद्ध धर्मावलम्वीक रूपमे प्रख्यात छथि तँ कतहु सर्वहाराक हिमायती। एक ‘वैद्यनाथ मिश्र’कतोक उपनामसँ चर्चित परिचित छथि। कियो ‘यात्री’कहैत छनि तँ कियो ‘नागार्जुन’कियो ‘विद्याथ्र्ज्ञी’कहैत छनि तँ कियो ‘वैदेह’, जखन कि मैथिली साहित्यक ख्यातिनामा विद्वान डॉ. जयकान्त मिश्र हिनक भाषा-शैलीकेँ पकड़ि हिनकासँ परिचित करबैत छथि :-
“Trhe change in the cdoms of these poems is remarkable. The poet does not use Sanskriticed words and rise a colloquial style to the poetec level. Ingenions thought, epigrammatic and terse slyle, colloquial diction, utiparalleled speed and tempo and obserration Characterise these poems.”[3]
यात्रीजीक जन्म स्थान :-
यात्रीजीक जन्म तिथि संदेहास्पद अछि। ओ स्वयं अपन जन्म तिथि 1911 ई.क ज्येष्ठ पुर्णिमाकेँ मानैत छथि तथा हुनक पुत्र सेहो हुनक जन्मक विष्ज्ञयमे उपर्युक्त तिथिएकेँ स्वीकार्य करैत छथि, मुदा किछु अन्य श्रोतसँ विद्वान लोकनि हिनक जन्म 30 जून 1911 ई. शुक्रदिन मानैत छथि। दुनू तिथि भिन्न-भिन्न भऽ जाइत अछि कारण जँ जज्येष्ठ पुर्णिमा 1911 ई.केँ हुनक जन्म तिथि मानी तँ ई 11 जून रविदिन पड़ैत अछि। मुदा दुनू तर्कमे मात्र दिनक अन्तर होइत अछि वर्ष 1911 ई. तँ निश्चित अछि।
सन 1998 ई.मे राजकमल प्रकाशन नयी दिल्लीसँ प्रकाशित यात्री समग्रक अनुसार हिनक जन्म सन् 1911 ई.मे जेष्ठ पूणिमाक दिन दरभंगा जिलाक तरौनी गाममे भेलनि। मुदा अन्य श्रोतक अनुसार उक्त तिथिकेँ यात्रीजीक जन्म हुनक मातृक मधुबनी जिलाक सतलखा गाममे भेल छलनि तथा तरौनी हुनक पैतृक गाम छलनि। हिनक पिताक नाम गोकुल मिश्र तथा माताक नाम उमा देवी छलनि। यात्रीजीक वचपनक नाम ‘ठक्कनमिसर’ छलनि।[4] गोकुल मिश्र आ उमा देवीकेँ चारि गोट सन्तान भेलन्हि आ चारू लगातार असमय कालकवलित भऽ गेलनि। एहिसँ गोकुल मिश्र अति निराशापूर्ण जीवन जीबैत छलाह। अशिक्षित व्राह्मण गोकुल मिश्र ईश्वरक प्रति आस्थावान तँ छलाहे तथापि दुखक एहि समयमे अपन आराध्य देव भगवान शंकरक पूजा किछु बेसीए करय लागल छलाह। ओ पुत्र लालसाक हेतु वैद्यनाथ धाम (देवघर) जा कए बाबा वैद्यनाथक ओ यथाशक्ति उपासना कएलन्हि आ बादमे अपन गाममे आबि सेहो पूजा पाठमे समय बितबय लगलाह।
बाबा वैद्यनाथक आशीर्वादसँ पाँचम सन्तान भेलन्हि।
व्यक्तित्वक परिचय :-
व्यक्तित्वकेँ अंग्रेजीमे ‘Personality’कहल जाइत अछि जे लैटिन भाषक ‘Persona’शब्दसँ बनैत अछि। ‘Persona’शब्दक अर्थ लैटिन भाषामे होइत अछि ‘मुखौटा’। ग्रीक कलाकार लोकनि रंगमंचपर अपन पहचान छुपेबाक हेतु ‘मुखौटा’केर प्रयोग करैत छलाह। बादमे Persona शब्दक अर्थ बदलि गेल। मनुष्य दोसरकेँ केहन देखाइत अछि, एहि अर्थमे बादमे‘Persona’शब्दक रूपान्तर ‘Personality’ अर्थात् व्यक्तित्वक रूपमे कएल जाए लागल।[5]व्यक्तित्व शब्द भाववाचक संज्ञा थिक। व्यक्तिक क्षेत्रमे जाहि गुण अथवा विशेषताक समावेश होइत अछि, ओ सभ व्यक्तित्वक अन्तर्गत अबैत अछि। कहबाक तात्पर्य जे कोनो व्यक्तिक महत्वपूर्ण विशेषता ओहि व्यक्तिक व्यक्तित्व कहबैत अछि। व्यक्तिक एहि प्रकारक विशेषता ओकरा सामान्यसँ पृथक करैत अछि। अर्थात् कोनो व्यक्तिक विशेषताक समुदाय ओकर व्यक्तित्व कहबैत अछि।[6]
मानक हिन्दी शब्दकोशक अनुसार व्यक्तित्व शब्द शब्दक युग्मसँ बनैत अछि, जकर अर्थ होइत अछि- व्यक्त हेबाक अवस्था वा भाव।[7] कोनो लोकक निज विशिष्ट क्षमता, गुण, प्रवृत्ति आदि जे ओकर उद्देश्य, कार्य, व्यवहार, आदिमे प्रकट होइत अछि आओर ओहिसँ ओहि लोकक सामाजिक रूवरूप स्थिर होइत अछि।
लोकक मनोभाव एवं विचार ओकर कार्य तथा वाचिक, आंगिक क्रियासभमे, हाव-भावमे प्रकट होइत अछि, लोकक मन सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेशसँ संस्कारित होइत अछि। ई संस्कार सेहो ओकर क्रियकलाप, हाव-भावमे अनायास व्यक्त होइत अछि। व्यक्तित्व लोकक अन्तर्निहित गुणमे प्रकाशित होइत अछि तथा ओकरा अभिव्यक्त करबाक क्षमतेकेँ व्यक्तित्व कहल जाइत अछि।
हिन्दी विश्वकोशमे व्रूक्तित्वक अवधारणा एहि प्रकारे देल गेल अछि- “व्यक्तित्व शब्द कोनो व्यक्तिक उद्दीपक मूल्यक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि।”[8]एकर तात्पर्य ओहि सम्पूर्ण प्रभावसँ अछि जे एक व्यक्तिक दोसरपर पड़ैत अछि उद्दीपकक रूपमे क्रियाक प्रभाव सेहो सतत् पड़ैत अछि, जकर ओ अन्य व्यक्तिक बीच उपक्रम करैत अछि। ई परिणामात्मक शक्ति एकटा एहन परिवर्तन उत्पन्न करैत अछि जे ओकर अपन दोसर लोक आ परिस्थितिकेँ प्रभावित करैत अछि। दोसर अर्थमे ई कहल जा सकैछ जे लोक आत्म परीक्षण करैत अछि तथा वाह)य जीवन, संगठन, एकता आओर स्थिरता उत्पन्न कए कऽ अपन अन्तर्वैयक्तिक स्वभावमे अपन आत्म धारणाक विकास करैत अछि।
प्रत्येक रचनात्क व्यक्तिमे प्रतिभा महत्वपूर्ण होइत अछि। साहित्यिक कृतिसभमे साहित्यकार लोकनिक व्यक्तित्व प्रसंगत: किछु अंशमे अनायास प्रतिविम्बित होइत अछि। रचनाकारक अहमक संस्कार ओकर आत्माभिव्यक्तिक रूपमे व्यक्त होइत अछि। रचनाकारक ‘अहम्’समाजक सामूहिक अहमक संग तादात्म्य बना ओकर आनन्दक कारण कारण बनैत अछि। रचनाकारक व्यक्तित्व युग परिवेशसँ प्रभावित होइत अछि। उपर्युक्त सभ विवरणपर विमर्श कएलाक बाद ई कहल जा सकैछ जे दिव्य प्रतिभासँ उभरि कए कोनो साहित्यकारक व्यक्तित्व विकसित होइत अछि।
कोनो लोकक किछु वाह्य एवं आन्तरिक तत्वसँ व्यक्तित्वक निर्माण होइत अछि। एहि तत्व सभक विवेचन व्यक्तित्व निरूपणमे अन्तर्भूत होइछ। साहित्यकारक परिवार, परिवेश, स्वभाव प्रवत्तियुगीन वातारण जीवनमे भेटयबला अवसर, किछु लगती, किछु कमजोरी, चुकल अवसर किछु क्षमता, किछु सबलता, जीवनक मूल्य दृष्टि, आदर्शक प्रभाव आदि अनुभवसँ बनल दृष्टिकोणसँ साहित्यकारक मानवीय व्यक्तित्वक निर्माण होइत अछि। ई व्यक्तित्व समाज आओर साहित्यकारक दायित्वमे, प्रतिवद्ध ओ सजग भऽ एकटा साहित्यकारकेँ सर्जक व्यक्तित्वक निर्माण सेहो करैत अछि। संक्षे9मे साहित्यकारक निजी व्यक्तित्व हुनक व्यक्तित्वक सामंजस्यसँ बनल एकटा विलक्षण व्यक्तित्व होइत अछि। यात्रीक साहित्यपर विवेचन करबासँ पूर्व हुनक जीवन परिवचय करब आवश्यक अछि।
मनमे ई आशंका रहनि जे पूर्वक चारि सन्तानक भाँति इहो ने ठकि कए चलि जाए तेँ पाँचम संतानकेँ सभ ‘ठक्कन’नामसँ पुकारय लागल। कतोक दिनक बाद एहि ठक्कन नामक बालकक नामकरण भेल आओर बाबा वैद्यनाथक कृपा प्रसाद मानि एहि बालकक नाम ‘बैद्यनाथ मिश्र’राखल गेल। यात्रीक नामे प्रसिद्ध भेलाह।
आगू चलि कए इएह बालक मैथिली साहित्य जगतमे यात्री, हिन्दीमे ‘नागार्जुन’, लेखकगण, मित्रमण्डली एवं राजनीतिमे ‘नागाबाबा’, संस्कृतमे ‘चाण्क्य’नामसँ प्रख्यात भेलाह। संगहि हिन्दी साहित्य जगतमे ‘आधुनिक कबीर’क नामे विभूषित कएल गेलाह।
यात्रीक जन्म प्रसंग अद्यावधि निश्चित निर्धारण नहि भऽ सकल अछि। डॉ. जयकान्त मिश्र अपन पोथी The History of Maithili literature मे हिनक जन्म सन् 1908 ई. मानैत छथि। हिन्दी साहिय कोषमे हिनक जन्मक विषयमे 1910 ई. निर्धारित कएल गेल अछि। डॉ. प्रकाशचन्द्र भट्ट हिनक जन्म 1911 ई. मानैत छथि। डॉ. ज्ञानेश्वरदत्त हरित अपन शोध प्रबंध ‘नागार्जुन व्यक्तित्व और कृतित्वमे सन् 1911 ई. जेठ (जून) मासक कोनो तिथि मानैत छथि।[9] डॉ. प्रभाकर माचवें जेठ पूर्णिमा सन् 1911 ई.[10]बाबू राम गुप्त नागार्जुनक नानीक अनुसार जेठ मासक कोनो दिन 1911 ई. हिनक जन्म मानैत छथि।[11] मिथिलाक विद्वान लोकनिमे बहुसंख्यक सेहो जेठ (जून) पूर्णिमा सन् 1911 ई. सहए हिनक जन्म तिथि निर्धारित कएलन्हि अछि।
यात्रीक जन्म निम्न मैथिल व्राह्मण परिवारमे भेल छलनि। हिनक जन्म स्थान मातृक ‘सतलखा’हेबापर कतोक विद्वान मत भिन्नता रखैत छथि मुदा अधिकांश विद्वान व्राह्मण मधुबनी जिलाक ‘सतलखा’केँ स्थापित करैत छथि जे मिथिलाक एकटा भू खण्डक अंग अछि। हिनक पैतृक गाम तरौनी दरभंगा नगरसँ लगभग 13 कि.मी. दूरीपर स्थित अछि।
यात्रीक माता-पिता एवं वंश :-
वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क जन्म एकटा गरीब निर्धन परिवारमे भेल छलनि। हिनक पिताक नाम गोकुल मिश्र एवं माताक नाम उमा देवी छलनि। जखन यात्रीजी मात्र छह वर्षक छलाह तखनहि हिनक माताक देहान्त भऽ गेल छलनि। हिनक माता एकटा सुशील महिला आ अपन नैहरसँ सभ्रान्त परिवारसँ छलीह। कूल-मूलक दृष्टिऍं यात्रीक पैतृक पक्ष उच्च छल। मातृ विहीन छोट सन बालकक सम्पूर्ण पालन-पोषण एकटा एहन पिताक द्वारा भेल जे घुमक्कर, भंगेरी, लापरवाह, रूढ़िवादी गरीब अशिक्षित तथा कठोर स्वभावक व्यक्ति छलाह। हिनक पिताक मृत्यु सितम्बर 1943 मे काशीक मणि कर्णिका घाटपर भेल छलनि। माता-पिताक वात्सल्यसँ वचित बालक वैद्यनाथक शिशु मनपर पहिल छाप भरि जन्म अपन पिताकसँ अपमानित माए आ विधवा पतिअनिक दु:खक जीवनसँ पड़ल। जकर प्रभाव हिनक हिन्दीमे रचित उपन्यास- ‘रति नाथ की चाची’ तथा मैथिलीक दीर्घ कविता ‘विधवा विलाव’ मे देखल जाइत अछि।
यात्रीक माताक देहावसानक बाद पिता गोकुल नाथ यात्रीकेँ अपन कान्हपर बैसा कए गामे-गामे घुमबथिन। कारण हुनक वृत्त ‘पुरहित-पाटी’ (पुरोहित कर्म) छलनि। गोकुल मिश्र एकटा कठोर आ घुमक्कर स्वभावक व्यक्ति छलाह। एहि प्रकारेँ यात्रीजीकेँ वाल्यकालहिसँ विरासतमे ‘यायावर’प्रवृति भेटल छलनि। उपर्युक्त वातावरण आ परिस्थितिसँ निकलल एकटा अबोध बालक माँ सरस्वतीक एहन बड़दपुत्र हैता से कियो नहि जनैत छल। मुदा यथार्थ इएह थिक। ईहो बात सत्य जे यात्रीक बाल मन पर जे उचाट बैसल तकर दंश ओ भरि जीवन झेलैत रहलाह, तकर प्रतिबिम्ब हुनक प्राय: सभ रचनामे देखल जा सकैत अछि।
यात्रीजी अपन वचपनकेँ कहियो नहि जी सकलाह। एकटा मातृहीन बालकक सहारा पिता होइत अछि आ जखन ओ पिता आशिक्षित, अज्ञानी, मूर्ख, नशेरी हो तँ ओ कोमल नश्चछल बाल मनमकेँ कोना पढ़ि सकैछ। तेँ यात्रीजीक व्यवहार बादोमे सामान्य लोकसँ भिन्न होयब स्वाभाविक छल। किम्वदन्ती आ जनश्रुतिक अनुसार ‘गोकुल मिश्र’क विधवा भाभी आ कुलानन्द मिश्रक पत्नीसँ वैद्यनाथ मिश्रक अबैध संबंध छलनि।[12] मुदा उपर्युक्त तथ्य जे ‘नागार्जुन मेरे बाबूजी’मे वर्णित अछि एकर अतिरिक्त हमरा अन्यत्र कतहु नहि भेटल अछि तेँ एहि तथ्यकेँ हम पूर्णत: निराधार मानैत छी।
यात्रीकेँ वाल्यकालहिमे अपन भाए द्वारा ईमान्दारी, परिश्रम, साहस, समृद्धि दृढ़ चरित्र हेबाक शिक्षा सहजहि भेटि गेल छल। हुनक माएक व्यक्तित्वक ई गुण हुनक कतोक रचनाक नारी पात्र सभमे परिलक्षित होइत अछि। यथार्थमे यात्री एकटा कर्मशील चरित्रवान व्यक्तित्वक लोक छलाह ई कहबामे हमरा कनियोँ संकोच नहि होइत अछि।
यात्रीजीक वंश परिचय :-
यात्रीजीक पूर्वजलोकनि बिहारक दरभंगा जिलाक तरौनी गाम स्थित वत्स गोत्रीय मैथिली व्राह्मण छलाह। हिनक कुलक पलिवाड़ मसौल शाखासँ ई परिलक्षित होइत अछि जे करीब दू सौ वर्ष पूर्व हिनक पितामह छत्रमणि मिश्र ‘मसौल’गामक निवासी छलाह। हिनक पिता गोकुल मिश्र तथा एहिसँ पूर्व तीन चारि पीढ़ीक पूर्वज लोकनि कम पढ़ल-लिखल छलाह। ओ लोकनि खेती-बारी करैत छला आ व्रितान पदाधिकारी लोकनिक देखभाल करैत छलाह। ओना हिनक पुर्वजमे वाचस्पति (अभिनव) आ रूचिपति आदि कतोक महामहोपाध्याय लोकनिक विवरण सेहो उपलब्ध अछि मुदा से साक्षात नहि भऽ गोत्रक शाखाक आधारपर अनुमानित अछि।
“महामहोपाध्याय परमेश्वर झा मिथिलांचलक रत्न छथि। गामक मध्यमे हुनक मकानक भग्नावेश अद्यावधि अवस्थित अछि। एहि गाममे करीब 250 घर आ आबादी लगभग 3500 अछि। उपजाऊ भूमिक रकबा गाममे बेसी नहि अछि। गामक आवादीमे उच्च वर्गक आवादीमे मात्र व्राह्मण लोकनि निवास करैत छथि। गैर व्राह्मणमे यदुवंशी यादव लोकनि रहैत छथि। तरौनी गाम विद्या द्वारा अर्जित बाहरी कमाइ पर अपन अस्तित्व बचा कए रखने अछि। तरौनीक गैर व्राह्मण सेहो आब महानगर दिस आकर्षित भेलाह अछि। व्रह्मण आ गैर व्राह्मण मिलाकए मात्र पाँच-सात गोट परिवार अन्वेषणक क्रममे हमरा दृष्टिगत भेल जे गरीब छथि। शेष लोक अपन गुजर-वसर नीक जकॉं करैत छथि। गामक निम्न वर्गक लोक तँ अपन श्रमशक्तिक बदौलत स्त्री-पुरुष ठीक-ठाक कमा लैत छथि मुदा उच्चवर्गक लोक उच्च ख्शिक्षा पएबाक कारणेँ श्रम कार्य करबासँ परहेज करैत छथि। एकरा अपन प्रतिष्ठासँ जोड़ैत छथि। मैथिलीक एकटा कहाबत तरौनी गामक लेल सटीक वैसैत अछि- “छूछ गौरव छूटाइन ढेकार”अर्थात् प्रतिष्ठाक कारण अपन विपन्नताकेँ नहि उजागर करबाक मजबूरी।[13]
यात्रीजीक पुत्र श्री शोभाकान्त अपन पोथी ‘नागार्जुन मेरे बाबूजी’मे लिखैत छथि-
“हमर बाबा अर्थात् बाबूजी केर पिताजीकेँ अपन पूर्वजसँ पैतृत सम्पत्ति बेसी तँ नहि मुदा कामचलाऊ जरूर प्राप्त भेल छलनि।” गोकुल मिश्रक पिताक नाम छत्रमणि मिश्र छलनि। छत्रमणि मिश्रकेँ तीन गोट पुत्र- परमानन्द मिश्र, कुलानन्द मिश्र आओर गोकुलानन्द मिश्र। हिनकालोकनिक मातृक सहरसा जिलाक महिसी गाममे छल। मातृकक संपति सेहो हिनका तीनू गोटाकेँ प्राप्त भेल छलनि। आँगनमे तीन भाग एक-एकटा घर एक-एक माईक हिस्सामे पड़ल छलनि। पूवरिया घर कुलानन्द मिश्रक हिस्सामे, उत्तरवला परमानन्द मिश्रक हिस्सामे आ दक्षिणवला गोकुलानन्दक जिम्मामे छलनि। घरक बनावट भीतक देवाल, वाँस-काठक ठाठ तथा खढ़ (फूस)सँ छारल छल। पछवरिया वासडीह खाली पड़ल छल। आँगनसँ पूब पोखरि पड़ैत छल जे अद्यावधि अवस्थित अछि। आँगनसँ दक्षिण एकटा बसविट्टी छल जकर क्षीण अवशेष अखनहुँ स्थित अछि। गोकुल मिश्रक समयेमे परमानन्द बाबूक परिवार मातृक ‘महिसी’जा कए स्थायी रूपसँ बसि गेलाह आ हुनक उत्तराधिकारी लोकनि तरौनीक अपन हिस्सा बेचि कए एहि गामसँ सदाक लेल नाता तोड़ि गेलाह। शेष दुनू भाई मातृकक सम्पत्तिकेँ सेहो नहि राखि सकलाह।[14]
चौदहवी शताब्दी अर्थात् 1310 ई.मे मिथिलाक महाराज हरसिंह देव द्वारा जे पंजी प्रथा चलाओल गेल छल ओकर मूल पंजीक वंश वृक्षक आधारपर यात्रीजी ‘वत्सगोत्रीय’पलिवार समौल मूलक निर्विवादित मैथिल व्रह्मण छलाह। यात्रीजीक पुत्र शोभाकान्तक अनुसार यात्रीक प्रपितामहक नाम पारसमणि मिश्र छलनि तथा उक्त पोथीक आधारपर यात्रीजीकेँ छओ गोट संतान छलनि जाहिमे चारि गोट पुत्र- शोभाकान्त, सुकान्त, श्रीकान्त तथा श्यामाकान्त तथा दू पुत्री छलीह- उर्मिल आओर मंजू, मुदा उमेक्षा वृत्ति एवं निर्धनताक कारणेँ कोनो पुत्र अथवा पुत्री उच्च विद्याभूषित नहि भऽ सकलाह। ओना हिनक दोसर पुत्र सुकान्त ‘सोम’ मैथिली साहित्यक स्थापित कवि, कथाकार एवं पत्रकार छथि। हिनक एकटा प्रसिद्ध कविता संग्रह निज सम्वादाता द्वारा प्रकाशित अछि। वर्तमानमे सुकान्त सोम हिन्दीक प्रसिद्ध दैनिक अखबार हिन्दुस्तानमे स्थानीय सम्पादकक रूपमे कार्यरत छथि। उपलब्ध श्रोतक आधारपर यात्रीजीक वंशावली निम्न सारिणीमे द्रष्टव्य अछि-
पारसमणि मिश्र
(प्रपितामह)
छत्रमणि मिश्र
(पितामह)
परमानन्द मिश्र कुलानन्द मिश्र गोकुलानन्द मिश्र
(चाचा) (चाचा) (पिता)
शोभाकान्त सुकान्त श्रीकान्त श्यामाकान्त उर्मिल मंजू
(पुत्र) (पुत्र) (पुत्र) (पुत्र) (पुत्री) (पुत्री)
यात्रीक शिक्षा-दीक्षा :-
बालक बैद्यनाथक पिता श्री गोकुलानन्द मिश्र रूढ़िगत अनपढ़ व्राह्मण छलाह। ओ वैद्यनाथकेँ अंग्रेजी शिक्षासँ अलग राखय चाहैत छलाह। कारण ओ बुझैत छलाह जे अंग्रेजी पढ़निहार लोक ‘क्रिश्चयन’बनि जाइत अछि।
वैद्यनाथ मिश्रक प्रारंभिक शिक्षा अपन मातृक सतलखासँ प्रारंभ होइत अछि। एकरा किछु दिन बाद हुनका तरौनी गामक पाठशालामे नामांकन कराओल गेल। एहिठाम हिनक संस्कृत शिक्षा भेटलनि। गनौलीसँ ई ‘काव्यतीर्थ’क उपाधि ग्रहण कएने छथि। आगूक शिक्षाक लेल ई काशी तथा कलकत्ता गेलाह। हिनका समयमे संस्कृत शिक्षाक प्रचलन व्राह्मण परिवारमे छल। एकर प्रभाव यात्रीजीपर सेहो पड़लनि।
अपठित दीन-हीन रहलाक बादो यात्रीजी अपन प्रतिभा दृढ़ विश्वास आ संघर्षक उच्च शिक्षा अर्जित कएलनि। यात्रीजी घुमक्कर लोक छलाह तेँ मिथिलाक बाहर अन्य प्रान्त सभमे सेहो जाइत छलाह। जिज्ञासु प्रवृतिक स्वभाव रहबाक कारणेँ यात्रीजी जाहि-जाहि प्रान्तमे अपन भ्रमणक क्रममे जाइत छलाह ओहि प्रान्त सभक भाषापर अपन अधिकार जमा लैत छलाह। यात्रीजी वहुभाषाविद् छलाह। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, बंगला, पाली, मराठी, तिब्बती, सिन्धी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, रूसी, चानी आदि भाषाक ज्ञाता छलाह।
यात्रीजीकेँ प्रारम्भमे तँ अंग्रेजी भाषाक ज्ञान नहि छलनि मुदा भ्रमणक क्रममे ओ काम चलाऊ अंग्रेजी सीखि लेलनि। यात्रीजी काशीमे रहि संस्कृत भाषाक गहन अध्यययन कएलनि। एहि प्रकारेँ यात्रीजी किछु दिन गाम किछु दिन मातृक सतलखा,किछु दिन कलकत्ता तथा किछु दिन काशीमे संस्कृत साहित्यक अध्ययन कएलनि। एकर बाद बौद्ध भिक्षु भऽगेलाह आ श्रीलंका चलि गेलाह।
यात्रीजी अपन 14 वर्षक उमेरमे संस्कृतसँ प्रथमा पास कएलनि। ओहि वरख तरौनीक प्रतिष्ठित विद्वान पण्डित अनिरूद्ध मिश्रक ध्यान हिनकापर पड़लनि। अनिरूद्ध बावू चारि-पाँच दिन धरि हिनक शिक्षा, बुद्धि आ प्रखरतापर ध्यान दैत रहलाह आ तकरा बाद हिनक पिंगल शिक्षाक गुढ़ता बुझवय लगलाह। किदु छन्दक प्रारम्भिक ज्ञान, पुन: वाल्मीकि आ कालीदासक किछु-किछु प्रसिद्ध पोथी सभकेँ लऽ कए छन्दक सामान्य ज्ञान देलनि। पहिल ‘समस्या’ जे वैद्यनाथ मिश्र पूर्ति कएने छलाह से छल- बलानां दरोदनम् बलम्...।
संस्कृतसँ प्रथमाक बाद आगू पढ़बाक लेल बैद्यनाथ मिश्र जे अपन गाम-घर छोड़लनि आ आगू मुहेँ चलैत रहलाह तकर परिणति ‘यात्री’नामे देखार भेल। बैद्यनाथ मिश्रकेँ विद्यार्थी- वैदेह- यात्री वा नागार्जुन धरिक विशेषण लगबैमे 1925 ई.सँ 1937 ई. धरि पूरा एक युग यानी बारह वर्ष लागल रहन्हि। प्रथमाक बाद गणौली- पंचगछिया रहि तीन वर्षमे ‘मध्यमा’फेर पढ़ाइ अथवा आन किछु करी तकर इतह-तितहमे किछु मास आ अन्तत: पढ़बाक लेल काशी गेलाह। काशीमे प्रख्यात मैथिलीक कवि पण्डित सीताराम झा संस्कृत काव्य दिस झुकैत बैद्यनाथकेँ मैथिली आ हिन्छी कवि कर्म दिस घुमा देलथिन। कविवर सीताराम झा अपन प्रेरणा आ प्रशिक्षण दऽ संस्कृत आ हिन्दी-मैथिली काव्य शास्त्रक अन्तर आ अन्तरसंबंध नीक जकॉं परिछा देने रहथिन। जाहि समय भाषा-शिल्प-बिम्ब आदिक प्रयोगसँ वाक्य विन्यासमे चमत्कार अनबाक रहस्य सीखैत रहथि ओहि कालमे पण्डित बलदेब मिश्र बैद्यनाथकेँ सांस्कृतिक परम्पराक संग वर्तमानकेँ बुझबाक हेतु प्रेरित कैलथिन। दैनिक अखबार आ जनजीवनकेँ निकट जा कए देखबाक जिज्ञास ओहि समयसँ हिनका अन्दर जागृत होमय लागल। पण्डित अनिरूद्ध मिर, कविवर सीताराम झा आ पण्डित बलदेव मिश्र वैद्यनाथक जीवन निर्माणमे तीनटा सबल ईंटा जकॉं छथि जाहिपर पं. बैद्यनाथ मिश्र सन बहुभाषी विद्वान आ काव्य शास्त्र मर्मज्ञ, जनकवि नागार्जुन एवं युग पुरुष यात्रीक विशाल, विलक्षण तथा अविस्मरणीय व्यक्तित्व ठाए़ भेल आगू आबि कए।[15]
यात्रीजी संस्कृत भाषामे रूचि रहबाक कारणेँ प्रथमा, मध्यमा ओ ‘काव्यतीर्थ’क उपाधि प्राप्त कएने रहथि। काशीमे हिनका ज्योतिषाचार्य बलदेव मिश्र, त्रिलोचन झा, रायबहादुर श्रीनाथ मिर सन कतिपय विद्वानकसानिध्यमे रहि कऽ संस्कृत भाषाक गहन अध्ययन कएलनि।
एहि प्रकारेँ मनक अन्त: संघर्ष कतेको तनाव, पारिवारिक बोझ, आर्थिक तंगी आदिकेँ रहैत वैद्यनाथ मिश्र जे शिक्षा ग्रहण कएने छथि ओ अति दु:साहसु कार्य छल।
यात्रीक जीवन वृत एवं आजीविका :-
आधुनिक कालमे विशेष रूपेँ स्वातंप्योत्तर कालमे हिन्दी एवं मैथिली कथा-साहित्यमे यात्रीजीक विशिष्ट स्थान छनि। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्दक बाद हिन्दी साहित्य मध्य समाजक पीड़ित, शोषित, किसान, मजदूर वर्गक जीवनक चित्रण करयबला कथाकारमे नागार्जुन (यात्री)क नाम उल्लेखनीय अछि। हिनक कथा साहित्यमे सामाजिक अत्याचार आ प्रखर शोषणक चित्र प्रस्तुत कएल गेल अछि। प्रेमचन्दक समान यात्री सेहो उमेक्षितक पक्षधर छलाह। ई हिन्दी एवं मैथिलीक प्रखर कथाकार एवं जनवादी चेतनाक कार्यवाहक छथि। हिनका कथाक केन्द्र-बिन्दुमे किसान-मजदूर, दबल-कुचलल गाम घरक लोक रहैत अछि तेँ ई अपन जनवादी चेतनाक अभिव्यक्तिमे मुख्य रूपेँ ‘किसान, मजदूरद्व नारी समाज, दलित एवं निम्न वर्गक लोकक लेल आस्था रखैत छथि। यात्रीजीक समस्त साहित्य हिनक जीवनसँ अभिनन रूपेँ जुड़ल अछि। हिनक जीवनक कथा स्वयं केर अनुभव, विचार, समस्त मानवतासँ जुड़ि हुनक मने हुनक साहित्य थिक। यात्रीजी अपन युग आ समस्त भारतीय समाज राजनीति, धर्म, लोकतंत्र आ जनवाद आदिसँ सतत् जुड़ल रहलाह।
ओना तँ यात्रीजी कथाकारक रूपमे ख्याति पाओने छथि मुदा देखल जाए तँ ई मूलत: कवि छथि। हिनकामे कथाकार, उपन्यासकार, आलोचनक तथा एकटा सुधि चिन्तकक जकॉं अनेक विशेषता विद्यमान छलनि। अपन विशिष्ट शैली, जनवादी विचार, शोषित एवं पीड़ितक दु:ख-दर्दकेँ बुझयबला तथा शोषकक षडयंत्रकेँ उघारयबला निडर, निर्भीक साहित्यकार छथि। पीड़ित लोकसँ आत्मीयतारखबाक कारणेँ हिन्दी एवं मैथिली साहित्य मध्य हिनक एकटा विशिष्ट स्थान छनि। आधुनिक साहित्यकारलोकनि अपन युगीन विशेषता- घात-प्रतिघात, विकृति, विरोधाभाष, समस्या, जिज्ञासा विषमता आदिकेँ विभिन्न विधा सभमे अभिव्यक्त कएलन्हि अछि। यात्रीजी सेहो उपर्युक्त तथ्यसभकेँ अपन साहित्यमे उठेलन्हि अछि।
यात्रीजी बाल्यकालहिसँ एक स्थानसँ दोसर स्थानक यात्रा करैत छलाह। एहन लोकक जीवन यापन कोना होइत छैक ईहो एकटा बिडम्बने अछि। गुजर करबाक लेल कठिन परिश्रमक आवश्यकता होइत छैक, मुदा जे व्यक्ति उपनयन संस्कारक बाद अपन गाम-घर त्यागि पड़ा जाए, साधु बनि जाए, बौद्ध भिक्षु बनि जीवन-यापन करैत हो ओहेन व्यक्ति अपन जीवन-यापनक हेतु रोजगार कतए खोजत? जखन जीवनक बहुमूल्य समय नव-यौवनमे धन कमयबाक छल ताहि समय ओ कोलम्बो, तिब्बत आ वर्मामे घुमि-घुमि बितौलनि तखन रोजगार कतए भेटत।
हिनक जन्म मिथिलाक एकटा साधारण परिवारमे भेल छल। खेत-पथार ओहेन नहि रहनि जाहिसँ जीविका चलि सकए। पिता कोनो तरहेँ पोसि कए युवक बनौलकनि। मुदा हिनक तँ जन्म भेल छल साहित्य साधना करबाक लेल। तेँ ई अपन जीविकोपार्जनक साधन एकमात्र साहित्य साधना बुझलनि। आ एहि क्षेत्रमे एकसँ एक नवीन अध्याय जोड़ैत गेलाह।
ई बात सत्य जे भाग्यहीन होयबाक बादो जँ मनुष्य प्रतिभा सम्पन्न होइछ तँ ओकर विकास होयब निश्चित अछि। कोनो प्रकारक संकट किएक नहि हो, जँ लक्ष्य प्राप्त करबाक मनोभाव रहैछ तँ बेरा पार अवश्य लागि जाइत अछि।
सन 1932 ई.मे यात्रीजीक विवाह मिथिलांचलक सुदूर देहात मधुबनी जिलाक हरिपुर ढंगा गाममे अपराजिता देवीक संग भेलनि। दुई वर्षक बाद दुरागमन सेहो भऽ गेलनि मुदा एहन सन्यासीकेँ एहि समयमे एकर आवश्कता नहि छल आ ओ पुन: अपन गाम घरकेँ छोड़ि पड़ा गेलाह। यात्रीकेँ कहियो धनक लालसा नहि छल। एकटा प्रश्न सभक मनमे उठैत अछि जे ओतेक प्रतिभा सम्पन्न यात्री छलाह तखन नोकरी किएक नहि भेलन्हि? मुदा एक सटीक उत्तर हुनक धर्म पत्नी अपराजिता देवी अपन एकटा साक्षात्कारमे एहि प्रकारेँ देने छथि-
“हुनकर अपन खुशी जे नौकरी नहि कएल अंग्रेजक विरोध करैत छलाह। गाँधीक संग रहैत छलाह। चारि बेर जेल गेल छथि। सन्यासी भऽ गेलाह। सन्याससँ लौटलाक बादो गृहस्थी बसेबाक लेल ओ तैरूार नहि भेलाह। हमरा अन्न-पानि नैहरसँ आबि जाइत छल। किछु पाइ हुनक लिखल अखबारक रचनासँ आ किछु जेलक भत्तासँ अबैत छल। जाहिसँ हमर पारिवारिक गुजर-बसर कोनो तरहेँ चलैत छल।”[16]
एहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे यात्रीजी अपन आजीविकाक कोनो स्थायी नहि कऽ सकल छलाह। समय-समयपर अपन रचनाकेँ प्रकाशित भेलाक उपरान्त जे कठोर परिश्रमक कमाई होइत छल ओहिसँ पारिवारिक भरण-पोषण होइत छलनि।
मूलत: आजन्म यात्रीजीक जीविकाक एक मात्र साधन इएह रहलनि ओना शोभाकान्त एवं सुकान्त दुनू बेटा स्वयं कमासुत भऽ गेलाक बाद ओते कष्ट नहि रहलन्हि।
बादमे बिहार सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, बंगाल सरकार ओ अनेक संगठन पुरस्कार स्वरूप यात्रीजीकेँ अनेको बेर सहायता भेटलनि। जाहिसँ हिनक गुजर-वसर चलैत रहलन्हि। परिवारक बोझ हिनकापर नहि रहलन्हि संगहि कोनो तरहक लालसा सेहो नहि रहलनि। मुदा एकटा महान कथाकारक आर्थिक व्यथाक कथा हृदय अवश्यक विदीर्ण कऽ दैत अछि।
यात्रीक विभिन्न नाम एवं भिक्षु जीवन-
यात्रीजी तीन नामसँ साहित्य जगतमे सुविख्यात छथि। हिनक जन्म समय नाम पड़ल ‘ठक्कन’। एकरा बाद हिनक नामकरण कएल गेल वैद्यनाथ जे कौलिक उपनामक कारणेँ ‘वैद्यनाथ मिश्र’नामसँ प्रसिद्ध भेलाह। हिन्दी साहित्यमे नागार्जुन तथा मैथिली आ संस्कृत साहित्यमे ‘यात्री’क नामे परिचित छथि। अपन प्रतिभा एवं पढ़ाकू प्रवृत्तिक कारणेँ गामक लोक हिनका ‘विद्यार्थी’कहि सेहो सम्बोधित करैत छलाह। यात्रीक एकटा उपनाम ‘वैदेह’सेहो छनि।
पिता गोकुल मिश्र आ माता उमा देवीकेँ ‘यात्री’क जन्मसँ पूर्व चारिगोट संतान जन्म लैतहि काल कवलित भऽ गेल छलनि। दुनू मिश्र दम्पत्ति पुत्रक लेल अति चिन्तित रहैत छलाह। पुत्रक इच्छासँ दुनू प्राणी ‘बाबा वैद्यनाथ’ (देवघर) मे जा हुनक पूजा-अर्चना अति भक्ति-भावसँ कएलनि। वैद्यनाथ बाबाक कृपासँ पुत्र जन्म लेलकनि।
मुदा मनमे आशंका छनि जे अन्ये पुत्र जकॉं ईहो ने ठकि कए चलि जाए। तेँ बालक यात्रीक जन्म होइतहि सभकियो हिनका ‘ठक्कन’कहए लगलनि। चूमि वैद्यनाथ बाबाक आशीर्वाद स्वरूप हिनक जन्म भेल छलनि तेँ हुनकहि नामपर बादमे हिनक नाम ‘वैद्यनाथ मिश्र’राखल गेल।
वैद्यनाथ मिश्र जखन मैथिली आ संस्कृतिमे साहित्य लेखन करैत छलाह तखन ओ ‘यात्री’नामसँ लिखैत छलाह। चूमि हिनक जन्महिसँ हिनक कुल-परिवारक लोक प्रयाण कऽ जएबाक आशंकासँ चिन्तित छल, तेँ बादमे ‘यात्री’क नामसँ कविता आ उपन्यास लिखय लगलाह। यात्रीजी एहि नामक प्रसंग स्वयं लिखैत छथि :- “ओना पहिल साहित्यिक नाम यात्री छल। संस्कृत आ मैथिलीमे ‘यात्री’क नामसँ लिखि रहल छी। बहुत लोककेँ तेँ पतो नहि छनि जे यात्री आ नागार्जुन एके व्यक्ति अछि।”[17]यात्रीजी विभिन्न पत्र-पत्रिका सभमे लिखैत छलाह आ यात्री नामसँ लेखन करबासँ पूर्व वैद्यनाथ मिश्र ‘वैदेह’नामे लिखैत छलाह।
हिनक नाम नागार्जुन कोना पड़ल ताहि प्रसंगयात्रीजी स्वयं लिखैत छथि :- “मैं राहुल जी के साथ यात्रा पर निकल गया... फिर हम लंका गये। वहाँ मैं बौद्ध भिक्षु हो गया। उसी स्थान पर मुझे नागार्जुन नाम दिया गया, जो चल रहा है।”[18]एहि प्रसंग बाबूराम गुप्तक कहब छनि जे- भारतक विभिन्न खेत्रक भ्रमण करैत नागार्जुन सन् 1936 ई.क अन्तमे सिंहल द्विप (श्रीलंका) चल गेल। ओतहि ओ गृहस्थ रूप छोड़ि ‘चीवर’ धारण कएलनि। ओहिठा ओ बौद्ध जगतक प्रख्यात, लंकाक प्रचीन विद्यापीठ- विद्यालंकार- परिवेणमे पहुँचि कए बौद्ध धर्ममे दीक्षा प्राप्त कए बौद्ध भिक्षु बनि गेलाह। ओ प्रख्यात बौद्ध तत्ववेताक दर्शनिक ग्रन्थ सभक अनुवाद करय चाहैत छलाह आ ओ वैद्यनाथ मिश्रक स्थानपर अपन नाम ‘भिक्षुनागार्जुन’ कऽ लेलनि।[19]
यात्रीजी जखन लंकासँ भारत अएलाह तँ रामवृक्ष बेनीपुरीजीसँ मिललनि। बेनीपुरीजी हुनका ‘नागार्जुन’नामसँ लिखबाक सलाह देलखिन। यात्रीजी हुनक सलाह मानि हिन्दी साहित्यक लेखन नागार्जुनक नामसँ करय लगलाह। एही नामसँ हिन्दी जगत मे अपन पृथक स्थ्ज्ञान बना लेलनि। जखन वैद्यनाथ मिश्र संस्कृतमे लिखैत छलाह तँ ओहि समय ‘चाणक्य’आ मैथिलीमे ‘यात्री’नामसँ सुविध्यात भेलाह। एहि प्रकारेँ यात्रीक पृथक-पृथक नाम आ पृथक-पृथक नामसँ कएल गेल लेखन अद्यावधि उपलब्ध अछि।
विवाह एवं पारिवारिक जीवन :-
19 सम वर्षक आयुमे सन 1930 ई.मे यात्रीजीक विवाह अठारह वर्षीय अपराजिता देवीसँ भेलनि। यात्रीजीक मनमे सदैव अपन पत्नीक प्रति सहानुभूतिक भावना रहलनि, मुदा ययावरी जीवनक कारणेँ उचित स्नेह नहि दऽ सकलाह। सन् 1938 ई.सँ 1941 ई. धरि घर छोड़ि भ्रमण करैत रहलाह। एकरा बाद पुन: गृहस्थीमे निमग्न रहलाह मुदा हिनक संबंधी एवं मित्रलोकनिक कहब छनि जे एहन गृहस्थीसँ संयासीए रहब उचित छल।
यात्रीजी घुमक्कर प्रवृत्तिक लोक छलाह। अपन पिताक प्रति तिरस्कारक भावना जे हिनका पिताक दुर्व्यवहार सन प्रवृतिक कारण उत्पन्न भेल छल, ज्ञान प्राप्तिक जिज्ञासा एवं पिताकेँ दण्डित करबाक उद्देश्येँ ई घर त्यागि देने छलाह। मुदा पत्नीक प्रति हिनका सदैव स्नेह आ सहानुभूति रहैत छलनि।
यात्रीजीक सम्पूर्ण जीवन आर्थिक संघर्षक रहल ई हिनका विषयमे उपलब्ध जे कोनो ग्रन्थ अछि ओहिसँ स्पष्टत: प्रमाणित भऽ जाइत अछि। प्रारम्भमे जीवन निर्वाहक लेल ‘बुढ़वर’ ‘विलाप’ नामसँ आठ-आठ पेजक दू गोट पोथी छपबा कऽ स्वयं रेलगाड़ीक डिब्बामे घुमि-घुमि बेचैत छलाह आ एहिसँ उत्पन्न आयसँ अपन गृहस्थी चलबैत छलाह। यात्रीजी पिताक आग्रहपर किछु दिन लुघियानामे जैनमुनि उपाध्याय आत्मारामजीक साहित्य निर्मित काज हेतु नौकरी सेहो कएलनि मुदा वेतनभोगी बनब हिनका स्वीकार्य नहि छलनि तेँ नौकरी छोड़ि देलनि। ई भरि जीवन अपन साहित्य सृजनक प्रकाशनसँ प्राप्त रायल्टी एवं मिथिलाक देहातमे अल्पमात्रामे खेती-बारीक आयपर निर्भर रहलाह।
पिताक मृत्युक बाद यात्रीजी अनाथ भऽ गेलाह। पैतृक गामक घर-गृहस्थीक सभ भार पत्नी अपराजिताक ऊपर आबि गेलनि। अपराजिता देवी भू-स्वामी किसानक बेटी छलीह। भूमिक महत्व ओ बुझैत छलीह। हुनका शहरक वातावरण कथमपि रास नहि अबैत छलनि ओना यात्रीजीकेँ सेहो शहरक ताम-झाम पसिन्न नहि छलनि मुदा साहित्यिक कार्यक हेतु हुनका शहरसँ संबंध राखब आवश्यक बुझाइत छलनि। तेँ अपराजिता देवी ई निर्णय लेलनि जे ओ गामे धी कए रहतीह आ पतिकेँ (यात्रीकेँ) जतए जेबाक होनि ओ जाथु।
यात्रीजी अपन परिवारक भरण-पोषणक चिन्ता कहियो नहि केलनि। ओ सतत् भ्रमणशील रहलाह। एहि अभ्यंतर पत्नी अपराजिता देवी थोड़-बहुत खेत-पथार आ नैहरक बलेँ अपन बाल-बच्चाक उदर पोषण करैत रहलीह। मुदा एहि बातकेँ कथमपि नहि नकारल जा सकैछ जे हुनका घरक चिन्ता नहि रहैत छलनि। ओ अपन पत्नी आ धिया-पुताक उदरपोषणक हेतु सेहो सदिखन चिन्तित रहैत छलाह। एहि कारणेँ ओ अपन भ्रमणक क्रममे- पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, कठियावाड़ सिंहल द्विप, जतए-जतए गेलाह ओहिठामक प्राकृतिक रूप, लोकजीवन साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म आदि संबंधी ज्ञान प्राप्त कएलनि। सन् 1951 ई.मे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धामे ओ नौकरी कएलनि मुदा सेहो उपजिविका चलेबाक हेतु। कखनहुँ कविता गाबि कऽ बेचैत छलाह, कखनहुँ अनुवादकक रूपमे चाकरी कए कऽ साहित्य लेखन करैत छलाह। कखनहुँ अध्यापकक रूपमे। एहि विविध अस्थायी कार्य सभसँ जे किछु उपार्जन होइत छलनि ताहिसँ अपन खर्चक अतिरिक्त जे बँचैत छलनि ओ पत्नीकेँ पठा दैत छलथिन। यात्रीजीकेँ अपन पत्नी आ घरक चिन्ता सतत रहैत छलनि, मुख्य रूपसँ आर्थिक संकटक। जकर प्रमाण 7 अगस्त 1976 ई.क लिखल हुनक निम्न पत्रमे दृष्टिगत होइछ जे ओ अपन पत्नीक नामे लिखने छथि-
c/o राजकमल प्रकाशन
8 फैज बजार दिल्ली- 6
7-8-76
सोस्ति सिरी अपराजिताजी,
निकेँ रहू। हम आइ भोरखन दिल्ली पहुँचल छी। एक मासक प्रोग्राम अछि। कृष्णाष्टमीसँ पूवेँ टाका अहाँकेँ पहुँचि जायत। बउआ झाकेँ कहबइक- पाँच टाका जमा कऽ कऽ नेहरावला बंक मे अपन खाता खुजबा लेत। हम ओकरे नामे ड्राफ पठा देबइक।
-ना.
बी- 3/113 जनकपुरी
नई दिल्ली- 58
स्वस्ति!
आइ टुनाइक चिट्ठी आयल अछि। ओ एहिठाम आबि रहल अछि। अही ठाम रहत- काज ओकरा भेटिए जेतइ।
बउआ झा कत’अछि? दयानाथ एको बेर आयल छथि की नहि? मंजुलियाक ननकिरबी निकेँ रहइ छइ की नहि? बेसी की लिखू? हमरा दम्मा परेशान कऽ देने छल। आब निकेँ भेल छी।
-ना.
उपर्युक्त दुनू पत्र हमरा बुझने प्रयाप्त अछि यात्रीजीक पारिवारिक पृष्ठभूमिक चित्रांकन करबाक हेतु। यथार्थमेमैथिली साहित्यक महामानव नागार्जुन आ मैथिली साहित्यक काव्य मनीषी यात्रीक एहि पत्रक कथामे जे व्यथाकेँ उकेड़ैत अछि ओ हृदयकेँ द्रवित कऽ दैत अछि। एतेक आर्थिक संकटसँ विपन्न लोक साहित्य सृजय कऽ सकैछ ई वर्त्तमान समयमे कोनो कल्पनासँ कम नहि। मुदा सत्य तँ इएह थिक। यात्री जे ने आर्थिक रूपेँ भरि जन्म संघर्ष करैत रहलाह वल्कि दर्दसँ सेहो जुझैत रहलाह जे दर्द हुनक उपर्युक्त पत्रमे दृष्टिगत होइत अछि।
यात्रीजी पंजाबमे ‘दीपक’ नामक मासिक पत्रिकाक सम्पादनक कार्य सेहो कएलनि। अपन पोथीक प्रकाशनक हेतु ‘यात्री’ नामक प्रकाशन सेहो खोललनि मुदा से अर्थाभावक कारणेँ बन्द भऽ गेल। गुजरातमे जैन मुनि ‘रामचन्द्र’ सँ हिनका भेँट भेलनि जे आगू पढ़बाक आदेश देलकनि। हुनक आज्ञा मानि यात्रीजी ‘प्राचीन भारतीय भाषा प्राकृत, पाली, अपभ्रंशआदि भाषाक अध्ययन कएलनि। ओ पाली भाषाक अध्ययन कएलन्हि जाहि क्रममे हुनका बुद्धक क्रान्तिकारी विचार अति प्रभावित कएलकनि। यात्रीजी श्रीलंकामे बौद्ध दर्शनक अध्ययन कएलनि आओर ओतहि 1936 ई.मे बौद्ध धर्मकेँ स्वीकार कएलन्हि।
यात्रीजी अपन जीवन निर्वाह करबाक लेल किछु दिन अध्यापन कार्य सेहो कएलनि। सिंघल प्रान्तमे प्राचीन भाषाक अध्ययन सेहो कएलनि। श्री लंकामे हिनका वामपंथी पार्टी दिस झुकान भेलनि।
यात्रीजीकेँ कुल छ: गोट संतान छनि जाहिमे चारि गोट पुत्र- शोभाकन्त, सुकान्त, श्रीकान्त, श्यामाकान्त तथा दू गोट पुत्री जनिक नाम छनि- उर्मिल आ मंजू। वर्त्तमानमे पुत्र ‘सुकान्त’‘सुकान्त सोम’क माने मैथिली साहित्यमे प्रसिद्ध कथाकारक रूपमे ख्याति छथि मुदा अन्य सन्तान आर्थिक विपन्नताक कारणेँ ओतेक पढ़ि-लिखि नहि सकलाह।
यात्री प्रतिभा ओ व्यक्ति:-
जखन कोनो व्यक्तिक मरण भऽ जाइत छैक तखन ओकर व्यक्तित्वकेँ संस्करणात्मक रूपमे संजोगि कऽ रखबाक प्रयोजन पड़ैत अछि। तेँ लोक अपन आत्मीय जनक संस्करण लिपिबद्ध कऽ लैत अछि। मैथिली साहित्य मध्य यात्रीजी अपन अप्रतिम प्रतिभा लऽ अवतीर्ण भेल छलाह। हुनक ई प्रतिभा अर्जित नहि नैसर्गिक छलनि। एकर उपयोग ओ अपन जीवनक विषम परिस्थितिमे करबामे पूर्णत: सफल रहलाह। एहि तथ्यक परिज्ञान समाजकेँ हुनक मृत्युक पश्चात भेलैक।
ई बात एहिसँ स्पष्ट होइछ जखन यात्रीजी गीताक- “स्वधर्मे निधनं श्रंय: परधर्मो भयावह:”क वचनक उल्लंघन कए-
“अहिवातक पालितल फोड़ि-फोड़ि
हम जाय रहल छी आन ठाम।”
लिखि नव विवाहिता पत्नीकेँ त्रूागि बौद्ध भिक्षु भए गेल रहथि। ओहि समय कर्मकाण्डक प्रतिष्ठा रखनिहार तरौनी गामक ब्राह्मण समाज हिनका मात्र कुल नहि, समाजोक हेतु कलंकित पुत्र मानने छलनि। मुदा अठासीम वर्ष पूर्ण कएलाक बाद हुनक मृत शरीरकेँ पूर्ण तामझामक संग, पुष्पमाल्यसँ आच्छादित कएने बिहार सरकारक प्रशासन विभाग अन्त्येष्ठि हेतु तरौनी गाम पहुँचल तँ सम्पूर्ण मिथिलावासी अश्रुजलसँ तिलांजलि दैत श्मशान भूमिकेँ दलमलित कए देलक, तखन ई कुल-कमल तरौनी गामक गौरव ओ मिथिलाक विभूतिक रूपमे वन्दित-अभिनन्दित भेलाह। एहन सम्मान साहित्यकारक कोन कथा, राजपुरुषो लोकनिकेँ भेटब दुर्लभ अछि। ई सभ हुनक प्रकृति प्रदत्त प्रतिभेक प्रतिफल थिक।
यात्रीजी कोनो शास्त्रीय गम्भीर अध्ययन नहि कएलनि। कतहु अपन पांडित्यक प्रखर चमत्कार नहि देखौलनि। कोनो सिद्धान्त ग्रन्थ नहि लिखलनि। शोध कार्य कऽ कोनो नव तथ्यक उद्घाटन सेहो नहि कएलनि। मुदा जाहि नव-नव बाटपर अपन डेग उठौलनि तकर अन्तिम छोड़ धरि पहुँचि गेलाह। ई हुनक असीम प्रतिभाकेँ प्रदर्शित करैत अछि, कारण कोनो व्यक्तिक प्रतिभा व्यक्तिमे निहित रहितो व्यक्तित्वसँ पृथक अपन अस्तित्व रखैत अछि।
यात्रीजी विचारसँ यद्यपति घोर नास्तिक रहथि। जनउ-तनउकेँ ओ पाखण्ड मानैत छलाह। तथापि बौद्ध धर्मसँ पुन: सनातन धर्ममे अएबाक हेतु पुन: अपन उपनयन कएने रहथि। स्वाभावोक्ति हिनक रचनाक अलंकार थिक आ दैनन्दिन जीवनक प्रयोगमे अबैत ठेंठ शब्दावली शृंगार। पण्डिताम भाषासँ ई अपनाकेँ दूरे राखब श्रेयस्कर मानैत छलाह जाहि कारणेँ सामान्यो लोककेँ हिनक रचनाक आस्वादनसँ आनन्द भेटैत छलैक।
हिनक जनउ-तनउ प्रसंगकेँ पाखण्ड कहब उक्ति जे ऊपर वर्णित अछि तकर मूल प्रमाण पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क निम्नलिखित संस्मरणसँ भेटि जाइत अछि। एहि संस्मरणमे अमरजी लिखैत छथि-
“श्री सुमनजीक बालक श्री व्रजेन्द्रजीक उपनयन छलनि। पं. सहदेव झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी, काशीनाथ ठाकुर ‘कलेश’क संग हम पहिने वल्लीपुर पहुँचि गेल रही। स्नान जलपानादिसँ निवृत होइत करीब एक बाजल, देखैत छी घामे-पसीने तरबतर यात्रीजी धुरिअयले पैरेँ धम्म दए आबि बैसि गेलाह। कियो पंखा हौंकय लगलनि, क्यो पैर धोयबाले पानि अनलक। श्री सुमनजीक अनुज भूपेन्द्र बाबू कककरो शर्बत आनय कहि, हिनका पैर धोयबाक आग्रह करय लगलथिन। मुदा ने कुर्ता बाहर कएलनि ने पैर धोलनि। कहलथिन- हम राति समस्तीपुर मुसाफिर खानामे सूतल छलहुँ, भोरे उठि कए विदा भेलहुँ से एखन पहुँचलहु अछि, बड्ड भूख लागल अछि। भूपेन्द्र बाबू कहलथिन- पैर धो लेब तँ ठंढ़ा जायब। जलखै चूड़ा-दही, सोहारी-तरकारी, दुनूमक व्यवस्था छैक, जे इच्छा हो।यात्रीजी कहि उठलथिन- ने दही-चूड़ा, ने सोहारी-तरकारी, हम गूड़क संग चूड़ा फाँकब। घरबैया असमंजसमे, पाहुन पड़क चकित, ग्रामीण विस्मित, मुदा यात्रीजी जिद्दपर अड़ल रहलाह। जे बाजल छलाह सैह कएलनि। चूड़ा फाँकि शर्बत पीबि दीर्घ निसास लए हमरा कानमे कहलनि-
मामाजी, हम उपनयमे अयलहुँ अछि, मुदा जनउ नहि अछि, तकर जोगार धराउ। तेँ कुर्ता नहि बाहर करैत छी, एहि घटनामे एक नाटकीयता सेहो छल।”[20]
यात्रीजी कविता, कथा, उपन्यास, रिपोर्ताज आदि सभ किछु लिखलनि, मुदा नाटक दिस दृष्टि नहि उठौलनि, परन्तु अपन क्रिया-कलापसँ सर्वग नाटकीयता बनौने रहैत छलाह। अलबटाह बगय-बानी, बाणी सेहो पूर्णत: स्फुट नहिए छलनि तथापि भाव-भंगिमा ओ कलममे तेहन चुम्बकत्व छलनि जे व्यक्तिकेँ आकृष्ट कए लेबाक अद्भुत क्षमता रखैत छलनि।
यात्रीजी गम्भीर व्यक्तित्वक लोक कखनहुँ नहि बुझाइत छलाह। जेहने भेष-भूषा तेहने स्वभाव। हँसी-चौल हिनक व्यक्तित्वक पर्याय बनल छल। तेँ लोक हिनका हल्लुक व्यक्ति मानैत छलाह। जकर प्रमाण अमरजीक एहि संस्मरणमे देखबामे अबैछ-
सुमनजीक बालकक उपनयमे जखन यात्रीजी बल्लीपुर गेल रहथि तँ ओहिठाम एकसँ एक महारथी लोकनि पहुँचल रहथि। बल्लीपुर ओहनहुँ जमीन्दारी ठाठ-बाठक लेल प्रसिद्ध छल। ओहि उपनयनमे कतोक प्रसिद्ध गायक सभ अपन गायन कऽ रहल छल। ओहिठाम राजदरभंगाक अनेक अधिकारी लोकनि जेना- पं. गिरीन्द्र मोहन मिश्र, दुर्गानन्द झा, प्रो. रमानाथ झा, आदिक काफिलसँ महफिल सजल छल। समावर्त्तन संस्कार चलि रहल छलैक। सम्पूर्ण आँगन गदमद भरल छल। एकटा गवैया शास्त्रीय, कोनो रागमे मूर्च्छानाक संग आलाप लेलनि। ओहि गम्भीर वातावरणक गम्भीरताकेँ भंग करैत यात्रीजी चिचिआइत उठि कए ठाढ़ भए गेलाह। सुमनजीक अनन्य सखा श्री नूनू बाबू दौड़ल लग जा पुछलथिन- ‘की भेल?’ यात्रीजी जोरसँ बाजि उठलाह- ‘हमरा गाममे एकटा बकरी एहिना मेमिआइत-मेमिआइत मरि गेलैक।’ से कहैत दलान दिस चल गेलाह।[21] उपस्थित जन समुदायमे व्याप्त विस्मय हास्यमे परिवर्तित भए गेल, किछु गोटेमे क्रोध तँ किछु गोटेमे खोभ सेहो परिलक्षित भेल। गायक लोकनि सेहो क्षुब्ध भऽ गेलाह। यात्रीजीक व्यक्तित्व एहने सदावहार छलनि।
यात्रीजीक नाम पिता रखलथिन ‘ठक्कन’तँ हुनको हेतु अपन नामकेँ सार्थक कएलनि। अपने उपनाम रखलनि यात्री तँ तकरो सार्थक कएलनि। मात्र जे कियो नाम रखलथिन ‘नागार्जुन’से नाम भने सभसँ बेसी प्रसिद्ध पौने होनि, मुदा ओकरा सार्थक नहि राखि सकलाह। तकर श्रेय हिनक धर्मपत्नी अपराजिता देवीकेँ छनि जे तरौनीक घराड़ीकेँ आजीवन सेवि कए धयने रहलीह। जाहि प्रसादेँ जाहि मिथिलाकेँ अन्तिम प्रणाम कए चल गेलाह, ताही मिथिलाक माटिमे हिनक शरीर पंचत्वमे विलीन भए सकलनि।
यात्रीक जीवनक संक्षिप्त यात्रा-
हिनक मूलनाम बैद्यनाथ मिश्र यात्री छलनि। जन्मक बाद पीसी द्वारा हिनक नाम ‘ठक्कन’राखल गेल। साहित्यिक नामक रूपमे ई वैदेही, यात्री, नागार्जुन नामे ख्याति पाओलनि। पिताक नाम गोकुल मिश्र तथा माताक नाम उमा देवी छलनि। हिनक जेष्ट पूर्णिया 11 जून 1911 ई.केँ तरौनी, जिला दरभंगामे भेल छलनि तथा मातृक मधुबनी जिलाक सतलखा गाममे भेल छलनि। यात्रीजीक विवाह अषाढ़ 1931 ई.मे श्री कृष्णकान्त झा उर्फ कंटीर बाबूक कन्या अपराजिता देवीक संग भेल छलनि तथा तकरा तीन वर्षक बाद सन 1934 ई.मे दुरागमन भेल छलनि। यात्रीजी जखन तिब्बतक यात्रापर छलाह तखन सन 1943 ई.मे हिनक पिताक देहान्त भेल छलनि। पत्नी अपराजिता देवीक अवसान 19 फरवरी 1997 ई.केँ तथा हिनक देहावसान 5 नवम्बर, 1998 ई.केँ भेलन्हि।
मातृहीन ठक्कन पाटी आ गबिसक संग गामक लोअर प्राइमरी स्कूलमे प्रवेश कएलनि। पिताक द्वारा अंग्रेजी माध्यमक विद्यालयमे प्रवेशसँ वर्जित राखल गेल। हिनका पुरोहित कर्म हेतु जीविकोपार्जनक योग्यता प्राप्त करबा लेल गामक टोल पाठशालामे प्रवेश कराओल गेल, जाहि ठामसँ ई प्रथमाक परीक्षा उत्तीर्ण कएलन्हि। संस्कृत विद्यालय गोनोलीसँ मध्यमा प्रथम वर्ष, पंचगछिया संस्कृत विद्यालयसँ शास्त्री प्रथ्ज्ञम खण्ड (1931), कलकत्ता गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज कलकत्तासँ शास्त्री (द्वितीय खण्ड, 1922) आ काव्य तीर्थक शिक्षा ग्रहण कएलन्हि।
यात्रीजीकेँ छओसँ बेसी भाषाक ज्ञान छलनि जाहिमे मैथिली, संस्कृत, हिन्दी, बंगला, प्राकृत, सिंहली आदि-आदि। यात्रीजी श्री लंकाक विद्यालंकार परिवेण मठसँ सन् 1937 ई.मे नायकपद आनन्दसँ दीक्षा लए ‘नागार्जुन’बनलाह।
स्वामी के शवानन्दक अनुरोधपर साहित्य सदन, अवोहरक पत्रिका ‘दीपक’क दू वर्ष सम्पादन कएलनि तथा लुधियानाक जैन मन्दिर (1941-42) धरि एवं हैदराबाद वर्त्तमानक पाकिस्तानक सिन्ध प्रान्तक सारस्वत ब्राह्मण पाठशालामे अध्यायन कएलनि। सिंध राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हैदराबादक मुखपत्र ‘कौमी बोली’क संपादन सेहो किछु दिन कएलन्हि। भारतीय ज्ञानपीठ काशीमे 1945 ई.मे नौकरी सेहो पकड़लनि। एकर अतिरिक्त राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धामे किछु मास सन 1951 ई.मे नौकरी कएलनि।
यात्रीजी निरंतर पाठावस्थामे एक विद्यालयसँ दोसर विद्यालयमे यात्रा, एक स्थ्ज्ञानसँ दोसर स्थानक यात्रा, एक श्खहरसँ दोसर शहरक यात्रा करैत रहलाह। सन 1037 ई्मे केलेनिया (श्रीलंका) विद्यालंकार परिवेण मठ, श्री लंकाक यात्रा, राहुल सांस्कृत्यायनक संग जून 1938 ई.मे अस्वस्थताक कारणेँ तिब्बतक अपूर्ण यात्रा, 1942-43 मे एकसरे थोलिंग महाविहार तिब्बतक यात्रा कएलनि। महाकवि यात्री मैथिली कविक रूपमे रूसक यात्रा अर्थात् जा धरि काया संग देलकनि ता धरि भरि जन्म निरंतर भ्रमणशील रहलाह।
सहजानन्द सरस्वतीक किसान आन्दोलनमे सक्रिय भेलाक कारणेँ 20 फरवरी 1930 ई.मे छपराक अमवारी जेलमे बन्दी बनाओल गेलाह। एहि क्रममे हजारीबाग आ भागलपुर जेलक यात्रा स्थानान्तरणक कारणेँ सेहो भेलनि। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक हत्याक उपरान्त प्रकाशित कविता ‘शोषिण तर्पण’क कारणेँ सन 1948 ई.मे सेहो जहल कटलनि। जे.पी. आन्दोलनमे 26 मार्च 1976 ई. के पटना हाइ कोर्टक आदेशपर आराक जेलसँ मुक्त भेलाह।
तरौनीक पण्डित अनिरूद्ध मिश्रक प्रेरणासँ वाल्यावस्थामे संस्कृतमे समस्या पूर्तिसँ काव्य यात्राक श्री गणेश कएलनि। काशी अएलापर कविवर सीताराम झाक सम्पर्क आ प्रेरणासँ मैथिलीमे रचना प्रारंभ कएलनि। हिनक पहिल रचना मैथिलीक पत्रिका ‘मिथिला’मे सन् 1929 ई.मे प्रकाशित भेल। संस्कृत, मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, बंगला आदि भाषामे काव्यारंभ कएलनि। दरभंगाक महारानी लक्ष्मीवती द्वारा उदियमान बालकक हेतु स्थापित संस्था बालवर्धनी सभ तथा काशी द्वारा काव्य रचना हेतु यात्रीजी पुरस्कृत कएल गेलाह। एहि सभाक कर्त्ताधरता पण्डित बलदेव मिश्र छलाह। सन 1968 ई.मे पत्रहीन नग्न गाछ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारती उत्तर प्रदेश, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान मध्यप्रदेश, राजेन्दशिखर सम्मान बिहार, राहुल सांकृत्यायन सम्मान, पश्चिम बंगाल, साहित्य अकादमीक महत्तर सदस्य 1994 ई.मे तथा चेतना समिति पटना द्वारा सन् 1977 ई.मे सम्मानित कएल गेलाह।
चेतना समितिक स्थापना, 18 जुलाई 1954 ई. केँ महाकवि यात्रीजीक प्रेरणा आ मार्गदर्शनक कारणेँ संभव भऽ सकल।
यात्रीक रचना संसार (कृतित्व)
कविशेखर ज्योतिरीश्वर- विद्यापतिसँ अविच्छिन्न रूपेँ प्रवाहित मैथिली काव्यधारामे महत्वपूर्ण मोड़ अननिहार कविलोकनिमे मनबोध, चन्दा झा, कविवर सीताराम झा प्रभृत कतोक महाकविलोकनिक नाम लेल जा सकैछ। मुदा ओकर गतिकेँ तीव्रतम कऽ ओकरा आधुनिक युगक कोनो अन्य समृद्ध भाषाक काव्य-प्रवाहक समानान्तर लऽ अनबाक श्रेय जाहि एक मात्र कविकेँ देल जाइछ, ओ छथि ‘यात्री’क उपनासँ सुविध्यात ‘श्री बैद्यनाथ मिश्र। यात्रीक प्रसंग डॉ. भीमनाथ झाक कथन छनि-
“हिन लेखनीसँ नि:सृत मैथिली कविता अपन ओहेन सुच्चा सुवाससँ वातावरणकेँ महमहा देलक जकर सुगन्ध लेबाक लेल दूर-दूरक लोक स्वत: आकृष्ट भऽ गेल। वस्तुत: आकृष्ट करऽवला हिनक विलक्षण व्यक्तित्वो अछि- अपन गाम-घरक भारसँ अपनाकेँ कात रखबाक चेष्टामे रत रहऽ बला फक्कड़ व्यक्तित्व; सतत भ्रमनशील, समाज संसरक रग-रंगकेँ परखऽबला पारखी व्यक्तित्व; रूढ़ि भंजक, श्रम-शक्तिक पूजक, व्यवस्थाक विद्रोही, नवीन पीढ़ीक प्रति आवेशी व्यक्तित्व। अपन जीवने जकॉं मैथिली कविताकेँ संकीर्ण छन्दक बन्धनसँ मुक्त कऽ सर्वहाराक प्रस्त बाटपर उन्मुक्त विचरण करबाक हेतु छोड़ि देलनि।”[22]
आधुनिक मैथिली साहित्यमे यात्रीजीक नाम अविस्मरणीय बनि गेल अछि। गद्य (उपन्यास) एवं पद्य (काव्य) दुनू क्षेत्रमे अपन रचनाक गुण-धर्म, ओजस्विता, जनगणमनक भावनाक सहज साधारणीकरण, भाषाक भूगंध एवं जनसंदेदनाक मनोगंधक बलेँ मैथिली ओ हिन्दी दुनू साहित्य जगतमे यात्री ओ नागार्जुनक रूपमे चिरस्मरणीय बनल रहलाह।
बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’आ नागार्जुनक रूपमे अनेक विधामे रचना कएने छथि, मुदा उपन्यास ओ कविता हुनक प्रमुख ओ विशिष्ट क्षेत्र रहल अछि। बङला ओ संस्कृतमे तँ मात्र काव्ये रचना कएने छथि। एहू दुनूमे कविक रूपमे हिनक देखब विशेष रूपेँ उपयुक्त लगैत अछि। उपन्यास हो अथवा कविता दुनूमे ई जन सामान्यक पक्षधरताकेँ उजागर कएने छथि, विशेष शैलीमे विशेष प्रभावी ओ लोक प्रचलित भाषमे।
यात्रीक रचना :-
यात्रीजीक रचनाकाल करीब सत्तरि वर्ष रहल। एहि अवधिमे हिन्दीमे तँ हिनक कतोक पोथी प्रकाशित भेल मुदा मैथिलीमे गानि-गुथिकऽ मात्र पाँच गोट पोथी भेटैत अछि जाहिमे दू गोट कविता संग्रह आ तीन गोट उपन्यास छनि। मुदा मैथिली पत्र पत्रिकामे घनेरो आलेखादि हिनक छपल अछि।
यात्रीक अधिकांश रचना पूर्वेक लिखल छनि। जखन यात्रीजी हिन्दीमे लिखय लगलाह तँ मैथिलीक रचना कमि गेलनि। बादमे तँ प्राय: मैथिलीक रचना बन्दे भऽ गेलनि। तेँ हिनक रचना पहिलुके पत्र-पत्रिकामे संचित अछि। पुरान पत्र-पत्रिका हमरा एहि शोध-क्रममे उपलब्ध नहि भऽ सकल तथापि जतबा धरि उपलब्ध भेल ताहिमेसँ बिछि-बिनि एहिठाम प्रस्तुत कऽ रहल छी। इहो सम्भव जे जाहि पत्र-पत्रिका सभक नाम एहिठाम हम उल्लेख कएल अछि ताहूमे सँ कतोक छुटि गेल हो। तेँ एहि सूचीमे परिष्कार करबाक संभावना आ अपेक्षा मैथिलीक गम्भीर विद्वान लोकनिसँ सतत रहत।
यात्रीक मैथिली रचना :-
क्र.सं. – पोथीक नाम – विधा – प्रकाशन वर्ष – लेखकक नाम – प्रकाशक
1. पारो उपन्यास 1946/1965 यात्री - ग्रन्थालय प्र. दरभंगा
2. नवतुरिया – उपन्यास- 1954/1965 यात्री- विद्यापति प्रकाशन दरभंगा
3. बलचनमा- उपन्यास 1966/1965 – यात्री – मिथिला सांस्कृतिक परिषद कलकत्ता
4. चित्रा- कविता- 1949 – यात्री – तीरभुक्ति पब्लिकेशन प्रयाग
5. पत्रहीन नग्न गाछ- कविता 1967 – यात्री – मैथिली एकेडमी, इलाहाबाद
मैथिली पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचना-
1. कविता मिथिले! – 1936 यात्री- मिथिला मिहिर, दरभंगा, मिथिलांक
2. एते दिनुका बाद- 25.09.1960- यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना
3. आधुनिक राधिका- 27.11.1960-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना
4. देखल समपनामे- 11.08.1963-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना
5. अन्तिम दर्शन (अमरनाथ झाक प्रति कविता)- 16.02.1964-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना
6. दू टा रचना (नेहरुक महाप्रयाणक पश्चात)-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना
ठाम-ठाम, कनैत अछि गुलाब-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना
7. दू टा कविता- विहुँसै छी, सभागाछी-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना
8. ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति: -08.11.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
9.दोहाइ हे लिबर्टी मैया- 19.12.1965, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
10.आउ हे ऋतुराज- 13.03.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
11.अहँ, अहँ- 03.04.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
12.भेटल छल वरदान- 22.05.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
13.युगक चमत्कार- 22.05.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
14.कालिदास कविकुल गुरु- 17.12.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
15.राज्य मंत्री भेला उत्तर- 01.04.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
16.एम्हर जुनि अबै- 06.05.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
17.हऽ आब भेल वर्षा- 15.07.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
18.सुनल शब्द विमान परिचारिकाक- 12.08.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
19.मामा आँखि मुनि लेलथि- 23.09.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
20.वाह रे हमर नाति!- 28,10,1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
21.एहि घर पर बैसल रहय गिद्ध- 20.10.1974,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक)
22.गाँधी- जनवरी, 1950, वैदेही (मासिक) दरभंगा
23.कोरिया- फरवरी 1951,वैदेही (मासिक) दरभंगा
24.गोठिबिछनी- विशेषांक साल 1358, वैदेही (मासिक) दरभंगा
25.मुक्तक- नवम्बर 1952, वैदेही (मासिक) दरभंगा
26.गाँधी- जनवरी 1852,वैदेही (मासिक) दरभंगा
27.अरूणोदय- फरवरी 1953, वैदेही (मासिक) दरभंगा
28.अन्हार जिनगी- मई 1953, वैदेही (मासिक) दरभंगा
29.या निशा सर्वभूतानाम्- जुलाई 1953,वैदेही (मासिक) दरभंगा
30.हम क्षुब्ध छी- मार्च 1954,वैदेही (मासिक) दरभंगा
31.दूटा गीत- (I)जय जय भारत! जय हिन्द भूमि- जनवरी 1955, वैदेही (मासिक) दरभंगा
(II) निखिल विश्व प्रिय निखिल भूमि प्रिय- जनवरी 1955,वैदेही (मासिक) दरभंगा
32.ओ तँ थिका दधीचिक हार- सितम्बर 1962,वैदेही (मासिक) दरभंगा
33.कोचिंग इन्स्टीच्यूट- सितम्बर 1958,वैदेही (मासिक) दरभंगा
34.जन्म भूमि- अंक 10, 1973,विभूति (मासिक) मुजफ्फरपुर
35. मिथिला-15.12.1952, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
36. युद्धगीत- 12.01.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
37. नेहरु- 09.02.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
38. नचारी (पुरान आ नवीन)-02.03.1952, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
39. चीन- 09.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
40. हे अभागल देश- 16.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
41. किसान- 30.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
42. कोरिया- 13.04.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
43. कांग्रेसी कनवासर- 18.05.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
44. नेहरुक लंदन यात्रा- 01.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
45.सिनुरिया आम- 18.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
46.छठू बाबू- 15.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा
47.बाबाक विभूति-उदय- 1, किरण- 3, 1930, मिथिला मित्र
48.भगवान! हमर ई मिथिला सुख
शान्ति केर घर हो- 1932 – मिथिला संदेश
49.वन्दना- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा
50.गाँधी- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा
51.दीन बालिका- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा
52.सुग्गा मैना इन्स्टीच्यूट- 1954- चौपाड़ि
53.तीव्र विषाक्त विलक्षण गन्धी- 1954- चौपाड़ि
54.पुनि-पुनि पसरओ- जून 1956- पल्लव (मासिक) नेहरा
55.उपहार- जून 1956- पल्लव (मासिक) नेहरा
56.आहि रे कर्म!-अप्रैल 1968- मैथिली कविता (त्रैमासिक), कलकत्ता
57. स्वागत हे विलम्बित- वर्ष- 1, अंक- 6, 1969- सोना माटि (मासिक) पटना
58.हमहूँ संध्या तर्पण करितहुँ भोरमे- वर्ष- 7, अंक- 1, 1979- मिथिला भारती (द्विमासिक) पटना- अंक- 4, अप्रैल-मई 1981- मैथिली अकादमी पत्रिका (द्विमासिक) पटना
59.चारि कविता
1. तोहर तानी हमर भरनी-
2. हुनका लकबा मारलकइनि-
3. खूब चटइ जो...
4. मिनि मिथिला-
60.कविता तीन- 1. शनि महराज- अगस्त 1983- माटि-पानि (मासिक) पटना
2. बप्प रे बप्प-
3. हुजूर, हँ हजूर-
61.लिप्सा- दिसम्बर 1983, माटि-पानि (मासिक) पटना
62.जन्म भूमि- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयंती अंक) द्विमासिक, दरभंगा
63.बाबाक विभूति-अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक)
64.मुक्तक- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक)
65.सुग्गा मैना इन्स्टीच्युट- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक)
66.हुनका लकबा मारलकइन-अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक)
67.बाजलि सुखमा- अंक- 1, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
68.यात्रीक किछु कविता-
1. अबितहिं, अही हमर स्वागत- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
2. नहि, नहि नहि किन्नहु नहि- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
3. मणिजी हमर झोरा नुका राखत-अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
4. अन्तत: ओ अपनहि मूहेँ अरुणोदय-अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
69.सिनुरिआ आम- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना
70.कारी-कारी- जनवरी-अप्रैल 1987, कोसी कुसुम (द्विमासिक) सहरसा
71.रचू-रचू मधुरगीतम्- जनवरी-अप्रैल 1987- कोसी कुसुम (द्विमासिक) सहरसा
72.मैथिल के? – वर्ष- 2, अंक- 1, 1987, अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषदपत्रिका, दरभंगा
73.दूटा कविता- शारदीय 1994, कर्णामृत (त्रैमासिक), कलकत्ता
1. पूर्वाभ्यास-
2. कुसियारक छाहरिमे-
74.हे हमर आद्य- नवम्बर 1982, आरंभ, पटना
75.चारिटा एम्हरुका कविता- जून, 1997, 1982, आरंभ, पटना
1. मोशहरिक भीतर/पौने नओ बजे राति-
2. शुरू वैशाखमे गामसँ
3. भकड़ार मोछवला पैंतालिस बर्खक-
4. तुलसी बाबा साथ रहइ तों-
76.अहाँ बड्ड फूसि बजइ छी- अंक- 4, अप्रैल 1994, संकल्प, सुपौल
77.जरदगब- 15.09.1953, मिथिला मिहिर
78.गप्पक फोड़न- दिसम्बर 1954, वैदेही, दरभंगा
रिपोजार्ज एवं शब्दचित्र :
79.बूढ़ बोको- जून 1950, वैदेही दरभंगा
80.चारि अहोरात्रि आ एक दिन- जुलाई 1954, वैदेही दरभंगा
81.वैदेहीक नव रूप- जून 1871, वैदेही दरभंगा
निबंध-
82.मैथिल महासभा मैथिलत्वक- वर्ष- 1, अंक- 12, 1937, विभूति, मुजफ्फरपुर
83.पृथ्वे ते पात्रम्- सितम्बर 1954, वैदेही दरभंगा
84.प्रवासक संस्मरण- अप्रैल 1957, वैदेही दरभंगा
85.लेनिन आ भारतीय साहित्य- अंक- 2, 1986, सन्निपात
(मूल हिन्दी)
स्तम्भ-
86.यत्र-तत्र सर्वत्र- मई, 1957, वैदेही, दरभंगा
87.यत्र-तत्र सर्वत्र- जुलाई, 1957, वैदेही, दरभंगा
88.यत्र-तत्र सर्वत्र- अगस्त, 1957, वैदेही, दरभंगा
89.यत्र-तत्र सर्वत्र- अक्टूबर, 1957, वैदेही, दरभंगा
90.यत्र किंचित- जून, 1959, मिथिला दर्शन
91.चिन्तन अनुचिन्तन- जन.-फरवरी 1959, मिथिला दर्शन
92.ओना मासी धँ- 15 जनवरी, 1961, मिथिला मिहिर
93.ओना मासी धँ- 05 फरवरी, 1961, मिथिला मिहिर
साक्षात्कार-
94.अनौपचारिक साहित्य-वार्त्ता- 06 जुलाई 1975, मिथिला मिहिर
95.टेमी के दाग?-अप्रैल 1987,1987, (दोसर पक्ष)मिथिला मिहिर
96. मिथिला मैथिल विभूति : बाबा श्री
बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’- शारदीय अंक 1987, कर्णामृत, कलकत्ता
97.गप्प किछु हमर जबाब हुनकर- वर्ष- 1, अंक-2, नवम्बर 1993, अनुवाता
98.खिसिअयल व्यक्ति नहि लिखत- जून 1994, देस-कोस
अन्य-
99.शोक-श्रर्द्धांजलि (म.म. पं. मुरलीधर झाक प्रति)-वर्ष-1, अंक-9, साल- 1337, मिथिला
100.विभागीय सभापतिक भाषण : कविता विभाग- 1956, प्रथम अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन, दरभंगा
101.सम्पादकीय- जनवरी 1973, मिथिला दर्शन
102.यात्रीजीक पत्र ललितक नाम- 29 मई 1983, मिथिला मिहिर
103.विश्व सम्मानिक महाकवि विद्यापति- दिसम्बर 1985, हालचाल
104.संवेदना (मणिपद्म श्रद्धांजलि अंक) जुलाई-सितम्बर, 1986, कर्णामृत
105.यात्रीजीक एगारह पत्र किसुनजीक नाम- सितम्बर 1986, चिनगी
पोथीमे संग्रहीत रचना-
106.विद्यापति के देश मे-
(सं. जगन्नाथ प्रसाद, सुमन, अमर) मुक्तक- 1955, संकलन
107.मैथिली पद्य संग्रह-
(स. डॉ. उमेश मिश्र) 1. मिथिले, गोठबिछनी- 1962, संकलन
108.गलप सुधा- 1964, संकलन
(स. डॉ. अशर्फी झा, अमरेश आ श्री रमानन्द),
109.मैथिली साहित्य संग्रह- वंदना, कौसिकीक धार- 1964, संकलन
(पद्यांश- सं. रमानाथ झा)- इजोत-
110.कविता कुसुम- सम्पादक रमानाथ झा- 1964, संकलन
1. हम छी छुब्ध-
2. परमसत्यसँ-
3. हिमगिरक उत्तुंगमे-
111.मैथिली नवीन गीत- सं. रमानाथ झा- 1965, संकलन
1. भावना-
2. सिनुरिआ आम
3. अन्हार जिनगी-
4. आधुनिक राधिका-
5. देखल सपनामे-
112.मैथिली गद्य संग्रह, (तृतीय भाग)-1964, संकलन
(सं. रमानाथ झा, सुमन, ईशनाथ झा)
1. पृथ्वी ते पात्रम-
113.कविता कलाप- 1970, संकलन
1. केहन दिव्य- (सं. शंकर कुमार झा)-
114.कविता संग्रह- 1977, मैथिली अकादमी, पटना
(सं. प्रो. आनन्द मिश्र, आर.सी. प्रसाद सिंह, अमरजी)
1. कविक स्वप्न, 2. पितापुत्र संवाद
3. परम सत्य, 4. एहि घर पर बैसल रहय गिद्ध-
115.काव्य माधुरी- सं. प्रो. आनन्द मिश्र-1980, मैथिली अकादमी, पटना
1. माँ मिथिले, 2. अंतिम प्रणाम,
3. नव नचारी, 4. गोठिबिछनी-
116.मैथिली गद्य प्रसून- सं. बालगोविन्द झा व्यथित- 1980, मैथिली अकादमी, पटना
1. पितापुत्र संवाद
117.कथा कुंज- सं. प्रो. परमानन्द शास्त्री- 1986, मैथिली अकादमी, पटना
1. चारि अहोरात्रि एक दिन
118.पद्य तालिका- (सं. माहेश्वरी सिंह महेश- 1987, मैथिली अकादमी, पटना
तथा डॉ. प्रेमशंकर सिंह)
1. भावना, 2. आधुनिक राधिका,
3. नवतुरिआ आबओ आगाँ-
119.मैथिली कथा- काव्य संग्रह- 1991, मैथिली अकादमी, पटना
(सं. शिवशंकर झा कान्त, नवोनाथ झा)
1. विलाप-
120.कमलदह- सं. नवीन चन्द्र मिश्र, अमरनाथ झा- 1991, मैथिली अकादमी, पटना
1. भावना, 2. युगधर्म,
3. तारक गाछ, 4. अन्हार जिनगी
121.मैथिली कविता संग्रह नेपाल- 1990, मैथिली अकादमी, पटना
(सं. राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
1. जगतारनि, 2. तीसीक तेल मध्य-
अभिनन्दन ग्रन्थ-
122.सारस्वत सरमे हे मराल- (श्री रमानाथ झा, अभिनन्दन ग्रन्थ)
123.गोविन्दाय नमो नम:-पं. गोविन्द झा अर्चा ओ चर्चा
(संस्कृत श्लोक)
पुस्तकक भूमिका इत्यादि-
124.कला (उपन्यास)-प्र. वर्ष- 1948, सम्प्रति
ले. चतुरारानन मिश्र
125.नक्षत्र (कविता संग्रह)- प्र. वर्ष- 1956, दुटप्पी
ले. श्री राम चरित पाण्डेय अनु.
126.अनेरे (कविता संग्रह)- प्र. वर्ष- 1993, भूमिका
ले. श्री हंसराज
127.सभसँ पैघ विजय (कथा संग्रह)- 1966, प्रस्तावना
ले. आशा मिश्र-
128. मोहन लड्डू (गीत संग्रह)-1947, दू आखर हमरो
ले. रूप नारायण मिश्र
नागार्जुनक नामसँ एकर अतिरिक्त यात्रीजी हिन्दीमे सेहो कतोक रचना कएलन्हि अछि जकर विवरण विधाक हिसाबें निम्नलिखित अछि-
उपन्यास : (हिन्दी)
1. रतिनाथ की चाची- नागार्जुन- द्वि. स. 1953, किताब महल, इलाहाबाद
2.वलचनमा (हिन्दी संस्करण)- नागार्जुन- द्वि. स. 1967, किताब महल, इलाहाबाद
3.दुखमोचन- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1966, किताब महल, इलाहाबाद
4.वरूण के वेटे- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1957, किताब महल, इलाहाबाद
5.बाबाबटेसर नाथ- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, राजकमल प्रकाशन
6.कुम्भीपाक- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, राजकमल प्रकाशन
7.चम्पा-
(कुम्भी पाकक संक्षिप्त संस्करण)- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, जी.टी. रोड, शहादरा
8.उग्रतारा-नागार्जुन- तृ. संस्करण, 1970, राजपाल एण्ड सन्स
9.हीरक जयन्ती- यात्री, 1962, आत्माराम एण्ड सन्स
10.इमरतिया- यात्री, 1968, आत्माराम एण्ड सन्स
11.नई पौध- यात्री, 1953, आत्माराम एण्ड सन्स
काव्य रचना- (हिन्दी)
12.युगधारा- नागार्जुन, 1953, जनसेवा प्रकाशन
13.सतरंगे पंखोंवाली- नागार्जुन, 1959, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता
14.प्यासी पथराई- नागार्जुन, 1962, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता
15.खून और सोले- नागार्जुन, 1962, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता
16.प्रेत का बयान- नागार्जुन, 1962, यतीन प्रेम, पटना
17.चना जोर गरम- नागार्जुन, 1952, हंस- कार्यालय, इलाहाबाद
18.शपथ- नागार्जुन, 1952, हंस- कार्यालय, इलाहाबाद
19.अब तो बन्द करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन- नागार्जुन, 1952, ब्रजदुलार स्ट्रीट, कलकत्ता
20.भस्माकर- नागार्जुन, 1972, राजकमल प्रकाशन
21.तालाब की मछलियाँ- नागार्जुन, 1974, अनामिका प्रकाशन
(एहि संग्रहमे- युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली,
प्यासी पथराई आँखें काव्य संग्रहक बीछल
चुनल कथा सभ संग्रहीत अछि)
बाल साहित्य- (हिन्दी)
22.वीर विक्रम- नागार्जुन, पुस्तक भंडार, पटना
23.तुकों का खेल- नागार्जुन, बाल सखा, पटना
24.नदी बोल उठी- नागार्जुन, ऐजन
25.वानर कुमारी- नागार्जुन, ऐजन
26.प्रेमचन्द्र की जीवनी- नागार्जुन, ऐजन
निबंध- हिन्दी-
27. एक व्यक्ति एक युग- नागार्जुन, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद
उपयुक्त तालिकामे सहजहि देखल जा सकैछ जे मैथिली साहित्यमे ‘यात्री’जीक तीन गोट उपन्यास, दू गोट कविता पाँच गोट साक्षात्कार, एक सौसँ बेसी विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचना, (कविता, आलेखादि) आदि अछि। एकर अतिरिक्त मैथिलीक विभिन्न पोथी सभमे जेना- मैथिली पद्य संग्रह, गल्प सुधा, कविता कुसुम मैथिली गद्य संग्रह, मैथिली नवीन गीत, कविता संग्रह, कविता कलाप, काव्य माधुरी, मैथिली गद्य प्रसून कथा कुंज, पद्य तालिका, मैथिली कथा कमलदह आदिमे हिनक रचना संग्रहीत अछि। यात्रीजीक रचना सभ अभिनन्दन ग्रन्थ, विभिन्न पोथी सभक भूमिका, पत्र-पत्रिका सभमे स्तम्भ लेखनक रूपमे सेहो भेटैत अछि। अहिना हिन्दी साहित्यमे सेहो उपन्यास, काव्य, वाल साहित्य, निवंध एवं अन्यान्य विधापर हिनक लेखनी चलल अछि। हिनक विविध प्रकारक रचना देखलासँ ई स्वयं परिभाषित भऽ जाइत अछि जे यात्रीजी वहुमुखी प्रतिभाक धनी छलाह।
यात्रीक रचनाक विश्लेषण :-
‘यात्री’आ ‘नागार्जुन’ओना तँ दू रूपमे रचना कएने छथि, मुदा उपन्यास ओ कविता हुनक प्रमुख ओ विशिष्ट क्षेत्र रहल अछि। बाङला आ संस्कृतमे तँ मात्र काव्ये रचना कएने छथि मुदा एहू दुनूमे कविक रूपमे हिनक देखब विशेष रूपेँ उपयुक्त लगैत अछि। उपन्यास हो अथवा कविता दुनूमे ई जन सामान्यक पक्षधरताकेँ उजागर कएने छथि। हिनक रचना विशेष शैलीमे विशेष प्रभावी ओ लोक प्रचलित भाषामे देखल जा सकैछ।
मैथिलीमे हिनक तीन गोट उपन्यास आ दू गोट कविता संग्रह प्रकाशित अछि जे क्रमश: एहि प्रकारेँ- पारो (1946), चित्रा (1949), नवतुरिया (1954), बलचनमा (1966)आ पत्रहीन नग्न गाछ (1967)। एकर अतिरिक्त यात्री समग्रमे करीब 80 गोट कविता संकलित अछि। हिनक आधा दर्जन कथा, तीन गोट स्तम्भ लेखन सेहो संकलित अछि। एहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे हिनक रचना विधा कतेक व्यापक छल।
यात्रीक प्रथम उपन्यास 1946मे प्रकाशित भेल। ता धरि भारत वर्ष स्वतंत्र नहि भेल छल। अवस्था आकर्षक छलनि। ओ समय राजनीतिक ओ सामाजिक रूपसँ संघर्षक समय छल। ओहिसँ पहिलुक शताब्दीमे विश्वक क्षितिजपर पव राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक चेतनाक उदय भए चुकल छल। पूँजीवादी अवधरणाकेँ ध्वस्त करबाक उद्देश्यसँ मार्क्सवादी दर्शनक प्रभाव सम्पूर्ण विश्वमे परिव्याप्त भऽ रहल छल। एकरा अन्तर्गत शासक ओ शासित, पूँजीपति ओ सर्वहारा आदिक अवधरणा ओ शब्दावली प्रचलित-व्यवहृत भऽ गेल छल। भारतवर्षमे राजा राम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती आदि नवीन विचारक ध्वजवाहक बनि उभरि चुकल छलाह तथा सामाजिक चिन्तन संबंधी हुनकलोकनिक अवधारणा प्रभाव देखायब प्रारंभ कऽ देने छल। सम्पूर्ण देशमे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद अथवा सामाजिक यथार्थवादक अवधारणा पसरि गेल छल। भारतीय स्वतंत्रता संग्राममे राष्ट्रीय अवधारणाक संगहि समाजवादी विचारधारा संग-संग चलि रहल छल। भारत वर्षमे किसान आन्दोलन सेहो सक्रियता देखा रहल छल। एहि वैश्विक एवं भारतीय चिन्तन ओ क्रियाशीलताक प्रवाहपूर्ण युगमे यात्रीजी साहित्य जगतमे नव चिन्तन-नव विचारधाराक संग पदार्पण कएलनि। हिनक उपन्यास पर दृष्टिपात कएलासँ स्पष्ट होइत अछि जे तीनू उपन्यासमे तीन विषय अछि।
‘पारो’उपन्सासमे वयसमे अनमेल विवाह जन्य सामाजिक समस्याक मनोवैज्ञानिक पक्षक उद्घाटनक दिशामे सांकेतिक डेग मात्र उठाओल गेल अछि, मुदा मैथिली जगतमे इएह डेग आधुनिक ओ प्रगतिशीलताक दृष्टिसँ साहसिक डेग छल, कारण अद्यावधि वर्जित क्षेत्र यौन-आकर्षणक वर्णन-चित्रण करबाक साहस कएल गेल जकर दूरगामी प्रभाव समकालीन आ परवर्ती साहित्यपर पड़ल।
हिनक ‘नवतुरिया’ (1954) उपन्यासक कथानक सेहो वैवाहिक समस्यापर आधारित अछि मुदा ई ‘पारो (1946) सँ दू डेग आगाँ बढ़ि कए अछि। एहि उपन्यासमे तत्कालीन समाजक गतिविधि सेहो स्थान पाओलक अछि। नवीन विचार, क्रियाशीलता, प्राचीन-नवीनक संघर्षकेँ सेहो एहिमे समेटबाक प्रयास भेल अछि। एहिमे समाधानक दिशा संकेत, नारी जागरणक संग नारी शक्तिक आवाहन ओ सहभागिताक संदेश देल गेल अछि। नवयुवक वर्गक आगाँ अएबाक कथावस्तु एहिमे लेल गेल अछि। वैवाहिक समस्यासँ संबंधित रहितहु एहि उपन्यासमे नवोन्मेषकेँ प्रश्रय देल गेल अछि।
यात्रीजीक मैथिलीक तेसर उपन्यास थिक ‘बलचनमा’ (1966)। एहि उपन्यासक हिन्दी संस्करण पहिने प्रकाशित भेल छल आ एकर हिन्दी मूल सन 1966 ई.मे प्रकाशित भेल। एहिमे हिनक ‘पारो’आ ‘नवतुरिया’सँ भिन्न कथावस्तु राखल गेल अछि। एहिमे हिनक ‘पारो’आ ‘नवतुरिया’सँ भिन्न कथावस्तु राखल गेल अछि। एहिमे किसान आन्दोलन, फलीभूत भावना, जागरूकता, धनवानक उत्पीड़न आ निर्धन पीड़ित अवस्था-भावनाकेँ प्रश्रय देल गेल अछि। अर्थात् धनवान-निर्धनक संघर्ष, भूमिक प्रति धरती पुत्रक मोह ममत्व आदि समाविष्ट कएल गेल अछि। स्वातंत्रयोत्तर कालक परिवर्तित होइत समाजमे दलित जागरणक संदेश सेहो एहिमे नीक जकॉं कएल गेल अछि।
प्रगतिशील, यथार्थवादी अथवा नवीनताक मूलमे नवीन अवधारणा सामाजिक भावात्मक स्तरपर फ्राइडक धारणा-वासना अथवा यौन भावना ई दुनू अवधारणा मुख्य रूपेँ सक्रिय रहल अछि। एकरा रचनाकारलोकनि अपन कौशल ओ क्षमतासँ विभिन्न रूप दैत रहलाह अछि। यात्री सेहो ओहि कोटिमे राखल जा सकैत छथि किन्तु कथावस्तु एवं अभिव्यक्ति शिल्पक क्षेत्रमे ई ओहि दुनूसँ आगाँ बढ़ि जाइत छथि। स्थानीय वैशिष्टकेँ समाहित करैत नवीनताक वरण हिनक साहित्यिक गरिमाक श्रीवृद्धिमे आधारभूमिक काज करैत अछि। ‘पारो’मे जतए फ्रायडीय अवधारणाक अनुसार समवयस्क ‘नारी-पुरुष’क परस्पर आकर्षण भावनाकेँ स्थान भेटल अछि तँ ‘नवतुरिया’मे नवजागरणक समाज सुधारक विषमता विनासक युवाशक्तिक अवतरण ओ सक्रिय नेतृत्व क्षमताक संकेत दैत मार्ग प्रशस्त करैत अछि। वास्तवमे तीनू उपन्यास स्वतंत्रता कालक पूर्ववर्ती ओ निकटवर्ती कालक परिस्थिति भाव ओ सेघर्षक क्रियाशीलताकेँ कथावस्तुक आधार बनौलक अछि। पारो ओ नवतुरिया दुनूमे नारीकेँ प्रधानता दए तानी-भरनी बुनल गेल अछि जाहिमे यथार्थक विद्रुप स्वाभाविकताक संग स्थान पाबि सकल अछि। ओना बलचमामे सेहो बलचनमाक बहिनकेँ सेहो एही अवधारणासँ देखल जा सकैछ। तीनू उपन्यासमे चरित्रकेँ नीक जकॉं ठाए़ कएल गेल अछि। शैलीक दृष्टिएँ पारोमे प्रथम पुरुषमे कथा कहल गेल अछि- विरजू द्वारा। एहिमे चरित्र चिन्तनरत अछि। पारो एवं विरजू दुनूक मनोगत भाव देखाओल गेल अछि। कुण्ठा किंवा क्रानि दुनू पात्रक मनोगते रहैत अछि वाह्य वा प्रकट रूपमे नहि। नवतुरियामे उपन्यासकार घटित घटनाक चित्रण करैत छथि। पात्रक संख्या आ घटनाक क्रियाशीलताक मात्र ओहिमे रहैछ। बलचनमामे तँ आओरो अधिक गतिविधि गामसँ शहर धरि पहुँचैत अछि। धनिक निर्धनक चित्र अछि उत्पीड़न, संघर्ष, भूमि सम्बन्धी अथवा ग्राम्य जीवन, राजनीतिक चेतना आदिक समावेश ‘बलचनमा’क कथा वस्तुकेँ विस्तार दैत अछि।
शिल्पक दृष्टिऍं पारोमे वर्तालाप पद्धति अपनाओल गेल अछि। मुदा नवतुरिया ओ ‘बलचनमा’मे वर्णनात्मक घटनाक चित्रण पद्धति अपनाओल गेल अछि।
‘नवतुरिया’मे नवीन समाजिक चेतनाक अनुकूल ‘गरम दल’क चर्चा अछि जाहिमे अनेक नवयुवक माहे, बुलो, गोनउरा, टुनाई आदिकेँ स्थान दऽ साहसी परिवर्तनक आकांक्षी युवा वर्गकेँ ठाढ़ कए नव संदेश देल गेल अछि। तहिना परम्परापोषंक ओ रूढ़िवादीलोकनिक रूपमे खोखाइ झा, मुखिया, चौधरी, मुटकी मिश्र फतूरी काका आदि नारी नवतुरिआक चरित्र सेहो ठाढ़ कए सकत। संघर्ष ओ परिवर्तनक भावकेँ विश्वसनीयता प्रदान कएल गेल अछि। केन्द्रीय समस्याक समाधान हेतु अपनहि बीचसँ उपयुक्त बरक रूपमे वाचस्पतिकेँ ठाढ़ कएल गेल अछि। एहि प्रकारेँ कोकनल रूढ़िभंजन ओ सामाजिक पुनर्निमाणक दृष्टान्त बनल नवतुरिया।
सहज, सरल फड़कैत भाषाक प्रयोग यात्रीजीक सभ उपन्यासमे बेछप अछि। वातावरणक अनुकूल ठेँठ शब्दावली, तत्सम, तद्भव देशी-विदेशी, विदेशीक ग्राम्य प्रयोग पात्र ओ परिस्थिति अनुसारेँ सटीक रूपेँ करब यात्रीक उपन्यासक वैशिष्ट्य थिक।
उपन्यासे जकॉं यात्रीक कविता सभमे सेहो समाजिक यथार्थवादकेँ प्रमुखतासँ स्थान देल गेल अछि। हिनक प्रथम काव्य संग्रह ‘चित्रा’मे 1931 सँ 1949 धरिक चुनल कविताकेँ राखल गेल अछि। प्रत्येक कविता अपन पृथक वैशिष्टसँ युक्त अछि। जेना विलापमे सामाजिक कुप्रथा ओ नारी नैराश्यकेँ उजागर कएल गेल अछि। ‘कविक स्वप्न’मे प्रगतिवादी उद्देश्यक घोषणा कएल गेल अछि। ‘अन्तरात्माक भाव’हिमगिरिक उत्संगमे सिनुरिया आम आदिमे संस्कार संस्कृति, मिथिला मातृभूमि सभ भावक कविता एहिमे स्थान पओलक अछि।
तहिना 1967 ई.मे प्रकाशित आ 1968 ई.मे साहित्य अकादमी दिल्लीसँ पुरस्कृत कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’मे पारंपरिक सामाजिक यथार्थतासँ परिपूर्ण, प्रतीक पूर्ण, प्रयोगपूर्ण ओ वक्रोक्तिपूर्ण आधुनिक वातावरण नव्यतम स्वरूपमे विद्यमान अछि। एहिमे नव नचारी, अन्हार जिनगी, नवतुरिए आबओ आगाँ, आधुनिक राधिका आदिक संगहि प्रकृति वर्णनसँ युक्त माघ, फागुन, चैत, वैशाख, अषाढ़, साओन, मेघवर्णन आदि कविता अछि।
हिनक काव्यमे मानवीयताक रचनात्मक प्रीतिरोध सर्वस्पर्शीय संदेवदना, एकरे परिधिमे, सामाजिक कुरीति, एहि जालमिे फँसल, पछुआएल अपेक्षित नारी ओ दलित समाज तथा नव युगक संदेशवाहक, नवयुवकक पक्षधरता नीक जकॉं उजागर भेल अछि।
यात्रीक काव्यक प्रसंग डॉ. वासुकी नाथ झा लिखैत छथि- “कथ्य, सत्य ओ यथार्थक खर-खर धरातलपर आक्रोश ओ संवेदनाक मार्मिकता यात्रीक काव्यमे बेछप अछि। ‘अगराही लगौ बरू वज्र खसौ’ भावक उद्दीपन मिथिलाक नारी वर्गक आजुक संदर्भमे निष्पत्ति दिस अग्रसर होइत स्पष्ट दृष्टिगोचार होइत अछि। कविक युगद्रष्टा ओ युगस्रष्टा होएबाक विशेष सन्दर्भमे एकरा देखल जा सकैत अछि।”[23]
यात्रीजीक कविता सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक स्थिति-परिस्थिति ओ विद्रुपताक प्रति सचेत तँ करितँहि अछि, संगहि जागरूकता आ सुधारक प्रेरणा सेहो दैत अछि। हिनक काव्यमे विद्यमान वस्तु स्थितिक समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ विवेचन अपेक्षित अछि।
यात्रीजीक काव्यक भाषा बेछप अछि। सर्वत्र व्यावहारिक लोक भाषाक सटीक प्रयोग सरलता-सहजतासँ परिपूर्ण ओ प्रवाहपूर्ण, ओजस्वितापूर्ण, स्वत: सम्प्रेषण सक्षम शब्दावली ओ शिल्प शैलीक परिपूर्णता विद्यमान अछि। आधुनिक मैथिली कवितामे मुक्त वृत्तिकेँ व्यापक ओ गरिमापूर्ण बनेबाक श्रेय हिनका देल जाइत छनि।
हिनक योगदानकेँ एहि प्रकारेँ रेखांकित कएल जा सकैछ- मार्क्सवादी ओ फ्रायडीय सिद्धान्तक प्रभावपूर्ण प्रयोग, सामाजिक यथार्थकेँ कविता आ उपन्यासमे सटीक रूपेँ प्रयोग, मुक्त वृत्तिकेँ कलात्मक बनाय सर्वस्वीकृत बनाएब, सामाजिक यथार्थकेँ व्यंगक माध्यमे काव्यमे प्रभावी बनाय ग्राम्यचित्रक शब्दावलीक प्रयोगसँ भाषामे सरलता, सहजता, स्वाभाविक भाव बोध सहज प्रभाव सामान्य पाठक धरिकेँ अभिभूत करबामे सक्षम होयब।
वर्त्तमानक साहित्यकार जतए आई स्त्री विमर्शक नारा दऽ रहल छथि ओतए यात्रीजीक 20म शताब्दीक चारिम दशकक कविता विलाप, बूढ़वर, जगतारनि स्त्रीक स्वरकेँ, आर्तनादकेँ तथा आर्त्तनादक अभ्यन्तर उद्भूत संश्लिष्ट अन्तर्द्वन्द्वकेँ ओकर गाम्भीर्यकेँ जगजियार कऽ चुकल छथि। ई कविता सभ वास्तमे स्त्री-विमर्श सामाजिक दृष्टिसँ वस्तुत: भविष्यद्रष्टा सिद्ध करैत अछि जे आइ चरितार्थ भए रहल अछि।
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[1]परिचायिका- डॉ. भीमनाथ झा, 107
[2]मैथिली साहित्यक इतिहास- पृ.- 206, डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश
[3]History of Maithili literature- page- 160, Dr. Jaikant Mishra.
[4]यात्री : मेमे बाबूजी, शोभाकनत, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1990, पृ.- 13
[5]दिनकर का व्यक्तित्व- पृ.- 8ए डॉ. प्रमिला
[6]दिनकर का व्यक्तित्व- पृ.- 8ए डॉ. प्रमिला
[7]मानक हिन्दी कोश- पृ.- 124ए पॉंचवा खण्डए रामचन्द्र वर्मा
[8]हिन्दी विश्वकोश- पृ.- 150ए प्रथम संस्करण खण्ड
[9]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ.- 1, श्याम प्रकाशन जयपुर, 3 1985, बाबू राम गुप्त
[10]आज के लोक प्रिय हिन्दी कवि नागार्जुन- पृ.- 3 प्र. राजपाल एण्ड सन्स- 3, डॉ. प्रभाकर माचवें
[11]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ्.- 2, रामबाबू गुप्त
[12]नागार्जुन मेरे बाबूजी : पृ. सं. 58, शोभाकान्त
[13]नागार्जुन मेरे बाबूजी : पृ. सं. 46, शोभाकान्त
[14]नागार्जुन मेरे बाबूजी- पृ.- 53, शोभाकान्त
[15]यात्री समग्र : ‘यात्री समग्र’क सन्दर्भमे- 2003, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
[16]नव भारत टाइम्स : साक्षात्कार, अपराजिता देवी, 29 जुलाई 1991, अंक- पटनासँ प्रकाशित
[17]बाबा नागार्जुन- पृ.- 14, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, सं.- नरेन्द्र कोहली
[18]बाबा नागार्जुन- पृ.- 14 वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, सं.- नरेन्द्र कोहली
[19]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ.- 6, श्याम प्रकाशन जयपुर, बाबूराम गुप्त
[20]यात्री- (2000) पृ.- 20, चेतना समिति पटना, सम्पादक डॉ. श्री हरिनारायण मिश्र
[21]यात्री- (2000), पृ.- 20, चेतना समिति पटना, सम्पादक डॉ. श्री हरिनारायण मिश्र।
[22]परिचायिका- पृ.- 107, डॉ. भीमनाथ झा
[23]यात्री साहित्यावलोकन- पृ.- 5, 2011, चेतना समिति पटना, स. वासुकी नाथ झा

Suggested citation: अनुपम रैना. “यात्रीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/यात्रीक-व्यक्तित्व-ओ-कृतित्व.htm

मूल विदेह अंक / Original issue