विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर

चंद्रेश · 2021-04-01 · अंक 319

चंद्रेश-संपर्क-9430640883
प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर

रामलोचन ठाकुरक पहिचान प्रतिरोधी साहित्यकारक रूपमे। ओ सदैव संघर्ष चेतनासँ संपृक्त भऽ व्यवस्थामूलक विरोधमे अपन कलमकेँ हथियार बनौलनि। हुनका केखनो समझौतावादी गंध पसिन्न नहि छलनि। ओना किछु समझौता अबस्से जीवन संघर्षमे करए पड़लनि अछि जकरा मनुक्खक दुर्बलता ओ विवशता बूझि अवहेलित कएल जा सकैत अछि। ओ यथास्थितिवादकेँ तोड़बाक प्रयास अपन कथनी ओ करनीक माध्यमे अबस्से केलनि अछि।
ओ लिखलनि से जमि कऽ लिखलनि। हिनक दर्जन भरि मौलिक आ अनूदित पोथी आएल अछि। बहुत रास रचना पत्रिकाक पातपर अछि। एहि रचना सभमे हिनक मानसिक परिवेश आ अन्तर्निहित मनोवैज्ञानिक सत्य खूजि कऽ उभरल अछि से वैविध्य परिवेशमे विभिन्न छवि-छटा नेने विविध अर्थमयी भऽ आएल अछि।
ओ बौद्धिक रचनाकार छथि। हिनक भाषामे सहज सौंदर्यक दृष्टि अछि। ओ विभिन्न वयक लोकक लेल विविधतामे रचना केलनि। एहिमे व्यवहारिकता सार्थकता आ स्वाभाविकता अछि तँ किछु रचना अबस्से गुरू गंभीरतामे आएल अछि। जखन जीवनक वर्तमान आ भविष्य डवाँडोल बुझाइत छैक आ अतीतक फरफराइत पन्ना मूँह दूसए लगैत छैक तँ स्वाभाविक थिक जे आँखिक आगा अन्हार या छापि कऽ इजोतकेँ मटियामेट करबापर तूलि जाइत छैक। एहने दुःस्थितिमे हिनक अनुभव,सोच आ दृष्टिसँ ओहि अन्हरियाकेँ फाड़बाक ब्योंत अपन रचनाक माध्यमे प्रस्फुटि भऽ करबैत अछि। ओ केखनो काल जँ गुम-सुम भऽ चुप्पी लाधितो छथि तँ ओ तैयो संकेतक भाषामे बहुत किछु कहि दैत छथि जे कहबे केलनि।
हिनक सभ हीत-मीत अछि आ केओ नहियो अछि। कारण आपकतामे रहितो ओ ओहि व्यक्तिकेँ चुट्टी काटबासँ परहेज नहि करैत छथि जनिक काज अनसोहाँत बुझाइत छनि। तें शत्रु बनाएब आ राखब हिनका पसिन्न छनि। कारण, दूमूँहा चरित्रकेँ उघार करबासँ ओ केखनो परहेज नहि करैत छथि। उदाहरणस्वरूप एकटा नहि बहुतो घटना घटित भेल अछि जे हिनक कलमक नोकपर चढ़ि कऽ कागतपर उभरल अछि। ओ विविधाकेँ दुविधा कहि प्रचारित-प्रसारित केलनि।
हिनका जखन जे आवश्यकता बुझेलनि से लिखलनि। गद्य ओ पद्य दूनू लिखलनि। ओ बात-बातमे बातकेँ रखलनि। कही तँ छिलका छोड़ा कऽ प्रस्तुत कऽ देलनि। अपने 'बेताल कथा' (१९८१) हास्य-व्यंग्य पोथीमे सात गोट आलेखक माध्यमे विभिन्न विषयादिकेँ उठा कऽ जीवंततामे चरित पुराणकेँ राखि देलनि। जेना 'कुर्सी महात्म्य'मे स्पष्ट रूपे लिखलनि अछि "विभिन्न जाति आ धर्मक बीच झगड़ा बझेबाक प्रयास हो। आ एहि सभ काजक लेल प्रचुर मात्रामे चमचा प्रोडक्सन हो। आर कतेक रास बात छैक जे तोरा ओ कुर्सी स्वंय सिखा देतह (२१)"। आजुक राजनैतिक परक स्थिति-पातकेँ उठा कऽ जे ओ व्यवस्थापरक छिद्रान्वेषणकेँ देखार केलनि अछि से वस्तुतः कोनो निर्भीक साहित्यकारे इमानदारीपूर्वक दृढ़तामे कऽ सकैत अछि जे ओ केलनि अछि। आजुक भ्रष्ट सत्ता-व्यवस्था अपन तिकड़मी चालिमे बझबैत दूमूँहा चरित्रकेँ देखार करैत अछि। ई ओ विभिन्न अवसरपरक बहुत किछु खूजि कऽ वा मौन भाषामे कऽ देलनि अछि। हिनक भीतर जे जन-समाजक अपसंस्कृतिक गादि अछि तकरा ओ ताकि कऽ जमा केलनि अछि आ ओहि कूड़ा-कर्कटकेँ मानसिकतासँ बहरिया कऽ फेकि देलनि अछि। समाजक मूँहपर ओ समाधानपूर्वक थापड़क चोट देलनि अछि। ई सत्य अछि जे हिनक रचना जन-मानसक बातकेँ उठबैत जन-जीवनकेँ झकझोड़ैत अछि। ओ जन-जनक पीड़ाकेँ अपन पीड़ा बना सार्वजनिक कऽ देलनि अछि। ओ आत्मकथ्यकेँ जगतकथ्य संग सामंजस्य स्थापित कऽ सर्वजीन बनबैत छथि। किछु बात ओ व्यंग्यक माध्यमे सेहो चुप्पी सधैत संकेतक भाषामे कहि दैत छथि। तें ओ 'विद्यापतिक बर्खी'मे कहि उठैत छथि-"आजुक मैथिल जाति भूतजीवी आ भूत प्रेमी थिक, ओकरा वर्तमान आ भविष्यक कुनू संबंध-सरोकार नहि छैक। एहि प्रकारे ओ जे मैथिल जातिपर चोट केलनि अछि से कसगर चमेटा कसैत ओकर स्वाभाविक गुणकेँ निखारलनि अछि।
रामलोचन ठाकुर मूलतः आ प्रसिद्धतः कवि छथि। हुनक कैकटा मैथिलीक पोथी से कविता संग्रह अछि जेना इतिहासहंता, माटि-पानिक गीत, देशक नाम छलै सोनचिड़ैया, प्रतिध्वनि, अपूर्वा, लाख प्रश्न अनुत्तरित अछि। आजुक कविताकेँ ओ संपादित केने छथि। ओ कैकटा पत्रिका यथा रंगमंच विषयक पत्रिका रंगमंच, अग्निपत्र, सुल्फा, मैथिली दर्शन ओ मिथिला दर्शन आदिकेँ सफलतापूर्वक संपादित केने छथि। ओ रंगमंचक कलाकार रहथि। एहि क्रममे ओ किछु नाटकक अनुवाद सेहो केने छथि जे पत्रिकाक पातपर आएल अछि यथा जादूगर, फाँस, रिहर्सल अछि। ओ संस्मरण सेहो लिखलनि। स्मृतिक धोखरल रंग हिनक प्रमाण अछि। तहिना आँखि मुनने आँखि फोलने सेहो अछि। आँखि मुनने आँखि फोलने पोथीमे २४ गोट आलेख अछि। बुद्ध एवं अन्यान्य पादगणसँ लऽ कऽ दोषीक दोष धरि। एहिमे किछु नव-नव तथ्यक खोज सेहो केलनि अछि। जेना पाद लोकनिमे २६ गोट पादक उल्लेख नाम सहित भेल अछि। मुदा एहि पाद लोकनिक जन्मस्थानक संबंधमे आ मैथिल हेबाक संबंधमे अर्थात प्रमाणिक विश्वसनीयताक उल्लेख नहि करब अबस्से कमी बोध देखबैत अछि। कहब जे कोनो एकटा निबंधमे सभटा बातक उल्लेख होइतो नहि अछि। जे स्वाभाविक थिक मुदा चौरासी गोट सिद्धमे कतेक मिथिलाक छथि ताहि प्रसंग सिद्ध नहि करब से आलेखकेँ हलुकाबैत अछि। तें की? ओ जतेक काज केलनि से तँ आधार भूमि देबे केलनि। ओ तँ स्वयं मिथिला विभूति महाकवि डाकक आलेखमे स्पष्टतः उल्लेख केलनि अछि जे हिनक (डाकक) जन्मस्थान तथा समयक संबंध एखनो धरि निस्तुकी नहि भऽ पाओल अछि। जे किछु, रचनाकारक इमानदारी स्पष्टतः लौकि जाइत अछि। २४ गोट आलेख जे एहि पोथीमे अछि से मुख्यतः मिथिला विभूतिक कहल जाएत। ओना एहिमे बेसी गुजरि गेल छथि मुदा सोमदेव छथिए। किछु आनो आलेख जेना समकालीन कथाक सौंदर्यबोध, मैथिली लोक साहित्यः उत्पति, उपयोगिता, अनुसंधान, नाट्यमंचक विकासमे पत्रिकाक योगदान, भतरस लेल भाषा आएल अछि। ओ लिखैत छथि, जतए विशेष छनि से प्रकट करैत छथि। मुदा हिनक आलेख सभमे ओ व्यापकता आ विशदता नहि भऽ पबैत अछि जे हेबाक थिक। कारण थिक संक्षिप्तता। ओ जनैत छथि जे एखन पैघ आलेख पाठक पढ़ए नहि चाहैत छथि। कारण, धैर्य ओ समयक अभाव कहि सकैत छी। मुदा नीक आलेखक पाठकक अभाव कहियो नहि रहल अछि। तैयो ओ जतबे जे किछु आलेख लिखलनि आ जाहि समयमे लिखलनि तकर मोल अछिए। समृतिक धोखरल रंगमे तँ कोलकाताक प्राचीन नाम कलकत्ताक विभिन्न विषयक योगदानपरक दस गोट आलेख अछि। कलकत्ताक साहित्यिक, सांस्कृतिक विषयक बात-विचारकेँ बुझबाक लेल ई पोथी लाभप्रद अछि। कहब जे कविवर आरसी प्रसाद सिंहपर स्वतंत्र आलेख अछि आ ओ कलकत्ताकेँ अपन कर्मक्षेत्र नहि बनौलनि। स्पष्ट अछि जे कोनो रचनाकार कोनो समय-क्षेत्र विशेषक होइतो हुनक रचनाक गमगमी दग्-दिगंतमे पसरैत अपन सार्थक अनुभूति करा जाइत अछि। ईहो सत्य अछि जे रामलोचन ठाकुर देखल-भोगल अनुभूतिक चित्रण करैत छथि। तें रचना सभमे अपन सार्थकताक बोध करबैत छथि। कहब जे कोनो रचनाकारकेँ अपन आत्मकथाक बोध नहि करेबाक चाही जे ओ करौने छथि। ई ओ एहि कारणे केने छथि जे हिनक व्यक्तित्व अपन कृतित्वक संगहि अछि जकरा ओ देखार केने छथि। ओ काज केने छथि से साहित्यधर्मिता ओ आन्दोलनधर्मिता निर्वाह करैत केने छथि। ई हुनक मिथिला-मैथिलीक प्रति पूर्णतः समर्पण भाव थिक। ओ विशुद्ध कवि छथि। हमरा जनैत नीक कविता लिखब बड्ड कठिन काज होइत अछि। कारण,नीक कविता ओ होइत अछि जकर अर्थ मात्र कवितेमे सीमित भऽ कऽ नहि रहि जाइत अछि। प्रत्युत ओकर मर्म पाठकीय अन्तर्मन धरि पैसि कऽ ओहि पाठकीय मानसिकताकेँ सदैव हौंड़ैत रहैत अछि। जतेक खेप पढ़ब ततेक नीक आस्वाद ग्रहण करैत जाएब। ईहो कहि देब अनर्गल नहि हएत जे कोनो कविक सभटा कविता नीके नहि होइत अछि। तखन अनुपातमे सम्मान देबेए पड़ैए। ईहो सत्य अछि जे कालजयी कृति अबस्से जटिल स्तरपर आधृत होइत अछि जे बेर-बेर पढ़लापर नव आस्वाद करबैत अछि। रामलोचन ठाकुर सभ तरहक आ सभ वयसक लेल कविता लिखलनि। तें बालसँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक कविता आएल अछि। एहिमे किछु नीक कविता अबस्से अछि। किछुमे आक्रोशमूलक स्वर विशेषे भऽ आएल अछि। खौंझाहटिमे लिखल गेल कविता कनेक विशेषे उग्र भऽ आएल अछि। किछु कवितामे बौद्धिकताक ताप अछि। जे गंभीरता लेने आएल अछि। मिथिलाक आचार-विचार ओ सभ्यता-संस्कृति सेहो कतिपय कवितामे अभिव्यक्त भेल अछि। सृष्टि विस्तारक क्रममे हिनक कविता सभ उत्थानपरक अछि। कैकटा कविताक सरलता ओ सहजता जे अभिधात्मकतामे अछि तँ सेहो ताहि ढंगे जाहि शिल्पमे रचित अछि से विशेषे बनैत अछि। ओ स्वयं स्वीकारने छथि जे –
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हमरा सभकेँ अपने लिखबाक अइ
अपन इतिहास
जे सरिपहुँ थिक संघर्षक
वर्ग संघर्षक
(इतिहासहंता-समानधर्माक नाम)
हिनक छोट-छिन कविता सभ सेहो संघर्षक चुनौती दैत अछि। कविता छोट हो वा कि पैघ से ततेक महत्व नहि खैत अछि। महत्व अछि जे जन-संवेदनाकेँ झकझोड़बामे कोना की जीवन सत्यसँ साक्षात् करबैत अछि। समाजक विडंबना, विसंगति, विद्रूपता आदिकेँ को तरहें आ कोना कऽ प्रस्तुति कएल गेल अछि जे जन-जनक हियमे पैसिक कऽ अपन समार्थ्यबोध देखबैत अछि। समयबोध अबस्से निरखरि उठए एहि सभ बातकेँ रामलोचनक कवि हृद्य नीक जकाँ जनैत-बुझैत छथि। ओ नीक जकाँ जनैत छथि जे बिनु विचारें रचना भैए नहि सकैत अछि। हिनक रचनामे विचार आएल अछि से रचि-पढ़ि कऽ। कतहुँ जँ अलगलो अछि तँ तेना भऽ कऽ नहि। तें रचना विशेषे मूर्त अछि, अमूर्त नहि। ओ उदारीकरणपर चोट करेत लिखैत छथि-
"ई गिद्ध सभ नहि खाइछ माँस
माँसक दू टूक ल उड़ि जाइछ
दूर देश
बिना कोनो रोक-टोक निर्यात
उदारीकरण
(एहि महाश्मसानमे- लाख प्रश्न अनुत्तरित)
ओ स्वयं नाटककार छथि। नाटकीय कला-कौशल छनि। एहि नाट्य तत्वकेँ सेहो अपना रचनाक माध्यम बनौलनि अछि। नाटकीय गुण हेबाक फलस्वरूप हिनक कतिपय रचना उतार-चढ़ाओक क्रममे अछि। ओ अपन झिवनक खूजल पन्ना पढ़बाक लेल 'सागर लहरि समाना'(२०१७) लिखलनि अछि जे जीवनक पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित भऽ आएल अछि। ई पोथी संस्मरणात्मक होइतो आत्मकथाक बहुतो अंशकेँ समेटने-बटोरने अछि। तें ओ आत्मकथात्मक पोथी कहल जा सकैत अछि। एहिमे मिथिला-मैथिलीक गतिविधिक बहुतो बात आएल अछि। सांस्कृतिक कार्यक्रम, आन्दोलनपरक बात सभ आएल अछि। लोकक चरित्रकेँ नाँगट-उघार करैत ओ स्वयं लिखलनि अछि-
किछु लोक कूपक बेंग सन
संसारकेँ जनैत अछि
इतिहासकेँ आरंभ अपने
जन्मसँ मानैत अछि
ओ समय आ समाजपर कटाक्ष करैत बहुतो बात सभक जीवंत चरित्र चित्रण केलनि अछि। आपकताकेँ बचा कऽ रखबाक चिन्ता सदैव रहलनि अछि। ओ जखन कोनो दरंगी नीतिकेँ देखलनि आ से साहित्यकारगणमे महंथी साहित्यकारक कुत्सित क्रियाकलापकेँ देखलनि तकरा ओ खुजि कऽ उघार करबे केलनि। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक बुझैत ची जे मेथिलीक बहुतो उर्जस्व रचनाकार लोकनि मैथिलीक महंथ लोकनिक खडयंत्रकारी नीतिसँ उबिया कऽ मैथिली लिखनाइ छोड़ि देलनि। फल भेल जे ओहन रचनकारक अमूल्य लेखन रत्न-मंजूषासँ सजग पाठक वर्ग वंचित रहल आ भ्रष्ट गोलौसीवाद महंथ लोकनिक अपन सड़ल-गलल रचना लऽ पुजबैत रहलाह, सम्मानित होइत रहलाह आ स्वार्थवादी नीतिमे पाठककेँ अपन रचना पढ़बाक लेल बाध्य करैत रहलाह। यैह सभ रामलोचन ठाकुरक रचनाकारकेँ ारो धधकबैत रहल। ओ स्वयं पजरैत रहलाह आ बहुत किछु लिखबाक लेल बाध्य होइत रहलाह।
ओ सफल अनुवादक छथि। जा सकै छी किन्तु किए जाउ, पद्मा नदीक माँझी, नंदितनरके आदिक सफल अनुवाद केलनि। हिनका जनसम्मान अबस्से बेटलनि। एहिमे भाषा-भारती सम्मान, प्रबोध साहित्य सम्मान किरण साहित्य सम्मान आ आनो संस्था सभक सम्मानसँ ओ समलंकृत भेलाह अछि।
अतेक तँ अवश्य कहल जाएत जे ओ लिक्खाड़ छथि। ओ जे किचु लिखलनि से अबस्से अपन जीवनमे भोगल यथार्थकेँ उभारलनि। संबंधक बदलैत दवाबमे समाजिक मुद्दा सभकेँ उठा कऽ रखलनि। हिनक दूरदृष्टि अबस्से रहल अछि जे सभ समाजिक दवाबमे लिखल गेल कही तँ प्रखर चेतनाक स्वर लऽ आएल अछि। एकटा बात ईहो कहब अनर्गल नहि हएत जे हीत-मीतसँ बेसिए ओ शत्रु बनौलनि। तैयो जे ओ हपन नव जमीन लेखनक उर्वराशक्तिसँ बनौलनि से अबस्से कहल जा सकैत अछि आ यैह बात हमरा नीक लगैत अछि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: चंद्रेश. “प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 319, 2021-04-01. https://www.videha.co.in/research/2021/319/प्रतिरोधी-साहित्यकार-रामलोचन-ठाकुर.htm

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