विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर: रामलोचन ठाकुर

डा. वन्दना किशोर · 2021-04-01 · अंक 319

एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर: रामलोचन ठाकुर
प्राश्निक- डा. वन्दना कुमारी (आब डा. वन्दना किशोर)
मिथिलांचलसँ बाहर कलकत्ता (कोलकाता) ओ पहिल स्थान अछि, जतए आधुनिक भाव-बोधक समसामयिक मैथिली नाटकक मंचन प्रारंभ भेल। स्वतंत्र नाट्य संस्था सब अस्तित्वमे आयल। निरन्तर नाट्य-गतिविधि चलल, जे आइयो चलि रहल अछि। मूलतः प्रवासी मैथिल लोकनिकेँ एकजुट करब तथा मैथिली आन्दोलनकेँ आगू बढ़ायब तहिया एकर लक्ष्य छल। कलकत्ताक मैथिली नाट्य आन्दोलनक आब सुदीर्घ इतिहास अछि। कतोक स्वर्णिम उपलब्धिक गवाह अछि कलकत्ता। बादक समयमे एकरे देखा-देखी देशक आन शहर आ गाम सबमे सेहो मैथिली नाटकक संस्था सब बनल तथा रंगमंचीय गतिविधि सक्रिय भेल। कलकत्तामे मैथिली रंगमंचक न्यों रखनिहार तथा निरन्तर सक्रिय रखनिहारमे जाहि किछु नामक उल्लेख अनिवार्य भऽ जाइछ, ताहिमे एकटा प्रमुख नाम अछि-रामलोचन ठाकुरक, जे बादमे नाटक छोड़ि कथा-कविता आ साहित्यमे रमि गेलाह। परंच परोक्ष रूप ओ एखनो कलकत्ताक मैथिली रंगमंचसँ सम्पृक्त छथि। रामलोचन ठाकुर अभिनय तँ करबे करथि, कतोक नाटकक अनुवाद आ निर्देशन सेहो कयलनि। मुदा हुनक योगदान के एतबे धरि सीमित नहि कयल जाय सकैत अछि। ओ एकटा महत्वपूर्ण संगठनकर्ता आ समन्वयक सेहो रहथि जकर योगदान गतिविधिक सक्रियता आ तकर निरंतरता बनौने रखबाक लेल जरूरी अछि।
८ मार्च २००५ केँ रामलोचन ठाकुर पटनामे रहथि। ओ प्रबोध साहित्य सम्मान २००४क निर्णायक मंडलक बैसारमे आएल रहथि। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आ महाशिवरात्रि पाबनिक हूलि-मालिक बीच संध्या ८ बजे फ्रेजर रोड स्थित प्रेसीडेंट होटलक कमरा न. ४०५मे हुनकासँ ध्वन्यांकित साक्षात्कार कएल गेल। ई साक्षात्कार वस्तुतः "नाटक आ नारी" विषयक वृहद शोधक क्रममे कएल गेल छल। शोध कार्य पूरा भऽ अपन निष्पत्ति प्राप्त कऽ चुकल अछि। मुदा ई साक्षात्कार आद्यावधि अप्रकाशित छल। आब पंद्रह वर्ष बाद एहि विशेषांक लेल ई उपलब्ध कराओल गेल अछि। कृप्या पाठक गण एहि साक्षात्कारमे आएल तथ्य आ विचार आदिकेँ साक्षात्कारक समय-तिथि दर्पणमे देखबाक प्रयास करथि। प्रस्तुत अछि ४० मिनटक एहि ध्वन्यांकित साक्षात्कारक प्रमुख अंश--
अपने कलकत्ताक मैथिली रंगमंचमे खूब सक्रिय रहलहुँ अछि। लगसँ एकर गतिविधि देखैत रहलहुँ अछि। कहू जे कलकत्ताक मैथिली रंगमंचमे महिला कलाकारक केहन भूमिका रहल अछि? सुनल अछि जे बंगला भाषी स्त्रीगण लोकनि मैथिली नाटकमे अभिनय करैत रहल छथि ?
कलकत्ताक मैथिली रंगमंचकेँ दू भागमे बांटू-1953सँ 1976 धरि आ फेर 1983सँ अद्यावधि। 1976मे हम सब नाटक करब छोड़ि देलौं। तहिया धरि हमरा सबकेँ जतेक महिला कलाकार भेटलीह, सब बंगला रंगमंचक कलाकार छलीह, एहिमे कोनो शक नै। मैथिलानी मंचपर नै उतरै छलीह, आइयो नै उतरै छथि। एकरा एना बुझियौ जे सय वर्ष पहिने जखन गिरीश घोष बंगालमे नाटक शुरू केने रहथि, तखन पुरूषे महिलाक रोल करैत छल। बादमे एकटा वेश्या के प्रथम बेर ओ मंचपर उतारलनि, नाम रहैक नटी विनोदिनी। यह स्थिति कम की बेसी मैथिली नाटकक आइयो अछि। 1976क बाद बंगालमे मैथिली नाटकमे ब्रेक लागि गेलै। 1983सँ फेर दोसर चरण शुरू भेलै। एहि खेप किछु मैथिलानी मंचपर अयलीह। दू-एक टाक नाम कहब, नीक अभिनेत्री छथि (नाम मोन पाडैत, परंच मोन नहि पडै छनि), महेश झाक ननकिरबी रहै। विवाह भेलै तँ नाटक छूटि गेलै। सामाजिक बंधन छलै। पतिदेव नाटकमे नै उतरय देलथिन। दोसर श्रीमती वन्दना झा, बड़ नीक अभिनेत्री, एखनो करैत छथि। मुदा हुनका रंगमंचसँ कम प्रेम छनि-ग्रुप (संस्था)सँ बेसी। जाहि ग्रुपसँ ओ जुड़ल छथि-तकरे टाक संग नाटक करैत छथि- दोसर ठाम नै करैत छथि। एकटा आर घटना कहब। भरिसक 1983क बात थीक। हम सब मुंशी रघुनन्दन दासक नाटक 'मिथिला नाटक' कलकत्तामे खेलायल रही। एहिमे सात टा महिला रहै, प्रस्तुतकर्ता रहै-कर्ण गोष्ठी-कायस्थक संस्था छियै, बुझिते छियै। सात टा महिला आयल रहथि, नाटक कयलनि। तकरा बाद दोसर नाटक लेल उपलब्ध नै भेलीह। ई तँ विडम्बने ने भेल।
बंगला भाषी अभिनेत्री रहलासँ मंचनमे दिक्कत नै होइत रहए ?, प्रस्तुतिक गुणवत्ता नै प्रभावित होइ ?
खूब बाधा होइ। हालमे 6 मार्च के कलकत्तामे एकटा नाटक भेल-'भफाइत चाहक जिनगी'(लेखक-सुधांशु 'शेखर' चौधरी)। एहिमे बंगला भाषी अभिनेत्री छलीह। ठीकसँ उच्चारण तक नै कऽ सकलीह। आब अहाँ नाटकमे ठीकसँ बजबे नै करबै तँ......?
अपन व्यवहारिक अनुभव कहू ? अहाँ लोकनि कोना तैयार करियै बंगला भाषी अभिनेत्री के?
ओना तँ सब गोटे मुदा विशेष रूपसँ- हमरा सबहक बीच लक्ष्मीनारायण मिश्र नामक एक व्यक्ति रहथि, जे आफिससँ छुट्टी लऽ लऽ भरि दिन अभिनेत्रीक डेरा जा हुनका मैथिली बाजब सिखाबथि, पार्ट घोखबथिन। मैथिली संवाद के बंगला लिपिमे लीखि कऽ देथिन। तखन हुनकामे कोनो बातक पता नै चलै। हमरा सबहक संग जे-जे बंगला भाषी अभिनेत्री काज कयलनि से एहिना। दू टाक नाम लेब- श्रीमती वीणा राय आ चन्द्रकला किरण। ओकरा हम सब चिन्है छलियै जे ओ मैथिली भाषी नहि अछि, अहाँ नै चिन्हितियै। सिखबाक क्रममे दुनू के मैथिलीपर ततेक कमांड भऽ गेल रहै। ओ दुनू हमरा सबसँ मैथिलीयेमे गप्प-सप्प करैत छलीह। आब एखन ओतेक मेहनति होइते नै छै। हमरा सबमे प्रतिबद्धता छल। सिखबाक प्रयास करै छलिये। साँझ कऽ अड्डा दियै। एक टकाक टिकट कीनि-कीनि बंगला नाटक जा-जा कऽ देखियै, बंगलामे की नब भऽ रहलैए। महेन्द्र मलंगिया के पुछबनि, ओ कहताह। कलकत्तामे हुनका पकड़ि-पकड़ि हम सब नाटक देखाबी-चलू फल्लां नाटक देखा। एखनुका कलाकारमे ओ प्रतिबद्धता नै छनि। करऽ के अछि, कऽ लियऽ एकटा नाटक। नै किछु अछि तँ एकटा नाटके कऽ लिअ।
मैथिलानी नाटक करए मंचपर नै अबैत छथि तकर की कारण अहाँ के लगैए?
सामाजिक विडम्बना छै। हमर सबहक जे संस्कार अछि, गीतनाद-नृत्य-नाटककेँ हम सब हेयदृष्टिसँ देखैत रहलियै। आब यद्यपि नृत्यमे मैथिलानी आबि रहल छथि। हम नाम नै कहब, कलकत्ताक एकटा बड़ पैघ श्रेष्ठ आन्दोलनी-साहित्यकार छथि, तिनकर ननकिरबी के एक बेर इच्छा भेल छलै नाटक करबाक-मुदा ओ अपन बचिया के नाटक नै करय देलथिन। अपने ओ भाषण दैत छथिन मंचपर महिला के अयबाक लेल। आइयो हम-अहाँ भाषण दैत छियै, लेकिन अपन बेटी-स्त्रीकेँ मंचपर उतारब से साहस हम सब नै करै छी। हमरा लोकनिक समाज एखनो पुरुष शासित अछि। जँ पुरुष Alow नै करथिन तँ महिला कोना मंचपर अओतीह? एहि स्थितिमे एखनो परिवर्तन नै अयलैए- हम सब भाषण जतेक झाड़ी।
अहाँ स्वयं नाटक करैत रही, प्रगतिशील विचारधाराक लोक रही, अहाँ अपन पत्नीकेँ किएक नै मंचपर अनलहुँ ?
हम एहि प्रश्नक अपेक्षा करैत रही अहाँसँ। देखियौ, हमरा पत्नी के पढ़हो नै अबैत रहनि। बाजहो-भुकहो नै अबैत रहनि। किए तँ पढ़ल-लिखन नै रहथि। बियाह भेल तँ कहलियनि-चिट्ठी-पुर्जी लीखू। तँ मात्रा छोड़ि अक्षर लीखब सीखि लेलनि। ओ जे एकटा कहबी छ जे एकटा पत्नी अपन स्वामी के चिट्ठी लिखलथिन-ट क प ठ ब त प ठ ब न त स ब म र ब (टाका पठायब तँ पठाउ नै तँ सब मरब)। तेहने लिखब सिखलनि हमर पत्नी-मात्रा ज्ञान नै भेलनि, हुनकर स्थिति आ स्तरक अनुमान कऽ लियौ। दोसर अपने कमजोरी किए ने कहि दी। अपने हम मैट्रिक पास कऽ कऽ गामसँ कलकत्ता गेल रही। नोकरी लागल। मुदा कॉलेजोमे नाम लिखौलौ। हमरा माय के बड़ इच्छा पढ़ऽ-लिखऽ के। पत्नी जे सुनलनि कॉलेज जाय वला बात तँ कहलनि-'एह आब धियापुता पढ़तै, तँ अपने कॉलेजमे नाम लिखौताह।' तँ ओहि पत्नी के हम कतेक दूर धरि आनि सकैत छलहुँ ? नै आनि सकलहुँ, हमरो कमजोरी अछि। एकटा बात आर कहब। कोनो प्रोग्राम होइ छै, नाटक होइ छै तँ ओहिमे कैक टा दर्शक स्त्रीगण रहैत छैक ? हम सब,सब, गोटे परिवारक संगे रहै छी, मुदा परिवार लऽ कऽ प्रोग्राममे किए नै जाइ छी ?
कलकत्ताक मैथिली रंगमंचक इतिहास लगभग पचास वर्षक भऽ गेल। तथापि स्थिति नै बदलल?
जड़िआयल सामाजिक संस्कार जाधरि नै बदलत, ताधरि....। आब देखियौ जे हमरा घरमे कोनो महिला आई.ए.एस. छथि तैयो भानसक दायित्व हुनके रहतनि। नोकरी ओहो करैत छथि- स्वामियो करैत छथिन, मुदा भानस स्त्रीये करतीह, पतिकेँ चाह बना कऽ वैह देथिन। स्वामी किएक ने करथिन ? एकटा स्त्री मृदुला गर्गक 'रुकोगी नहीं राधिका' सन उपन्यास पढ़तीह, मुदा मंचपर नै उतरतीह। हम सब (पुरूष वर्ग) Allow नै करै छियनि। पटनामे हम कहब जे हमरा लोकनिक सौभाग्य अछि जे प्रेमलताजी (प्रेमलता मिश्र 'प्रेम') सन वरेण्य आ सम्मानित अभिनेत्री एखनो सक्रिय छथि। ओ साहस कऽ कऽ मंचपर अयलीह।
मैथिलीक नाटक सबमे संख्याक दृष्टिसँ स्त्री चरित्र कम रहैए। एकर की कारण ? की महिला कलाकारक अभाव मात्र एहि लेल जवाबदेह अछि ?
तँ आर की ? महिला कलाकार छैके नै तँ नाटककार लिखिये कऽ की करताह? मंचने नै होयतनि। हम कहि सकैत छी जे कमसँ कम कलकत्ताक नाटककार जे नाटक लिखलनि से ओही हिसाबे। हम एकटा नाटक खेलायल रही- जादूगर आ रिहर्सल। अनुवाद नाटक छल। तँ हम तकैत-तकैत ओहन नाटक तकलहुँ आ अनुवाद कयलहुँ, जाहिमे महिला कलाकार छलैके नहि। नचिकेताक नाटक 'एक छल राजा'मे तीन टा महिला रहै। मुदा हमरा सब लग रहथि दू टा महिला कलाकार। एक गोटेकेँ डबल रोल देलियै। तँ लोक चेहरा नै देखि सकै त एकटा रोलमे ओकरा चेहरा घुमा पाछू मुंह बैसा देलियै-अपन गीत गाउ आ चलि जाउ। ई तँ स्थिति अछि। कोना नीक नाटक लिखायत आ कोना तकर नीक मंचन होयत ? हमर स्पष्ट मत अछि जे महिला कलाकारक अभाव अछि तें नाटककार कम महिला चरित्र रखलनि, नै रखलनि। बिनु महिला पात्रक नाटक हो तँ उत्तम। आइयो जे नाटक लिखाइए-ताहूमे दू-तीनटासँ फाजिल नारी चरित्र कहाँ रहैए ? ई संकट सब ठामक छैक।
आब गोटपगरे सही, मैथिलानियो घरसँ बहरा रहल छथि। नोकरी, व्यापार, फैशन, खेल-पुलिस सब क्षेत्रमे। गबै छथि-नृत्य करैत छथि। तखन नाटक नहि करबाक पाछू की कारण लगैए रंगमंचक स्वयं केर स्थिति एहि लेल कतेक दोषी लगैए?
हम फेर कहब सामाजिक अवस्था दोषी अछि। ताहूमे पुरूष वर्ग दोषी अछि। स्त्रीक इच्छा रहितो छैक तँ पुरूष ओकरा Allow नै करै छ। तँ ओ नै अगुआइ छथि। ओहुना बंगालमे कि दक्षिण भारतीय भाषा सबमे कलाक प्रति जतेक आकर्षण छै ततेक हमरा सबमे नै अछि। एकदम्मे नै अछि। मिथिला पेंटिंग बंगाली सब बना-बना बेचि रहल अछि हम सब नै। मैथिलानी घर-घरमे पेंटिंग बनौतीह-मुदा प्रदर्शनीमे नै जेतीह, किए तँ परिवार Allow नै करै छनि। नाटको लेल सैह बात अछि। एखनो हमरा सबहक मानसिकतामे कहाँ परिवर्तन भेलए जे नाटक एकटा कला छियै। साहित्यक सबसँ सशक्त विधा छै नाटक, नाटक मात्र पोथी नै। एकटा समन्वित कला छै। एकर जे प्रभाव दर्शक-श्रोतापर पडै छै- से कथा-कविताक कहियो भइये नै सकै छै। मुदा हमरा सबमे तकर इमानदारी आ विचारक अभाव अछि। आब मल्ल कालक स्थिति तँ हम नै कहब। मुदा ओहू कालक नाटक सबमे नटी-सूत्रधारक परिकल्पना छै, तँ महिला कलाकार रहल हेतै-से हमरा लगैए। ई बीचमे आबि कऽ मुसलमानी आक्रामणक बाद पर्दा प्रथा आयल। हमरा लोकनिपरम्परावादी सोचक लोक, ओकर रूढ़ि बना देलियै।
जतेक नाटक अहाँ पढ़लहुँ, कयलहुँ अथवा देखलहुँ-ताहि आधारपर कहू जे मैथिल नारीक केहन छवि नाटक सबमे आयलह अछि ?
पुरुष आश्रित नारीक छवि। नियमसँ बाहल, भनसाघरमे घोंसियायल, घरक काज करैत, पुरुषक सेवा करैत नारीक छवि। बहुत-बहुत पछुआयल नारीक छवि। पुरुषक समकक्षोक छवि नै बनल अछि। स्त्रीक स्वतंत्र अस्तित्व कहाँ कोनो नाटकमे आयलए ? अगुआयल चरित्र कहाँ आयलए? स्वावलंबनक भावना वला नारी कहाँ अनलनिहें नाटककार लोकनि नाटकमे ? हँ, गुणनाथ जी 'पाथेय' नाटकमे नारीक कनेक नीक छवि देखौलथिन।
की यह अछि मैथिल नारीक सम्पूर्ण छवि?
सम्पूर्ण छवि माने की ? मिथिलाक नारीक दू वर्ग अछि ग्रामीण स्त्री आ शहरी स्त्री। विडम्बना अछि जे मिथिलामे कलकत्ता कि पटना सन शहर नै छै। शिक्षित-बुद्धिजीवी गाम छोड़ि शहर आबि गेल। मुदा गामक स्त्री एखनो गोबर पथैए। शहरमे से तँ नै करैए, मुदा ग्रामीण संस्कारसँ एखनो मुक्त नै भेलैए। आब देखू, हमरा लोकनिक अधिकांश नाटककार शहरी छथि। ग्रामीण पृष्ठभूमिपर मलंगियाजी टा नाटक लिखै छथि। आब शहरमे रहि कऽ गामक नाटक लिखबै तँ से केहन हेतै ? शहरियाक मात्र स्मृतिमे गाम छैक। कैक दिन गाम जाइ छी हमरा लोकनि ? तें गामक बारेमे चिंतन सतही होयत-तँ से स्वाभाविके। तें नारीक जे यथार्थ छवि अयबाक चाही नाटकमे - से नै अबैए। मलंगियाक नाटक 'ओकरा आंगनक बारहमासा, नसबंदी, जुआयल कनकनी'मे यद्यपि अयलैए।
स्त्रीक दुर्दशा लेल स्वयं स्त्री कतेक दोषी छथि ?
स्वयं स्त्री के सर्वांशतः दोषी नै मानल जा सकैए। हमरा लोकनिक समाज पुरुष शासित रहलए। हमरपरम्परा बहुत जड़िआयलपरम्परा अछि। एतय बुझबाक अछि जेपरम्परा नीक वस्तु अछि,परम्परा बनै छै मनुक्खे लेल-समाजक उन्नति लेल। लेकिन हमरा सबहक साहित्यमेपरम्पराक गलत व्याख्या कयल गेलए। जे रूढ़ि छै तकरा हम सबपरम्परा मानि लेलियैए। एहि रूढ़िसँ जाबे हमरा सब के मुक्ति नै भेटत-ताबे नारीक स्थिति , नै सुधरतनि। नारियो समाजमे जाबे बटसावित्रीक पूजा होइत रहतै आ मधुश्रावणीमे ठेहुन दगाइत रहतै-ताबे तक भरिसक नारी आगू नै आबि सकतीह। नाटकोमे यह स्थिति अछि। आखिर लेखको तँ ओही वर्ग आ समाजसँ अबैत छथि- प्रायः ओहो नारी के सामने नै आनय चाहैत छथिन। हमरा जनैत मलंगियाजी विशिष्ट वर्गक नाटके लिखैत रहलाह। ओहि विशिष्ट पिछड़ा वर्गमे नारी के विशेष स्वाधीनता छै। जकरा फारवर्ड कहैत छियै, ताहि वर्गक नारीमे बड़ कम स्वाधीनता छै। जखन कि फारवर्डमे नारी कम कि बेसी पढ़बो-लिखबो कयलनि। परंच संस्कार समकालीन नै भेलनि। सोच आधुनिक नै भेलनि। आधुनिकताक प्रभावसँ पाछू रहलीह।
की अहाँ के लगैए जे महिला नाटककारक अभाव रहलासँ नाटकमे महिलाक उचित प्रतिबिम्ब....
(बिच्चेमे बात लोकैत) नै-नै, ई कारण नै छै, बल्कि ई गलत धारणा छै। कोनो भाषामे एना नै छै जे महिला लेखिके महिलाक विषयमे बढ़िया लीखि सकैत छथि। नाटककार तँ सब भाषामे पुरुषे बेसी छथि। महिला लिखतीह तँ महिला कलाकार भेटत अथवा महिलाक सम्पूर्ण समस्या आओत ई हम नै मानै छी। जेना, साहित्यमे आएल दलित साहित्य एकदम बकबास छै। साहित्य कतौ दलित होइ आ साहित्यकार कतौ दलित हुअय। साहित्यकार मात्र स्रष्टा होइ छै बस। देखू, दरअसल हमर नाट्य विधे कमजोर अछि। नाटक लिखायत मंचन लेल से कते मंच (नाट्य संस्था) अछि अपना सब लग? नाटक खेलाइ वला लोक नै अछि। मंचक (नाट्य संस्था) अभावक चलते नाटक कमजोर। कम लेखन। सय वर्षक आधुनिक मैथिली नाटकक इतिहास अछि-संख्यामे कतेक नाटक अछि ? 1953मे कलकत्तामे हम सब मैथिली नाटक करब शुरू कयलहुँ। तँ 51-52 सालमे कलकत्तामे एखन तक मात्र 51 टा मौलिक मैथिली नाटक आबि सकल-बाकी अनुवाद अछि। जखन कि कलकत्तासँ हम सब एखन धरि 250सँ 300 पोथी छपलहुँ, ताहिमे मात्र 51 टा मौलिक नाटक। हमरा सब लग नाटककारोक अभाव रहल अछि। नाटक लीखब परिश्रमक काज अछि। ओकरा मंचक ज्ञान होइ। नाटक एक बेर लिखायल, पाठ होयत, फेर काँट-छाँट। फेर लीखू। तखन रिहर्सल। रिहर्सलमे फेर चेंज होयत। तखन मंचन। फेर काटपीट, तखन प्रकाशन। एतेक परिश्रम करबाक लेल लोक तैयारे नै छथि। डैराइ छथि। उपन्यासोमेहनत मंगैत छै तें मैथिलीमे उपन्यासो कम छै। सबसँ बेसी कविता लिखा रहलए सेहो हम कहब छंदक बंधन टूटि गेलै तें। हमरा सब लग प्रतिबद्ध आ परिश्रमी लेखकक अभाव अछि। फेर लेखनसँ पाइ तँ भेटै नै छै। तें ई 'पार्ट टाइम' जॉब जकाँ लोक करैए? थोड़े नाटक नचिकेता लिखलनि। आब एखन तँ मलंगिया छोड़ि कियो नै। बाबू साहेब चौधरीक एके टा नाटक अछि-'कुहेस'। हमरा बुझने दहेज प्रथापर मैथिलीमे सबसँ नीक नाटक अछि। किएक तँ ओ 15-20 टा नाटकमे स्वयं अभिनयो कयने रहथि आ नियमित बंगला नाटक देखितो छलाह।
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रामलोचन ठाकुर जीक अनुवाद
रामलोचन ठाकुर जीक पोथी प्रतिध्वनि पढ़बाक प्रयास कऽ रहल छी , पढि नहि पाबि रहल छी कारण ,पढबा काल मोन सदति पूर्वाग्रहसँ भरल रहैछ, रामलोचन ठाकुर जीकेँ पढबा लेल लगैछ जे हमरो निर्द्वन्द ,निर्लेप होयबाक चाही। अनुवाद पहिनहु पढ़ने छी मुदा एहन अनुवाद कम्मे भेटल जाहिमे ईशा अपन आत्मा जनक आ जानकीमे समाहित कऽ देने होथि , ठाकुर जी के पढबा माने सर्वहारा मैथिलक संस्कारमे डूबकी लगैब ,जत्त दुख तकलीफ सेहो आध्यात्म आ दर्शनक समुद्रमे समाहित अछि। धनकुटनी पढबाकाल "ढेकीमे धान कतेक कष्ट पबैछ" .......... विपत्तिक कारखानासँ रत्न भऽ बाहर अबैछ । एहि पाँतिमे उपदेश प्रेरणा, सत्य सभटा एक्कहि संग अगल,बगल ठाढ़ भेल अछि, ठाकुरजीक विषयमे हल्ला छैक ओ हरा गेलाह, हमरा जनतबे ओ मैथिली छोड़ि कत्तहु ने हरा सकै छथि। श्रीमानक रचना सदति खेत खरिहान ,वंचितक आँगन घर सौंसे ठाढ़ भेटत ओ अनुवादे किएक नहि हुए मुदा निर्विवाद रुपमे अनुवाद कत्तहुसँ अनुवाद नहि मैथिलीक सुच्चा माटि-पानि संग ओही स्वादमे ठाढ़ "वसुधैव कुटुंबकम" सन वसुधैव कष्ट एकदृष्टमक सूचना दैत जागृत अछि।
बेसी काल रचना विन्दु आ रचनाकार एकाकार नहि भऽ पवैछ ,परंच रामलोचन ठाकुरजीक रचना कखनहुँ हुनकासँ फराक दृष्टिगोचर नहि होइछ। हुनक रचना बहुत संगठित लोकशक्तिक उदय आ‘ विस्तारक ओहि सम्भावनासँ परिचय करेबाक प्रयास करैत अछि जाहिठाम प्रतिफल विकासक बाटक प्रशस्त करत। विकाससँ सुख समृद्धि आ क्लान्त मुखमण्डल पर सुख उझलबाक काज रचना मादे कैल जा सकै छै एकर विश्वास हिनक रचना कैएक बेर दिएबामे सफल रहल।तखन ईहो कहब जे ओ इतिहास बिसरि गेल छलाह से नहि तँइ हुनका रचनामे क्रान्तिक ओ घवाह स्वर छैक जे अन्यत्र भेटब कम संभव वा ईहो कहि सकैत छियैक जे रचनाकार बेसी काल जाहिसँ परहेज करैए छथि। "आर जुनि उठा माथ बर्फ अम्बार नहि तऽ अइखन पकड़ब हम तरुआरि" जाहिमे सम्पूर्ण व्यवस्थाक प्रकृतिके विरुद्ध ठाढ़ होयबाक प्रयास जाहिमे वर्ग विशिष्ट नहि सभक लेल वर्तमानसँ संघर्षक घोष छैक , मैथिलीए नहि हिन्दीयोमे झट दऽ भेटब असंभवे बुझियौ। समृद्धिक फूहिआएब देखबामे अबैछ मुदा भाषा लेल भाषा समृद्धिक बरखा कम्महि भेटैछ। फूहीसँ सन्तोषक हरितिमाक विस्तारक आश मुदा स्थायी विस्तार लेल बरषा चाही ।जागरण, संगठन, सामाजिक दायित्वबोध आ’ समन्वित राष्ट्रीय दृष्टिक विकासक विविध बाट आ ओहि बाटपर प्रमुख अछि, स्वर्णिम अतीतक अवदानक परिचय द्वारा लोककेँ उत्प्रेरित करब। मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास पराक्रमक गौरव गाथासँ परिपूर्ण अछि। मुदा ठाकुर जी ओहि गौरवगाथासँ फराक भऽ एकटा नव दृष्टिकोण ठाढ़ करबामे लागल छथि जे नहि तऽ राजनीति प्रेरित अछि आ नहि कूनू विशेष धारा वा विचारसँ हुनक स्वतः स्फूर्त भाव जे किनको कम्युनिस्ट वा वामपंथी लगौन्ह परंच ओ सदति मिथिला आ मैथिलीपंथी थिकाह जाहि विषयमे जनबाक अनेक स्रोत अछि। ओ स्रोत सभ लिखित आ’ अलिखित दूनू अछि। जे लिखित अछि पढ़ल-लिखल लोक तकरा पढ़ि पढ़ि सामाजिक बोधसँ अभिभूत होइत रहलाह अछि आ जे लिखल नहि जा सकल, से लोक कंठहिक माध्यमे आइ धरि सुरक्षित रहि प्रेरणाक अजस्र स्रोत प्रवाहित करैत आबि रहल अछि। कूनू बेक्ति जखन कर्म आ दायित्व के चरम विन्दु तक पहुँचबाक प्रयास करै छथि तँ देखार होइ छथि। तहिना ठाकुरजीक रचना सेहो समाजक सभ वर्गक बोध पसारैत सभक लेल चेतौनीक काज सेहो करैए छथि आ अपना दिससँ संघर्षघोष सेहो।
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गीतकार रामलोचन ठाकुर
मैथिलीक आने विधाक अनुरूप मैथिलीक गीतक उपर आलोचक लोकनि कम्म ध्यान देलनि अछि। कविताकें विशेष महत्व द' मैथिली गीतक उपेक्षा कयल गेल अछि। यद्यपि मैथिली गीतक परम्परामे महाकवि विद्यापति जकाँ गीति-काव्यक पुरोधा नीक जकाँ मुखर छथि आ हुनका बाद सेहो बहुत नीक गीतकारक श्रृंखला रहल अछि, तथापि ई कहबामे कोनो अशौकर्य नहिं जे मैथिली गीत-विधाकें ओतेक मूल्य नहि भेटि सकल जे ओकरा भेटबाक चाही। यद्यपि भिन्न- भिन्न कालमे गीतकार- कवि द्वारा रचल सुमधुर गीत मैथिल जनमानसक कंठमे अपन माधुर्य संग लोकप्रिय होइत रहल मुदा गीतक आलोचना पक्ष आ अइ वास्ते अकादमीक सहयोगक दृष्टिकोणसँ गीत विधा कविता जकाँ जगह नै बना सकल।
मैथिलीक प्रसिद्ध कवि, रंगकर्मी, आंदोलनी, पत्र-पत्रिकाक माध्यमे मैथिलीक जन- जागरण कएनिहार श्री रामलोचन ठाकुर जीक साहित्यिक अवदान बेस व्यापक अछि। एकटा समर्थ कवि, मातृभाषा अनुरागी, आन्दोलन कर्मी, पत्रकार इत्यादि विभिन्न भूमिकाक नीक जकाँ निर्वहन करितो ठाकुर जी मूलतः मैथिलीक सुंदर भविष्य लेल, मिथिलाक उत्थान लेल चिंतित स्वप्नद्रष्टा छथि।
रामलोचन जीक गीत मूलतः मिथिलाक छायाचित्र अछि। व्यापक उद्देश्य सँ रचल गेल गीतक कैनवास नमहर अछि आ आने गीतकार जकाँ वस्तुनिष्ठ आ सूक्ष्म नै भ' पबैत अछि। गीतकार ठाकुरजी निश्चित रूपेण प्रगतिशीलता प्रतिनिधि छथि। हिनक गीत यथार्थक भूमि पर ठाढ भेल मजगूत घर जकाँ अछि। अपना समयक समाज आ देशक समुचित चित्र उपस्थित करबाक सफल प्रयास ठाकुर जी कयने छथि। हिनक गीत समाजक वर्ग- संघर्ष केँ, असमानताकेँ प्रतिध्वनि थिक। ई अपन गीतमे क्रान्तिक आह्वान करैत छथि। हिनकामे समतामूलक समाजक प्रबल भावना देखाइत अछि। हिनक गीत कोनो नवयुवतीक प्रति रचल गेल उपमा- उपमेय आ श्रृंगारक वर्णमाला नै, अपितु हिनक गीत भूख, ब्याधि, बेकारी, शोषण आ अपन भाषा- संस्कृतिक प्रति हिनक अगाध अनुरागक गान थिक। श्रमिक- मजदूर वर्गक आक्रोश, पलायन, भूखमरी, कृषकको अधोगति हिनक मूल- विषय रहलनि अछि।
अपूर्वाक भूमिकामे श्री नवीन चौधरी लिखैत छथि-"रामलोचन ठाकुर जीकेँ यशस्वी गीतकारक पतियानीमे देखब कोनो आलोचककेँ नै अघरतनि। एहि पोथीक गोटेक दर्जन गीतमे ओ सामर्थ्य छै।" हम आदरणीय चौधरी जीक एहि कथनसँ सहमति नै रखैत छी। यथार्थक तेहेन स्वर ठाकुर जीक गीतमे प्रमुखता सँ उपस्थित छन्हि जे निश्चित रूपेण हिनका अग्रणी गीतकारक रूपमे स्थापित करैत अछि। ठाकुर जीक गीत परम्परागत गीतसँ पृथक अछि। हिनक गीतक कथ्य आ शिल्प दुनू परम्परा सँ अलग अछि। उदाहरण लेल- हिनक गीत " उठ - उठ रओ बौआ"मे ठाकुर जी कहैत छथि-" काल्हि जनगणना थिक गामे पर रहब, ठीक - ठीक लिखाएब कने जेना - जेना कहब, माइक जे भाषा से मैथिली लिखाएब, देखब हिन्दी ने लिखए मुझौसा-"
एकटा दोसर गीतमे लोक गीतक शैली लिखल पर ई बेस चोटगर अछि_ " करिया झुम्मरि खेलै छी, ढील पटापट मारै छी, लीख पटापट मारै छी, शोणित पीबै जे मनुखकेँ, तकरे मारै - जारै छी,"
हिनक एकटा प्रसिद्ध गीत अछि-'बिढनी कटलकौ,तुम्मा फुलेलकौ, फेर कन्हुआइ छौ तोरे पर'। ई गीत पाँच बरख पर नेतालोकनि द्वारा चुनाओ जीत क' जन- समुदायक शोषण पर बेस धरगर प्रहार अछि। संगहि, गीतकार अइ गीतमे मतदान करय बला समुदायकेँ चेतौनी द' रहल छथि।
शिल्पक दृष्टिसँ गीत लेल आवश्यक छैक ओकर गेयता।ताहि लेल आवश्यक छैक जे ओकर अंतराक मीटरमे तारतम्य होइ जाहिसँ ओ प्रभावी रूपे गाओल जा सकय।मुदा ताहि दृष्टिकोणसँ हिनक गीत बेसी ठाम उपयुक्त नै लगैए।उदाहरण लेल-
"सखि हे हम की गायब गीत" शीर्षक मे कोनो अंतरा तीन पाँतीक अछि त' कोनोमे चारि -पाँच पाँतीक। तहिना -" इतिहास युग नवीन के" आ " क्रांतिक आह्वान " मे सेहो साम्यताक अभाव। हिनक बेसी गीतक शिल्प नजरिए ओतेक प्रभावी नै। पोथी 'अपूर्वा'क प्रारंभमे आदरणीय सुनील चौधरी ललन जीक ई कथन -" रामलोचन ठाकुर लग कतोक वस्तुक अभाव छनि। आलोचनाक निष्पक्ष कसौटी पर राखि क' देखल जाए त' किछु दोष अवश्य भेटत। ठाम - ठाम हुनकर मान्यतासँ सहमति होएब कठिनाह बुझि पड़त......। "सँ हमहुँ सहमति रखैत छी। प्रगतिशीलता आ यथार्थवाद केँ समेटैत,परम्परागत गीत-शैली केँ अनठबैत जँ अहाँ हिनक गीतक उद्देश्य आ विषय-वस्तुक प्रासंगिकता मात्र धरि ध्यान राखी त' हिनक गीतकारी नीक छनि आ मिथिला- मैथिल लेल प्रभावोत्पादक छनि। मुदा, ओइमे आन आवश्यक गुणक अभाव। रामलोचन जी बहुतो विधा पर अपन कलम चलौलनि।एकटा गीतकारक संभावनाक रूपमे जँ विचार करी त' ओ विषय - चयन आ तत्कालीन परिवेश ( अखनहुँ प्राय: ओहिना) केँ चित्र उपस्थित करबामे सफल छथि मुदा गीतक आन तत्वक अभाव कारणे ओ बेसी काल धरि गीतकारक रूपमे आकर्षक नै लगै छथि।
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Suggested citation: डा. वन्दना किशोर. “एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर: रामलोचन ठाकुर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 319, 2021-04-01. https://www.videha.co.in/research/2021/319/एहन-जड़िआयल-समाजमे-महिला-कोना-उतरतीह-मैथिली-रंगमंचपर-रामलोचन-ठाकुर.htm

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