विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

एकटा खाँटी मैथिल: रामलोचन ठाकुर आ हुनकर काव्य संसार

शैलेन्द्र मिश्र · 2021-04-01 · अंक 319

शैलेंद्र मिश्र-संपर्क-7600744801
एकटा खाँटी मैथिल:रामलोचन ठाकुर आ हुनकर काव्यसंसार
आदरणीय रामलोचन ठाकुर मिथिला मैथिली मध्य एकटा ध्रुवतारा बनि चमकि रहल छथि ई कहबामे हमरा असोकर्ज नै भऽ रहल अछि किएक तँ भाषाक प्रति समर्पणता ओ त्याग बिरले व्यक्तिमे भेटत। ई कलकत्तामे मिथिला-मैथिलीक पर्याय बनि एकटा खाम्हक रूपमे विद्यमान छथि आ अपनासँ कनिष्ठ पीढ़ीक कतेको साहित्यकारकेँ साहित्य-साँचामे गढ़लथि। अपन बात–विचार स्पष्ट रूपसँ रखैत रहलाह अछि। एकटा विरल मैथिली आंदोलनकर्ता, कवि, गद्य लेखक, समालोचक, कुशल संपादक, नाटककार, निर्देशक ,रंगकर्मी ओ सफल अनुवादकक रूपमे प्रख्यात छथि। हुनकर रचना संसार ततेक विशाल छनि जे सम्पूर्ण कृतित्वकेँ एकटा लेखमे समेटनाइ कठिन अछि। अइ लेखमे हम हुनकर मात्र काव्य यात्रापर केंद्रित करब। हिनकर राजनीतिक विचार मार्क्सवादी –बामपंथी रहलनि आ हिनकर कविता सभमे सेहो मार्क्सवादक सौन्दर्य-शास्त्रक उदाहरण भेटैत अछि। लेकिन सिर्फ ककरो राजनीतिक विचारधाराकेँ केंद्रभूमिमे राखि कऽ मूल्यांकन केनाइ निश्चित रूपसँ त्रुटिपूर्ण साबित हएत किएक तँ अइ बातपर सबमे सहमति छै जे कोनो रचनाकार तखने पैघ बनैत छथि जखन ओ अपन विचारधाराकेँ अतिक्रमण करैत अछि।हिंदी साहित्यमे भक्तिकालक एकर उदाहरण अछि जायसी तँ आधुनिक कालमे मुक्तिबोध। सूफी मतवादक अतिक्रमण कइए कऽ जायसी पद्मावत सन श्रेष्ठ रचना लिख सकलाह तँ मुक्तिबोध मार्क्सवादी विचारधाराक अतिक्रमण कऽ सफल भेलाह। आलोचनामे एकटा प्रवृत्ति हावी रहलैए जे रचनाकारकेँ व्यक्तिगत राजनैतिक विचारधाराक आधारपर मूल्यांकन केनाइ लेकिन हमर कोशिश अछि जे रामलोचन जीके रचनाकेँ केंद्रमे राखि अपन विचार प्रस्तुत कऽ सकी। तखन ईहो बात सत्य अछि जे हुनकर कविता-संग्रहक अध्ययन केलाक बाद एकटा गीत स्वतः मोन पड़ि गेल –‘दुखहि जनम भेल, दुखहि गमाओल’ निराशा ,कष्ट ओ संघर्ष आदरणीय रामलोचन ठाकुर के कविताक केन्द्रीय भाव छै। जेना भगवान बुद्ध कहने छथिन –‘संसारमे दुःख छै’ लेकिन ओ दुःखक समाधान सेहो देने छथिन। ठाकुरजीक कवितामे दुःख तँ छै लेकिन समाधान नै छै। ई चिकित्सक जकाँ समाजक रोगकेँ उजागर करैत छथिन,ईहो गप्प सत्य जे कवि समाधान देबे करथि से आवश्यक नै।
रामलोचन ठाकुर जीक रचना संसारमे सब तत्व विद्यमान अछि काव्यक सब रस भेटैत अछि , सर्वगुण सम्पन्न हुनकर विद्वता ओ गहराइ के साधारण चश्मासँ किन्नहु नै देखल जा सकैत छै। हुनकर काव्य-यात्रा
एकटा मानव जीवन सन उभर –खाभर ओ वैविधतापूर्ण छनि। अपन कविता सबमे सब बात फरीछ कऽ कऽ रखने छथि। आदरणीय ठाकुरजीक व्यक्तित्व ओ कृतित्वमे बेसी अंतर नै छै। जएह हुनकर जीवन सएह हुनकर रचना संसार। हुनकर तेवर अप्पन पहिलुके कवितासँग्रह ‘इतिहासहंता’मे देखल जा सकैत अछि जतऽ ओ मिथिला मैथिली के अस्मिताक नामपर चलि रहल खेल के अस्वीकार कऽ दैत छथि बहुत रास बिम्बक माध्यमसँ अप्पन गप रखने छथि। जखन ओ अपन पहिलुके कविता ‘मैथिली’मे कहैत छथि “मैथिली कें बनसँ नै /नैहरेसँ /बलजोरी घिसियबैत /ल गेल छला राक्षस-राज /आ औखन रखने छनि /अशोक बाटिका मे/शोकाकुल मैथिली जतय /कुहरि –कुहरि /अपन जीवनक अंतिम क्षणक /प्रतीक्षा क रहल छथि /की करती बेचारी /विदेह बाप पहीनहिं देह त्यागि चुकल छथिन /राम छथिन नपुंशक /आ /हुनकेसँ जनमल /लव आ कुश की वीर पुरुष हेथिन”।ई पढलाक बाद कविक प्रति आक्रोश स्वाभाविक छै किएक तँ राम भारतीय सांस्कृतिक एकटा उत्कर्ष पुरुख भेल छलथि आ हुनका ‘नपुंसक’ कहनाइ बहुत खेदक गप्प भेल। लेकिन उपरोक्त कविताकेँ कएक टा तह छै सतही स्तरपर जतय एकटा साधारण मैथिलक पीड़ा ओ आक्रोश नजरि परिलक्षित होइ छै किएक तँ सीता संग भेल दुर्व्यवहारक कारणे रामकेँ लोक कथा कहनाइ ,गारि पढ़नाइ एकटा स्वाभाविक प्रतिक्रिया छै। मैथिल संस्कृतिमे जमाए ओ ओकर सासुरक लोककेँ हास्य-परिहास केनाइ कोनो नब गप्प नै। तँइ कहल जा सकैए जे ओ आवेशमे आबि एकटा सीमाकेँ तोड़ि आगू बढ़ि गेल छथि ,परंच ओ नैहर पक्ष ओ मिथिलाक लोक के सेहो नै छोड़लखिन। लेकिन यदि दोसर तहकेँ देखल जाए तँ ओ मैथिली भाषाक मादे सेहो बहुत किछु कहि देने छथि जे एखनो प्रासंगिक अछि लगभग 40 वर्ष पूर्व जे मैथिली भाषाक दुर्दशा छल वएह एखनो अछि अष्टम सूचीमे शामिल भेलाक बादो कतेको विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे शामिल भेलाक बादो खाली मंच ,पाग दोपटा ओ विद्यापति पर्व-समारोहक भाषा बनि कऽ रहि गेल अछि। कतेक विश्वविद्यालयमे विद्यार्थीक अभावमे मैथिली विभाग बंद भऽ गेल तँ कतेको ठाम बंद होमए के कगारपर अछि। ‘नैहर’ के मतलब एतय राज्य राखि देल जे तैयो बहुत किछ फरीछ भऽ जाइ छै ,राज्यमे मैथिली के कोनो सम्मान नै ,ओइसँ बेसी त दोसर राज्य जेना झारखंड /दिल्लीमे बेसी छै।
हुनका सन मातृभाषा प्रेमी ओ युगपुरुष मैथिली भाषा साहित्यमे कम्मे भेटत किएक तँ ओ मिथिलाके भूगोल,सांस्कृतिक परिदृश्य, आर्थिक-सामाजिक परिदृश्यसँ पूर्ण रुपें परिचित छथि। ओ गन्हाइत व्यवस्थाक प्रतिवाद करैत छथि। ‘नाटक ,निर्देशक आ एक गोट कविता’ शीर्षक कवितामे माध्यमसँ कटु सत के जगजियार करैत छथि –‘जखन मंच से उतरैए /कुनु एक कलाकार /दर्शक दीर्घा से ल जाइए /एगो युवती कें /प्रतिवादी भाईक हत्याक पश्चात /मंचपर कएल जाइए ओकरासँग /सामूहिक बलात्कार /अभिनय के नामपर /तैयो शांत –एकदम चुप्पी आ /आन्दोलनमत्त भेल अभिनेता सब /क रहलए गरंथिया नाच’। अइ कविताक माध्यमसँ रामलोचन ठाकुर बहुत किछु बात कहि दैत छथि ,ई कोनो मैथिले समाज नै अपितु अभिनयक नामपर व्याप्त स्त्रीक शोषण, फूहड़ता ओ लोकक असंवेदनशीलताकेँ प्रकट केने छथि। आइयो दृश्य-परिदृश्य वएह छै अइमे कोनो बदलाबक कल्पना केनाइ संभव नै छै।
अग्रजक नाम शीर्षक कविता –केहन लागत अहाँके /जे भनसाघर कुनू /कसाइ खाना-कम किचेन –कम रेस्टोरेंट /बनि गेल हो ,आ /अहाँक अनुजक ससड़ी काटल खलड़ी ओदारल /देह झुलैत हो पछुअतिमे /ओकर टटका मांसक कबाब, आ /टटका रक्तक शराब बेचल जाइत हो। ओ एकटा जनवादी-प्रगतिवादी कवि के रूपमे आमजनक व्यथा–कथाकेँ निष्पक्ष आ बिना कोनो लाइ–लपटाइ के राखि दैत छथि। ओ मार्क्सवादक प्रभावमे छलथि आ ‘इतिहासहंता’मे सबटा एहने –एहने क्रांतिकारी कविता सब के संकलन छै। लेकिन हिनकर मात्र एक गोट कविता-संग्रहकेँ पढ़ि कोनो टैग नै लगायल जा सकैए, लगभग 45 बरखक काव्य साधनामे बहुत रस ओ रंगक रचना केलथि। ओ सब तरहक रचना चाहे तुकांत हो वा अतुकांत ,सब तरहक रचना केलथि। हुनकर बादक कविता सभक विषय वस्तु सेहो भिन्न रहलनि। परंच ई बात सेहो सत्य जे हुनकर मूल विषय मिथिला ,मैथिली ओ मैथिले रहलनि। अपन दोसर कविता –संग्रह ‘देशक नाम छलै सोन चिड़ैया’ (अरुणोदय प्रकाशन,कलकत्ता 1986 ई)मे ‘सुच्चा मैथिल’ शीर्षक नामक कवितामे मैथिलक दुर्दशाक वर्णन केने छथि – आइ भारती /गुदड़ीसँ झपने अंग /दाबापर चिपड़ी पथैत छथि /हीरामनि सुग्गा /पहिलहि मरि चुकल अइ /आ /तीन दिनसँ अन्हार /तौनीसँ बन्हने अपन पेट /बैसल छथि /एकजनियाँ एकचारीमे /महापंडित मंडन मिश्र /स्वतः प्रणाम /परतः प्रणामम रटैत /जानि ने /कोन शंकराचार्यक /प्रतीक्षा छैन’। वस्तुतः मिथिला /मैथिल भूतकालमे जीबए बला छी ,अतीत कतबो सोहनगर किएक नै रहल हो, वर्तमानसँ बेसी सुन्नर नै भऽ सकैए। पुरातन संस्कार तखने बचि सकत जखन हम सब साकांछ भऽ अपना के आर्थिक ,सामाजिक ओ राजनीतिक दृष्टिसँ मजगुत रहब। उपरका कवितामे बहुत रास बिम्बक माध्यमसँ ओ सूतल लोककेँ फेरसँ जगेबाक प्रयास कऽ रहल छथि। रामलोचन ठाकुर मैथिली –मिथिलामे एकटा पुनर्जागरण चाहैत छथि।
मैथिलीक उपेक्षा ओ राजनीतिक –आर्थिक रूपे जानि बूझि कऽ पाछा रखनाइ के खेल सदतिसँ चलि आबि रहल अछि जकर कारण मैथिल स्वयं छथि। मिथिला राज्य आन्दोलनक नामपर सेहो बहुत किछ भेल बादमे जा कऽ भारतक संविधानक अष्टम सूचीमे शामिल तँ भेल लेकिन ओ वस्तुतः बहुत दिनक संघर्षक परिणाम छल। रामलोचन ठाकुर अपन कविताक मादे चेतौनी सेहो देने छलखिन जे मैथिली के जदि अपन हिस्साक उचित सम्मान नै देल जायत तँ ई आंदोलन भीषण रूप लऽ सकैए। भाषाक अस्मिता आंदोलन केहन –केहन देशकेँ तोड़ि देलकै आ रामलोचन ठाकुर अइ बातक उल्लेख कऽ मैथिली /मिथिलाक नामपर दोकान चलेनहार नेता ओ दलाल सबकेँ सतर्क करैत छथि।
आबहुँ तों चेत/ रे पटना के पंडा /रे डिल्लीक दलाल /हिंदीके पोसा कुकूर –शैतान /जुनि करबा /इतिहासक पुनरावृत्ति /सम्मुख ज्वालामुखी /बढ़ा जुनि डेग /सावधान /नहि तई मिथिला देश /बनत विश्व कें /दोसर बांग्लादेश /दोसर वियतनाम।
अग्नि पीढ़ीक कवि होमए कारणे जोशमे ओ कनि दूर चलि जाइ छथि बांग्लादेश ओ वियतनामकेँ मात्र एकटा संकेतक रूपमे लेबाक चाही किएक तँ हुनकर देशभक्ति ओ मिथिला भक्ति दूनु एक दोसर के पूरक छै हुनकर हुंकार तँ मात्र माँ मिथिलाक हेरायल स्वर्णकालक स्मृति दिअबैत छै। हुनका ई कनिको स्वीकार नै छनि जे ककरो फूसिक आश्वासनपर निर्भर रही ओ अपन अधिकार के माँगबामे नै बल्कि जरूरत पड़लापर छिनबामे सेहो विश्वास रखैत छथि।
रामलोचन ठाकुर सब तरहक प्रयोग सेहो केलथि अपन कवितामे कतेको तरहक ज्यामितीय आकृतिमे कविता सब लिखने छथि। एकटा और बात हिनकर रचना सबमे हमरा लागल जकरा व्यक्त करै के लेल एकटा अंग्रेजी शब्दक सहारा लेब ‘bravity’ अर्थात संक्षिप्तता। ओ शब्दक खर्चक प्रति बड्ड साकांक्ष रहलथि जतबी शब्दक खगता ओतबी शब्द खर्च केलथि। हिनकर कविता–संग्रह सभ सबटा पातर –पातर भेटत, कविता सब छोट ओ माँझिल आकारक लेकिन मारुख लौंगिया मिरचाइ सन। कोनो कवितामेसँ जँ एकटा शब्द निकालि देल जाए तँ ओ सर्वथा अपूर्ण लागत तहिना हिनकर कविता–संग्रह सब कोनो कविता के यदि छाँटल तँ संग्रह झुझुआन बुझि पड़त। यदि हिनकर बात किछु शब्दमे संप्रेषित भऽ जाइ छै तँइ अनेरो ओकरा दीर्घ नै बनबै छथि। किछु बात ई हाइकूमे सेहो कहने छथि जकर मारक –क्षमता किन्नहु कम नै छै। उदाहरण :- ईहो बर्ख /ओहिना बीति गेल/ बुढ़ अथबल सूर्य /बस गैरेजक /पछुआरमे डुबि गेल एवं लाहौर बस /कारगिलमे ध'स /बिजेपी बस (बर्खान्त, लाख प्रश्न अनुत्तरित, 2003)
अपूर्वा जे 1996 ईस्वीमे छपल कविता –संग्रह अछि ओइमे सबटा कविता सबमे रामलोचन ठाकुर जीक अलग रूप देखबामे अबैए। हमरा बुझने प्रत्येक मैथिली–मिथिलासँ प्रयोजन रखै व्यक्ति सबकेँ ई संग्रह पढ़बाक चाही यदि नै पढ़ि सकी तँ कमसँ कम शुरुआती पाँच टा कविता अवश्य पढैत। अहि कविता सभक पहिल विशेषता ई छै जे कविता सब तुकांत छै आ रामलोचन ठाकुरकेँ वामपंथी चश्मासँ देखनाहर लोक सब के लेल निराश करतनि। रामलोचन ठाकुरक विराट व्यक्तित्वक दर्शन होइत छै। ओ मैथिली–मिथिलाक निधि एवं हुनकर कृतित्व सबकेँ प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत भावुक करैत छथि संगे समकालीन ओ कनिष्ठ पीढ़ीक लेल प्रशंसाक शब्द रखैत छथि। किछु पंक्ति सभ नीचा देल गेल अछि :-
धीरेश्वर धीरेन्द्र बनि धयल जनकपुर धाम। ठुमकि बहथु कमला भने ओ नहि घुरता गाम।।
माया मायानंद के पाथर बनले मोम। गीजि गीत गीतल बनल भांगक लोटा होम।।
पाथर जे पसिझैत अछि देखु कबिलपुर जाय। रामदेव कविएल छथि अजगुत कहल न जाए।।
गुंजन नहिं गंगेश ओ आइ भोर के आश। नाम उचितवक्ता हिनक लोक सुनु नवभास।।
बुद्धिनाथ मिश्रक सकल रचना अर्थ प्रधान। हिंदीमे तें गवै छथि सोहर आ समदाउन।।
रामलोचन ठाकुर वर्तमान राजनीति –व्यवस्था ,राजनेताक स्वार्थसँ नीक जेना परिचित छथि,ओ अइ बातसँ एकदम व्यथित भऽ जाइत छथि जे राजनीति जे एक समयमे देशक गरीब –गुरबा, दलित-शोषितक उत्थानक लेल एकटा पुनीत कर्तव्य छल आब ओ महज लूट-खसोट ओ पूंजीपति –वर्गक संरक्षणक एकटा साधन बनि गेल अछि। व्यवस्था सड़ि गेल अछि :-
दिल्ली आकुल अछि अगबे निर्यात लए
गामक चिंता दुनु साँझ बुतात लए
नेता लोकनिक नजरि विदेशी नोटपर
सत्य देश चिंता सीमित अइ मंच धरि
वास्तवमे सभ मरैछ अपन गतात ले (नेता ओ जनता, अपूर्वा, 1996)
एतेक बर्ख बितलाक बादो राजनीतिक रंग-रूप नै बदलल अछि। स्थिति दिनो दिन खरापे भेल जा रहल छै, तँइ रामलोचन जीक बात एखनो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल।
हमरो एकटा गाम छल ‘बरखामे बिलंब देखि /गमैया पुजाक सँगोर /जाट-जटिन खेलबामे व्यस्त/महिला समाज /तजियाकसँग /झरणीपर झूमैत किशोर ,तरुण दल /फगुआक अबीर / आ जुड़-शीतलक कादो-माटिकसँग /हमर गाम जीबैत छल .. हम ताकि रहल छी सएह गाम /अपन गाम ‘
उपरका कविताक विश्लेषणसँ लगैत अछि जे रामलोचन ठाकुर एक तरफ मिथिलाके समृद्ध देख’ चाहैत छथिन तखन जखन लोक बदलल गाम देख क ओ किएक ने हरखित छथि? जखन वैश्वीकरण/भूमंडलीकरण सब व्यवस्थामे परिवर्तन अनलकै तखन गाम कोना अपरिवर्तित रहि जेतै। मिथिलाक दुर्भाग्य जे लोक रोजी-रोटी ओ शिक्षा के लेल पलायन कऽ गेल। गाममे बूढ़ कि लाचार लोक भेटत गामक–गाम सुन्न। महल सब भम्म पड़ि रहल छै। गाम तँ ठीके हेरा गेल छै ,परंच बदलल गामकेँ सेहो स्वीकार करऽ पड़त। गाममे एखनो बड़ किछु बाँचल छै, गामकेँ मात्र पिकनिक स्पॉट के रूपमे नै देखबाक चाही, ओतुक्को लोकक जीवन स्तर बदललैए, सबके जीवन स्तर बढ़लैए नीक कपड़ा ओ नीक घर सबके छै।
रामलोचन ठाकुर एकटा क्रांति-धर्मी कवि रहितो एकटा खास दृष्टिकोणसँ आगू नै बढि सकला। संघर्ष के बाद आयल सुख के वर्णन नै करैत छथि। ई बात सत्य जे हिनकर कविता सब ओइ समयक वर्णन करैत अछि जाहि समयमे ज्ञान-विज्ञान, धन ओ शक्ति किछु खास लोक तक सीमित रहै आब समय बदललैए आब ओ बात नै छै सब पढै-लिखै छै। जाति-संघर्ष नै रहि वर्ग-संघर्ष छै –‘बीसम शताब्दीक शेषक / सभ्य सुशिक्षित मनुक्ख /शब्द के बना लेने छी अस्त्र /अस्त्र विभाजनक /अस्त्र शोषणक /अस्त्र संहारक/ आइ शब्द स्नेह नहि /घृणाक करैत अछि सृष्टि-संसार------ शब्द आइयो अछि/ मुक्तिक हेतु कछमछाइत /आकुल-व्याकुल पेबाक लेल/ अपन हेरायल अर्थ/ तकैत अछि बाट/ कोनो वाल्मीकि,विद्यापति, कृतिवासक/ शब्द आइयो थिक ब्रह्म’ (शब्द –लाख प्रश्न अनुत्तरित 2003) अइ कवितामे दू तरहक परस्पर विरोधी बात छै, अपनहि कहल गप्पकेँ अपनहिसँ कटैत कवि रामलोचन ठाकुर बात के विराम दै छथिन एक ठाम शब्दकेँ शोषणक पर्याय बनेने छथि त दोसर ठाम शब्दकेँ ब्रह्म। वास्तवमे ओ अपन मोनक भावकेँ खोलि कऽ राखि दै छथिन ,’पॉलिटिकली करेक्ट’ हेबाक चेष्टा कखनहु नै करैत छथि किएक तँ हुनका पुरस्कार, मंच मालाक कोनो मनोरथ नै रखलथि। ओ कतियायल रहलाह कि राखल गेला से तँ नै बुझल अछि किएक तँ मैथिली साहित्यक हम बड नव विद्यार्थी ओ पाठक छी मुदा एतेक बात तँ कहि सकैत छी जे रामलोचन ठाकुर अपन विचार ओ क्रांतिधर्मिताक गुण किन्नहु नै छोड़ि सकलाह। उदासी, अनुचितक प्रतिवाद हुनकर स्थायी भाव बनि रहि गेलनि।
रामलोचन ठाकुर वैश्विक राजनीतिक घटनाक प्रति सेहो साकांक्ष रहल छथि। ‘नेल्सन मंडेला’ नामक शीर्षक कवितामे ओइ विराट महामानव के लेल लिखने छथि जाहि समयमे ओ जहलमे छलथि –कोनो /रक्तबीजी बाजक /चांगुरसँ चोंचधरि किकियाइत /विगत छब्बीस बर्खसँ छटपटाइत /एकटा श्वेत कपोत - नेल्सन मंडेला। एतबे टा नहि ओ भारतक पड़ोसी देश अफगानिस्तानक बिगड़ैत परिस्थिति हुनकर कवि मोन के झकझोड़ि देने रहैन्ह जकर उल्लेख ओ ‘ओइ दिन उगल नै छल सूर्य’मे केने छथि –‘ ओ देखलक / चौबटियाक बिजुलीक खम्हा से झुलैत/ एगो लाश /क्षत- विक्षत, सोणिते- सोणितान /अपन पोती के कोरामे उठबैत /फिसफिसायल रहमत -/”नाजीब !संयुक्त राष्ट्रसँघक सुरक्षामे तोहर ई परिणति !/ मौलवाद, युद्धवाद तालीबान/ जे गति हिनकर भेलनि/ सैह गति तोरो लोकनिक हो।“
अंतमे एतनी कहि सकैत छी जे रामलोचन ठाकुरक मैथिली, मिथिला ओ मैथिलक प्रति स्नेह, समर्पण ओ कर्तव्ययबोध अविस्मरणीय छनि। आदरणीय ठाकुरजी एकटा क्रांतिधर्मी, आन्दोलनी ओ मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहर के रक्षा केनिहार एवं निडर व्यक्ति रहलाह। जएह हुनकर जीवन सएह हुनकर रचना। जरूरी छै जे हिनकर साहित्यिक अवदानक और वृहत रूपमे चर्चा होय। हिनकर छपल कविता सभक संग्रहकेँ एकटा समग्र पोथी के आकार देल जाए किएक तँ हुनकर बहुत रास रचना सब यत्र-कुत्र पसरल छै। हुनकहि रचनासँ हम अइ आलेख के सम्पन्न कर’ चाहब जे हुनका जीवनपर एकदम सटीक छै :-
कतौ रहब हम करब कुशलेक कामना
खगता हो शोर करी तेजी भूल भावना
हम ने बेर बीतल जे घूरि ने फेर ताकत (बाट अहाँक ताकत – अपूर्वा 1996)
-------------
संदर्भ :
1.इतिहासहंता,रामलोचन ठाकुर, शिखा प्रकाशन, कलकत्ता, 1978
2. देशक नाम छलै सोन चिड़ैया,रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता , 1986
3. आजुक कविता,संपादक –रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता,1984
4. अपूर्वा,रामलोचन ठाकुर,मिथिला समाद, कलकत्ता,1996
5. लाख प्रश्न अनुत्तरित,रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता/ बाबुपाली ,2003
6. आँखि मुनने: आँखि खोलने, रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता/ बाबुपाली ,2005
7. Contemporary Marxist Literary Criticism, Fancis Mulhem, Routledge, London, 1992
8. http://videha.co.in/
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
भीमनाथ झा-संपर्क-7482066855
बचा दिअ भाइकेँ
जड़ि तँ रामलोचनजी आ हमर एकै नर्सरीक गाछक अछि। मुदा हुनक थल्ला रोपा गेलनि कलकत्ता आ हमर रहि गेल गामेक कोनो छोट हत्तामे। माटि-पानिक भेद फलक स्वादमे जतबा अंतर आनि दैत छै से तँ छैके, ताहिसँ बेसी ई भेलै जे ओकर ताकुत केनिहार नीक भेटलै आ एम्हर ई एक हिसाबें अनेरुआ भऽ गेलै।
रामलचोनजीकेँ साहित्यिक प्रशिक्षण नीक भेटलनि आ हमर सोच विशृखंल भऽ गेल। ओ ओतए गोड़ी रोपि लेलनि आ हम बौआइत रहलहुँ बेगूसराय, बखरी, कुशेश्वरस्थान, राँची, पटना, दरभंगामे। ने हम कलकत्ता बेसी गेल छी आ ने वएह इम्हर अधिक अबैत रहथि। कवि सम्मेलनोक मंचपर दूनू संग-संग कदाचिते अभरी। कारण वएह दूरी। कलकत्ताक साहित्यिक समारोहमे हम चारि-पाँच खेप गेल हएब। ओहो इम्हर तहिना आएल हेताह जतए हमहूँ पहुँचल होइ। तँइ भेंट-घाँट सेहो हिसाबेंसँ होइत रहए। पत्राचार एहिसँ कने बेसी। पत्रलिकक्खड़ हम छी नहि।, ईहो नै छथि। हँ पत्र उत्तर अवश्य देबाक इच्छा रखैत छी। से इच्छा हिनको रहैत छलनि। पछाति फोन एलापर ओ तँ बंदे जकाँ ई कने ताहिसँ बेसी चालू भऽ गेल छल- कनियें बेसी ई जखन 'मिथिला दर्शन'क संपादक (कार्यकारी) भऽ गेला आ हम हिनक लेखक, तखन बेसी काल फोनक घंटी हमरे बाजए। दर्शनोक अवसर, हिनक गाम अबरजातिक क्रममे, कने बेसी पाबए लगलहुँ।जतेक सुविधासँ ई अपन विचारक प्रतिकूलो व्यक्तिसँ आत्मीयता स्थापित कऽ लै छथि, से हिनक व्यक्तित्वकेँ उदाहर आ भास्वर बनबै छनि। साहित्यक प्रति हिनक की विचार छनि ई सर्वविदित अछि। जकरा परंपरावादी सोच कहल जाइछ, तकर विरुद्ध युद्ध केनिहार दलक एक टुकड़ीक नायक ईहो मानल जाइत छथि। स्वयं 'इतिहासहंता'क रूपमे अपनाकेँ ठाढ़ करै छथि। अपन रचना लक्ष्यक उद्घोष करै छथि ई- "सरिपहुँ उगिलत आगि कलम/ हो चिनगीये/ रखने अपना अन्तरक मध्य/ क्षमता अजस्र/करबाक सृष्टि दावानलकेँ/ जे जरा करत सुड्डाह/ मात्र कूड़े-कर्कट नै/ घास-पात/ बँसबिट्टी-बेल-बबूर-बर-पीपरक गाछ"
आ सरिपहुँ हिनक लेखनी आगि उगिलललकनि, चिनगी उड़ि कऽ अग्रजक आंगपर पड़लै आ सट दऽ दागि देलकै-
"मुदा / अहां नञि / अहां सन नञि / अहां /हमरा सोझा सं फराक भ जाउ/ हम नञि देख' 'चाहै छी/
अहांक मुंह/ नञि सुन' चाहै छी/ अहांक मुंहे कुनू इतिहास/ ई एक-एक घटना/ एक-एक नाम/ की ताइ सं कम महत्वपूर्ण अइ/ कत्ते नीक होइत/ जे आइ/ अहूं बनि गेल रहितौं/ कुनू एगो घटना/
एगो नाम/ एगो इतिहास/ आ हमर छाती/ सूप सन भ गेल रहैत/ किन्तु अहां से नञि भेलौं/अहां से भइयो ने सकैत छी/ आ हम/ एखन नञि लिखि सकब/ करिया मोसि सं/ उजरा कागत पर/ कुनू कविता/ कथा/ इतिहास /अप्रयोजनीय/ अस्थायी / देखैत नञि छी / हमरा हाथमे / चमकैत पंचकमनियां भाला/ चलि पदल छी हम/ लाल टुह-टुह रक्त सं / पिरथीक विशाल वक्ष पर / लिखबा लेल एगो कविता / एगो कथा / एगो इतिहास"
हिनक मनोनुकूल हिनक अपन समाज, अपन लोक, अपन संस्कृति, अपन साहित्य "एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास" नै बनि सकलनि तकर बड़ आक्रोश छनि हिनका, आ तें उताहुल छथि " स्वयं बनि जेबाक लेल एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास" आ तें हिनक हाथमे जे कलम देखै छियनि से असलमे थिकनि "चमकैत पंचकमनियां भाला"।
हिनका के उत्तेजित करै छनि, आदर्श की छनि, तकरो खुलासा कऽ देने छथि- "फ्रांस रूस चीनक/ क्रान्तिक कथा/ वियतनाम लाओस कम्बोदिया/ चीली आ क्यूबाक/ संग्रामक कथा/ रूसो मार्क्स एन्जिल्स/ लेनिन स्टालिन माओ/ चू-ते होचिमिन्ह मारकुस/ नेरुदा सार्त्र चे-गुएवाराक नाम/ राजकमल सुकान्त गोर्की/ लू-सुन लुमुम्बाक मृत्यु सम्बाद/ हेमिंग्वेक आत्महत्या/ आर कते रास की...."
मानल बात थिक, जकरा ई सभ उत्तेजित करतै ओ क्यो रहय, ओकरा धर्म-कर्म, नियम-निष्ठा, अपन परंपरा, अपन संस्कार-व्यवहार-लोकाचार बलाय लागऽ लगतै, ताहिसँ ओ मुक्त होबऽ चाहतै, अपन सहगामी-अनुगामीसँ एहने अपेक्षा रखतै, ओकरा सभकेँ ताहि लेल प्रेरितो करतै। अदौसँ चल अबैत सिलसिलाक खिधांस करतै, ओकर दोष गनौतै।
तँ की से रामलोचन ठाकुर कयलनि? कहबा लेल जे कहि लेथु, मुदा हिनक पुष्कल रचना, एकाधिक पोथी एकर साक्षी अछि जे ई मिथिलाक लोकसंस्कृतिकेँ निकृष्ट नहि मानैत छथि अपितु अपन परंपरा हिनका उत्कृष्ट लगै छनि, आकृष्ट करै छनि। मैथिली काव्यक छंद, यति, लय, तुकपर ई हँसैत तँ नहिएँ छथि उनटे ओकरा स्वायत्त कयने छथि। जाहि कोटिक रचनाकेँ हिनक दलीय मित्र लोकनि परंपरावादी कहि तिरस्कार कहै छथिन, ताहू तूरक हिनक रचना थोड़ नहि छनि।
हिनक एक पोथी अछि 'माटि-पानिक गीत'। ओहि महक किछु पाँति देखल जा सकैछ-
"तीर पर अवस्थित पुनि यज्ञ तीर-तीर
पावन एहि धरतीक तीर्थ गाम-गाम
स्रष्ट जन पूजक आ पूजित हो सृष्टि
माटिक शिव बना पुनि प्रतिष्ठाक प्राण
महिमा गबैछ जकर उपनिषद् पुराण
मिथिले मम मातृभूमि तिरहुत ललाम
एक अन्य गीतक ई अंश सेहो द्रष्टव्य--
कुटिया पीसिया करैक माय नाम दुर्गादत्त
बेटाक कहू कथा ई न के जनैत छी?
एक चुरू पानि बरू डूबि मरू नीक थिक
मिथिलाक नामपर कलंक की मढ़ैत छी
एक अंश ईहो-
जाहि माटिसं जन्मलि सीता
सएह हमर ई धरती
यज्ञवल्क्य गौतम कपिल के
भूमि रहत नञि परती
सुग्गा शास्त्रक गप्प करै छल
तकरे गीत सुनाबै छी
एतबे नहि, ताहिसँ आर आगाँ छथि ई। मिथिलामे प्रचलित जे रंग बिरंगक लोककथा अछि-सुच्चा मैथिलीक लोककथा, तकर ई विलक्षण संग्रह कयने छथि। ई सभ कथा जे लुप्त भेल जा रहल छल, शहरी संस्कृतिमे पालित नेना-भुटका लेल जे अनचिन्हार भऽ गेल छल, मुदा जहिमे मिथिला बजैत अछि, जाहिमे अपन पूर्वज बजैत छथि, जाहिमे अपना लोकनिक समाजिक सांसकृतिक आर्थिक आ मानवतावादी आस्था संचित अछि, तकर वर्तमान आ भविष्य लेल जोगा कऽ राखि देलनि अछि रामलोचन ठाकुर। वएह रामरोचन ठाकुर जे कहै छथि हुनक हाथमे कलम नहि "पंचकमनियां भाला" छनि।
मुदा हमरा तँ बुझि पड़ै अछि, हुनक हाथमे कलम नहि, चंपा-चमेली, बेली-गेना, सिंगरहारक पंचसुगंधित माला छनि। ततबे नहि, वर्तमानन कालक लगभग समस्त प्रसिद्ध साहित्तिक व्यक्तित्वक परम्परित कुंडलिया छंदमे तथा सिद्ध-असिद्ध शतावधि लेखकक परम्परित दोहामे जे ई परिचय प्रस्तुत कयने छथि, सेहो हिनका मिथिलाक माटि-पानि आ परंपरासँ जोड़ै छनि। एकरा तँ हम कहब, हिनक हाथमे मैथिली कवि-पूजन लेल प्रस्तुत दही-धान-पान-मखान-मिठाइ पूरित चुमानक डाला छनि। रामलोचनजीक सोझाँ जखन हुनक एहि अंतर्विरोधकेँ रखै छलियनि, तखन ओ तेना मुस्किया उठथि जेना कहि रहल होथि- एत्ते सोझ नै छै बूझब। डूबऽ पड़ैत छै।
हमहूँ मुस्किया दियनि-डूमू अहाँ। डूमल तँ छीहे। जनिके रूचय तनिके गीत गाउ।.............................................
मुदा नहि भाइ, अहाँ डूमू नहि। फेरसँ उगि आउ। अहाँ भने नहि मानियनु, हमरापर तमसाउ भने, मुदा हम तँ भगवानकेँ गोड़ लागि कऽ कहिते रहबनि- बचा दिअ भाइकेँ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
महाकांत ठाकुर-संपर्क
माटि परहक लोक
हमर पाली मोहन गाम, एहि अर्थमे उछितगर अछि जे पचीस टा जाति हीलि-मीलि कऽ रहि रहल छथि। गामक अपन इतिहास होइ छै। मुदा किछु सुकर्मी की किछु कुकर्मी ऐतिहासिक भऽ जाइत छथि। अइ गपकेँ कते सुंदर लोकोक्तिमे कहल गेल अछि- सुकर्महि नाम कि कुर्महि नाम। हमर पात्र काल्पनिक नहि छथि। कवि शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुरक गाम हुनका नहि जनैछ। ज्योतिरीश्वर चौक पाली, नहि जनैछ लोक । पाली मोहन, सेहो नहि। लोक जनैए: मरनी चौक, बाबू पाली। जे डाक घर कि कोनो सरकारी कागतमे नहि अछि। अही चौकसँ पूब, चारिम-पा़ँचम घराड़ीपर सूरति ठाकुर रहथि। निसंतान। ई घरारी नहि रहै, एकटा खत्ताक कातमे किछु धूर खाली जमीन रहै। सझिया आँगनमे भरत ठाकुर, घरक ठाकुर, सरक ठाकुर आदि पहलवान, बहलमाध ठाकुर सभ संतानहीन सूरति ठाकुरकेँ आँगनसँ बैला देलकनि। ई कहि जे कोन ठीक पिता बनि जेबें,जगह बदलने। मिथिलामे बड़ सुंदर चलन रहै। हगना नाम रखबहि कि कोनो तेहने सन, पपिआहा नाम तँ नेना जल्दी नञि मरतौ। बेसी दिन जीतौ । सूरति ठाकुर जेना तेना रहक ब्योंत केलनि एतय। रमलोचनाक जनम एतहि भेल रहै, महा दीदी कहलक। बेचन के बेचना, फेकन के फे़कना दुलारक नाम मानल जाइ। सूरतिकेँ सुरता, जीबछकेँ जिबछा, युगेश्वरकेँ जुगबा आदि भेटैत अछि। हरि गाममे पाँचे-दस गोटे साक्षर, सभ टोलमे एक टा कऽ अखाड़ा जरूर रहय। बारह-बरना गाम। बाहर, माने गामसँ निकलक बाट बड़ विकट, थाल-पानि हेलू तँ निकलू। ओना कटही गाड़ी आबय जाय जोगर एकलिखा सड़क चारुदिश। थाना खजौली, जिला दरभंगा........। जमींदारक ड्योढीक गाम। मतलब बाभनक गाममे राड़-पँजियार । तें पाली मोहन आ ज्योतिश्वरकेँ हटा बाबू पाली बनाबक खेड़हा बराक....एतय राम लोचन ठाकुरकेँ लालन-पालन हेतनि/भेलनि।
सूरति ठाकुर बिना कोनो हील-हुज्जतिकेँ सपत्नी रहय लगला एहि तिनकोनमा घरारीपर। न्याय प्रिय समाजमे। संतानहीनकेँ कते सम्मान। मुदा नहि, किछुए बरखक पछाति ओ पिताक गौरवशाली पदपर प्रतिष्ठित भेला। पूरा समाज हर्षित। पत्नी कोकण बालीक खुशीक ठेकान नै। कोकण वाली (नाम मने शारदा देवी रहनि) केर सुखक हृदय नीकसँ भरलो ने रहनि कि पति परमेश्वर माने सूरति ठाकुर स्वर्गवासी भऽ गेला। चारुकात कनफुसकी शुरू भेल। शिशु माने चिलका बपखौका भेलै। बपटुग्गर नेन्नाक प्रति लोकक भाव बूझल जा सकैछ।
कोकण वाली कि दिआद-बाद अपनहि लल्ल। धन बीत आ विवेकसँ सेहो। तें जेना-तेना माय अपने आ नेनाक पेट भरि जीबि लेबाक दुस्साहस करैत रहली। बपटुग्गर बालक बटुक भेला। बगलक दिआद सुखदेव ठाकुरक पिता हल्ली ठाकुर ड्योढीक गुमास्ता रहथिन। ऊंचगर दलान आ परोपट्टाक मानल सम्मान संग किछु गोटेमे खिस्सा पिहानी बाँटथि। हुनका दलानपर दस-बीस गोटेक बैसार सदति रहिते छलनि। ओ कहिओ काल टोलक नेना सभकेँ भट्ठा पकड़ब सिखाबथि। कहय लय गाममे विद्यालय रहै पाँचवा धरि। मुदा मारिक डरे कम्मे बच्चा नाम लिखबैत छल। पढब-लिखब स्वान्त: सुखाय कर्म मानल जाइत रहै। माय-बाबू की समाजक कोनो आग्रह नञि पढ़य लेल। कारण पढ़क उपयोगिता बुझले ने ककरो। खनदानी कारबारमे संग पूरब नेन्नहिसँ शुरू होइ। कुम्हारक बेटा बासन गढ़यमे निपुण होबक प्रयास करैत छल तँ बनियाक नेन्ना व्यापारमे। ई दुनु पड़ोसी एहि बालकक। हल्ली ठाकुरक दलान टापर रंग-बिरंगक गपास्टक होइत छल ।
एहन परिवेशमे पढ़य-लिखक प्रेरणा भेटक कारण कारण अज्ञाते। तथापि हमर बटुक शिक्षा आरंभ केलनि आ मारि नहि लागय, ताहि डरे, मोन खराब की बिकालो समयमे छुट्टी नहि करथि ।
लोक जीवित कोना रहता, पेट भरक कोन उपाय करय पड़त, तकर चिंता बेसी। उपजाबारी कम होइ । तीन-तीन बरख रौदी, महामारी, चेचक, हैजा, टीबी सन महामारीक प्रकोप। तँ ई मसोमातक बेटा पढतै। कथी करतै पढ़ि कऽ । इह........
मलखान की बबुआनक ढेकरबसँ भुक्तभोगिए टा नहि पूरा समाज डेराइत छल। बौना। भोजनमे की सभ छलैए? बात दाइल अल्लुक सन्ना। ऐ नारायणपुर बाली। कनी सुनू। ई मसोमातक बालक भात दाइलपर अल्लुक सन्ना भोजन केलक अछि। भगवान सबहक ने छथीन। अहीं टा नहि ने छी.....माटि परहक लोक लेल खाय-पीबय लय रहै भरुआ, अल्हुआ, खेसारी, इशारा, पोखरीक पाइन । तखन एक टा अनमोल वस्तु रहै, सभक हृदयमे प्रेम ठोरपर मुस्की, चून-तमाकूक स्नेह। माटिक मनुख सभ लग। तदपि कनैत नहि छल एना लोक। सागोभात अनूप ।मसोमात अपना बेटाकेँ महीसक चरवाह की घसबाह बनएसँ बचा कऽ रखलनि । खिस्सा-पिहानी, लिखना आ काज उदेममे निपुण कोकण वालीक पुत्र मैट्रिक पास केलकनि ।
(मैट्रिक धरिक खिस्सा एहि संस्मरणमे अछि आ तकर बाद संभवतः रामलोचन ठाकुर कलकत्ता चलि एलाह आ ओकर बादक क्रमबद्ध लेखन तँ नै भेल अछि मुदा अतेक तँ जरूर छै जाहिसँ रामलोचनजीक कलकत्ताक कालखंडकेँ नीक जकाँ देखल जा सकैए। एहिमे आएल नाम सभ ओहिना राखल गेल अछि-संपादक)
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: शैलेन्द्र मिश्र. “एकटा खाँटी मैथिल: रामलोचन ठाकुर आ हुनकर काव्य संसार.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 319, 2021-04-01. https://www.videha.co.in/research/2021/319/एकटा-खाँटी-मैथिल-रामलोचन-ठाकुर-आ-हुनकर-काव्य-संसार.htm

मूल विदेह अंक / Original issue