लालदेव कामत
भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि
जगत जननी जगदंबा जानकी महामाया थीकिह। जातेक रामायण संख्याँमे य रामायणक अवलोकन-मनन करैत धारावाहिक टी० वी० पर श्रीमान् रामानंद सागर जीक आयल। आ अहू कोरोना महामारीक लॉक डाउनमे रामायण सीरियल सर्व सुलभ भेल। ताहि लेल हुनकर धन्यवाद अवश्य करैत छी, परंच एकटा कचोट मनमे सदा सर्वदा रहैत अछि: जौ श्री सागर जी एतुका भाषाक (मैथिली) उपेक्षा नहिंकए तत्कालीन जनकपुर मिथिला क जनभाषाक कनेक चर्चा करितथि तँ मैथिली अनुरागीमे उत्साह बढ़ितैक। आओर हमसब जे जानकी नवमी मनाबैत छी, से आरो परिष्कार होइत। सामाजिक दूरीके नीमाहैत कतौह पैघ जमाबड़ा जुनिकरी, मात्रे नैतिक समर्थन करैत अपन पुरान मांग पर अड़ल रही " मिथिलाराज बनाके रहब " एहि संकल्पके फेरसँ दोहराबैत जनक सुता जानकी आ हुनक मातृभाषा मैथिली पर संक्षिप्त चर्चा करबा सँ अपनाके एहि अवसर पर रोकि नहिँ सकब।
महर्षि महामुनि वेदव्यासक अध्यात्म रामायण जे ब्रह्मांड पुराणक उत्तर खंडक आख्यान अछि आ संत बाल्मिकिक प्रतिष्ठा भारतवर्षमे आदि कविक रुपमे छैक जे संस्कृतमे रामायण लवकुश जन्मसँ पूर्वहि रचने रहथि। बहुतो इतिहासकार पौलथि जे सबहक रामायणमे रामेक गुणन बादन बेशी भेल छैक, जखनकि पंडित लाल दासक मैथिली रामायणमे सीताक गुणगान बेसी भेलैक। सीता बिनु रामक मर्यादा पुरुषोत्तम होयब कठिण रहैक। भगवतीरुपे जखन राक्षसके लतियबैत दण्डित करैत छथिन, ताहि प्रसंगके दोसर रचियता सब लालदाससँ फुट विचार केने छैक आ हुनका अपना छाती ( थन) सँ असुरक संहार करबाक कहने छथि: जे कियो पतिया नहिँ सकैत छैक। हमरौ ई तथ्य कनियों नहिँ अरघैत अछि। एहिठाम सीताक प्रति लेखकीय उदणडताक लगाम नहिँ लागने समीक्षक मंथन करथि। हमरा मैट्रिक मे लंका दहन आ आई0ए0 मे वर्षागीत पढ़बाक बाद डाँ0 बच्चेश्वर झाक रेडियो वार्ता सेहो महाकवि लालदास पर सुनवाक सौभाग्य भेटल रहय। हुनकर जन्मभूमि खड़ौआ गाम बहुतोबेर सन् 1980 सँ हालधरि जाकए ओतुका माँटिक चन्दन लगेबाक अवसर भेटल अछि। हुनकर किछु पांति एहि तरहेँ अछि-
निज भाषा जननी निज देश!
स्वर्गहु सँ जानथि जीवेश!!
तेँ हम कथा कहब तेहिरीति!
नहि विद्या कविता गुणगीति!!
मिथिला भाषा मधु माधुर्य!
शेष शारदा कह प्राचुर्र!!
देश विदेश क कयल विचार!
लक्ष्मी जतय लेल अवतार!!
नाम जानकी पड़ल जनीकि!
बजली मिथिला भाषा नीकि!!
कोमल वाणी अमृत समान!
तकर भाव रस क्यो-क्यो जान!!
पुण्य देशमे भाषा नीकि!
मिथिला सभक शिरोमणि थीकि!!
ताहि भाषामे करब सुवन्ध!
सीतारामक चरित प्रबंध!!
मैथिलीमे राज आश्रित दू महाकविमे चंदा झाक मिथिला भाषा रामायण आ लाल दासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण चर्चित भेल। लाल दास सबसँ बढ़िके सीता पर विस्तार देलनि एकटा पृथक पुष्कर काण्ड रचलनि, जकर पाँति देखू-:
मिथिला देश परम अभिराम!
सकल तीर्थमय धर्मक धाम!!
आबथि ततय मुनीश अनेक!
मिथिला वास करथि सुविवेक!!
दुष्कर तप कर मुनि समुदाय!
जनक सुश्रूषा करथि सदाय!!
ऋषि आ घुमन्तु प्राचीन परम्पराक बाद मानव समाज मे जे मैथिली भाषा आ तकर पहिचान दियेबा लेल विश्व प्रसिद्ध हमरा सभक आदर्श सीता दाई लेल आधुनिक उदगार व्यक्त करयमे किछु प्रमुख तथ्य सोझासोझी अछि -:
प्रो0 राम प्रमोद चौधरी अपन एकटा आलेख मे कहने छथि- जनक देश बाइस योजन धरि व्याप्त अछि। एतय हजारों गाम अछि। एहि देश मे नीच जातिमे उत्पन्न मनुष्यो प्रायः उदार होइत अछि। जनकरपुरक दक्षिणमे सात योजन दुर हटा कए डीजगल नामक महाग्राम अछि जतय जनक महाराजाक राजप्रसाद अछि, ग्रामक सटले सरिता सभमे श्रेष्ठ यमुना अत्यंत वेग सँ बहैत अछि। डीजगलक दक्षिण भाग मे आध योजन दूरी पर गिरजा नामक ग्राम देशवासी सभ मे विख्यात अछि। एहिठाम दुई नदीक मध्य मे एकटा प्राचीन मंदिर अछि। तत्पश्चात भैरव स्थान अछि जाहिठाम मुनिक... भैरव पूजन कए ओ सीतामण्डप गेलाह, जाहिठाम प्राचीनकालमे ग्रंथि बंधनक रुपे सीताक विवाह भेल छल।
पांचम शताब्दीक वृहत पुराणक मिथिला महात्म्य खंड मे जे वर्णित छैक तकर अनुवाद कविवर चंदा झा ई पाँति सृजित केलाह-
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशी पूर्व कौशिकी धारा ।
पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा।।
मैथिली साहित्य मे सिद्धहस्त हस्ताक्षर किछु कविक पाँति देखल जाए, 'वर्तमान मिथिला' कविता मे राजीव कुमार कण्ठ गाबै छथि -
माँ मैथिली हटावल गेली, हम चुप रही
बीपीएससी सौं धकियावल गेली, हम चुप रही
हम मैथिल कियो नै! कास्यथ, ब्राह्मण,यादव बनल चुप्प रही
जाति-पाति मे बटल समाज, तखन की हैत?...
डाँ0 बुचरू पासवान 'श्री जानकी' कविता शुरू करैत गाबै छथि-
मिथिला मे बहु ग्रह नाना जानकी नवमीक बनल संगोर
बहु संख्यकमे जनमनके जेना पूजा अर्चना मे जन विभोर...
सुभाष कुमार कामत केर पाँति मैथिल मंच सँ प्रकाशित -
....
ठाकुरजी, चौधरीजी झाजी मिश्रजीक दलान सँ बहरा दियौक
जाय दियौक यादवजी... पासवानजी भंडारीजी आ बारहौं वर्णक दलान पर
मिथिला राज्यक नारा कें जाए दियौक
घसछिलनी क छिट्टा मे , हरबाहक लागैन पर......
तेरहम शताब्दी मे ज्योतिरीश्वर केर वर्णरत्नाकर मैथिली गद्य पोथी सँ ल के अद्यतन बहुतो रचनाकर् मैथिली साहित्यक कतेको विधामे अपन कलम चलेबामे समर्थ भेलाह/भेलीह। ताहि सद् प्रयास लेल मैथिली पाठक श्रोता अभिभूत रहैत आयल अछि। सन् 1971 मेँ जननायक कर्पूरी ठाकुर सरकार बिहार विधान सभा सँ एक प्रस्ताव पारित कए भारत सरकार केँ पठौनै छलाह। मैथिली विरोध मे श्री धनिक लाल मंडल सन के नाम अबैत रहलैक । मधेपुरक पहिल विधायक स्व0 जानकी नंदन सिंह जी मिथिला राज्य लेल मांग केर बहस के आगू बढैनै रहथि।ओना 1918 सँ कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयक एम0 ए0 धरि पढाई होइत रहल। 1939 सँ पटना विश्वविद्यालय मे क्रमशः इण्टर, स्नातक आ स्नातकोत्तर मेँ मैथिलीक पढौनी होइत रहल। मिथिलांचलक बहुतरास राजनेता मैथिलीक प्रति उदार छथि आ मातृभाषामे सदन मेँ शपथ लैत देखेलाह अछि। एखनो हक्कन कनैत मैथिलीक लेल नेतागण प्रयासरत रहौथु। मैथिली भाषा संविधानक अष्टम अनुसूची मे शामिल होअय, ताहि लेल एहि पाँतिक लेखक 1985 मे झंझारपुरक विद्वान सासंद डाँ0 जी एस राजहंस सँ पत्राचार करैत सरकार सँ सब एम0पी0 मिलकए भेंट करथि से आग्रह कैने रहैक। एहि दिशा मे संघर्षशील वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजूक’ भाषण एकबेर सरौती (घोघरडीहा) अन्तर स्नातक महाविद्यालयक स्थापना लेल प्रथम बैसक अधिवक्ता सूर्य नारायण कामत केर संग सुनने रही, ताहम अंडर मैट्रिक छात्र सरौती हाई स्कूल सँ रहल होयब। मिथिलाक गौरव गाथाक वर्णन बहुतो पोथीमे मुन्दर्ज छैक। एहि पोथीक नीक कागतक अभावे दीमक केँ शीघ्रे भेंट चढि जाईछ आ ग्रन्थालयमे धुरा गरदा तरमे सैंतायल रहल। किछु दुर्लभ पाण्डुलिपि प्रकाशन एखनो धरि नहिँ भेल छैक। मिथिला मे कोनो पोथीक ग्राहक सदा अभावै रहैत छैक,तैँ बेसी चलैन आब इलैक्ट्रानिक मीडिया आ ई-पत्रिका क भलैक अछि। एहिक लुत्फ नवपीढि उठवयमे लागले अछि। पोथीदिस तैयो उन्मुख समय पर हेबाक चाही। बिनु कोनो नारा आ बिना फ़ैशन केँ मैथिली आगू बैढ़ सकैत छलीह आ मिथिलांचल (भारत - नेपाल) सँ बाहर रहनिहार समस्त प्रवासी मिथिला लोक केँ सिनेमाक माध्यम मातृभाषा दिश आकर्षित करक उद्देश्य सँ मैथिलीक प्रचार-प्रसार चलचित्र माध्यमे हुअय, ताहिलेल धार्मिक बदला सामाजिक समस्या पर एकटा ममता गायब गीत फिल्म बनेबाक धुनकिमे लागल रहथि सर्व श्री केदार नाथ चौधरी (मधुबनी) आ हुनक परम मित्र आर्थिक मददगार स्व0 मदन मोहनदास, उदय भानु सिंह जे राजनगर आ दरभंगा क विराट मठ मे रहल छलाह ओ तिरहुताक (मुजफ्फरपुरक) छलाह। आब तँ बहुत टेलीफिल्म आ सिनेमाक फिल्म चित्रालय सँ देखाईल गेल छैक। नव अभिनेता आ अभिनेत्री जिनक सद् प्रयास सँ मैथिली आरो आगू बढत से आशा जनमानस मेंँ बनल छैक। एहि लेल सरकारी मदद चाहियेक।आ सुविधा बंचित समाजक नायिका गंभीरा देवीक' प्रोत्साहन भेटक चाही।
देहाती कोशी क्षेत्रक एकटा गाम सँ मिथिलांचल कोशी विकास समिति हटनी आ एहिक 'कोशी संदेश ' त्रिमासिक मैथिली पत्रिकाक माध्यमे मैथिली लेल कतिपय काज भैलैक अछि। सर्वहारा मंचक रुपे सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी क माध्यमसँ नव लेखकीय समाज तैयार भ रहल छैक। सुच्चा मैथिलक कार्यक्रमक चर्चा चहुँओर पसरल हन। मिथिला मैथिली सँ जुड़ल लोग केँ एक साथ समेटैय म मैथिल मंच क योगदान प्रंशसनीय अछि।
मातृभाषा मैथिली मेँ गीत संगीत आ नाटक माध्यम आ मिथिलाक बिरुदावली बखानमे लागल महराय,गायकक दिश सँ मैथिली अगूएलिह अछि। मातृभाषा मे बच्चे सँ पढाई लिखाई केर व्यवस्था राज्य सरकार करय, तकर पाठ्य पुस्तक अकादमी तैयार करय, से काज आजुकौ तारीख म फछुआयल छैक। भुल्ली महिष वाला कथा आ मीरा कलम दिनेश सँ बाल वर्गक विद्यार्थीक मनोविज्ञानिक तरहेँ विकास होइत रहैक से ठमकल छैक तेँ आगू बढवामे पिछैड़ अधिगम स्तरधरि देरी सँ पहूँचैत छैक। जखन कि विदेशोक खानगी स्कूलों म नर्सरी सँ मातृभाषामे धियापुताक पढाई हुअय लागल अछि। मिथिलाक्षर केँ आजादी पूर्व दरभंगा महाराजाधिराज शासन कालेमे पाछु छोड़लक आ कैथी लिपिमे दस्तावेज लेखन कार्य अपन स्थान बनेलक से अद्यतन देवनागरीक ईजोत सँ नेपथ्य चलिगेल सन छैक। नैका पीढी अपन भाषा आ अक्षर पकड़ब केर बनसब्त इंगलिश दिश झूकल छैक। मधुबनी पेंटिंग केर पहिचान विश्व भरि मेँ छैक। एहि सभक संवर्घन होयब परमावश्यक छैक। मिथिला मैथिली लेल बाबा यात्री जी द्वारा स्थापित चेतना समिति पटना आओर छोट पैघ संस्था संगठन लक्षित लाभ लेल काज करैत रहलैक, करितौ अछि जाधरि पूर्ण सफल नहिँ होयत ताधरि ई बैनर "हमरा मिथिला राज्य चाही " जिंदाबाद रहत से विश्वास जमि गेल अछि। एहि छोट सन रिपोतार्य मेँ बहुत रास पैघ विद्वान क आ रचनात्मक कार्यकर्ता गणक चर्चा करब संभव नहिँ भ सकल जे अहर्निश माँ मैथिली जानकी नवमी आ मिथिला राज बनेबा ले अपन सर्वस्व निछावर केने होथि। हम एहि अवदान लेल हुनको सबहक प्रति आभार प्रकट करैत छी। प्रज्ञान रामायणक माध्यम सीताराम मिश्रक कहब-
यदि राम छोड़ि दोसर पुरुष नै कएलौं चिंतन
तखन सेँ पृथ्वी देवी हमरो दिअ शरण अपन
सीता जीक श्रधान्वित एहि पाँति सँ समाप्त करब जे रामायणमे बहुत बेर पढ़ने होयव
युग- युग जीवथु बसथु लखकोस
हमर अभाग हुनक नहिँ दोष
जानकी जीक महात्याग केँ शत् शत् नमन्।
लालदेव कामत
लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार
नौआबाखर , घोघरडीहा
7631390761
अपन मंतव्य editorial।staff।videha@gmail।com पर पठाउ।
सुभाष कुमार कामत
2 टा बीहनि कथा
1.भूख
बीच राति मे मुन्नाक अपन माई सँ। माँ.. माँ.. उठ हमरा बिस्कुट दे। बिस्कुट दे आओर कानइ लगल।
- बउआ रौ ! इतेक रातिक लोग बिस्कुट नै खाइयै छै।
- नै हमरा चाही, हम खाएब आओर बोम फाड़ि काइनै लगल
- राति मे खाए सँ पेट मे दर्द होएत छै। भोर मे खाएब ! अखन सुति रहूँ
- माँ.. पेटक कोना पता की 'अखन दिन छै कि राति'
2. बुढवा पेंशन
- हे रौ ! मुन्ना तोरा कहलियौ न लाल कऽ उधार नै दयि लऽ
- मालिक...
- तखनौ नै 'तू हमर बात बूझै छी'
- मालिक ओ तऽ सब दिन सँ अपने दुकान सँ बेसाहि गुजर बसर करै लैथि। ए लाकडाउन मे कतह जेताह ?
- हे रौ ! से समय किछु आओर छल। अखन समय साल खराब छै , उपर सँ हुनकर अवस्था नै देखै छी
- मालिक विपैत मे तऽ लोग ओनाहियो एक दोसर के मदद करैत छै। अहाँ कैंचाक चिंता जुनि करूँ , हुनका बुढवा पेंशन भेटते छै।
-सुभाष कुमार कामत
घोघरडीहा, मधुबनी
8271282752
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’
आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ( आत्म-कथा )
एकटा नाटकक अन्त : एक टा कथाक जन्म
दिन भरि हम सभ क्लासक पाछाँ व्यस्त रहैत छलहुँ | साँझमे पाँच बजेसं सात बजे धरि समय रहैत छल घुमै लेल अथवा मनोरंजनक लेल |
घुमैले’ हम सभ बान्ह पर जाइत छलहुँ | अधिक काल चारू गोटे संगे रहैत छलहुँ |
गप कतहु सं शुरू होइ मुदा आबिक’ सभ दिन ओही ठाम पहुंचि जाइ छलै | एकटा झूठ सत्यक स्थान प्राप्त क’ नेने छल | मिश्र जी गीताक कोनो श्लोक द्वारा हमर स्थितिक विवेचन करैत छलाह आ समाधानक सूत्र कहैत छलाह | झाजी और ठाकुरजी सेहो अपन-अपन विचार दैत छलाह | सभ गोटे हमर तथाकथित समस्याकें सोझराबय चाहैत छलाह |
निर्णय भेल जे पन्द्रह दिन बाद दू दिनक जे छुट्टी छै तकर उपयोग करैत हम शनि दिन क्लासक बाद बस पकडब | एहि सं पहिने हम एकटा चिट्ठी लीखि पठा दिऐ |
मिश्र जी हमरा रजोगुण आ तमोगुणक त्यागक लाभ बुझबैत रहलाह |एकटा चिट्ठी हमरासं लिखबाओल गेल |
निर्धारित दिन, जेबाक लेल हमर यथोचित तैयारी नहि देखि, हम नीक जकाँ जाइ तकर तत्काल प्रबन्ध भेल | झाजी अपन बला आयरन कएल सुन्दर पैंट-शर्ट पहीरिक’ जाए लेल देलनि, जे हमरा फिट सेहो भ’ गेल | ठाकुर जी अपन बला नबका बैग देलनि | एक बेर फेर हम अपन स्थिति स्पष्ट करबाक कोशिश केलहुँ, मुदा झूठ ततेक आकर्षक भ’ गेल छलैक जे सत्य प्रभावहीन भ’ गेल छल | क्लासक बाद, भोजनक बाद बस स्टैंड आबि हमरा दरभंगा बला बस पकड़ा देल गेल |
बसमे सीट भेटि गेल | बैगसं ‘मिथिला मिहिर’ निकाललहुँ | पढ़’ लगलहुँ | कोनो कथा पढ़ैत-पढैत एकाएक ध्यानमे आएल, हम जाहि स्थितिक अभिनयमे बाझल छी, ईहो त’ एकटा कथा भ’ सकैत छै | हम कल्पनामे डूबि गेलहुँ | एकटा नव विवाहित युवक- पत्नीक कोनो व्यवहारसं दुखी भेल अछि – कतेक नीक-अधलाह कल्पना करैत अछि –बहुत दिनसं एकटा चिट्ठीक बाट तकैत अछि –चिट्ठीक बिना डेग नहि उठब’ चाहैत अछि- परीक्षाक अंतिम दिन छै-कॉलेज सं घुरैत अछि –चाहैत अछि कोनो चिट्ठी आएल रहितै त’ आइ अवश्य विदा होइत सासुर....... |
अपने संग संवाद चलि रहल छल |
धुर, एहेन झूठ कतहु कथा भेलैए |
त’ की कथा सत्य हेबाक चाही ? कथा कोनो अखबारक समाचार थोड़े होइछै ?
त की सभटा जे कथा पढैत छी, झूठ छै ?
से नहि त की ? कनी सत्य आ बेशी झूठ |
मगर झूठ किए ? बिना झूठ के कथा नै भ’ सकै छै ?
बिना झूठक कथा माने कोनो अखबारक समाचार |
नै, अखबार ओ कहै छै जे भेलैए, जे हेबाक चाही से कथा कहतै | कथा लोकक सम्वेदनाकें जगबैत छै | अखबारमे एकटा तथ्य रहैत छै,कथा एकटा सत्य दिस लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि | कथासं एकटा सन्देश निकलैत छै, जकर उद्देश्य कल्याण होइ छै, सुख आ शान्ति होइ छै |
कथ्य, तथ्य आ सत्य मे की अंतर ?
की तीनू एके नै भ’ सकैत अछि ?
किछु कथा सुखान्त होइत अछि, किएक त जीवनक लक्ष्य होइत अछि सुख-शान्ति, अन्त नीक त सभटा नीक | किछु कथाक अन्त दुखमे होइत अछि...एकटा प्रश्न छोडि जाइत अछि...एहि दुखसं उबरबाक प्रश्न |
हमरा नीक लगैत अछि सुखान्त कथा | हमर कथा सेहो एहने हेबाक चाही | लिखलाक बाद मोन हल्लुक लागय |
हम अपन कथाक अन्त तकैत छी .....हम सिनेहसं किरण दिस तकैत छी.....तकिते रहैत छी .....बड़ी काल धरि....नीक लगैत अछि एना ताकब ....बहुत दिनक बाद |
बस रुकल | हमर कल्पनाक उड़ान बन्द भेल | आबि गेल छलहुँ लहेरियासराय |
लहेरियासराय सं दरभंगा, दरभंगासं सकरी –पंडौल होइत कैटोला चौक धरि पहुँचैत-पहुँचैत कथा मोनमे जन्म ल’ नेने छल आ कागत पर उतरबा लेल लालटेमक इजोत, कागत आ पेनक प्रतीक्षा करय लागल |
सबेरे स्नान क’ क’ सायकिल लेलहुँ, विदा भेलहुँ भवानीपुर | संगे छलाह आशा भाइ आ भगवान बाबू |
ईहो स्थान एकटा कथाक कारणें आकर्षित केने अछि | उगना नाटकमे एकर वर्णन अछि | महाकवि विद्यापति राजा शिव सिंह ओत’ जा रहल छलाह, संगमे छलनि खबास उगना | एतहि एलाक बाद बड्ड जोर पियास लगलनि | उगना कनिए कालमे जल आनिक’ देलकनि पीबाक लेल | पीलनि त गंगाजलक आभास भेलनि | पुछलखिन कत’ सं जल अनलें त जे जबाब भेटनि, ताहिसं संतुष्ट नहि होइत छलाह | लगमे कतहु जलाशय हेबाक सम्भावना नहि बुझाइत छलनि | कोनो अलौकिक शक्तिक आभास भेलनि | ध्यान केलनि त’ महादेव सोझां आबि गेलखिन | उगनामे महादेवक दर्शन भेलनि |पएर पकड़ि लेलखिन | महादेव किछु पल लेल दर्शन दैत कहलखिन जे ई रहस्य जहिए ककरो लग प्रकट करब, हम अलोपित भ’ जाएब |
कथा कहैत अछि जे महादेव विद्यापतिक गीतसं एतेक प्रभावित भेलाह जे हुनका संग रहबाक लेल धरतीपर एलाह आ हुनकर खबास बनिक’ बहुत दिन धरि रहलाह |
काव्य-कर्मकें प्रतिष्ठा देब’ बला ई अदभुत कथा अछि |
एहि कथाक कारण ई स्थान मिथिलाक प्रमुख धार्मिक स्थलक रूपमे लोकक आस्थाक केन्द्रमे रहल अछि | भव्य मन्दिर आ जलाशय लोककें आकृष्ट करैत अछि | शिव रात्रिमे एहि ठामक दृश्य मनोहर रहैत अछि, ओना रवि दिनक’ सेहो सालो भरि दर्शक आ शिव-भक्त लोकनि अबैत रहैत छथि | हमहूँ सभ कतेक रविक’ एत’ आएल छलहुँ | ढोली जेबासं पहिने नियमित रूपसं रवि दिनक’ अबैत छलहुँ |
पूजाक बाद मुरही-कचरी कीनि कतहु बैसिक’ गप-शप करैत खेबाक आ फेर साइकिलसं घर घुरैत आनन्दक अनुभव करैत छलहुँ | से बहुत दिनक बाद आइयो भेल |
आइयो विद्यापति आ उगनाक कथापर विचार करैत आनन्द अबैत अछि | पुराण सभमे भगवानक विभिन्न अवतारक कथाक वर्णन अछि | कहल गेल अछि जे धरतीपर जखन-जखन अन्याय-आतंक-अत्याचार बहुत बढ़ि जाइत अछि त धर्मक स्थापनाक लेल भगवान विभिन्न रूपमे प्रकट होइत छथि |
कोनो महाकवि अपन विशिष्ट रचना द्वारा सामूहिक चेतनाक आविष्कार करैत छथि | यैह चेतना जन-मनमे नव संकल्प-शक्ति आ संस्कार भरैत अछि जे अपेक्षित सामाजिक, आर्थिक आ राजनीतिक आन्दोलनक सूत्रपात करैत अछि जे अन्याय-आतंक आ अत्याचारक अन्त करैत अछि | एहि चेतनाकें भगवानक रूपमे देखल जा सकैत अछि | महाकवि विद्यापतिक समयमे समाजमे जे असमानता अथवा विद्रूपता छलै, तकरा मधुर गीतक माध्यमसं लोकक समक्ष आनि लोककें जागृत कएल गेल जे एकटा सांस्कृतिक आंदोलनक रूपमे देश-विदेश सभ ठाम प्रतिष्ठित भेल अछि |
विद्यापति आ उगनाक कथाकें जखन एहि दृष्टिसं देखैत छी त कथाकारक प्रति असीम श्रद्धा होइत अछि |
ई शोधक विषय भ’ सकैत अछि जे टेलिफ़ोन-मोबाइलक आविष्कारमे ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास....’ अथवा एहने कोनो रचनाक की आ कतेक योगदान अछि, अनमेल विवाहकें रोकबामे ‘पिया मोर बालक......’ गीतक हस्तक्षेपक की प्रभाव पडल |
साँझमे बैगसं कापी आ पेन निकालि लालटेम ल’ क’ बैसि गेलहुँ |
सबेरमे मोन प्रसन्न लगैत छल | कागतपर कथाक जन्म भ’ चुकल छलै | आनंदक अनुभव करैत गामसँ प्रस्थान केलहुँ ढोलीक लेल |
हमर मोन प्रसन्न छल, से देखि हमर शुभेच्छु संगी सभ सेहो प्रसन्न भेलाह |
हमर कथा पढ़िक’ मिश्रजीकें नीक लगलनि आ आगू किछु पुछबाक आवश्यकता नहि रहि गेलनि | कह्लनि कथा आकाशवाणीकें पठा दियौ | तीनू गोटेक यैह सुझाव छलनि |
फेयर क’ क’ कथाकें आकाशवाणी,पटना कें मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ ले पठा देलहुँ |
एक मासक भीतरे आकाशवाणीसं सूचना भेटल जे कथा ‘भारती’मे प्रसारण हेतु स्वीकृत कएल गेल अछि, अतिरिक्त सूचना बादमे भेटत | नीक लागल | फेर किछु दिनक बाद प्रसारणक तिथि, समय आ पारिश्रमिक-राशिक सूचना भेटल | आनंदित भेलहुँ | संगी सबहक सुझाव जे हम अपनहि जा क’ कथाक पाठ करी, कल्पना ई जे कथाक नायिका सेहो सुनतीह त आनन्दित हेतीह |
प्रसारणक समय 5.30 छलै | हम करीब 11 बजे आकाशवाणी पहुँचलहुँ | गुंजनजीक आवाज त सुनने छलहुँ, भेंट आइ पहिल बेर भेल छल, से नीक लागल | अपन एबाक उद्देश्य कहलियनि |सम्पादित कथा देख’ देलनि | देखलिऐ, किछु ठाम अंगरेजीक शब्द छलै, तकरा बदला मैथिली शब्द राखल गेल छलै, किछु और सुधार कयल गेल छलै | हम आगाँ ध्यानमे रखबाक संकल्प केलहुँ |
कथा-पाठ लेल 10 मिनट निर्धारित छलै | हमरा पढ़’ कहलनि |
कहलनि, हडबडी करबाक काज नै छै, एक-आध मिनट बेशीयो लागि जाइ त कोनो बात नै | कार्यक्रम साढ़े पाँच सं शुरू होइत छलै, हमरा पाँच बजे आबि जाय कहलनि |
हम पाँच बजे गेलहुँ, त कथा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’क हाथमे देखलियनि | प्रेमलता जी सेहो ‘भारती’ मे रहैत छलीह | गुंजन जी आ प्रेमलताजीक स्वर सुनने रही,मुदा सोझां देखबाक-सुनबाक ई पहिल अवसर छल, से आनंदित भेलहुँ | कथा पर दुनू गोटेक टिप्पणी नीक लागल | एकटा नव विवाहित नवयुवकक मनःस्थितिक चित्रण छलै कथामे |
मिश्र जी कहैत छलाह जे ई जिनगी दू टा जिनगीक बीच ओहिना अछि जेना सिनेमाक बीचमे इन्टरवल होइ छै | हम कथाक नाम ‘इन्टरवल’ रखने रही, तकरा स्थान पर ‘धारक ओइ पार’ कयल गेल रहै, से हमरा कथाक अनुरूप ठीक लागल आ एहिसं शीर्षक चुनबाक लेल नव दृष्टि भेटल | नीक अनुभवक संग घुरल रही पटनासं |
पटनासं घुरैत काल सोचैत रही जे कथामे की रहै -सन्देहक एकटा धार छलै, जकरा ओइ पार तथ्य छलै, से सुन्दर छलै, कल्याणकारी छलै | मुदा छलै त एकटा कल्पना आ कल्पना मात्र | हमर त विवाहो नै भेल अछि | अपनहि मोन उतारा देलक, रोगीक दुःख दूर करबाक लेल कोनो जरुरी छै जे डॉक्टर कें बिमारीक अनुभव होइ ?
त की जतेक कथा पढैत छी, से कल्पनाक कमाल मात्र थिक ? सीता आ रामक कथा – रामक चरण रजसं अहिल्याक उद्धारक कथा, आइ रामक राजतिलकक निर्णय आ काल्हि चौदह बरखक लेल वनबासक कथा, सीता-हरण आ रावणक मृत्युक पश्तात रामक अयोध्या आगमन आ राज्याभिषेक –एहिमे कतेक सत्य आ कतेक कल्पनाक उड़ान से के कहि सकत | मुदा कथा विभिन्न परिस्थितिमे स्वस्थ जीवन जीवाक लेल मार्ग-दर्शनक रूपमे एकटा उपकरण बनिक सोझां अबैत अछि |
हमरा ‘कन्यादान’क बुच्ची दाइक कथा मोन पडैत अछि | बुच्ची दाइक वियाहक कथा –सी सी मिश्रक कथा – अनमेल विवाहक परिणाम –एकटा सामाजिक समस्या –समस्याक निदान देखबैत ‘द्विरागमन’ –की एना सम्भव छै.......मुदा, हम ई सभ किएक सोच’ लगलहुँ - हमरा जीवनमे बुच्ची दाइ नहि आबि सकैत छथि- हमरा सावधान रहबाक अछि ...एकदम सावधान .... हमरा लगैत अछि जे जीवनक आनन्द लेल जीविकोपार्जनक व्यवस्था आ साहित्यसं प्रेम दूनू जरूरी अछि आ साहित्यसं प्रेमक लेल आवश्यक अछि जे पत्नी सेहो पढ़लि-लिखलि होथि .... आ से किएक ने भ’ सकैत अछि ...एकटा कल्पनामे विचरण करैत ढोली पहुँचलहुँ |
होस्टल पहुंचि आनन्दित भेलहुँ | हमर प्रिय संगी सभ सुनने छलाह कार्यक्रम | सबहक कल्पना ई जे कनियाँ सेहो सुनने हेतीह त कते आनन्दित भेल हेतीह |
आब चर्चाक केन्द्र ई कथा बन’ लागल | हम कागज़ पर दू टा टुकड़ीमे लिखलहुँ जे एहि नाटककें एतहि समाप्त कर’ चाहैत छी आ ठाकुरजी आ झाजीक कोठलीमे एक-एक टा टुकड़ी नीचाँ द’ क’ रातिमे खसा देलहुँ | मिश्रजीकें मौखिक रूप सं कहि देलियनि, मुदा कियो मान’ लेल तैयार नहि भेलाह | हमरा कखनो क’ हुअ’ लागल की पता इहो सभ बुझियोक’ नहि बुझबाक नाटक क’ रहल छथि |
तिला संक्रान्तिक बाद हमर पिता गामसं किछु सनेश नेने एलाह त कोनो तरहें मिश्रजी पूछि क’ सत्यकें स्वीकार करबाक स्थितिमे अबैत एक दिन कहलनि, हम सभ गोटे एहि सृष्टिमे कोनो-ने-कोनो भूमिकामे रहैत जीवन भरि अभिनय करैत रहैत छी, कखनो बालक-बालिकाक रूपमे, कखनो माता-पिताक रूपमे अथवा छात्र-गुरु,पोता-दादा, मित्र-शत्रु अथवा आन कोनो संबन्धमे, ई संसार एकटा रंगमंच अछि आ हम सभ अभिनेता, अभिनेता मंचसं दूर भ’ जाइत अछि,मुदा अभिनयक स्मृति शेष रहि जाइत अछि ; अभिनेता बदलि जाइत अछि, रंगमंचपर अभिनय चलैत रहैत अछि..........
( क्रमशः )
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