विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

यात्रीजीक मैथिली रचनामे समसामयिक जीवनक अभिव्यक्ति

अनुपम रैना · 2020-10-15 · अंक 308

यात्रीजीक मैथिली रचनामे समसामयिक जीवनक अभिव्यक्ति
बहुभाषा विज्ञ वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ मैथिलीक मुख्यतः दू उपन्यास आर कविता संग्रह लिखि समस्त मिथिलाक तात्कालिन आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक परिदृश्यक चित्रण क्रमशः विश्लेषित प्रारूपक सँग कएलन्हि अछि । यात्रीजीक प्रार्दुभाव राजनीतिक रूप सँ भारतीय उपनिवेशक परिवर्तनक काल छल । अंग्रेजी हुकुमतक बर्बर तानाशही एवं ब्रिटिश सरकार द्वारा मान्य जमींदरी प्रथा समाज के ँ शोषक वर्गक हाथ में कठपुतली बना राखि देने छल । सम्भ्रान्त समाजक मुट्ठी भरि लोक बहुसंख्यक गरीब प्रजाक ऊपर पाशविक अत्याचार, दमन, शोषण कए समाजक दुर्गति करबा में लीन छल । भारतीय अर्थव्यवस्थाक रीढ़ खेती छल जे जमींदारक हस्तगत छल । जमींदारक अत्याचार किसानक मनोबल के तोरि देने छल । अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार सँ सम्पूर्ण देश मे अर्द्धशिक्षित वर्गक संख्या बढ़ि गेल । बल्कि विभीषिका सँ महामारी दुभिक्ष आदि सँ जान-मालक हानि चेचक, प्लेग, हैजा अदि बिमारी महामारीक रूप अखित्यार कएने छल । एहना परिस्थिति में सामाजिक विषमता, अंधविश्वास वर्ग-भेद, वर्ग-उपवर्ग, छूत-अछूत, धार्मिक पाखण्ड आदि समाजक मध्य रोग जकाँ पसरि गेल छल जे कवि यात्री जी अपन रचना मध्य व्यक्त करबा सँ नहि चुकलाह अछिः-
मकडाक जाल सँ बेढल हुइ चुलहाक मुँह
थरी-गिलास सब बेचि बिकिन खा गेलइ ऊँह
समाजक दुरावस्थाक दृष्य केँ एहि प्रकारे देख वैत कवि यात्रीक उक्त पंक्ति के देखल जायः-
कैंचा जकरा से, खाए भात
क रहल मौज से, जकरा छइ कोनी गतात
दरिद्रताक अभिशाप समस्त मिथिलांचल भोगिरहल छल । अन्न पानि दवा दारूक कोनो युक्ति नहि छल । समाधानक उक्ति ढूढ़वाक प्रयास मे कवि यात्री कहैत छथि ।
नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस ।
माँटिक महत्व केँ चीन्हि लेलक ई देश-कोश ।
वस्तुतः भगवानक भरोसे जीवऽ बला व्यक्ति केँ साफ शब्द में कहऽ चाहैत छथि जे अपन धरतीक भरोस करू, देह मे मांइट लगाउ, कर्म करू, मेहनत करू एही बदौलत समस्याक समाधान भए सकत। नहि कि मात्र देवताक भरोसे सब किछु छोरि जीवन के बेकार बना देव । मिथिलाक परिस्थिति सँ खिन्न यात्री कोनो विकल्प नहि देखि रहल छथि । एहन परिस्थितिमे कवि अपन भाव के शब्द दैत कहैत छथिः-
अन्न नेछै कैंचानै छै कौड़ी ने है
गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे?
उठह कवि, तो दहक ललकाय कने
गिरि शिखा पर पथिक हल चातैक रे!
कवि अपनहि अपन आत्मबल केँ मजबूत करैत कहैत दथि अर्थहीन संसाधन बिहिन समाजक उत्थान करबा लड हमरे अथैकेँ आगु आबऽ पड़त । निश्चित रूपेँ यदि संकल्पक सँग जनहित हेतु संघर्ष कएल जायत तँ असम्भव नहिं जागृतिक शंखनाद भटका रहल मात्र कने प्रयासक आवश्यकता छैक, साहस क आवश्यकता छैक। कोनो पैद्य बात नहि जयनाद जैहैत तऽ अवस्से उँच से ऊँच पहाड़ केँ पथिक सहज रूपें रास्ता बना लैत अछि।
जिन्दगी भरि जे अमृत मंथन करल
जिन्दगी भरि जे सुधा संचित करए
ओ पिआसैं मरि रहल अछि, ओकरे
अमृत पीवा सँ जगत वंचित करए
ओकर मूल भूत अधिकारक हनन होइत छैक। ओकर उचित हिस्सा नहिं भेटैत छैक। एहन बर्बर समाजक सामन्ती सोच बलाक प्रति अभिजात्य वर्गक प्रति घोर घृणाभाव आक्रोश सँ भड़ल कवि अपन मनोभाव के पुनः शब्द दैत कहैत छथि
हमर वीणा ध्वनि कने पहुँचैत जँ
सटल पौजर बोनिहारक कान में
सफल होइत तखन ई स्वर साधना
चिर उपेक्षित जनक भौटव गान में।
अन्न बिना सटल पाँजर कुपोषणक बोनिहार अवश्य परिवर्तन आनत यदि शिक्षक अलख ओकर घर घरि पहुंच जेतैक । भारत सर्वशक्तिमान सम्पन्न ‘चन्द्रगुप्त’ क राज्यक अभ्युदय भेल तहिना प्रेरणाश्रोत माध्यमक आवश्यकता छैक ।
परम मेघावी कतेबालक जत
मूर्ख रहि हा गाय चरवैत छथि
कते वाचस्पति कते उदयन जत
हाय! बनगोइठा विछैत फिरैत छथि
तानसेन कतेक रविवार्म कते
घास छिलथि वाग्मतीक कछेड़ में
कालिदास कतेजक विद्यापति कते
छयि हेड़ाएल महिसवारक हेड़मे
कवि यात्री एही सँ चिंतीत छथि । के एकर मार्गदर्शन करत के सोचत गरीब निरिहक हेतु ताहि सँ मेधावी गरीब बच्चा अपन स्थान अपन अधिकार निरूपित कऽ सकत । ओहने स्थिति मिथिलांचलक सुसंस्कृतिक अपसंस्कृति में बदलि देलक । स्वार्थां भए परम्पराक नाम पर कुव्यवस्था केँ परिपाटी बनालेलक कवि एहि भयानक मनोवृत्तिक चित्रण कए वास्तविक जीवनक स्थिति सँ परिचय करौलनि अछि ।
समस्त भावनाकेँ दरकिनार करइत समाज में पसरल दर्भिक्ष जकाँ स्त्रीक प्रति अन्यायपूर्ण मानसिकता समाजक स्वीतत्व पर प्रश्नचिन्ह लगवैत अछि। धन एक मात्र उदेश्य बनि मनुष्यक जीवन के नर्क बना दैत छैक। एहन स्थिति क बेटीक बाप शुभछन कहि, बेटीक बापक उत्तरदायित्व केँ नकारबक चेष्टा करैत अछि। जहिना माछ मखानक खेती अर्थोपार्जनक साधन अछि तहिना बेटीक जन्म एकरा व्यवस्था सँ कम नहि एहि सँ बेसी सोचबाक ककरो उद्देश्य नहि समय नहिं।
अहुरिया कटलक मललक हाथ
बाबू भाभी माय झुकौलनि माथ
हुनक अन टोटल बात एकदिश
झरकल सन हमर अहिबात एकदिस
करब की सब पी गेलऊँ घोरि कऽ
चम्पाक कली-फेकल गेलऊँ खोंटिकऽ
समाज में पसरल कुव्यवस्थाक झांकी एखनहुँ अनवरत देखवा में अवइयै।
पारो:- मैथिली में पहिल उपन्यास ‘‘पारो’’ 1946 ई0 में प्रकाशित भेलाक बाद उपन्यास जगत मे श्री बैधनाथ मिश्र ‘‘यात्री’’क नाम विख्यात भए गेल। अपन पहिल कृति ‘‘पारो’’ सन सामाजिक ओ मनोवैानिक उपन्यास लिखि ‘‘यात्री’’ मैथिली उपन्यास मे एक नवीन प्रयोग कए देलैन्हि। गद्य-शैलक विलक्षणता सेहो यात्री सन कविमे अछि एहि सँ पहिल बेर लोक परिचित भेल आ अपन एहि पहिल परिचय मे यात्री तेहन ने सामाजिक रूढ़ परम्पराक चचार्प कएलैन्हि जे ओ विवादक विषय बनि गेल। आश्चर्य एहि बातक जे यात्री कोनएहन अपराध कए देलनि जकर किछु विद्वान लोकनि घोर निन्दा कए देलैन्हि। परन्तु एतबा कहि देब जे यात्रीक ई पहिल प्रयोग जे ओ गद्य रूप मे बएतैन्हि पूर्ण सफल भेल अछि। हुनक गद्य शैलीक विलक्षण प्रतिभा सँ हमरा सभकेँ ‘‘पारो’’ द्वारा परिचय भेल अछि। तेँ ई निर्विवाद सत्य धिक जे यात्रीक ई ‘‘पारो’’ सामान्य पारो नहि अपितु मिथिलक आइ धरिक जीवनक ई पहिल ओ अंतिम पारो थिक। पारोक परिचय ई अछि-
‘‘पारो नामि रहय। चेहरो नामे रहैक।
हाथ सीक सन-सन। देह लक-लक पातर।
टाङ सन्ठी सन-सन। कटगर ओकर आंखि जेहेन
छलै तेहेन आन कोनो अंग कथी ले रहते।’’
यात्रीक एहि पारोक पूरा नाम छल पार्वती । पारो एहि उपन्यासक मुख्य नायिका अछि ।आ एकर मुख्य नायक ब्रजकान्त झा उर्फ बिरजू तेसर जे चरित्र एहि मे अछि ओ छथि वैधव्य सँ देदीप्यमान ललाट वाली पीसी जनिक नाम प्रतिभा मा अछि । एहि उपन्यास मे चारिम सभ सँ महत्वपूर्ण व्यक्ति छथि चैधरी जी । यात्रीक चैधरी जी सँ परिचय कए लेल जाए- ‘‘वेश गोर नार । चेहरा नाम; मुहठान कटगर । नाल भरल। भौंहे सघन। कपार ने पैथ ने छोट । दहिना कान मे कनौसी। वाम कानक जड़ि मे, ऊपर दिस छोट छीन मसुविर्धि।’’
मैथिल समाज मे आएल रूढ़िवादी परम्पराक उद्घोष। मिथिलाक सभ्यता संस्कृति दर्शन सेहो एहि मे यात्री यत्र-तत्र करौने छथि।
‘‘पारो’’क कथानक प्रसंग डाॅ0 अमरेश पाठक अपन ग्रन्थ मे केने छथि मुदा जंएह कहने छथि ओ बड़ महत्वक बात-
‘‘कथावस्तुक विकास दृष्टिएँ यात्रीक पारो महत्वपूर्ण रचना अछि। इहो उपन्यास वैवाहिक समस्याकेद्द लए लिखल गेल अछि। निर्धनताक कारणें पारोक विवाह एक अधवयसू चैधरी जीक संग होइत अछि। पारोक हृदयक विषाद केँ पारोक विभिन्न उक्ति द्वारा व्यक्त करबाक चेष्टा कएल गेल अछि।
एकर कथानक निर्माण मे औचित्यक त्याग भेल अछि। ई वर्णन सामाजिक वातावरणक, साहित्यिक आदर्शक प्रतिकूल अछि । उपन्यासक कथानक केँ मानव जीवनक यथार्थ सँ घनिष्ठ रूपें सम्बद्ध होएब आवश्यक छैक ई सत्य किन्तु ओहि सत्यक कुत्सिक रूपक चित्रण साहित्यक मयार्दाक प्रतिकूल अछि।
यात्री जी नवतुरिया मे मैथिल समाजक पर्व-त्योहर सभक सेहो चर्चा केने छथि जेना-जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, पौचन्द्र, दीपावली, आदिक सांकेतिक चर्चा देने छथि, पितृपक्ष सन मैथिल समाजक अपन संस्कृतिक चर्चा कए ओ एकर महत्व के देखाएबाक प्रयास कैने छथि। पितृपक्ष मिथिला साज मे खूब प्रचलित अछि। एहि मे लोक अपन अपन मृत माए, मातामही, पितामही, सासु, प्रपितामही आदि जलक अर्ध दैछ आ एक-एक टा ब्राह्मण के भोज करवैछ तकर चर्चा एहि मे भेल, अछि, जाहि सँ मिथिला समाजक संस्कारक प्रतीति होइछ।
एहिना मैथिल समाज मे प्रचलित विवाहक अनेकानेक सामग्री सभक नाम सेहो एहि मे अंकित भल अछि संगीह समाजक प्रचलित विवाहक विधि सभक सेहो चर्चा भेल अछि, जाहि सँ मैथिल समाजक संस्कृतिक चित्र भेटैत अछि।
मैथिला समाज मे विवाह मैथिल-विवह पद्धतिक अनुसारे होइछ आ दुर्वाक्षतसन कार्यक्रम होइ तकरो चर्चा कए यात्री जी मिथिलाक गरिमा के बढ़ौने छथि।
यात्री सँ एहि सामाजिक उपन्यासक माध्यम सँ मिथिलाक रूढ़िवादी परम्परा पर वोट कैने छथि, तँ अन्धविश्वास सँ आक्रान्त नौगछिआ गामक नवतुरिआक द्वारा वीनी चेतना सेहो जागृत कैने छथि।
एहि तरहे जनसाधारणक भाषा मे अपन भावना व्यक्त करैत यात्रीजी मानव जीवनक सभसँ महत्वपूर्ण बिन्दु दिश दृष्टिपात कैने छथि आ साहित्य समाजक दर्पण अहि एहि बात केँ नवतुरिआ लिखि कए साकार कए देने छथि आ नवीन पीढ़ीक हेतु मार्ग प्रशस्त कए देने छथि जे आबधु नवतुरिआ, करथु मैथिल समाजक उद्धार ।
जे कहलैन्हि से यात्री पूरा सेहो कएलैन्हि तरखने सँ हिनक उपन्यास नवतुरिआ एतेक महत्व पाबि रहल अछि आएकरा पाबि कए यात्री सन बौद्ध भिक्षु आह्वाला दित भए रहल छथि आ नवीन मिथिला केँ उजागर होइत देखबाक लेल जीवन सँ संग्राम कए रहल छथि ।
बलचनमा - ‘‘बलचनमा’’ केँ जँ यात्रीक प्रतिनिधि उपन्यास कही तँ कोनेा अर्नगल प्रलाप नहि होएत कारण यात्री एहि उपन्यास माध्यम सँ समाज केँ ई देखएबाक प्रयास कएलैन्हि जे शोषित वर्ग केँ बलचनमा सदृश मजबूत बनि कए स्वयं अपन अधिकारके रक्षा करबाक होएत आ जें अपन अधिकार ओ शक्ति के नहि चिन्हूत, नहि बुझत, आ निरीह बनल रहल तखन ओकर शोषण होएबा सँ कोनो नहि बचा सकैछ आ नहि कोनो बचबाक विकल्प रहि जाइछ ।
मोन पड़ैछ हरिमोहन बाबूक ओ पांती जाहि मे ओ यात्री के कहने छथि-
‘छे टका लाखे जहां मैथिलीक कोषागार।
तैत खेदित होइछ मन इ देखि कै व्यवहार
जाय ‘‘बलचनमा’’ एते तँ पाबि के दुत्कार
आर स्वागत होइ ओकर जाके प्रयागक हार।’’
बलचनमाक प्रसंग यात्री जी अपन ‘‘आईने के सामने’’ नामक, लेख मे लिखने छथि- ‘‘बलचनमा से डरता हूँ। मै अपने इस खेतिहर हीरो से इन दिनों बहुत घबराता हूँ। वह चालीस से उपर का हो चुका है। एक बार गांव का सरपंच भी चुना गया था। सात-सात बेटों का बाप है अब हमारा बलचनमा।
अरे, बड़ा गुस्सैल है बलचनमा.......पीछे पड़ जाता है, तो फिर तबाह कर देता है........
यह मेरा मानस पुत्र ठहरा न?
बलचनमाक प्रसंग डा0 श्री ब्रजकिशोर वर्मा ‘‘मणिपद्म’’ अपन एकटा लेख ‘‘श्री नागार्जुनक चिन्तन धारा’’ मे लिखने छथि-
‘‘बलचनमा विद्रोही थीक । ओ सक्रिय आ सामाजिक रूप थीक आ ओ कपार पर अनवरत हथौड़ा पीटेवाला लोक थीक ।
डा0 दिनेश कुमार झा ‘‘बलचनमा’’क प्रसंग अपन मत व्यक्त करैत कहत छथि- ‘‘बलचनमा’’ यात्रीक उपन्यास कलाक कीत्र्तिस्तम्भ अछि । डाॅ0 जयकान्त मिश्र ‘‘बलचनमा’’क प्रसंग अपन मन्तव्य ‘‘मैथिली उपन्यास ओ सामाजिक चेतना’’ नामक आलेख मे दैत कहैत छथि-
‘‘अपने उपन्यास बलचनमा के माध्यम से नागार्जुन ने सर्वप्रथम ग्रामीण जीवन और भूमि व्यवस्था के साथ बनते-बिगड़ते सम्बन्धों को उद्घाटित किया है।
यात्री अपन मातृभूमि मिथिला धाम केँ गामक कृषक गरीबी, ओकर दुर्दशा, जमीन्दार लोकनिक द्वारा होइत ओकर शोषण, ओकरा पर कएल जाइत अत्याचार सन सामाजिक समस्रूा केँ उजागर करबाक उद्देश्य से एहि ‘‘बलचनमा’’ न सन उपन्यासक रचना कएलीन । ई पहिने अपन मातृभाषा मे सएह एकर रचना कएलैन्हि पश्चात हिन्दी मे एकरा अनुवाद कैलन्हि ।
यात्रीक बलचनाम मे सम्पूर्ण मिथिलांचल समाजक चित्र अंकित भेल ओ चित्र अछि सर्वहारा वर्धक संघर्षक, शोषण, अत्याचार, अमानवीयता, ओ समाज मे पसरल बिसंगतिक चित्र देखल जा सकैछ । समाजक मालिक कहाबए वला लोकक कुकुत्यकेँ। कोन तरहे एकटा जीव ओहो मे मनुष्य तकरा पशहुओं सँ बदत्तर स्थिति में बांधि कए मारि रहल अछि । एहि तरहे गरीब लोकनिक आर्थिक शोषण एहि समाज मे होइत छल आ समाज मौनव्रत धारण कैने छल । परिश्रमी श्रमिकक जीवन समाज मे केहन छल देखल जा सकैछ ।
‘‘नीक सँ भगवान करबे करैत छथि? धारि परानीक परिवार छोड़ि कए हमर बाप मरि गेल, इहो भगवान ठीके एकलक। भूख में मारे दाई ओ माए आमक गुठरीक गुद्दा चूरि-चूरि कए सकैत छल, इहो भगवान ठीके करैत छलाह आ मालिक लोकनि कनकजीर आ तुलसी फूलक गमकइत भात, राहरिक दाहि, परोरक सीमन, घी, दही, चटनी खइत छल, सएह अहो भगवानेक लीला छत। यौकोर दलम बागक तेल हुनका हमर दू कट्ठा खेत पहित छल आ हमरा अपन पौकोर पेटक लेल मुट्ठी भरि दाना ।’’
डॉ ललन कुमार झा, स्थायी पता- ग्राम-पो-रहुआ, भाया-सिमरी बख्तियारपुर, जिला- सहरसा 852127. - अध्यक्ष, मैथिली विभाग, यू.भी.के.कॉलेज करामा आलमनगर, पो- भागीपुर, जिला- मधेपुरा।

Suggested citation: अनुपम रैना. “यात्रीजीक मैथिली रचनामे समसामयिक जीवनक अभिव्यक्ति.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 308, 2020-10-15. https://www.videha.co.in/research/2020/308/यात्रीजीक-मैथिली-रचनामे-समसामयिक-जीवनक-अभिव्यक्ति.htm

मूल विदेह अंक / Original issue