विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2021-04-01 · अंक 319

रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना
कोलकाता मिथिलासँ बाहर बहुत झमटगर सृजन भूमि रहल अछि मैथिली डायस्पोरा लेल। एकर स्पष्ट कारण शायद ई रहल अछि जे लोक कोलकाता तँ जरूर जाइत छलाह काजक तलाशमे मुदा आत्मासँ गामे रहैत छलाह। ऊपरसँ ओहि भूमिमे भेंट जाइत छलथिन गामक लोक, दोसर गामक सम्बंधी, हित-मित्र, जानकार आ कियोक नहि तँ मैथिली भाषा बजनिहार। बस भऽ जाइत छलनि आप्त प्रेम, सरोकार,परदेसमे अपन देसक लोक आ बात विचार। फेर बनि जाइत छल अड्डा नौकरीकेँ बादक नौकरी तकबाक भऽ जाइत छल ओ स्थान रोजगार कार्यालय। सब पुरान लोक लागि जाइत छलाह अपन-अपन तरीकासँ नौकरीकेँ जोगारमे। आ शुरू भऽ जाइत छल कविता साहित्य, नाटक, आदिक निर्माण । ई सब एहि लेल होइत छल जे लोक अपन गामक कमीक अनुभव नहि करथि। ओहुनासँस्कृति स्वभावसँ नॉस्टैल्जिक होइत अछि। नोस्टाल्जिया तखन अपन प्रभाव देखेतैक जखन लोक अपन जड़िसँ फुनगी दिस बढ़तैक। कोलकातामे सएह भेलैक। रामलोचन ठाकुर ओहिपरदेसमे देसक खोज करैत छलाह। मैथिली जेना हुनका भंगिया देने होनि! लगातार रचना आ बादमे पत्रिका केरसँपादन आ देखरेखमे व्यस्त रहला। की-की कएलनि से किनकोसँ छुपल नहि अछि।
आब अबैत छी रामलोचन ठाकुरक एक पोथीपर। पोथीक नाम छैक "मैथिली लोककथा"। नामे ज्ञाने ई कथा नेनपनसँ लेखककेँ सुनल कथा केर स्मरण करैत लिपिबद्ध करबाक यत्न कएल गेल छैक। निश्चित रूपसँ ई उत्तम प्रयोग आ पोथी छैक। कथा लोकक छैक। लोककंठसँ सुनल छैक तँ स्वाभाविक छैक जे कथापर लोकक अधिकार छैक। अहि पोथीमे कुल जमा 36 कथाकसँचयन छैक: 1. हिरामनि सुग्गा 2. अबकी बेर फतंग 3. महाराज बिक्रमादित्य4. गदहा खेने कोनो ने दोष 5. एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया 6. काजरि7. सदबा-बदबा 8. एकटा बुढ़िया रहय 9. एकटा गरीब बाभन रहथि 10. नारदमुनि आ सांप 11. लाल बुझक्कर 12. जामुन अन्त न पाबेउ 13. राभणो नतु रावण 14. मीतारे 15. ठठपाल 16. एकटा रहथि राजा 17. एकटा गरीब बाभन रहथि18. महाकाली19. पतिबरता 20. एगो रहथि राजा 21. चिन्ता रोग 22. हम देवी चंडिके23. एगो रहए जोलहा 24. चतुर भागिन 25. चिल्हो सियारो 26. शीत-बसंत 27. हंसराज-वंशराज28. झोड़ाकपरताप 29. मोहन बरही 30. पड़ोसियाक दुनू 31. चारबाह राजा 32. अहदी 33. कुल्टा34. दिलजान साहु35. गल हस्तेन धोधरः 36. लिखलाहालोक बहुत सहज आ बहुत जटिल शब्द छैक। एकरा सब कियोक बुझैत छी आ सब कियोक भ्रममे रहैत छी। एहेने भ्रमक स्थिति रामलोचन ठाकुरकेँ छनि। ओ पहिने शास्त्रीय, प्रमाण, हिंदी साहित्यक प्रमाण आ वैश्विक प्रमाणसँ लोक शब्दक व्याख्या सन्दर्भ-कथामे (अथवा भूमिका) करैत छथि। वृहद्विष्णुपुराणसँ शुरू करैत, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति होइत हज़ारीप्रसाद द्विवेदीसँग मैक्सिम गोर्की तक केर भाव स्पष्ट करैत हुनकर लोकक भावसँ पाठककेँ अवगत करेबाक लघु किन्तु गंभीर प्रयास करैत छथि. मुदा एक बात, हमरा बेर-बेर एना बुझना गेल जेना ओ लोकक अर्थ ओहेन जन सामान्यसँ बूइझ रहल होथि जे बहुत शिक्षित आ विकसित नहि होथि। ई लोकसँग साहित्य आ तथाकथित एडवांस विषय अथवा शास्त्रीय विचारधारा केर विद्वानक वायरस जकाँ अछि। लोक, लोककथा, लोकविद्या अलग-अलग बात भेल। लोकविद्या ओ विधा भेल जाहिमे लोक ज्ञान, लोक ज्योतिष, लोक चिकित्सा, लोककृषि, लोकगीत, लोकसँगीत, लोककथा, जेंडर स्टडीज, नूतन प्रयोग, श्रृंगार, समाज आदिक बातपर विचार होइत अछि। जकरा ई लोक कहैत छथि तकरा पश्चिमक लोक पोपुलर कहैत अछि। तखन लोक की भेल? लोक भेल एक निश्चित भूभागमे रहय बला मानव समुदाय जे अपन भाषा,सँस्कृति, प्रकृति, स्थानीय ज्ञान, परंपरासँग रहैत अछि जाहिमे स्त्री, पुरुख, बच्चा, बुढ़, सब कियोक अबैत छथि। जाहिमे माटिक लोक आ माटिसँ बाहर रहनिहार प्रवासी सेहो अबैत छथि। आजुक युगमे लोक एक प्रजातान्त्रिक समूह छैक। आजुक युगमे एक व्यक्ति लोक छथि आ वैह मॉडर्न अथवा शास्त्रीय सेहो छथि। तखन लोक भेल की? लोकक मादे ई प्रश्न एखनो ठाढ़े अछि।
लोक कहीं ओ तँ नहि जे लिखल नहि हो? आ शास्त्र ओ जे लिखल हो? नहि, ईहो बात नहि अछि। उपलब्ध ज्ञान आ डाटाबेस कहैत अछि जे मौखिकपरम्परा आ लोक अलग-अलग बात अछि। कतेक मौखिकपरम्परा एहेन अछि जे लोक नहि अछि, आ कतेक लिखितपरम्परा एहेन अछि जे लोक अछि। उदहारण स्वरुप वेद, उपनिषद तँ श्रुतिपरम्परा अछि मुदा लोक नहि अछि। सुकरात कहियो अपन बात नहि लिखलनि। ओ बजैत रहला आ हुनक शिष्य सब सुनैत रहल। ओ कहैत छलाह जे लिखलासँ ओहि बातक उपयोगिता खत्म भले नहि होइक लघु अवश्य भऽ जाइत छैक। ओ लिखित ज्ञानकेँसँग्रहालयमे राखल मृत वस्तुसँ तुलना करैत छथि। आर-त-आर रामलोचन ठाकुर जीक अहि पोथीक अंतिम कथाक नाम छनि "लिखलाहा"। लिखब केर अर्थ भेल ठोस प्रमाण; अंतिम सत्य; शब्द ब्रम्ह; अथवा तुलसीदासक रामचरितमानसक प्रसंगसँ बात करी तँ सत्यम शिवम् सुन्दरम। मुदा लिखब सेहो लोक भेल। विद्यापति अपन गीत अवश्य लिखने हेताह। बादमे ओकर महत्ता देखैत लोक ओकरा अपन कंठक चिपमे सदा सर्वदा हेतु सेव कऽ लेने हयत। ई भ्रम ओना तँ बहुत ठाम अछि मुदा भारत आ विशेष रूपसँ मिथिलामे अधिक अछि कारण जे लोकपर फोकलोर, एथनोग्राफी, मानवविज्ञान आदिक विद्वान सब काज नहि कऽ रहल छथि। अतेक स्पष्टीकरण देने बिना हम अपन बात कें आगा नहि कहि सकैत छी। ताहि कनि चर्च कएल।
आब पुनः पोथी दिस बढैत छी। कथा लिखित हो अथवा श्रौत जखन लोकमे अबैत छैक तँ लोक ओहि कथाक मूलकेँ रखैत अछि आ अपन ज्ञान, शब्दावली, भाव, भंगिमासँ ओकरा अपन अंदाजमे प्रस्तुत करैत अछि लोकक मादे मौखिक कथा सब दिन सब ठाम, नव शब्द सबसँ नित नूतन स्वरुप ग्रहण करैत छैक यद्यपि कथाक मूल भाव शास्वत रहैत छैक। लोककथा (वाचन कथा या कथा वाचन) मूलतः तीन ढंगसँ लिपिबद्ध होइत अछि:पहिल, ओहि समाजसँ कोनो बाहर केर व्यक्ति द्वारे। ई काज मानवविज्ञान, फोकलोर अथवा एथनोग्राफी केर लोक करैत छथि। हुनका एहेन ट्रेनिंग रहैत छनि जे जाहि तरहे कथा वाचक हुनका सुना रहल छथिन तहिना ओ लिखथि। ओहिमे कोनो तरहक सुधार अथवा अपना दिससँ किछु नहि जोड़ैथ।सँभव हो तँ एक कथा अलग-अलग व्यक्तिसँ सुनिक लिखथि। दोसर, कतेक स्थिति एहेन होइत छैक जखन लोक अपन समाजमे काज करैत छथि। मुदा हुनकासँ आशा ई रहैत अछि जे ओ ई बिसरि जाथि जे ओ ओहि समाजक हिस्सा थिकाह। आ गंभीरतासँ ओतबे लिखथि जे कथा वाचक अथवा वाचिका कहि रहल होथि। ई कनि सहज काज नहि छैक। लोक नहियो चाहैत पूर्वाग्रही भऽ सकैत छथि। एहि तरहक काज करेबला लोककेँ ऑटो- अन्थ्रोपोलोजिस्ट कहल जाईत छनि। चंदा झा आदि विद्यापति गीत लोकसँ सुनबाक क्रममे अहि धरमक पालन नहि कऽ सकल छलाह। मुदा तकर प्रयोजन अते नहि अछि. अहिपर विस्तारसँ कहियो लिखब.
तेसर, एहेन जे जखन लोक अपन समाजमे प्रचलित सुनल कथाकेँ बहुत दिनक बाद अपन स्मरणसँ लिखैत अछि। रामलोचन ठाकुर तेसर श्रेणीक लोक छथि। हिनको कथावाचक कहल जा सकैत अछि। कहल की जा सकैत अछि, ई छथिए। जेना कोनो कथा वाचक कथाकेँ अपन भाव, भंगिमा, आ शब्दावलीसँ मनोरंजक आ प्रभावी बना सुनबैत अछि तहिना ई कथा सबकें अपन श्बवालीसँ सजेने छथि। ओहिमे व्याकरण, आ श्ब्द्संयोजनासँ आकर्षण उत्पन्न केने छथि। ताहिं हिनक कथा मूल कथा बुझल जाए। उपरसँ अपन दाई पितियाइनसँ सुनने छथि से ई स्पष्ट करैत अछि जे कथापरम्परासँ एक पुस्तसँ दोसर पुस्त दने चलैत हिनका लग आबि गेल छनि। आब ई कथाकेँ कहि कऽ नहि लिख कऽ अपना पीढ़ी आ आबय बला पीढ़ीकेँ शास्वत प्रमाण केर रूपमे हस्तांतरित कऽ रहल छथि - चरैवेति- चरैवेतिक निनादसँ कथा बढ़ि रहल अछि।कहैत चली जे रामलोचन ठाकुर बहुत साकांक्ष भेल कथा लिख रहल छथि। कोनो कथा एहेन नहि भेटत जाहिमे ठोस आ ठेस मैथिली केर शब्दावली नहि भेटत। नीक तँ ई हएत जे आलेख केर अंत मे हिनका द्वारे व्यवहृत ठेठ शब्दक एक ग्लोसरी बना दी। मुदा ताहि अवस्थामे अएबाक हेतु अहि पोथीपर कमसँ कम तीन खेप लिखनाई जरुरी अछि। प्रमाणक रुपमे किछु शब्द कें देखल जा सकैत अछि:“पातर, ओजीर, भोजन-साजन, हेट, दिवड़ा भीड़, पएर दाबि, पहरुआ, दू टूक, करमान, कौआ टाहि, ईतस्ततः, फुरफुरा क उठल, यार कें बाझ,हरलनि ने फुरलनि, टहाटही, मन मेछंत, चौर-चाचर, लहालोट, अहर बीतल, पहर बीतल,ठकमुरी,घेंट,चिड़ै मड़ा कें,डिगडिगिया,हरबिड़रो,सीधा सम्मर,नग्र,बिसनाइत,पहरू सभ,फूलें-फलें माति उठल,गाजु,पोखरिक भीड़,ले बलैया,खा लौक,कन-साग,गदहा बौरि गेल,मिस पड़ै छल,गदहा डोभ चरन्त, झी-चाकर,बोरसी,धुरखुर,बरबरना,लगे दाढ़ी पड़ोसे छूरा,कपारपर टिटही मरडाइ छइ,उफांट,पतिया-पराछुत,किछु मुनियां,चीन,फूजल ऊक,खलोदर,दरेग,अगहरी पात,मन मेछंत,तरबाक लहरि टिकासन,ठेसी,मकुनीहाथी,डांरथि,चुट्टीक धारी, सितुआ चोख”एखन अतबे अहि पोथीपर लिखब सहज बात नहि अछि। एकर अनेक बिंदु, कहबाक शैली, बातक प्रमाणिकता, आ लेखक महोदय केर निष्ठा किछु एहेन बात अछि जाहिपर गंभीर भेने नहि लिखल जा सकैत अछि।
आब कथा दिस फेरो बढ़ी। जेना-जेना हिनकरसँकलित आ हिनक मस्तिष्क केर मेमोरीसँ निकसल कथा सभ पढ़ने जायब, एक पाठकक रूपमे लोक सङ्ग लोक भेल जायब। जेना लोकमे होइत छैक तहिना हिनको कथा सभमे प्रकृति अर्थात चिड़ै चुनमुन, जानवर सब बजैत छैक। बाजब प्रमाण छैक। अतेक ठोस प्रमाण जे प्रकृति केर मानवीकरण कखनो अहाँकेँ बनाबटी अथवा अनसोहात सन नहि लागत। लोककथामे नदीक प्रवाह, बटोहीक चलब, फुलवारी, सब किछु अबैत छैक। धोबिया घाट, ब्राह्मणक दरिद्रता, जोलहाक चतुराई, सब किछु अबैत छैक। लोककथा लोककेँ कथा सङ्ग जोड़ैत छैक। रसद सङ्ग चलैत बैलगाड़ी बनिया आदि सेहो अपन भूमिका सङ्ग रहैत छैक। लोककथा यथार्थक कल्पनाशीलता छैक। अहु बातक भान कथा सङ्ग एक गंभीर पाठक केर रूपमे अहाँ अवश्ये देख सकैत छी। लोककथा अपन भावकसँवेदना अनेक भाषा आ भाषाक प्रसंग जेना की फकड़ा , गीत, दोहा आदिक मादे प्रयुक्त होइत छैक। लोककथा अहि तरहें मोनोलॉग नहि मल्टी डायमेंशनल डायलाग होइत छैक। लोककथा एकरंगी विधवा परिधान नहि अपितु बहुरंगी चुनरी होइत छैक। अतय कनि कम साकांक्ष छथि रामलोचन ठाकुर जी। ओ गद्य जखन लिखैत छथि ताहि काल ओ अपन भाषासँ अलग लोकक आत्मामे नहि जा पबैत छथि। एकरा एना बुझु: कहियो कखनो मधुश्रावणी कथा सुनने हएब, अथवा गाम घरमे ककरो कथा सुनने हएब। ताहिमे अगर बनिया छैक तँ दोसर भाषा बजतैक। अगर पात्र दोसर भूमिकेँ छैक तँ कथा वाचक (अथवा वाचिका) ओकरा लेल अलग भषा केर प्रयोग करतैक। कथा वाचिक बात कहतैक, भंगिमा प्रदर्शित करतैक। ओ नाटकीयता कनि खटकि रहल छैक। मुदा रामलोचन ठाकुर एकरा लोकक एक ओहेन श्रेणी जे वाचिककेँ लिखितपरम्परामे बदलैत छथि, मूल कें यथावत रखने ओकर विन्यास आ सौंदर्यमे परिवर्तन करैत छथि तँ ईहो स्वीकार होबाक चाही।
मुदा जखने प्रसंग पद्यक अबैत छैक तँ लोकक निश्छल स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होमय लगैत छैक। उदाहरण स्वरूप "अबकी बेर फतंग" कथाकेँ देखू। ई कथा अपन शब्द शैलीमे स्मरणक पिटारासँ लिख रहल छथि लेखक । जहाँ की पद्य अबैत छैक लोक जेना जागि जाइत छैक:"थप्पा गनि-गनि रोटी पकओलनि गदहा ढोभ चरन्तघोड़ा बांस फसन्त निनिआ कहैत जे नेनिआ आएलिघर-पछुआर मे भुस्सा तइ मे ल गेल मुस्सा अबकी बेर फतंग" (पृ. 25 )
एहने सन भाव "गदहा खेने कोनो ने दोष" मे भेटैत छैक। ई एकर किछु मात्रक शब्दक दू आखर पूरा कथाक सीख बनि जाइत छैक। अंतिममे जखन ई कहैत छैक:"तीन राड़ एकसँतोष गदहा खेने कोनो ने दोष"
एकर आशय भेल जे तीन बुरीलेल (मुरखक बाहुल्य) अपन बेबकूफीसँ गलत काज करैत अछि तँ ओहिमे केहेन आश्चर्य! एकरसँदर्भसँ बुझक दरकार होइत छैक।
लोककथा गतिमान होइत छैक। कथा कहनहार आ सूनयबला दुनू गतिशील होइत छैक। गति सङ्ग जेना ट्रेन अथवा बसक सवारीमे खिड़की लगसँ नदी, पहाड़, झरना, धरतीक वैविध्य अबैत जाइत रहैत छैक आ यात्री गतिशील भेल रहैत अछि तहिना लोककथा केर कथानक पाठककेँ गतिशील बनने रहैत छैक। ई गतिशीलता कनि आरो डायनामिक भऽ जाई ताहि लेल गद्यमे पद्यक प्रवेश होइत छैक। रामलोचन जी बहुत गंभीरतासँ ई बात बुईझ पबैत छथि आ ओ पद्य सब हेरि अनैत छथि। एक उदाहरण "एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया"सँ देखल जाओ:
"बरदबला भाइ !परबत पहाड़पर खोंता रे खोंताभूखे मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइयातइलए पकड़ने जाइए "।
उपरोक्त पद पूरा कथाक आत्मा छैक आ पारिस्थिकीसँतुलन केर वेद मंत्र जेना काज क रहल छैक। कथाक पात्र मुनिया ई पद्य घोड़हिया, हाथीबला, आ खुद्दीबला सबसँ कहैत छैक आ ओकर समस्या केर समाधान भऽ जाइत छैक।
एक स्पष्ट उदाहरण देखू जाहिमे भावकसँवेदना आ कथ्यक गंभीरताकेँ डायनामिक बना भाषा केर देबार कोना तोड़ैत छैक श्रुतिकथा। ई पद्य "लालबुझक्कर" कथामे भेटत:"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पएर मे उखड़ि बान्हि कें हरिन चरक्का होइ।।"
कथा आगा बढ़ैत छैक। फेरो उपरोक्त पदक प्रथम पंक्ति केर बेस बनबैत दोसर पंक्ति केर मादे बात स्पष्ट होइत छैक :"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पहुँचे लगसँ काइट दो कि अपने बाहिर होइ।।"
आ अंततः कथा अपन यात्राक अंतिम पड़ाव दिस अबैत छैक:"लालबुझक्कर देखितहि बूझकि हो हाथी की अमरूद।"
बात बायोडायवर्सिटी केर लोककथा के मादेसँरक्षण केर बात करैत रही। एकर प्रमाण भेटैत अछि "जामुन अन्त न पाबेउ" नामक कथा मे। ई कथा अपन नामकरणसँ शुरू होइतसँस्कार धरि समस्त स्वरूपमे बायोडायवर्सिटीकेँ हारमनी प्रदर्शित करैत छैक। कोना लोक शास्त्रपर कखनोकाल बीस पड़ैत छैक आ कोना अपन पारिस्थितिकी ज्ञानसँ अब्बल होइत छैक तकर प्रमाण छैक ई कथा। जखन चारि दोस्त सामान्य वेश भूषामे राजा लग अबैत छैक त शास्त्रीय विद्वान लोकनि ओकरापर हँसैत छथिन। मुदा जखन ओ चारु लोकज्ञानी एक चारि पंक्ति केर पद्य मिल कऽ सुनबैत छैक त सभक होश उड़ि जाइत छैक। पद्य छैक:"जामुन अन्त न पाबेउ पीपर आनेउ नार उमर कटंती जानि क वर तर ठानेउ राड़।" आब कोना एकरा चारि मित्र कहैत छैक से देखल जाओ:"चारु दोस्त उठि क ठाढ़ भेल।पहिल कहलकै --- जामुन अन्त न पाबेउ दोसर कहलकै -- पीपर आनेउ नार तेसर कहलकै -- उमर कटंती जानि कचारिम कहलकै -- वर तर ठानेउ राड़।“ हमरा लगैत अछि ई कथा कनि विस्तृत विवरण आ विवेचना मँगैत छैक। से केना? एना जे किछु लोक जे अनेड़े लोकपर शास्त्र थोपने रहैत छथि आ अपना कें सर्वक्षेष्ठ स्थापित करैत छथि, एहेन लोकपर ई कथा निर्मम प्रहार छैक। ई कथा बतबैत छैक "सावधान भऽ जाऊ! लोक अहाँकेँ विद्याक सम्मान करैत अछि मुदा लोकक ज्ञान अगाध छैक। एकर विशालताकेँ अहूँ सम्मान करू। से नहि करब त लोक कखनो अहूँकेँ धोबिया पाट दऽ देत!"ई पोथी अनेक तरहें उपयोगी छैक। मैथिली साहित्य अनुरागी सब एकरा अधिकसँ अधिक पढ़थि। एकर अनेक पक्षपर बहुत गंभीरतासँ फैलसँ लिखबाक दरकार छैक। एहि पोथीपर एक अखिल भारतीय स्तरक सेमिनार आयोजित कएल जा सकैत अछि। एकर अनुवाद अनेक भाषामे होबाक चाही। हिंदी आ अंग्रेजीमे तुरत होबाक चाही। अहिपर बात होइत रहक चाही। एकर पट दरपरत खुजिते रहक चाही। एक एहेन मैथिली केर साधक रामलोचन ठाकुर जे एकरा अपनसँस्मरणसँ शब्द देलनि तिनका प्रतिसँवेदनशील भेनाइ हमर सभक सम्मिलित जवाबदेही अछि। एहि पोथीपर हम तँ लिखते रहब आरो लोक सब लिखथि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
रमण कुमार सिंह-संपर्क-9711261789

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 319, 2021-04-01. https://www.videha.co.in/research/2021/319/रामलोचन-ठाकुरक-मैथिली-लोककथा-एक-विवेचना.htm

मूल विदेह अंक / Original issue