अरविन्द ठाकुर-संपर्क-9955155156
अपूर्णता जखनि नियति हुअए [सन्दर्भ:रामलोचन ठाकुरक काव्य-रचनाक मूल्यांकनक अपूर्ण प्रयास]
अहा कलकत्ता!
कलकत्ता! कोलकाता! पश्चिम बंगालक राजधानी!
तिरहुत जनपदक बेरोजगार सभक लेल मोरंगक बाद आ दिल्ली-पंजाब सं पहिनेक दालि-रोटीक ठिकाना।
जेकर नाम सं बहुत दिन तक कोनो रेलवे स्टेशन नहि रहए आ जेकर काम हाबडा आ सियालदह सं चलैत रहए।
जेतय हाल-हाल तक हाथ रिक्शा चलैत रहए,प्रतिबंधित भेलाक बादहु चलए छै आ जेकरा चलाबैक लेल पशुक नहि,मनुष्यक उपयोग(?) होइत रहए,होइ छै ।
जेकर भुइयां दिआ कहल जाइ छै जे ई भीतर सं फोंक छै।
एहन अमानवीय नगर,जेतय लोकक भीड़क बीच सड़कक पटरी पर कोय मरि जाइ,तखनिअहु रफ़्तारक बबन्डर मे उड़िआइत लोकसभ पर कोनो असर नहि,ओकरा भीतर कोनो उत्सुकता,कोनो संवेदना,कोनोटा भावना नहि जागए।
जेकर स्थापना 1690 मे मुट्ठी-भरि फिरंगी तिजारतीसभ कएने रहए,जे1772 मे अंग्रेजसभ द्वारा ‘भारत दैट इज इंडिया’क राजधानी बनाएल गेल रहए आ 15 अगस्त,1947 कें अंतिम अंग्रेज गवर्नर जनरलक विदा भए जएबा तक जे नगर/शहर भूमंडल पर राज करैक अंग्रेजी सपनाक प्रतीक रहए।
जे नगर हिंसा आ अराजकताक घर छै आ जेतहुका नागरिकगण आइयो एहि मिथकक भरोस करैत अछि जे साम्यवाद ओकर संरक्षण करत आ सभटा विघ्न-बाधा सं पार लगाए देत।
जाहि नगर पर डोमिनीक लापिएर ‘द सिटी आफ जोय’ नाम सं उपन्यास लिखि एकर घिनाएल बस्तीसभ कें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कलंकित कए साहित्यिक व्यावसायक कीर्तिमान बनएलनि आ ईसाइ धर्मक कृपालुता कें महिमामंडित कएलनि।
से,एहि कलकत्ता मे मधुबनीक बाबूपाली गाम सं आबि अपन जीवनक चारि दशक सं बेसीक अवधि बितैनिहार कवि छथि – रामलोचन ठाकुर। आ से सामान्य कवि नहि,घोषित रुप सं दुर्घर्ष (किताब पर ‘दुर्घर्ष’ लिखल देखाइत अछि,शुद्ध प्राय: ‘दुर्द्धर्ष’ हेतए) अग्निहस्ताक्षर छथि आ कविता नहि करए छथि,अग्निलेखन करए छथि।इतिहास कें पछाड़ैत,मिथिहास कें धकियाबैत मिथकक घटाटोप मे धावा मारए छथि आ शाब्दिक ताप एहन जे अपन पहिल काव्य-संग्रहक नामकरण “इतिहासहंता” करए छथि।
इतिहासहंता बनाम मिथकजीवी
रामलोचन ठाकुर स्वयं कें ‘तामसक कवि’क रूप मे प्रस्तुत करबाक आग्रही छथि आ एहि विशेषण कें प्रमाणित करबाक क्रम मे अपन कविता मे आगि भरैक पुरजोर प्रयास त करितहि छथि,एहि बातक पैरोकारी करबाक लेल अपन अधिवक्ता सेहो नियुक्त कएने छथि।एहि प्रयासक क्रम मे हुनक बहुर रास कवितासभ कृत्रिम,सूत्रबद्ध किंवा ‘लाउड’ भए गेल अछि। किन्तु हुनक कवितासभक रचनाकाल कें देखैत एहि बातक प्रशंसा आ स्वागत कएल जएबाक चाही।मैथिलीक मसुआएल,मिझाएल परम्परावादी कविता-साहित्यक जे पथार ओहि काल-विशेष तक प्रकाश मे आएल छल,तेकर परिपेक्ष्य मे ई तेवर एकदम अभिनव आ क्रांतिकारी बुझाइत अछि।
‘इतिहासहंता’ काव्य-संग्रहक प्राकट्य-काल अछि उन्नैसम इस्वीक सातम दशक आ एहि मे 1972 सं 1977क बीच लिखल ‘मैथिली’ सं ‘जेठुआ मेघ’ तक एक सोरय(16 टा) कविता कुल 37 पृष्ठ मे समेटल अछि।प्रथम कविता ‘मैथिलि’ मे कविक शब्दसभ फुफकार छोड़ैत अछि।तामस उर्ध्वगामी भेल अछि – ‘मैथिली कें वन सं नहि/नैहरे सं बलजोरी घिसिअबैत ल गेल छल राक्षसराज’ वा ‘विदेह बाप पहिनहि देह त्यागि चुकल छथिन’ वा ‘राम छथिन नपुंसक’ वा ‘हुनके जनमल लव-कुश की वीर पुरुष हेथिन’ वा ‘दशरथक बरखी मे मैथिलीक आपसीक सिपारिसक भीख मांगैत तीनू बापते’ – पराकाष्ठा दिस जाइत।किन्तु तामसक ई पराकाष्ठा,ई उर्ध्वगामिता अपन वेध-आकांक्षा लेल की कोनो लक्ष्य सेहो निर्धारित कएने अछि?से निर्धारित अछि त देखाइ किऐ नहि पड़ैत अछि?आक्रोश कवि-कविताक आन्तरिक शक्ति होइ छै,किन्तु तखनि,जखनि ई सही मिकरात मे हुअए,संतुलित हुअए।संतुलन आ मिकरातक(मात्राक) एक रत्ती फ़र्क एहि आक्रोषक अभिव्यक्ति कें गारि मे बदलि दैत अछि,अभिजात्यक भाषा मे जेकरा शाब्दिक हिंसा कहल जाइ छै।तामसक स्वर ‘विध्वंस मात्र’ मे सेहो छै,किन्तु हाहाकारी शीर्षकक बादहु एहि कविता मे ‘नवनिर्माणक मार्ग प्रशस्त’ हेबाक कामना सेहो छै।बढियां!
संग्रहक प्राय: प्रत्येक कविता कोनो ने कोनो सन्दर्भ सं जुड़ल बुझाइ छै,किन्तु जेंकि ई सन्दर्भसभ व्यष्टि-अंश अछि,समष्टि-अंश नहि,तें पाठक लेल सन्दर्भक अज्ञान कविता कें बुझबा मे बाधक होइत अछि।प्राय: इएह कारण सं ‘नाटक,निर्देशक आ एक गोट कविता’ किए ने किए हमरा जीवकांतक ‘धार नहि होइछ मुक्त’ संग्रहक स्मृति दिआए देलक,जे छपल त रहए सामान्य रुप मे,किन्तु पुरस्कारक प्रत्याशा मे ओकरा हार्ड बाउन्ड आ नवका कभर सं सुसज्जित कएल गेल रहए।‘सर्वहारा टी स्टाल’ मे पहिल बेर किछु कलकतिया दृश्यसभ आएल छै,किन्तु ओ कविताक भाव-मूल मे नहि छै।एहि कविताक अंत कविक स्वगत प्रश्न सं होइत अछि – ‘त कि/हमरो लेल कविता लिखब/कुनू फैशन थिक वा आदति’।कविक अग्निलेखन एहन अतस्तितह मे किए पड़ि जाइत अछि?सर्वहाराक कविता बनैत-बनैत एकर परिणति आत्मरोदन मे किए होइ छै?एहने अतस्तितहक पुनरावृति ‘अन्तरक ज्वाला हमर’ मे देखाइ पड़ैत अछि जखनि कविताक प्रारम्भ मे कवि कहए छथि – ‘जनै छी हम/शब्द मे नहि छैक ओ सामर्थ्य/क सकै जे सही व्याख्या भावना कें आइ/तद्यपि बन्धु!’।ई कविता बाद मे जाए कए सम्हरए छै,किन्तु हारल मन सं की कोनो जीतक आशा कएल जाए सकैछ?प्रथमे ग्रासे मक्षिका पात:।जखनि शुरुए मे शब्द कें सामर्थ्यहीन सकारि लेल गेल,तखनि बिगुल फूकए सं पहिने ‘तद्यपि’ त लगाबहि पड़त आ ई ‘तद्यपि’ तमाम हरबै-हथियार कें भोथ कएअहि देत,ताहि मे कोनो संशय नहि। ‘अग्रजक नाम/प्रजातंत्र’ वंशवादी राजनीतिक विरुद्ध अछि।एहि मे वंशवादक विरुद्ध कविक प्रतिवाद बहुत मुखर अछि।किन्तु जेंकि कवि मात्र अपन कविता मे नहि,अपन अस्तित्वक आन-आन उपस्थिति सेहो राखैत अछि – अपन वाचिकता मे,अपन गतिविधि मे;तें कवि सं ई अपेक्षा स्वाभाविक जे ओकर लिखित रचना आ ओकर दैनन्दिनी अभ्यास मे एकरुपता रहए,विरोधाभास नहि हुअए।भारतीय साहित्यक लेखकसभक हमरा सभ लग जे मूल्यवान विरासत अछि,ओहि मे शब्द आ कर्म एकहि सिक्काक दू पहलू मानल गेल अछि।साहित्यक लोक(पाठक समाज) अधिकांशत: भारतीय लोकमतक प्रतिनिधित्व करैत अछि आ ओ लेखक आ ओकर रचना मे फर्क कए कए नहि देखैत अछि।एहन स्थिति मे ई बात बहुत अनसोहांत बुझाइ छै जे वंशवाद पर एहन तीव्र प्रहार करनिहार कवि कें वंशवादी मिथिला राजक पुनरावृतिक लिलसा किए छनि?एहि राजपरम्परा मे मात्र सीताक बाप जनक नहि,कराल जनक सन अत्याचारी-व्यभिचारी राजा सेहो भेल अछि।एहि कविता मे एक ठाम कवि कहए छथि—‘ओना/यज्ञ आइयो होइ छै/छोट सं ल अश्वमेध पर्यन्त/मुदा पुरोहितक बदला/होइत छै प्राइवेट सेक्रेटरी’।उपरका प्रश्नक उत्तर की एहि पंक्तिसभ मे उपस्थित छै?ई क्षोभ पुरोहितसभक भाग(हिस्सा) छिनैबाक आधुनिक युगक उपक्रम सं उपजल त नहि छै?एहि कविता कें ‘कवि सोमदेवक लेल’ समर्पित करबाक प्रत्यक्षत: कोनो तारतम्य नहि बुझाइत अछि।सोमदेवक संग मैथिलीक प्रजातंत्रकालीन वंशवादी तत्व द्वारा कएल गेल अनदेखी वा तिरस्कार वा अन्यायक आकलनक समय आइ छै,तहिया नहि रहए जहिया ई कविता लिखल गेल रहए।‘अग्रजक नाम/केहन लागत अहां कें’ मे जेहन वीभत्स चित्रण अछि,से केकरहु रोइयां भुलकाए दए सकैत अछि। अवसरवादी-पराश्रयी लोकनिक एकटा विशेष सुविधालोलूप वर्ग होइत अछि,जे अवसर ताड़ैत रहैत अछि,अवसर पाबितहि अमरबेलक लत्ती जकां कोनो शक्तिशाली अस्तित्व पर पसरि/लतरि ओहि अस्तित्वक रक्त सं अपन पोषण-संवर्द्धन करए लागैत अछि।एहन वर्ग पहिनहु रहए,आइयो छै आ भविष्यहु मे रहतए।एहन सर्वज्ञात यथार्थ कें नव कलेवर मे चित्रित कए किछु प्रश्न ठाढ कए देब—कविक की एतबे टा काज छै?एहन परजीवी तत्वक ठोस आ स्पष्ट पहचान करए मे कविता किए चुकि रहल छै?एतय लेखनक अग्नि मसुआएल किए छै? उनटे ई एहि कथन कें प्रमाणित कए रहल छै जे ‘कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया अइ’।‘अग्रजक नाम’ शीर्षकबला तेसर कविता ‘हम बिसरि गेल छी’ उपशीर्षक सं ‘कवि जीवकांतक लेल’ अछि।(अकस्मात मन पड़ल जे फेसबुक,ट्विटर आदि सोशल साइटसभ पर जेकरा कम मित्र व फालोवर रहए छै,ओ बेसी मित्र वा फालोवरबला कोनो व्यक्ति कें टैग करैत अछि,जाहि सं ओकर बात बेसी लोग तक पहुंचए) साहित्यक विभिन्न विधाक अतिरिक्त जीवकांतक धुरझारिता पत्र-लेखन मे सेहो रहल अछि।तें पत्र-लेखन सं सन्दर्भित कविता कें हुनक नाम सं जोड़ब प्रथमदृष्टया उचितहि बुझाइत अछि।ई अलग बात जे जीवकांतक लेखन(पत्र सहित) के केन्द्र मे और जे किछु हुअए,सिंगरहार,हीना,रजनीगंधा,कमल आ ओढूलक फ़ूल वा खजन चिड़ैया सं महमह-चहचह करैत वातावरणबला नास्टेल्जिया नहि रहनि।एहिसभ प्रतीकक माध्यम सं कवि जं कोनो आन बात(आपकता,रसगर गपबाजी,ग्रामीण सौन्दर्य आदि-इत्यादि) कहए चाहए छथि त बात अलग।‘एहि जम्बूद्वीपक भारत खण्ड मे’ प्राचीन प्रतीकसभक माध्यम सं स्वतंत्रता आन्दोलन, स्वतंत्रता प्राप्ति,केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठानक निरन्तर सबल आ आमलोकक निबल होइत जाएब,लोकतंत्री संसद आ चुनावी प्रक्रिया पर प्रहार कएल गेल अछि।कविताक नकार-भाव त पचैत अछि,किन्तु एकर नैराश्य-भाव व्यथित-चिन्तित करैत अछि।स्वतंत्रता भेटब अपना-आप मे अनमोल वस्तु छै।स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद सभ बेजायहि-बेजाय भेलए की?आ जं छुच्छे बेजायहि-बेजाय भेलए त की भविष्यक बेहतरीक कोनो छोट-क्षीण किरणहु बांचल नहि छै? जं ‘अहिना बितल जाइछ/दिन पर दिन/मास पर मास/बर्ख पर बर्ख’,त की ई मनि ली जे ई जम्बूद्वीप भारत खण्डक भुइयां वीर-विहीन भए गेलए? जं एना छै त दुर्द्धर्ष अग्निहस्ताक्षर लोकनि,हुनक सखा-समुदाय कोन बील मे नुकाएल छथि?जे शंखनाद ‘समानधर्माक नाम’ मे कएल गेल अछि;कर्ण,एकलव्य, शंबूक,शिव आदि मिथकीय पात्रक माध्यम सं इतिहास-पुराणक होलिका-दाह करबाक,रामराज्य पर थुकबाक, पांडुक नपुंसकताक संग-संग ओकर जन्मक कथा,परीक्षितक दुराचारिता,रामक स्वेच्छाचारिता, आचार्यक कुकर्मक पर्दाफाश करबाक आह्वान कएल गेल अछि,वर्ग-संघर्ष आ संगठित शक्तिक चर्चा कएल गेल अछि,से ‘एहि जम्बूद्वीप….’ मे नदारद किए अछि?ई कविक द्वैध,कविक वैचारिक द्वैध त नहि अछि?अपन समकालीन परिदृश्यक अत्याचार-अनाचार पर नैराश्य-भाव सं गबदी मारि थस लए लेब आ बितलाहा कोनो मिथकीय युग पर फांड़ा बान्हि कए चढि दौड़ब दुर्द्धर्षक श्रेणीक विशेषता भए सकैत अछि की?आ की ई सम्मुख-संघर्ष सं सुविधाजनक दूरी बनाए कए स्वयं कें सुरक्षित राखबाक मनोवृतिक परिचायक अछि?द्वैध एतबे नहि छै।काव्य जीवन मे ‘मिथिलाक पाहुन’क रामराज्य पर थुकबाक आह्वान आ व्यक्तिगत जीवन मे पाहुनक ससुरारिबला राजक मांग करब—द्वैधक पराकाष्ठा छै आ एहन भयंकर विरोधाभास कविक व्यक्तित्वद्वयक खण्डित छवि बनबैत अछि।‘ओना होइत त इएह आएल अछि’ वाक्य-खण्ड कें बेर-बेर दोहराएब आ अन्त मे बिगुल बजाए देब—ताहि सं अमृत-पानक समय आबि जेतए,ई आन त आन,कविक कोनो समानधर्मा-समानकर्मा कें सेहो एहन विश्वास हेतए—ताहि मे सन्देह।किन्तु कवि सेहो जिदियाह छथि आ एहि दुनू कविताक सभटा कोर-कसर ‘अग्रजक नाम/इतिहासहंता’ मे निकालबाक प्रयास करए छथि।‘इतिहासहंता’ कविता मे लाल भोर सं जुड़ल प्राय: प्रत्येक वाम शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि।एहि मे फ्रांस-रूस-चीनक क्रान्तिक कथा,वियतनाम-लाओस-
कम्बोडिया-चीली-क्यूबाक संग्राम कथा,रूसो-मार्क्स-एन्जिल्स-लेनिन-स्टालिन-माओ-चू ते-होचिमिन्ह-मारकुस-नेरुदा-सार्त्र-कैस्त्रो-चेगुएवारा आदिक नाम,राजकमल-सुकान्त-गोर्की-लू सून-लुमुम्बाक मृत्यु सम्वाद आदि-आदिक चर्चा भेल अछि।कविताक अंत ‘देखैत नहि छी/हमरा हाथ मे/चमकैत पंचकमियां भाला/चलि पड़ल छी हम/लाल टुहटुह रक्त सं/पिरथीक विशाल वक्ष पर/लिखबा लेल एगो कविता/एगो कथा/एगो इतिहास/आ स्वयं बनि जेबा लेल/एगो घटना/एगो नाम/एगो इतिहास।‘ सं होइत अछि।विलक्षण विरोधाभास! लाख मगजमारीक बादहु एहि अंत कें ‘वक्रोक्ति’ किंवा ‘व्याज स्तुति’क रूप मानए मे भीषण सं भीषण साहित्याचार्य-संहिताचार्य कें संकोच हेतनि।‘इतिहासहंता’ द्वारा ‘इतिहासजीवी’ होएबाक कामना कल्पनातीत अछि,अविश्वसनीय अछि। ‘अनुजक नाम/काज अहींक थिक’, ’व्यवस्थाक नाम/चेतौनी’ आ ‘जेठुआ मेघ’ छोट-छोट आ नीक कविता अछि। ‘कंकावतीक कैबरे’ मे ने कविता अछि,ने व्यंग्य,स्तरहीन टिप्पणी अछि। ‘सांझ हमरा आंगन मे’ कविता कोनो भांज सं अग्निलेखनक चौहद्दी मे नहि अंटैत अछि,किन्तु हम अधिकारपूर्वक एहि कविता कें संग्रहक सर्वश्रेष्ट रचना मानए छी,घोषित करए छी।
अग्निक पोस्टर आ मार्क्सवादक प्रहसन
समालोचनाक लेल कुछ सर्वस्वीकृत मान्यतासभ अछि। समालोचना दुराग्रह सं रहित,भावुकता सं बचल आ दलबन्दी सं उपर उठल हएबाक चाही।आचार्यलोकनि एक स्वर सं एहि काज लेल ‘सहृदय हृदय’ कें प्रामाण्य मानलनि।ई ‘सहृदय हृदय’ की छिए?अभिनवगुप्तक मत सं जिनकर मन-रूपी मुकुर—मनोमुकुर,जे काव्यशीलनक अभ्यास सं स्वच्छ भए गेल अछि—मे वर्णनीय विषय मे तन्मय भए जएबाक योग्यता अछि,वएह हृदय-संवादक भाजन रसिकजन सहृदय कहाए सकए छथि।
ई संग्रह (इतिहासहंता) अपन अवलोकन-मनन लेल पाठक कें ई छूट नहि दैत अछि जे ओ अपन हिसाबें एहि मे डुबकी मारए,काव्य-सागर मे हेलबाक आनन्द लिअए,मन हुअए त एकाध घोंट पीबिअहु लिअए आ एकर पानिक तासीरक अपन ढंग सं आकलन करए।पाठकक एहि लोकतंत्री अधिकारक स्वतंत्र उपयोग मे एहि पोथीक ब्लर्ब पर अंकित टिप्पणी कोनो रिंगमास्टर जकां बाधकहि टा नहि होइ छै,ओ कोड़ा फटकारैत ई निर्देश(आदेश) सेहो दए छै जे एकरा कोड़ाक लहरानक अनुपातहि मे पढल आ अर्थग्रहण कएल जाय।ठीक ओहिना,जेना वैदिक मंत्र कें बुझबाक,अर्थ-ग्रहण करबाक लेल उदात्त,अनुदात्त आ त्वरितक संकेत अंगुरीक माध्यम सं कएल जाइत छै।एना मे पाठकक संकट अपारताक पार चलि जाइ छै।पहिने त ओकरा खुलल आंखि सं देखबा पर प्रतिबन्ध लागलए,फेर ओकरा एकटा विशिष्ट उपकरणक माध्यम सं,विशिष्ट कोण सं,विशिष्ट स्थिति मे देखबा लेल बाध्य कएल
गेलए। परिणाम ई जे पाठक मूल-वस्तुक मौलिकता सं छत्तीस लग्गा दूर भए गेलए आ ओकर दृष्टि(विजन) कें
केलिडोस्कोपिक भ्रम गछारि लेलकए।(बहुत संभव जे हमहुं एहि पर लिखैत काल एकर मौलिक तत्व सं कतेको लग्गा हटि भ्रमित भए गेल होइ आ हमर ‘सहृदय हृदय’ कतहु लंक लए लेने होइ।)
ब्लर्बक टिप्पणी मे एक ठाम लिखल अछि – “हिनक(कविक) चिन्तन धाराक आधार अइ मार्क्सवाद,फलत: ‘वर्ग-संघर्ष’ आ तइ पर आधारित क्रान्ति,हिनकर रचनाक मूल होइए।“ टिप्पणीकार जाहि विचार/चिन्तन धाराजनित रचनाक गप टीपए छथि,ओकर एकटा सुदीर्घ इतिहास रहल अछि,जेकरा मार्क्सवादी चिन्तक ‘विश्व कविता’ कहए छथि।एहि सं इतर कविता मार्क्सवादी दृष्टि मे ‘बूर्ज्वा कविता’ अछि।मार्क्सवाद आ मार्क्सवादी कविता दुनूक उद्घाटक स्वयं मार्क्स कें मानि सकए छी। मार्क्स,एंजेल्स आ लेनिन कें प्राय: राजनीतिक चिन्तन आ सक्रियताक लेल जानल जाइ छनि,किन्तु ओसभ अपन सामाजिक-राजनीतिक चिन्ता कें यदा-कदा कविताक माध्यम सं सेहो व्यक्त कएने छथि। मार्क्स लेल कवि-कर्म साभिप्राय रहनि।एक दिस ओ अपन पत्नी जेनी कें सम्बोधित प्रेम कविता आ दोसर दिस चिकित्सा,आचार संहिता आ गणित सन शुष्क विषयसभ कें लए कए कविता लिखलनि। मार्क्स एकटा कविता मे कहए छथि –‘नष्ट कए देब ई संसार सदैवक लेल/किए त रचि नहि सकए छी नव संसार हम’। एंजेल्स लिखए छथि-‘प्राय: तिरोहित भए चुकल अछि दीप्ति पश्चिमक/धीरज राखह?/आबैत अछि नव श्रम-मुक्ति-दिवस/आरोहित हएत सूर्य फेर सदालोकित सिंहासन पर/और ई चिन्तासभ रातिक/अस्त भए जाएत’।लेनिन अपन एकमात्र कविता ‘संघर्ष’,जे ओ बाल्टीक नदीक कछेर पर स्थित एकटा गाम मे गुप्तवासक अवधि मे लिखने छला,मे लिखए छथि- ‘बढल चलह भूखल लोकनि/बढल चलह/बढल चलह सताएल लोकसभ/आगू बढह अपमानित जन/मुक्ति-जीवन दिस/गरदनि पर राखने जुआ उच्चवर्गसभक/चलह लड़ाई मे सर्वहारा’। माउत्सेतुंग चीनी क्रान्तिक पहिने सं कविता लिखब शुरू कएने रहथि। हुनकर अनेक कविता नमहर अभियानसभक बीचक अछि।हुनक काव्य यात्रा 1925 सं 1965 तक जारी रहल।दुनियांक मजदूर-समुदाय कें एकजुट करबाक लेल जाहि अन्तर्राष्ट्रीय गीतक रचना विश्व सर्वहाराक इतिहास मे एकटा क्रांतिकारी भुमिका निभएलक,ओकर श्रेय पेरिस मे जनमल एजेन पोतिए कें जाइत अछि।‘इन्टरनेशनल’ शीर्षक सं प्रसिद्ध ई गीत 1871क मई मासक खूनी पराजयक बाद रचल गेल छल।वियतनामक होचीमिन्ह क्रांतिकारी योद्धाक संग-संग एक संवेदनशील कवि सेहो छला।हुनक कवितासभ हुनक पोथी ‘जेल डायरी’ मे संग्रहित अछि। ओ अपन ‘हजार कविक कविता संग्रह कें पढला पर’ शीर्षक कविता मे जनताक पक्षधर कविलोकनिक रचना-दायित्वक निर्धारण एहि पंक्ति मे कएने छथि – ‘रचबाक चाही गीत हमरासभ कें फौलाद ढालल/आ जानबाक चाही कविसभ कें हमला करबाक पैंतरासभ’। चीनक लू शून आ रूसक मायकोवस्की कें सेहो एहि क्रांतिकारी परम्पराक मानल जाइत अछि। तुर्कीक नाजिम हिकमत,चिलीक पाब्लो नेरुदा,जर्मनीक बर्तोल्द ब्रेख्त आदिक अतिरिक्त क्युबाक रेजिन आ निकोलस गिल्यिन,ग्वाटेमालाक ओतोरेने कास्तील्यो,स्पेनिश कवि डेविड फ़ेर्नादेस,बल्गेरियाइ कवि निकोला वाप्सारोव,इंग्लैंडक लुई मैकनीस आ चिलीक विन्सेन्त युरोवारो आ पैब्लोद रोस्य आदि अनेक नाम एहि परम्परा मे गिनाएल जाए सकैत अछि। अर्जेन्टिना मे जनमल चे ग्वेवेराक नाम आइयो क्रांतिक पर्याय मानल जाइत अछि।चिकित्सा विज्ञानक शिक्षा पूर्ण कए चे दक्षिणी अमेरिकाक यात्रा कएलनि। ग्वाटेमालाक सरकारक तख्तापलटक बाद ओ सीधा मैक्सिको पहुंचला,ओतय कैस्त्रो सं भेंट भेलाक बाद क्यूबा पहुंचि ओतहुका संघर्ष मे सम्मिलित भेला आ क्यूबाक नागरिक बनि गेला।बहुत गोटे कें ई अविश्वसनीय लागतनि जे चे ग्वेवेरा कवि-कर्म सेहो करैत छला। ‘कैस्त्रोक लेल’ शीर्षक कविता मे हुनक कुछ पंक्ति छनि—‘पहिल गोली दगितहि/संपुर्ण वन जागतए विस्मय सं आ/ओतय ओहि क्षण एकटा शांत टुकड़ी/प्रकट हेतए, अहांक बाहु सं’ आ ‘आ जखनि बर्बर पशु चाटि रहल हएत/अपन घायल भुजा/चोट कएलक अछि जाहि पर क्यूबाई बर्छा/हएब हमसभ अहांक बाहु सं सटल/गर्वोन्नत छाती तानने’। दक्षिण अफ्रीकाक श्वेत(बोथा) सरकार सं मुक्ति-युद्ध मे शहीद भेल सोलोमन महलांगू आ बेंजामिन मोलाइस सन देशभक्त आ क्रांतिकारी कवि इएह परम्पराक रहथि।
विदेशक एहि तीव्र परिक्रमाक बाद अपन देश घुरिकए देखी त एतहु मार्क्सवादी-वामपंथी कविता आ कविक उपस्थिति भेटत। एहन कविसभ मे तेलुगुक सुब्बाराव पाणिग्रही आ चेराबंड राजूक संग-संग एम टी खान , निखिलेश्वर आ वरवरा राव; पंजाबक अवतार सिंह पाश,अमरजीत चन्दन,सुरजीत मोहनजीत,लाल सिंह दिल आदिक नाम लेल जाइत अछि। एहि आलेखक आलोच्य कवि जाहि बंगालक राजधानी मे चारि-पांच दशक गुजारलनि,ओहि बंगाल मे सेहो एहि क्रांतिकारी कविताक नमहर परम्परा रहल अछि। विद्वद्जन एकरा नजरुल इस्लाम सं शुरू मानए छथि आ एहि कड़ी मे नवारुण भट्टाचार्य,सुकान्त भट्टाचार्य (जे ‘पारपत्र’ मे संकलित अपन रचनाक माध्यम सं जन-जागरणक शंखनाद कएने छथि आ जिनकर नामक चर्चा आलोच्य संग्रहक कविता ‘इतिहासहंता’ मे भेल अछि।),सरोजदत्त,द्रोणाचार्य आदिक नाम सम्मिलित करए छथि।
एतय मार्क्स सं लए कए द्रोणाचार्य तक के चर्चा एहि उद्देश्य सं कएल गेल अछि जे हिनका सभक क्रांतिकारी लेखनक योगदानक परिपेक्ष्य मे अग्निलेखनक,जेकर चिन्तनधाराक मूल मार्क्सवाद घोषित कएल गेल अछि,सही-सही वजन कएल जाए सकए; दुर्द्धर्ष अग्निहस्ताक्षर,अग्निलेखन आ ओकर पहिल दस्तावेजक उदात्त ,अनुदात्त, त्वरित कें सार्थकताक कसबट्टी पर परखल जाए सकए। ई आकलन कएल जाए सकए जे ई कवितासभ मार्क्सवादी परम्पराक बीच अपन उपस्थितिक संज्ञान कराबैत अछि की नहि? किन्तु एहि पर आगू बढए सं पहिने “देशक नाम छलै सोनचिड़ैया”क हवाई सर्वेक्षण आ “लाख प्रश्न अनुत्तरित” पर विहंगम दृष्टि फेरल जाय।
देशक नाम छलै सोनचिड़ैया
वर्ष 1986 मे प्रकाशित एहि संग्रह मे कुल 64 पृष्ट मे समेटल ‘मैथिली सं’ सं ‘किछु क्षणिका’ तक 21 टा कविता संग्रहित अछि।‘इतिहासहंता’ जकां एहि संग्रह मे कवितासभक रचनाकाल अंकित नहि अछि।
पहिल कविता ‘मैथिली सं’ मे कवि चारि कोटि लव-कुशक कुम्भकर्णी निद्रा मे सूतल रहबाक,चारि कोटि संतानक नपुंसक हेबाक घोषणा करैत मैथिली सं काली-कराली-खप्परवाली बनि एक बेर,मात्र एक बेर प्रलय मचाए देबाक आह्वान करए छथि,किन्तु हुनक संशयग्रस्त मन मैथिली कें वैकल्पिक प्रस्ताव दैत कहैत अछि—‘जं से नहि क पाबी/त हमर अनुरोध/खा लिअ बिख/किन्तु/विदेहक नाम कें/बदनाम जुनि करी’।एहि कविता मे कवि भाषाक शक्तिक प्रति एहन भयंकर रूप सं द्विधाग्रस्त किए छथि? हुनका धर्म कें अफीम मानबाक मार्क्सवादी मान्यता बिसारि काली-कराली-खप्परबालीक शरणागत हेबाक मानसिकता मे किए घुरियाबए पड़ल छनि? हुनका मैथिलीक बिख खाएब मंजूर छनि,किन्तु विदेहक नाम बदनाम हएब मंजूर नहि। किए? एकर की अर्थ? ओ मैथिलीक मूल्य पर मिथिला-राजक प्राप्ति वा पुनर्जन्मक महत्ता कें सन्दर्भित/प्रतिपादित कए रहल छथि की? ‘सुच्चा मैथिल’ कविताक प्रारंभिक पंक्तिसभ मे अर्थालंकारक ‘व्याज स्तुति’ भेद उपस्थित अछि,जाहि मे उपर सं देखला पर त ओ निन्दा बुझाइ छै,किन्तु ओ होइत अछि वस्तुत: प्रशंसा! कविताक द्वितीयार्द्ध मे उपमेय,उपमान, साधर्म्य,वाचक आदिक तेहन विचित्र धालमेल छै जे अर्थ मे अनर्थ आ अनर्थ मे अर्थक अनेकानेक विस्फोट होइ छै। ‘गुदड़ी सं अपन अंग झपने दाबा पर चिपड़ी पथैत भारती,मरि चुकल हीरामनि सुग्गा आ तीन दिन(मात्र) सं अपन पेट कें तौनी सं बन्हने एकजनिया एकचारी मे स्वत: प्रमाणम परत: प्रमाणम रटैत महापंडित(?) मंडन मिश्र’ तक त ई बुझाइ छै जे कवि पतनक दृश्य चित्रित कए रहल छथि,किन्तु कवितान्त मे ‘जानि ने/कोन शंकराचार्यक/प्रतीक्षा छनि’क वक्रोक्ति माथ सं उपर बहि जाइत अछि।(ई पाठक/आलोचकक अपन बुद्धिक सीमा सेहो भए सकैत अछि)मैथिललोकनि केतबो गाल बजाबथि,शंकराचार्यक आएब कोनो शुभ आ स्वागतयोग्य बात त नहि भेल रहनि मंडन-भारती लेल! मंडन स्वयं पराजित भेल छला शंकराचार्य सं आ भारती द्वारा शंकराचार्य कें पराजित करबाक जे गौरव-गाथा बुनल गेल अछि,तेकर अन्तर्कथा त और ग्लानिदायक अछि।शंकराचार्य सन ब्रह्मचारी,उद्भट्ट विद्वान आ शास्त्र-मर्मज्ञ कें ‘कोकशास्त्र’ सन विषय कें माध्यम बनाए पराजित करब बहुत गौरवपूर्ण आ सम्मानजनक गप नहि अछि। कवि एहि कविताक माध्यम सं मैथिलक ‘कोंढ मे खाज’ बला मुहावरा चरितार्थ होइत देखबए चाहए छथि की? अपन शब्द-प्रयोगसभ मे कवि जाहि तामसक प्रदर्शन करए छथि,तेकर आधार पर त इएह मानल जएबाक चाही,जं कविताक पुर्वार्द्ध कें व्याज-स्तुतिक श्रेणी मे नहि राखी त। ‘चेतौनी’ पोस्टर कविता अछि आ प्राय: तें अर्धवयस्क अंधोत्साह आ विवेकहीन धमकी-चमकी कें एकर अन्तर्वस्तु बनाएल गेल अछि—‘रक्तधार बहाएब/राष्ट्र की धो-धो चाटब?/बरू आगि लागौ एइ राष्ट्र/बिलटि जाओ भारत/अन्हरा धृतराष्ट्र/हिन्दी के पोसा कुकुर—शैतान/नहि त ई मिथिला देश बनत विश्व के दोसर बंगला देश,दोसर वियतनाम’। एहन शब्द,एहन भाव,एहन कथ्य,एहन भौंकी जं कविताक तत्व अछि त गाम-देहातक गमार स्त्रीगणक बीच होइबला राड़ी-बेटखौकी की भेलए? महाकाव्य? ई ठीक छै जे कथ्यक दबाव कवि कें उपयुक्त भाषा आ रूपक निरन्तर खोजक लेल बाध्य करैत अछि।प्रभावशाली भाषा आ रूपक ई खोज रचनाकार कें विभिन्न प्रयोग दिस प्रवृत करैत अछि।किन्तु ई खोज कविक असावधानीक स्थिति मे ओकरा भटकाबितहु अछि आ ई भटकाव ओकरा भाषाक अपव्यय दिस लए जाइत अछि।ई स्थिति खतरनाक होइ छै। भाषाक अपव्यय बड़बोलापन कें जन्म दैत अछि,जाहि सं कविताक स्वाभाविकता कें त क्षति पहुंचतहि अछि,कविक विचार मे सतही आस्था कें देखार सेहो करैत अछि। एहि पोस्टर कविताक अलगाववादी, क्षेत्रीयतावादी आ मिथकजीविताक उपनिवेशवादी मानसिकताक सन्दर्भ मे मन पाड़ैत चली जे पंजाबी कवि पाश अपन क्रांतिकारी सोच आ समझक तहत विश्वक व्यापक जनता आ सर्वहारा वर्गक पक्षधर हेबाक चलते संप्रदायवाद, अलगाववाद,क्षेत्रीयतावाद,जातिवाद आदिक खिलाफ अपन पत्रिका आ रचनाक माध्यम सं एकटा व्यापक मुहिम चलएने रहथि। ओ खलिस्तानक खिलाफ रहथि,तें हुनकर लड़ाई एकरहु विरुद्ध छल। इएह कारण रहए जे 23 मार्च,1988 कें खालिस्तानक पक्षधर लोकनि हुनका मारि देलक आ एहि तरहें पाश अपन क्रांतिकारी भुमिकाक कारण शहीदक मौत मरला। ’कहैत छला बाबा’ मे धर्म आ धर्मस्थलक यथार्थ पर बहुत कुछ कहबाक गुंजाइश रहए,किन्तु कवि एहि विषय पर समग्रता मे समधानल प्रहार करबा मे हिचकिचाए गेल छथि आ बीध पुराबैक लेल एकरा मात्र छुबिकए छोड़ि देने छथि। धर्म आ धर्मस्थलक सभ सं बेसी विकृति एकर पंडा-पुरोहित व्यवस्था मे अन्तर्भूत छै,जेकर विरोध कए ओकरा निर्मूल करब कोनो प्रगतिशील व्यक्तिक/कविक काम्य हेबाक चाही। से कामना एतय अलोपित छै। एहि हिचकिचाहटिक पाछू कविक व्यक्तिगत पृष्टभूमिगत कोनो अवरोधक तत्व वा मानसिकता अछि की? ‘भूख’ कविता मे पेट आ सेक्सक भूखहिक सभकुछ हएबाक घोषणा आपत्तिजनक आ अस्वीकार्य अछि। जं इएह दुनू भूख सभकुछ छै,तखनि कवि कें कविता लिखबाक भूख किए जागलनि? मैथिली मे लेखन सेक्सक भूख त किन्नहु नहि अछि। ई त ‘घर फूंक,तमाशा देख’बला काज अछि। हृदयक शोणित जराए रचना करू,अपन जोड़ल पाइ लगाए ओकरा प्रकाशित करू आ घर-घर जाए कए पढबाक आग्रह संग पोथी बांटि आउ।तें एकरा पेटक भूख सेहो नहि मानल जाए सकैछ। साहित्यकार जीवन कें देखैत अछि त जीवनक पार सेहो देखैत अछि,तें ओकरा सं एहन वक्तव्य एकदम अवांछित अछि। हिप्पी-संस्कृतिक उद्घोषक वा पैरोकार हएब कवि-कर्म नहि अछि। ‘हमरा कने बिलम्ब हएत’, ’भाइ!अहां घुरि जाउ’, ’आगामी काल्हि हमरे सभक हएत’, ’दोहाइ ओइ पारक छी’, ’ओहू दिन एहिना भेल रहए’, ’बिहाड़िक बाद आमक गाछी’, ’कैफियत’, ’ओ हमरे भाइ छल’, ’आर कहिया धरि’ आ ‘मृत्यु अभिमन्युक’ आदि कविता मे साम्यवादक मनोहर पोथीक शब्दावली सं लेल शब्दसभक खूब प्रयोग भेल अछि,पर्चा-पोस्टरबला उत्तेजना सेहो अछि,वर्त्तमानक प्रति असन्तोष आ भविष्यक लाल-बिहानक प्रति अंध-आशावादक फार्मूला सेहो अछि,किन्तु एहि सभ सामग्री कें काव्य-तत्त्व सेहो मानल जाएत,ताहि मे सन्देह अछि। आन-आन कलासभ जकां कविताक प्रकृति सेहो अधि भौतिक(मेटाफिजिकल) छै आ ओ मात्र तर्कक वा आक्रोशक स्तर पर प्रभावित नहि करैत अछि। बिना काव्य-तत्त्वक मात्र सपाटबयानी कोनो सोझ प्रहार कए सकैत हुअए,ई सेहो सम्भव नहि अछि। त्वरित लोकप्रियता अर्जित करबाक लेल एना कएल जाए सकैत अछि,कएलहु जाइत अछि,किन्तु ई लोकप्रियता स्थायी नहि भए सकैछ। मार्क्सवाद एकटा क्रांतिकारी विचारधारा अछि। ई रचनाकार कें संघर्षधर्मी चेतना सं लैस करैत अछि। एकर माध्यम सं कोनो कवि अपन कविता मे विचार आ वक्तव्यक नीक समायोजन आ प्रभावशाली संयोजन कए सकैत अछि।किन्तु जीवन-जगतक यथार्थक गहन अवलोकन, जनजीवनक प्रति अनुभूतिगत संवेदना आ कल्पनाशक्तिक अभाव मे ओकर कविता दोहरौनीक शिकार भए जाएत। ई सेहो ध्यातव्य जे जं कोनो विचार नीक जकां अभ्यंतर मे घुलि-मिलि नहि गेल हुअए त ओ असन्तुलित आक्रोश अश्लील आ कुरुचिक रुप मे प्रगट होइत अछि आ ई सबलताक नहि,दुर्बलताक प्रतीक अछि। ‘हमरा कने बिलम्ब हएत’ मे ‘तानसेन’ आ ‘बाइजी’ कें अपन प्रयोजनक तरजू पर एक बराबर तौलब सामान्य पाठक कें की, कोनो परम-प्रयोगशील कविअहु कें अनसोहांत लागि सकैत अछि। ‘चारण हम ओकरहि छी’ मे कविता सं पूर्व कवि ‘धूमिल’क वक्तव्य उद्धरित देखि कविताक प्रति उत्सुकताक संग-संग अतिरिक्त अपेक्षा जागैत अछि।कवि एहि मे स्वयं कें श्रमजीवी समुदायक चारण घोषित करए छथि। स्वागत! कविता बेजाय नहि छै,किन्तु एहिमे ने अन्तर्वस्तुक नवीनता छै आ ने प्रस्तुतिकरण मे कोनो विशेषता। ‘एक टा सही कविता पहिने एक सार्थक वक्तव्य होइत अछि।‘ – धूमिलक ई प्रगतिशील-प्रिय कथन बेर-बेर दोहराएल गेल अछि आ हमरा सन-सन अनेक लोग एकर अन्तर्भाव सं सहमत सेहो छथि।किन्तु एकरा दोहरैनिहार द्वारा एकर आन्तरिक भाव कें की ठीक-ठीक आत्मसातहु कएल गेल अछि? धूमिलक ‘सही’,’पहिने’,’सार्थक’ आदि शब्दप्रयोगक निहितार्थ बुझने बिना हुनकर एहि कथनक आत्मा मे प्रवेश नहि कएल जए सकैत अछि। प्रगतिशील कविताक नाम पर छूछ नकल,नारा,फ़कराबाजी खूब भेल अछि,भए रहल अछि आ आगुअहु हएत,किन्तु एकर नियति मात्र अल्पजीविता अछि। मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र सृजन प्रक्रिया कें अद्भुत आ अनायास या दैवी-कृपा नहि मानैत अछि,किन्तु एकर ई अर्थ नहि लगाएल जेबाक चाही जे ई ओकरा सायास आ यान्त्रिक मानैत अछि।ई सही छै जे रचना प्रक्रियाक कोनो निर्धारित विधि वा अवधि नहि छै आ ई रचाकारक आवेगक मुखापेक्षी होइत अछि,किन्तु एकरा पाछू विचार आ प्रेरणाक तत्व रहैत अछि,जे कवि कें मूर्त जीवन-जगत सं प्राप्त होइत अछि।रचनाकारक दृष्टि जं सोझराएल आ वैज्ञानिक चेतना सं लैस नहि हुअए त ओ वस्तु कें ओझराएल आ विकृत रूप मे देखैत अछि आ ओकरा तहिना व्यक्त करैत अछि।ई सभ बात धूमिलक संज्ञान मे रहनि आ तें ओ वक्तव्यक सार्थकता पर,विचारक प्राथमिकता पर जोर त दए छथि,किन्तु अन्तत: एहि मे काव्य-तत्त्वक अनिवार्यता कें सेहो रेखांकित करए छथि,जेकर उपस्थिति सं कोनो कविता ‘सही’ कविता बनैत अछि। संग्रहक अगिला कविता ‘अजगुत देश’ अजगुत छै—निस्सन्देह! ई कविता पढैत अनायास एकटा विदेशी लोक-कथाक नायक ‘नारसिसस’ मन पड़ि जाइत अछि,जे एकटा झील मे अपन अप्रतिम रूप देखि स्वयं पर एहि पराकाष्ठा तक मोहित भए गेल जे अपन सुध-बुध बिसारि ओहि झीलहि मे खसिकए डूबि गेल रहए। स्वमुग्धताक एहि चरम कें ‘नारसिसस सिन्ड्रोम’ कहल जाइ छै।जेना बताह सं बतहपनी बनए छै,तहिना एकरा मैथिली मे ‘नारसिससपनी’ कहि सकए छी। ‘अजगुत देश’ कविता आ एकर कवि एहि नारसिससपनीक प्रभावक उत्कृष्ट उदाहरण बुझाइत अछि।कविता मे युटोपिया,नास्टेल्जिया आ मिथिज्म (मिथकजीविता वा मिथकवाद) चरम पर छै।एहन चरम जे प्रगतिशीलताक आग्रही पाठक कें वितृष्णा सं भरि दए छै आ ई विश्वास करबाक यथेष्ट आधार प्रदान करए छै जे कवि अपन अन्तस मे मूलत: नारसिसक प्रतिरूप छथि। हुनक काव्य-जगत मे जेतय-जेतय मिथकक झील आबैत अछि,ओ अपन अपरूप रूप निहारि आत्मरतिक चरम पएबा लेल ओहि मे खसि पड़ए छथि।विचित्र बात ई जे झील मे देखाइत ई अपरूप रूप वर्त्तमानक नहि, कोनो आन रचनाकारक रचित काल्पनिक अतीतक खिस्सा मे वर्णित रूप अछि। एतय रबीन्द्रनाथ ठाकुर मन पड़ि जाइ छथि जे एकठाम लिखने छला – ‘धुइयां आकाश सं शेखी बघारैत अछि आ छाउर पृथ्वी सं जे ओ अग्निवंशक अछि।‘ धुइयां आ छाउरक ई शेखी खूब शिद्दत सं एहि कविता मे उपस्थित आछि। ‘एहि संएतीस बर्ख मे’ एकटा लघुकथा कें कविता बनएबाक निष्फल प्रयास अछि। एहिमे रिक्शाबलाक पीड़ा अपेक्षित प्रभाव नहि उत्पन्न कए पाबैत अछि। आजादीक सैंतीस बर्ष बादहु देश मे सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल आ गरीबक दुख-पीड़ा आ ओकरापर अत्याचारक यथास्थिति कायमहि अछि,इएह एहि कविताक मूल कथ्य अछि।कविता मे बेर-बेर ‘एहि संएतीस बर्ख मे’ वाक्य-खण्डक दोहरौनी एकर गंभीरता कें खण्डित करैत अछि।यथार्थ आ वस्तुस्थितिक चित्रण कवि सं अपेक्षित होइत अछि आ ओ यथार्थ आ वस्तुस्थिति बेजाय आ निराशजनक सेहो भए सकैत अछि। छूछ निराशावाद राजनीति मे जनाक्रोश जगाबए लेल त उपयोगी भए सकैत अछि,किन्तु कवि सं महत्तमक अपेक्षा होइत अछि जे ओ जनाक्रोशक सत्ती जन-चेतनापर अपन चेतना कें केन्द्रित राखथि। अगिला कविता ‘अनेकता मे एकता’ बहुत प्रयासक बादहु हमर समझदारीक सीमा मे नहि अंटि सकल,बाहरहि बाहर रहि गेल। अनेकता मे एकताक मखौल उड़ैबाक लेल नरभक्षी,पिशाच,कपिला गाय सन कंपैत माउग आदि-आदि प्रतीकक काव्यार्थ वा भावार्थ स्वयं कें बूझल जएबाक लेल कोनो गंभीर आ नामवर काव्य-अध्येताक मांग करैत अछि। संग्रहक शीर्षक-कविता ‘देशक नाम छलै सोनचिड़ैया’ कें वस्तुत: कुमारेश काश्यपक ‘बेताल कथा’ मे संग्रहित कएल जएबाक चाही छल। ई व्यंग्य-रचना प्राय: भूलवश कविताक रूप मे एहि संग्रह मे चलि आएल अछि।संग्रहक अन्तिम छहटा क्षणिका नीक अछि।
लाख प्रश्न अनुत्तरित
मैथिली दिवस(ई दिवस के बनएलक से नहि जानल),1410 तद्नुसार 11 मई,2003 कें प्रकाशित एहि संग्रहक एक सय पृष्ट मे ‘विख्याता भुवनत्रयम’ सं ‘बर्खान्त’ तक कुल 48 टा कविता संग्रहित अछि।
‘विख्याता भुवनत्रयम’,’बहिनदाइक नाम एगो चिट्ठी’,’हमरो एकटा गाम छल’ आदि कविताक विषय मैथिली मे बेर-बेर दोहराएल गेल अछि आ एकर प्रस्तुतिकरण मे सेहो कोनो नवीनता नहि छै। ‘विख्याता भुवनत्रयम’ मे जखनि कवि कोशी-प्रांगणक व्यथा लिखने चलि जाइ छथि,तखनि ओ निश्चित रूपसं वर्त्तमान मे उपस्थित छथि, किन्तु ‘जतए ने जाथि रवि,ओतय जाथि कवि’ कें चरितार्थ करैत ओ अकस्मात युग-शताब्दी कें हनुमत-वेग सं टपैत कंकालक देश अपन मातृभूमि तथाकथित विख्याता भुवनत्रयम मिथिला मे प्रगट भए जाइ छथि।ई काल-विसंगति कनेक नहि,बहुत विचित्र छै। जं मिथकहि कें आधार मानी त कोशी नदी मिथिलाक सीमांत मानल गेल अछि। ई नदी अपन प्रचण्ड हाहाकारी मुद्रा मे अपन पथ बदलैत रहल अछि। ई नदी आइयो अपन भौगोलिक-अस्तित्व मे उपस्थित अछि आ मिथिलाक मैथिल-मन छोड़ि और कतहु कोनो अस्तित्व नहि अछि।यथार्थ आ मिथक कें एना मिज्झर करब भूगोलहु कें टेढ-घोंच कए देत।कवि कें अपन कल्पनाक पसारक स्वतंत्रता छै,किन्तु इहो कविए कें देखए पड़तनि जे ई स्वतंत्रता आन भौतिकता कें क्षतिग्रस्त करबाक संग-संग स्वयं हुनकर अपनहि रचल कविता कें वायवीयतामय नहि कए दनि।कोशी-प्रांगणक व्यथा लिखैत काल एहि क्षेत्रक दुर्दमनीय जीजिविषा,अथक पुरुषार्थ आ श्रम-संस्कृतिक महत्ताक ठामपर जं कवि कें परजीविताक प्रतीक कोनो मिथकीय मकड़जाल मे मुक्ति वा त्राण देखाइ पड़ए लागए त ओकर सम्पूर्ण प्रगतिशीलता आ वामवादिता पर प्रश्नचिंह त लागितहि अछि, ओकर व्यक्तित्व पर छद्मक छटाक आभास सेहो दैत आछि। ‘एक फांक अन्हार:एक फांक इजोत’ मे गाम-शहरक तुलना इजोत-मात्र तक सीमित,सरलीकृत अछि आ तें अपूर्ण कविता अछि। ‘अपन समाचार’ कविक व्यंग्य रचना ‘बेताल कथा’क लाट सं भटकिकए एम्हर चलि आएल अछि। ‘शब्द’ सचेत अवस्था मे लिखल कविता नहि अछि। ई अवचेत आ अचेतहु सं पारक कोनो चेतावचेताचेत अवस्थाक बियान अछि। शब्दक प्रति एहन भ्रम,एहन शंका,एहन अविश्वास कोनो कविक भाव अछि,से केकरहु भ्रम,शंका आ अविश्वास सं भरि दए सकैत अछि—एकदम अनसोहांत जकां। ई सम्भव छै जे कोनो क्षण-विशेष मे,क्षण-विशेषक उत्तेजना मे कविक शब्दास्थाक नींव डगमगाए जाइ,लेखन-कर्मक व्यर्थता-बोध सं भरि कवि स्वयंक प्रति ग्लानि सं भरि जाइ।एकरा कविक व्यक्तिगत आ मानवीय कमजोरी मानि तत्काल स्वीकार कएल जाइ सकए अछि।किन्तु जखनि ओ अपन समकालीन कविसभ कें निस्पृह,निर्विकार होएबाक आरोप सं लांछित करैत शब्द कें अपन हेराएल अर्थ पएबाक लेल भविष्यक नहि, अतीतक बाट दिस जएबाक प्रतिगामी गप करए त इ कवि-कर्मक प्रति अपराध-सदृश्य अछि।ठीक छै जे कविता कें जीवनक आन-आन भौतिक वस्तु जकां व्यवहृत नहि कएल जाए सकैत अछि। ई मनुष्यक लेल हवा,पानि आ भोजन जकां अनिवार्य नहि अछि। आस्कर वाइल्ड एकठाम कहने रहथि जे,’अन्तत: समस्त कलासभ सारहीन अछि’। तें कला-कविता कें महज उपयोगितावादी नजरिया सं देखब त ताहि सं कुछ हासिल होबएबला नहि अछि। अहां अपन व्यक्तिगत जीवन मे एहि बात लेल स्वतंत्र छी जे अहां अपन सुविधानुसार मार्क्सनामी चद्दरि ओढी/उतारी वा रामनामी चद्दरी ओढी/उतारी वा एकटा मूल्यहीन समाजक हिस्सेदारक रूप मे एकटा मरणधर्मा संस्कृति कें उघैत रही।किन्तु जेना राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता कोनो व्यक्ति कें सार्वजनिक बनबए छै,तहिना साहित्यिक सक्रियता सेहो व्यक्ति कें सार्वजनिकता प्रदान करए छै।एना मे अहां रचनाक नाम पर एकालाप वा प्रलाप नहि कए सकए छी।एक बेर सार्वजनिक होइतहि अहां संलापक परिधि मे आबि जाइ छी आ तेकर पालन करब अहांक बाध्यता अछि। ‘मैथिली मन्दिर मे दीप लेसैत’, ’हम श्रद्धांजलि नहि द पाएब’, ’नेल्सन मंडेला’, ’नीक नहि कएल अहां’ आदि विभिन्न व्यक्तित्व कें समर्पित कवितासभ अछि। समर्पणक सभक अपन-अपन तरीका होइ छै,तें ओहिपर कोनो टिप्पणी नहि कएल जएबाक चाही।किन्तु सत्य कें ‘संदिग्ध’ आ गांधी कें ‘विखण्डित राष्ट्रक विकलांग पिता’ कहब; नेल्सन मंडेला कें ‘श्वेत कपोत’क उपमा देब कतेक गोटे कें ठोंठ सं गीरब पार लगतनि,से कहब कठिन। कविता कें जं विज्ञान सं परहेज होइ वा अविज्ञानी हएब कविक लेल अनिवार्य हुअए,तखनि त ‘धरती प्रतिकार करैछ’ कविताक विरोधक कोनो बात नहि; किन्तु इतर स्थिति मे ई प्रश्न उठब स्वाभाविक जे ज्वालामुखी भड़कए,अन्हर-बिहाड़ि उठए आ भूकंप होइ मे धरतीक कोन भुमिका,कोन अपराध?कोनो स्कूलक सामान्य छात्रहु कें ई तथ्य बूझल रहए छै जे धरती एहिसभ उत्पात कें सहैत-भोगैत अछि,एहि उत्पातसभक उत्पादक नहि अछि। ‘शहर शामियाना’, ’पन्द्रह अगस्त’, ’एक गोट राष्ट्रद्रोहीक वक्तव्य’ राष्ट्रीय विषय-घटनासभ सं जुड़ल कविता अछि। एहि कवितासभक रचाव मे अपेक्षित गंभीरता आ संवेदनाक अभाव एकरासभ कें अधसिज्झू व्यंजन जकां नीरस बनाए दैत अछि। ‘हम चाहै छी’ मे कविक काव्याकांक्षा प्रशंसनीय अछि। अजुका कविता ओहने हएबाक चाही, जेहन कविताक आकांक्षा एहि कविता मे कएल गेल अछि।नीक कविता। आब लाख रुपैयाक जिज्ञासा ई जे कविक ई आकांक्षा भूमिका-मात्र तक किए रहि गेल,एकरा हुनक तीन-तीन टा संग्रहक अन्तर्वस्तु बनाबए सं,एकरा क्रियान्वित करए सं के रोकलकनि? लेखन सं लए कए प्रकाशन तक सभ सरंजामक अछैतहु हुनक ई कामना फलीभूत किए नहि भेल? ई कविता अपनहि रचनाकार कवि सं एहि प्रश्नसभक उत्तर आ स्पष्टीकरणक मांग करैत अछि। ‘भगवान तथागत’, ’मनुक्ख आ ईश्वर’, ’दिनचर्या’, ’संवाद’, ’बसात’, ’कौआ’, ’मैना’, ’नव रचनाक मादे’, ’सोना आब नम्हर भ गेलए’ आदि कविताक अन्तर्वस्तु ओ नहि अछि,जेकर आकांक्षा कवि द्वारा ‘हम चाहै छी’ कविता मे कएल गेल अछि,किन्तु एहि कवितासभ मे काव्य-तत्त्वक पुष्टता अछि आ कवि एतय सहज कवि-रूप मे उपस्थित छथि। एत्ते तक जे पत्रिका आ पोथीक चर्चा होइतहु ‘संवाद’ कविताक लय नहि टूटैत अछि,बरु ई चर्चा कविताक प्रभाव कें विस्तारित करैत अछि। ई बात एहि दिस इंगित करैत अछि जे रामलोचन ठाकुरक काव्य-विषयक प्राय: इएह स्वाभाविक क्षेत्र छनि,जेकरा ई कवितासभ छुबैत अछि। भ्रमण कवितासभ मे स्थलसभ कें देखबाक कवि-दृष्टि रुमानी अछि आ ई रुमानी-दृष्टि नीक लागैत अछि। चारि गोट मिनी कविता बहुत रास मैक्सी कविताक तुलना मे बहुत उत्तम अछि। क्षणिका भात मे आएल कंकड़ जकां अछि। अन्तिम आ संग्रहक शीर्षक-कविता ‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ राह भटकि कए ‘बेताल कथा’ सं बिछुड़ि एम्हर चलि आएल अछि।
रहबर जखनि डगर भटकाबए
साहित्यक वाचिक/श्रव्य परम्परा आ आधुनिक लिखित/पठ्य परम्परा मे बहुत रास ढब-ढांचा आमूलचूल बदलि गेल अछि। अनेक सुविधा बढल अछि,त अनेक सुविधा विलुप्त भए गेल अछि।वाचिक परम्पराक कवि अपन श्रोता लग सदेह उपस्थित रहैत रहथि आ हुनका ई सुविधा रहनि जे ओ अपन हाव-भाव,अपन आंगिक प्रदर्शनक संग-संग मौखिकहु स्तर पर अपन काव्यक मूलार्थ वा गूढार्थ अपन श्रोता तक पहुंचाए सकथि।लिखित परम्परा मे कवि कें ई सुविधा नहि रहलए।पोथीक प्रकाशनक बाद ओकर रचनाकार विदेह ( बिना देहक,अनुपस्थित वा अदृश्यक अर्थ मे,मिथकीय राजाक अर्थ मे नहि) भए जाइत अछि।कविक हाव-भाव,ओकर आंगिक प्रदर्शन आ मौखिक व्याख्या वा स्पष्टीकरणक क्षतिपूर्तिक सभटा दारोमदार पोथीअहि पर चलि आबैत आछि।तें संग्रहक (प्रकाशित पोथीक) अन्त्तर्वस्तु सं लए कए ओकर प्रस्तुतिकरण ( कवर-डिजाइन,प्रकाशन-विवरण,ब्लर्ब पर देल रचनाकारक परिचय,फोटो वा टिप्पणी,समर्पण,भूमिका आ पोथीक पृष्ट आ मूल्य तक) तक प्रत्येक वस्तुक अपन अर्थ होइ छै।ई सभटा वस्तु अपन-अपन दिस सं किछु ने किछु कहए छै,संकेतित करए छै,निरर्थक नहि होइ छै।उदाहरण लेल ‘इतिहासहंता’ पोथीक मुद्रित मूल्य (साधारण-दू टाका:विशेष-चारि टाका) कें ललका रोशनाई सं काटि पन्द्रह टाका लिखि ओकर नीचां कविक हस्ताक्षर करब सेहो बहुत बात कहि जाइत अछि।ध्यातव्य अछि जे सामान्य परम्पराक अनुसार पोथीक मूल्य निर्धारित करबाक अधिकार प्रकाशकक होइत अछि आ एहि पोथीक प्रकाशक कवि रामलोचन ठाकुर नहि,शिखा प्रकाशनक कुणाल-अग्निपुष्प छथि।किन्तु मैथिली त कोनो सामान्य भाषा नहि अछि।तें एतय प्रकाशनक नियमसभ सेहो असामान्य अछि।ललका रोशनाई सं कवि द्वारा संशोधित मूल्य मैथिली मे पोथी प्रकाशनक व्यवस्थाक पोल खोलैत अछि (ई पोथी विदेहपर डाउनलोड लेल कवि द्वारा देल गेल छै)।एहि पोथीक ब्लर्ब पर कुणालक टिप्पणि दर्ज अछि,जाहि मे ओ रामलोचन ठाकुर कें ‘दुर्घर्ष अग्निहस्ताक्षर’ आ एहि संग्रह कें ‘अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज’ घोषित करैत दाबी ठोकए छथि जे ई दस्तावेज साबित करैए जे कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया नै अइ। आगू ओ ‘अग्निलेखन’क परिभाषा दैत लिखे छथि जे अग्निलेखन यथास्थितिक प्रति अतिशय असहिष्णु,आक्रोशक तीक्ष्ण भावाभिव्यक्ति,मार्क्सवादी चिन्तन सं संपृक्त संघर्ष चेतनाक निर्माता,स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान,तें विध्वंस कें आवश्यक मानैत कोनो तरहक सुधार कंह पूर्णत: अस्वीकार करैए; मानैए जे मनुखक जीवनक सुन्दरतम क्षण ओ हेतै जखन ओ क्रांतिक साक्षी बनत—सहभागी बनत आ तावत साहित्यक काज छै संघर्षक वैचारिक धरातल तैयार करैत रहनाइ जाइ मे मात्र स्थिति निरुपण नै,दिशाबोध भयंकर(!) रूप सं आवश्यक छै। आगू ओ कविक परिचय दैत लिखए छथि—“कवि,निबंधकार रामलोचन ठाकुर मैथिली साहित्यक सुपरिचित नाम अइ,अपन प्रखरता आ वैचरिक सुदृढता स एकटा फराक स्तित्वक मालिक सेहो। हिनक चिन्तनधाराक आधार अइ मार्क्सवाद,फलत: ‘वर्ग-संघर्ष’ आ तइ पर आधारित क्रांति हिनकर रचनाक मूल होइए। हिनका अग्निलेखन के प्रपंच आ विकृति सं बचेबाक प्रमुख श्रेय छनि।…… स्वभाव सं उग्र,विचार सं परिपक्व आ व्यवहार स सर्वहारा…..”
दुर्द्धर्ष अग्निलेखकक अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज ‘कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया नै अइ’ कें साबित करैत अछि की नहि,ताहिपर किछु चर्चा एहि आलेखक पूर्व मे भेल अछि,किछु आगू हएत।किन्तु ब्लर्ब पर कुणालक ई टिप्पणी,जे मौलवी-मुल्लासभक फतवाक हद पार करैत अछि,शब्दस: ‘मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया’ अछि,से कहबा मे हमरा कनियहु संकोच वा संशय नहि। ई सम्पूर्ण मैथिली-जगत कें बूड़ि बुझबाक,अनकर माल पर फुटानी करबाक,मैथिली रचनाकार-समुदाय कें मानसिक,वैचारिक आ रचनात्मक स्तर पर परम पिछड़ल आ अपढ बुझबाक आ आत्मरतिक पराकाष्ठा सं उपजल अहंकार सं ऐंठल टिप्पणी अछि। ‘अग्निलेखन’ आ ‘अग्निहस्ताक्षर’क शिगूफा एहि एहि मानसिक व्यभिचारी यूटोपियाक प्रथम पौदान अछि।एकर बादक हुनक सम्पूर्ण टिप्पणी,जेकरा ओ स्वघोषित विश्वकर्मा जकां अपन आचार्यबोधत्वक प्रभाव मे अग्निदुर्गक निर्माणक संरचना बुझि लेने छथि,वस्तुत: यूटोपियाक पसरल मकड़जाल अछि,जाहि मे अपढ कीट-फतिंगा त ओझराए कए मरितहि अछि,स्वयं अतिविद्वान मकड़ा सेहो अधमरू होइत दिवंगतावस्था मे चलि जाइत अछि।शास्वत यथार्थ छै जे भारी-भरकम,महाकाय,विराटकाय पहाड़नुमा शब्दसभक ढेरी लगएला सं कोय वेदव्यास नहि भए जाइ छै। ’पहाड़ तोड़ि देबए’, ’भुइयां हिलाए देबए’ सन-सन हुंकारा देला सं कोय क्रांतिकारी वा पहलवान नहि भए जाइ छै,ठीक ओहिना जेना ‘आगि-आगि’ चिकरला सं मूंह नहि जरए छै।गांधी-नेहरूक नाम जपला सं जेना कोय कांग्रेसी नही भए जाइ छै,तहिना मार्क्स,एन्जेल्स आ लेनिनक नाम-जाप आ ‘वर्ग-संघर्ष’, ’बूर्ज्वा’, ’सरमायेदार’, ’भौतिक द्वन्द्ववाद’, ’सर्वहारा’, ’पूंजीवाद’, ’सामन्तवाद’, ’लाल सलाम’, ’कामरेड’ आदि शब्दक आडंबरपूर्ण व्यवहार सं कोय मार्क्सवादी नहि भए जाइ छै; आ ने ‘पेरेस्त्रोइका’ आ ‘ग्लास्नोस्त’क रट्टा मारला सं सोवियत संघ विघटित भए जाइ छै।कोनो वैचारिकता कें ग्रहण करबाक लेल एकटा समझदारी सं ओतप्रोत निष्ठा चाही,वैचारिकताक सांचा मे स्वयं कें आपादमस्तक ढालि लेबाक अटूट जिद चाही।विचार चद्दरि जकां देह पार ओढल नहि,अस्थि मे मज्जा जकां आ नस-नस मे शोणित जकां प्रवहमान हएबाक चाही।संयोग कही वा कुसंयोग,सौभाग्य कही वा कुभाग्य,कुणालक फतवारूपी परिचय-प्रस्तावना आ रामलोचन ठाकुरक काव्य-जगत दुनू मे वैचारिकताक उपस्थिति देह पर ओढल चद्दरि जकां अछि,जेकरा निज सुविधा किंवा अवसरक अनुसार ‘ज्यों की त्यों धरि दिन्ही चदरिया’ कएल जाए सकैत अछि आ फेर दोसर क्षेत्र मे जाइतहि ‘पुनर्मूषको भव:’ भेल जाए सकैत अछि।एतय जे मार्क्सवाद अछि,से एकटा सजीव दर्शनक निर्जीव अ बचकाना समझ सं उपजल फसिलक रूप मे उपस्थित अछि।मार्क्सवाद अपन राजनीतिक इस्तेमाल मे विवाद,निन्दा आदिक विषय रहल अछि।एकर आधार पर बनल राजनीतिक संरचनासभ पर हिंसात्मक रवैया अख्तियार करबाक आरोप लागैत रहल अछि।किन्तु एहि विचारक वैज्ञानिकता पर प्रश्न ठाढ करबा सं एकर विरोधीअहुसभ परहेज कएलनि अछि।सोवियत रूसक विखण्डनक आलोक मे जे ई कहल गेलए जे ई मार्क्सवादक पराजय नहि,मार्क्सवादक नाम पर बनल राजनीतिक संरचनाक पराजय अछि,से उचित। चीनक वर्त्तमान पूंजीवादी वामपंथ सेहो विचारक नहि,संरचनाक दोष अछि। भारतीय वामपंथ त शत-प्रतिशत विदेशी नकल पर आधारित अछि।एतय एकरा लागू करबा मे एहि देशक सामाजिक संरचना,एकर सांस्कृतिक परम्परा, एकर भाव-भूमिक अनुरुप कोनो परिवर्तन/परिवर्द्धनक लेल भारतीय बौद्धिकताक प्रयोग कएलहि नहि गेल। भारतीय कम्युनिष्ट परिदृश्य पर नजरि राखनिहार विचारकसभ कें देखल छनि जे एतय जोर वैचारिक दीक्षा देबा पर नहि,कैडरक नाम पर बंधुआ मजूर बनएबा पर देल गेल अछि।एतहुका विभिन्न कम्युनिष्ट पार्टी अपन-अपन बौद्धिक कुटीर उद्योगक लेल श्रमिक तैयार करबा लेल जे अक्षरबोध पाठशाला चलबैत अछि,ताहि मे चटियासभ कें मेधावी बनएबा पर नहि,रट्टू सुग्गा बनबए पर बेसी ध्यान रहैत अछि। एहन रट्टू सुग्गा,जेकरा राजनीतिक बोलचाल मे ‘छोटभईया’ कहल जाइत अछि। छोटभईया वा छुटभैया,जे अपन बुद्धि-विवेक कें ताल्लुक सं बाहर राखए आ ओतबे बाजए/लिखए जे ओकरा सिखाएल/रटाएल गेल अछि,ओतबे करए/चलए जे पोलित ब्यूरो लेल वांछित अछि।ओकर अवचेतनहु मे एहि प्रश्नक कल्पना तक नहि आबए जे मार्क्स त सर्वहाराक अधिनायकत्व पर बल देने छला,किन्तु लेनिन ओहि सिद्धांत कें साम्यवादी पार्टीक अधिनायकत्व मे बदलि देलनि,जे अन्तत: महासचिवक अधिनायकत्व मे बदलि गेल आ जेकर साक्षात रूप बचल-खुचल रूस,अगियाबैताल भेल चीन,लचरल बेनेजुएला आ मिझाइत क्यूबा आदि देश मे दृश्यमान अछि।भारतीय वामपंथ एहि सभक नकलची हएबाक फिराक मे आपादमस्तक भ्रमित भए ने घरक रहल अछि ने घाटक।एकरा पर स्वतंत्रता संग्रामक दौरान अंग्रेजक लेल स्वतंत्रता सेनानीसभक मुखबिरी करबाक आ गांधी-नेताजी आदिक प्रति अपशब्द आ अपमानजनक संज्ञासभ सं कलंकित करबाक आरोप रहल अछि।1940क दशक मे वामपंथीसभ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ‘अनमास्क्ड पार्टिज एण्ड पोलिटिक्स’ मे गांधीक संग-संग नेताजी कें ‘आन्हर मसीहा’ कहल गेलए(आलोच्य कविक गांधीक प्रति कएल एहनहि सन टिप्पणीक चर्चा पूर्व मे कएल गेल अछि)। सुभाषचन्द्र बोसक प्रति त वाम शब्दावली भयावह रूप सं अपमानजनक आ अश्लील भए गेल रहए। हुनका ‘काला गिरोह’, ‘गद्दार बोस’ आ ‘हिटलरक अगुआ दस्ता’ तक कहल गेलए।वामपंथी लोकनि द्वारा नेताजीक आजाद हिन्द फौज कें भारतीय भूमि पर लूट,डाका,विध्वंस मचैनिहार घोषित कएल गेल रहए।1947 मे द्विराष्ट्र सिद्धान्तक समर्थन करब,1948 मे हैदराबाद मे भारतीय सेनाक विरुद्ध रजाकारसभक समर्थन करब,1962क युद्ध मे चीनक भाषा बाजि ओकर समर्थन करब,1967 मे हिंसक माओवाद कें जन्म देब,आपातकाल मे इन्दिरा गांधीक समर्थन आ जेपी आन्दोलन कें फासिज्म घोषित करब,कांग्रेसक संग मिलि फासिस्ट विरोधी सम्मेलनक सहभागी बनब आदि-आदि घटना भारतीय इतिहास मे दर्ज अछि आ भारतीय वामपंथक भ्रमित राजनीतिक चेहराक प्रमाण अछि।भारतीय वामपंथक ई हाल मात्र राजनीतिक स्तर पर नहि छै। प्रगतिशील लेखक संघक स्थापना जाहि परिस्थितिमे,जाहि लेखक लोकनि द्वारा भेल हुअए,कालान्तर मे ई कम्युनिष्ट पार्टीक एकटा विंग भए गेल। शोभा लेल भरतीक कुछ पद भनहि व्यक्तित्वक आधारपर भेटि जाइ,किन्तु एकर केन्द्रीय पदधारी बनबाक लेल पार्टीक कार्डहोल्डर हएब अनिवार्य अछि। प्रसिद्ध विचारक चौथीराम यादवक वामपंथी वैचारिकता पर हुनक दुश्मनहु कें कोनो शंका नहि भए सकैत अछि।किन्तु वएह चौथीराम जी कें प्रगतिशील लेखक संघक विलासपुर अधिवेशन मे खुलल मंच सं दुखी स्वर मे एहि बातक उपराग दिअए पड़लनि।हम स्वयं एहि संगठन सं जुड़ल रहल छी,बिहार राज्यक उपाध्यक्ष रहि चुकल छी आ एहि अप्रिय यथार्थक गवाह छी।एतेक चर्चा मात्र ई कहबाक लेल जे वैचारिक मार्क्सवादी हएब अलग बात छै,मार्क्सवादी कार्डहोल्डर हएब अलग बात।पहिल स्थिति मानसिक आ वैचारिक छै,उत्तम छै।दोसर स्थिति शारीरिक आ भौतिक छै आ वामपंथी राजनीति कें देखैत एकरा अधम कही,नहि कही,मध्यम कही,नहि कही,उत्तमक श्रेणी मे किन्नहु नहि अछि।एहि परिपेक्ष्य मे ई मानए मे कोनो संशय नहि जे कुणालक लिखल परिचय-प्रस्तावना मार्क्सवादी विचारक प्रतिफलन नहि,मार्क्सवादक प्रहसन अछि। हुनक लिखल टिप्पणीक एकहु टा अंशक पुष्टि ने एहि संग्रहक रचनासभ करैत अछि,ने रचनाकार।ई विचित्र स्थिति अछि आ एकर व्याख्या दू तरह सं कएल जाए सकैत अछि।पहिल ई जे परिचय-प्रस्तावनाक रूप मे कुणाल जे गाइडलाइन देलनि,तेकर अनुपालन रामलोचन जी अपन रचना मे नहि कएलनि।दोसर ई जे रामलोचन जी जे कुछ लिखलनि,तेकरा कुणाल जी ठीक-ठीक बुझिकए व्याख्यायित नहि कए सकला।ओना एकटा तेसरहु स्थिति भए सकैत अछि जे ने कुणाल जी रामलोचन जी कें पढलनि आ ने रामलोचन जी कुणाल जी कें पढलनि।ई तेसर स्थिति कनी हास्यास्पद छै,किन्तु मैथिलीक परिदृश्य,जेतय कोय केकरो नहि पढैत अछि बल्कि कुछ गोटे त पढितहि नहि छथि, कें देखैत एहि तेसर स्थितिक स्थिति बेसी सटीक लागैत अछि।एतेक धरि अवश्य जे ई परिचय-प्रस्तावना अपन गब्बरीय अस्तित्व सं कोनो विमर्श ठाढ करबाक कुल दायित्व समीक्षक-समालोचक पर बलात आरोपित कए दैत अछि आ तेकरहु विचित्र पक्ष ई जे एहि विमर्श लेल समालोचक कें कविताक अन्तर्वस्तु, ओकर शैली-शिल्प दिस कम,कविता मे जे नहि छै वा जे हएबाक चाही छल,तेम्हर उन्मुख करैत अछि।ई कनी अनेरुआ सन चुनौती अछि,किन्तु मैथिली आलोचना-साहित्यक दरिद्रता कें देखैत एहि चुनौती कें स्वीकार करब मैथिली आलोचनाक हित मे अछि।ओना स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान(आत्ममुग्ध) व्यक्ति संघर्ष-चेतनाक निर्माता भए सकैत अछि;विध्वंस कें आवश्यक माननिहार,सुधारवाद कें पूर्णत: अस्वीकार करनिहार संघर्षक वैचारिक धरातल तैयार कए सकैत अछि – ई सभ ततेक हाई-लेवलक गप छै जे एकरा मैथिलीक पोलित-ब्यूरोक जन्मजात व्यास-महासचिवलोकनि बुझथु त बुझथु,सर्वहारा-समुदायक माथक केशक उपर सं उड़ियाइत चलि जाइत अछि।किन्तु जेंकि अग्निलेखन आ अग्निहस्ताक्षर नामकरण मार्क्सवादी कविताक पैटर्न पर कएल गेल अछि त ई देखब उचित जे एहि पैटर्न मे कोनो तथ्यगत,वस्तुगत संगत छै की नहि।
‘मार्क्सवादी चिन्तन सं संपृक्त’ कविता मार्क्सक अपनहि लेखन सं शुरु भेल आ विश्वक विभिन्न भागक क्रांतिकारी व्यक्तित्वसभ सं समृद्धि पओलक।एहि पर पूर्व मे विस्तृत चर्चा कएल गेल अछि।मार्क्स,एन्जेल्स,लेनिन आदि मूलत: कवि नहि रहथि,राजनीतिक चिन्तक रहथि,अपन राजनीतिक उद्देश्यक पूर्तिक क्रम मे यदा-कदा किछु लिखैत रहथि।तें हुनकरसभक कविता मे काव्यक दृष्टिकोण सं नाराबाजी आ जोश रहए।माओत्सेतुंग आ होची मिन्ह सेहो एहनहि सन कवि रहथि,किन्तु हिनकादुनू मे कलात्मकताक संग-संग प्राकृतिक संवेदनाक सन्दर्भ बेसी रहए,जे हिनकासभक कविता कें तुलनात्मक रूप सं उल्लेखनीय बनबैत अछि।एतय बेसी विस्तार मे नहि जाए कए एतबे कहबाक अछि जे कम्युनिष्ट क्रांति सं जुड़ल बहुत रास लोग फुरसत मे कविता लिखलनि किन्तु ओसभ मूलत: कवि नहि छला। आगू जए कए एहि परम्परा मे एहन बहुत रास लोग अएला जे क्रांतिकारी गतिविधि सं जुड़ल त नहि रहथि,किन्तु एहि विचारधारा कें मानैत रहथि आ मूलत: कवि रहथि।एतय मात्र नाजिम हिकमतक चर्चा करैत चली,जे अपन देश तुर्कीए टा मे नहि वैश्विक स्तर पर चिन्हल गेला,प्रसिद्ध भेला। से हिकमत अपन ओहेन अनेकानेक प्रारम्भिक कवितासभ कें बाद मे खारिज कए देलनि,जे मात्र प्रोपगण्डा लेल लिखल गेल छल।किन्तु ई खारिजबला कार्रवाई ओ तखनि कएलनि,जखनि हुनक कविता उत्तरोत्तर विकास करैत गेल आ ओकरा ‘मार्क्सवाद’ सं बाहरहु स्वीकृति भेटलए।एतय कहबाक एतबे जे मार्क्सवादी कविताक दू धारा रहलए—एकटा प्रोपगण्डा कविताक आ दोसर शुद्ध (प्रोपगण्डामुक्त) कविताक। आब प्रश्न ई ठाढ होइत अछि जे आलोच्य कविक कवितासभ एहि दू धाराक कोन धाराक कविता अछि,कोनो धाराक अछिअहु वा नहि?वामपंथी धाराक आइ तक लिखल कवितासभ मे आलोच्य कवि कें एहन कोन तत्त्वक कमी बुझएलनि,जेकर पूर्तिक लेल हुनका स्वयं कविता लिखब आवश्यक बुझएलनि?हुनक अपन कविता एहि क्रांतिकारी विरासत मे किछु जोड़ैत अछि वा नहि?मार्क्सवादी चिन्तन मे सर्वहाराक शत्रु-समुदाय आ क्रांति-पथ मे बाधक तत्व कें सेहो चिन्हित कएल गेल अछि।ई देखब आवश्यक जे अग्निहस्ताक्षर सेहो ओहि शत्रु-दल कें चिन्हलनि अछि की नहि, अग्निलेखनक लक्ष्य-वेधक वृत्त मे ओ शत्रु-दल आएल अछि वा नहि आ ओकरा पर समधानल प्रहार भेल अछि वा नहि?
अर्जुनक आंखि,माछक आंखि आ निशाना
भारतीय परिपेक्ष्य मे सर्वहाराक सर्वाधिक प्रबल शत्रु अछि—उपनिवेशवाद। एहन शत्रु जे मायावी अछि,मायाक बलें अपन रूप बदलि लैत अछि,माया पसारि लोक-डीठ कें भ्रमित कए सकैत अछि,मायाजाल सं अपन बहुरूप कें मनोवांछित विस्तार दए सकैत अछि आ निरन्तर शोषण करितहु पीड़ित कें शोषणक कनिकहु टा आभास नहि हुअए दैत अछि।उनटे पीड़ित कें अपन शोषण एकटा प्रभु-कृपाक आनन्ददायी रूप बुझाइत रहैत अछि।
अपन वर्तमान राजनीतिक,आर्थिक आ सांस्कृतिक निर्मिति पर सर्वहारा-प्रतिबद्धताक संग दृष्टिपात करी त एहिपर औपनिवेशिकताक घातक प्रहारक स्पष्ट निशानसभ देखाइ पड़त।दृष्टिक स्पष्टता हुअए त एकर बाह्य आ आन्तरिक घावसभ ठाम-ठाम उपस्थित देखाइत अछि आ हमरासभक मूंह दूसि रहल अछि।इएह ‘घवाह निर्मिति’ आइ अपनसभक राष्ट्र-समाजक निर्णायक आ भाग्यविधाता बनल अछि।प्रकट रूप मे ई ब्रिटिश उपनिवेशक करतूत बुझाइत अछि आ बहुलांश मे ई सत्य सेहो अछि।मानल जाइत अछि जे ई देश जन्म-जन्मान्तर तक ब्रिटिश उपनिवेश बनल रहए,ताहि लेल अंग्रेजसभ एहि देश पर तीन चीज आरोपित कएलक—ब्रिटिश पार्लियामेन्टक नकलबला भारतीय लोकतंत्र,ब्रिटिश नौकरशाहीक प्रतिरूप घटिया शासनतंत्र आ तेसर फोंकाएल औद्योगिक सभ्यता। चाही त चारिम तत्त्वक रूप मे मैकालेक शिक्षा-पद्धति कें सेहो राखि सकए छी। अंग्रेजसभक ई प्रयत्न एतेक अप्रत्यक्ष आ सूक्ष्म रहल अछि जे एकरा पकड़ब कठिन।एकरा चिन्हबा मे संकट ई छै जे औपनिवेशिक मंशा कें आधुनिक सभ्यताक अर्थक अढ मे झांपि देल गेल अछि। एकर व्यवहार उपर सं अतिशय सुधारवादी, लोकतंत्रात्मक आ प्रगतिशील रहल अछि।एकर सम्पूर्ण दमन-लूट-शोषणक तंत्र खूब महीन आ अप्रत्यक्ष रहल अछि। भारतीय बुद्धिवादक संकट ई छै जे एकरा थोड़-बहुत बुझितहु,एकर कम-बेसी विरोध करितहु ओ एकरा प्रति आकर्षित सेहो छै।स्वाभाविक छै जे चाहे हमरासभक लेखन हुअए,चाहे हमरासभक राजनीतिक दल हुअए,चाहे हमरासभक विभिन्न शासन-सत्ता हुअए,सभ एहि ब्रिटिश औपनिवेशिकताक अधीन विकसित भेल अछि आ हमसभ एकरहि प्रभाव मे यांत्रिक रूप सं प्रत्येक क्षेत्र मे क्रांतिकारी भेल छी।किन्तु ई सभ त एम्हर दू-चारि सौ वर्षक खेरहा अछि।
हजार-हजार वर्ष सं भारतीय राष्ट्र-समाज एहि ब्रिटिश औपनिवेशिकता सं बेसी भयंकर,बेसी घातक,बेसी जहरी औपनिवेशिकताक दंश सं पीड़ित रहल अछि।समकालीन भारतहु मे पुरातन भारतक औपनिवेशिकताक रक्तजीवी तत्त्व आइअहु कतेको धूल-धुसरित परत,गली-कोनटा,दीमकक भोज्य-अधभोज्य बनल पोथीसभ,बीहड़ जंगल-पहाड़ आ भुतिआएल-अनचिन्हार भेल खण्डहरसभ मे त अचेत-अवचेत अवस्था मे उपस्थित त अछिए, विरासतक स्वघोषित ठीकेदार बनल पण्डा,महन्थ,सन्तादिक पौरोहित्य-प्रवचन आदि मे खूब सचेत भेल हुंकार भरि रहल अछि।ई पुरोहिति उपनिवेश हजारक हजार वर्ष तक अपन घातकता सं जे कएलक से कएलक, ब्रिटिश उपनिवेशवादक संग नत्थी भए कए ई औरहु ज्ञानघातक भए गेल अछि।स्वतंत्रता आ संविधान-प्रदत्त अवसरक प्रभाव सं अधिकार-चेतनाक जे सुगबुगी-छटपटी-कछमछी अजुका सर्वहारा-समुदायक बीच जागल अछि,ताहि सं चौकन्ना भए उपनिवेशवादी तत्त्वक ई मिश्रित अभिजात्य-मानस नव-नव खटराग लए कए मंचस्थ भए रहल अछि।‘तिरहुता’क ‘मैथिली’ नामकरण मे सफलता पाबि आब एकरा संग ‘मिथिला-मैथिल’क प्रपंचत्रयी रचि साहित्य-संस्कृतिक मंचसभ पर मैथिल ब्राह्मणक जातीय आ अणुष्ठानिक परिधान ‘पाग’ कें मिथकीय मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक कहि जे तमाशा ठाढ कएल जाए रहल अछि,से यजमानी उपनिवेशक डोरी ढील भेलाक बाद एहि क्षेत्र-विशेष (कोलकाता मे बसए सं पहिने आलोच्य कवि सेहो एहि क्षेत्रक रहवासी रहथि) कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक नवका उपक्रम अछि।ई पौरोहित्य-परम्परा जाति-वर्ण-धर्मक नाम पर मनुष्य-मनुष्य मे विभेद करबाक ,स्वयं कें उच्च आ आन कें नीच मानबाक मानसिकता कें पसारबाक अपराधी रहल अछि आ एकरा अपन भरण-पोषणक माध्यम बनएने रहल अछि।इएह पुरोहिती-उपनिवेशवादक परिणाम अछि जे ई राष्ट्र-समाज,एतहुका लोक-वेद कहियो एकजुट भए कए आततायी राजवंशसभक,विदेशी आक्रांतासभक विरुद्ध लामबन्द नहि भेल आ जं कहियो एकजुटताक प्रारम्भिक चरण अएबहु कएल त अगिला चरण मे एहि विभेदकारी तत्त्वक कुप्रभाव मे छिन्न-भिन्न भए गेल।
मार्क्सवाद वैश्विकताक पैरोकार अछि,किन्तु अपन मौलिक सोच मे क्षेत्रवादक घोर विरोधी अछि।एकर मानब छै जे क्षेत्रीयताक आग्रह सं सर्वहाराक एकजुटता खण्डित होइत अछि आ ई साम्यवादी राष्ट्रक निर्माण मे बाधक होइत अछि। क्षेत्रीयतावाद साम्राज्यवादक ओ हथियार अछि जे सामन्तवाद,राजतंत्रवाद आदिक रूप मे परिवर्तन, आधुनिकता,वैश्विक भाइचाराक धुर विरोधी होइत अछि,यथास्थितिक पोषक होइत अछि, अतीतोन्मुख होइत अछि,भविष्य-दृष्टि कें बाधित करैत अछि,चरित्र मे बूर्ज्वा होइत अछि आ सर्वहाराक गुलामीक मूल कारक होइत अछि।कोनो देशक कम्युनिष्ट क्रांति राष्ट्रनिर्माणहि लेल भेल अछि आ एहि मे राष्ट्रक प्रति घृणा,ओकर विखण्डनक कामना आ क्षेत्रीय राज बनैबाक लिलसा कतहु नहि देखाएल अछि।भारतक प्रगतिशील-जनवादी कविताक कविलोकनि लेल, पेरेस्त्रोइका आ ग्लास्नोस्तक परिणामस्वरूप विघटनक नियति कें प्राप्त होइ सं पहिने तक,प्रिय यूटोपिया रहल सोवियत संघ एकर ठोस प्रमाण अछि।
ओना संज्ञा जे रहओ,उपनिवेशवाद,पुरोहितवाद,पुंजीवाद,सामन्तवाद सभ एकहि सिक्काक विभिन्न पहलू अछि, अपन मूल मे सर्वहाराक शत्रु अछि आ जातिवाद,सम्प्रदायवाद आ क्षेत्रीयतावाद आदि एकरहि बाइ-प्रोडक्ट अछि।
ओह,कलकत्ता !
[एतय आबि अकस्मात रामलोचन जीक 12 फरवरी,2021क भोर मे बिना केकरहु किछु कहनहि अपन घर सं बहराए जएबाक आ व्यक्तिगत,सामुहिक आ प्रशासनिक स्तर पर समग्र प्रयासक बादहु हुनक कोनो सूचना नहि भेटबाक स्तब्धकारी सूचना भेटैत अछि। कलम आ लिखबाक आवेग दुनू ठमकि जाइत अछि,आगू बढए सं नठि जाइत अछि। आ ई आलेख रामलोचन जीक जीवनहि जकां …………….]
कलकत्ता !
जेकरा समक्ष बम्बई कें पिछड़ल शहर मानल जाइत रहए।
जे औषधि आ कपड़ाक अखिल भारतीय केन्द्र रहए।
जेतय आजादीक बाद भारतक शीर्ष कम्पनीसभक,मल्टीनेशनल कम्पनीसभक मुख्यालय रहए।
जेकर एयरपोर्ट सं भारतक समस्त एयरपोर्टक सम्मिलित उड़ान सं बेसी उड़ान होइत रहए।
जे एकटा अति-समृद्ध सांस्कृतिक विरासतक केन्द्र रहए आ विभिन्न संस्कृतिक समावेशी सेहो।
जेतय वामपंथी शासन अएलाक बाद सभटा उद्योग खण्ड-विखण्ड भए गेलए आ विभिन्न उद्योग कें ओतए सं अपन कारबार समेटए पड़ि गेलए।
जेतय हड़ताल सामान्य बात रहए आ अक्सरहां ई हिंसक रूप लए लैत रहए आ ताहि मे कतेकहु प्राण गेलए।
जेतय सं धीरे-धीरे राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनीसभ भागल,बौद्धिक आ कलाकार भागला आ साम्यवादी राजनीतिक क्रियात्मक रूप कतेक भयावह होइ छै,तेकर ओ प्रदर्श भेल।
जे वर्ष 2001 मे कलकत्ता सं कोलकाता भेल।
ताहि कलकत्ता कें कलकत्ता मे प्राय: पांच दशक बितैनिहार कवि रामलोचन ठाकुर एकाध ठाम बीध छोड़ि अपन रचनासभ मे कोनो मोजर नहि देलनि।
की हुनका ई बूझल रहनि जे ई कलकत्ता हुनक अज्ञात-यात्राक प्रस्थान-बिन्दू हएत?
(अपूर्ण)
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आमोद झा- संपर्क- 9433100407
“सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान ’’
मैथिली भाषा साहित्य ओ संस्कृतिक दृष्टिसँ सामाजिक भाव विकास कयनिहार, निरंतर मानव- जीवन मूल्यक आदर्श पर अग्रसर सामान्यतया यात्रीक समान धर्मा रचनाकार, ठेंठ शब्दक ठाठ कोमल उपयोग कयनिहार, काव्य बानाक अक्षर शिल्पी, श्रृजनात्मक साहित्यकेँ अभिव्यक्ति देनिहार, मनुष्य जीवनक कुत्सित मनोवेग के चिंतन आ व्यवहारमे वैयक्तिक चरित्रक निर्माणकेँ उजागर कयनिहारक नाम छनि बाबूपाली जिला मधुबनीक कोलकाता बासी श्री रामलोचन ठाकुर । आदरणीय ठाकुर जीक प्रसंगे आदरणीय विद्वान नवीन बाबू लिखैत छथि जे “ रामलोचन बाबूक काव्यमे निराशाक बिरड़ोमे आशाक नव आलोकक संधान कठिन, से मुदा हिनक काव्यमे भटैत अछि ”। एतद् कविक रचनामे कारुणिक मन:स्थितिमे नव कवितामे जे विद्रोह तकर बानगी पोथी नामे लिखल रचना शीर्षक “ लाख प्रश्न अनुतरित “मे अनुभव करी हम चाहै छी हमर कविताक भाव कोटि कोटि शोषित पीड़ित मनुपुत्रक परितोष नहि, आक्रोशक उपादान हो मुक्ति संघर्षक प्रेरणा, शक्ति सरंजाम हो हम चाहैत छी - - -!
एतद् निराशाक बिरोड़ोमे आशाक नव आलोक संधान केनिहार मुक्ति संघर्षक कवि श्री रामलोचन बाबूक| पोथी “ लाख प्रश्न अनुतरित ’’ अपन पाठकीयताक भाव-विचार ओ समीक्षात्मक अभिव्यक्ति लिखि रहल छी। ताहि प्रसंगे कही प्रस्तुत पोथीमे छोट पैघ कुल 48 गोट रचनाक दूरी कुल एक सय पेजक मध्य असीम शक्तिक संग नव निर्माणक ओ जागरूकताक संग प्रतिष्ठापन भेल अछि। सुधि पाठक कवि रामलोचन ठाकुर जीक हृदयमे वर्तमान परिवेशमे धन-पद-लोलुप प्रवंचक चाटुकार,ब्यवस्थाक प्रति अनास्था असंतोषक मोनमे हिलकोर मारैत छनि आ बनि जाइत छथि ब्यवस्थाक प्रति विद्रोही कवि । से देखू अपन बहीन तक के व्यवस्थाक प्रति अपन दायित्वक निर्वहण करैत “बहीनदाइक नाम एगो चिठ्टी”मे :
“कथमपि उचित नै कानब/ वरन चिन्हब अपन शक्ति आ बाहरोक शब्द के अकानब - - - आ एगो प्रण ठानब तs कालि - - - आगामी कालि हमरो एगो परिचय रहत बिरदानक हम हमर विरदावन”
कवि कुत्सित मनोवेग आ निराशाकमेघ जे आच्छादित तकरा आशान्वित करबाक धारणा छनि । आम जनकेँ अपन शक्तिसँ परिचय करायब आ अपन उदात भावमे अपन अतीत ओ सामाजिक व्यवस्थाक जे अतीत गौरव के निर्मित करब कवि अपन अभीष्ट सेहो रखैत छथि। अध्ययन कहैत अछि जे समालोचना शास्त्रक अंतर्गत समीक्षामे यथासाध्य सर्वांगीन परिचय प्रस्तुत करब आवश्यक मुदा से भs जाइत अछि व्यक्तिगत दकियानूसी विचार, इएह जे मैथिली साहित्यक समालोचना ओ समीक्षाक स्तर शनै:-शनै: समाप्तक कागारपर छैक परिणाम सृजनशील साहित्यक बेस कमी भेल जा रहल अछि । पाठकक कमी साहित्यक मनीषी लोकनि विमर्श कs रहला अछि, “ लाख प्रश्न अनुतरित” मध्य प्रत्येक रचना प्राय: स्व के चिन्हबाक प्रेरणा आ मिथिलाक संस्कृतिक चेतना आ समाज उत्थानक दर्शन करबैत अछि। मातृभूमिक स्वरूपक स्नेह जगबैत अछि ।कवि भोगल यथार्थ आ युग परिस्थितिक ढकफेरीसँ उत्पन्न अविश्वास - अनास्था-अकुलाहटिसँ अपन अग्रज कवि जीवकांतक समीप जा आशाक संचार होइत शीर्षक “ वसंत गीतक मादे”मे:
"आउ ने हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी -----आइ ने काल्हि एहिमे होएतैक नव पल्लव रंग बिरंगक फूल"
एतद काव्यकार सदैव साकांक्ष अपन शास्त्रीय काव्यक आंतरिकमे बसल सूक्ष्म भाव जे मुद्रित होइछ से पाठकक हृदय के गद-गद कs जाइत अछि। सहजातावादक प्रणेता सोमदेवसँ प्रभावित काव्य बानाक रूप लैत “ अपन समाचार “ शीर्षकमे मानवीय दुर्बलता ओ दृढताक समन्वित भाव भेंट-घाँट क्रमें अपन निजत्वक झलकैत स्नेह "हमरो एकटा गाम छल" गामक प्रति अगाध स्नेह, गामक सरलता भरल जीवनमे सोहर आ समदाउनक अतिरेक कविक मोन अपन गामेमे बसल रहैत छनि, ओना विद्वान नवीन बाबू के मैथिली कविता पर नॉस्टेलजियाक गंध अबैत रहै छनि, मुदा वर्तमानमे मैथिली कविताक स्वरूप बदलि रहल छैक। स्वतंत्रताक मानवीय शोषण आ गरीबीक पराभव आ गुनधुनियोमे गामक लोक श्रद्धा-स्नेहक बीच मस्त रहैत अछि। चरित्र निर्माणक भावमे कवि “ एक फॉक अन्हार : एक फॉक इजोत"मे गाम आ शहरक बीच अंतर के स्पष्ट करैत, समालोचनाक मादे जयधारी बाबू लिखैत छथि जे मनोवैज्ञानिक अपनत्व जखन रहि जाइत छैक तखन मानसिक शक्ति पर कलमक जोर मारैत छैक, तकरे फल कविक “ मैथिली – मंदिरमे दीप लेसैत” रचनामे आरसी प्रसाद सिंह जीक, “फूल जी पूजाक आनल पॉतीमे अपन भाव दीप जराय स्वगत स्नेह दर्शा रहलाह अछि । “शब्द” शीर्षकमे शब्द ब्रम्ह साधनामे लीन मानू कवि निज चिंतक भावमे सामान्य जन जीवनक कल्याणक कामना, ओना सब ठीके रहैक शीर्षकमे कवि भाव यतिक समरूपतामे ठाकुर जीक मुखर वाक्यांश जे हिनक विशिष्टता अछि। कविक रचना मानू कवियेक पाँती मादे कविक “कीर्ति चमकैत चान-पुनिमक” अमर कीर्ति भावोद्रेक भेल अछि । कही तँ समालोचना शास्त्रमे साहित्यमे एकरा कलात्मक अभिव्यक्ति मानल जाइछ। कविक रचनामे नित नवीन प्रयोगसँ कवि रामलोचन बाबू अर्थानुसंधाता मात्र नहि अपितु काव्य जगतक संस्पर्श अनुभूति संड़्गाता बनि जाइत छथि। मैथिली काव्य जगतक बहुआयामी कवि “ओना सब किछु ठीक रहैक”।मे थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली'क बौद्धिकता ओ चिंतनपूर्ण सत्यता पर आधारित कीर्ति छनि। कविक प्रत्येक सृजन क्षेत्रीय संस्कारसँ उपर उठल संवेदनाक गहनता पर आधारित अछि। श्रद्धांजलि नहि दs पाएबमे लिखै छथि:
"अल्ला ईश्वर तेरो नाम सस्वर गाओल जा रहल आ बढले जा रहल दिनानुदिन अल्ला ईश्वरक बीच व्यवधान "
एतद् पोथीक नेल्सन- मंडेला आदिक भाव कमोवेश एक्कहि सजगता संग आत्म निर्वासन भावसँ तँ “ नीक नहि कयल अहॉ” शीर्षकमे बंगला साहित्यक मर्मज्ञ कवि शक्ति चट्टोपाध्यायक अवसानक व्यथामे अपन
विशाल हृदयक आशय Oh dissection calendar भावक परिचय, 15 अगस्तमे रजनीतिक गिरावट संज्ञाहीन नेताक परिचय तँ एना नहि बुझाइए देशराग आ धरती प्रतिकार करैछ शीर्षकमे यथार्थवादी कवि यदुनाथ झा “यदुवरक” समीप अनैत छनि । कविक अपन भाषा साहित्यक प्रति असीम स्नेह आ अनुराग देखैत यदुवर जीक भावमे भाव “मातृभाषा आ मातृभूमि एके सम सेवथि। विवुद्ध त्यागथि अधम मलीन ।आशय ठाकुर जीक रचना परिधि अत्यंत विस्तृत इएह जे हिनक काव्य इन्फ्लूएन्स वर्तमान हिनक समकालीन कविक भीड़सँ फराक आनि ठाढ करैत छनि। वर्तमानमे अद्य पतन पर कतेक व्यथानुभूति भरल रचनाक बानगी:-
"महामान्य अदालत । ओना कहबा लय बहुत किछु अछि हमरा लग मानवताक आदिसँ अद्यपर्यन्त किन्तु सीताराम कह - - - आत्माराम रटाओल पिजड़ामे बंद पाखीक- - -!"
उपर्युक्त रचना आदिमे कवि गुणीभूति ब्यंगकार कविक रूपे
“ ओहि दिन उगल नाञिं छल सूर्य” मे आंतरिक अंतर्विरोध अतीतक गुलामीक मानसिकतासँ मुक्ति संघर्षक संदर्भ,विकट द्वन्दसँ साक्षात्कार करबैत कवि के मनन करू:- नञिं कथमपि नञिं - - - - -वर्तमान स्वरमे बाजि उठल अतीत विप्लव की होइ छै बाबा ? कविक काव्यधारा एकटा प्रवाह अछि । अत्याधुनिक अकविताक प्रवाहमे कतेक यथार्थवादी मर्मस्पर्शी शहर शामियानामे अनुभव करी: कियो न्यायिक जाँच कऽ कियो स्मारक निर्माणक आ बात एतेक दूर तक गेलैक -- - - -गोली धरि चलि गेलैक ।परिस्थितिक भयंकरतासँ क्षुब्द कवि, देश आ समाजक उलझल समस्या के निदान तकैत दिशा लक्षित करैत “भगवान तथागत” शीर्षकमे बुद्धक मार्ग के आवलंम्बन करैत छथि । साहित्यमे कविक शील्प शैली जीवन्तताक प्रतीक मनुख आ ईश्वर शीर्षकमे समाजसँ आलोपित होइत मनुख माने मनुखता जाहिसँ चिंतित लिखैत छथि :
"मनुक्ख नहि रहल रहि गेल किछु हिन्दू - - - मुसलमान - - - सिख - - - क्रिस्तान"
कवि सदैव समाजक बीच कटु सत्य के उजागर करैत शासन आ व्यवस्था पर कड़गर चोट करैत छथि । काव्यमे व्यंग्यक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि गाम कोतवाल शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति उक्ति जतहि कोतवाल चोरक ततहि उपद्रव, तहिना महाश्मशानमे कवि सबहक अछैत जीवाक लिलसामे श्मशानमे बसल अछि: जीवाक लिलसामे पल-पल मरैत पल - घड़ी – दिन – गनैत लोकमानवीय संवेदनाक अपूर्व मिसरी घोरल काव्य सृजन,’क भावमे भीड़सँ बाहर करैत छनि एतद् रचनाक मादे सिद्ध होइछ कवि अपन समकालीन कविसँ अत्यंत संवेदित छथि। अपन उदात् भाव ओ समभावमे “ अहाँ आ हम “ शीर्षकमे अपूर्व शब्द संधान करैत कवि हमरा मोन पड़ैत छथि सर्वमान्य आधुनिक कवि राम कृष्ण संग राजकमल जे कहलनि “ समय एकटा साँप “ कहलनि “सद्य: अनुभव करी: क्रोनिएक घूस खा मैच हारब थोरेक पाइपर बिका जाइछ समाचारसे नहि बनैछ समाचार चिंता जुनि करी - - -!
अस्तु कवि अपन अग्रज कवि सबहिक सदैव अनुज भावमे पाठक पबैत छनि जकर प्रभाव पाठक हुनक रचनामे स्पष्ट छाप देखैत अछि ख्यातिनामा कवि जीवकांत “ नाचू हे पृथ्वी “ वेद पुराण पर समसायिक विषमताक प्रभाव तहिना ठाकुर जीक रचनामे भेटैत अछि ।“ संवाद “ शीर्षकमे “ अग्निपुष्पक “ पत्र पाबि
कतेक आह्लादित छथि से देखू : "सहस्त्रबाहुक अभियानक शंखनाद थिक “संवाद” भाइ !मैथिली काव्यक नवताक पक्षधर कवि अपन रचना बसात, कौआ,मैना शीर्षकमे पारंपरिक दलान खसैत आ केबिन के गेट खुजैत, भाव बोधमे आधुनिक परिवेशक भयंकरतासँ सेहो चिंतित छथि । यथा टीड़ी शीर्षकमे नेता रूपी टीड़ी समाजिक भाव व्यवहार के चाटि जाइत अछि , नव रचना मादे भाइ कुलानन्द मिश्र केँ संबोधित करैत लिखै छथि जे युगक धुआँमे लोक औनायल जकाँ, बुझू कवि नव तूरके एवाक आह्वान करैत , सोना आब नम्हर भs गेलैए शीर्षकमे जीवनक मार्गदर्शन कs रहला अछि। दिन एखनो बहुत बाँकी छै मे कवि कोनो धीरोदात वा धीरप्रशांत दैव गुण संम्पन्न नायक'क व्यंजना नहि अपितु ओ मनुक्ख जे अपन जन्म लग्नहिसँ संघर्षरत अन्हारक विरूद्ध कवि सदैव आगू बढ़बाक लेल प्रेरित करैत छथि । उनटा बसात शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति शैलीमे कतेको समस्याक समाधान ओ जगजियार कयलनि करैत छथि । छोट-छोट सृजनमे तिस्ता नदीक समस्या, सिक्किम ओ गेंगटोक आदि-आदि स्थानक वर्णन आदिक संग किछु पाश्चत्य शैलीक हाइकू जे भारतीय काव्य परंपरामे प्रचलित किछु सृजनमे अपन भाव अभिव्यक्ति खूब सुतरलनि अछि ।यथा: इहो बर्ख ओहिना बीति गेल बूढ अथबल सूर्य बस गैरेजक पछुआरमे डूबि गेल ।
एतद् “लाख प्रश्न अनुतरित” पोथीक अध्ययन - मनन – विश्लेशणसँ स्पष्ट अछि जे ठाकुर जीक काव्य परिधि विस्तारमे युग जीवनक गौरवगाथा संग प्राकृतिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक समसायिकताक उत्कर्ष - अपकर्ष संग साहित्य समाज महापुरूष संग व सामाजिक ब्यवस्था पर सौंदर्य चेतनामे लक्षणा व्यंजना अप्रस्तुत विधान सांकेतिक भाव करूण विवशता सामाजिक अंतर्विरोध द्वंदात्मक उन्मेष,वर्ग चेतनाक स्वरूप अशिक्षा-अविश्वास भुखमरी भ्रष्टाचार, चाटुकारिता,सँ टुटैत सामाजिक व्यवस्था पर कविक पाँति मोन पड़ैत अछि: आ एगो दीर्घ निसास छोड़ैत बाजल रामलाल बौआ ! एहि अस्सी बर्खक बयसमे हम तs खाली बेरबादिए देखैत आयल छी बौआ !उपर्यक्त पाँतीक संग कविक लाख प्रश्न अनुतरित रहैत छनि जे पोथीक नामके सार्थक ओ समीचीन सिद्ध करैत छनि।
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