विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज

अनुपम रैना · 2020-12-15 · अंक 312

अनुपम रैना
यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज
साहित्यक रचनाक दू गोट विधा होइछ- गद्य ओ पद्य। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, स्मरण, व्यंग्य, आत्मकथा, पत्र लेखन, आदि अबैत अछि; ओतहि ‘पद्य’क अन्तर्गत कवि, गीत, गजल, मुक्तक, महाकाव्य, खण्डकाव्य आदि अबैत अछि। पद्यमे अलंकारक प्रयोग तुलनात्मक रूपेँ अत्यधिक होइत अछि। अलंकारकेँ पद्यक गहना कहल गेल अछि। पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि। एहि प्रकारक रचना गेय होइछ। हमरालोकनि एकरा सुरमे गाबि सकैछ। पद्य रचनाक प्रारम्भ गद्यसँ पहिनहि भेल छल। महाभारतसँ लऽ ऋग्वेद काल धरिक पुरातन रचनासभ पद्य विधेमे अछि।
यात्रीक मूल्यांकन कविक रूपमे :-
कवि शब्दक अर्थ मात्र कविता लिखनिहार नहि थिक। प्राचीन भारत वा प्राचीन ग्रीक देशमे सभ दिन शब्दक प्रयोग द्रष्टा, क्रान्ति द्रष्टा, सर्वज्ञ, नियन्ताक अर्थमे होइत रहल। अंग्रेजीमे तकरे भावार्थ gifted, insight, seev, prophet आदि शब्देँ व्यक्त कएल गेल अछि। एही अर्थमे सोना कविकेँ आदिअहिसँ ओ जे कोनो भाव सभ व्यक्त कएलनि, जे किछु तथ्य विचारलनि तकरे, महत्व देल जाइत अछि।
यात्रीजी की कएलनि, की लिखलनि, की कहलनि तकर महत्व एही दृष्टिसँ बुझबाक थिक। आइ हुनक मृत्युक बाद हमरा इएह खटकैत अछि जे हम सब ई नहि बुझि, हुनक महत्व मात्र हुनक कवित्वक चमत्कारकेँ दैत छिअनि। ओ कविता लिखनि, नीक कविता लिखलनि, नव ढंगक कविता लिखलनि से से सर्वथा सत्य थिक, मुदा ओतबे सत्य नहि थिक। ओ बरोबरि जाहि कवि कर्मकेँ धेने रहलाह, से हुनक नैसर्गिक ओ स्वाभाविक कलमक गति छलनि। विशिष्ट जे हुनकामे वस्तु छल, से ओतबे धरि नहि रहल। लोक कहैत छनि जे यात्रीजी बहुत संख्यामे कविता लिखलनि, ओ अपनहुँ बजलाह जे हम कतेक कएलहुँ, से लोक नहि जनैत अछि, हमर बहुत प्रकारक कविता भेल, हिन्दीमे भेल आ से मिथिलाक लोक नहि जनैत बुझैत अछि; हम बहुत प्रकारक विताकेँ नव आयाम देलियैक, से लोक नहि बुझैत अछि। हिन्दीमे कहल जाइत अछि जे ओ आञ्चलिकता, शब्दक ठेठपन, तद्भावना, व्यंगपूर्ण भावुकता आ प्रवल जीवन शक्तिक कविता लिखलनि, प्रगतिशील कविता लिखलनि, ओ नव छन्द, मुक्त वृत छन्द गढ़लनि, अतुकान्त कविता लिखलनि, गद्य लिखलनि।’ सभसँ बेसी कहल जाइत छनि जे जनताक पक्षधर ओ व्यंग, ओ बहुत संख्यामे आ बहुत दिन धरि दू हजार पाँती पचास वर्ष धरि- बरोबरि लिखैत रहलाह। आ इएह हुनक महानता छलनि।
एहि प्रसंग बहुतो बात ठीक छैक आ बहुत बातक दृष्टिकोण हुनक कवि कर्मक सम्बन्धमे उनटा-पुनटा बूझल जाइत अछि।
मोटा-मोटी हुनक सम्पूर्ण रचनामेसँ आजुक लोककेँ हुनक गद्य रचना विशिष्ट लगैत छनि। ई बात नहि जे हम हुनक गद्य शक्तिक महत्व कम दैत छिअनि, से भा्रमक होएत। प्रत्युत हम मानैत छी जे गद्यमे पाखण्डक ओ सामाजिक स्वार्थक महान चित्रण यात्रीजी कएलनि। एहिमे वर्ग संघर्षक विद्रोह एवं असन्तोष उजागर कएलनि अछि। ओ नव कविता आ मुक्तक छन्दक प्रचार-प्रसार सेहो कएलन्हि, मुदा हम ई नहि मानैत छी जे हुनक महत्व आञ्चलिकताक कारणेँ भेलनि।
हिन्दीमे यात्रीजी अपन पेट पोसबाक लेल एवं विशाल क्षेत्रमे प्रसिद्धि पएबाक लेल जे प्रयास कएलनि, ताहि हेतु हुनक सभसँ विशेष महत्व देबय बला वस्तु छलनि। मुदा ओ तँ भीतरसँ- अन्तससँ मिथिलाक साहित्यकार छलाह, मिथिलाक माटि-पानि केर ओ मूलत: जीवन्त कवि छलाह, जकर सीमा महान छल, हिमालयक शिखर सन उच्च छल। ओ कोनो आञ्चलिक शक्ति नहि छलाह जे हिन्दीमे प्रकट भेलनि, किछु सन्हिआ गेलनि, किछु देखि पड़लनि। मैथिली साहित्यक एकटा विस्तार छल। मूलत: ओ हिन्दीक लेखक नहि छलाह। एहि विषयपर विचार करबाक हेतु एकटा बृहत् शोध-प्रबन्ध लिखबाक आवश्यकता अछि। हुनक मैथिली कविता कम रहनु, मुदा हिन्दी बला जकरा आञ्चलिकता कहैत छथि से बहुत बेसी, बहुत उत्तम, खाँटी मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक तात्विक छिटका सभ थिक। ओ सभ तँ मैथिलीमे लिखबाक वस्तु छलैक, मैथिलीएमे लिखल जइतैक, मुदा ताहि हेतु प्रचुर प्रकाशक नहि भेटलनि। ‘बाबा बटेसर नाथ’नामक जे ओ पोथी लिखलनि से विशुद्ध एहने कथा थिक। ओकर मर्म हिन्दीक पाठक नहि बूझि सकताह। ओकर गहींड़ सामाजिक अभिप्राय नहि पाबि सकताह, मुदा से यात्रीजी मैथिलीमे नहि लिखनि, तकर कारण छल मैथिलीक प्रकाशक नहि भेटब। मैथिलीमे लिखि ओतेक पैसा, मेहनति, विस्तृत क्षेत्रमे पाठक एवं यश भेटबाक आशा छलनि तेँ ओ पोथी मैथिलीमे नहि लिखल गेल। बलचनमा, दुखमोचन आदि एही प्रकारक आञ्चलिकताक द्योतक थिक। व्यंगपूर्ण सामाजिक चित्रण मिथिला मात्रक टिप्पणी नहि थिक, ओहिमे मिथिलासँ बाहरो अनुभव सभक प्रयोग भेल छैक।
मुदा, कवित्व शक्ति जकरा कहैत छैक, जाहि कवित्व शक्तिक कारणेँ यात्रीक कविकर्मकेँ हमरालोकनि उत्युच्च कोटिक लेखन मानैत छिअनि, तकर बराबरी करय बला हिन्दीमे हुनक काव्य नहि भेटैत अछि। जेना- कल्पनाक पाँखिक उड़ान, द्वन्द्व, कृतिका नक्षत्रमे, हिमगिक उत्संगमे, ताड़क गाछ, भए गेल प्रात, ऋतु सन्धि आदि केर जोड़ी हुनक हिन्दी काव्यमे हम तककैत-तकैत हरान भए गेलहुँ, नहि भेटल। ‘आन्हर जिनगी’जाहि कविक शक्तिक परिचय दैत अछि से प्राय: विश्वक सभसँ श्रेष्ठ कवित्वमे कतहु भेटय तँ भेटय अन्यथा ओ बेजोड़ अछि।
यात्रीजीक एकटा पैघ उपलब्धि ई छनि जे हुनका भाषामे ठेठ शब्दक प्रयोग होइत अछि आ हुनक भाषा एही कारणेँ क्रान्ति अनलक। ओ देहातीपनक गमैया टाँसमे ठेंठ बोलीक रचनामे माधुर्य उत्पन्न करैत छथि। एहि प्रकारेँ खाँटी शब्दक पाथर हिनक रचनामे अनायासे भेटि जाइत अछि। यात्रीजी एकटा विशेष शैलीमे लोक जीवनक ठाठ बुनि अपनत्व बोधक प्रगाढ़तामे जीवन यथार्थक खाला खिचलनि। श्री चन्देशक उक्ति छनि- ‘युग सत्रूक प्रमाणिक दस्तावेज’ यात्रीक प्रसंग।[i]
उपर्युक्त चन्द्रेशक उक्तिमे हमरा अतिशयोक्ति देखि पड़ैत अछि। प्रत्युत हिन्दीक लेखनकेर बीचमे मैथिली शब्दावलीक प्रयोगकेँ हिन्दीक बोलीक रूपमे देखब छैक। हम मैथिलीक साधारण शब्दक साधारण प्रयोगकेँ गमैया आ ठेंठ अपमानजनक बुझैत छी। मैथिली शब्द मात्रकेँ गमैया प्रयोग कथमपि नहि मानल जा सकैछ। मैथिली शब्दक प्रयोग स्वस्थ आ शिष्ट मैथिली भाषाक शब्दावलीक प्रयोग थिक, जाहिमे सरल जीवन्त भाषा ओहिना रहैछ, जहिना मिथिलाक शिष्ट समाजमे मैथिली बाजल जाइत अछि। ओहिमे शब्द जे सरल अछि, ताहिमे कोनो गमैया प्रयोग नहि झलकैत अछि। ध्यान देबाक थिक जे ओहि शैलीमे संस्कृतिक प्रयोग सेहो पूर्ण साहित्यिक रूपमे यत्र-तत्र भरल अछि। जेना बंगला भाषाक कोनो साहित्यमे सरल बंगला सहित संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीक प्रयोग करब स्वाभाविक होइत छैक। ओकरा गमैया ठेंठ कहब अपमानजनक थिक। ओ तँ शिष्ट भाषाक साहित्यिक रूप थिक। यात्रीजीक मैथिली काव्यमे जे प्रयोग सब अछि तकरा कोनो रूपेँ संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीसँ ओत-प्रोत कएल छैक, तकरा देखलापर हुनक मैथिलीकेँ कोनो गमैया ठेंठ कहल जा सकैछ, से आश्चर्य लगैत अछि। एकर एकटा बानगीक रूपमे ‘परम सत्य’नामक कवितामे देखल जा सकैछ :-
“हम, अहाँ ओ ई मने क्यो होथु-
व्यक्ति मात्र थिकाह अगबे फूसि
सत्य की तँ शून्य
सत्य की तँ ब्रह्म
सत्य की तँ घनानन्द, अखण्ड चित् कूटस्थ
सैधव लवण सम नीरंध्र..।”[ii]
की, एहि पाँती सभकेँ गमैया कहबैक? अगबे शब्द गमैया नहि थिक शुद्ध मैथिलीक शिष्ट भाषा थिक। आ ‘सौंधव लवण सम नीरंध्र मैथिलीक चमत्कृत संस्कृतनिष्ठ प्रयोग थिक। ई कोनो कृत्रिमताक भाषा नहि थिक। ई सहज शिष्ट मैथिलीक साहित्यक रूप थिक। जेना-
“धनिकहा सबहक
हाथमे छनहि राम-कृष्णक टीक
जे बजइ अछि फूसितकरा डरेँ घर-घर कपइ छथि हलुमान,
घूस रोटक पाबि दुष्टक पीठ
ठोकथि काल भैरव सन विकट बलवान।”[iii]
एहिठाम ध्यान देबा योग्य बात ई अछि जे हलुमान आ काल भैरव’क बिम्ब-गमैया ठेंठ आ संस्कृत पर आधारित छैक, से गमैया नहि थिक। ओ सभ मिल-जुलल मिझड़ाएल शुद्ध शिष्ट मैथिली भाषाक साहित्यिक रूप थिक।
यात्रीजीक आओर कोनो कविता लेब; तँ ओहिमे सरल ओ सस्कृतनिष्ठ मिझड़ल भाषा भेटत, जहिना शिष्ट साहित्यिक भाषामे भेटत। ओकरा गमैया कहब धृष्टता होएत :-
कुम्हीक लैत अओढ़, चारक पुरान खओढ़
कोड़ो धरैत खाम्ह, बरेड़ीक संग-संग
छल जा रहल बहैत, अपसग अलझन दैत
देखि भेलहुँ ढंग-
क्षीर सागरमे सुतल भावनाकेँ करबाक लेल तंग।[iv]
उपर्युक्त पद्यांशमे क्षीरसागर आ खाम्ह, कोड़ो, दुइ भाषा छैक? नहि। दुनू एके भाषा- शिष्ट, साहित्यक मैथिली भाषाक शब्दावली थिक।
जाहिठाम जेहन कल्पना, जेहन साहित्यिक योजनामे जेहन भाषाक, जेहन शब्दावलीक माङ छैक, तेहन शब्दावली आनल गेल अछि। ई देहातीपनक बोलीमे रचना माधुर्य उत्पन्न करब थिक। ई शुद्ध मैथिली भाषा, मैथिली साहित्यक चमत्कार कवि कर्म थिक।
ई सभ तँ सामान्य रूपेँ शीर्षस्थ कवि कर्मक गुण भेल। मुदा एतबे लए केँ हम यात्रीजीकेँ महाकविक रूपमे नहि देखैत छिअन्हि। ओ दूर द्रष्टा, युग स्रष्टा जे भेलाह से एहिसँ बेसी अपना देश अपन जन्मभूमि मिथिलाकेँ महान आधुनिक देश बनेबाक दृष्टि रखबाक कारणेँ भेलाह, जे आरम्भसँ हृदयमे आगि जकाँ पजरैत छल, मुदा पूर्ण रूप जीवनक अन्त अबैत-अबैत देखलनि।
पहिल दृष्टिमे यात्रीजीकेँ सन 1931 ईसँ 1941 ई. धरि एतबे ध्यान गेलनि जे अपन प्राचीन इतिहास बहुत महान छल। मुदा ओहिमे बहुत रास सामाजिक ओ आर्थिक समस्या सभ आबि कऽ देशकेँ जटिल ओ दुर्भाग्यपूर्ण बना देने अछि, तकरा ओ बालविवाह ओ बृद्धविवाह केर कारूणिक एवं घिनाओन वैवाहिक दुखस्थाकेँ हटेबाक विकलता रूपमे देखलि। बूढ़ वर ओ बाल विधवाक विलाप नामक कवितामे लिखलनि-
“बनौने जा रहल अछि नोरक धार
ओहीमे लोक वेद भसिया बरू जाय
अगराही लगौ बरू बज्र खसौ
एहन जाति पर बरू धसना खसौ
भूकम्प हौक बरू फटौक धरती
मा मिथिले रहिये केँ की करती।”[v]
एहिठाम ध्यान देबाक अछि जे मिथिलाकेँ बड़ उच्च स्वरमे ओ गौरव गाथा लय अपन काव्य दृष्टि आरम्भ कएने छलाह आर से गौरवमयी प्राचीन मिथिला केर गीत गाबि कऽ की हैत? जँ ई समस्या सभ नहि सुधरत। समस्याकेँ ओझराएबाक हेतु ओ नवतुरियाक आह्वान कएलनि। हुनक कहब छलनि- पछाति नवतुरिए आबओ आगाँ ई ओ पहिल दृष्टि थिकनि जाहिसँ ओ मिथिलाकेँ आगाँ बढ़ाबय चाहैत छलाह।
यात्रीजी एतबेसँ सन्तुष्ट नहि होइत छथि। ओ ताकए लगलाह जे आर की करबाक छैक। कविक स्वप्न कामक कवितामे तकर आभास पूर्ण रूपसँ देखलनि-
“अन्न नै छै, कैंचा नहि छै, कौड़ी ने छै
गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे?
उठह कवि तोँ दहक ललकारा कने
गिरि शिखर पर पथिक- दल चढ़तैक रे!”[vi]
वास्तविकता की थिकइ से बुझितहक आँखि खोलि ओ चारू दिस तकलनि तँ मिथिलादेश हुनका देखि पड़लनि। बाढ़िक विकट समस्या, गरीबीक मारि, बेरोजगारीक झमारल देश आँखिक सामने नाचय लगलनि आ हुनका रहि नहि भेलनि। 1947 ई. अबैत-अबैत यात्रीजी बुझलनि जे मिथिलाक विकास तखने होएत, जखन समाजमे छोट-छोट, छोट-पैघ जे भिन्न-भिन्न अपनाकेँ बुझैत अछि- मिथिलावासी यावत् अपनाकेँ एकदेसी भए भेद-भावकेँ बिसरि, स्वयं जागि समस्या सभकेँ अपने नहि सोझराओत। ओ लिखैत छथि-
“जय जय जय हे मिथिला भात
जय लाख लाख मिथिलाक पुत्र
अपनहि हाथेँ हम सोझराएब
अपना देशक शासनक सूत्र।”[vii]
तेसर दृष्टिकोण अबैत छनि मिथिलाक हेतु विद्यापति पर्व गाम-गाम मनयबाक-प्रचलित करबाक यात्रीजीक आह्वान आ चेतना समितिकेँ पटनामे स्थापित करब। ई कथा विशेष जोर दए कहबाक थिक ओ बुझबाक थिक। महाकवि विद्यापतिक नामेसँ जे मंच बनल से आइ एकर प्रतीक अछि जे मिथिला वासीक चेतना जगबाक इएह मंच, इएह संस्था मार्ग थिक, जाहिसँ नव मिथिलाक निर्माण भए सकत। कवि देखलनि आ हमरा सभकेँ मार्ग धरा देलनि।
इएह विचारसँ घुमि-घमि ‘परम सत्य’नामक कवितामे कहैत रहलाह। ओ लिखलनि- धन्य हे श्रमशील मानव विश्वभरिमे व्याप्त तोहर जाति।
अन्तिम सोपान अपन एकान्तमे लिखल पत्र सभ श्री जीवकान्तक नामे जे भारती-मंडन नामक पत्रमे छपओलन्हि तइमे ओ स्पष्ट ओ गूढ़ विचार रूपेँ ओ बाजि उठलाह-
“संयुक्त मिथिला पीपुल्स पार्टी अथवा ताहिसँ पहिने रन्टेले कचुअल फोरम फार युनाइटेड मिथिला कोटिक कोनो ग्रुपकेँ अंकुर रूपेँ देखय लागल छी। समस्त पत्रावलीमे ओ सभटा विस्तारसँ देने छथि हुनक कवि दृष्टि विकसित भए गेलनि आर ओ की करय चाहैत छलाह।
मिथिलाक निर्माण एत्ते एही मार्ग होएब सम्भव छैक। दु:ख एतबे जे एहि दृष्टिकेँ देखि-देखि ओ मात्र कविक स्पप्न बना सकलाह। मरबाक समय मात्र ओ एतबे बाजि सकलाह- हमरा लए चलह अपन गाम, सभसँ पहने मोन पड़इ अछि अपने भूमिक लोक।
-अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर
[i]यात्री- चेतना समिति पटना, 2000 ई, पृ.- 44
[ii]चित्रा- यात्री, (परम सत्य कविता)
[iii]चित्रा- यात्रीजीसन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44
[iv]चित्रा- यात्रीजी सन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44
[v]चित्रा- परम सत्य कविता- वैद्यनाथ मिश्र यात्री
[vi]चित्रा- बूढ़वर
[vii]चित्रा- मॉं मिथिले कविता- यात्रीजी

Suggested citation: अनुपम रैना. “यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 312, 2020-12-15. https://www.videha.co.in/research/2020/312/यात्रीक-पद्यमे-मिथिला-समाज.htm

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