आभा झा
बीहनि कथाक आजुक परिप्रेक्ष्यमे उपादेयता
परिवर्तन संसारक नियम छैक। बदलैत समयक संग लोकक आवश्यकताक स्वरूप बदलैत छैक आ तदनुसार ओकर प्राप्तिक साधन सेहो। ई आवश्यकता मात्र भौतिकेटा नञि, मानसिक, बौद्धिक आ भावनात्मक सेहो होइत छैक आ ओकर पूर्तिक साधन मनुष्य पोथी सभहक मध्य तकैत अछि। विज्ञानक जिज्ञासा वैज्ञानिक ग्रन्थ आ प्रयोग आदिसॅं शमित होइत छैक, राजनीतिक विचारक परिपुष्टि राजनीतिक पुस्तकादिसॅं। अर्थात् कोनो तरहक रुचि आ जिज्ञासाक शमन ओहि विषयक पुस्तकादिक अध्ययन-मननसॅं होइत छैक। मुदा ज्ञानक धाहसॅं तप्त विकल मनक, भौतिक –समृद्धिक प्राप्ति लेल अविराम पड़ाइत लोकक थकित-तृषित हृदयक, संसारक ताप- शापसॅं आहत- व्यथित अन्तर्मनक लेल शान्तिक शीतल- स्निग्ध लेप साहित्ये द' सकैत अछि।
साहित्य शब्द आ अभिप्रेत अर्थक समभाव मानल जाइ छैक। ई साहित्य मूलतः गद्य , पद्य आ नाटक तीन रूपमे पाओल जाइत अछि। साहित्यकारक सूक्ष्म दृष्टि, गहन अनुभूति आ विचारक आलोड़न जखन कल्पनाक संग झंकृत होइत छैक, कोनो बंधनक बिना सहज रूपें अभिव्यक्त होइत छैक, तखन गद्य- साहित्यक सृजन होइत छैक। छंद, गति- यति- लयादिक आग्रहसॅं मुक्त हयबाक कारण गद्य- साहित्यक अभिव्यक्ति अधिक स्फुट आ अधिक ग्राह्य होइत छैक।
गद्य साहित्यक अनेक भेदमे कथाक विशिष्ट स्थान छैक। बदलैत समयक संग साहित्यक रूपमे परिवर्तन सेहो होइत रहलै अछि, हयबाको चाही। बहैत पानि सदैव निर्मल होइत छैक, यदि ओकरा बान्हि देल जाइ त' ओ गंदा भ' जाइत छैक। पाठकक साहित्यसॅं की अपेक्षा छै, ओ साहित्यकारक प्रस्तोव्य विषय बनैत छैक। आजुक समयमे उपदेशात्मकताक अपेक्षा यथार्थपर आधारित कथा बेशी पसिन्न कयल जाइत छैक। विविध सामाजिक- परिस्थिति , समस्याक समाधान तथा जीवन मूल्यक उद्घाटन कथाक उद्देश्य मानल जाइत छैक। अपन आकारक आधारपर कथा, लघुकथा आ बीहनि कथा आदि एकर भेद मानल जाइ छै।
आइ हमर विवेच्य विषय अछि- "बीहनि कथाक आजुक परिप्रेक्ष्यमे उपादेयता"।
साहित्यक सभ रससॅं भरल वृहत्कलेवर उपन्यासक जॅं खगता नञि हो, यथार्थ, कल्पना आ रोचकतासॅं संश्लिष्ट कथाक चॅंखिगर उपस्थिति हो, तखन ई छोट सनक कथाक आवश्यकता कियैक? खेतमे लहलहाइत धानक फसलि छाड़ि ओकर बीहनिक अन्वेषण कियैक कयल जाय? भरल बखारी छाड़ि छोट सनक स्टीलक डिब्बा चुनब कोनो बुद्धिमानी त' नञि?
एहि सभ तरहक प्रश्नक उत्तरमे हम एतबहि कह' चाहब कि सभ विधाक, साहित्यक सभ उपादानक अपन- अपन महत्त्व छैक। कोनो विधा दोसर विधाक विकल्प नञि भ' सकैछ। हॅं, आवश्यकतानुसार आ रुचिक अनुरूप ओकर चयन कयल जा सकैत छैक। कोनो समयमे महाकाव्य रचबाक परंपरा छलै, आइ छोट-छोट मुक्तक, क्षणिका आदि अनवरोध लीखल आ पढ़ल जा रहल छैक। तैॅंकी महाकाव्य अर्थहीन भ' गेलै?
जॅं लोकक समक्ष साहित्य पढ़बाक अवसर नञि हो, पेटक आ गिमिझयबा लेल कोल्हुक बड़दबला स्थिति हो, अथवा उच्च महत्वाकांक्षाक प्राप्ति लेल यन्त्रवत जीबाक स्थिति हो, गहूमक उपजाक लिलसामे गुलाबक कलीक बिनु फुटने मुरझयबाक स्थिति हो, एहन स्थितिमे जिम्मेदार लोकक कर्त्तव्य –क्षेत्र बढ़ि जाइत छैक। कियै नञि व्यस्तसॅं व्यस्त लोकक सोझॉं ओकर साहित्यिक पिपासा शान्त करबा लेल एक घोंट ठंढा पानि राखि देल जाइ? ओकर तृषित-बुभुक्षित मन पूर्णतः आश्वस्त हो वा नञि, किन्तु किछु सीमा तक प्रफुल्लित अवश्य हेतै। एहन स्थितिमे बीहनि- कथा अपन अत्यल्प संक्षिप्त कलेवरक कारण युवा वर्गक लेल उपयोगी आ ग्राह्य अछि।
युग –परिवर्तनक संग पाठकक मनोदशामे परिवर्तन भेलै अछि। आब कथाक फैंटैसीसॅं बेशी यथार्थाधारित कथा पसिन्न कयल जाइत छैक। बीहनि- कथा अहू मानदंडपर अपनाकेॅ स्थापित करबाक कारण लोकक मोन छुबै छै, किछु चिंतन करबा लेल प्रेरित करैत छैक, चिंतनक संग किछु प्रतिकारक लेल सन्नद्ध करैत छैक। हॅं, ई गप अवश्य जे कथा- लेखक कथावस्तुक चयन, अपन अभिव्यक्तिक बेधकता आ विषयोपस्थापनक अभिनव शैलीसॅं पाठक वर्गक अपेक्षा पूरा करबाक सामर्थ्य निरन्तर विकसित करैत रहथु। कारण, मात्र छोट हयबाक कारण कोनो चीज ग्राह्य वा मात्र पैघ हयबाक कारण कोनो विधा त्याज्य नञि होइत छैक। अखनहुॅं साहित्यानुरागी पैघ-पैघ उपन्यासकेॅं खूब रुचिसॅं पढ़ैत छथि। हॅं, हुनका छोटसॅं कोनो विरोध नञि, मुदा शर्त एतबहि जे ओ पाठकक साहित्यिक- क्षुधा शान्त करबाक क्षमतासॅं सम्पन्न हो।
साहित्यमे संक्षेपणक अपन चमत्कारिक महत्त्व छैक। कमसॅं कम शब्दमे बहुत किछु कहि सकबाक क्षमताक पाठक समुदायमे अत्यधिक आदर होइत छैक। प्राचीन कालकक विगण एक मात्राक लाघवमे पुत्र जन्मक आनन्दोल्लाससॅं भरि उठैत छलाह। एहि विशिष्टगुणसॅं युक्त बीहनि कथा आइ अवश्य उपादेय अछि।
बीहनि कथा लेखक पाठकवर्गकेॅं एकटा प्लाट उपलब्ध करयबाक उद्देश्यसॅं सेहो उपादेय। अहाॅंक सोझाॅं विविध भावभूमिपर आधारित प्लाट अछि , रुच्यनुसार चयन करू आ ओहिपर बनाउ दीर्घकथा वा उपन्यासक भवन!
बीहनि-कथाक सर्व- स्वीकार्यता औखन प्रश्नांकित अछि। हमर कहब एतबहि जे कोनो विधामे साहित्यक रस प्रवाहित होमय, सहृदय पाठककेॅं मानस- तोषदैमे सफल हो, त' ओकरा उदार भय स्वीकार करबाक चाही। अन्हार भगबैमे कखनो –काल भगजोगनीक इजोत सेहो कारण बनै छै। बरगदक अत्यन्त लघु बीआ शाखा- प्रशाखासॅं युक्त बटवृक्षक कारण होइत छैक। माॅं मैथिलीक उपासककेॅं सभ अहंभावतजिहुनक सभ सन्तानकेॅं समुचित समादर देबाक चाही। प्राचीन ऋषि-मनीषी अहम्सॅं मुक्त मन: स्थितिमे एहि तथ्यक साक्षात्कार केलनि अछि- "नाल्पेसुखमस्ति, भूमावैसुखम्"।