२.१०.उमेश मण्डल- मैथिलीमे ई-पत्रकारिता
२.११.गजेन्द्र ठाकुर- भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक)
२.१२. जितेन्द्र झा- रिपोर्ट
२.१३.नवेन्दु कुमार झा- रिपोर्ट
२.१४.श्याम सुन्दर शशि- कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह
२.१५.डॉ कैलाश कुमार मिश्र- यायावरी
२.१६.डॉ. गंगेश गुंजन- रिपोर्ट
२.१७.हितेन्द्र गुप्ता- आब नहि खुलत नवका शराबक दोकान
२.१८.सुभाष साह- लन्दनमे नेपाल मेला २००८ (लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट)
२.१९.सुशांत झा- रिपोर्ट
२.२०.मनोज झा मुक्ति- निष्कर्षविहीन सम्मेलन !
२.२१.सुमित आनन्द- भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना
२.२२.उमेश कुमार महतो- बहादुरगंज स’ रिपोर्ट
२.२३.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली सी.डी. एल्बम
योगेन्द्र पाठक वियोगी (सम्पर्क- 9831037532)
नरक विजय
(एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि।- नाटककार)
पात्र परिचय
मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक)
पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत
अंक 2
दृश्य 1
मंच सज्जा मे कोनो विशेष अन्तर नहि। एकटा टेबुल आ किछु कुर्सी मंच पर राखल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लिखल अछि ‘यमलोक’।
यमराज आसन पर बैसल छथि। बगल मे चित्रगुप्त अपन खाता बही पसारने ओहि मे डूबल छथि। प्रकाश पहिने यमराज पर पड़ैत अछि तखन चित्रगुप्त पर। फेर प्रवेश पथ पर, जतए दूनू यमदूत बाहुबली मृतात्मा रमेश आ सुरेश कें लेने आबि रहल छथि। हुनका दूनूक मंचक बीच पहुँचला पर पूरा मंच आलोकित होइत अछि। दूनूक हाथ मे ब्रीफकेस छनि, से मंच पर रखैत छथि।
यमराज चित्रगुप्त महराज, इएह दूनू ओ विशिष्ट बाहुबली मृतात्मा छथि रमेश आ सुरेश। हिनकर कर्मक लेखा जोखा देखि लेल जाओ।
रमेश (नम्र स्वरें) धृष्टता माफ हो महाराज तऽ निवेदन करी। यदि ब्रीफकेस खोलबाक अनुमति भेटैत तऽ अपने सबहक काज आसान भऽ जाइत।
यमराज अहाँ दूनू लेल जखन सब नियम कानून बदलले गेल तखन इहो कइये लिअऽ।
(दूनू नीचा झुकि कए अपन ब्रीफकेस खोलि स्मार्टफोन बहार करैत छथि, ओहि मे लीखल विवरणक फाइल निकालि ओकरा चित्रगुप्त कें दैत)
सुरेश एहि मे अपने कें हमरा दूनूक सबटा पापक रेकॉर्ड भेटि जाएत। हमरा दूनू द्वारा कएल गेल हत्या, अपहरण, बलात्कार, व्यभिचार आदिक विस्तृत विवरण तारीख, साल आ समय सहित लिखल अछि।
रमेश ई विवरण हमरा कम्प्यूटर मे सेहो भेटि जाएत। इंटरनेट आब पूरा ब्रह्माण्ड मे उपलब्ध छैक। यदि एतए कम्प्यूटर उपलब्ध हो तs क्षणे मे सब सूचना हाजिर भs जाएत।
चित्रगुप्त इंटरनेट आ कम्प्यूटर की होइत छैक ? छोड़ू ई मुरखाहा गपसप। (स्मार्टफोनक विवरण कें देखैत आ अपना खाता सँ मिलबैत) धर्मराज, विवरण तऽ ठीके नीक सँ लीखल अछि।
यमराज ठीक छैक, एखन तऽ हिनका दूनू कें जल्दी अपन स्थान पठेबाक अछि तकर इन्तजाम होअए।
चित्रगुप्त हिनकर कर्मक फल देखि तऽ लगैत अछि जे छियासियो नरक कुण्ड कम पड़ि जाएत। हिनका दूनू कें सब नरक कुण्डक बास भोगनाइ छनि तें कतहु सँ शुरू कऽ सकैत छी।
यमराज तऽ पहिने अग्निकुण्डे मे जाथु।
रमेश अनुमति हो तऽ एकटा तुच्छ निवेदन करी धर्मराज।
यमराज आब की ? डराइत छी की ?
सुरेश नहि धर्मराज, उखरि मे मुह देलाक बाद मुसराक कोन डर ? यमलोक मे आबि पापी कें यातनाक कोन डर ? डर होइतै तऽ लोक पाप करबे नहि करैत। हमर निवेदन दोसर अछि।
रमेश हमरा दूनू कें स्नान करबाक अनुमति देल जाओ महाराज वैवस्वत।
यमराज (तमसाइत) पापी नरकभोगी मृतात्मा कें स्नानक कोन काज ? ई कोन नव टाटक ठाढ़ केलहुँ अहाँ सब ?
सुरेश धर्मराज, अपनेक न्याय तीनू लोक मे ख्यात अछि। बुझले होएत जे फाँसिओक सजा भेटल कैदी कें अन्तिम इच्छा पूछल जाइत छैक आ पूरा कएल जाइत छैक।
रमेश ओतबे नहि, ध्यान दियौक देव जे छागड़ो कें बलि देबा सँ पहिने स्नान करा देल जाइत छैक। हमहूँ सब जखन विभिन्न नरक कुण्ड मे हजारो सालक सजा भोगए जा रहल छी तऽ ओहि सँ पहिने एक बेर नीक जकाँ स्नान कऽ लेब उचिते ने हेतैक न्यायराज।
चित्रगुप्त धर्मराज, बहस मे हिनका दूनू सँ जीतब कठिन अछि। अपन चमत्कार तऽ ई सब मर्त्यलोके सँ देखा रहल छथि। तें हमर विचार जे हिनका लेल स्नानक व्यवस्था कइये देल जाए।
सुरेश (चित्रगुप्तक पैर पकड़ैत) धन्य छी प्रभो। बस एकटा आर विनय जे स्नान खुला मे नहि बन्द कक्ष मे करबाक व्यवस्था हो आ ब्रीफकेस लऽ जेबाक अनुमति सेहो भेटए।
यमराज बन्द कक्षक स्नानघर तऽ मात्र हमरेटा अछि, ताहि मे मृतात्माक प्रवेश सम्भव नहि। (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) जाउ कोनटा बला इनार कें घेरेबाक व्यवस्था करू।
रमेश धर्मराज, नियम मे मामूली ढिलाइ सँ समयक अमूल्य बचत होइत। जतेक काल मे इनार घेरल जाएत ओतेक काल मे तऽ स्नान कऽ कए हम सब किछु घण्टा अग्निकुण्ड मे बासो कऽ लेब। एहि दृष्टिकोण सँ देखल जाओ सूर्यपुत्र।
चित्रगुप्त हमरा लगैत अछि नियम मे ढील देबहि पड़त। जतेक जल्दी हिनका दूनू कें एतए सँ हटाएब ओतेक जल्दी दोसर काज शुरू कऽ सकब। ई सब जतेक काल एतए रहताह, किछु ने किछु टाटक ठाढ़ करितहिं रहताह।
यमराज (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) बेस, चित्रगुप्त महराजक इच्छानुसार हिनका दूनू कें हमरा स्नानघर मे लेने जइयनु। कड़ा पहरा राखब। चिन्हिते छिएनि केहन मायावी छथि। कतहु एम्हर ओम्हर बहरा जेताह तऽ पूरा यमलोक मे हड़कम्प मचि जाएत।
दूनू दूत जे आज्ञा देव। (दूनूक ब्रीफकेसक संग दूनू कें स्नानघर दिस लऽ जाइत छथि।)
चित्रगुप्त हमरा लक्षण किछु नीक नहि लागि रहल अछि। ई सब धरती पर पापो केलक अछि, जतेक जे काज केलक से अनायासे नहि, खूब सोचि विचारि कए केलक, ओकर क्रमबद्ध रेकॉर्ड सेहो तैयार केने अछि जे सत्ते मे हमरा खाता सँ नीके छैक, हरदम विचित्र माँग रखैत अछि जकरा एकदम अनुचितो नहि कहि सकैत छिऐक।
यमराज अपने तऽ ई खेला एखन देखलियैक अछि, हम तऽ कतेक काल सँ देखि रहल छी। एही खेलाक कारण ने हमरा मर्त्यलोक जाए पड़ल आ फेर दौड़ि कए देवलोक आबए पड़ल मंत्रणा लेल। (किछु खियाल करैत) स्नान मे बहुत देरी लगौलक ई दूनू।
(एतबे मे एक यमदूत दौड़ल अबैत अछि एकदम परेशान भेल)
दूत-एक जुलुम भऽ गेल धर्मराज, ओ दूनू एकहि संग स्नानघर मे प्रवेश कऽ गेल दूनू ब्रीफकेसक संग। एतेक देरी लागि गेलैक मुदा बहराइते नहि अछि। तें अपन संगी कें पहरा पर राखि हम दौड़ल एलहुँ अपने कें सूचित करै लेल।
यमराज चित्रगुप्त महराज, आब की होएत ? एहि मायावी मृतात्माक कोनो ठेकान नहि।
चित्रगुप्त कने देखि लेल जाओ, यमलोक सँ भागत कतए ?
(ताबत पाछू मे दोसर दूतक संग रमेश आ सुरेश आबि कए ठाढ़ भऽ जाइत छथि, दूनूक हाथ मे एकटा पैकेट छनि।)
रमेश अपने सबहक समय बचबै लेल एके बेर स्नानघर मे प्रवेश कएल धर्मराज। कोनो कुण्ड मे पठेबा सँ पूर्व एकटा तुच्छ अनुरोध मानल जाओ देव।
यमराज आबहु अहाँ सभक बखेराक अन्त नहि भेल अछि ?
सुरेश नहि देव, बखेरा कोनो नहि, मात्र एतबे जे मर्त्यलोकक ई छोटछीन उपहार स्वीकार कएल जाओ जे हम सब अपना ब्रीफकेस मे लेने आएल छलहुँ। (रमेश अपन पैकेट यमराज कें आ सुरेश अपन पैकेट चित्रगुप्त के दैत छनि)
यमराज (पैकेट कें निहारैत) एकर की प्रयोजन ?
रमेश उपयोग केलाक बाद एकर गुण अपनहि बूझि जेबैक महाराज वैवस्वत।
चित्रगुप्त (पैकेट कें चारू कात घुमा कए देखैत) एकरा की करबाक छैक ?
सुरेश एकर उपयोग अपने शयनकक्ष मे करबैक देव। पैकेट मे देखियौ एकटा टोंटी छैक। राति मे शयन कक्ष मे विश्राम करबा काल पैकेट सँ वस्तु कें बहार कए ओहि टोंटी कें सेहो खोलि देबैक। किछु काल बाद ओ पसरि जेतैक आ किछु बाजऽ लागत। ध्यान सँ सुनबैक आ जेना कहल जाए तहिना करबैक। यदि कोनो तरहक गड़बड़ी लागए तऽ टोंटी कें मुह बन्द कऽ देबैक। ओ वस्तु फेर अपन पुरान अवस्था मे आबि जाएत।
यमराज आर किछु ?
रमेश नहि देव, हम सब तैयार छी, पठाउ जाहि कुण्ड मे आदेश हो।
सुरेश (रमेशक हाथ धरैत) अग्निकुण्डक आदेश तऽ भइये गेल छैक, चलऽ ने अपनहि पुछैत पुछैत चलि जाएब। बुझले छहु ओतए सौ हाथ उपर धधरा उठैत हेतैक। (विदा हेबाक उपक्रम करए लगैत अछि)
चित्रगुप्त आब अहाँ सब किछु बेसिए हड़बड़ाएल लगैत छी। थम्हू, हमरा खाता मे नाम पता लिखऽ दिअऽ, एतए औंठा छाप दियौक। ई आदेशपत्र लऽ कए दूत लोकनि जेता अहाँक संग, ओतुका अधिकारी कें देथिन, ओ फेर औंठा छाप लेताह मिलबै लेल जे कतहु कोनो मृतात्माक अदलाबदली तऽ ने भऽ गेल। तकर बादे कुण्ड मे खसाओल जाएत।
रमेश दूटा निवेदन स्वीकार करियौ देव — पहिल जे औंठा छाप नहि लऽ कए दस्तखत लेल जाओ, हम सब तऽ उच्च शिक्षाप्राप्त छी। आब मर्त्यलोक मे सब साक्षर भऽ गेल छैक। दोसर जे हमरा दूनू कें कुण्ड मे खसबैक कोनो काज नहि, हम सब अपनहि खुसी खुसी कूदि जेबै ओहि मे।
यमराज दस्तखत तऽ आइ तक कियो करबे नहि केलक, हमरा इहो नहि बूझल अछि जे ओतुका अधिकारी लोकनि कें दस्तखत मिलान करबए अबैत छनि की नहि।
सुरेश अपने सब फोटो लेबाक व्यवस्था किएक ने रखैत छी ? कोनो तरहक झंझट नहि, फोटो देखू, मिलाउ। कोनो अदलाबदलीक सम्भावना नहि।
चित्रगुप्त (खिसिया कए) ई यमलोक छिऐक, मर्त्यलोक नहि। एतए वैज्ञानिक आविष्कार नहि भऽ रहल छैक, मात्र पापी मृतात्मा कें सजा देल जाइत छैक।
रमेश हम सब नीके लेल कहलहुँ देव, कोनो बात नहि, सुरेश, छोड़ह अपन जिद, दऽ दहक औंठा छाप आ आगू बढ़ऽ। (औंठा छाप देबा लेल हाथ बढ़बैत छथि, चित्रगुप्त हुनकर औंठा छाप लैत छथि, तकर बाद दोसर कागत पर सुरेशक औंठा छाप सेहो लैत छथि, दूनू कागत दूतद्वय कें दैत)
चित्रगुप्त हिनका दूनू कें सम्हारि कए अग्निकुण्ड तक लेने जइयनु, ओतुका अधिकारी कें सब बात नीक जकाँ बुझाए देबनि नहि तऽ ई दूनू ओतहु कोनो टाटक ठाढ़ करताह।
(दूनू यमदूतक संग रमेश आ सुरेशक प्रस्थान)
यमराज एक उखराहा मे मात्र दूटा मृतात्मा कें निपटाओल। एना जॅं स्थिति आगुओ भेल तऽ यमलोकक कार्यालय बन्दे भऽ जाएत।
चित्रगुप्त आब आइ कोनो काज करबाक मोन नहि अछि। जाइ विश्राम करी, अहूँ विश्राम करू धर्मराज।
यमराज आजुक संध्या तऽ ओहुना एहि मायावी पैकेट कें बुझबा मे बीत जाएत।
चित्रगुप्त से ठीके। हमरा तऽ डर लगैत अछि जे ई सब कोनो षडयंत्र ने रचने होअए अपना सब कें बुड़िबक बनबै लेल।
यमराज की कहू ? ओतए जखन देवलोक सँ मीटिंग के बाद पहुँचलहुँ तऽ देखल जे दूनू दूत ओएह डायरी बला डिब्बा मे किछु देखि रहल अछि। ततेक तल्लीन छल जे हमरा पहुँचबाक कोनो सुधि नहि भेलैक ओकरा दूनू कें। हम ओ डिब्बा छीन कए जे देखल तऽ आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ। एतेक छोट डिब्बा मे एकटा अर्धनग्न युवती बन्द आ कूदफान करैत।
चित्रगुप्त (किछु नहि बुझबाक भाव चेहरा पर) किछु बुझबा मे नहि आबि रहल अछि एकरा सबहिक खेला। देखियौ राति मे ई डिब्बा कोन करतूत देखबैत अछि।
यमराज बेस, आब चलल जाए। (अपन अपन उपहारक डिब्बा सम्हारने दूनू गोटेक प्रस्थान, मंच अन्हार)
(अगिला अंकमे जारी)
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
रबीन्द्र नारायण मिश्र- सम्पर्क -9968502767
धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर
लजकोटर
(प्रवासीक जीवनपर आधारित)
-13-
प्रातभेने हम भोरे तैयार भए लताक ओहिठाम बिदा भेलहुँ।ताबे लताक तीनटा एसएमएस आबि गेल छल । भोरक समयमे दिल्लीक बसक भीड़ जगजाहिर अछि । टिकट लेबाक हेतु पाछूसँ चढ़नाइ जरूरी अछि। जँ अहाँ आगाबाटे चढलहुँ आ टिकटचेकींग भए गेल तँ गेलहुँ । जुर्माना दिअ आ फज्जतिओ सुनू ।ई बात हम बुझि रहल छलहुँ मुदा पछिलका गेटपर ततेक लदमलद छल जे हमरा आगूबाटे बसमे घुसिआए पड़ल । जाबे ककरो टिकट हेतु हाक दितिऐक ताबतेमे टिकटचेकींग भए गेलैक। हमरा लाख कहबाक कोनो असर नहि भेलैक । दू-तीनटा मुस्टंड मिलिकए हमरा बससँ उतारि देलक आ लेने-लेने कातमे लए गेल । एक आदमी कानमे कहैत अछि-“एकसए टाका दए दएह,छुटि जेबह नहि तँ जहलो भए सकैत अछि ।" हम जेबीमे हाथ देलहुँ । कुल एकानबेटा टाका छल । ओकरा निकालि कए देखए देलिऐक आआग्रह केलिऐक जे कमसँ कम दसटाका छोड़ि दिअए मुदा कथी लेल किछु सुनत । ओ चट्ट दए सभटा टाका अपन जेबीमे धए लेलक आ दसटाका आओर देबाक जोर देबए लागल । हमरा नहि रहि भेल । ठोह पाड़ि कए कानए लगलहुँ ।एकटा बूढ़बा टिकटचेकर कहलकैक॒ –
“छोड़ि दही।”
से सुनि कएजानमे जान आएल । जेबीमे एकहुटा पैसा नहि रहए। तैओ मोन हल्लुक लागल । कैटा यात्रीसभ तँ ओतहि रोकि लेल गेल । कैटाकेँ टिकटचेकरसभ गरदनिआ दए बससँ उतारि देलक।बस आगा बढ़ल ।कहुना कए लताक घर लगक बसस्टापपर उतरलहुँ । बसस्टापसँ सटले ओकर घर छलैक । हम आगा बढ़ैत छी। लता घरक गेटेपर भेटि गेलि ।
गेटसँ अंदर होइते लताक पिताजी, नीरज भेटि गेलाह । हम हुनका प्रणाम केलहुँ । कहए लगलाह-"हम अहींक बाट ताकि रहल छी।" जाढ़क समय छल । रौदेमे लौनमे हम सभ बैसलहुँ ।
"लता अहाँक बहुत प्रशंसा करैत रहैत अछि ।"
"हम हिनका सभटा बात बुझा देने छिअनि । ताही हिसाबे ई आएल छथि ।"-लता बाजलि।
" ओ तहन तँ हिनका सभटा बात बूझले छनि । कारखानापर दुनूगोटे संगे चलि जाह । हम मौका पबितहि आबि जाएब । आइएसँ काज शुरु कए देथि । हिनकर रहबाक ओरिआन सेहो कए देलिअनि अछि ।" -से कहि नीरजओहीठाम बामा कातक कोठरीक कुंजी हमरा थम्हा देलाह । लताक घरमे मात्र ओ आ ओकर पिता नीरजरहैत छलाह। घरकसभटा काज नौकर-चाकर करैत छलैक।हमसभ चाह-पान केलहुँ आ लताक संगे कारखानाबिदा भए गेलहुँ ।
नोएडामे कारखानामे हमर सभक कार जहिना पैसल कि गार्डसभ धराधर लताकेँ सलामी देबए लगलैक । हमसभ उतरिकए सोझे मालिकक कक्षमे गेलहुँ । ओहिठाम पहिनेसँ दरबानसभ मुस्तैद छल । चाह-जलखै सभ किछुक ओरिआन छल । हमसभ चैनसँ चाह-पान करैत गप्प-सप्प करैत रहलहुँ । चाह पीबि बैसले छलहुँ की नीरजकफोन आबि गेल जे ओ किछु झंझटमे फँसि गेलाह आ अखन कारखाना नहि आबि सकताह । हमसभ कारखानाक चारूकात घुमलहुँ ,कर्मचारीसभक संगे गप्प-सप्प केलहुँ । आ भोजनक समय फेर ओहीठाम आबि गेलहुँ।
"हमरा तँ एहि तरहक काजक कोनो अनुभव नहि अछि ।"
"काज तँ स्टाफसभ करैत छैक । अहाँकेँ तँ बस देखरेख करबाक अछि । फेर हमहुसभ रहबे करब ।"
हमसभ दिनबरि ओहीठाम रही । कखनो किछु,कखनो किछु होइते रहलैक । साँझ भए रहल छल । हम आ लता कारसँ आपस ओकर घर बिदा भेलहुँ । ई तय भेल जे दू-तीन दिनमे हम समान सहित नवका डेरामे चलि आएब । लता हमरा बसस्टापधरि छोड़ि आएलि । हम रस्ताभरि आजुक घटनाक्रमपर सोचैत रहि गेलहुँ । विश्वासे नहि होइत छल जे एहनो भए सकैत छैक ।
रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक
प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:-