विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

एकटा ‘मैथिली गजल’ जे बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास

आशीष अनचिन्हार · 2020-12-15 · अंक 312

आशीष अनचिन्हार
एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास
समाजमे हरेक एक केर प्रभाव दोसरपर पड़िते छै (नकलकेँ मुदा प्रभाव नै कहल जा सकैए)। से प्रभाव नीको भऽ सकैए आ खरापो। साहित्य सेहो समाजे केर चीज छै आ साहित्य केर विभिन्न विधा सेहो। साहित्य केर एक विधासँ प्रभावित भऽ दोसर विधाक नीक रचना होइत रहलैए। तेनाहिते एक विधाक कायान्तर कऽ दोसर विधामे रचल जाइ छै। आ ई प्रक्रिया नीक छै। मुदा धेआन देबाक बात ई सभ बात पाठक केर सामने रहैत छै। जेना मधुपजीक कविता 'घसल अट्ठन्नी' केर नाट्य रूप सेहो छै मुदा प्रचार-प्रसारमे पहिने कहि सूचित कएल जाइत छै जे ई मधुपजीक कविताक नाट्य रूप थिक। मुदा ई सौभाग्य मैथिली गजल लेल कहियो नै रहल। एकटा मैथिली गजल जे “बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास” मुदा साहित्यकार-संगीतकार एहि गजलक संग न्याय नै केलाह। गजल छै मुदा एकरा गीत कहि प्रचारित कएल जाइत छै। आब एकटा विधा लेल एहिसँ दुखद बात की हेतै? ई बात हम लोक लेल नै कहि रहल छी। ई हमरो बूझल अछि जे जखन कोनो महान रचना रचना लोकमे जाइ छै तखन ओकर शब्द उनट-पुनट होइते छै। ओकर विधापर धेआन नै देल जाइत छै। हमरा लोकसँ नै कथित विद्वान ओ अपनाकेँ महान गायक कहए बला सभसँ शिकाइत अछि जे ओ सभ एहि गजल संग न्याय नै केलथि। लगभग 90 बर्खसँ बेसी धरि पाठक-श्रोताकेँ भ्रमित कएल गेलै जखन कि ओहि रचनाक व्याकरण गजलक छै। रचनाकार ओकरा गजल कहि गेल छथि तकर बादो ई हाल। एहि गजलक प्रभाव ततेक जे जतबे गायक-गायिका एहि गजलकेँ गेलाह वा गेलीह से गलत कऽ वा एकर पैरोडीमे गीत बना गेलाह-गेलीह। अइ हाल लेल तीन टा कारण अछि पहिल जे आधुनिक मैथिलीक गीत विधा बहुत कमजोर अछि। आधुनिक कालमे एकरा अपन कोनो निश्चित आधार नै रहलै मैथिलीमे। आ ताहि लेल ओ गीतकार सभ जिम्मेदार रहलाह जे कोनो तुकांत पाँतिकेँ गीत मानि मंचपर पाग-माला लेल व्याकुल भेलाह। आइ धरि मैथिलीमे गीत विधाक कोनो अपन आलोचक नै भऽ सकलै आ ताहू लेल वएह कथित गीतकार सभ जिम्मेदार छथि। अपवादमे किछु नीक गीतक सृजन भेल मुदा ओ गीतकार सभ गीत विधाक आलोचनामे कहियो नै एलाह आ से चाहे रवीन्द्र नाथ ठाकुर होथि कि मैथिलीपुत्र प्रदीप होथि कि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' वा चंद्रमणि झा। दोसर कारण जे मैथिलीमे कथित गजलकार सभ पतचटनाक भूमिकामे रहलाह सदिखन। जिम्हर देखला मंच तिम्हर केलाह लंच। आ ताहूपर गजलक व्याकरणक ज्ञान पूरा गोल। तखन कोना बूझितथिन जे ई रचना गजल छै। आ तेसर कारण एहि गजलक प्रभाव। विद्यापतिक गीतक प्रभावक बाद जँ कोनो आन रचनाक प्रभावक बात हएत तँ एहि गजलक नाम सभसँ उपर रहत। खएर हम एतए गीत विधाक चर्चा नै करए आएल छी। हम आएल छी ओहि भ्रमक निस्तार लेल जे कि 90 बर्खसँ 'कमजोर गीत विधा' केर 'कमजोर गीतकार' आ 'कमजोर गायक-गायिका' सभ द्वारा पसारल गेल छै। बहुत गायक कहि सकै छथि जे हम भासपर रचना केलहुँ। मुदा हम कहब जे कोन भासपर रचना केलहुँ? वएह भास ने जे गजलक छै। ओही गजलक किछु शब्दकेँ आगू-पाछू कऽ दऽ ओकरा गलत बना कऽ गाबै छी।
कविवर सीताराम झा जी रचित सूक्तिसुधा (प्रथम बिंदु) केर पहिल प्रकाशन 1928 ई. मे भेल छल (संदर्भ- कविवर सीताराम झा-काव्यावली प्रथम भाग, संपादक- विश्वनाथ झा 'विषपायी', प्रकाशक-नमन निकुंज शिक्षा परिषद्, चौगमा, वर्ष-1998)। एहि सूक्तिसुधामे कविवर अपन एकटा रचनाकेँ गजल कहि प्रस्तुत केने छथि जकरा निच्चा दऽ रहल छी (फोटो परिशिष्टमे देखू)-
जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी
हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी
न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन
कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी
दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में
लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी
कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ
अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी
करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं
अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी
उपरक रचना गजल थिक आ सीतारामजीक अपन वर्तनीमे छनि। गायक सभ अही गजलकेँ गलत कऽ गाबै छथि। एहि गजलक व्याकरणकेँ हम अपन पोथी 'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' मे नीक जकाँ देखेने छी। तँइ एहिठाम नै दऽ रहल छी। जिज्ञासु पाठक ओहि पोथीकेँ पढ़ि जानि सकै छथि। बहुत लोक एकरा भगवती गीत कहै छथि जखन कि एकरा 'भगवती गजल' कहल जेबाक चाही। ई अनचिन्हार आखर टीमक सौभाग्य अछि जे ओ मैथिली गजलमे 'भक्ति गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (7 अगस्त 2012 केँ अमित मिश्र द्वारा) आ एहि तरहें कविवर सीताराम झा मैथिलीक पहिल 'भक्ति गजल' कहनाहर-लिखनाहर छथि। कविवरजीक ई गजल वस्तुतः भक्ति गजल अछि। ईहो सौभाग्य अनचिन्हारे आखरकेँ छै जे ओ मैथिलीमे 'बाल गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (24/3/2012 केँ एहि पाँतिक लेखक द्वारा) आ ईहो सौभाग्येक बात जे मैथिलीक पहिल 'बाल गजल' कहनाहर-लिखनाहर एक बेर फेर कविवर सीताराम झा सिद्ध होइत छथि (विशेष जानकारी हमर गजलक व्याकरण ओ इतिहास बला पोथीमे भेटत)।
भासक चर्चा हम उपरे केलहुँ जतेक ई पुरान गजल अछि (8 बर्ख बाद ई गजल 100 बर्खक भऽ जाएत) ताहि हिसाबसँ एकर भास आब कल्ट बनि चुकल अछि। एकर भास आब कियो प्रयोग अपन पैरोडीमे नव रूपें बना सकै छथि आ बलजोरी कहि सकै छथि जे हम नकल नै केलहुँ। हमर अनुमान अछि जे ई गजल बहुतो लोकक नजरिसँ हटि गेल छल जकर पुष्टि रचना नामक पत्रिका केर जून 1984 अंकमे डा. रामदेव झा जीक लेखसँ सेहो होइत अछि जाहिमे ओ सीताराम झाजीक आन गजलक उदाहरण देने छथि मुदा एहि भक्ति गजलकेँ बिसरि गेल छथि। जाहि समयमे ई लेख लीखल गेल हेतै ताहू समयमे एहि गजलक प्रभाव रहल हेतै तँइ हमर अनुमान अछि जे ई गजल डा. रामदेव झाजीक नजरिसँ सेहो छुटल रहलनि। एहिठाम हम एहि गजलकेँ तोड़ि-मरोड़ि आ पैरोडी बनल एक-दू प्रस्तुतिक लिस्ट दऽ रहल छी जाहिसँ स्पष्ट हएत जे कोना एहि गजल संग मजाक भेल छै (एहि लिस्टमे शौकिया आ सिद्ध-प्रसिद्ध दूनूक नाम अछि)-
1) नीलकमल झा रचनाकारक नाम तँ गलत देनहे छथि अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि (ओना अधिकांश पाँति ई शुद्ध गेने छथि)- https://www.youtube.com/watch?v=SnRmai1qtj0 नीलकमल झा एहिमे गीतकार रूपमे -उपेन्द्र ठाकुर मोहनजीक नाम देने छथि से आपत्तिजनक तँ अछिए संगे-संग मैथिली गीत-संगीतक अवस्थाकेँ सेहो देखा रहल अछि।
2) संजय झा एकर भासपर गेलथि जकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://youtu.be/EYctiERxVwo
3) मैथिली ठाकुर अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=0wFT4nPm360
4) आदित्य नाथ पैरोडी बना गेलथि जकर लिंक अछि -https://www.youtube.com/watch?v=yHPSqoSBwN0
5) भाव्या रानी अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=5dbn5X6f5yQ
6) उमा झा अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=26vr-J3Wtvc
7) प्रेमसागर अपन गायनमे थर्ड क्लासक पैरोडी केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=JNAen4rZeMg हम पहिने कहने छी जे कविवरक गजलक भास आब कल्ट अछि। एहि भाससँ बहुत नव पैरोडी बनाएल जा सकैए। एकर अतिरिक्त आरो नाम अछि मुदा एहिठाम हम उदाहरण स्वरूप किछुए देलहुँ अछि। अपवादमे हम प्रदीप पुष्पजीक उल्लेख करब ओ गायक नै छथि मुदा फेसबुकपर अपन स्वरमे एहि गजलक शुद्ध पाठ केलथि जकर लिंक एही आलेखक अंतमे एकटा आन संदर्भमे भेटत।
स्पष्ट अछि जे सीतारामजीक ई गजल गीत विधामे गहींर धरि गेल। आ एहि लेल बहुत तत्व जिम्मेदार छै पहिल तँ बहर (छंद) ओ काफिया, दोसर मिथिलाक शाक्त परंपरा, आ तेसर सरल शब्द। तीनू विशेषतासँ ई गजल अपन विधामे रहि कऽ गीत विधा धरि गेल इएह एकर सफलता छै। आब हमरा लोकनि लेल ई उचित जे लेखक केर सम्मान करैत, एकटा विधाक सम्मान करैत एहि रचनाक सही वाक्यक संग गायन हो, एहि रचनाक सही विधा देल जाए आ एहि रचनाक रचनाकारक नाम देल जाए। अन्यथा आब गजल विधा कमजोर नै अछि ओ अपन उचित स्थान लेब जनैत अछि।
उपरक जे लिंक देखलहुँ तकर अतिरिक्त अन्नु कर्ण जीक गाएल ई भीडियो सेहो देखू- https://www.youtube.com/watch?v=T6XvSPbL9DY एहि लिंकक अलगसँ उल्लेख करबाक मतलब अतबे जे ई भीडियो जिनका द्वारा अपलोड भेल अछि से एहि गजलक संबंधमे बहुत कुतर्क केने रहथि प्रदीप पुष्प जीक वालपर जकरा अहूँ सभ एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://www.facebook.com/pradeep.pushpa.7/posts/1414904502006571
हम उपरमे जतेक लिंक देलहुँ आ एकर अतिरिक्त आर जे लिंक हेतै ताहि ठाम जा-जा कऽ हमरा लोकनिकेँ एहि रचनाक सही विधा आ सही रचनाकारक नाम लेल कमेंट देबए पड़त आ ओकरा बदलबाबए पड़त ताहि लेल सभ गजल कार्यकर्तासँ आग्रह जे कविवरजी आ हुनक गजलकेँ उचित स्थान लेल जतेक संघर्षक जरूरति पड़तै से करथि। हम नीलकमल झाजीक लिंक उपर कमेंट दऽ एकर शुरूआत कऽ चुकल छी।
परिशिष्ट-
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ज्ञानवर्द्धन कंठ
मोबाइलक रुटीन
विवेका बाबूकेँ बड्ड फिकिर लागल रहैत रहनि।घरनी काँटीबालीकेँ कहलथिन- "अइ, अपनेक बालकक चरजा हमरा एकोरत्ती सोहा नहि रहल अछि।जखन-तखन मोबाइल पर लागल रहैत छथि।राति दू बेरि निकास जाइत छी।दूनू बेरि हुनका जगले आ मोबाइल पर लगले देखैत छियनि।जीह लहरि जाइत अछि।कथी इदिर-बिदिर करैत रहैत छथि, नहि जानि!किदन-किदन बाजितो रहैत छथि कनटोपा लगेने।गोली मारो,पकड़ो,..... की-कहाँ अर्र-दर्र बजैत सुनलियनि अछि।कखनहुँ ठठाक' सनकाह जकाँ हँस' लगैत छथि।पता नहि,केहन संगी-संगत छनि! हम तँ हिनक जीवन-भविष्य ल' क' बड्ड चिंतित रहैत छी।सुनै छलियैक-नो नॉलेज,विदाउट कॉलेज।कॉलेज त' कहियो पढ़' जाइत नहि छथि।पता नहि,मोबाइल पर कोन यूनिवर्सिटी खुजल छैक!बुझाक' कहियौन जे अपन मोबाइलक एकटा रुटीन बनाबथु।हरदम मोबाइल जोतने रहैत छथि,से अकरहर क' रहल छथि।एनामे कोनो दिन हमहीं कतहु पड़ा जायब।से कहि दैत छी!" काँटीबाली कहलथिन- "अरे ओ गेम खेलैत रहैत छैक।ओही पर पढ़िया- लिखिया सेहो करैत रहैत छैक।अहाँ अनेरे एहि सभमे नहि पड़ू आ हमरा पेड़ू नहि! जाउ अपन ऑफिस।बेमतलब धिया-पूता पर खिसिएबाक जमाना नहि छैक।की-कहाँ क' लै छैक गे माय गे माय!देहो भुलकि गेल।जाउ, हमर माथ नहि खाउ!"
साँझमे ऑफिस सँ आबि विवेका बाबू ओछान पर देह मोड़क लेल पड़ि रहलाह।ओतय सँ हॉलमे बैसल पुत्र पर नजरि गेलनि। ओतय आबि कुरसी पर बैसि गेलाह।कनी कालक बाद बजलाह- "बौआ,एकटा बात कही?खराप लागत त' नहि कहब!" बेटा कहलथिन- "कहू ने पापा! खराप किएक लागत?" प्रसन्न होइत बजलाह- "वाह, इ ने भेल हमर बेटाबला गप!देखू बेटा, हम अपना लेल नहि,अपितु अहींक लेल कहैत छी।एखन अहाँ जलखै क' रहल छी।एखनहुँ एक हाथ मोबाइले पर चलि रहल अछि।एक बेरिमे एक्केटा काज करू।भरि राति जागइ छी,आठ बजेक बादे सूतिक' उठैत छी।इ कोनो नीक बात थीक?गैसक समस्या भ' जायत।स्वास्थ्य गड़बड़ा जायत।तखन कोनो काज नीक सँ नहि क' सकब!मोबाइल सँ हमर कोनो शत्रुता नहि,मुदा अति सर्वत्र वर्जयेत्।तेँ एकटा रुटीन बना लिय'।एक नहि, दू, हे लिय' तीन घंटा मोबाइल चला लिय'।मुदा सदिखन ओही पाछाँ रहब,अहाँ सन बुधियार बेटा सँ हम इ अपेक्षा नहि करैत छी।की,अनुचित कहैत छी?" पुत्र कहलथिन- "पापा, अहाँक कहब सर्वथा उचित अछि।हम मोबाइलक रुटीन बनाक' अहाँकेँ देखबैत छी।" आधा घंटाक उपरांत ओ रुटीन बनाक' अयलाह।कहलथिन-"मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल चलेबाक समय निर्धारित केलहुँ अछि।"विवेका बाबू प्रसन्न भ' बजलाह- "वाह, मोन खुश क' देलहुँ।" अगिला दिन फेर पुत्रकेँ मोबाइल पर लागल देखि कहलथिन- "बौआ! फेर मोबाइल?आ रुटीन?" पुत्र मुँह पर आँगुर राखि कहलथिन - "वाइवा चलि रहल छैक!" विवेका बाबू चुप लगा गेलाह।साँझमे पुत्रकेँ पुछलथिन- "यौ,अहाँ अपन रुटीन देखाउ त' बौआ!कनी हमहूँ त' देखी जे कोन रुटीन बनेलहुँ अछि!" पुत्र रुटीन आनि देखेलथिन-
'भोर 10बजे सँ साँझ 5 बजे धरि- ऑनलाइन क्लास।
साँझ 5बजे सँ राति 10बजे धरि- क्लास-आधारित स्वाध्याय।
राति 11 बजे सँ 1 बजे धरि -मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल पर मनोरंजन/गेम/फेसबुक/व्हाट्सएप्प आदि।' विवेका बाबू कपार पीटि लेलनि।अपन ऑफिसक सहकर्मी लोकनि सँ पुछलथिन।सभक समान व्यथा।बड़ा बाबू कहलथिन - "देखू,तनावमे हमहूँ छलहुँ।अहीं जकाँ हमहूँ बड्ड उद्योग-उपाय केलहुँ।अंतमे केलहुँ की,त' हमहूँ एकटा एंड्रॉइड मोबाइल कीनि लेलहुँ।हम घर जाइते मोबाइल ल' क' बैसि जाइत छी।बस,आब संसारमे अट्ठाबजर ने खसि जाउ, हमरा लेल धनि सन!देखू, संसारक गतिक संग तालमेल मिला लिय'।कोनो तनाव नहि हैत।"विवेका बाबू तहिये अपना लेल एकटा एंड्रॉइड मोबाइल किनलाह।आब दूनू बापूत अपन-अपन संसारमे मगन छथि। काँटीबाली एकदिन कहलथिन- "एकटा एहने फोन हमरो किनबा दितहुँ!हथौड़ीबाली बड्ड चोट मारैत रहैत छथि।आइ मान चढ़ाक' की कहैत रहथि जे बुझलखिन हे बहिन!हमहूँ मोबाइल कीनि लेलियैन।आइकाल्हि ओहि लोककेँ कोनो लोक बुझै छैक लोक,जे एकटा मोबाइलो नहि राखत!की करत पाइ राखिक'? ल' जायत संगे उप्पर?आँय?"
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मुन्नाजी
लघुकथा- बीचला लोक
हमर साहित्यिक यात्रा कथा लेखन सं प्रारम्भ भेल छल. पहिल कथा-" मनियाडर" झंझारपुर कथा गोष्ठी (1993) मे पाठ पहिल प्रकाशनार्थ कथा " स्वीकार " कर्णामृत (1994) दोसर , प्रदीप बिहारीक संपादन मे सझिया संगोर " भरि राति भोर मे '(1997) तकर अतिरिक्त विदेह, मिथिलांगन....मे. ओइ बीच बीहनि कथा विधा फरिछाब' मे लागल आब ओ पाटि ध लेलक. पुन: कथा दिस....क्रमश: अपन तेरहम आ हिजड़ा जीवन पर लिखल टटका कथा प्रस्तुत ऐछ! सलाह, सुझाव सादर अपेक्षित!-मुन्नाजी
वाह!आइ त' जतरा सुफांटि निकलल! तीन दिन सं बौआ-टौआ कें खाली हाथ घर घुरि जाइ! लगैए आइ परोपट्टाक मए सब चिलका जन्म देनाइ बन्न क' देलकैए! अपन अन्न पानि खा कते दिन निमहब? पहिने जाहि गली, मोहल्ला मे पएर दी घोघतनिया बाली सब सेहो कहि दिए-"फल्लां गाम बाली के बेटा भेलैए! "जाउ ने धनगर आ समंगर दुनू छै! खोंइछा, झोरा-झपटा सब भरि देत! धिया पुता सेहो पछोड़ लागि सुना दिए -" ओकरा घर मे बेटा एलैए, चलू ओकरे दुरा पर जमघट जमतै! "यै मइयां आब जनी जाति के चिलका नै होइ छै?
धौर हेतै किए नै, ऐ तोर मे सबटा छौंड़ीए भफएल छलै!
बेटा सुनिते,हिजड़बा-हिजड़नीक झुण्ड ढोल, हरमुनिया ल' ढ़ूकि जाइ ओही अंगना! रहै त' सबटा हिजड़नीये साया, साड़ी आ ब्लौज पहिरने! कियो कियो सलवार समीज मे आ ओढ़नी ओढ़ने! ओही मे सं कियो कियो जिन्स, टीशर्ट पहिरने, बाबरी छंटेने हिजड़बा भ' जए! आ बांकी सबटा जनी जातिक भेष मे छाती बढ़ेने ऐन मेन मौगीए बुझू! सांच मे त' इ सब ने स्त्री ने पुरूष, बीचला लोक, भगवानक डांग देल! मुदा समाज मे रहै बसै लए कपड़ा लत्ता आ बोल सं पानिगर! देहगर आ दुधगर सेहो! पएरक घुंघरू सं लोकक मोन हरिया दान, धान आ पाइ ल' घर घुरए !
मिथिला मे बेटाक जन्म पर लोकक मोन हर्षित केनाइ पमरियाक काज छल! इ इस्लाम धर्म माननिहार ' पमार' जातिक एकटा वर्ग पेशाक रूप मे अपना लेने छल! इ सब झुण्ड बना गामे गामे पता करैत रहैत छल -' कोन घर बेटा जन्म लेलक! "एकरो रेवाज मे आने पौराणिक रेवाज सन कान्या बारल रहै छलै! कोनो घर कान्या जन्मक खबरि पाबि ओ घर बागि चलए. जखन की एकर पुरूष झुण्ड मोन बहटारै लए किछु सदस्य कें घघरी पहिरा स्त्री वेश मे नचबैए माने राज नर्तकी सं लोक नर्तकी धरि, पेशा मे सेहो स्त्री के नचएब समाज कें बेसी पसिन्न.मिथिला मे लौण्डा नाचक प्रथा नै रहलैए.कबुला पाती मे छठिक घाट पर आंचर पर नटुआ नचएब होइ कि विवाह दान छकरबाजी नाच करतै पुरूष आ स्वांंग स्त्रीक.आ ताहि समाज मे बेटी जन्म पर ओकरा मनहुस बुझत.गर्भहि जांच लग सं ओकर प्रताड़ना सं समाज एकभगाह सन भेल जाइछ.एक दिस बेटी जन्म पर बान्ह आ दोसर दिस जीवनक संपूर्णता आ कि मोन बहटारबाक प्रमुख साधन बेटीये, स्त्री.यांत्रिक विकासें परम्पराक होइत पतन सं सामाजिक सरोकार सेहो भारल सन. आकि लोक विकासक गति नव नव रूचि मे परिवर्तित भ' रहल. हिजड़ा नाच सेहो तहि रूचिक संकेत थिक.आ आब हिजड़ा समाज सेहो तेजी सं विकसित भ' रहल.
हय... हय तूं सब आङन मे कत' घूसल अबै छें?
बाबा ,तमसाइ किए छी? की भेल अहां कें धीरज धरू ने.हम सब कोनो मुजरा बाली नै जे मोन आ देहक मनोरंजन क' ढ़ेका,जेबी ढ़ील क' घर घुरा देब.
हय तों त' बताह जकां गप्प करै छें, हमरा की लालबत्ती बला बस्तीक गांहकि बुझै छें जे एना लोढ़िएने जाइ छें?
नै यौ बाबा, हम सब अहांक सनक देखि कें चौल करै छलौं.हम सब कि कोनो कोठा बाली छी जे इमान, देह, धरम सब बेचि क' पेट भरब.
हम सब अहीं सब सन माय बापक, इश्वरक डांग सं डेंगएल चिलका थिक. से इश्वरक गलती की हमर सबहक कर्तव्य दोष, नै जानि.एकहि कोखिक कियो सोझ कियो टेढ़ के त' परिवार, समाज राखिए लै छै. मुदा ओही कोखिक बीचला लोक माने नै बेटी ने बेटा के लोक मोन मारि बहटारि दैए.आ तहन हम सब मए बाप, सर समाजक निंहुछल एकटा नव समाजक अंग होइ छी.आ ओही तिरस्कृत समाजक हंसी ठठ्ठा मे समिलात भ' जीवन गुदस्त करैत रहै छी.
छी त' हमहुँ सब मनुक्खे, सकलि सुरति , देह गात सं अहीं सन एकरंगाहे. मुदा प्रकृति प्रदत्त जे सृजनधर्मिता तकरा सं वंचित.समाजक लेल अशपृश्य त' नै मुदा कुड़कुट सन. सेहो अयोग्यता त' प्रकृतियेक देल. कोनो बलात् व्यवहृत वस्तु जात त' नै ने हम सब. तहन बाबा एना हिज्जो किए ?
ऐ हिजड़ा जातिक एत' कोन खगता ?.हमरा घर त' पोती आयल, पोता नै ने! तहन कथीक हंसी खुशी. जो तों सब आन दुआरि,आन टोल, गाम. ताकुत कर गे नवजात बेटा आ घरन्दार घर. तों किन्नरवा सब हमरा बखसि दे,नेहोरा करै छीयौ. तों सब नाच गान कर तोहर सएह काज ने! जो धन संपति अरज पेट पोस!
बाबा, हम सब किन्नर नै, हिजड़ा छी, हिजड़ा. मुदा किन्नर जातिक गुण सेहो अंगेजने छी, पेट पोस' लेल. किन्नर त' सृष्टिक आदिये काल सं छल, वनवासीक रूप मे. जाहि मे नर नारी दुनू फराक छल. जे स्वर्ग लोक मे नर्तक नर्तकी ( नचनिया) रूप मे उपस्थित रहै छल. रामायण- महाभारत सब काल मे नचनिया निमित्त रहल. मुदा हिजड़ा प्रकृतिए सतएल एहेन जीवात्मा ऐछ जे ने नर छल आ ने नारी.कालान्तर मे लेखक सब किन्नर आ हिजड़ा के ओहिना मिझ्झर क' देलक जेना सबटा वनस्पति घी भेल डालडा आ सबटा वाशिंग पाउडर सर्फ कहए लागल.पौराणिक ग्रन्थ ज्योतिष शास्त्र फरिछौने ऐछ जे "- कोनो स्त्री मे चन्द्रमा, मंगल आ सूर्यक लग्ने गर्भधारण होइछ.शारीरिक संबंध मे वीर्यक अधिकाधिक उपस्थिति सं बेटा, रक्तक अधिकाधिक सं बेटी आ दुनूक समान उपस्थिति सं नपुंसक वा हिजड़ा चिलका जन्म लैछ.ओना विज्ञान तकरा नै मानैए.विज्ञानक अनुसार गर्भधारणक विकासक क्रम अवरुद्ध भेला सं मिलावटी जननांग (intersex) के संभावना बनैछ.एकर कारण मे संबंधक अनियमितता, दवाइ सेवनक उनटा प्रभाव, क्रोमोजोम मे एक्स- वाइक जग्गह एकाकी उपस्थिति आदि होइछ. बाबा, एकटा बात गिरह बान्हि लियय जे जन्मक समय सब बच्चा हिजड़ा नै रहैछ.सिरखारी सं सब पुरूषे सन रहैछ, मुदा अविकसीत जननांग रहैछ, टेस्टोरेनक अभाव सं छाती त' विकसीत होइछ मुदा अविकसीत लिंग उपस्थित रहैछ. करीब अस्सी प्रतिशत एहेन चिलका सर्जरीक पछाति कोनो एक रुप पबैछ. किछु सफल ऑपरेशन सं पूर्णत: पुरूष वा पूर्णत; स्त्री काय मे सेहो नवजीवन पौलक.
हय ,सुन ! हम कोनो स्कूलक कक्षा मे नै बैसल छी. तों तहन सं इतिहास, भूगोल, विज्ञान पढ़ेने जा रहलें. तोहर सबहक इश्वरक डांग सं समाजिक आ मानसिक स्थिति दारूण छौ से बुझै छी. मुदा आब की अंग्रेजी शासकक सत्ता थोड़े छै जे तोरा सबकें उभयलिंगी दर्जा आ अधिकार छीनि कें नक्सली की अपराधीक श्रेणी मे द' देने छलै. तोहर एतेक भाषण सं जिज्ञासा भेल जे तों नाच गान मे मगन रहै बाली इ विशिष्ट ज्ञानी कोना भेलें?
बाबा! हम पूरे हाइ स्कूल पढ़ने छी, आ अपन हंजेड़क मेट छी.अपन आ समूह सदस्यक अधिकार आ ज्ञान प्राप्तिक वास्ते स्कूल, कॉलेज, कचहरी आ मंत्रालयक चक्कर कटैत रहै छी....! समाचार चैनलक पैनल सदस्य छी!
बाबाक जिज्ञासा शान्ति पछाति ओकर खून मे नव उर्जा प्रवाहित भेलै,आंशिक चमक बढ़िया गेलै.हलसैत बाजि उठल-" हं बाबा हं, अहूं के जेना हमर सबहक जिनगीक दुख दर्दक खिस्सा बुझले ऐछ! आब कहू जे हम सब सबहक सुख- दुख मे सहयोगीये , मुदा शायद अंग्रेजबा सब रहै उनटा खोपड़ीक . जहन अवसान अबै छै तहन अहंकार बढ़ै छै आ बुद्धि घटै छै. तें ने 1871 मे इ सब एकभगाह कानून पास क' हमरा सब कें अपराधिक जनजाति " जरायम "के श्रेणी मे द' देने छल. बुझू ओ सब हमर सोन चिड़ै सन भारत के कामधेनु गए बुझि दुहि दुहि खए, से भेल मालिक.जहन की हम सब मांगि चांगि खाइ. फेरो हंसाब' खेलाब' जाइ से भेलौं ओकरा नजरि मे अपराधी. धनि कहू सुभाष, खुदीराम आ गांधी बाबा ....सब कें जे ओइ कलमुहां सब सं देश के आजादी दियौलनि.तहन 1951 मे अपन सरकार हमरा सब कें से हो ' जरायम ' सं आजाद करा समाज मे रहि नाच- गान क' पेट भरि जीवाक अवसर देलक.
समाजक ओलवा दोलवा सं कहियो हम सब खिन्न नै होइ छी. जे समाज अपन संगतुरिया के नै बखसैए से हमर सबहक कोना हएत? हम सब त' प्रकृतिए बारल सन. बाबा एकटा बात ध्यान राखब, बरू हम सब बारले सही मुदा असमाजिक नै. देहक भूख बरू नै जगौ मुदा पेटक भूख त' लगबे करै छै. ताहि लए त' नाच गाने क' हम सब अहां सबहक नजरि मे रहै छी. अहींक समाज जकां हमरो समाज मे जहन संख्या वृद्धि होइत गेलै तहन कते लोक बधइये मांगितै? सुनने हेबै जे खगता आविष्कारक जननी होइछ.त' हमहूं सब गुरूक आदेशे बस, ट्रेन, रेडलाइट पर थपड़ी पारि अर्थक जुटान मे जुटि जाइ छी.
आम समाज सं बरू बारले मुदा हमर कतिएल बेरएल लोकक सेहो एकटा संगठित समाज त' ऐछिए. समाज की? इएह ने जे एक फरीकक,एक जीव वर्गक सामुदायिक जिनगी जीवाक समूह.त' हमहूं सब की एकरवा थोड़े रहै छी. जेना अहांक समाज जाति, धर्म, वर्ग मे बांटल मुखिया, सरपंच, माञिन्जन शासन त'र निमहैए तहिना हमहूं सब अपन देवीक समूह मे बांट बखरा भ' सामूहिक जिनगी जीवै छी यै ने यौ.हमर समूह चारि वर्ग मे संगठित ऐछ! सब वर्गक अपन अपन देवी छथिन.
पहिल बुचरा,ऐ वर्ग मे कने पिताह, पुरूषाह आ उग्र सदस्यक प्रवेश रहैछ.इ देवी सेहो काली माय जकां उग्र त' ओ ऐ समूहक शांति भंग नै होम' देथिन, इएह लोक मान्यता छैक.
दोसर नीलिमा, इ संयमित, संतुलित जीवन जीयय वाली देवीक समूह ऐछ.!ऐ मे स्त्रैण सदस्य सबहक प्रवेश देल जाइछ. जे राब दुआब नै, अपना कें दाबि राख' वाली सदस्य होइथ.तेसर समूह जाहि देवीक होइछ ओ कहबैछ मनसा, जाहि मे एहेन सदस्य कें राखल जाइछ जे जीवन सं अगुताइथ नै, अपन जीवन मे किछु नव करबाक आतुर होइथ.आ चारिम समूह होइछ हंसा देवीक.ऐ मे हुनकर प्रवेश होइछ जे सदस्य उडांत होइथ. जिनकर पोन, मोन आ जीह एक ठाम टिक कें नै रहि पाबए.एक समूहक सदस्य कें दोसर समूहक सदस्य सं कोनो राग द्वेष नै रहैछ.मुदा जे जाहि समूह वर्गक सदस्य तकर नियमक बन्हन मे बान्धल सन बुझू.अहीं सबहक पंचायतक मुखिया जकां हमरो समूहक प्रमुख नायक कहबैछ.सब समूहक नायक मिलि जुलि एकटा गुरूक चयन करैछ.हमर समाजक कियो सदस्य प्रतिभाशाली, बलशाली, मेधावी कि उजड्ड हो, गुरूक अपमान नै करैछ.हम सब खोपड़ी खपा कि थोपड़ी बजा जे धन अर्जित करै छियै ने बाबा ओ सबटा गुरूक चरण मे अर्पित क' दै छियै. से करियौ किए ने, उएह हमर सबहक पालक आ उएह अभिभावक.
ऐ फाल्गुन शुक्लपक्ष मे वार्षिकोत्सव ऐछ, ऐ अवसर पर सब समूहक सदस्य एक निर्धारित जगह पर उपस्थित होइछ.सब अपन लहंगा- चुनरी, जेवर सं सुसज्जित, सजि धजि , दुल्हिन बनि आयल ऐछ. गुरूक आदेशानुसार इ पर्व विवाह अनुष्ठानक पर्व थिक.ऐ दिन सबहक सामुहिक विवाहक स्वांग रचाओल जाइछ.सबहक एकहिटा वर होइत छथि ' अरवण'. गाम, शहर सं बहरी जग्गह, सुनसान सन, अरवण देवताक प्रतिमा लगाओल गेल ऐछ! शमियाना मे लाइट आ डी. जे सं चकमक आ गनगन करैत दृश्य!
सब हिजड़ा गण पतियानी बना, धुप दीप जरा ' अरवण' देवताक अराधना मे बैसि गेल. नायक द्वारा पूजन, हवनक संग सबहक सिनूरदानक रेवाज पूर्ण भेल.आब सब नाच गान करैत हर्षोल्लास मे रमि गेल ऐछ! इ त्योहार सांझ सं भोर धरिक होइछ. भोरूकवा मे गुरूक आज्ञा होइते ' अरवण' देवताक मूर्ति तोड़ि फोड़ि नष्ट क' देल जाइछ. तहि संग सब वधुगण अपन अपन चुड़ी फोइर,सेनुर मेटा, मंगल सूत्र तोड़ि वैधव्य धारण क' लैछ.रंग विरंगा साड़ी, ब्लाउजक जग्गह उजरा साड़ीक परिधान मे आबि जाइछ. मुदा विलापक प्रथा नै छै. कींवदन्ति ऐछ जे- महाभारत काल मे हिजड़ा गण वनवासी छल. ओइ ठाम एकरा सब कें राक्षसक उत्पात भेलै.जकरा सं संघर्ष क' अर्जुन पुत्र ' अरवण' आजाद करौलनि. तें इ सब रक्षक बुझि अपन पति स्वीकार क' लेलक.मुदा अरवण,युद्धभूमि मे लड़ैत ओही दिन मृत्यु गति के प्राप्ति क' लेलनि.ओइ दिन सं इ, एकदिना पावनि मनेवाक रेवाज आइ धरि निरन्तरता बनौने ऐछ!
आइ सबहक जुटान एकठाम भेल ऐछ, पूरा चुप्पी मुदा मोन अशान्त सन! शान्तिक मृत्यु सं सब मोने मोन खुश भेल ऐछ,जए दहि एकरा त' मोक्ष हेतै.गै बिन्दा,ओना थोड़े पैट हेतौ चप्पल, जुत्ता ला ने.आ सब मिलि लहाश कें चप्पल, जुत्ता सं पीटैत कहैए- जो... जो गै फेर एम्हर नै अबिहें, जनमिहें त' मनुक्ख भ' कें! गै किरणिया तों किए नोर बहबै छें,पोछ! नै त' इ फेरो एम्हरे घुरि औतौ.पुन: शान्ति पसरि गेल ऐछ!अधरतिये मे लहाश कें खेत मे आनल गेल. हिन्दु धर्म मानितो लहास जरएब असगुन बुझल जाइछ. कियो बहरी बला लोकक दर्शन सं एकरा मोक्ष नै भेटतै तें चुपचाप खाधि मे द' झांपि चल. मना जे अगिला जन्म मे मनुक्ख होउ, नर- नारी किछो मुदा बीचला लोक नै.
आइ चारू भर खुशीक च'प उनार गप्प पसरल छै.सब हिजड़ाक करेजा सुप सन भेल बुझू.ओना निर्णय समाजक हो कि न्यायालयक सार्थके बुझू.इ निश्तुकि बुझू जे सब निर्णय सब पर लागू नै होइछ.आ कि एना कहू जे सब बात सं सब लाभान्वित नहि होइछ. मुदा तै सं कि आइ 15 अप्रैल 14 हमर सबहक जीवनक इतिहास स्वर्णक्षार सं लिखल सन! किए त' अझुके दिन सर्वोच्च न्यायालय हमरा सब कें पिछड़ी जातिक श्रेणीक बराबर आरक्षणक घोषणा कएलक! आब पढ़ल लिखल कें नोकरी मे जग्गह सुनिश्चित सन. ओना पहिनहियो सं हमर लोक सब शिक्षक, प्रोफेसर, पार्षद आदि त' भेले छै.मुदा आब अधिकार संग हेतै.हं अधिकारक बात पर मोन पड़ैए वर्ष-94. जहिया हम सब टी.एन. शेषण कें नाचि गाबि मोन बहटारने रही.उएह त' पहिल बेर हमरा सब कें विधिवत मताधिकार प्रयोगक अधिकार दियौलनि.ओइ सं पहिने हमरा सब कें मतदानक ने कोनो अधिकार छल आ ने कोनो सरोकार.आब.. आब हमहूं सब सरकार भ' सकै छी आ हमरो सबहक सरकार बनि सकैए जेना एखनहु धरि अहां सबहक ऐछ! बाबा ओंघाइ छीयै की?
ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन में ढ़ूकि गेल।
कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।।
क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।पमरियाक जग्ग्ह हिजड़ा देखि उत्सुकता दुन्ना।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल।
नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू।
यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन।
गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ!
मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक!
हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष।
" बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।"
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जवाहर लाल कश्यप
स्ट्रेश बस्टर
"रागिनी जल्दी चलु 6.13 के ट्रेन भेट जायत तखन समय पर घर पहुँचब आ घरक काज जल्दी भ जायत" सुशीला ऑफिश स निकलैत रागिनी के हाथ ध क बजलीह /
"नहि आई हम संगे नहि जायब /"
"ओकर फोन आयल छल कि ?"w
"हॉ ओकरे फोनेआयल छल कहलक जुहु मे भेट करु" रागिनी के मुँह पर लज्जा मिश्रित मुस्कान आबि गेल /
ओकर बाद दुनु अलग अलग दिशा मे मुम्बई के भीड के हिस्सा भ गेलीह /मुम्बई के भीड, भागैत भीड, एक दोसर स आगा बढबा के होर लैत भीड, धकियाबैत मुकियाबैत भीड, पता नहि ई होर कहिया खतम होयत /
ओहि भीड के अंग बनि सुशीला अन्धेरी स्टेशन पर आबि गेलीह / ट्रेन पहिले आबि गेल छल आ लगभग भरि गेल छल /ओ ओहि मे चढि गेलीह / बैसबाक नहि मुदा सोझ स ठाढ होबाक जगह भेट गेल छल / समय बीति रहल छल आओर् लोक ट्रेन मे चढल जा रहल छल / तिल रखबाक जगह नहि छल मुदा आदमी तैयो सन्हियायल जा रहल छल / मुम्बई के ट्रेन मे भारतक छवि देखल जा सकैत अछि / कोना नाना धर्म, नाना जाति , भिन्न-भिन्न प्रकार के वेश धेने सब एक संग समाहित भेल अछि आ अपस्यॉत भेल जिन्दगी जीबय लेल आ देश चलनिहार के गारि पढबाके लेल विवश भेल छथि /
ट्रेन चालु भेल आ सब कियौ भगवानक जयकारा लगेलक / सुशीला रागिनी के लेल सोचय लगलीह हमरा त अप्पन काज स फुरसति नहि होईत अछि, आखिर कोना ओ सब काज करैत हेती /अप्पन आफिसक काज , घर मे दुनू बच्चा के काज , पति के काज तखन बॉयफ्रेंडक नखरा से अलग / पता नहि भारतक पतन आ पाश्चात्यक नकल कतय जा रुकत /
* * *
"आई पहिले आबि गेलहुँ" सुशीला घर मे घुसैत आँफिस स आयल अप्पन पति के देखि बजलीह / खुशी बड्ड भेलन्हि मुदा भरि दिनक झमारल मुँह पर ओ खुशी नहि आबि सकल आ मोनक ओहि खुशी के राहुल (पति) नहि देख सकलाह /
राहुल व्यंग केलथि ,"चलु आई गलती भेल आब हम जल्दी नहि आयब /"
"हाँ जल्दी आबि क हम्मर उपकार केलहुँ . . ." सुशीला खिसिया गेलीह "तखन स टी व्ही देख रहल छी / एक कप चाह नहि पिने होयब ? रवि (बेटा) के स्कुल स आनि लाबितहुँ, सेहो नहि केने छी…."
राहुल बीच मे खिसिया क बजलाह "एक दिन हम सबेरे आबि जाउ तकर मतलब जे सब काज हमहीं करु /"
"नहिं , आबि क टीव्ही देखैत रहु " सुशीला बैग राखैत, जबाब डेल्खिन्ह् / हन हन करैत , घरक दरबज्जा जोर स बन्द करैत, रवि के लावय लेल स्कूल विदा भ गेलीह /भरि रस्ता अप्पन क्रोध के शांत करबाक प्रयास करैत रहली मुदा क्रोध छल जे शांत हेबाक नाम नहि ल रहल छल / पता नहिं पुरुख जाति कहिया स्त्री के अपन सम्तुलय मानत / जतेक काज ऑफ़िश मे ओ करैत अछि ततेक त हमहुँ करैत छी, तखन कथीक घमंड /
रवि के स्कूल मे छुट्टी होमय बला छल गार्जियनक लाईन लागल छलै, सुशीला मोने-मोन खिसियाईत पता नहिं ई लाईन स कहिया छुट्टी होयत जतय जाउ ओतय लाईन, बस मे लाईन, ट्रेनक टिकट मे लाईन, रोड पर गाडी के लाईन/तखने छुट्टी के घंटी बाजल / बच्चा सब अप्पन-अप्पन गार्जियन सब लग आबय लागल/ रवि के कुम्हलायल फुल सन सुखायल मुँह के देखिते सुशीलाक क्रोध ममत्व मे बदलि गेल / अप्पन जमाना याद आबय लागल / एकटा स्लेट ल क स्कूल गेनाई ,जतय पढाई कम,मौज-मस्ती ज्यादा /पढाबय के जगह पर कुर्सी पर बैस क सुतय बला मास्टर साहेब पासवान जी /खिस्सा सुना क पढाबय बला चन्द्रकांत बाबु /आब अपना स ज्यादा भाडी बैग /डिसिप्लिन के नाम पर बच्चा के टार्चर करैत सर / अहि चक्कर मे हरा गेल बचपना /
सुशीला अहि बात के सोचैत अप्पन घर आबि गेल आ आबिते क्रोध अप्पन चरम पर पहुँच गेल / राहुल घर मे नहि छल, घर मे ताला लागल छलै आ घर के दोसर चाभी सुशील के बैग मे रहै / राहुल के मोबाईल स्विच आँफ छलै आब एकटा उपाय छल जे पडोसी के घर मे बैस इंतजार कैल जाय आ सुशीला वैह करय लगलीह /ज्यों-ज्यों समय बितैत छल हुनकर क्रोध चरम पर जा रहल छल / ओ आ रवि दोसर के घर मे बैसल परेसान भ गेल मुदा राहुल के कोनो पता नहिं / रातिके 9.35 मे राहुल घर आयल आ अप्पन गलती पर सफाई देनाई सुरु केलक, सुशीला ओकरा बिना सुनने अंदर आबि गेलीह /
राहुल -" साँरी हमरा ई अंदाज न.........
सुशीला- "चुप भ जाउ हमरा कोनो बात नहि सुनय के अछि /"
सुशीला के क्रोध देखि रवि त सहमि गेल मुदा राहुल और खिसिया गेलाह / ओहि राति दुनु प्राणी मे खुब झगरा भेल / राहुल सुशीला पर पहिल दिन हाथ छोडि अप्पन पुरुषत्व सेहो प्रदर्शित केलाह /तीनु प्राणी भुखले सुतलाह /
रातिक घटनाक प्रभाव भोर मे सेहो देखल गेल / राहुल बिना खाना खेने चलि गेलाह /सुशीला रवि के खाना खुआ स्कूल भेजि अपने बिना खेने चलि गेलीह / फ़ेर सुरु भेल ट्रेनक वैह भीड / अंधेरी मे ट्रेन स उतरि ऑफिस के लेल बिदा भेलीह तखने रागिनी के फोन आयल कहाँ छी हमहुँ अंधेरी आबि गेल छी / सुशीला ओकर इंतजार करय लगलीह /किछु देर मे खुशी मोन रागिनी आयल आ दुनु आँफिस के लेल बिदा भेल /सुशीला -" कि बात छै आई बहुत खुश छी /"
"हम त अहिना खुश रहैत छी" रागिनी के जवाव छल "जिंदगी के एकटा मकसद अछि जे खुश ऱहु /"
सुशीला -"एकटा बात पुछु खराप नहि ने मानब ?"
पुछु....
"अहाँ जे दोसर लडका स भेंट करय जाईत छी से के अछि ?अहाँक बियाह भ गेल अछि, दू टा बच्चा अछि तखन ओकर की महत्व ? ओ अहाँक के अछि ?"
रागिनी के मुँह पर मुस्कान आबि गेल -"ओ हम्मर कियौ नहि अछि आँफिस मे सर स परेशान आ घर मे पति के पुरुषत्व स / बस ओ स्ट्रेश बस्टर छै ,स्ट्रेश बस्टर .............

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “एकटा ‘मैथिली गजल’ जे बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 312, 2020-12-15. https://www.videha.co.in/research/2020/312/एकटा-मैथिली-गजल-जे-बदलि-देलकै-मैथिली-गीत-संगीतक-इतिहास.htm

मूल विदेह अंक / Original issue