अनुपम रैना
यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज
सामान्यत: मनुष्यक लिखबा-पढ़बाक अथबा बजबाक छन्दरहित साधारण व्यवहारक भाषा गद्य (Prose) कहबैत अछि एहिमे मात्र आंशिक सत्यता अछि, कारण एहिमे गद्यकारक रचनात्मक बोधक अवहेलना होइछ।
साधारण व्यवहारक भाषा गद्य तखनहि भऽ सकैछ जखन ओ व्यवस्थित आ स्पष्ट रूपेँ व्यक्त कएल गेल हो। तेँ रचनात्मक प्रक्रियाकेँ ध्यानमे रखैत गद्यकेँ मनुष्यक साधारण किन्तु व्यवस्थित भाषा वा ओकर विशिष्ट अभिव्यक्ति कहब सएह उचित होयत।
साहित्य रचनाक दू गोट विधा होइछ- ‘गद्य- ओ ‘पद्य’। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, निबन्ध, संस्मरण, व्यंग, आत्मकथा, रिपोर्ताज, आलोचना पत्र-पत्रिका इत्यादि लिखल जाइत अछि। गद्यमे अलंकारक प्रयोग प्राय: नहिए होइत अछि मुदा पद्यमे एकर प्रयोग खूब होइत अछि। गद्य विधाक रचना सोझ-डारिएँ पढ़ल जाइत अछि, कारण एहिमे लयात्मकता नहि होइत अछि, जखन कि पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि।
यथार्थमे गद्यक सम्बन्ध हमरालोकनिक अभिव्यक्ति आ विचारसँ रहैत अछि जखन कि पद्यक सम्बन्ध मनोभावसँ रहैत अछि। दोसर शब्दमे पद्यक सम्बन्ध मनसँ होइछ आ गद्यक सम्बन्ध मस्तिष्कसँ।
ई बात सत्य जे पद्य लेखन प्रारम्भ गद्यसँ पहिने भेल छल, जकर प्रमाण महाभारतसँ लऽ ऋग्वेदकालीन प्राचीन रचनासभकेँ देखलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ मुदा आधुनिक काल गद्यक स्वर्णयुग थिक कारण तुलनात्मक रूपेँ एहि कालखण्डमे गद्यक विकास बेसी भेल अछि।
आधुनिक गद्यक प्रारम्भ :-
मैथिली गद्यक प्रारम्भ कहिआ भेल से निश्चित रूपेँ नहि कहल जा सकैछ मुदा आरम्भमे एकर साहित्य मौखिके छल तथा एकर विकासो तहिना होइत रहल। चौदहम शताब्दीक प्रथम चरणमे ‘वर्णरत्नाकर’क रचना भेल छल।
तेँ ई अनुमान लगाए असंगत नहि होयत जे ताबत काल धरि मैथिली गद्यमे साहित्याभिव्यक्तिक क्षमता आबि गेल रहए। मैथिली पद्य-साहित्ये जकाँ गद्य साहित्य सेहो सरस्वतीक अन्त: सलिला धारा जकाँ जनसमाजमे प्रवाहित भए रहल छल।
वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य साहित्यक स्वरूपक हमरालोकनि अनुमाने अथवा पीढ़ीगत हस्तान्तरणक आधारपर बुझि सकैछ। कारण ओ आलेखित आ मौखिक होइत छल।
तात्कालीन समयक लोककथा जेहन प्रो. तंत्रनाथ झाक ‘जोगक संगी’ ओ ‘जिवितहिँ स्वर्ग’ अछि तथा विभिन्न प्रकारक लोक कथाकाव्य जाहिमे म.म. परमेश्वर झाक ‘सीभान्तिनी आख्यायिका’क अनुसार रूक्मिणी स्वयंवरसँ लऽ विरहा चाँचरि धरि अबैत अछि। एतबे नहि एहिमे सलहेस प्रभृति ‘लोकवीरगाथा’ सेहो अबैत अछि। लोककथा काव्यकेँ गद्य-साहित्यमे परिगणित करबाक कारण ई जे एहिमे पद्यक अतिरिक्त गद्यक प्रयोग होइत छल, मुदा ओ पढ़ल जाइत छल लयात्मक रीतिएँ, गीत जकाँ। एहि पढ़बाक रीतिकेँ म.म. परमेश्वर झा ‘गमैया भास’ कहने छथि। डॉ. ग्रियरसन अपन ‘मैथिली क्रिस्टोमैथी’ (1981) मे सलहेसकेँ संकलित कए प्रकाशित करबौने छथि। ओकर भाषा केहन छल से द्रष्टव्य अछि- “नान्हिटासँ पोसलहु, एतेक वस्तु आनि कै घरमे रखलहुँ, तैयो नहि स्वामी सलहेस ऐलाह। हुनका कारण फुलबारी रोपलि, रंग-रंगक फूल आनि जगाओलि। बेली फूल, चमेली ओ बुलकुंज, नेबार, तेखरिक फूल, फुलवारी लगाओल हुनि सलहेस... आदि।”
उपर्युक्त पाँतीकेँ पढ़लासँ एतबा तँ स्पष्ट अछि जे ई नि: सन्देह ओहि समयक भाषा नहि थिक, मुदा ओहि समयमे भाषाक जेहन रूप रहल हो, गद्य धरि अवश्य लयात्मक प्रवाहमे गाओल जाइत छल आ ओ आइओ गाओल जाइत अछि।
परन्तु वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य लिखित रूपमे उपलब्ध नहि अछि। एकर कारण प्राय: छल पण्डितलोकनिक लोकभाषाक प्रति उपेक्षा भाव अथवा लिखबाक असौकर्य।
इएह कारण अछि जे वर्णरत्नाकरक पूर्वकेँ के कहए, पश्चातहुक कोनो साहित्यक गद्य चन्दा झाक पूर्वक प्राप्त नहि होइत अछि। चन्दा झासँ छओ सए वर्ष पूर्व ‘वर्णरत्नाकर’क भाषाक गद्यमे रचना कए ज्योतिरीश्वर केहन साहसक परिचय देने होएताह, तकर आइ हमरालोकनि अनुमाने टा लगा सकैछ।
विद्यापति सेहो लोकभाषामे पद्य रचना कए बड़ साहिसक परिचय देल एवं मैथिली लोकभाषाकेँ साहित्यिक गरिमा प्रदान कएल मुदा मैथिलीमे गद्यक रचना ओहो नहि कए सकलाह।
विद्यापति गद्य लिखलनि तँ अवश्य मुदा अवहट्ठमे- ‘कीर्तिलता’ ओ ‘कीर्तिपताका’ तथा संस्कृतमे ‘पुरुषपरीक्षा’ प्रभृति ग्रन्थक माध्यमे एतेक दूर धरि जे लिखनावलीक रचना ओ संस्कृतमे कएल, जकर उद्देश्य छलैक पत्र प्रभृति लोकोपयोगी प्रणालीक व्यवस्था प्रस्तुत करब आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसर आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसरपर आमंत्रण प्रभृति लिखबामे आदर्श बनले अछि।
एहिसँ पण्डित लोकनिक जाहिमे विद्यापति सेहो अन्तर्भुक्त कएल जा सकैत छथि, लोक भाषाक प्रति केहन प्रवृत्ति छल, तकर परिज्ञान होइत अछि। तथापि हुनक अवहट्ठु भाषामे मैथिली गद्यक विकासशील स्वरूपक परिचय भेटि जाइत अछि, यद्यपि ओहिमे संस्कृतनिष्ठता सएह अधिक अछि।
आधुनिक कालमे मैथिली जकर अतीत आ मध्यकाल उज्जवल रहलैक अछि, अपन सवल-श्रेष्ठ आधुनिक साहित्यपर यक्तिञ्चतो गर्व करबाक स्थितिमे अछि। मिथिलाक नवजागरण “नवीन पश्चात्य शिक्षा-पद्धति ओ एहिसँ उद्भूत नाना प्रकारक आन्दोलन, मुद्रण-यंत्र तथा समुन्नत ब्रिटिश प्रशासन”क सत्परिणाम थिक। ओना एकटा बात एतए कहब आवश्यक जे जखन पटनामे हिन्दीसँ अभिभूत विश्वविद्यालय स्थापित भेल तँ मैथिली शिक्षा-संस्थानसँ हटाए देल गेल आओर “तिरहुत महाराज”क कचहरीसँ सेहो निष्कासित भए गेल, तथापि एकर साहित्यिक स्तर एवं परंपरामे महान् परिवर्तन आएल।
एहि नवोन्मेषक एकदम प्रत्यक्ष ओ महत्वपूर्ण परिणाम गद्यक क्षेत्रमे परिलक्षित भेल अछि। प्राचीन आ मध्यकालीन गद्य नवीन युगक अपेक्षाक पूर्ति करबामे समर्थ नहि छल। पूर्वक गद्य अत्यधिक कवित्वमय आ अत्यधिक रीतिवादी छल; मध्यकालीन गद्यमे विभिन्न प्रयोजनक अनुरूप अपनाकेँ गढ़ि लेबाक खमता नहि छलैक। आधुनिक जीवनमे एहन गद्यक आवश्यकता छलैक जे दीर्घ काल धरि सुविधापूर्वक पढ़ल आ स्वादल जाए सकए, जे अखबार, पत्रिका, फिल्म, उपन्यास, विज्ञापन, कथा, आलोचना तथा एहिसभक संग शास्त्रीय निबन्ध एवं ग्रन्थक उपयुक्त माध्यम भए सकए।
आधुनिक गद्यक आदिकालीन आ अन्तकालीन स्वरूपक बीच ततेक प्रखर अन्तर अछि जे आन्हरहुकेँ ओ देखि पड़तैक। एहि नवीन स्वरूपपर अएबासँ पूर्व मैथिली गद्यकेँ अपन अनेक सोपान पार करए पड़लैक अछि।
एकर विकासमे जकर मत्वपूर्ण योगदान रहल अछि से थिक आधुनिक कालमे श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक उदय। हिनकहि प्रसादेँ मैथिली गद्य अपन नवीन स्वरूपक वरदान पाओलक अछि।
मैथिली गद्यमे यात्रीक अवदान :-
मैथिलीक कतोक शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनि मातृभाषा ओ राष्ट्रभाषा दुनूमे उत्कृष्ट कोटिक रचना कएलनि। मातृभाषा आ राष्ट्रभाषामे अन्यतम सम्बन्ध छैक। अतएव साहित्यकार जे विवेकशील, सम्वेदनशील ओ व्यापक अन्तर्दृष्टिसँ सम्पन्न होइत छथि, हुनका लेल दुनूमे पार्थक्य भाव राखब असम्भव। मातृभाषा परिचितक माध्यम थिकै। मातृभाषा अपन देश-कोस, माटि-पानिक महत्वकेँ सार्वजनिक रूपसँ स्वीकृति मान्यता देबाक, आदर्श स्थापित करबाक माध्यम थिक। यात्रीजी एहि दृष्टिकोणसँ अन्यतम साहित्यकार छथि। ओ मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा दुनूमे समान रूपेँ रचना कएलनि तथा अपन रचनाक माध्यमसँ समाजकेँ नव दिशा-दशा, आयाम आ दृष्टि देलनि। इहो तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण ओ गूढ़ रूपसँ विचारणीय जे मातृभाषेक माध्यमसँ द्विभाषी साहित्यकार लोकनि शीर्षस्थ साहित्यिक पुरस्कार अर्थात् साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ पुरस्कृत भेलाह- ताहिमेसँ एक छथि ‘श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषाक ओ ‘यात्री’ छथि तँ राष्ट्रभाषाक- ‘नागार्जुन’।
‘यात्री’ सन साहित्यकार कोनो एक भाषा, देश-काल, माटि-पानि, व्यक्ति- वर्ग, समाज-लिंग, जातिक सीमामे बन्हाएल नहि रहैछ। ओ सार्वदेशिक, सार्वकालिक ओ सार्वभौमक होइछ। मानवीय धरातलपर उतरि जखन सम्वेदनाकेँ अनुभव कएल जाइछ एवं जन-जनमे तकरा देखल जाइछ, तखन सृजन होइत छैक, कालजयी- विश्व व्यापी रचनाक, जे युगधर्मसँ सम्पृक्त रहैछ। जन-जनकेँ अपनामे आत्मसात कएनिहार ‘यात्री’ आ जन-जनमे समाहित ‘यात्री’ वंचित, पीड़ित, शोषकक दु:ख दर्दक मूक वेदनाकेँ करूण किन्तु बुलन्द स्वर देलनि। स्वरमे अनुनय-याचना नहि, संघर्ष विद्रोह ओ ललकाराक तख्ती प्रदान कएलनि। भूतसँ स्वीकृति-अस्वीकृति, वर्त्तमानक समकालिकता एवं भविष्यक लेल स्वस्थ्य आस्थापूर्ण सूक्ष्म-तीक्ष्ण अन्तर्दृष्टिक दिग्दर्शन यात्रीक गद्य वा पद्यक अन्तर्गत होइत अछि। ‘यात्री’ मिथिलेक नहि वैश्विक छथि। एतएव हुनक गद्यमे प्राचीनताकेँ स्वीकार अथवा नकार भावसँ ग्रहण नहि कएल गेल अछि आ, ने तँ नवीनताकेँ सद्य: सकारि लेल गेल अछि। दुनूक ग्राह्य-अगाह्य पक्ष-तत्त्व सतत हुनक अन्तर्दृष्टिमे रहलनि अछि।
यात्रीजीक मैथिली गद्य :-
मैथिलीक गद्य विधापर जँ विचार करी तँ श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक रचना संसार अति विस्तृत अछि। अपन एहि गद्य रचनाक माध्यमे यात्रीजी मिथिलाक सुदूर गाम-घर, कोठा-अटारी, झुग्गी-झोपड़ी, नगर-नगर आदिक विस्तृत चित्रण प्रस्तुत कएलन्हि अछि। हिनक सभ रचनामे मिथिला समाजक माटिक सुगन्ध भेटत, मिथिलाक प्रतिभा प्रतिष्ठा भेटत, समाजक सोझ-टेंढ़, विद्रुप्ता भेटत जकरा साहित्यकार श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ यथार्थताक संग प्रस्तुत करैत छथि। मैथिली गद्यक क्षेत्रमे यात्रीजीक निम्नलिखित कार्य अति प्रसंसनीय अछि यात्रीजी मैथिली साहित्यक प्रत्येक विधापर अपन हाथ चलौलन्हि आ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर थिक। हिनक दू गोट उपन्यास मैथिली भाषामे प्रकाशित अछि जे औपन्यासिक साहित्यक लेल एक विशिष्ट अवदान अछि-
(1) पारो (1946)
(2) नवतुरिया
यात्रीजीक फुटकर गद्यक रूपमे जे प्रमुख साहित्यक हम अपन एहि शोध प्रबन्धमे चर्च करए चाहब ओहिमे निम्नलिखित कथाक नाम लेने बिना हिनक गद्यक प्रसंग चर्च अपूर्ण रहत। ओ थिक-
(1) बउकन ठाकुर
(2) बूढ़ बोको
(3) गप्पक फोड़न
(4) रूपान्तर
(5) जरद्गव
(6) चितकबरी इजोरिया
यात्रीजीक तेसर विधा जे गद्यक रूपमे हमरालोकनिकेँ भेटैत अछि, ओ थिक हिनक संस्मरण, जाहिमे निम्नलिखित शीर्षकक संस्मरण कएने बिना यात्रीजीक गद्य-संसार अधूरा रहि जाएत। संस्मरण विधामे हिनक तीन गोट संस्मरणक विमर्श करब एतए उचित एवं आवश्यक अछि-
(1) चारि अहोरात्रि एक दिन
(2) पृथ्वी ते पात्रं
(3) प्रवासक संस्मरण
हिनक लेख व्याख्यान, रिपोर्ताज तथा स्फुट आदिक रूपमे जे प्रमुख गद्य यात्रीजीक अछि ओहिमे निम्नलिखित शीर्षकक उल्लेख करब अपेक्षित अछि-
(क) मैथिल महासभा : मैथिलित्वक मानदंड
(ख) रिक्तता ओ पूर्णता
(ग) कविता युगक गीता
(घ) प्रस्तुत प्रसंग
(ङ) स्वगत- अनुचिन्तन
(च) एकटा संदेश
एकर अतिरिक्त स्तम्भ लेखन एवं पत्र सेहो यात्रीजीक छनि। ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’ नामसँ चारि गोट स्तम्भ, ‘यत्-किंचित’ शीर्षकसँ आठ गोट स्तम्भ तथा ‘ओ-ना-मा-सी-धङ’सँ दू गोट स्तम्भ छनि।
-अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर