विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान

आमोद झा · 2021-04-01 · अंक 319

आमोद झा- संपर्क- 9433100407
“सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान ’’
मैथिली भाषा साहित्य ओ संस्कृतिक दृष्टिसँ सामाजिक भाव विकास कयनिहार, निरंतर मानव- जीवन मूल्यक आदर्श पर अग्रसर सामान्यतया यात्रीक समान धर्मा रचनाकार, ठेंठ शब्दक ठाठ कोमल उपयोग कयनिहार, काव्य बानाक अक्षर शिल्पी, श्रृजनात्मक साहित्यकेँ अभिव्यक्ति देनिहार, मनुष्य जीवनक कुत्सित मनोवेग के चिंतन आ व्यवहारमे वैयक्तिक चरित्रक निर्माणकेँ उजागर कयनिहारक नाम छनि बाबूपाली जिला मधुबनीक कोलकाता बासी श्री रामलोचन ठाकुर । आदरणीय ठाकुर जीक प्रसंगे आदरणीय विद्वान नवीन बाबू लिखैत छथि जे “ रामलोचन बाबूक काव्यमे निराशाक बिरड़ोमे आशाक नव आलोकक संधान कठिन, से मुदा हिनक काव्यमे भटैत अछि ”। एतद् कविक रचनामे कारुणिक मन:स्थितिमे नव कवितामे जे विद्रोह तकर बानगी पोथी नामे लिखल रचना शीर्षक “ लाख प्रश्न अनुतरित “मे अनुभव करी हम चाहै छी हमर कविताक भाव कोटि कोटि शोषित पीड़ित मनुपुत्रक परितोष नहि, आक्रोशक उपादान हो मुक्ति संघर्षक प्रेरणा, शक्ति सरंजाम हो हम चाहैत छी - - -!
एतद् निराशाक बिरोड़ोमे आशाक नव आलोक संधान केनिहार मुक्ति संघर्षक कवि श्री रामलोचन बाबूक| पोथी “ लाख प्रश्न अनुतरित ’’ अपन पाठकीयताक भाव-विचार ओ समीक्षात्मक अभिव्यक्ति लिखि रहल छी। ताहि प्रसंगे कही प्रस्तुत पोथीमे छोट पैघ कुल 48 गोट रचनाक दूरी कुल एक सय पेजक मध्य असीम शक्तिक संग नव निर्माणक ओ जागरूकताक संग प्रतिष्ठापन भेल अछि। सुधि पाठक कवि रामलोचन ठाकुर जीक हृदयमे वर्तमान परिवेशमे धन-पद-लोलुप प्रवंचक चाटुकार,ब्यवस्थाक प्रति अनास्था असंतोषक मोनमे हिलकोर मारैत छनि आ बनि जाइत छथि ब्यवस्थाक प्रति विद्रोही कवि । से देखू अपन बहीन तक के व्यवस्थाक प्रति अपन दायित्वक निर्वहण करैत “बहीनदाइक नाम एगो चिठ्टी”मे :
“कथमपि उचित नै कानब/ वरन चिन्हब अपन शक्ति आ बाहरोक शब्द के अकानब - - - आ एगो प्रण ठानब तs कालि - - - आगामी कालि हमरो एगो परिचय रहत बिरदानक हम हमर विरदावन”
कवि कुत्सित मनोवेग आ निराशाकमेघ जे आच्छादित तकरा आशान्वित करबाक धारणा छनि । आम जनकेँ अपन शक्तिसँ परिचय करायब आ अपन उदात भावमे अपन अतीत ओ सामाजिक व्यवस्थाक जे अतीत गौरव के निर्मित करब कवि अपन अभीष्ट सेहो रखैत छथि। अध्ययन कहैत अछि जे समालोचना शास्त्रक अंतर्गत समीक्षामे यथासाध्य सर्वांगीन परिचय प्रस्तुत करब आवश्यक मुदा से भs जाइत अछि व्यक्तिगत दकियानूसी विचार, इएह जे मैथिली साहित्यक समालोचना ओ समीक्षाक स्तर शनै:-शनै: समाप्तक कागारपर छैक परिणाम सृजनशील साहित्यक बेस कमी भेल जा रहल अछि । पाठकक कमी साहित्यक मनीषी लोकनि विमर्श कs रहला अछि, “ लाख प्रश्न अनुतरित” मध्य प्रत्येक रचना प्राय: स्व के चिन्हबाक प्रेरणा आ मिथिलाक संस्कृतिक चेतना आ समाज उत्थानक दर्शन करबैत अछि। मातृभूमिक स्वरूपक स्नेह जगबैत अछि ।कवि भोगल यथार्थ आ युग परिस्थितिक ढकफेरीसँ उत्पन्न अविश्वास - अनास्था-अकुलाहटिसँ अपन अग्रज कवि जीवकांतक समीप जा आशाक संचार होइत शीर्षक “ वसंत गीतक मादे”मे:
"आउ ने हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी -----आइ ने काल्हि एहिमे होएतैक नव पल्लव रंग बिरंगक फूल"
एतद काव्यकार सदैव साकांक्ष अपन शास्त्रीय काव्यक आंतरिकमे बसल सूक्ष्म भाव जे मुद्रित होइछ से पाठकक हृदय के गद-गद कs जाइत अछि। सहजातावादक प्रणेता सोमदेवसँ प्रभावित काव्य बानाक रूप लैत “ अपन समाचार “ शीर्षकमे मानवीय दुर्बलता ओ दृढताक समन्वित भाव भेंट-घाँट क्रमें अपन निजत्वक झलकैत स्नेह "हमरो एकटा गाम छल" गामक प्रति अगाध स्नेह, गामक सरलता भरल जीवनमे सोहर आ समदाउनक अतिरेक कविक मोन अपन गामेमे बसल रहैत छनि, ओना विद्वान नवीन बाबू के मैथिली कविता पर नॉस्टेलजियाक गंध अबैत रहै छनि, मुदा वर्तमानमे मैथिली कविताक स्वरूप बदलि रहल छैक। स्वतंत्रताक मानवीय शोषण आ गरीबीक पराभव आ गुनधुनियोमे गामक लोक श्रद्धा-स्नेहक बीच मस्त रहैत अछि। चरित्र निर्माणक भावमे कवि “ एक फॉक अन्हार : एक फॉक इजोत"मे गाम आ शहरक बीच अंतर के स्पष्ट करैत, समालोचनाक मादे जयधारी बाबू लिखैत छथि जे मनोवैज्ञानिक अपनत्व जखन रहि जाइत छैक तखन मानसिक शक्ति पर कलमक जोर मारैत छैक, तकरे फल कविक “ मैथिली – मंदिरमे दीप लेसैत” रचनामे आरसी प्रसाद सिंह जीक, “फूल जी पूजाक आनल पॉतीमे अपन भाव दीप जराय स्वगत स्नेह दर्शा रहलाह अछि । “शब्द” शीर्षकमे शब्द ब्रम्ह साधनामे लीन मानू कवि निज चिंतक भावमे सामान्य जन जीवनक कल्याणक कामना, ओना सब ठीके रहैक शीर्षकमे कवि भाव यतिक समरूपतामे ठाकुर जीक मुखर वाक्यांश जे हिनक विशिष्टता अछि। कविक रचना मानू कवियेक पाँती मादे कविक “कीर्ति चमकैत चान-पुनिमक” अमर कीर्ति भावोद्रेक भेल अछि । कही तँ समालोचना शास्त्रमे साहित्यमे एकरा कलात्मक अभिव्यक्ति मानल जाइछ। कविक रचनामे नित नवीन प्रयोगसँ कवि रामलोचन बाबू अर्थानुसंधाता मात्र नहि अपितु काव्य जगतक संस्पर्श अनुभूति संड़्गाता बनि जाइत छथि। मैथिली काव्य जगतक बहुआयामी कवि “ओना सब किछु ठीक रहैक”।मे थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली'क बौद्धिकता ओ चिंतनपूर्ण सत्यता पर आधारित कीर्ति छनि। कविक प्रत्येक सृजन क्षेत्रीय संस्कारसँ उपर उठल संवेदनाक गहनता पर आधारित अछि। श्रद्धांजलि नहि दs पाएबमे लिखै छथि:
"अल्ला ईश्वर तेरो नाम सस्वर गाओल जा रहल आ बढले जा रहल दिनानुदिन अल्ला ईश्वरक बीच व्यवधान "
एतद् पोथीक नेल्सन- मंडेला आदिक भाव कमोवेश एक्कहि सजगता संग आत्म निर्वासन भावसँ तँ “ नीक नहि कयल अहॉ” शीर्षकमे बंगला साहित्यक मर्मज्ञ कवि शक्ति चट्टोपाध्यायक अवसानक व्यथामे अपन
विशाल हृदयक आशय Oh dissection calendar भावक परिचय, 15 अगस्तमे रजनीतिक गिरावट संज्ञाहीन नेताक परिचय तँ एना नहि बुझाइए देशराग आ धरती प्रतिकार करैछ शीर्षकमे यथार्थवादी कवि यदुनाथ झा “यदुवरक” समीप अनैत छनि । कविक अपन भाषा साहित्यक प्रति असीम स्नेह आ अनुराग देखैत यदुवर जीक भावमे भाव “मातृभाषा आ मातृभूमि एके सम सेवथि। विवुद्ध त्यागथि अधम मलीन ।आशय ठाकुर जीक रचना परिधि अत्यंत विस्तृत इएह जे हिनक काव्य इन्फ्लूएन्स वर्तमान हिनक समकालीन कविक भीड़सँ फराक आनि ठाढ करैत छनि। वर्तमानमे अद्य पतन पर कतेक व्यथानुभूति भरल रचनाक बानगी:-
"महामान्य अदालत । ओना कहबा लय बहुत किछु अछि हमरा लग मानवताक आदिसँ अद्यपर्यन्त किन्तु सीताराम कह - - - आत्माराम रटाओल पिजड़ामे बंद पाखीक- - -!"
उपर्युक्त रचना आदिमे कवि गुणीभूति ब्यंगकार कविक रूपे
“ ओहि दिन उगल नाञिं छल सूर्य” मे आंतरिक अंतर्विरोध अतीतक गुलामीक मानसिकतासँ मुक्ति संघर्षक संदर्भ,विकट द्वन्दसँ साक्षात्कार करबैत कवि के मनन करू:- नञिं कथमपि नञिं - - - - -वर्तमान स्वरमे बाजि उठल अतीत विप्लव की होइ छै बाबा ? कविक काव्यधारा एकटा प्रवाह अछि । अत्याधुनिक अकविताक प्रवाहमे कतेक यथार्थवादी मर्मस्पर्शी शहर शामियानामे अनुभव करी: कियो न्यायिक जाँच कऽ कियो स्मारक निर्माणक आ बात एतेक दूर तक गेलैक -- - - -गोली धरि चलि गेलैक ।परिस्थितिक भयंकरतासँ क्षुब्द कवि, देश आ समाजक उलझल समस्या के निदान तकैत दिशा लक्षित करैत “भगवान तथागत” शीर्षकमे बुद्धक मार्ग के आवलंम्बन करैत छथि । साहित्यमे कविक शील्प शैली जीवन्तताक प्रतीक मनुख आ ईश्वर शीर्षकमे समाजसँ आलोपित होइत मनुख माने मनुखता जाहिसँ चिंतित लिखैत छथि :
"मनुक्ख नहि रहल रहि गेल किछु हिन्दू - - - मुसलमान - - - सिख - - - क्रिस्तान"
कवि सदैव समाजक बीच कटु सत्य के उजागर करैत शासन आ व्यवस्था पर कड़गर चोट करैत छथि । काव्यमे व्यंग्यक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि गाम कोतवाल शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति उक्ति जतहि कोतवाल चोरक ततहि उपद्रव, तहिना महाश्मशानमे कवि सबहक अछैत जीवाक लिलसामे श्मशानमे बसल अछि: जीवाक लिलसामे पल-पल मरैत पल - घड़ी – दिन – गनैत लोकमानवीय संवेदनाक अपूर्व मिसरी घोरल काव्य सृजन,’क भावमे भीड़सँ बाहर करैत छनि एतद् रचनाक मादे सिद्ध होइछ कवि अपन समकालीन कविसँ अत्यंत संवेदित छथि। अपन उदात् भाव ओ समभावमे “ अहाँ आ हम “ शीर्षकमे अपूर्व शब्द संधान करैत कवि हमरा मोन पड़ैत छथि सर्वमान्य आधुनिक कवि राम कृष्ण संग राजकमल जे कहलनि “ समय एकटा साँप “ कहलनि “सद्य: अनुभव करी: क्रोनिएक घूस खा मैच हारब थोरेक पाइपर बिका जाइछ समाचारसे नहि बनैछ समाचार चिंता जुनि करी - - -!
अस्तु कवि अपन अग्रज कवि सबहिक सदैव अनुज भावमे पाठक पबैत छनि जकर प्रभाव पाठक हुनक रचनामे स्पष्ट छाप देखैत अछि ख्यातिनामा कवि जीवकांत “ नाचू हे पृथ्वी “ वेद पुराण पर समसायिक विषमताक प्रभाव तहिना ठाकुर जीक रचनामे भेटैत अछि ।“ संवाद “ शीर्षकमे “ अग्निपुष्पक “ पत्र पाबि
कतेक आह्लादित छथि से देखू : "सहस्त्रबाहुक अभियानक शंखनाद थिक “संवाद” भाइ !मैथिली काव्यक नवताक पक्षधर कवि अपन रचना बसात, कौआ,मैना शीर्षकमे पारंपरिक दलान खसैत आ केबिन के गेट खुजैत, भाव बोधमे आधुनिक परिवेशक भयंकरतासँ सेहो चिंतित छथि । यथा टीड़ी शीर्षकमे नेता रूपी टीड़ी समाजिक भाव व्यवहार के चाटि जाइत अछि , नव रचना मादे भाइ कुलानन्द मिश्र केँ संबोधित करैत लिखै छथि जे युगक धुआँमे लोक औनायल जकाँ, बुझू कवि नव तूरके एवाक आह्वान करैत , सोना आब नम्हर भs गेलैए शीर्षकमे जीवनक मार्गदर्शन कs रहला अछि। दिन एखनो बहुत बाँकी छै मे कवि कोनो धीरोदात वा धीरप्रशांत दैव गुण संम्पन्न नायक'क व्यंजना नहि अपितु ओ मनुक्ख जे अपन जन्म लग्नहिसँ संघर्षरत अन्हारक विरूद्ध कवि सदैव आगू बढ़बाक लेल प्रेरित करैत छथि । उनटा बसात शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति शैलीमे कतेको समस्याक समाधान ओ जगजियार कयलनि करैत छथि । छोट-छोट सृजनमे तिस्ता नदीक समस्या, सिक्किम ओ गेंगटोक आदि-आदि स्थानक वर्णन आदिक संग किछु पाश्चत्य शैलीक हाइकू जे भारतीय काव्य परंपरामे प्रचलित किछु सृजनमे अपन भाव अभिव्यक्ति खूब सुतरलनि अछि ।यथा: इहो बर्ख ओहिना बीति गेल बूढ अथबल सूर्य बस गैरेजक पछुआरमे डूबि गेल ।
एतद् “लाख प्रश्न अनुतरित” पोथीक अध्ययन - मनन – विश्लेशणसँ स्पष्ट अछि जे ठाकुर जीक काव्य परिधि विस्तारमे युग जीवनक गौरवगाथा संग प्राकृतिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक समसायिकताक उत्कर्ष - अपकर्ष संग साहित्य समाज महापुरूष संग व सामाजिक ब्यवस्था पर सौंदर्य चेतनामे लक्षणा व्यंजना अप्रस्तुत विधान सांकेतिक भाव करूण विवशता सामाजिक अंतर्विरोध द्वंदात्मक उन्मेष,वर्ग चेतनाक स्वरूप अशिक्षा-अविश्वास भुखमरी भ्रष्टाचार, चाटुकारिता,सँ टुटैत सामाजिक व्यवस्था पर कविक पाँति मोन पड़ैत अछि: आ एगो दीर्घ निसास छोड़ैत बाजल रामलाल बौआ ! एहि अस्सी बर्खक बयसमे हम तs खाली बेरबादिए देखैत आयल छी बौआ !उपर्यक्त पाँतीक संग कविक लाख प्रश्न अनुतरित रहैत छनि जे पोथीक नामके सार्थक ओ समीचीन सिद्ध करैत छनि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
चंद्रेश-संपर्क-9430640883
प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर

रामलोचन ठाकुरक पहिचान प्रतिरोधी साहित्यकारक रूपमे। ओ सदैव संघर्ष चेतनासँ संपृक्त भऽ व्यवस्थामूलक विरोधमे अपन कलमकेँ हथियार बनौलनि। हुनका केखनो समझौतावादी गंध पसिन्न नहि छलनि। ओना किछु समझौता अबस्से जीवन संघर्षमे करए पड़लनि अछि जकरा मनुक्खक दुर्बलता ओ विवशता बूझि अवहेलित कएल जा सकैत अछि। ओ यथास्थितिवादकेँ तोड़बाक प्रयास अपन कथनी ओ करनीक माध्यमे अबस्से केलनि अछि।
ओ लिखलनि से जमि कऽ लिखलनि। हिनक दर्जन भरि मौलिक आ अनूदित पोथी आएल अछि। बहुत रास रचना पत्रिकाक पातपर अछि। एहि रचना सभमे हिनक मानसिक परिवेश आ अन्तर्निहित मनोवैज्ञानिक सत्य खूजि कऽ उभरल अछि से वैविध्य परिवेशमे विभिन्न छवि-छटा नेने विविध अर्थमयी भऽ आएल अछि।
ओ बौद्धिक रचनाकार छथि। हिनक भाषामे सहज सौंदर्यक दृष्टि अछि। ओ विभिन्न वयक लोकक लेल विविधतामे रचना केलनि। एहिमे व्यवहारिकता सार्थकता आ स्वाभाविकता अछि तँ किछु रचना अबस्से गुरू गंभीरतामे आएल अछि। जखन जीवनक वर्तमान आ भविष्य डवाँडोल बुझाइत छैक आ अतीतक फरफराइत पन्ना मूँह दूसए लगैत छैक तँ स्वाभाविक थिक जे आँखिक आगा अन्हार या छापि कऽ इजोतकेँ मटियामेट करबापर तूलि जाइत छैक। एहने दुःस्थितिमे हिनक अनुभव,सोच आ दृष्टिसँ ओहि अन्हरियाकेँ फाड़बाक ब्योंत अपन रचनाक माध्यमे प्रस्फुटि भऽ करबैत अछि। ओ केखनो काल जँ गुम-सुम भऽ चुप्पी लाधितो छथि तँ ओ तैयो संकेतक भाषामे बहुत किछु कहि दैत छथि जे कहबे केलनि।
हिनक सभ हीत-मीत अछि आ केओ नहियो अछि। कारण आपकतामे रहितो ओ ओहि व्यक्तिकेँ चुट्टी काटबासँ परहेज नहि करैत छथि जनिक काज अनसोहाँत बुझाइत छनि। तें शत्रु बनाएब आ राखब हिनका पसिन्न छनि। कारण, दूमूँहा चरित्रकेँ उघार करबासँ ओ केखनो परहेज नहि करैत छथि। उदाहरणस्वरूप एकटा नहि बहुतो घटना घटित भेल अछि जे हिनक कलमक नोकपर चढ़ि कऽ कागतपर उभरल अछि। ओ विविधाकेँ दुविधा कहि प्रचारित-प्रसारित केलनि।
हिनका जखन जे आवश्यकता बुझेलनि से लिखलनि। गद्य ओ पद्य दूनू लिखलनि। ओ बात-बातमे बातकेँ रखलनि। कही तँ छिलका छोड़ा कऽ प्रस्तुत कऽ देलनि। अपने 'बेताल कथा' (१९८१) हास्य-व्यंग्य पोथीमे सात गोट आलेखक माध्यमे विभिन्न विषयादिकेँ उठा कऽ जीवंततामे चरित पुराणकेँ राखि देलनि। जेना 'कुर्सी महात्म्य'मे स्पष्ट रूपे लिखलनि अछि "विभिन्न जाति आ धर्मक बीच झगड़ा बझेबाक प्रयास हो। आ एहि सभ काजक लेल प्रचुर मात्रामे चमचा प्रोडक्सन हो। आर कतेक रास बात छैक जे तोरा ओ कुर्सी स्वंय सिखा देतह (२१)"। आजुक राजनैतिक परक स्थिति-पातकेँ उठा कऽ जे ओ व्यवस्थापरक छिद्रान्वेषणकेँ देखार केलनि अछि से वस्तुतः कोनो निर्भीक साहित्यकारे इमानदारीपूर्वक दृढ़तामे कऽ सकैत अछि जे ओ केलनि अछि। आजुक भ्रष्ट सत्ता-व्यवस्था अपन तिकड़मी चालिमे बझबैत दूमूँहा चरित्रकेँ देखार करैत अछि। ई ओ विभिन्न अवसरपरक बहुत किछु खूजि कऽ वा मौन भाषामे कऽ देलनि अछि। हिनक भीतर जे जन-समाजक अपसंस्कृतिक गादि अछि तकरा ओ ताकि कऽ जमा केलनि अछि आ ओहि कूड़ा-कर्कटकेँ मानसिकतासँ बहरिया कऽ फेकि देलनि अछि। समाजक मूँहपर ओ समाधानपूर्वक थापड़क चोट देलनि अछि। ई सत्य अछि जे हिनक रचना जन-मानसक बातकेँ उठबैत जन-जीवनकेँ झकझोड़ैत अछि। ओ जन-जनक पीड़ाकेँ अपन पीड़ा बना सार्वजनिक कऽ देलनि अछि। ओ आत्मकथ्यकेँ जगतकथ्य संग सामंजस्य स्थापित कऽ सर्वजीन बनबैत छथि। किछु बात ओ व्यंग्यक माध्यमे सेहो चुप्पी सधैत संकेतक भाषामे कहि दैत छथि। तें ओ 'विद्यापतिक बर्खी'मे कहि उठैत छथि-"आजुक मैथिल जाति भूतजीवी आ भूत प्रेमी थिक, ओकरा वर्तमान आ भविष्यक कुनू संबंध-सरोकार नहि छैक। एहि प्रकारे ओ जे मैथिल जातिपर चोट केलनि अछि से कसगर चमेटा कसैत ओकर स्वाभाविक गुणकेँ निखारलनि अछि।
रामलोचन ठाकुर मूलतः आ प्रसिद्धतः कवि छथि। हुनक कैकटा मैथिलीक पोथी से कविता संग्रह अछि जेना इतिहासहंता, माटि-पानिक गीत, देशक नाम छलै सोनचिड़ैया, प्रतिध्वनि, अपूर्वा, लाख प्रश्न अनुत्तरित अछि। आजुक कविताकेँ ओ संपादित केने छथि। ओ कैकटा पत्रिका यथा रंगमंच विषयक पत्रिका रंगमंच, अग्निपत्र, सुल्फा, मैथिली दर्शन ओ मिथिला दर्शन आदिकेँ सफलतापूर्वक संपादित केने छथि। ओ रंगमंचक कलाकार रहथि। एहि क्रममे ओ किछु नाटकक अनुवाद सेहो केने छथि जे पत्रिकाक पातपर आएल अछि यथा जादूगर, फाँस, रिहर्सल अछि। ओ संस्मरण सेहो लिखलनि। स्मृतिक धोखरल रंग हिनक प्रमाण अछि। तहिना आँखि मुनने आँखि फोलने सेहो अछि। आँखि मुनने आँखि फोलने पोथीमे २४ गोट आलेख अछि। बुद्ध एवं अन्यान्य पादगणसँ लऽ कऽ दोषीक दोष धरि। एहिमे किछु नव-नव तथ्यक खोज सेहो केलनि अछि। जेना पाद लोकनिमे २६ गोट पादक उल्लेख नाम सहित भेल अछि। मुदा एहि पाद लोकनिक जन्मस्थानक संबंधमे आ मैथिल हेबाक संबंधमे अर्थात प्रमाणिक विश्वसनीयताक उल्लेख नहि करब अबस्से कमी बोध देखबैत अछि। कहब जे कोनो एकटा निबंधमे सभटा बातक उल्लेख होइतो नहि अछि। जे स्वाभाविक थिक मुदा चौरासी गोट सिद्धमे कतेक मिथिलाक छथि ताहि प्रसंग सिद्ध नहि करब से आलेखकेँ हलुकाबैत अछि। तें की? ओ जतेक काज केलनि से तँ आधार भूमि देबे केलनि। ओ तँ स्वयं मिथिला विभूति महाकवि डाकक आलेखमे स्पष्टतः उल्लेख केलनि अछि जे हिनक (डाकक) जन्मस्थान तथा समयक संबंध एखनो धरि निस्तुकी नहि भऽ पाओल अछि। जे किछु, रचनाकारक इमानदारी स्पष्टतः लौकि जाइत अछि। २४ गोट आलेख जे एहि पोथीमे अछि से मुख्यतः मिथिला विभूतिक कहल जाएत। ओना एहिमे बेसी गुजरि गेल छथि मुदा सोमदेव छथिए। किछु आनो आलेख जेना समकालीन कथाक सौंदर्यबोध, मैथिली लोक साहित्यः उत्पति, उपयोगिता, अनुसंधान, नाट्यमंचक विकासमे पत्रिकाक योगदान, भतरस लेल भाषा आएल अछि। ओ लिखैत छथि, जतए विशेष छनि से प्रकट करैत छथि। मुदा हिनक आलेख सभमे ओ व्यापकता आ विशदता नहि भऽ पबैत अछि जे हेबाक थिक। कारण थिक संक्षिप्तता। ओ जनैत छथि जे एखन पैघ आलेख पाठक पढ़ए नहि चाहैत छथि। कारण, धैर्य ओ समयक अभाव कहि सकैत छी। मुदा नीक आलेखक पाठकक अभाव कहियो नहि रहल अछि। तैयो ओ जतबे जे किछु आलेख लिखलनि आ जाहि समयमे लिखलनि तकर मोल अछिए। समृतिक धोखरल रंगमे तँ कोलकाताक प्राचीन नाम कलकत्ताक विभिन्न विषयक योगदानपरक दस गोट आलेख अछि। कलकत्ताक साहित्यिक, सांस्कृतिक विषयक बात-विचारकेँ बुझबाक लेल ई पोथी लाभप्रद अछि। कहब जे कविवर आरसी प्रसाद सिंहपर स्वतंत्र आलेख अछि आ ओ कलकत्ताकेँ अपन कर्मक्षेत्र नहि बनौलनि। स्पष्ट अछि जे कोनो रचनाकार कोनो समय-क्षेत्र विशेषक होइतो हुनक रचनाक गमगमी दग्-दिगंतमे पसरैत अपन सार्थक अनुभूति करा जाइत अछि। ईहो सत्य अछि जे रामलोचन ठाकुर देखल-भोगल अनुभूतिक चित्रण करैत छथि। तें रचना सभमे अपन सार्थकताक बोध करबैत छथि। कहब जे कोनो रचनाकारकेँ अपन आत्मकथाक बोध नहि करेबाक चाही जे ओ करौने छथि। ई ओ एहि कारणे केने छथि जे हिनक व्यक्तित्व अपन कृतित्वक संगहि अछि जकरा ओ देखार केने छथि। ओ काज केने छथि से साहित्यधर्मिता ओ आन्दोलनधर्मिता निर्वाह करैत केने छथि। ई हुनक मिथिला-मैथिलीक प्रति पूर्णतः समर्पण भाव थिक। ओ विशुद्ध कवि छथि। हमरा जनैत नीक कविता लिखब बड्ड कठिन काज होइत अछि। कारण,नीक कविता ओ होइत अछि जकर अर्थ मात्र कवितेमे सीमित भऽ कऽ नहि रहि जाइत अछि। प्रत्युत ओकर मर्म पाठकीय अन्तर्मन धरि पैसि कऽ ओहि पाठकीय मानसिकताकेँ सदैव हौंड़ैत रहैत अछि। जतेक खेप पढ़ब ततेक नीक आस्वाद ग्रहण करैत जाएब। ईहो कहि देब अनर्गल नहि हएत जे कोनो कविक सभटा कविता नीके नहि होइत अछि। तखन अनुपातमे सम्मान देबेए पड़ैए। ईहो सत्य अछि जे कालजयी कृति अबस्से जटिल स्तरपर आधृत होइत अछि जे बेर-बेर पढ़लापर नव आस्वाद करबैत अछि। रामलोचन ठाकुर सभ तरहक आ सभ वयसक लेल कविता लिखलनि। तें बालसँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक कविता आएल अछि। एहिमे किछु नीक कविता अबस्से अछि। किछुमे आक्रोशमूलक स्वर विशेषे भऽ आएल अछि। खौंझाहटिमे लिखल गेल कविता कनेक विशेषे उग्र भऽ आएल अछि। किछु कवितामे बौद्धिकताक ताप अछि। जे गंभीरता लेने आएल अछि। मिथिलाक आचार-विचार ओ सभ्यता-संस्कृति सेहो कतिपय कवितामे अभिव्यक्त भेल अछि। सृष्टि विस्तारक क्रममे हिनक कविता सभ उत्थानपरक अछि। कैकटा कविताक सरलता ओ सहजता जे अभिधात्मकतामे अछि तँ सेहो ताहि ढंगे जाहि शिल्पमे रचित अछि से विशेषे बनैत अछि। ओ स्वयं स्वीकारने छथि जे –
--
हमरा सभकेँ अपने लिखबाक अइ
अपन इतिहास
जे सरिपहुँ थिक संघर्षक
वर्ग संघर्षक
(इतिहासहंता-समानधर्माक नाम)
हिनक छोट-छिन कविता सभ सेहो संघर्षक चुनौती दैत अछि। कविता छोट हो वा कि पैघ से ततेक महत्व नहि खैत अछि। महत्व अछि जे जन-संवेदनाकेँ झकझोड़बामे कोना की जीवन सत्यसँ साक्षात् करबैत अछि। समाजक विडंबना, विसंगति, विद्रूपता आदिकेँ को तरहें आ कोना कऽ प्रस्तुति कएल गेल अछि जे जन-जनक हियमे पैसिक कऽ अपन समार्थ्यबोध देखबैत अछि। समयबोध अबस्से निरखरि उठए एहि सभ बातकेँ रामलोचनक कवि हृद्य नीक जकाँ जनैत-बुझैत छथि। ओ नीक जकाँ जनैत छथि जे बिनु विचारें रचना भैए नहि सकैत अछि। हिनक रचनामे विचार आएल अछि से रचि-पढ़ि कऽ। कतहुँ जँ अलगलो अछि तँ तेना भऽ कऽ नहि। तें रचना विशेषे मूर्त अछि, अमूर्त नहि। ओ उदारीकरणपर चोट करेत लिखैत छथि-
"ई गिद्ध सभ नहि खाइछ माँस
माँसक दू टूक ल उड़ि जाइछ
दूर देश
बिना कोनो रोक-टोक निर्यात
उदारीकरण
(एहि महाश्मसानमे- लाख प्रश्न अनुत्तरित)
ओ स्वयं नाटककार छथि। नाटकीय कला-कौशल छनि। एहि नाट्य तत्वकेँ सेहो अपना रचनाक माध्यम बनौलनि अछि। नाटकीय गुण हेबाक फलस्वरूप हिनक कतिपय रचना उतार-चढ़ाओक क्रममे अछि। ओ अपन झिवनक खूजल पन्ना पढ़बाक लेल 'सागर लहरि समाना'(२०१७) लिखलनि अछि जे जीवनक पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित भऽ आएल अछि। ई पोथी संस्मरणात्मक होइतो आत्मकथाक बहुतो अंशकेँ समेटने-बटोरने अछि। तें ओ आत्मकथात्मक पोथी कहल जा सकैत अछि। एहिमे मिथिला-मैथिलीक गतिविधिक बहुतो बात आएल अछि। सांस्कृतिक कार्यक्रम, आन्दोलनपरक बात सभ आएल अछि। लोकक चरित्रकेँ नाँगट-उघार करैत ओ स्वयं लिखलनि अछि-
किछु लोक कूपक बेंग सन
संसारकेँ जनैत अछि
इतिहासकेँ आरंभ अपने
जन्मसँ मानैत अछि
ओ समय आ समाजपर कटाक्ष करैत बहुतो बात सभक जीवंत चरित्र चित्रण केलनि अछि। आपकताकेँ बचा कऽ रखबाक चिन्ता सदैव रहलनि अछि। ओ जखन कोनो दरंगी नीतिकेँ देखलनि आ से साहित्यकारगणमे महंथी साहित्यकारक कुत्सित क्रियाकलापकेँ देखलनि तकरा ओ खुजि कऽ उघार करबे केलनि। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक बुझैत ची जे मेथिलीक बहुतो उर्जस्व रचनाकार लोकनि मैथिलीक महंथ लोकनिक खडयंत्रकारी नीतिसँ उबिया कऽ मैथिली लिखनाइ छोड़ि देलनि। फल भेल जे ओहन रचनकारक अमूल्य लेखन रत्न-मंजूषासँ सजग पाठक वर्ग वंचित रहल आ भ्रष्ट गोलौसीवाद महंथ लोकनिक अपन सड़ल-गलल रचना लऽ पुजबैत रहलाह, सम्मानित होइत रहलाह आ स्वार्थवादी नीतिमे पाठककेँ अपन रचना पढ़बाक लेल बाध्य करैत रहलाह। यैह सभ रामलोचन ठाकुरक रचनाकारकेँ ारो धधकबैत रहल। ओ स्वयं पजरैत रहलाह आ बहुत किछु लिखबाक लेल बाध्य होइत रहलाह।
ओ सफल अनुवादक छथि। जा सकै छी किन्तु किए जाउ, पद्मा नदीक माँझी, नंदितनरके आदिक सफल अनुवाद केलनि। हिनका जनसम्मान अबस्से बेटलनि। एहिमे भाषा-भारती सम्मान, प्रबोध साहित्य सम्मान किरण साहित्य सम्मान आ आनो संस्था सभक सम्मानसँ ओ समलंकृत भेलाह अछि।
अतेक तँ अवश्य कहल जाएत जे ओ लिक्खाड़ छथि। ओ जे किचु लिखलनि से अबस्से अपन जीवनमे भोगल यथार्थकेँ उभारलनि। संबंधक बदलैत दवाबमे समाजिक मुद्दा सभकेँ उठा कऽ रखलनि। हिनक दूरदृष्टि अबस्से रहल अछि जे सभ समाजिक दवाबमे लिखल गेल कही तँ प्रखर चेतनाक स्वर लऽ आएल अछि। एकटा बात ईहो कहब अनर्गल नहि हएत जे हीत-मीतसँ बेसिए ओ शत्रु बनौलनि। तैयो जे ओ हपन नव जमीन लेखनक उर्वराशक्तिसँ बनौलनि से अबस्से कहल जा सकैत अछि आ यैह बात हमरा नीक लगैत अछि।
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रामलोचन ठाकुरक 'बेतालकथा'
'बेतालकथा' रामलोचन ठाकुरक व्यंग्य रचना थिक, जकरा ओ "हास्य-व्यंग्य" विधाक रूपमे लिखलनि अछि। रामलोचन ठाकुरक अन्य नाम अछि- अग्रदूत, कुमारेश काश्यप ओ मजतबा अली। उक्त नाम सभ ओ अपन पोथी 'लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता संग्रह)' मे देने छथि। बेताल कथा कुमारेश काश्यपक नामसँ लिखने छथि किंतु किएक से एहि प्रसंग हुनक कोनो मंतव्य प्राप्त नहि अछि। एहि पोथीक प्रकाशन 'विदेह पबलिकेशन्स' कलकत्तासँ 1981 मे भेल अछि। व्यंग्य साहित्यिकविक विधा थिक, जकर अर्थ होइछ कटाक्ष करब जे शब्दक व्यंजना शक्तिसँ प्राप्त होइत अछि। हास्यक अर्थ उपहास होइत अछि जे कतौ ने कतौ व्यंग्यबोधक अछि। ओना हास्य हँसबाक लेल, मनोरंजन लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि। मिथिलामे संबंधनक अनुसार हास्यक परिपाटी रहल अछि जाहिमे उपहास कम संबंधबोधक मधुरता बेसी रहैत अछि। एहन हास्यमे मनोरंजनक उद्येश्य रहैत अछि।मैथिली साहित्यमे प्रो. हरिमोहन झाक विभिन्न विधामे लिखल हास्य-व्यंग्य भेटैए। हिनक साहित्यमे हमरा सभ दिन ओहि विधाक शिल्पमे हास्य बोड़ल भेटल मुख्य व्यंग्य अछि जाहि माध्यमे ओ (हरिमोहन झा) समाजमे सुधारक आकांक्षी रहलाह आ लोकप्रिय भेलाह।
मिथलामे केकरोपर व्यंग्य करबाक हेतु मान चढ़ा कऽ बजबाक सेहो स्वभाव रहल अछि। जेना कि कहि रहल छी केकरो विषयमे आ ओकर अर्थ खुजि रहल छै केकरोपर। हमरा जनैत एहि पोथीक रचनामे कुमारेश काश्यप अर्थाप रामलोचन ठाकुर एहि स्वभावक अनुसार कथाक रचना करैत अपन रचनाक उद्येश्यक पूर्ति कयलनि अछि। आ ई बात हिनका हरिमोहन झासँ फूट करैत छनि।
एहि पोथीक नाम अछि "बेताल कथा'।
संस्कृत साहित्यमे बेताल भट्ट द्वारा लिखित 'बेतालपञ्चविंशतिका' कथा संग्रह प्राप्त होइत अछि। एहि पोथीक पचीसो कथामे विक्रमादित्यक न्याय प्रति हुनक दृढ़ता देखाओल गेल अछि। हिंदी साहित्यमे सेहो अनेक अपना-अपना ढंगक बेताल कथा विभिन्न नामसँ अछि। रामलोचन ठाकुरक 'बेतालकथा' पोथीमे पाँच टा बेताल कथा, एकटा तोता-मैना संवाद अथ कथा चमचा पुरणा प्रसंग ओ एकटा लालबुझक्कर विद्यापतिक बर्खी' कुल सात टा कथा अछि। 'तोता-मैना संवाद अथ कथा चमचा पुरणा प्रसंग ' उक्त संग्रहक पहिल कथा थिक। एहिमे रचनाकार अपन भाषाक चिन्ता करैत छथि, हिनक कहब अछि जे जावत मैथिली कार्यलयक भाषा पढ़ौनीक भाषा नहि हएत ताबत विभिन्न संस्थामे मात्र स्वीकृति भेलासँ मैथिलीक उचित विकास संभव नहि अछि। आ ई काज तखने हएत जखन जनता जागत किन्तु से कोना हएत? एहि भूमिक नेता एहि भूमिक रहितो दिल्ली दरबारक पूजामे रहैत अछि आ समाजक लोक बनि गेल अछि दरबारी जकरा ओ चमचा कहलनि अछि। वर्तमान स्थिति (रचनाकाल आ एखनो जे ओहिना विद्यमान अछि)केँ देखा कथाकार अपन कथाक इति करैत छथि। उक्त बात निश्चित रूपें समाज ओ एकर राजनीतिक पृष्ठिभूमिपर व्यंग्य अछि। अपन भाषाक प्रति अतेक आस्था रखनिहार रामलोचन ठाकुर एहि कथाक नाममे सूगा बदला तोता लिखलनि। ओना सूगा आनो भाषामे प्रयोग होइत अछि किन्तु मैथिलीमे "सूगा", "सुग्गा" शब्द सएह प्रयोगमे रहल अछि। हँ, इम्हर आबि कऽ विभिन्न प्रभावे 'तोता' सेहो कहल जाइत अछि। किन्तु रामलोचन जी 'सूगा' नहि लीखि 'तोता' लिखलनि , ई नीक नहि लगैत अछि। भऽ सकैए जे हिन्दी भाषामे "तोता-मैना"क कथा जे गद्य ओ पद्यमे प्रसिद्ध अछि से हिनका सेहो नाम देबामे प्रभावित केने होइन।
'विद्यापतिक बर्खी' मे लेखक वर्तमान समयमे शिक्षा जगतमे होइत शोध-कार्यादिपर व्यंग्य केलनि, जे बहुत मार्मिक अछि। विद्यापति पदावलीमे जे मूल बात अछि, जाहि कारणे ओ जन-जनक कवि छथि ओहि सभसँ फफूट हुनका युग-चेतनाक रूपमे नहि अन्य विभिन्न रूपमे हुनक छविकेँ आधार मानि शोध प्रस्तुत करैत पी.एच.डी प्रदान कएल जा रहल अछि। लेखक अपन रचनाक बलपर नहि अन्य कारणे महान घोषित कएल जा रहलाहे। एहि सभपर हिनक व्यंग्य निश्चित रूपसँ सचेतक अछि। एहिठाम एकटा बात आरो हम कही जर व्यंग्य रचना जहिना साधारण पाठक लेल बहुत रुचिप्रद ओ प्रेरक होइत अछि ओहिना विसंगतिकारी लेल असह्य ओ त्याज्य। प्रो. हरिमोहन झापर सेहो परंपरावादी लोकनि विभिन्न तरहेँ अपन क्रोध प्रगट केने छथि।रामलोचन ठाकुरक रचना व्यंग्य रूपमे एतेक तीक्ष्णता संग आपकता रखने किंतु हिनका व्यंग्यकार रूपमे नहि चीन्हल गेल से आश्चर्य, जखन कि हिनक रचनामे समयक अद्भुत पकड़ अछि आ व्यंग्यक सटीक चमत्कार।
उक्त दूनू कथाक बाद हिनक शुरू होइत अछि- बेताल कथा। पहिल कथा अछि कुर्सीक महात्म्य।
हिनक बेताल कथा पारंपरिक बेताल कथासँ फूट अछि। एहि कथामे विक्रमादित्य छथि, बेताल छथि किंतु दूनू चरित्र पूर्णतः आजुक समयानुसार नव परिधान ओ नव चिंतनमे अछि। 'कुर्सीक महात्म्य'मे विक्रम अपन कुर्सीक सुरक्षा चाहैत छथि।
एहि कथामे रचनाकार वर्तमान समयमे जे सत्तासीन नेताक चरित्र अछि ओ विक्रमादित्यमे आरोपित केलनि अछि। एहन विक्रमादित्य अपन परमप्रिय सलाहकार बेतालसँ मंत्रणा करैत छथि जे हुनक सिंहासन कोना बाँचल रहत। आ बेताल हुनका युक्ति बुझा रहलाह अछि। सत्तासिन व्यक्ति स्वाभाविक रूपसँ सामंती मनोस्थितिक होइत छथि। एहन लोक समाजमे पिछड़ल लोकक उत्थानसँ डेराइत छथि। उक्त कथामे दुसाधक बेटा न्याय-प्रक्रिया ओ समाजक ओहि दिस जाइत रुखिसँ विक्रम डेराइत छथि। आ, ओहिसँ चिंतित भऽ अपन सिंहासनक सुरक्षाक उपाय बैतालसँ पुछैत छथि। उक्त कथा कहैत अछि जे वर्तमान समय एहन भऽ गेल अछि जे राजनेता सत्ता पबैक लेल संपूर्ण देशक लोकमे महान बनबाक नाटक करैत अपन सुख-भोगमे लिप्त रहैत अछि आ सदिखन अपन कुर्सीक सुरक्षा हेतु अपन चमचा द्वारा अपन महिमाक गान करबैत रहैत अछि। उक्त कथा अतीतसँ वर्तमान अबैत अछि आ कहैत अछि जे एकटा समय आओत जे ई कुर्सी दिल्ली (भारतक राजधानी)मे रहत आ एहिपर बैसनिहार प्रधानमंत्री कहाओत। एहि तरहे लोकतंत्र शासनमे व्यक्ति-पूजाक खेलपर भयानक व्यंग्य अछि जे पाठककेँ समयसँ साक्षात्कार करेबामे समर्थ होइत सचेत करैत अछि।
कथा अछि 'विप्लव'। 'विप्लव' केर अर्थ होइत अछि-क्रांति, विद्रोह। राजसत्ता केखनो अपन समाजिक विद्रोह नहि चाहैत अछि। ओ एकरा दबेबाक लेल समाजक बीच एहन चुप-चुप कांड करैत अछि जाहिसँ समाजक ध्यान ओहि दिस बँटि जाइत छैक आ राजसत्ता स्वयं कांड कऽ कऽ ओहि घटित कांडकेँ निंदा करैत समाजक सहानुभूति लैत अपना प्रति होइत विद्रोहक धाराकेँ बदलि दैत अछि। एहि बातकेँ बेताल विक्रमादित्यसँ वनराज सिंहक कथा कहैत छथि जे कोना सिंहक ' प्राइवेट सेक्रेटरी चमचा प्रधान श्रीमान शृंगाल शर्मा मंत्रणासँ बकरीक अपहरण कऽ ओकरा मारि खाएल गेल पुनः हरिणक अपहरण कऽ मारल गेल आ स्वयं शेर सिंह एहिपर दुख प्रगट करैत, भाषण दैत जानवर सभक सहानुभूति पौलनि। राजसत्ताक एहि भयंकर खेलकेँ उघार करैत उक्त कथा सत्तापर व्यंग्य तँ करिते अछि समाजकेँ सेहो सतर्क करैत अछि, जे ध्यान योग्य अछि।
रामलोचन ठाकुर जाहि रूपेँ जन-मानसिकतासँ अपन व्यंग्यमे राजसत्ताक चरित्रपर चोट करैत छथि ओ अत्यंत महत्वक अछि। हिनक खूबी अछि जे ओ बहुत सहजे प्राचीन युगक पात्रकेँ वर्तमान समयक राजनेताक चरित्रमे आरोपित कऽ अपन व्यंग्यात्मक विद्रोहक स्वर स्पष्ट करैत छथि जे अत्यंत महत्वपूर्ण ओ तथ्यपरक अछि। हिनक रचनाक आर खूबी अछि जे ई अपन व्यंग्यमे ने तँ लावधिक नाम लैत छथि आ ने नेताक किंतु हिनक कथाकालक ओ खास राजनेताकेँ सेहो इंगित करैत अछि।
भारतीय प्रजातंत्रक इतिहासमे इमरजेंसी (आपातकाल) २५ जून १९७५ सँ २१ मार्च १९७७ धरि २१ मासक अवधिक बीच छल। एहि बीच भारतीय नागरिक स्वतंत्रता छिना गेल छलैक। विद्रही नेता, पत्रकार ओ जनपक्षक लोककेँ जेल भऽ गेल छलनि। सत्ताक विरोधमे बाजबकेँ दंडनीय अपराध बूझल जाइत छल। देशद्रोह बुझल जाइत छल। ई बात वर्तमान समयमे सेहो कतेक प्रासंगिक अछि सहजहि बूझल जा सकैत अछि।
एहन समय हेबाक कारणमे जाहि रूपेँ 'ब्रह्माक श्राप' मे इंद्रक ताना-शाही, ॠषि-मुनिक कारागार ओ अन्य बात देखाओल गेल ओ अद्भुत रूपेँ देशमे भेल 'आपातकाल'केँ मोन पाड़ि दैत अछि। ओ समय आपातकाले थिक से आइ स्पष्ट होइत अछि जखन ब्रह्मा हुनका आगूक जन्म नारी हेबाक श्राप दैत छथि।
उक्त कथामे आपातकालक जन-दुर्दशाकेँ जाहि रूपेँ बेताल-विक्रमादित्यकेँ कथा सुना रहलैए ओ इंद्रक प्रशासनमे चलैत अछि। किंतु इंद्रकेँ नारीक श्राप जाहि कुशलतासँ ओकरा भेटैत छैक ओ सद्यः आपातकालक स्थितिक भऽ जाइत छैक। कोनो व्यंग्य अपन व्यंजना शक्तिक ई विशेषता थिक जकरा कहबी संग कहि सकैत छी जे 'घाओ' कत्तौ आ पह कत्तौ' आ से रामलोचनजीक रचनामे बहुत सहजता संग 'घाओ आ पह' दूनू चिन्हार होइत अछि।
एहि रूपेँ, अद्भुत रूपेँ आपातकालक विषम स्थितिपर टिप्पणी करैत उक्त कथा जन-चेतनाकेँ झकझोड़ि कऽ जगेबाक काज करैत अछि जे हुनक व्यंग्यकेँ सार्थक ऊँचाइ प्रदान करैत अछि। कोना लोक नायककेँ खलनायक, सद्गुणीकेँ दुर्गुणी लोक कहि अपना अनुसार समयकेँ देखि कऽ करैए तकर उत्तम उदाहरण अछि हिनक व्यंग्य 'उत्तर महाभारत'। जाहिमे बेताल पांडवकेँ अन्यायी, कृष्णकेँ कुटिचाली संबोधन कऽ कथा कहलनि अछि। ओना राजनीतिमे सभ किछुकेँ अपना हितमे सिद्ध करबाक बातकेँ सफल राजनीति कहल जाइत अछि, हमरा जनैत प्रकरान्तरसँ बेताल सएह कहै छथि।
'अमरावती उपकथा' अद्भुत कथा अछि। एहि देशमे आपातकालक बाद छठम आमचुनाव भेल। जाहिमे जनता पार्टी जीतल। कहल गेलै जे भारतीय जनताकेँ आब असल स्वतंत्रता भेटलैक किंतु की भेल? तकरे व्यंग्य कथा अछि उक्त कथा। उक्त कथा कहैत अछि जे पुनः जनता ठकल गेल। चुनावसँ पहिने नेता लोकनि बहुतो आश्वासन देने छलखनि किंतु सभ बिसरि जाइ गेलाह। बेतालक शब्दमे "कारण तखन ई लोकनि कुर्सी बिहीन छलाह। कुर्सी भेटिते बिसरि गेनाइ स्वाभाविक । आब कैसी तेरी रंगा ! दोसर बात जे इहो लोकनि त कुनू ने कुनू रूप मे पुरने दल सं सम्बद्ध छलाह। रक्त सम्पर्के ओही वंशक छथि ! आ तेसर बात जे बिलाड़ि जं माछक रखबार हो त परिणामक कल्पना सहजहि कएल जा सकैए।"
एतावता ईहो लोकनि जनताकेँ भ्रमित करैत अपन स्वर्ग भोगमे लागि गेलाह। कथा स्पष्ट रूपसँ कहैत अछि जे एहि देशक जनता जावत स्वयं नहि जागत, तावत ओकर कल्याण संभव नहि छैक। एहि बातकेँ कहबाक लेल कथा जाहि तरहेँ व्यंग्यात्मक रूपें अपन बात कहैत भारतीय राजनीतिक दुर्दशाकेँ समक्ष करैत अछि, ओकर प्रस्तुतिक विलक्षणता बहुत प्रभावी अछि।
कथामे नेताक वेश-भूषा ओ ओकर प्रवृतिकेँ समक्ष रखबामे रचनाकार अत्यंत सफल भेलाह अछि ततबे नहि ओ जनताक सहिष्णु स्वभावकेँ सेहो आलोचना केलनि अछि। हिनक कहब अछि जे जनताकेँ अपन सहबाक सीमाकेँ सेहो बूझक चाही। अन्याय ओ शोषणक विरोधमे ठाढ़ हेबाक चाही। ओतबे नहि कथा अपन प्रसंगसँ स्पष्ट कहैत अछि जे जनता स्वयं अपन शोषणकेँ रोकि सकैत अछि, अपन स्वतंत्रताक द्वारि खोलि सकैत अछि।
एहिठाम एकटा बात हमरा कहब आवश्यक बुझाइए ओ ई जे मैथिली साहित्यमे व्यंग्यपरक रचनामे कतेको रचनाकारक रचना छनि जाहिमे प्रो. हरिमोहन झा, अमरजी, छात्रानंद आदि लोकनि प्रमुख छथि किंतु ई लोकनि कोनो खास विधामे व्यंग्यक समावेश केलनि अछि। हँ, एहिमे हरिमोहन झाक 'खट्टर खकाक तरंग' केँ छोड़ि कऽ। 'खट्टर ककाक तरंग' विभिन्न विषयपर लिखल संवादात्मक हास्य (मनोरंजन हेतु, हास्य उत्पन्न करबाक हेतु)-व्यंग्य रचना थिक जे कोनो खास विधाक अंतर्गत नहि रहितो अत्यंत मार्मिक अछि। एहिठाम हम ईहो कहि सकैत छी जे हरिमोहन झा उक्त रचना व्यंग्यकेँ स्वतंत्र विधाक रूप देलनि अछि।
किंतु रामलोचन ठाकुर 'बेताल कथा' मुख्य रूपसँ राजनीतिपर अपन रचनाकेँ केंद्रित कऽ हास्यकेँ उपहाेसक रूपमे व्यंग्यमे समाहित करैत अपन रचनाकेँ व्यंग्य विधामे कायम केलनि अछि तें हम पहिनहुँ कहलहुँ अछि जे ई हरिमोहन झाक रचनासँ फूट अपन रचनाकेँ स्वरूप प्रदान केलनि।
हिनक पोथीक नाम थिक 'बेताल कथा'। हम सेहो हिनक रचनाक व्याख्या करैत कएक ठाम कथा शब्दक प्रयोग केलहुँ अछि किंतु हिनक रचना कथा नहि थिक। ओ सभ थिक व्यंग्यात्मक गद्य जकरा 'व्यंग्य रचना' कहल जाएत। तकर कारण अपन विधामे जाहि रूपें अपन घटनाक समापन संग कथ्यकेँ देखार करैत अछि से हिनक रचनामे नहि अछि। कथामे जँ कतौ मूल घटनासँ फराक लगैत विषय देखाइत अछि तँ ओ अंततः मूले घटनाकेँ स्पष्ट करैत ओहि संग समाहित भऽ जाइत अछि।
किंतु रामलोचन ठाकुरक उक्त रचनामे घटैत घटना ने कथा जकाँ क्रमशः सम्यक रूपें चलैत अछि ने कथ्य धरि जाइत अछि , अस्तु हिनक रचना प्रारंभेसँ अपन कथ्य कहैत पुनः चलैत आगू बढ़ैत अछि जे हिनक रचनाकेँ कथा नहि बनए दैत अछि, कतहुँ संवाद कतहुँ कोनो घटनाक वर्णन, कतहुँ कोनो सूचनात्मक वृतांत हिनक रचनाकेँ मात्र व्यंग्य रूपमे आगू बढ़बैत अछि। आ व्यंग्यक खास विधाकेँ जनपक्षधरताक दृष्टिएँ आगू बढ़बैत अछि जे हिनका महत्वपूर्ण व्यंग्यकारक रूपमे महत्वपूर्ण बनबैत अछि।
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दिलीप कुमार झा-संपर्क-6207627509
एखनो माँगि रहलए उत्तर -' लाख प्रश्न अनुत्तरित'
मैथिली कविताक जे प्रगतिवादी धारा भुवनजीसँ प्रारंभ भेल से यात्रीजी लग अबैत-अबैत बेस भकरार भ' गेल।रामलोचन ठाकुर जाहि प्रगतिवादी धाराक प्रतिनिधित्व करैत छथि से विश्वमे नित- नूतन होइत परिवर्तनसँ प्रभावित तँ अछिये,मिथिलाक जे आर्थिक ,सामाजिक दुर्दशा अछि से हिनक कविताक केन्द्र बिन्दुमे रहल अछि।एहि मामिलामे यात्रीजीक मैथिली कविता सेहो मिथिलाक सामाजिक ,आर्थिक परस्थितिकक गहन विश्लेषण करैत देखाइत अछि।राम लोचन ठाकुरक कविताक अभिष्ट एकटा सुन्नर दुनियाँ देखबाक अभिलाषी अछि,जाहिमे मानव मूल्यक कीमतपर कोनो समझौता नहि। हुनक कविताक केन्द्रमे एकटा विकसित,शिक्षित मिथिलाक परिकल्पना सेहो रहलनि अछि।कविक रुपमे कविता लिखलनि, ताहुसँ आगाँ मिथिलाक भाषा - संस्कृतिक रक्षाक लेल, मिथिलाक अस्तित्वक फराक परिचिति बनल रहय ताहि लेल दरभंगा,पटना सँ कोलकाता धरि अनेको आन्दोलनमे भाग लेलनि। एकटा आन्दोलनी व्यक्तित्व छथि कवि रामलोचन ठाकुर।कविता लिखि क' सुति नहि रहलाह।अपन कविताकें क्रियाशीलनक अवस्थामे अनबाक जे कोनो प्रयास संभव छलनि से ओ करैत रहलाह खाहे ओ रंगमंचक माध्यमसँ हो वा पत्र -पत्रिकाक संपादनक माध्यमसँ।सम्प्रति किछु दिन पूर्वतक मिथिला दर्शन पत्रिकाक संपादन करैत रहलाह अछि।अपन प्रश्न सभक उत्तर हेरैत रहलाह अछि।एकटा तेज छात्र अवसर भेटितहि शिक्षकसँ अनेको प्रश्न करय लगैत अछि से रामलोचन ठाकुर अपन कविताक माध्यमसँ लाखों प्रश्न करैत छथि।हम बात क' रहलहुँ अछि हुनक कविताक संग्रह 'लाख प्रश्न अनुत्तरित' के प्रसंग।एहि आलेखमे, संग्रहमे संग्रहित हुनक कवितापर किछु बात तँ करबे करब।हम एहु बातक पड़ताल करय चाहब जे एखन धरि हुनक प्रश्न सभक किछुओ उतारा भेटलनि की नहि!
कवि लिखबा लए बैसैत छथि गंगा अवतरणक कथा,लिखने चलि जाइत छथि कोसी- प्रांगणक व्यथा। कविकें मिथिलाक लोकक पीड़ा कखनो दोसर वस्तु सोचबा लेल पलखति नहि दैत छनि।ओ विश्वक चिंतन करैत छथि।दुनियाँमे अनेक रंगक संकट उपस्थित छैक ताहिपर कवि अपन चिंता व्यक्त करैत छथि मुदा फेर अनचोके बाजि उठैत छथि- रक्तहीन,मांसहीन/कंकालक देश/हमर मातृभूमि /मिथिला ई
विख्याता भुवनत्रयम्
बिसरल कि जाइत अछि।
कवि अपना देशमे प्रसन्नता तकै छथि।आजादीक बाद भारत कतेक तरक्की केलक? भारतक विकासमे मिथिलाक की हालति छैक तकर सेहो संगे -संग पड़ताल करैत छथि।कवि कहि उठैत छथि- लिखबा ले बैसै छी
कथा आजादी के/ब्यथा बेरबादी के लिखायल चलि जाइत अछि।
सरिपहुँ कवि की लिखथि? कियेक लिखथि? तकर निर्णय नहि क' पबैत छथि कारण स्पष्ट छै।देश समाज दिन- दिन ओझारइते जा रहल अछि।अपने गाममे हमसभ अनठिया अनचिन्हार भ' गेल छी।जकर कोनो पता ठेकाना नहि बाँचल अछि।सरिपहुँ कतेक असहनीय पीड़ा होइछ कोनो संवेदनशील व्यक्तिक लेल जखन ओकर परिचिति समाप्त होब' लगैत छैक।मुदा ताहि लेल कवि कहैत छथि एकर समाधान बैसि क' कनलासँ नहि हैत।एकरा लेल करय पड़त उद्यम।चिन्हय पड़त अपन शक्तिकें।जाहिसँ एकटा समृद्ध ओ सुसंस्कृत भारत ओ मिथिलाक निर्माण क' सकी।
राम लोचन ठाकुरक जन्म गाममे भेलनि। नेनपनसँ किशोरावस्था धरि गामेमे रहलाह मुदा दरिद्रता मिथलाक लेल सभदिन अभिशाप रहलैक से युवा रामलोचन ठाकुर चलि गेलाह कलकत्ता ओतय जेना- तेना किछु उपार्जनक संग अपन आगाँक अध्ययन सेहो करैत रहलाह।मिथिलाक सोन्हगर माटिक सुगन्धिसँ शिक्त एहि कविक मोन- प्राण नहि रमलनि कोनो आन बाटपर ओ सदिखन ठाढ़ भेटलाह अपने माटिपर।ओ कलकत्तामे सेहो मैथिली बिषय पढ़लनि।ताहि दिन कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली पढ़ाइ होइत छलै।संगे संग मैथिलीमे लेखन दिस सेहो उन्मूख भेलाह।भारत गामक देश अछि आओर मिथिला गामक प्रदेश ,से गाम रामलोचन ठाकुरकें सभदिन आकर्षित करैत रहलनि।कविक मोनमे जे अनेक प्रश्न उमरैत - घुमरैत रहलनि अछि ताहिमे ईहो एकटा प्रश्न रहलनि जे भारत गामक देश अछि तँ भारतक विकासक मानचित्रपर गाम कतहुँ कियेक नहि देखाइत अछि? सभठां नगरेक चर्चा - वर्चा अछि।नगरेक विकास लेल संसद आ विधानसभामे योजनाक निर्माण होइत अछि ।तखन खाली जबानी जमाखर्च सँ गामक विकास कोना हैत?गाम लगातार विकासक दौड़मे पिछड़ि रहल अछि।गामक लोक परा क' शहरमे शरणागत भ' रहल अछि।ताहि स्थितिमे कविक मोनमे ई प्रश्न घुरिआयब स्वभाविके छनि। जखन कवि अपन कवितामे बाजि उठैत छथि-
' किंतु श्रीमान्
अपने त' कहने रहिअइ
भारत गामक देश थिक
आ एहिठाम त' अगबे शहरे- शहर छै
गाम कहाँ छै,अपना सभक गाम...'
कविक मोनसँ एको पलक लेल गाम बाहर नै भ' पबैत छनि।रहैत छथि नगरमे, गाम बर्षमे एक दू बेर आबि जाइत हेताह सएह बहुत।चाही तँ अहाँ हुनका नास्टेल्जिक बुझि सकैत छी,मुदा से अपने जे बुझि कविक मोनमे गाम रचल - बसल छनि।कविक मानस पटलपर अपना गामक अनेक रंगक चित्र उभरैत छैक।हुनका मोन पड़ैत छनि अपना गामक शिव मंदिर,डीहबारक स्थान,मसजिद। माने सभ जाति धर्मक सदभावसँ बनल ,बसल गाम।हुनका मोन पड़ैत छनि-' पसरमे जाइत चरबाहक पराती
आ साँझ मे
दूर नदी कातसँ
बाध -बोनसँ भासल अबैत
बारहमासाक स्वर
आङनसँ
ढेकी जाँतक संगीतक संग
लगनीक स्वर
कहियो सोहर, कहियो समदाओन
कहियो तिरहुत जे
कहियो मिथिलाक गामक परिचिति छल'
एतबे नहि हुनका मानस पटलपर गामक संस्कृतिक सभटा रंग देखाइत छनि।गमैया पूजाक सड़ोर,
जट-जटिनक खेल,तजियाक संग झरनी गीत,फगुआ ,जुड़शीतल सहित सभटा पाबनि तिहारक पुरना स्वरुप आ गामक लोकक मेल मिलापक संग जीवन बितायब ।।गामक सामाजिकता ,एक दोसराक संग पुरब।सुख- दुखमे संग रहब सभटा मोन पड़ैत छनि।
कवि ताकि रहलाह अछि अपन ओहेन गाम।
एहि भूमंडलीकरणक दौड़मे आब ओ गाम भेटब मोशकिल छनि। एहि संग्रहक अधिकांश कविता भारतमे भूमंडलीकरणक आरंभिक समयमे लिखल गेल अछि।आइ तीस बर्खक बाद कविताक अभिष्ट निजगुत बुझा रहल अछि।जं -जं दिन बितैत जाएत समय आर फरीछ होइत जाएत ।एहि भुमंडलीकरणमे सांस्कृतिक विविधताक लोप भ' रहल अछि।ओना तँ सगरे संसार एहि सांस्कृतिक ओ आर्थिक आक्रमणक शिकार भेल अछि मुदा मिथिला एकटा तन्नुक मनोस्थितिवला प्रदेश अछि, जे बहुत तीव्रतासँ दोसराक देखाँउस करैत अछि।कवि एहि प्रवृतिसँ दुखी छथि,चिंतित सेहो।आनक छिछा उतारबामे मस्त रहैत अछि।
'अए हओ बुढ़बा तों आजादी देखने छहक?
सत्त-सत्त कहिह'
ओ बकर- बकर ताकय लागल हमर मुह
'आजादी हओ आजादी देखने छहक?
हम ओकरा बुझबैत बाजल रही
आ एगो दीर्घ निसास छोड़ैत बाजल छल रामलाल--
'बौआ ,एहि अस्सी बरखक वयस मे
हम त'खाली बेरबादीए देखैत आयल छी
कहियो रौदी ,कहियो दाही
कहियो हैजा,कहियो मैया पपियाही
कहियो जमिंदारक जुलूम आ
आब त' ओकर संग पुरैत छै थानाक सिपाही'
से आजादी के पचहत्तरि बरखक बादो की हालति छैक देशक? आइ भीतरिया आ बहरिया दुनू कातसँ देशपर आक्रमण छैक।देशक संसाधनपर सीमित लोकक अधिकार छैक।राजनीतिज्ञ, अपराधी ओ व्यवसायिक तीन तरफा गठजोड़ सँ आम लोक त्रस्त अछि।पचहत्तरि बरखक आजादीक बादोआइ भारतक बच्चा सभकें गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षाक अधिकार नै भेटि सकलै।भारतक शिक्षा केटेगरीमे बटल छैक।अमीरक लेल अलग शिक्षा आ गरीबक लेल अलग।एखन धरि सभक लेल स्वास्थ्य सुविधा सपने अछि।तखन एकटा आजादी तँ अवश्य भेटलैक अछि से बजबाक आजादी।जकरा जे फुरा रहल छैक से बाजि रहल अछि ।से लोकतंत्र आ देशक मार्यादाक उल्लंघन करब सेहो कोनो संवेदनात्मक बात नहि रहलैक। देश प्रेमक अतिवाद सेहो छैक तँ देशक विरोधमे , विरोधमे नारा लगेबासँ सेहो कोनो बन्हेज नहि,कोनो परहेज नहि।देशद्रोही आ देशभक्तक पहिचान करब एखनुका समयमे बड़ कठिनाह अछि।तें रामलाल बुढ़बाक बात एखनो प्रासांगिके अछि।
जाति आ धर्म शक माध्यमसँ सत्ता प्राप्त करब एखन देशमे बड़का खेल भ' गेल अछि।आम लोकक मौलिक आवश्यकताक कोनो मोल नहि।आब मनुक्खसँ बेसी जरुरी अछि जातिक विकास,धर्मक विकास।लोक सेहो आब अपना -अपना जातिक हिसाबें मतदान करैत आछि। साँच बजबाक आ साँच सुनबाक साहस प्राय: समाप्ते जकां भ'गेल अछि,तें जे हाल -चाल अछि एखन आजादीक नामपर से लगभग एहिना चलैत रहत।सार्थक विरोध करबाक साहस नै रहलै।आब यात्री,रामलोचन ठाकुर सन ठाँहि-पठाँहि कहैवला,कविता रचैवला तँ सेहो विरले छथि।अन्ध विरोध आ अन्ध समर्थकक बीच प्रतियोगितात्मक दौड़ चलि रहल अछि।तेहने परिस्थितिमे रामलोचन ठाकुरक लाख बेर मोन पड़त लाख प्रश्न अनुरत्तरित!
रामलोचन ठाकुर अपादमस्तक मैथिल छथि।मैथिली भाषापर आसन्न संकटक निवारण लेल ओ सदति संघर्ष करैत रहलाह। एकटा विपन्न परिवारमे जन्म भेल छलनि।अभाव कें ल'ग सँ भोगने ओ देखने छलाह। मिथिलाक जनगणक पीड़ाकें अकानैत सदति मिथिलाक उन्नति,प्रगतिक कामनाक लेल चिंतित कवि ,नाटककार रामलोचन ठाकुर कवितामे एहने रंग भरैत छलाह जाहिमे सीदित पीडि़त मिथिलाक लोकक स्वर देबाक सदति चेष्टाक संग ओहि विपन्न समाजकलेल सशक्त स्वर छथि ,जे हजारो बर्षसँ सीदित अछि,पीड़ित अछि।भाषाक लेल सेहो एकटा मुखर स्वर छलाह। एकटा कविता छनि एहि संग्रहमे' अपन समाचार'।कियो परिचित मैथिल व्यक्ति हुनक समाचार पुछैत छथिन।उतारामे कहैत छथि-" समाचार तँ तत्काल एक्केटा
मैथिलीकें लोकसेवा आयोगक परीक्षासँ क' देलकयै बाहर
लल्लू सरकार.....
बेस सहजताक संग बाजल ओ--
"हँ,अखबार मे देखलए
आर अपन समाचार?
केना अछि डांड़?
एहि कविताक माध्यमसँ मैथिल समाजक असंवेदनशीलता नीकसँ देखार चिन्हार भेल अछि।एहि कवितामे कवि रामोलचन ठाकुरक भीतर मातृभाषाक अपमानक कतेक आगि छनि तकरो नीकसँ उभार भेल अछि? कवि रामलोचन ठाकुरक मादे हुनक अग्रज पीढ़ीक साहित्यकार जीवकान्त लिखैत छथि," पच्चीस बर्ष पहिने रामलोचन ठाकुर भाषाक स्वयंसेवक छलाह।हुनक संगतुरिया मैथिलीक अनेक लोक महंथ भेल छथि। ओहो महंथ भेल रहितथि तँ हुनक प्रतिष्ठा घटल रहितनि।"
से राम लोचन ठाकुर अद्यावधि मैथिली भाषा आओर भाषाक लेल काज केनिहार मनीषी लोकनिक सम्मान करैत रहलाह।कवि आरसी प्रसाद सिंहक लेल एकटा कविता अछि एहि संग्रहमे 'मैथिली -मंदिरमे दीप लेसैत'
" मैथिली मंदिरमे दीप लेसैत
दीप,फूलडालीमे सजबैत।
फूल पूजाक मैथिली केर
प्रतीक्षा बाल रविक बिहुँसैत
बहाना मात्र सूर्यमुखि केर
बिसरि की सकत मैथिली पूत
रत्न मिथिलाक अनमोल अनूप
महाकवि आरसीक छबि,कृति
सौम्य सुन्दर आकर्षक रुप
करत सब बेर-बेर आवृति
रहत जा धरा-धाम मिथिलाक
पानि गंगा-कोशी-कमलाक
रहत ता नाम अमर कवि तोर
कृति चमकैत चान-पुनिमाक
मात्र आशीष तोर, प्रण मोर।
राम लोचन ठाकुर श्रमजीवी लोकनिक संघर्ष ओ पीड़ाकें उजागर करैवला महत्वपूर्ण कवि छथि मुदा कविक काज खाली आगिए उगलब तँ नहि थिक।प्रकृतिमे परसल नीक - नीक वस्तुकें देखब।पर्यावरणमे उपस्थित सौन्दर्य छटाकें निहारब ओहिमे श्रृंगार ओ सौन्दर्य बोधकें ताकब- हेरब सेहो कविताक काज थिक,से कवि रामलोचन ठाकुर सेहो कवितामे सौन्दर्यबोध अनबाक चेष्टा केलनि अछि ओ एहिमे कतेक सफल भेलाह अछि से पाठकक दृष्टिपर निर्भर करैत छैक।ओ वसंत गीत लिखय चाहैत छथि मुदा कखन?
'हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी
गाछ सब एखनो अइ प्राणवंत आ
हमरा विश्वास अइ
आइ ने कालि
होएतैक नब पल्लव
रंग बिरंगक फूल
जकर मादक गंधसँ महमह करत परिवेश
पीबि मधु मातल मधुप गुंजन करत
तखन
हमहूँ लिखब
वसन्त गीत जे
आकाशक नहि
परिवेशक उपजा थिक।
कवि सौन्दर्य बोधक संवेदनाक लेल आर्थिक रुपसँ लोक सामर्थ्यवान हेबे करय से नहि मानैत छथि।ओ श्रमिक वर्गक सौंदर्यबोधक अलगे परिभाषा गढ़ैत छथि।जकर स्थिति नितह कमेनाय आ नितह खेनाय छैक से कतयसँ ताजमलक सैर करबा लेल जायत।खजुराहो वा कोणार्कक सूर्यमंदिर देखबाक लेल जायत मुदा सौन्दर्य बोध गरीबक लेल सेहो होइत छैक,जकर प्रकृतिसँ बहुत सन्निकटतासँ सम्बद्ध रहैछ।
कवि लिखैत छथि-
'ओना, हम देखने छी
साँझक मेघाच्छन्न आकाश
घर घुरल जाइत कोनो सारस- दम्पत्ति
हम देखने छी।
--------------
हम देखने छी
डबरी-चबच्चा मे
जलविहार करैत डुबैत -उगैत
हंस-दम्पत्ति हम देखने छी।
कवि भादवक अन्हरिया रातिमे ,पछुआरक बसबिट्टी आ करजानमे अनगिनत भोगजनीकें चमकैत देखने छथि। कविक आँखि एहने- एहन दृश्य सब देखबाक लेल औनाइत छनि।एहन सौन्दर्य छटा जे जन साधारण बिनु कोनो खर्चकें देखि सकैत अछि।
ओ अपन कविताक अलग सौन्दर्यशास्त्र गढ़लनि अछि।हुनक कविताकें पढलाक पछाति पाठककें एकटा खास तरहक सौन्दर्य बोधक आभास होइत छैक।जखन हुनक कवितामे ढेकि जाँतक आबाज,कनसारनिक लाड़नि,हट्ठामे आ पौरपर चलैत बड़दक गरदामीक बजैत घंटी -ध्वनि
लोहाड़क हथौड़ा आ मशीनक आबाजमे ध्वनिक सौंदर्य बोध भेटैत अछि तँ निश्चिते एकटा फराक सौन्दर्यक परिभाषा गढ़ैत अछि।
एतावता हम देखैत छी जे कवि रामलोचन ठाकुरक कविताक सौंदर्यबोध सेहो एकदम फराक अछि।निस्सन अछि आ शाश्वत सेहो।
एहि तरहें कविता संग्रह पढ़लाक पछाति ई नहिकहि सकैत छी जे कविता अप्रासांगिक भेल अछि।बीस बरखक बादो कविता सभ समकालीन स्वरसँ ओत -प्रोत अछि।कविताक माध्यमसँ उठाओल गेल अनेक प्रश्न एखनो उत्तर हेरि रहल अछि। कविक आज थिक आम जनक हितक लेल संवाद करब।प्रश्न उठायब।से एहि कविता संग्रहमे कवि सफलतापूर्वक उठौलनि अछि।जाहिमेसँ कतेक प्रश्न उत्तर भेटल? कतेक एखनो अनुत्तरित अछि? कतेक नव प्रश्न सभ ठाढ़ भेल अछि? से सभक पड़ताल करब निश्चितरुपसँ वर्तमान समाजक अछि से साहित्यिक समाज लेल सेहो ।हँ,जे शासन सत्ताक हर लगातार जोति रहलाह अछि।जिनका लग सत्ताक सभटा कुंजी छनि हुनकासँ त' स्वाभाविके।
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उदयनारायण सिंह 'नचिकेता'-संपर्क-9434050218
रामलोचन - हमर नजरिमे
भारतीय नवजागरणक पृष्ठभूमिमे अप्पन देस-कोसक भाषा और साहित्यकें प्राथमिकता देल गेल छल। ई त' हम सब जनिते छी जे मैथिली आ’ बांगला – दुनू केर साहित्यक मध्य युगेमे वैष्णव और शाक्त सम्प्रदाय – दुनू सम्प्रदाय केर रचनाक प्रभावसँ सामान्य जनसँ ल’ कय कवि-विद्वान रचनाकार सब क्यो प्रभावित भेल छला। जाति प्रथा और भेद भावकें मेटा देबाक वाणी बजैत तकर पहिनहि चैतन्यदेव आर हुनक धार्मिक आन्दोलनक प्रभाव समग्र पूर्वी साहित्यपर पड़ल छल। विद्यापतिसँ एहन समन्वय केर चिन्ता शुरू भेल छलनि। उन्नैसम शतकमे आबैत-आबैत तकर सुदूर-प्रसारी प्रभाव हमर सोच-विचारपर पड़त आ' हमरा नव तरहसँ सोचै ले' वाध्य करत - से कोनो अनापेक्षित घटना त' नहिये छल। देखल जाइत अछि जे प्रारंभिके समयमे राष्ट्रीय चेतनाक जेना ज्वार नजरि आयल छल – जकर प्रभाव समग्र भारतीय जन-जीवनपर पड़ल – ई त' हम सब जनिते छी। उन्नैसम शतकमे, जखन बंगाल जागि रहल छल आ’ जखन हमर पड़ोसेमे साहित्यक इतिहासमे एकटा नवीन चेतना आबि रहल छल, तकर प्रभाव मिथिलापर पड़त ताहिमे आश्चर्य की? मिथिलाक सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक जीवनपर तकर बड्ड प्रभाव पड़ल। ओना त' मिथिलामे एहि विषयपर तत्तेक शोध आ’ चर्चा भेल नहि अछि – मुदा रामलोचनजीक संगे हमर निकटता अथवा उर्दूमे कही त 'नज़दीकी' जे कैकटा कारणें भेल छल तकरामे प्रमुख ई छल जे हम दुनू बंगालमे रहि कय मैथिलीक चर्चा करैत काल इतिहासक एहि समझ अथवा 'पाठ'पर सहमत छलहुँ। सदा प्रयास ई रहैत छल जे कोना हमरा लोकनिकें इतिहासक गभीरता धरि ल' जायब संभव होयत। तैं आश्चर्य नहि जे हुनकर हाथसँ 'इतिहासहन्ता' सनक महापाठक निर्माण हेतनि।
ओना त' रामलोचन ठाकुर मार्क्सवादी विश्वदृष्टिसँ सम्पन्न रचनाकार छथि, जनिक काव्य-शिल्प लोकधर्मी छनि । अग्निजीवी काव्यधाराक प्रवर्तक कवि, अभिनेता-निर्देशक एवं कर्मठ भाषा आंदोलनी रहल छथि। हुनक लेखनी कत्तेक शक्तिशाली छनि तकर एकटा अंदाजा किछु पंक्तिसँ भेटि सकैत अछि -
“बन्धु !
एना होइत छैक
एना होइत छैक कहियो काल
भदवारिक सतहिया
माघक शीतलहरी
कोनो नव बात नहि
जखन दिनपर दिन सूर्यक अस्तित्व
रहैछ अगोचर
तें मानि लेब सूर्यक अवलुप्तिकरण
आलोकपर अन्धसकारक वर्चस्व
कत' क' बुद्धिमानी थिक
सामयिक सत्यस होइतहुं
शाश्वत नहि होइछ अन्धकार”
ओ हमरा सबकें सचेतक' दैत छथि - विश्व-बाजार केर चलि रहल खेल केर विषयमे, एहि तरहेँ -
“जखन पूंजीवादी विस्तानर लिप्साक'
जारज संतान वैश्वीकरण
वृहत विश्ववकें बाजार बना देबाक लेल
अछि उद्धत अपस्यांत
आवश्य्के नहि अनिवार्य भ' जाइछ
प्रतिकार शब्द-साधक लेल…”
मिथिला, मौथिली आ मौथिल संस्कृतिक प्रति अगाध प्रेम हुनका मिथिलाक पीड़ा आ आकांक्षाकें कवितामे करबा लेल प्रेरित कयने छनि। व्यंग्य, करुणा, विरोध आ ललकार हुनक प्रमुख काव्य-स्वर थिकनि। हुनक काव्य-शिल्प लोकधर्मी अछि।
पनरहे बर्खक उमरमे जखन ओ नोकरीक खोजमे कलकत्ता चलि आयल छलाह, जखन हुनकरआँखिमे कतेको सपना छलनि, तखनहि हुनका संग परिचय आ' मित्रता भेल छल – जे अटूट रहल। शिक्षाक प्रति जे अनुराग हुनकामे छलनि से चैन नहि लेबऽ देलकनि। स्थायी नौकरी शुरू करिते ओ सांध्यकालीन छात्रक रूपमे चारुचन्द्र कॉलेजमे प्रवेश लेलथि। ओ कलकत्ता विश्वविद्यालयक एहन स्नातक छात्र भेलाह, जिनका मौथिली पढ़बा लेल संघर्ष करए पड़लनि। ओ आयकर विभागसँ 2009 मे सेवानिवृत्त भेला। तखनहि हमहुँ सब 'मिथिला दर्शन'क पुनरुज्जीवनक योजना बना रहल छलहुँ, जकर ओ कार्यकारी सम्पादनक दायित्व ग्रहण कयने छला।
रामलोचन ठाकुर जखन छठमेमे पढ़ैत छलाह तखने गीत लिखब शुरू कयलनि। नौ टा मौलिक पोथीक अतिरिक्त दूटा संपादित तथा अनुवादक सात टा पोथी प्रकाशित आ कैकटा अप्रकाशित सेहो छनि। पाँच टा प्रकाशित काव्य संग्रह भेलनि : ‘इतिहासहंता’ (1977), ‘माटि-पानिक गीत’ (1985), ‘देशक नाम छल सोन चिड़ैया’ (1986), ‘अपूर्वा’ (1996) एवं‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ (2003)।`बेताल कथा` नामक एकटा हास्य-व्यंग्य कथा-संग्रह सेहो कुमारेश काश्यपक छद्म नामसँ 1981 मे छपल छलनि। एम्हर रामलोचनक दूटा संस्मरणात्मक पोथीअयलनि - `स्मृतिक धोखरलरंग` (2004)मे आ `आँखि मुनने : आँखि खोलने` (2005)। 1983 आ पुन: 2006 मे ओ `मौथिली लोककथा` छपौलनि जे लोकसाहित्यक पुनर्रचना अछि। अनुवाद लेल हुनका प्रतिष्ठित `भाषाभारती सम्मान`सँ अलंकृत कयल गेल छलनि तथा विदेह सम्मान सेहो प्राप्त भेल छनि। वर्ष 2012क लेल वरिष्ठ कवि एवं गीतकार चंद्रभानु सिंहक संग युग्म रूपमे रामलोचन ठाकुर कविताकें सेहो मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे सर्जनात्मक आ' अनुवादक काज लेल प्रबोध साहित्य सन्मान भेटल छलनि।
‘अग्रदूत’क छद्म नामसँ रामलोचन अनेक कथा एवं निबंध लिखलनि जे अद्यावधि पत्र-पत्रिकामे छिडि़आयल अछि- ओकरा एकत्रित क' कय क्यो प्रकाशित करय त' आर कैकटा पुस्तक बनि सकैत अछि; ओ अनेक पोथी आ पत्रिका कसंपादन सेहो कऽ चुकल छथि। `अग्निपत्र`, `रंगमंच`, `मौथिली दर्शन` आ `सुल्फा` सन स्तरीय पत्रिकाक ओ यशस्वी संपादक रहल छथि।जे क्यो अनुवाद-प्रेमी छथि, तिनका लोकनिकें हिनक अनुवाद-पुस्तक सब अवश्य मोन हेतनि - ‘प्रतिध्वनि’ (अनुदित कविता), ‘जा सकै छी, किन्तु किए जाउ’ (अनुदित कविता), ‘जादूगर’ (अनुवाद), आदि। जापानी पद्धतिमे ओ हाइकू कविता - 'किछु क्षणिका' केर रचना कयने छला - जे 'विदेह' मे प्रकाशित भेल छलनि –जेना कि - "भोजक पान/ सासुरक सम्मान/ पुनिमाक चान", वा "हाथीक कान/ नटुआक बतान/ एक समान", अथवा "दूरक चास/ गामक कात बास/ कोन विश्वास" – जतय पद्धति विदेशी अवश्य छलैक, मुदा स्वर सम्पूर्ण रूपेण 'मैथिली'येक।
१९५७ मे हरिमोहन झा, मणिपद्म-जी आ' लक्ष्मण झाजीक प्रेरणासँ अखिल भारतीय मैथिली संघ आ' मैथिली लोकसंघक विलय क' कय जे अखिल भारतीय मिथिला संघ बनल छल – जकर पुरोधा स्वरुप बाबूसाहेब चौधरी, प्रबोधनारायण सिंह आदिक संग रामलोचनक पितृव्य शुकदेव ठाकुरजी सेहो अत्यंत सक्रिय छला – आओर तरुण रामलोचन सेहो आगाँ चलि कय भाषा आंदोलनमे काफी सक्रिय भ' गेल छला। बादमे ओ बेसी इन्वोल्वड भ' गेल छला मैथिली नाट्य-आन्दोलनक संग। तकरहि संगे लेखन आ' सम्पादन त छलैये। स्वस्थ रहथि आ' सृजनशील रहथि, सैह कामना करब।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
नबोनारायण मिश्र- संपर्क-9330173348
हमरा नजरिमे: श्री रामलोचन ठाकुर
मिथिला-मैथिलीक उत्थान हेतु कलकत्ता सभ दिन अग्रगण्य रहल अछि। एकर अतीत वस्तुतः गौरवपूर्ण रहल अछि। हमर अग्रज लोकनि भाषा-संस्कृतिक हेतु सजग रहलाह आ एखनहुँ नव पीढ़ी अपन दायित्वक पालन करैत छथि। ताहि मध्य श्री रामलोचन ठाकुर जीक नाम विशेष लोकप्रिय रहल अछि।
श्री रामलोचन ठाकुरजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक समग्र मूल्यांकन करब हमर सामर्थ्य नहि तथापि जे हम देखल अछि से वर्णनातीत। मिथिला-मैथिलीक प्रति हृदयमे वेदनाकेँ ओ साकार करैत रहलाह अछि। मूल समस्याकेँ विभिन्न स्तरपर रेखांकित करैत रहलाह अछि। तकरे निमित्त मैथिली आंदोलन, मैथिली रंगमंच, काव्य आदिक सर्जनाकेँ माध्यम बनौलनि। मैथिली आंदोलन हुनक मूल अभिव्यक्ति छलनि। मैथिलीक अधिकार हेतु आंदलोन पक्ष रखैत 'देसिल बयना'मे हुनक संकल्प द्रष्टव्य अछि-
संविधान बिनु मैथिलीक ओ
मानचित्र बिनु मिथिला धाम
डाहि-जारि सुड्डाह करब हम
विद्रोही मिथिलाक जुआन
यद्यपि श्री ठाकुरजीसँ पूर्व परिचित छलहुँ मुदा हुनकर स्नेह-सान्निध्य १९९० ई.मे मैथिली नाट्य संस्था 'कोकिल मंच' के स्थापनाक पश्चात हमर सक्रियतासँ प्रगाढ़ भेल। हम हिनक मैथिलीक प्रति समर्पणसँ बहुधा प्रेरित होइत रहलहुँ। ताहि दिन कोनो एहन कार्यक्रम नै छल जाहिमे वक्ता ओ नै होथि। ताहि मध्य शिष्टाचारवश भेंट होइत रहल आ हम अपनाकेँ पारिवारिक सदस्य सन पाबि धन्य होइत रहलहुँ। कोकिल मंचक कोनो एहन कार्यक्रम नै जाहिमे ओ सम्मिलित नै भेल होथि। प्रत्येक वर्ष स्मारिकामे आलेख हेतु जखन कहलियनि से निरंतर महत्वपूर्ण आलेख दैत रहलाह। हुनक परामर्शसँ संस्थाकेँ सुयश प्राप्त होइत रहल।
एकटा उल्लेखनीय काजक चर्चा करब जरूरी बुझना जाइत अछि। श्री सूर्यनारायण झा 'सरस' रचित "मैथिली श्री सीताराम चरित मानस"केँ जखन कोकिल मंच दिससँ प्रकाशनक योजना बनेलहुँ आ तकर संपादनकेँ गुरूतर भार हुनका देल तँ ओ सहर्ष स्वीकार केलनि जे वस्तुतः बहुत श्रमसाध्य काज छल। ताहि अवधिमे प्रेससँ प्रूफ देखेबाक हेतु मित्रवर कुमरकांत झाजी (राघोपुर-बलाट)क संगे अनेको बेर हुनका घर जेबाक अवसर भेटल। महाजाति सदन प्रेक्षागृहमे मैथिली नाटकक मंचनकेँ अवसरपर एहि पोथीक लोकार्पण भेल जाहिमे मंचासीन प्रो. विद्यानंद झा आ रामचलोचन ठाकुरजीक सारगर्भित वक्तव्य आइयो प्रासंगिक अछि। एक दिन प्रसंगवश आग्रह केलियनि जे 'मैथिली रंगमंच आ कलकत्ता' विषयपर आलेख लिखू जे कोकिल मंचक स्मारिकामे देबाक अछि। ओ कहलनि जे जतेक बुझल अछि तकर अतिरिक्त कलकत्ताक आ उपनगरीय क्षेत्रक मैथिली रंगमंचक जानकारी अहाँ देब तखनहि संभव अछि। हम सहयोग केलियनि जे स्मारिकामे छपलै आ पश्चात जखन 'स्मृतिक धोखरल रंग' हुनकर पोथी छपलनि ताहिमे सेहो संकलति केलनि।
दोसर महत्वपूर्ण पक्ष जे मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति स्नेहक वशीभूत विभिन्न पत्र-पत्रिकासँ संलग्न रहितो एकटा ठोस साहित्यिक मंच "संपर्क" केर ओ प्रणेता रहलाह अछि। ध्यातव्य जे उक्त संस्थामे एकटा पदाधिकारी "संयोजक" प्रारंभहिसँ ओ रहलाह अछि। एहि संस्थाक नियमानुसार साहित्यिक रुचि रखनिहार आ मैथिली सेवी भाग लैत छथि। एकर कोनो सदस्य नै बनाओल जाइत अछि। अपन रुचिकेँ अनुसार सम्मिलित व्यक्ति ओकर सदस्य भेलाह। मासक प्रत्येक दोसर रवि दिन साँझुक ४ बजेसँ कार्यक्रम प्रारंभ होइत अछि। सहभागी लोकनि अपन नव रचनाक संग उपस्थित होइत छथि जाहिपर उपस्थित लोक पठित रचनापर मंतव्य दैत छथि। आवाश्यकतानुसार आलेखमे संशोधन करबाक खगतापर सुझाव दै छथि। एहि प्रक्रियासँ साहित्यिक रुचि ओ गुणवत्तामे वृद्धि हएव स्वाभाविके। प्रत्येक संपर्कक प्रारंभमे उपस्थित लोक अपनेमेसँ एकटा अध्यक्ष चुनैत अछि जकर संचालनमे ई कार्यक्रम शुरू ओ अंत होइत अछि। मने हरेक संपर्कक अध्यक्ष अस्थायी होइत छलाह। ध्यातव्य जे अन्यान्य संस्था सभमे पदाधिकारी बनबाक लेल प्रतिस्पर्धा होइत अछि मुदा ताहिसँ अलग संपर्क अपन गतिविधि नियमित रूपें करैत अछि। मुदा आब ई कने अस्थिर भेल अछि। संपर्कक तत्वावधानमे जखन साहित्य अकादेमी पुरस्कार श्री कीर्तिनारायण मिश्र आ अनुवाद पुरस्कार श्री नवीन चौधरीकेँ भेटलनि ताहि उपलक्ष्यमे एकटा उल्लेखनीय सम्मान समारोह आयोजित भेल छल। नवीन जीक चर्च भेल तँ ई कहब उचित जे नवीनजी अपन पोथी "वर्ण वितान' केर भूमिकामे लिखै छथि जे "....श्री रामलोचन ठाकुरक सत्संग सँ साहित्य बुझबा आ लिखबाक अवगति भेल। आ संपर्क (सभ मासक दोसर रवि)मे निरंतर उपस्थिति सँ सूतल रहबाक मनःस्थिति एखन धरि नहि आएल...."। ध्यातव्य जे तीनू साहित्यकारक कर्मक्षेत्र कलकत्ता रहल अछि। अतबे नहि रामलोचन ठाकुरजी संपर्कक माध्यमसँ बहुतो नवयुवाकेँ प्रेरित केलाह ताहिमे एकटा आशीष अनचिन्हार सेहो छथि आ अनचिन्हारो अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" एहि बातक चर्चा केने छथि। संपर्कक समयक आस-पास बाहरसँ आएल कोनो साहित्यकारकेँ संपर्कक बैसारमे उपस्थित हेबाक आग्रह कएल जाइत रहल अछि। जाहिसँ बाहरी ओ स्थानीय साहित्यकार एक-दोसरसँ परिचित होइत रहलाह अछि। संपर्क एखनो धरि चलैत आबि रहल अछि जकर पाछू रामलोचने जीक बल छनि संगे-संग आनो लोकक। कलकत्तामे किछुए एहन मैथिल भेलथि जिनकर नाम लेलासँ कलकत्ताक बोध होइत हो। रामलोचनजी ओहि किछुमेसँ एकटा आइकन आ इनसाइक्लोपीडिया छथि से हम निश्चित रूपसँ कहि सकैत छी। एहन महान सर्जक, संपादक आ क्रांतिकारीकेँ पाबि हमरा सभकेँ सतत गौरव बोध होइत रहल अछि।
संपादकीय नोट- नबोनारायणजी द्वारा विदेहपर रामलोचन ठाकुरजीसँ संबंधित अन्य सामग्री।
2011 मे विदेह द्वारा संचालित “विदेह सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार)” 2011-2012 केर अनुवाद सम्मान रामलोचन ठकुरजीक अनुवाद पोथी पद्मा नदीक माँझी देबाक घोषणा भेलै। https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/147780938633376 आ एहि अवसरपर हमरा लोकनि नबोनारायण मिश्रजीसँ आग्रह केलहुँ हुनकर साक्षात्कार लेल। हमरा लग साक्षात्कार आएल आ ई विदेहक 15 जनवरी 2012 केर अंक संख्या 98 प्रकाशित भेलै। एहि समय धरि रामलोचनजी पूरा स्वस्थ छलाह। ई आलेख लेल विदेह अंक 98 डाउनलोड करू एहि लिंकसँ http://videha.co.in/new_page_15.htm एकरा एहू लिंकपर पढ़ि सकैत छी http://esamaad.blogspot.com/2012/01/blog-post_09.html
एहि साक्षात्कार केर अतिरिक्त महत्व ई जे जाहि समयमे ई साक्षात्कार लेल गेलै ठीक ताही समयमे प्रबोध साहित्य सम्मान केर घोषणा सेहो भेल रहै।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
अशोक-संपर्क-8986269001
राम लोचन ठाकुरक कविता पढ़ैत
रामलोचन ठाकुर मैथिलीक प्रसिद्ध कवि छथि। ओ एही संग आंदोलनकर्ता, रंगकर्मी ओ अनुवादक सेहो छथि। पोथी सभक संपादन केने छथि। व्यंग्य ओ लोकधर्मी कथा लिखने छथि। ओ एहन कवि छथि जिनक चेतना लोकोन्मुख आ अभिलाषा जनवादी अछि। ओ खाँटी मैथिलीक कवि छथि। हिंदीमे कहियो नहि लिखलनि। राम लोचन ठाकुर मैथिली साहित्कारक ओहि परंपराक लोक छथि जे परंपरा काञ्चीनाथ झा 'किरण'क अछि। मातृभाषाक विकास जिनकर लक्ष्य रहलनि। मातृभाषाक विकास एहि कारणे जे 'मातृभाषाक विकाससँ जन-जागरण होइत छैक ओ जागरण धन-कुल-जातिमूलक गरिमाकेँ चूरि दैत अछि'। रामलोचन ठाकुरक जन्म मिथिलामे भेलनि आ जीवन बंगालमे बितलनि। फलस्वरूप हुनक जे रचनाकार-व्यकतित्व निर्मित भेल से दूनू ठामक सांस्कृतिक चेतनाक समन्वयसँ निर्मित भेल। ई चेतना परिश्रमी ओ उत्पादक वर्गक संघर्षशीलतासँ उपजल छल।
रामलोचन ठाकुर अपन कविता आठम दशकसँ शुरू करैत छथि। मोटामोटी १९७० ई.क बादसँ लिखल हुनक कविता सभ चारि संग्रहमे संग्रीहत अछि। 'इतिहासहंता' (१९७७), 'देशक नाम छलैक सोन चिड़ैया' (१९८६), 'अपूर्वा' (१९९६) आ 'लाख प्रश्न अनुत्तरित' (२००३)। ओ विभिन्न शिल्प-शैलीमे कविता लिखलनि अछि। छंदोबद्ध ओ मुक्तक दूनू रूपमे हुनक कविता उपल्बध अछि। दोहा, कुंडलिया, मुक्तक कविता, मिनी कविता, क्षणिका (हाइकू) सभ तरहक कविता। हुनक कविता सभहक क विशेषता ईहो अछि जे पूर्वजसँ लऽ कऽ समकालीन ओ अनुज धरिकेँ मोन पाड़ैत ओ संबोधित करैत हुनक बहुते रास कविता अछि। एहिसँ हुनक जुड़ाओ ओ प्रतिबद्धता प्रकट होइत अछि। समानधर्माक प्रति लगाओ हुनक एक फराकसँ रेखांकित करए बला प्रवृति अछि। रामलोचन ठाकुरक कवितामे समयक ताप ओ धाकेँ संग आर्थिक-समाजिक ओ राजनीतिक-सांसकृतिक परिदृश्य ओ प्रवृतिपर टिप्पणी, व्यंग्य, आक्रोश भेटैत छैक। हुनक कविता-यात्रामे पाठककेँ ओहि समयक स्थिति-परिस्थिति मूर्तिमान होइत छैक जखन ओ कविता लिखल गेल छल।
ई देश स्वतंत्रता बादसँ बहुतो झंझावात, आलोड़न-विलोड़न देखि चुकल अछि। स्वाधीनता प्राप्तिक जे उल्लास रहैक से क्रमशः थोड़ेक वर्षक बाद बिलाए लगलै लोककेँ लगलै जे ओकर दुख-तकलीफ कम नै भऽ रहल छै। सत्तामे गोर अंग्रेजक स्थानपर कारी अंग्रेज बैसि गेल अछि। मोह-भंगक संग साहित्यमे सेहो ओकर अनुगुंज सुनाइ दिअ लागल। शासन-सत्तासँ निराश आ हताश विपन्न लोक सभ आ एक जुट हुअ लागल। सत्ता परिवर्तनकेँ अनुपयोगी बूझि व्यवस्था परिवर्तन लेल ओ कृषक-मजदूर सभहक शोषणसँ मुक्ति लेल सशस्त्र संघर्ष बंगालक नक्सलबाड़ीमे शुरू भऽ गेल। रामलोचन ठाकुर अपन कविता यात्रा ओही उथल-पुथलसँ भरल समयक संग शुरू केलनि। मैथिलीमे अग्निजीवी कविक रूपमे तमाम भेद-भाव, शोषणकेँ देखि वर्ग-संघर्षक लेल पुरातन मान्यताकेँ अप्रयोजनीय, अस्थायी, उज्जर-कारी रचना, इतिहासकेँ तात्तकाल निरस्त कऽ शोषितक पक्षमे नव इतिहास बनेबाक लेल सशस्त्र क्रांतिक लेल डेग बढ़ा दैत छथि।
आ हम/ एखन नञि लिखि सकब/ करिया मोसि सं/ उजरा कागत पर/ कुनू कविता/ कथा/ इतिहास /अप्रयोजनीय/ अस्थायी / देखैत नञि छी / हमरा हाथमे / चमकैत पंचकमनियां भाला/ चलि पदल छी हम/ लाल टुह-टुह रक्त सं / पिरथीक विशाल वक्ष पर / लिखबा लेल एगो कविता / एगो कथा / एगो इतिहास / आ स्वयं बनि जेबाक लेल एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास"
(अग्रजक नाम-इतिहासहंता)
व्यवस्था परिवर्तन लेल आरंभ भेल एहि प्रकारक संघर्षकेँ तँ तात्कालीन सत्ता द्वारा बलपूर्वक दबा देल गेल मुदा ई संघर्ष-चेतना जनतामे पसरि गेल। ई चेतना सामूहिक संघर्षक छल। मैथिली साहित्यमे सेहो चाहे कविता हो कि कथा कि उपन्यास एहि चेतनाक अभिव्यक्तिकेँ आठम-नवम दशकमे देखल जा सकैत अछि। ओहिसँ पूर्व मैथिली कविताक जे प्रवृति छल से आधुनिक दृष्टिसँ सम्पन्न रोमांटिक , प्रगतिवादी आ नव कविताक रूपमे अभिव्यक्त भऽ रहल छल। डा. हरिमोहन मिश्र अपन पोथी 'आधुनिक मैथिली कविता'मे लिखलनि अछि जे "रोमांटिक कवितामे प्रमुख रूपें सौंदर्यक वर्णन होइत छल। प्रगतिवादी कवितामे समाजिक वास्तव अर्थात समाजिक विषमता, समाजिक कुरीति, गरीबी, शोषण, अत्याचार आदिक वर्णन होबए लागल"। मैथिलीमे रोमांटिक कविता भुवनजीसँ, प्रगतिवादी कविता यात्रीजीसँ आ नव कविताक आरंभ राजकमल चौधरीसँ मानल जाइत अछि। नव कविताक प्रवक्ताक रूपमे रामकृष्ण झा 'किसुन'क योगादन महत्वपूर्ण रहल अछि। डा. हरिमोहन मिश्र ओहि पोथीमे ईहो कहै छथि जे "प्रगतिवादी कवि अतीतक विरोध करैत छलाह किन्तु भविष्यक प्रति पूर्ण आस्थावान छलाह कारण हुनका लोककनिक समक्ष भविष्यक कोनो एहन स्पष्ट चित्र छल। नव कविक समक्ष भविष्यक एहन कोनो स्पष्ट चित्र नहि अछि। तथापि ओ नवक स्वागत करैत छथि कारण जे ओ वर्तमानसँ अत्याधिक आशंकित ओ संत्रस्त छथि"। पाश्चात्य साहित्यिक विभिन्न काव्य आंदोलनक प्रतिध्वनि भारतीय आ कि मैथिली कवितापर ओहि काल विशेषमे पड़ैत रहल। मोटामोटी कवितामे बहिरंग आ कि बाहरी यथार्थ आ अंतरंग आ कि आन्रिक यथार्थ, चेतन आ अवचेतनक अभिव्यक्तिक द्वंद प्रगतिवादी आ नव कविताक मूलमे रहल अछि। रामलोचन ठाकुरक कवितामे अवचेतन आ कि अंतरंगक विभिन्न मोनोग्राफिक चित्रण साधारणतया नै भेटैत अछि। हुनक कविता स्वाभाविक रूपसँ सहज भाषा ओ शिल्पमे लिखल गेल अछि। हुनक कविता प्रयोजनमूलक अछि, कलात्मकमूलक नै।
"अइ रातिक गुज्ज अन्हारमे
हमरा सभकेँ
तय क लेबाक अइ
बहुत रास बाट
पहुँचि जेबाक अइ
ओइ दिबड़ा भीड़ पर
जतय स
काल्हिक बाल सुरुजक संग
देबाक अइ नारा
बड़बाक अइ डेग
आजुक बुढ़बा सुर्य
मरि चुकल अइ
ई अन्हार रहौक अनके लेल
किन्तु आगामी काल्हि
हमरा सभक हएत
हमरे सभक हएत"
(आगामी काल्हि हमरे सभक हएत-- देशक नाम छलै सोनचिड़ैया)
ई जे आस्था आ विश्वास अछि जे आगामी काल्हि हमरे सभक हएत अर्थात शोषित-दलित-परिश्रमी लोकक हएत से बिना भविष्यक चित्र स्पष्ट रहने नै भऽ सकैत अछि। ई कारपोरेटी व्यवस्था समाप्त कऽ उपेक्षित, हाशियापर ठेलल गेल लोकक नव, उर्वर ओ समानतापर आधारित व्यवस्था कायम करबाक लेल सामूहिक संघर्ष ओ एकजुटतापर संभव होयत। रामलोचन ठाकुरक कविकेँ ई सोच-विचार एकदम स्पष्ट छनि। हुनक कवितामे एहि भावक अभिव्यक्ति बेर-बेर होइत अछि।
रामलोचन ठाकुरक कवितामे एहि विचारधारक संग मिथिला ओ मैथिली लेल संघर्ष-चेतनाक अभिव्यक्ति सेहो भेटैत अछि। अपन धरोहरि अपन सांस्कृतिक-साहित्यिक थातीपर गौरव-बोध अछि तँ वर्तमान स्थिति प्रति असंतोष ओ आलोचनात्मक स्वर सेहो अछि। एही संग भाषिक चेतनाक लेल संघर्षक आह्वान अछि।
"स्त्री-पुरुष-जवान-बूढ़-बच्चा सभ चल
लाठी गड़ाँस भालामे शक्ति छै प्रबल
चूड़ी बजैत झन-झन नव चेतनाक स्वर
जय मैथिलीक नारा दए बज्र सन प्रबल
पटना दे पाटि दिल्ली धरि डगमगा पड़ै"
(इतिहास युग नवीनकेँ, अपूर्वा)
देशमे 1990 ई. बाद वैश्वीकरण आ कि भूमंडलीकरणक प्रभाव पड़ए लागल। शासन सत्ता सेहो मिश्रित अर्थव्यवस्था आ कि कल्याणकारी राज्यक नीतिसँ पृथक भऽ मुक्त बजार व्यवस्था जे उदारीकरणक नामसँ जानल जाइत अछि, केर रस्तापर चलए लागल। रंगीन टी.भी आएल आ ओही संग आएल रंगीन सपना देखबए बला जेबी कटू बजारक प्रचार-तंत्र। रूढ़वादिताक प्रचार-प्रसार बढ़ल। आम लोकक कष्ट आर बढ़ैत गेल। धनिक आर धनिक आ गरीब आर गरीब होइत गेल। जाति धर्म जे पहिनहिसँ जड़िआएल छल से आब खूब चतरि कऽ लोकक संकटकेँ बढ़ाबए लागल। सत्ता परिवर्तन होइत रहल मुदा लोकक स्वाधीनता आ सत्तामे बैसल लोकक पूँजीवादी मानसिकतामे दूरी आ चौड़गर होइत गेल। जनताक मतसँ चुनल प्रतिनिधि ओ सरकार जनताक हितमे निर्णय नहि कऽ पूँजीपतिक हितमे निर्णय लिअ लागल। ई सभ वस्तुतः विदेशसँ आयातित अर्थव्यवस्थाकेँ आदर्श मानि लागू कएल जाइत रहल। विश्व बैंक एवं आइ.एम.एफ केर कर्जक बोझ जनतापर तेजीसँ बढ़ए लागल। तथापि लोकक आस्था आ विश्वास नहि डगमगाएल। नीक दिन आओत से विश्वास बनल रहलैक।
एहि महान देशक नब्बे कोटि जनताक
कमसँ कम कम नवम अंश लोक
सत्ता परिवर्तन आ स्वाधीनताक
मौलिक पार्थक्य पर विचारब
कऽ देने अछि प्रारंभ
विदेशसँ आयातित स्मृति नाशक औषधि
जे कीटनाशक नामे कैल जाइत रहल-ए प्रयोग
खेत-खरिहानसँ चूल्हि-चिनवार धरि
प्रभावहीन प्रमाणित भऽ रहल अछि
आ नेता लोकनिक माथमे लीख
आ कुरसी मे उड़ीसक संख्याक
दिन-प्रतिदिन वृद्धि भऽ रहल अछि।
तात्काल
संतोषक बात इएह टा अछि।
(१५ अगस्त, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
एही समयमे कंडल ओ कलंडलक आंदोलनसँ जातीयता आ साम्प्रदायिताक भावनाकेँ राजनीतिक सत्ता द्वारा मजगूत कएल जाए लागल। स्वाधीनता संघर्ज़क जे मूल्य सभ छल से तिरोहित हुअ लागल। देशक बँटवारा समय हिंदू-मुसलमानक जे दंगा भेल, ओकरा महात्मा गाँधीक संग स्वाधीनताक नव विहानमे शासन सत्ता बुद्धिमत्तापूर्ण ढ़ंगसँ बिना कोनो साम्प्रदायिक भेद-भावकेँ शान्त करबामे सफल रहल छल। सामप्रदायिक ओ भावना मुदा समाप्त नहि भेल, फलस्वरूप महात्मा गाँधीक हत्या भेल। भितरे-भीतर सुनगैत ओ साम्प्रदायिक भावना भूमंडलीकरणक एहि अवधिमे छूटि कऽ खेलाए लागल। एहनमे कवि रामलोचन ठाकुर महात्मा गाँधीकेँ मोन पाड़ि बहुत दुखक संग ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यमे वर्तमानक सत्ता-संपोषित साम्प्रदायिक दंगाकेँ देखबैत छथि। अल्ला ओ ईश्वरक बीच बढल जाइत फाँकसँ ओ कराहि उठैत छथि।
अहाँक प्रियगान
'अल्ला ईश्वर तेरो नाम'
सस्वर गाओल जा रहल
आ बढ़ले जा रहल दिनानुदीन
अल्ला - ईश्वरक बीच व्यवधान
नोआखाली भनहि हो इतिहास
बम्बई अहमदाबाद थिक वर्तमान
हे राम!
अहिंसाक उपासक
(हम श्रद्धाञ्जलि नहि द' पाएब, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
रामलोचन ठाकुर अपन कवितामे ईश्वरक सत्ताकेँ नकारै नहि छथि मुदा ईश्वरक सत्ताक कारण विभिन्न धर्म संप्रदायकेँ बीच होइत बँटवाराकेँ मनुखताक विरुद्ध मानैत छथि। ओ एहि बँटवारा ओ एहि कारणे होइत वैमनस्य, कटुता, हिंसाकेँ एक मनुक्खक रूपमे न्यायोचित नहि मानैत छथि। एहिमे मनुख्ताक क्षरण देखैत छथि। वस्तुतः आब ओ मनुक्ख ओहेन नै रहल जे एहि विराट आ सुन्दर पृथ्वीपर आएल रहए। आब एहि कुरूप नृशंस भावनासँ विभिन्न कोलामे बँटि मनुक्ख पृथ्वीकेँ छोट कऽ लेलक अछि।
पिरथी पर
एहि विराट सुन्नर पिरथी पर
ईश्वर नञि छला
मनुक्ख स पहिने
छल जंगल पहाड़
झरना नदी
पशु पाखी ....
प्रयोजन नजि छलै
ओकरा सभ के ईश्वरक
मनुक्ख के भेलै
आविर्भूत होमय लगला ईश्वर
एकक पश्चात् एक
राम
कृष्ण
ईशा
मुहम्मद
बुद्ध
मनुक्खक कल्याण हेतु
ईश्वर अविनश्वर
आबय लगला
रहय लगला
आलोपित होइत चल गेल मनुक्ख
एकक पश्चात् एक
मनुक्ख नजि रहल
रहि गेल किछु
हिन्दू
मुसलमान
सिख
क्रिस्तान...
एहि पिरथी पर एहि छोट-छीन पिरथी पर ।
(मनुक्ख आ ईश्वर,लाख प्रश्न अनुत्तरित)
ई पृथ्वी जे मनुक्खक लेल जीवन जीबाक आ प्रकृति समग प्रगति करबाक जगह रहए से क्रमशः कारी-गोर, नस्लीय घृणा, जातिसम्प्रदायक पारस्परिक हिंसक व्यवहार, राष्ट्र-उपराष्ट्रमे बाँटए लागल। मानवता पाछू छुटेत गेल आ राष्टवाद-अंधराष्ट्रवाद बढ़ैत गेल। मनुक्ख हिंसक होइत गेल, ओकरामे निर्ममता, वीभत्सा एहन बढ़ल जे लोकसँ लोक आतंकित हुअ लागल। विचार जे मनुक्खकेँ सुंदर, सहज बनेबाक लेल उत्पन्न भेल छल से विचारधारक रूपमे घृणा आ हिंसाकेँ संपोषित करए लागल। देशप्रेमकेँ स्थानपर राष्ट्र आ राष्ट्रवादक ज्वारि राष्ट्र सुरक्षाक नामपर युद्ध आ युद्धक आकांक्षाकेँ बढ़बैत गेल। अस्त्र-शस्त्रक होड़ बढ़ैत गेल। एहनमे जीवन सौंदर्यक उपासक, मानव-विकासक आकांक्षी कवि छटपटा उठल। मानवताक पक्षमे ठाढ़ लोकेँ सत्ता आब देशद्रोही मानए लागल। सत्ता-पुरुष आ सर्वोपरि होइत गेल। सत्ता द्वारा राष्ट्रद्रोहीक आरोप झेलैत एहन एक कविक आदलातमे देल बयानकेँ एहि कवितामे देखल जा सकैत अछि।
हे महामान्य अदालत !
जेना कि कहल गेलए
हम एगो कवि छी
सौंदर्यक उपासक
जीवनक कविता लिखैत छी हम
मृत्युक नहि
ओकर निर्ममता बीभत्सता आतंकित करैछ
हमरा
तें हत्यारा सँ घृणा करैत छी
घृणित कर्म मानैत छी
हत्या के
मानवताक विरूद्ध
एगो एहन अपराध
जकर क्षमा नहि
से हत्या ---
भनहि विचारक नामपर हो
एनकाउन्टरक नाम पर वा राष्ट्रक सुरक्षाक नाम पर .....
(एक गोट राष्ट्रद्रोहीक वक्तव्य, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
एहन कवि स्वाभाविक रूपसँ चाहैत अछि जे ओकर कविता उत्पादक ओ परिश्रमी लोकक श्रमसँ अर्जित चेतना-विचार ओ सौंदर्यबोधसँ जन्मय। पुष्पित-पल्लवित हो। ओ कवि ईहो नहि चाहत जे ओकर एहन कोनो कविता-गीत कोनो शीत-ताप नियंत्रित सभागारमे भद्र सुसज्जित सज्जन समुदायमे पड़ल जाए किएक तँ ओ लोकनि एकर निहितार्थ नहि बूझि सकता। वस्तुतः जे लोक परिश्रमी लोकक पक्षमे नहि अछि से निश्चित रूपसँ अन्ततः हत्यारा प्रजातिक संग धऽ लेत।
कविता हमर
कोनो मंदिर मसजिद वा
कोठा सँ नहि, मजूरक झोपड़ी सँ
कारखानाक जरैत चिमनी सँ खेत जोतैत हरक फार सँ
धीपल लोहा पर पड़ैत लोहारक हथौड़ा सँ
कुम्हारक चाक सँ चमारक टाकु सँ जनमओ
हम चाहै छी
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
हम चाहै छी हमर कविता
महानगरक कोनो शीत-ताप-नियंत्रित
सभागारमे भद्र सुसज्जित, सज्जन समुदाय
मध्य नहि पढ़ल जाय
कोनो कारखानाक गेट पर
मजूरक बीच, खेतक आरिपर
झहरैत मेधक बीच सारिबद्ध
धनरोपनी करैत श्रमिकक समक्ष हम चाहै छी
हम इएहटा चाहै छी
अपन कविताक लेल ।
(हम चाहै छी, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
देश-दुनियाँमे चलैत आ बढ़ैत भूमंडलीकरण वा बजारवादक एहन समयमे जतए गलाकाट प्रतियोगिता आतंकक सृष्टि, उधारीक नीति, बाबा नाम आ दादा नाम केवलम् चलि रहल अछि ओतए शोषित-दलित-परिश्रमी लोक जीवन-यापन लेल एम्हर-ओम्हर बौआइत, जीविका तकैत छिछिया रहल अछि। एहि स्थितिक बावजूद स्नेह करए बला गामकेँ, जीवनसँ लबालब गामकेँ बिसरि नहि पाबि रहल अछि। भले गाम बदलि रहल हो, शहरे भऽ रहल हो, भले गामसँ विस्थापित लोक लेल गाम अनचिन्हार भेल जाइत हो वा ओ स्वयं अनठीया भऽ रहल हो, ओ अनुभव करैत अछि जे ओकर परिचय जेना छिना रहल छैक। मैथिली साहित्यक ई खास विशेषता रहल अछि जे एहिठामक साहित्यकार अपन रचनामे मिथिला भूमिक लोक हित-चिंतासँ विलग नहि भेल अछि। ओ चाहैत अछि जे मिथिलाक समाजिक-आर्थिक विकास हो जाहिसँ लोक पलायन लेल मजबूर नहि रहए। रामलोचन ठाकुरक कवितामे सेहो ई चिंता-बेगरता गामक स्मृतिक संग विभिन्न रूपे अभिव्यक्ति भेल अछि।
बहिन दाइ !
हम मानैत छी /
आ अहूं मानब जे आइ /
अपने गाम मे हम सभ छी अनठिया-अनचिन्हार
जकर नजि छइ कुनू पता-ठेकाना -
सरिपहुं कतेक असह्य थिक ई पीड़ा मुदा /
ताइ लेल कथमपि उचित नजि कानब /
वरन् चीन्हब अपन शक्ति
आ बाहरोक शब्द के अकानब-
आ एगो प्रण ठानब त
कालि-आगामी कालि
हमरो एगो परिचय रहत
बिरदावनक हम
हमर बिरदावन।
(बहीन दाइक नाम एगो चिट्ठी, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
वस्तुतः ई परिचय वैयक्तिक परिचयनहि थिक। सामूहिक परिचय थिक। मिथिलाक अपन धरती अपन देश अपन गामसँ जुडऽल रहि ओहि माटि-पानिसँ उर्जा पायब थिक जाहिसँ दुनियाँकेँ बदलि सकी। अपनाकेँ चिन्हबाक लेल आ अपन शक्तिकेँ बूझि समाज व्यवस्थामे परिवर्तन लेल सामूहिक रूपे सन्नद्ध होयब वस्तुतः अपन परिचय पायब थिक। एहि लेल शोषित-दलित लोकक प्रति संवेदनात्मक स्तरपर जुड़ल रहल जरूरी अछि। तैं कवि कहि उठैत छथि।
लिखबा लेल बैसै छी
गंगा अवतरण कथा
लिखने चल जाइत छी
कोशी प्रांगणक व्यथा
विख्यात भुवनत्रयम्, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
रामलोचन ठाकुरक आठम दशकसँ पछिला शताब्दीक अंत धरि आ एहि शताब्दीक आरंभ धरिक कविता सभकेँ पढ़ि लगैत अछि जे एहि देश-दुनियाँक विद्रूपता, वैषम्य, असमानता, शोषणपर आधारित समाज आ सत्ताक परत दर परत उघरैत चल जा रहल अछि। एक आस्था विश्वासक संग व्यवस्था परिवर्तन लेल सोच-विचार ओ सामूहिक संघर्षक मानसिकता परिश्रमी लोकक हित-चिंता, पक्षधरताक संग संवेदनात्मक स्तरपर अपन छाप छोड़ि रहल अछि। हइए जे कविक संग कहि उठी-
आउ ने
हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी
गाछ सभ एखनो अइ प्राणवंत आ
हमरा विश्वास अइ आइ ने कालि
एहि मे होएतैक नव पल्लव
रंग-बिरंगक फूल
जकर मादक गंध सं महमह करत परिवेश
पीबि मधु मातल मधुप गुंजन करत
तखन हमहूं लिखब
आ निश्चिते लिखब
वसन्त-गीत जे
आकाशक नहि
परिवेशेक उपज थिक ।
((वसन्त गीतक मादे, लाख प्रश्न अनुत्तरित)
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
नारायणजी- संपर्क-9431836445
विरोध आ अनुरोधक कविता
कवि रामलोचन ठाकुर हमरा सभ दिनसँ आकृष्ट करैत रहलाह अछि। तकर आधार हुनकर ओ सुस्पष्ट वैचारिक लेखन थिक जे एक संग भाषा आ साहित्यक प्रति समान भावे एकल निष्ठा आ समर्पणकेँ दर्शाबैत अछि।
साहित्य साधनाक माँग करैत अछि। साधना लेल चाही एकांत। एकांत वैचारिक सुदृढ़ीकरण लेल अत्यंत आवश्यक मानल गेल। संगहि एकांत भाव आ शब्दक उपासनाक लेल सेहो अवकाश उपलब्ध करेबामे साहयक होइत अछि। मुदा भाषा लेल चाही आंदोलन। आंदोलन लेल एकांतसँ बहरा व्यक्ति आ व्यक्तिसँ जुटि एकटा सार्थक संगठनक खाहे तँ निर्माण करब होइत अछि अथवा निर्मित संगठनक संग भऽ अपन गति आ त्वरासँ संगठनकेँ दिशा देब थिक। रामलोचन ठाकुरक जेँ कि मैथिली भाषा आ साहित्य लेल सदा समर्पित रहलनि अछि, पौराणिककेँ वर्तमानमे साकार करबाक लेल समर्पित रहलनि अछि तेँ हुनका द्वारा रचित मौलिक साहित्यकेँ भाषा आंदोलन आ ताहि लेल उत्खनित-अविष्कृत विचार संग जोड़ि देखल जाएब आवश्यक अछि। हमरा एखन अपन कहियोक पढ़ल मोन पड़ि आएल अछि जे पानिक अभावमे जखन सिंधुघाटी सभ्यता नष्ट भेल जा रहल रहै तखन सिंधु देवी एकटा प्रतिभाशाली तथा पराक्रमी युवकक सपनामे अवतरित भऽ जलक अविरल प्रवाह बनौने रहबाक लेल युक्तिक ज्ञान करबौने रहथिन। हमरा ईहो स्मरण भऽ आएल अछि जे मगध सम्राट अशोकसँ पराजित भऽ कलिंग कोना तीन सए बरखक उपरांत खाड़बेल (तात्कालीन कलिंग राजा) केर सपनामे देवी बनि प्रकट भए मुक्ति लेल प्रार्थना केने रहथि। आ ई स्मरण तँ भऽ रहल अछि जे लामा किछु मंत्र बिदबिदाइत छथि तकर आर जतेक आ जे किछु होइत हुअए मुदा एकटा आर अर्थ 'तिब्बत' होइतहिं टा अछि। तहिना रामलोचनजीक जतेक पत्र हमरा अबैत छल ताहिमे हमर नाम-गाम-जिलाक निच्चामे लिखल रहैत छल 'मिथिला'। मिथिलासँ बाहर रहैत रामलोचनजीक सपनामे 'मिथिला' साकार होएबाक अपन संपूर्ण कमनीय इच्छाक संग रहलनि।
रामलोचन ठाकुर मिथिलासँ बाहर रहैत अहर्निश मिथिला लेल चिंतिंत मिथिलाकेँ विकसित रूपमे देखबाक लेल जें कि आंदोलनक समग रहलाह, जन समुदायक संगे रहलाह तें अपन रचनाक भाषाकेँ अभिजात्य वर्गक भाषासँ यथासंभव दूर जनभाषक निकट रखलनि जे नहि सर्वजन-बोधगम्य छल अपितु भाषा द्वारा विचारकेँ सर्वग्राह्य बनएबाक लेल तथा जन समुदाय लेल, जनसमुदाय द्वारा अपेक्षित उत्तेजानक लहरि सेहो उत्पन्न करएमे सफल भेल अछि। संगहि मिथिलाक उद्धार लेल मिथिलाक निजी भाषा मैथिलीक उद्धार करबाक लेल भाषिक चिन्ता तँ हुनकर सर्वोपरि रहबे केलनि सभ दिन।
उपर्युक्त चिंतासँ चिंतित अनेक मौलिक तथा अनूदित पुस्तकक रचयिता रामलोचन जीक १९९६ ई. मे प्रकाशित ४८ शीर्षकमे विभक्त कविता सभक संग्रह थिक "अपूर्वा" जकरा क्रांति-गीत कहब बेसी उपयुक्त हएत, एहि लेल जे एहि संग्रहक कविता सभमे विलक्षण गेयधर्मी गुण अछि जे कविक विशिष्ट छंद-तानकेँ उजागर करैत अछि, तथा जाहि कविता सभक पाँति सभकेँ नाराक रूपमे आंदोलन लेल मंचसँ कहल जा सकैत अछि एवं देबालपर लिखल-साटल जा सकैत अछि।
रामलोचन ठाकुर मिथिलाक गरिमाक कवि रहलाह अछि। हुनकर कविता सभमे प्राचीन मिथिलाक ज्ञान-वैभव अनेक ठाम अनेक आवृति बनि आएल अछि, जाहि वैशिष्ट्यसँ परिचय करएब आजुक लोककेँ अनिवार्य बुझैत रहलाह अछि। ओ बुझैत रहलाह अछि जे गरिमामयी अतीत जे रहल अछि, अपन तकरा स्मरण दिअओलासँ वर्तमानमे एहिठामक निवासीमे ओहि मूल्यक प्रति जागरुक बनाओल जाए सकैत अछि जे कहियो छल से बूझब आवश्यक अछि-
"लक्ष्मी के बास जतए खेत-खरिहान
घर-घरमे सरस्वती गबै छथि साम।
स्रष्टा जत पूजक आ पूजित हो सृष्टि
माटिक शिव बना पुनि प्रतिष्ठाक प्राण।"
रामलोचन टाकुर मिथिलाक गरिमा आ ज्ञान-वैभव तथा स्वर्णिम अतीतक करैत आजुक समयमे मिथिलाकवासीक ओहि विवशताक अथवा ओहि निर्धनताक चर्च सेहो करैत छथि अपन कविता द्वारा जे हम सभ साग-पात खाए जिबैत छी की आ केहन अयाची छी?
रामलोचन ठाकुर मिथिलाक समुचित विकास लेल मैथिली भाषाक विकास बड़ आवश्यक मानैत छथि। एहि लेल जे भाषाक अभिव्यक्तिक एहन माध्यम थिक जाहि द्वारा जनसमान्यक नहि मात्र सुख-दुख टा बूझल जाए सकैत अछि अपितु जनसमान्यक सापेक्ष जीवन विकासमे ओकर इच्छा-आकांक्षाकेँ सेहो सरि भए बूझल जाए सकैत अछि। मुदा मिथिलामे पसरल तँ अछि हिंदी जे हमर शत्रु नहयो रहैत मित्र कखनहुँ नहि थिक। तें कवि आह्वान करैत छथि जे जनगणनामे मैथिली लिखबाक-
"काल्हि जनगणना थिक गामे पर रहब
ठीक-ठीक लिखाएब कने जेना-जेना कहब
माइक जे भाषा से मैथिली लिखाएब
देखब हिंदी ने लिखए मुद्दैया"
उपर्युक्त काव्य-पंक्ति मिथिलामे भाषाक प्रति भेल अपसांस्कृतिक दृष्टांत उजागर करैत हिंदीक विरोधमे कविक व्यक्त विचार थिक।
रामलोचन ठाकुर अपसांस्कृतिकरणक बिहाड़िसँ मिथिलाकेँ बचएबाक लेल ने केवल निज भाषाकेँ बचएबाक लेल आह्वान करैत छथि अपन कविता द्वारा अपितु अपन परंपरासँ गाढ़ अनुराग देखबैत तकरा बचएबाक अनुरोध करैत छथि। मुदा एहि विलक्षण दृष्टिकेँ जतबेक प्रशंसा कएल जाए से थोड़ हएत। ओ परंपराकेँ बचएबाक जे अनुरोध कएलनि अछि से पाबनि-तिहार आ भक्ति-पूजा सन बुजुर्आ सौंदर्यबोधक पारंपरिक संस्कारक बचएबाक अनुरोध नहि, से थिक लोक-संस्कृतिकेँ बचएबाक लेल विकल अनुरोध। आ ताहि लेल मिथिलामे कहियो प्रचलित ओ खेल आ फकड़ा सभ थिक जे कहियो छल जकर आइ लोप भए रहल अछि। मुदा ताहि लोक-संस्कृतिक फर्मामे ओ समयकेँ जे देखओलनि अछि तकर मूलमे लोकधाराक लोकरसमे पागि अपन संदेश बिलहब थिक आ तकर बानगी देखल जाए सकैत अछि--'उट्ठी गोटी मोर पचास' शीर्षक कविता, 'आम छू अमरोरा छू' कविता, तथा 'फेर कन्हुआइ छौ तोरे पर' कविता सभ थिक , जे सभ कविक अपन वैचारिक अनुरोधकेँ अपन राग-भासमे व्यक्त करबाक एक प्रकारक अनुरोध थिक।
रामलोचन टाकुर जाहि सकारात्मक निर्माणक योजनाक झलक संग मिथिलाक ओ रोग जे अपसांस्कृतिकरणक अछि तकर अपन कविता द्वारा विरोध कएलनि अछि ओतहि ओ अपन गौरवशाली परंपराकेँ बचएबाक लेल अनुरोध सेहो कएलनि अछि। आ हुनकर से सदिच्छा सर्वत्र हुनकर कविता सभमे मुखरित भेल अछि। आ अपन ताहि विचारकेँ पुनर्जीवित रखबाक लेल अपन एहि करुण विनय संग मार्मिक अभिव्यक्ति देलनि अछि-
हम रही वा नर रही
याद हमर बाँचत
मओन सुन्न बाट जकाँ
बाट अहाँक ताकत
हमर विश्वास अछि जे रामलोचन ठाकुर सभ दिन रहताह, हुनकर कविता सभ दिन बाँचत। आ कवितामे अनुस्यूत हुनकर विचार मिथिलावासीकेँ सभ दिन दिशा प्रदान करैत रहत।
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रामभरोस कापडि भ्रमर-संपर्क-9854020889
देसिल बयनाक बहन्ने रामलोचन ठाकुर प्रसंग
ह्मरा मोन नहि अछि–रामलोचन ठाकुरसँ हमरा कहिया भेट भेल छल । तखन सभा समारोहमे निरन्तर कतेको ठाम भेटैत रहलहूँ अछि । आ से मात्र औपचारिक भेटमात्र । हुनका अनेरे बजैत रहबाक प्रायः आदतो ने छन्हि । नहि देखलियनि तेहन ।
हँ, तखन पत्र–पत्रिकाक माध्यमे काफी पहिनेसँ भेट रहल । हुनक लेखनमे व्यवस्था प्रतिक आक्रोशक हुनक लेखकीय स्वरुपकें जतेक प्रखर बनबैत छलन्हि, ततबे प्रभावकारी । आ हम से रुचिसँ पढी । एहि दुआरे नहि जे हमरा कोनो वाम–दहिन विचारधाराक प्रभाव गछडने रहे । एहि दुआरे जे खूलि कऽ अव्यवस्था आ शोषणके रखबाक हुनक साहस हमरा लग अनने छल ।
ई सम्वन्ध आर प्रगाढ भऽ गेल–कलकत्तासँ बहराइन त पत्र–पत्रिकाक माध्यमे । हम निरन्तर छपैत छलहुँ । दोसकोस भाई विनोद कुृमार झाक, देसिल वयना जनार्दनझाक सम्पादनमे छपैत आ एम्हर भाइ रामलोचन ठाकुरक सम्पादनमे छपैत ‘मिथिला दर्शन’क साँग । ‘मिथिला दर्शन’मे रचना सभ छपिते छल, हमर एकटा स्तम्भ सेहो छपैत छल जे काफी समय प्रकाशित होइत रहल । कोनो खास रचनाक हेतु आग्रह, अथवा विशेष रुपें लिखल रचनाक प्रकाशनक विच सम्पादक वअस्था दुनूके निरन्तर जोडैत रहल छल ।
तकर अतिरिक्त भाइ रामलोचन ठाकुरक सँग हमर चेन्नईक भेटघाट संक्षिप्त मुदा सुखद अछि । हम, डा. रामावतार यादवक सँग ठाकुरजीक सँग विस्तृत गपसप आ फेर समुद्क किन्हेरमे सैर सपाटाक आनन्द, । ताहू क्रममे कतेको प्रसंगमे पोस्टमार्टम होइत रहल, हमरा सभक टोली आगा बढैत रहल ।
कम बाजब आ सटीक बाजब । लोक एकरा भले कडा, कठोर आ रसहीनताक आरोप लगाबे–लोक भाषामे एकरा ठाय–पटाका कहब कहल करैत अछि से ठाकुर जी कहैत अएलाह अछि ।
आब आबी बात करी देखिलवयनाक जे कलकत्तासँ १९८१ ई.मे बहार भेल छल । ई मासिक पत्र छल जे अखबारी साइजमे आठ पृष्ठक बहराइत छल । जँ कि ई मैथिली मुक्ति मोर्चाक मुखपत्र छल, तएँ एहिमे एकर संयोजक राम लोचन ठाकुर पृष्ट पृष्ट आ कही त पंक्ति पंक्तिमे बजैत छलाह । सम्पादक यद्यपि जनार्दन झा रहथि । मुदा देसिल बयनाक पृष्ट पर उभरैत विभिन्न नामी आ बेनामी रचना सभक चयन राम लोचन ठाकुरजीक सोचके अधीक सँ अधीक प्रतिनिधित्व करैत बुझाइक ।
तहिया हम जनकपुरधामसँ अर्चना द्वैमासिक रुपें निकालैत रही । जे तहिया डाक सुलभताक कारणे काफी ठाममे जाइक, कलकत्ता सेहो । दोसिल वयनामे तकर विज्ञापनो छपल करैक । हम प्रारंभेसँ देखिल वयनासँ जूडलहुँ । खूब लिखलहुँ आ खूब पढलहुँ । बरु कही त रामलागेचन ठाकुर जीक विचारसँ ताही पत्रिका माध्यमे अवगत भेल रही । ठायँ पटक्का बज बला मर्द मैथिल... ।
देसिलबयना हमरा निरन्तर अबैत छल । संग्रह अछियो । एखन जखन हुनकापर केन्द्रित लिखबाक हेतु विदेहसँ आग्रह आएल तं खोजल । एक–दूटा भेटल । आर खोजबाक हिम्मत नहि भेल । आधादर्जन अनबारीमे तहिआएल पुस्तकके कतौ पातर काया अदृश्य भऽ गेल छल । तखन विदेहक सहयोेगे आर किछु प्रति प्राप्त कएल । जकरा माध्यमे किछु लिखबाक आधार तैयार भेल अछि ।
से हम देसिल वयनाक वर्ष २, अंक ८ सँ किछु प्रसंग राख चाहब । ओ बाल गीत बरोबरि लिखैत छलाह । हम सेहो कहियो काल बालगित लिखैत छलहुँ । से हुनक बालगीत नीक लगैत छल । बच्चाके हुनके धुन आ शैलीमे अपन भाषा–साहित्यपर ध्यान केन्द्रित करबालेल कयल गेल आग्रह एत्त देखल जाए–
“झिझिर कोना झिझिर कोना, कोन कोना जाउ
मिथिलाके आंगनमे सभतरि खेलाउ
उत्तर हिमालय आ दक्षिणमे गंगा छइ
कोशी आ गंडकमे हेलु नहाउ !
उत्तर आ दक्षिणके भेद बिसराउ
मिथिलाके सन्तति छी मैथिल कहाउ
कन्हासँ कान्ह जोडि जाति–पाति अडि तोडि
मिथिलाके माटि उठा माथसँ लगाउ ।।”
ताही अंकमे एकटा कविता मीताक नाम छपल छन्हि । देखू–
“मानै छी मीत
सत्य सरिपहुँ आरोप तोहर
बीति गेल हमर समय
लिखि नहि सकैछी आब
व्यर्थ करैछी प्रलाप
संकुचित विचार बोध गहने चलि जाइत अछि
किन्तु
हम बाध्य छी
जरबय त चाहैछी आशक आलोक नव
निराशाक बिडरो
मिझओने चलि जाइत अछि
लिखबाले बैसैछी
कथा आजादीके
व्यथा बेरबादीके
लिखाएल चलि जाइत अछि... ।”
आजादीक सुखानुभूतिक पृष्टभूमिमे उगि आएल अव्यवस्था, अराजकताक प्रकोपेव्यथित कबि अपन लेखनीके अनायास अपन चिंतनक संवाहक बनएबा पर विवश भऽ जाइत छथि । आ हमरा जनिते जनवादी कवि रामलोचन ठाकुरक इएह सत्य थिकै, इएह अभिष्ट भऽ गेलै ।
‘कहलोचन कविराय’ स्तम्भमे रामलोचन ठाकुरक छव पतिया निरन्तर छपल करैन । आ ताहुमे ओ मैथिल, मिथिला आ मैथिली पर विचार, उद्वोधन रखबासँ पाछा नहि रहथि । आइयो हुनक एहि विचारमे कोनो परिवर्तन भेल छन्हि से बात नहि । तखन समय आ अवस्था ज्ञाने गति तेज आ मद्धिम होएब दोसर बात ।
तेहने एक ठाम ओ लिखैत छथि–
“बारिक पटुआ तीत आ, हो बाजारक मीठ
कुहरि रहल छै मैथिली, डनिया टेरय गीत
डेनिया रेरय गीत, नचैए पश्चिम गामक
चमक–दमकसँ मोहि, पुत सभ मिथिलाधामक
क्ह लोचन कविराय, कलंकक लेपल कारिख
मैथिल युवजन मानि, मैथिली पटुआ बारिक ।।”
(देसिल बयना, वर्ष २, अंक ५ फरबरी, १९८२)
बस्तवमे देसिल बयना पत्रिकाक लेखनक छांट देखलापर ई स्पष्ट भऽ जाइछ जे ओहिमहक बहुतो आलेख÷टिप्पणी विभिन्न नामसँ ठाकुरजी स्वयं लिखैत छलाह । वाणीमे ओज, जखन नुकायल नामोक आवरणमे पत्रिकाके पन्ना पर उतरैत छै तं बेछप बेसी काल नहि रहि पबैत अछि । ओएह प्रखरता, सुपत–कुपत कहबाक हिम्मत आ लोक व्यवहारसँ लोहछल मनःस्थिति ।
से ओ प्रकारान्तरसँ स्वयं स्वीकार कयनहुँ छथि, तखन जखन देसिल बयना पंयिजकरणक कारणे देसकोस नामसँ बहरायल त तकर पहिल अंकमे सम्पादकीय लिखैत ठाकुरजी व्यथा व्यक्त करैत देसिलबयनाके साहित्य विशेषांक (अक्टुबर १९८२) क बाद बन्न हयबाक मूल कारण लेखकीय असहयोग कहने छथि ।
‘देसिल बयना’ एक वर्ष चलल । एहि एक वर्षक प्रत्येक अंकमे रामलोचन ठाकुरक उपस्थिति विभिन्न रुपमे देखबामे अबैत अछि । कतेको स्तम्भ सभ देखि पडैछ– सभक भाषा–बोलीमे ठाकुरजीक कलमक चमत्कार देखि पडैछ । मैथिली भाषाक उत्थानक हेतु गठित भेल मैथिली मुक्ति मोर्चाक क्रान्तिकारी उद्बोधन एहि पत्रिकाक स्वर सन्धान रहलैक आ तकर संरक्षक प्रेरक रहलाह रामलोचन ठाकुरजी । हमहँु एहि पत्रिकासँ जूडल रहलहुँ । मुदा कथा, कविता धरि मात्र नहि रहि पौलहुँ । देसिल वयनाक वर्ष १, अकंक २ नवम्वर १९८२ ई. क अंकमे तेसर पृष्टपर हमर एकटा लेख छपल–‘मैथिली आन्दोलन–मैथिलक आन्दोलन बनब पडत ’ । आइ जखन उनचालिस वर्ष पूर्वक अपन एहि लेखके पढैत छी त लगैए इहो ठाकुरेजीक रँगमे रंगल लेख छल, जे तहिया माने चारि दशक पूर्व आनायास लिखबापर बाध्य भेल रही । आ ताहि लेखक जे भाव अछि ओ आइयो मैथिली भाषा, साहित्यक्षेत्रमे ओहिना देखल जाइछ, कोनो परिवर्तन नहि, बरु संकुचन बेसी । आजुक भाषा आन्दोलनक ओ पृष्टभूमि जकाँ लगैत अछि । भाषा आन्दोलनक चर्च जखन देसिल वयनाक पृष्ट पर देखैत छी त एखनो ओकर औचित्य बूझि पडैत अछि – आव ई स्पष्ट भऽ गेल अछि जे मैथिलक दूटा वर्ग अछि–समर्पित सेवीक आ सौदागरक । दुनूक अलग अलग उदेश्य छैक । मैथिलीके अपने बपौती बुझबला सौदागर वर्ग सदिखन मधुर झडबाक ताकमे बकध्यान लगौने रहैत अछि त दोसर दिस समर्पित लोक दिन राति रचनात्मक काजमे व्यस्त । ... सौदागर वर्ग समस्त सुख–सुविधा हथिया अपना स्वार्थ सिद्ध कऽ रहल अछि ।”
(बैद्यनाथ विमल, दैखिल वयना, वर्ष १, अंक ३, दिसम्वर १९८१)
‘देसिल बयना’क पृष्टपर अपन वास्तविक नामसँ उभरैत रामलोचन ठाकुर कखनो काल अत्यन्त कठोर भऽ उठैत छथि । अपन गामसँ, अपन सपनाक वृन्दाबनसँ जखन अर्थ आर्जन व्यथे शहर पकडबापर बाध्य होइत छथि त सामाचकेवा खेलाइत बहिनक भाइक अनुपस्थिति बोधसँ होइत पीडाक अनुभूतिके महशूस करितो ग्राम्य राजनीति प्रति अपना मोनमे बैसल अवसादके एना कऽ व्यक्त करैत छथि–
“बहिन दाई !
हम जानैत छी जे अहाँ एहु बेर
बनओने हएब शामा–चकेवा
तकने हएब हमर बाट
लगलापर आगि विरदाबनमे
आ नहि पाबि हमरा
भेल हएब उदास
बहल हएत आँखिसँ दहो–बहो नोर ।
किन्तु बहिन दाई !
अहाँ मानी कि नहि मानी
थिक धरि ई सत्य
जे कुनो दावानलके नहि मिझाओल जा सकैछ
सोबर्ना लोटासँ
आ, जेना अहाँ लिखने छी–
ठीके हम बड बदलि गेलौहें
हम बुझैछी÷जे विरदाबन÷ओ बिरदावन नहि रहि गेल–ए
आइ, एकटा नहि
हजारक हजाार चुगिला जनमि गेलए । आ
इएह बिरदाबन थिक ओकरा सभक आवास... ।”
एकर पुरान गाछ सभक धोधरिमे एकसँ एक अबोध विषधर करैए निवास
आइ
अइठामक बसातो अइ विषयुक्त
सांसो लेबाक अनुपयुक्त
तै
हमरा विचारे । एकरा जरिए गेनाइ थिक नीक
मिझेबाक प्रयास सर्वथा अनुचित...।”
(देसिलवयना वर्ष १ अकं २, नवम्वर १९८१)
‘देसिल वयना’सँ देसकोस धरिक यात्रापर फूटसँ कहियो लिखब । एखन एहि पत्रिकामे रामलोचन ठाकुरक व्यक्तित्वके खोजबाक प्रयास कएल अछि । एहिमे सावधानी इएह जे अनेको कठोर आ प्रतिरोधी विचारक प्रस्तुति सभ आएल अछि, जाहिमे हिनक नाम नहि छन्हि, तएँ हम उल्लेख नहि कएल अछि । ओहुना ओ व्यवस्था प्रति कठोर, अंवाछनीय गतिविधि प्रति अनुदार रह बला लोक छथि, आ ई कोनो दुर्गुण नहि, विरले भेटबला गुण होइछ । जे हिनकामे छन्हि ।
से एहि तरहे अपन सत्य तथ्यसँ लोकके तरंगित कैनिहार कवि व्यक्तित्व कखन सरस बनि प्रकृतिके सौन्दर्यमे अपनाके समर्पित कऽ दैत छथि देखी एकटा बानगी, हिनक चारिगोट मिनी कवितामे –

१. सूर्योदय
– माइक आंचर तरसं
बहार क क मुह अपन
बिहुसि देलक
शिशु अबोध !
२ राति
–दुरगमनिया कनियां बनि
बन्न साँझ महफामे
बेटी प्रत्येक दिन
चलि जाइछ
देने विछोह, व्यथा
पसारि मन पिरथी पर
कारी धन अन्धकार !
३ चन्द्रमा
–परदेशी पाहुन केर
जोहैत होथि बाट जेना
खिडकी लग ठाढि
कुनू राधिका !
४ बखान्त
इहो वर्ष
ओहिना बीति गेल
बुढ अथबल सूर्य
बस गैरेजक
पछुआरमे डुबि गेल !
(देसिल वयना, वर्ष २, अकं ४ जनवरी १९८२)
एहि तरहे देसिल वयना आ देसकोस पत्रिकाक माध्यमसँ अपन युवा आ उर्जावान व्यक्तित्वक छाप विभिन्न रचनामे छोडने छथि–रामलोचन ठाकुर । दोसर तरहें कही त एहि दुनू पत्रिकाक पृष्टपर राम लोचन ठाकुरक प्रतिबिम्ब झलकैत अछि ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-संपर्क-8789616115
अपूर्वा
मैथिलीक पद्य साहित्यमे प्रकाशित पोथी सबहक सूचीमे एकटा पवित्र नाम अछि ‘अपूर्वा’ जे चर्चित साहित्यकार-सम्पादक श्री राम लोचन ठाकुर जीक 1970सँ 1995 धरिक रचनाक एक संकलन अछि | ‘अपूर्वा’क प्रकाशन ‘मिथिला समाद’,कलकत्ता द्वारा 23 नवम्बर 1996 क’ भेल अछि | ‘अपूर्वा’ एकटा वहुमुखी प्रतिभाक कवि-गीतकार-चिन्तककेँ पुनः लोकक सोझां अनलक | अइसँ पहिने हिनक सात टा पोथी आबि चुकल छलनि | उनासी पृष्ठक एहि पोथीमे उन्हत्तरि पृष्ठमे पद्य-रचना अछि जकरा निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछि :
(1)दोहा
(2)छओ पाँतिक छन्दमय कविता
(3)आठ पाँतिक छन्दमय कविता
(4)गीत
रचनाक विषयकें निम्निखित वर्गमे राखल जा सकैत अछि :
(1) मिथिला,मैथिली,मैथिल, मैथिलीक साहित्यकार, मैथिलीक समस्या |
(2) देश, देशक समस्या,देशक व्यवस्था,देशक जनप्रतिनिधि |
दोहाकसँख्या 110 अछि | 25 टा दोहामे गामसँ दिल्ली धरिक बात, राजनीति आ सामाजिक सरोकारक बात अछि | किछु दोहा / किछु पाँति देखल जाए :
‘चालनि दूसय सूपके जकरा भूर हजार
पोथी के नहि मान अछि थोथी चलय बजार’
‘कान छैक पर सोन नहि सोन छैक नहि कान
वाणिक पूत झखैत छथि उल्लू लक्ष्मीवान’
‘भाइ-भाइमे शत्रुता पुजा रहल आइ सार’
‘विद्यापति केर पर्वमे विद्यापति टा बाद
सभ अपैत पति मंचपर व्यर्थक वाद विवाद’
‘राजनीतिसँ नीतिकें कहियो भेल न मेल
विजयश्री तें पार्थ लए कर्ण पराजित भेल’
कोनो साहित्यकारकें एकटा दोहामे व्यक्त करब कठिन काज अछि, तथापि ओहि समय तक चर्चित 85 टा साहित्यकारकें एक-एक दोहामे व्यक्त करबाक प्रयास कएल गेल अछि जाहिमे कतहु-कतहु हास्य-विनोद आ कतहु व्यंग्य सेहो अछि | साहित्यकार लोकनिक एहि सूचीमे महामहोपाध्याय मुरलीधर मिश्र,भाषाविद ग्रियर्सन, नगेन्द्रनाथ गुप्त, जीवन झासँ ल’ क’ प्रदीप, वियोगी, रमेश, चन्द्रेश, विभूति आनंद,अरविन्द ठाकुर,नारायणजी, केदार कानन, सुस्मिता पाठक धरि छथि | दोहामे साहित्यकारक कोनो पोथी अथवा हुनका सम्बन्धमे कोनो घटनाक संकेत मात्र अछि | बानगीक रूपमे किछु दोहा प्रस्तुत अछि :
‘नाचू हे पृथ्वी अहाँ जीवकान्त केर वस्तु
धार मुक्त नहि होइत अछि नहि कतहु नहि अस्तु |’
एहि दोहामे ‘नाचू हे पृथ्वी’ आ ‘धार नहि होइछ मुक्त’ जीवकान्तजीक कविता संग्रह, ‘वस्तु’ कथा संग्रह आ ‘नहि कतहु नहि’ उपन्यासक नाम अछि |
‘हमरा लग रहबै अहाँ पुछने फिरथि प्रभास
कथा प्रभासक की कही भेला हतो-प्रत्याश |’
प्रभास कुमार चौधरी पर एहि दोहामे हुनक चर्चित उपन्यास ‘हमरा लग रहब’क चर्च अछि |
‘राजमोहनक मोहमे आरंभक अछि अन्त
गलतीनामा जपै छथि कथा जगत के सन्त |’
एहि दोहामे ‘आरम्भ’ राजमोहनजी द्वारासँपादित पत्रिकाक नाम अछि आ हुनक आलोचनात्मक निबन्धक एक पोथीक नाम अछि ‘गल्तीनामा’ |
‘छोडल जे आनन्दकेँ जोड़ल भारद्वाज
तोड़-जोड़मे अनवरत मोहन भारद्वाज |’
मोहन भारद्वाजक मूल नाम छनि आनन्द मोहन झा, यैह एहि दोहामे कहल गेल अछि |
‘बुद्धिनाथ मिश्रक सकल रचना अर्थ प्रधान
हिन्दीमे तें गबै छथि सोहर आ समदाउन |’
सभकें बुझल अछि जे मिश्रजी हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे गीत रचना करैत छथि |
साहित्यकार रमेश आ महेन्द्र मलंगियाक लेल लिखल दोहा देखू :
‘सँच मंच भ’ मंच तजि लेखन करथि रमेश
गीत-गजल-कविता-कथा नित नूतन सन्देश’
‘नसबन्दी के डरसँ तेजि मलंगिया गाम
बारहमासा गबै छथि बैसल धनुषा धाम’
‘ओकरा आंगनक बारहमासा’ नाटककार महेन्द्र मलंगिया जीक चर्चित कृति अछि |
कतहु-कतहु बहुत कंजूसी कएल गेल अछि, एकर उदाहरण अछि ई दोहा :
‘लिली रे उषा किरण शान्ति सुमन नहि थोड़
नीता पुनि शेफालिका पसरल नवल इजोर |’
एतय चारिटा साहित्यकारकें एक दोहामे व्यक्त कएल गेल अछि | निम्नलिखित साहित्यकारकें छओ-छओ पाँतिक छन्दमे व्यक्त कएल गेल अछि :ज्योतिरीश्वर, महाकवि डाक,विद्यापति,चन्दा झा, लाल दास, कवि शेखर, सीताराम झा,भोला लाल दास,सुमन जी,मधुप जी, किरण जी, यात्री जी,मणिपद्म जी, हरि मोहन बाबू, आरसी प्रसाद सिंह,राघवाचार्य,ललित,किसुन आ राजकमल |
दोहाक तुलनामे छओ पाँतिक कविता सभ द्वारा सम्बन्धित साहित्यकारकें बेशी नीक जकाँ प्रस्तुत कएल जा सकल अछि | बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि हरिमोहन बाबू पर ई कविता :
‘हरिमोहन हरि लेल मन हास्य-व्यंग केसँग
कन्यादान द्विरागमन खट्टर कका तरंग
खट्टर कका तरंग रंगशालाक रंग मे
पढुआ अपढ़ जुआन बूढ़ सभ सम दर्पण मे
कह लोचन कविराय युग पुरुष युग मनमोहन
हास्य-व्यंग्य सम्राट अमर स्रष्टा हरिमोहन’
विशिष्ट छन्दमे लीखल एहि तरहक रचना सबहक पांचम पाँतिमे ‘कह लोचन कविराय’ नीक लगैत अछि | कवि मिथिलाकसँस्कृतिक अनमोल धनक स्मरण करैत वर्तमान स्थितिपर दुख प्रकट करैत कहैत छथि :
‘जइसँ छल विख्यात किछु नै मिथिलामे
वसुधा एव कुटुम्ब घोषणा भेल जतय
भाइ-भाइ दिन-राति लड़ैए मिथिलामे
सुग्गो शास्त्रक गप्प करै छल के मानत
लाठी-बम-बन्दूक चलैए मिथिलामे
कुल देवी बनि पुजा रहल अछि सुपनेखा
मैथिलीक कौचर्य होइत अछि मिथिलामे’
मिथिलाक महिमाक वर्णन करैत एकठाम कवि कहैत छथि :
‘एकर सिया धिया के बल पर
राम काल भगवान |’
दोसर ठाम देश-दशामे मिथिलाक वर्तमान स्थिति पर दुखी होइत कहैत छथि :
‘नढ़िया–कुकुर तीन कोटि छइ
सिंहक नाम बिला गेलै
ठोहि पारि कै कनइ मैथिली
की छलै आ की भेलै’
मिथिला-मैथिलीक लेल कर्तव्यक बोध करबैत कहैत छथि :
‘हम नव मिथिला निर्माण करब’
एहि लेल वैचारिक क्रान्तिक बात करैत कहैत छथि :
‘क्रान्तिक आह्वान थिक
शान्तिक सम्मान हेतु’
ई संकलन ओहि समयक थिक जखन मैथिलीकें संविधानमे स्थान नहि भेटल छलै आ मिथिला-क्षेत्रमे एहि बात लेल अपन नेता-स्थानीय नेता सभपर आंगुर उठाओल जाइत छल | लोकक खीझकें स्वर देल गेल अछि ‘किछु लोक’ शीर्षक रचनामे :
‘किछु लोक मैथिलीकें धन्धा बना लेने अछि
चन्दा उगाहि पालि रहल पेट किछु लोक
बजारमे निलाम करै माइक जे लाज
तकरे विभूति मानि रहल पूजि रहल लोक
वर्खोसँ ठकि रहल जे सांसद, हमर विधायक
तकरेपर फूल माला बरिसा रहल-ए लोक’
कविकें ओहेन पढ़ल-लिखल मैथिल लोक सबसँ दुःख होइत छनि जे मैथिलीक शब्द सभकें बिसरल जा रहल छथि | देखल जा रहल अछि जे ‘जलखै’ शब्दक स्थानपर लोक ‘नाश्ता’ शब्दक उपयोग क’ रहल छथि | अहिना और शब्द सभ अछि जकर उपयोग कम भ’ रहल अछि | एहिपर ‘छुबुध लगैए’ रचनामे कहल गेल अछि :
‘पढुआ लिखुआक एहेन अवस्था की पुछै छी
सोचि भविष्य मैथिलक सरिपहुं छुबुध लगैए’
ई काव्य-संकलन देशमे ओहि समयक जे सामाजिक, आर्थिक,राजनीतिक स्थिति रहै, तकर गवाह अछि | देशमे गरीबी, महगी,बेरोजगारी छल,मंडल आयोगक क्रियान्वयनसँ समाजमे उथल -पुथल छल |‘चित्र-विचित्र’ शीर्षकसँ एहि सभ विषयपर छओ-छओ पाँतिक चौदहटा रचना अछि |
महगीपर एहि छन्दमे लिखल एकटा रचना देखू :
‘जनताले’ ई देल अछि नव बर्खक उपहार
कोयला चाउर गहूमके दाम बढ़ा सरकार
दाम बढ़ा सरकार बन्द केलक कत गाड़ी
विदा नीति के तहत बन्द उद्यम सरकारी
कह लोचन कविराय देश के भाग्य विधाता
की की खेल देखौत जीत जौं देखत जनता’
अही छन्दमे देशमे लोकतन्त्रक स्थितिपर कहल गेल एक कविताक दू पांती देखू :
‘कह लोचन कविराय राज ई लाठी तन्त्रक
लल्लू पप्पू चला रहल गाड़ी गणतंत्रक’
स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद जतेक प्रगतिकेर आशा लोक करैत छल,से नहि भ’ सकल छल|
‘चरैवेति’ शीर्षक रचना कहैत अछि :
‘फूसि सभ प्रगति कथा, फुसियाही ई विकास
अन्न-वस्त्र जुटा पाएब, एखनो त बांकी अछि’
सामान्य जनक कष्टक लेल देशक नेतासभकें दोखी मानैत ‘नेता आ जनता’ शीर्षकसँ कहल गेल अछि :
‘नेता लोकनिक नजरि विदेशी नोटपर
जनताक आँखि नचैए रोटी-भात लए’
विकासक स्थितिपर ‘के हिसाब देत’ शीर्षक रचनामे कहल गेल अछि :
‘दसमहला-बिसमहला बनय रोज सत्य बात
खोपड़ि कतेक रोज खसय के हिसाब देत’
‘नेता कहैछ देश उन्नति के शिखर चढ़ल
अवनति ककर कतेक भेल के हिसाब देत’
लोक नेता चुनैए, आशा करैए जे हमर आवाजसँसदमे उठौताह,मुदा जौं नेतासँसदमे लोकक व्यथाकें व्यक्त नहि करताह, तं कविक शब्द बाजत,से कहल गेल अछि :
‘नांगरि दबा रहै छथि दुबकल जेसँसदमे
सएह चुनावक बेर गाममे गरजि रहल अछि’
‘उदार नीति’ शीर्षकसँ व्यवस्थापर जे कहल गेल अछि, से देखू :
‘अरथी अर्थक आजादीकेर कान्ह उठौने
कीर्तनियां दल राम नामक’ सत्य चलल अछि
थपरी झलिबज्जा ढोलबज्जा पोन पिटैए
चिकड़ि गबैए भांट सूर्य दिस देश बढ़ल अछि’
जाहि समयक गवाह अछि ई संकलन ओहि समयमे देशमे राजनीतिमे जे दू टा धारा जोर पकड़ने छल, तकरा एना व्यक्त कएल गेल अछि :
‘मण्डल आर कमण्डल केर एहि राजनीतिमे
जनता भेल तबाह आ नेता मौज करैए
भाइ-भाइ केर जानी दुश्मन घात लगौने
घृणा द्वेष ज्वालामे गामक गाम जरैए’
बिहारक जे स्थिति ओहि समय छल तकर साक्ष्य अछि रचना ‘फेर पाटलिपुत्र’ |
कविता कहैत अछि :
‘वसुधा एव कुटुम्ब सगर्व जतए घोषित छल
वर्गवाद के अगराहीमे आइ जरैत’छि
अत्याचारी शासकसँ मुक्तिक निमित्त तें
फेर पाटलिपुत्र कोनो चाणक्य तकैत’छि’
जाहि समयक ई संकलन अछि ,ओहिमे एहनो एकटा काल-खण्ड आएल छल, जे लोककें बौक बना देने छल आ तकर अभ्यास बहुत दिन लागल रह्लै | ’अद्भुत देश’ शीर्षकक अन्तर्गत ई पाँति देखू :
‘शब्द ब्रह्म थिक किन्तु अर्थपर अटकि जाइत अछि
आइ सत्यके सत्य कहब अपराध भेल अछि’
पोथीमे व्यवस्थापर आंगुर उठबैत पीड़ित वर्गक टीसकें ‘धनकटनीक गीत’ शीर्षक रचनामे व्यक्त कएल गेल अछि:
‘हम सभ कमाएब आ खाएत कियो आन
लगैए छगुन्ता ई छै केहेन विधान’
आ अधिकार लेलसँघर्षकसँकल्पक ध्वनि सेहो व्यक्त भेल अछि :
‘रोपने छी कटबै आ घर अपन भरबै
अन्नक अभावे ने आब हम मरबै’
‘चैत कबड्डी’,’हुक्का लोली,दीप जराउ’,’अटकन-मटकन’,’उठ रौ बौआ’, ’झिझिर कोना’,’करिया झुम्मरि’,’फेर कनुआइ छौ तोरे पर’,’आम छू अमरोरा छू’,’छै तकरे इतिहास’, ‘ताक धिना धिन’,’उट्ठी गोटी मोर पचास’,’मिथिलाक महिमा’,’मिथिलाक वसँत’,’देश महान छै’,’इतिहास युग नवीन के’,’हम मिथिलावासी’ आदि गीत मे मिथिलाक महानता, सम्पूर्ण देशक महानता,सँस्कृतिक विशेषता, आपसी स्नेह आ मेल-जोलक आवश्यकता,जन -जनक सुख आ समृद्धिक कामना आदि बातक उल्लेख बहुत सुन्दर आ सरल शब्द सबहक माध्यमसँ भेल अछि | ‘लेनिन’केँ बहुत सम्मानपूर्वक अभिनन्दन कएल गेल अछि | एहि संकलनमे कयटा रचना एहेन अछि जे गजल जकाँ लगैत अछि, किन्तु गजल बनि नहि सकल अछि |किछु रचनामे पहिलुक शेरमे गजलक गुण अछियो त बादक पाँति सभमे तकर अभाव अछि | बानगीक लेल देखल जाए ई रचना :
‘किछु गीत एहन होइ छइ गाओल ने जाइ छइ
किछु चीज एहन होइ छइ पाओल ने जाइ छइ
टहकैत रहै छैक कोंढ़मे करेजमे
किछु घाव एहन होइ छइ देखल ने जाइ छइ’
काव्य-दृष्टिक विविधताक कारणे एहि संग्रहकें कोनो एक ‘वाद’मे नहि राखल जा सकैछ | ई संकलन मैथिली साहित्यमे उपलब्ध पद्य संकलन सबहक मध्य एकटा विशिष्ट स्थान पर रहबाक पर्याप्त योग्यता रखैत अछि |
हिनक रचना संसारमे गीत अछि, कविता अछि, कथा अछि, हास्य-व्यंग्य अछि, अनुवाद अछि, संकलन-संपादन अछि । चिन्तन लेल मिथिला अछि, मैथिली-आन्दोलन अछि, देश अछि, देशक राजनीतिमे नैतिक आन्दोलन अछि । 'माटि-पानिक गीत'क बाद हिनक एहि संग्रहमे हिनक गीत रचना सभ अछि। गीत सभमे हिनक चिन्तन, सुन्दर सरल, लोकप्रिय शब्द सभ,स्वच्छ आ स्वस्थ दृष्टि देखि कहल जा सकैछ जे 'लोचन'जी जौं गीते टा लिखितथि तँ मैथिली भाषाक गीत कारक प्रथम पांतिमे हिनक स्थान सुरक्षित रहितनि ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
संतोषी कुमार-संपर्क-7562878005
भाषा-संस्कृतिक आस्था आ नव-निर्माणक संकल्प
‘‘ईर्षा-द्वेष हटाबै छी
घृणा विभेद मेटाबै छी
बुद्धि विवेकक दीप लेसि हम
प्रेमक ज्योति पसारै छी
करिया झुम्मरि खेलै छी।’’
मिथिला संस्कृति मे आस्था आ नव-निर्माणक संकल्पक समन्वय करैत कवि रामलोचन ठाकुरक पाँती मैथिल जन-मन लेल प्रेरणादायक अछि। मैथिली साहित्य जगतक कवि-निबंधकार (रामलोचन ठाकुर), कथाकार (अग्रदूत) आ व्यंग्यकार (कुमारेश काश्यप) मैथिल सामान्य लोक लेल ‘‘माटि पानिक गीत’’ आ गेय-काव्य ‘‘अपूर्वा’’ सन कविता-संग्रह लिखैत छथि। दोसर दिस ‘अग्निलेखन’ धर्मी बनि ‘‘इतिहासहंता’’, ‘‘देशक नाम छलै सोन चिड़ैया’’ आ ‘‘लाख प्रश्न अनुत्तरित” कविता-संग्रहक रचना करैत छथि, जाहि मे यथास्थितिक प्रति असहिष्णु, आक्रोशक तीक्ष्ण भावक अभिव्यक्ति, मार्क्सवादी चिंतन सँ सम्पृक्त, संघर्ष चेतनाक निर्माता आ स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान, तैँ विध्वंस केँ निर्माणक आवश्यकता मानैत छथि। हुनक मंतव्य अछि जे मैथिली आन्दोलन आ अफ्रीका वा फिलिस्तीनक मुक्ति आन्दोलन मे कोनो पार्थक्य नहि छैक। सभ ठामक जनता अपन भाषा-संस्कृति आ जातीय मुक्ति लेल एकरंग आकुल-व्याकुल आ संघर्षरत अछि। आ तैँ अफ्रीका हो वा फिलिस्तीन, पाकिस्तान वा मिथिला सभक कविताक कथ्य आ स्वर एक्के छैक। एहि पृष्ठभूमि मे अन्यान्य देशक/भाषाक कविक कविताक मैथिली अनुवाद ओ ‘‘प्रतिध्वनि’’ मे कएने छथि। सर्वहारा ओ शोषितक पक्ष मे अपन लेखनी केँ प्रतिबद्ध रखैत छथि। सर्वहारा ओ शोषितक लेल तऽ विश्व-बंधुत्वक अवधारणा रखैत छथि, मुदा व्यवसायीक वैश्वीकरण अनुबंधक प्रतिरोध स्वरूप अपन कविता-संग्रह ‘‘लाख प्रश्न अनुत्तरितकेँ समर्पित करैत छथि।
ठाकुरजी मिथिला-मैथिली प्रेम लेल प्रतिबद्ध छथि, जे हुनक कविता मे स्मृति, परिचय, वर्णन वा कटाक्ष रूप मे प्रतिचित्रित भेल अछि। नव-निर्माण लेल ध्वंस केँ आवश्यक माननिहार कवि, मिथिला मे पसरि गेल असंख्य कुत्सित प्रवृतिक लोक सँ अपवित्र भेल बिरदाबनक जड़नाइ उचित बुझैत छथि। एकरा सम्हारब व्यर्थ मानैत छथि। संगहि अपन श्रम सँ नव बिरदाबन (नव मिथिलाक) कल्पना करैत छथि, जाहि मे सभक आश पूर करबाक क्षमता हो –
‘‘हजारक हजार चुगिला जनमि गेल-ए आ
इएह बिरदाबन थिक ओकरा सभक स्थायी आवास
एकर पुरान गाछ सभक धोधरि मे
एक सँ एक विषधर करैयै निवास
...... एकरा जरिए गेनाइ थिक नीक
मिझेबाक प्रयास सर्वथा अनुचित
शक्तिक अपव्यय
जे करबाक थिक संचय
आगामी कालिक निमित्त
जखन कि हमरा लोकनि लगाएब
निश्चिते लगाएब/एगो नव बिरदाबन
पटाएब/कुनू डबरीक पानि सँ नइं
अपन घाम सँ/ आ फुलाएब
रंग-बिरंगक फूल/अपन आशाक अनुकूल
अपन कल्पना कें देब वास्तव रूप।’’
अपन आशा-आकांक्षाक प्रतिपुर्ति करबा योग्य मिथिलाक कल्पना मे ओ युवकक भूमिका महती मानैत छथि। मैथिली युवा लेखनक संकलन सँ प्रकाशित पत्रिका ‘‘अग्निपत्र’’क सम्पादन कएने छलाह। मैथिली भाषा केँ संविधानक अष्टम अनुसूची मे संलग्न करबाक आन्दोलनक समय लिखल गेल हुनक पाँती कोना बिसरा सकैत अछि -
‘‘संविधान बिनु मैथिलीक आ
मानचित्र बिनु मिथिला धाम
डाहि-जारि सुड्डाह करब
हम मिथिलाक जुआन।’’
हम श्री ठाकुरजी केँ ‘‘मिथिला दर्शन’’ पत्रिकाक सम्पादक रूप मे सम्पादकीय आलेख पढ़ैत चिन्हबाक-जनबाक प्रयास कएने छी। ‘मिथिला दर्शन’क जिज्ञासु पाठकक रूप मे हुनक आलेख गंभीर चिंतनक हेतु अग्रसर करैत रहल। कोलकाता प्रवासक समय हुनका सँ पहिल व्यक्तिगत भेंट ‘‘सम्पर्क’’ मे भेल छल। ओतहि ओ अपन ‘भिजिटिंग-कार्ड’ देने छलाह जाहि पर हुनक परिचय मे कवि (poet) अंकित छल। पश्चात् हुनक कविता सभ पढ़बाक सुयोग भेल। सत्ते ओ नैसर्गिक कवि छथि जिनक शब्द आ काव्य अपना मे सर्वहाराक दुःख प्रतिचित्रित करैत व्यवस्था सँ संघर्ष करैत अछि। काव्य ‘‘सर्वहारा टी स्टॉल’’क नाम सँ लिखाइत अछि। हुनका लेल साहित्यक सौंदर्य-बोध, असहाय-नचारक स्थितिक वर्णन-विश्लेषण मे अछि।
अपन नाट्य साहित्यक अध्ययन-अनुशीलनक क्रम मे कोलकाता मे मैथिली नाटक आ रंगमंच लेल कएल गेल कार्यक पर्यालोचन करैत छी, तऽ ओहि मे श्री ठाकुरजीक नाम श्रेष्ठ स्थान मे देखाइत अछि। कलकत्ता(आधुनिक कोलकाता) आरंभहि सँ मिथिला-मैथिली आन्दोलन लेल अग्रसर रहल अछि। आन्दोलनाकार लोकनि सामान्य मैथिल जन केँ एकत्रित आ संगठित कऽ प्रारूप पर कार्य करैत छलाह। लोकक आमंत्रण आ संगठन लेल साहित्यक सशक्त विधा नाटक रहल अछि। नाट्य-मंच केँ लोकरंजनक प्रमुख आ सहज-सुबोध साधन बूझि मैथिली आन्दोलन आहूत कएनिहार सभ मैथिली नाटकक प्रणयन कलकत्तामे प्रारंभ कएलनि, जाहि मे किछु प्रहसन आ अल्पावधिक नाटक मंचित भेल। पछाति हुनका सभक चिंतन-चेतना मे आभासित भेल, जे मैथिली आन्दोलन भाषा आन्दोलन थिक आ एकर सफलताक आधार प्राचीन साहित्यक भंडारे टा नहि, ओकर अविरल-अविच्छि परंपरा ओ समृद्ध समकालीन साहित्यक आगारो प्रयोजनीय अछि आ ई समृद्धि नाट्य विधाक लेल सेहो वांछित अछि। एही क्रम मे कलकत्तामे विभिन्न नाट्य संस्था सभक स्थापना भेल। एहि संस्था सभक प्रथमिकता छल मंचोपयोगी नाटक लिखाएब आ ओकर प्रदर्शन लेल मैथिलीभाषी कलाकारक जुटान करब। ठाकुरजी एहि दुनू कार्यक भार संवहन मे पछुएलाह नहि। अपन लेखकीय धर्मक निर्वहन करैत बहुभाषी प्रतिभाक धनीक ठाकुरजी बांगला सँ मैथिली मे नाटकक अनुवाद कएलनि। हुनक अनूदित नाटक मे बांगला रंगमंचक प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक शैलेश गुह नियोगीक ‘‘फाँस’’ आ ‘‘रिहर्सल’’ आओर श्यामल तनु दासगुप्ताक ‘‘जादूगर’’ (बांगला - जादूकर) अछि, जे नाटक सभ प्रदर्शित-प्रकाशित भेल अछि। किरण मैत्रक ‘‘चारि-पहर’’ आ मनोज मित्रक ‘‘किशुनजी-विशुनजी’’ (बांगला - ‘केनाराम-बेचाराम’) हिनक अनूदित नाटक अछि, जे प्रदर्शित भेल अछि, मुदा अप्रकाशित रहल अछि। पुस्तकाकार रूप मे प्रकाशित हो वा अप्रकाशित, हिनक अनूदित नाटक सभ मैथिली साहित्यक आगार मे निधि रूप मे संचित भेल अछि।
कलकत्तामे मैथिली नाट्य मंचक आरंभिक काल मे कलाकारक आवश्यकता आ हिनक नाट्य अभिरुचि, एहि सुयोग सँ कतेको नाटकक प्रथम रात्रिक मंचन मे पात्रक अभिनय करैत रहलाह। उदय नारायण सिंह ‘‘नचिकेता’’ जीक नाटकक पात्र ‘शुभंकर’ (एक छल राजा), ‘अनिरुद्ध’ (नाटकक लेल) आ ‘नवल’ (नायकक नाम जीवन)क भूमिका मे ठाकुरजीक अभिनय अविस्मरणीय रहल अछि। बिना प्रशिक्षण प्रप्त रंगकर्मी रहितहुँ, हिनका द्वारा कएल गेल अभिनय आ निर्देशन लेल मैथिली रंगमंचक प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक कुणाल हिनका मैथिली रंगमंचक उत्तम अभिनेता-निर्देशक मानैत छथि। हिनका निर्देशन मे मैथिली नाटक प्रदर्शित होएबाक सूचना तऽ अछि, मुदा तकर मान्य आ लिखित साक्ष्य नहि रहबाक कारणे ओकर चर्च नहि कऽ रहल छी।
नाटक केँ दृश्य-काव्य मानल गेल अछि, मुदा नाटक केँ विषय-वस्तु बना काव्य लिखब फराक अछि। ओ नाटक केँ काव्यक विषय बना ‘‘नाटक, निर्देशक आ एकटा कविता’’ शीर्षक सँ कविता लिखलनि, जाहि मे नाटकक नाम पर प्रस्तुत भऽ रहल उत्क्षृंखलता आ अश्लीलताक प्रतिवाद करैत छथि। नाटकक सफलताक आधार दर्शकक उपस्थिति वा ओकर थोपड़ीये टा नहि, अपितु कथ्य-कथानकक गांभीर्यक प्रमुखता मानैत छथि। मैथिली नाट्य मंच केँ समर्पित पत्रिका ‘‘रंगमंच’’ जे कलकत्तासँ प्रकाशित भेल छल, ओकर सम्पादक सेहो श्री रामलोचन ठाकुर छलाह। कतिपय कारण सँ एहि पत्रिकाक एक्कहि टा अंक प्रकाशित भेल। नाट्य संबंधी हिनक आलेख कलकत्ताक मैथिली नाट्यकार’’, ‘‘कलकत्तामैथिली रंगमंच आ श्रीकांत मंडल’’, ‘‘कलकत्तामैथिली रंगमंचक महिला कलाकार’’, ‘‘नाट्य-मंचक विकास मे पत्रिकाक योगदान’’, ‘‘मिथिला नाटक आ मुंशी रघुनन्दन दास’’, ‘‘समकालीन मैथिली रंगमंचक विकास मे कलकत्ताक योगदान’’ आदि पठनीय अछि, जे विभि पत्रिका मे प्रकाशित भेल छल। एहि समस्त आलेखक संकलित रूप मे प्रकाशन संस्मरण ‘‘आँखि मुनने, आँखि खोलने’’ आ ‘‘स्मृतिक धोखरल रंग’’ मे प्रकाशित अछि।
मैथिली आन्दोलनक ‘अग्निलेखन’ धर्मी कवि रामलोचन ठाकुरजी अपन लेखन आ रचनाक माध्यम सँ युवा वर्ग केँ सम्बोधित करैत रहलाह, मुदा आधुनिक युवाक इच्छा-आकांक्षा आ विमुख होइत मिथिला-मैथिली सँ विचार केँ देखि, आहत होइत लिखैत छथि –
‘‘दूरक ढ़ोल सोहावन, कहबी छैक पुरान
किन्तु मात्र कहबीए नहि, सुनियो रहलहुँ कान
सुनियो रहलहुँ कान, आँखि सँ देखि रहल छी
मैथिलीक दुर्दशा हाल मिथिलाक कहब की
कह लोचन कविराय, विवेक एहन नवतूरक
निश्चित पतनक मूल, प्रगति बात त दूरक।।’’
कियो कवि रूप मे जानए वा कथाकार ‘अग्रदूत’ रूप मे। कियो ‘‘बेताल-कथा’’ पढ़ि ‘कुमारेश काश्यप’ केँ जानए वा ‘‘पद्मा नदीक माझी’’ पढ़ि अनुवादक केँ। कियो सम्पादक बूझए वा रंगमंचक कलाकार। रामलोचनजी सभ ठाम सशक्त हस्ताक्षर बनि उपस्थित छथि। हुनक अस्वस्थताक सूचना अछि। हुनक शीघ्र स्वस्थ्यक कामना करैत छी। मैथिली आन्दोलनी रूप मे ओ संदेश दैत छथि, जे आत्मसात् करबा योग्य अछि –
‘‘निज भू-भाषा हित मरय
मरय ने, अमर बनैत अछि
तकरे गाथा विश्व ई
गाओत, सदा गबैत अछि।’’
संदर्भ-संकेत
1 करिया झुम्मरि, अपूर्वा, पृ॰41
2 आजुक कविता (भूमिका), प्रतिध्वनि, पृ॰10
3 बहिन दाइक नाम एगो चिट्ठी, लाख प्रश्न अन ुारित, पृ॰9
4 प्रतिध्वनि
5 समकालीन कथाक सौंदर्य बोध, आँखि मुनने, आँखि खोलने
6 इतिहासहंता
7 नाटक, निर्देशक आ एकटा कविता, इतिहासहंता, पृ॰13
8 देसिल बयना
9 आखर आलेख, स्मृतिक धोखरल रंग
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एक सुच्चा कविः रामलोचन ठाकुर
रामलोचन ठाकुर संघर्षशील कवि छथि। ओ बहुत श्रम आ साधनासँ कविताक समीप पहुँचल छथि। हुनक जीवन ततेक कंटकाकीर्ण आ क्षत-विक्षत रहलनि जे ओ कविता नै लिखतथि तँ कलकत्ता सन महानगरमे अनेक समान्य मैथिल जकाँ, अन्हारमे बिलायल रहितथि। ओ कविताक मर्म बुझलनि आ ओहि मर्मकेँ अपन वैचारिकताक संग काव्यात्मक अभिव्यक्ति देलनि।
कवि लग मिथिलाक महान परंपराक पूरम्पूर अभिज्ञान छनि। ओहि महान परंपराक सूत्र ओ सदैव धयने रहैत छथि। ओ अपन कवितामे कतहुँ हुसैत नहि छथि। हुनका अखनुक क्रूरतम समयक सार्थक बोध सेहो छनि। एहि दूनूक मिश्रणसँ ओ बेस बेधक आ बेछप कविताक सृजन कऽ सकलाह अछि।
आइ कविताकेँ ततेक गंजन सहय पड़ रहल अछि तकर लेखा नहि। कविताकेँ खेलौर बुझनिहार कवि लोकनि लग रामलोचन ठाकुरक कविता अयनाक काज करैत अछि। हुनका सभकेँ निश्चित रूपसँ रामलोचन जीक कविता पढ़बाक चाही आ तकर मर्मकेँ स्पर्श करबाक चाही। रामलोचनजी प्रचार-प्रसारसँ दूर रहि अपन कवि-कर्ममे लागल रहलाह आ सैह कारण थिक जे ओ कविताकेँ एक उद्येश्य धरि लऽ जा सकलाह।
हुनक जीवन सुच्चा रहलनि। अत्यंत सावधानी आ इमानदारीसँ ओ अपन जीवनक निर्वाह कयलनि। ठीक तहिना ओ कवितोमे बहुत सावधान आ इमानदार छथि। ओ जखन जे अनुभव कयलनि, अपन संवेदनाक धरातलपर आबि तकर अभिव्यक्ति कयलनि। यैह कारण थिक जे हुनक कविताने टटका स्पन्दन छनि, सुवास छनि। हुनक कविता मैथिलीक विशिष्ट काव्य-परंपरामे एक सार्थक हस्तक्षेप थिक।
हुनक कविता एक दिस मिथिलाक गाम आ ओहिठामक जीवन अछि तँ दोसर दिस महानगरीय जीवनक यथार्थ आ सक्कत-पथराह भूमि सेहो अचि। ओ कवितामे अपन बात बिना कोनो छल-छद्मक, बिना कोनो लाग-लपेटक कहि सकलाह अछि। तें ओ कविताकेँ एक निश्चित उद्येश्य धरि लऽ जा सकलाह अछि।
हुनका लेल सभसँ महत्वपूर्ण रहलनि अछि। अंतिम विपन्न आदमी। जकरा लग अपन कहबाक किछु नहि छैक। जकरा भारतक स्वतंत्रताक बाद एखन धरि लुलुआयले गेल छैक, तें अस्वाभाविक नहि जे ओ मनुक्खक जय चाहैत छथि, जीवनक जय केर आकांक्षा रखैत छथि आ मुक्ति संघर्षसँ प्रेरित जीवनक दोहाइ दैत छथि।
मैथिलीमे रामलोचन ठाकुर एक विशिष्ट आ तथाकथित सड़ल-गन्हाएल परंपराक भंजक कवि छथि। हुनक कविता पढ़ैत काल कतहु-कतहु ई बोध होइत छैक जे हुनक कविता वक्तव्य भऽ जाइत अछि अथवा नारा सन लगैत अछि। मुदा ओहू कविता सभमे कविक सुच्चापन आ इमानदारी झलकैत अछि।
जे मिथिला सौंसे भुवनमे विख्यात रहल अछि से आब रक्तहीन, मांसहीन कंकालक भूमि बनल अछि। मुदा कविक विवशता छनि जे ओ मातृभूमि मिथिलाकेँ बिसरि नहि पबैत छथि।
ओ अपन कवितामे घनघोर निराशा आ उदासीकेँ फटकय नहि दैत छथि। ओ सदैव आशा-उल्लास आ जीवनक बात करैत छथि। जीवनमे सफलताक बात करैत छथि। ओ एक सुखद भविष्यक बात करैत छथि। अपन कविता "बहीनिदाइक नाम एगो चिट्ठी"मे कहैत छथि-
आगामी कालिक निमित्त
जखन कि हमरा लोकनि लगाएब
निश्चिते लगाएब / एगो नव बिरदाबन पटाएब /
कुनू डबरीक पानि सं नहि अपन घाम सं /
आ फुलाएब रंग-बिरंगक फूल/
अपन आशाक अनुकूल अपन कल्पना कें देब वास्तव रूप
हुनक अधिकांश जीवन मैथिली आंदोलन लेल समर्पित रहलनि। मातृभाषापर होइत कोनो प्रहारकेँ ओ बरदास्त नहि कयलनि आ मैथिलीक हित लेल जे हुनकासँ संभव भेलनि से ओ निरंतर करैत रहलाह। आवश्यक भेलापर ओ मैथिली लेल नारा सेहो लिखलनि जे बहुत अर्थगर्भा आ व्यंजक छनि।
मिथिलाक गामक ओहि समृद्ध परंपरा आ प्रीति, सौजन्य-सौमनस्यकेँ ओ तकैत रहैत छथि। जतय कोनो भेदभाव नहि छल। जातिपात नहि छल। सभ एक-दोसराक पर्व-त्योहारमे खुजल आ उन्मुक्त मोनसँ सम्मिलित होइत छल। मुदा से गाम आइ निपत्ता भेल अछि। जीवन बदलि रहल छैक, सभ्यता-संस्कृति बदलि रहल छैक। आयातित विचारक प्रदूषणसँ, अपना-अपनीसँ, स्वार्थक महाजालसँ संपूर्ण परिवेश अनठिया बनि गेल छैक। ओ अपन गामक अन्वेषणमे लागल कहैत छथि—
पसरमे जाइत चरवाहक पराती
आ साँझमे दूर नदी कातसँ
बाध-बोनासं भासल अबैत
चौमासा-बारहमासाक स्वर
आँगनसँ
ढेकी जांतक संगीतक संग
लगनीक स्वर
कहियो सोहर, कहियो समदाओन
कहियो तिरहुत, कहियो मलार
हमर गामक परिचिति छल
बरखामे विलम्ब देखि
गमैया पूजाक सँगोर
जट जटिन खेलेबामे व्यवस्त
महिला समाज
तजियाक संग
झड़नी पर झुमैत किशोर/तरूण दल
फगुआक अबीर
आ जूड़शीतलक कादो-मटिक संग
हमर गाम जीबैत छल
.................
हम ताकि रहल छी सएह गाम
अपन गाम
कवि मानैत छथि जे शब्द जे कहियो पूर्वजक अनुसारे ब्रह्म छल से आइ अपन मुक्ति लेल छटपटाइत वाल्मीकि, विद्यापति, कृतिवासक बाट ताकि रहल अछि। कियैक तँ बीसम शताब्दीमे मनुक्ख ओहि शब्दकेँ अस्त्र बना लेलक अछि, ओकर अर्थ बदलि गेल छैक, अपन संपूर्ण अर्थवत्तामे ओ भयाओन भऽ गेल छै आ ओकरासँ साधारण लोककेँ डर होइत छै। कविता कतेक अर्थपूर्ण अछि से देखी--
हमरा लोकनि
अर्थात् एकैसम शताब्दीक
सभ्य सुशिक्षित मनुक्ख
शब्दकें बना लेने छी अस्त्र
अस्त्र विभाजनक
अस्त्र शोषणक
अस्त्र संहारक
आइ शब्द स्नहे-संवेदना नहि
घृणा-द्वेषक करैत् अछि सृष्टि-संचार
शब्द आइयो अछि
संसद-संविधानमें
बणिकक तिजोरीमे
स्तावक लोकनिक ठोर पर
कलमक नोक पर
शब्द आइयो अछि
मात्र बदलि गेल छैक ओकर अर्थ
तें लगैत अथ्छ अनचिन्हर-अनभोआर
लगैछ भयाओन
लोक, साधारण लोक
आइ शब्दसं डेराइत अछि
भारतक आजादीक पछाति गणतंत्र दिवस आ स्वतंत्रता दिवसक अवसरपर संपूर्ण देहक रोमांचित होयब, एकटा अखंड विश्वासक लहरिक दौगब आ मोन प्राणक उत्फुल्ल होयब, समय-साल बदललाक कारण , देश-दशाक स्थितिक विरूपताक कारण आ समान्य जनताक इच्छा-आकांक्षा आ ओकर समस्त भविष्यपर लगाओल गेल पैघ प्रश्नचिह्नक कारण, अंततः स्थिति कतेक बदलि गेल अछि तकरा कविक १५ अगस्त कवितामे देखल जा सकैत अछि-
१५ अगस्त आब रोमांचित नहि करैछ
फहराओल जाएब तिरंगाक शहीदक शोणित,
ओकर बलिदानक कथाक स्मरण नहि करबैछ
तिरंगाक केसरिया रंग लालक बदला --
एक पैध सुचिन्तित षडयंत्रक प्रतिफलन बुझि पड़ैछ
आ श्वेत खंडक बीचो बीच चक्र
एक पैघ कलंकक टीकाक प्रतीक
जाइ मे बोफर सं शेयर धरि
हवाला सं गवाला धरि कतेको
अपकर्म, कुकर्मक कथा गाथा
सत्तासीन भारत भाग्य विधाताक समाहित हो
कवि रामलोचन ठाकुर अपन 'हम चाहै छी' कवितामे कहैत छथि-
कविता हमर
कोनो मंदिर मसजिद वा
कोठा सँ नहि, मजूरक झोपड़ी सँ
कारखानाक जरैत चिमनी सँ खेत जोतैत हरक फार सँ
धीपल लोहा पर पड़ैत लोहारक हथौड़ा सँ
कुम्हारक चाक सँ चमारक टाकु सँ जनमओ
हम चाहै छी
रामलोचन ठाकुर विराट फलकक कवि छथि। मैथिलीमे, अपन धाराक एकसर कवि जकाँ, अपन संर्घष-पथपर अविराम चलैत, अनथक यात्राक सभटा मोल चुकबैत ई कवि अपन कविता सभमे एक विशिष्ट अर्थ भरैत रहलाह। आइ हिनक कविता सभ मैथिली कवितामे एक धड़कैत आ विचारोत्तेजक आयाम दैत अछि। एतेक सहज आ संप्रेषित जे कविताक अर्थ ताकबा लेल कतहुँ दूरक यात्रा नहि करय पड़त अपितु तकर अर्थ एतेक सरल आ खुजल रहैत अछि जे ओ अहाँ के समान्य मैथिल आ हिंदुस्तानी जीवनमे अनायासहि भेटि जाइत अछि। कोनो दीहन-हीम, कोनो मजूर, कोनो रिक्सा आ ठेला बलाक जीवनक संघर्षमे हुनक कविताक पाँति फड़कैत, अपन बात कहैत भेटि जाएत। ई हुनक कविताक एक महत्वपूर्ण आयाम थिक।
रामलोचन ठाकुर एक श्रेष्ठ कविक अतिरिक्त श्रेष्ठ अनुवादक ओ विचारक सेहो छथि। अपन अनुवाद कर्म आ तकर गुणवत्तासँ ओ मैथिलीक मान बढ़ौलनि अछि। ओ मैथिल मनक विशिष्ट रचनाकार छथि आ हुनक कवितामे आ अन्यो रचनामे संपूर्ण मिथिलाक जीवन स्पंदित करैत अछि। धर्म, समाजिक जीवन प्रणाली, राजनीति, सभ्यता आ संस्कृतिपर हुनक एतेक संतुलित आ समधानल व्यंग्य छनि जे हुनक रचनाक कलात्मक संयम आ तकर उत्कर्ष मनकेँ मोहि लैत अछि। मिथिलाक संग-संग बंगालक जीवन एक संग हुनक रचनामे अबैत अछि। एक दोसरासँ जुड़ल आ अन्तरंग रूपमे।
निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे कवि रामलोचन ठाकुर प्रथमतः आ अंततः जनताक रचनाकार छथि। आखरी विपन्न आदमीक सुख-सेहंतामे भीजल, ओकरे दुखसँ दुखी होयब, ओकरे सुखसँ सुखी होयबाक व्यापक परिधिमे हुनक रचना बौआइत रहैत छनि। हुनक रचनाकार लक्ष्य जनता थिक, समान्य जनता। आ हुनक एहि महत्वपूर्ण आ अर्थव्यापी लक्ष्य लग अंततः प्रत्येक रचनाकारकेँ जयबाक चाही।
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संवेदनाक सीढ़ीपर ठाढ़-“ताल बेताल”
जीवनक आपाधापीमे च'प-उनार हएब जिनगीक संतुलनक स्रोत बूझू। छोट पैघ डेग उठिते तँ मोकाम धरि पहुँचैए लोक। जहिना डेग छोट-पैघ, तहिना कर्मो छोट-पैघ आ ओहने फल सेहो होइछ! ओइ छोट-पैघपर जहन डेग लड़खराए लगैए तहन दोसराक मूँहे उपहासक पात्र बनब देरी नै।ओ उपहास, डेगे नै मोन सेहो तिलमिला देबाक लेल पूर्ण होइछ। ओ कखनो नजरि सँ तँ कखनो शब्दवाण भऽ बेधैछ।
शब्दवाण जे तिलमिला दिए, बेधि दिए उएह साहित्यिक परिधिमे व्यंग्यक संज्ञा पबैछ! व्यंग्य, माने प्रस्तुतकर्ताक सिरखारीपर मुस्की आ लक्ष्यपरक चोट आ कि तिलमिलाहटि। व्यंग्य हास्यमे सेहो प्रस्तुत होइछ आ हास्यास्पद रूपमे सेहो। व्यंग्येक एक रूप तँ आलोचना थिक। साहित्यमे व्यंग्यक कएटा रूप वा संबोधन अछि। यथा पैरोडी, प्रहसन आदि। सात दशकक मैथिली आन्दोलनी, दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व- श्री रामलोचन ठाकुर जी मिथिला भूमिमे हास्य-व्यंग्यक कोना धेलनि से नै जानि मुदा असल नाम नुका अपन छद्मनाम 'कुमारेश कश्यप'सँ व्यंग्य लिखबाक प्रयास हुनका अनुरूप हमरा नै लागल।
ताल- बेताल व्यंग्य संग्रहमे कुल सात गोट व्यंग्यक धार बहेलाह। जकर पहिल शीर्षक अछि-"अथ कथा चमचा पुराण। प्रस्तुत प्रसंगमे मैथिली आन्दोलनमे भोगल अनुभवक बीच देखल चाटुकारिता, गोधियाँ-गोधौअलसँ आहत भऽ तोता - मैनाक संवादे चित्रणसँ संतुष्ट भेलाह।
"ऐं यौ, ऐ बेर जहियासँ मिथिलाक सर्वेक्षण क' एलौं तहियासँ गुमसुम बैसल छी। की कहू-मिथिला, मैथिलीक क्षति त' हेबे करतै जे हमरो सबहक खोंता बिनु उजारने नै रहत। ओ! अच्छा ई कहू ई चमचा शब्द कत' भेटल, आ कि अहींक उत्पति? " देखू- चमचा शब्द प्रयोग भेल अछि महर्षि वेदव्यास द्वारा। ओ अपन सत्रह पुरानमे एकर कथांत नै क' पौलाह।तहन अठारहम पुराणक रचना कर' पड़लनि-" चमचा पुराण " ओइमे
लिखै छथिन- -" अष्टादस पुराणे व्यासाज वचनम ध्रुवमसर्व काले सभी क्षेत्रे चमचा सर्वत्र विद्यते "ओना अतबेसँ सन्तुष्ट नै भेलाह। तँ चमचाक प्रमुख प्रकार सेहो चारि भागमे बाँटि लिखलाह।
1- अज्ञान वाक् -जकरा ज्ञानक छुति नै, महन्थक वाक्यकें ब्रम्हवाक्य मानब।
2- सुटकुन -जकरा ज्ञानक छुति रहैछ मुदा महन्थक धरिया धेने पार उतरैछ।
3- स्वविवेकी -स्वार्थवश चमचागिरी , फेर अलोपित।
4- फँचारि-सभा , सोसाइटी दलमलित केलक। महन्थक टोकारापर घसकन्त।
विद्यापतिक बर्खी-विद्यापतिक सम्मानसँ बेशी जेबी भरबा लए हुनक अवसानपर चोट करैत! वक्तामे सेहो गोधियाँ-गोधौअलक प्रस्तुति! सुनू ऐ मंचपर बेशी बला सब बाजि गेलाह। हम तँ कम्मे जे पढ़ने सतमा धरि माने वामन बुझू। पैघ ओ जे सबमे पैघ होथि। जेना बेशी विवाह, बेशी धिया पुता, बेशी धन संपत्ति, बेशी लटारहम (टंटबंट), बेशी गप्प हांकय,बेशी खाय, बेशी पचाबय।
आब अध्यक्षीय भाषण- अहाँ सबहक सौभाग्य जे आइ मंचपर तीन गोट विद्यापति विशेषज्ञ बैसल छथि डॉ. झांखुर झा- जिनका विद्यापतिक नायिका चूड़ी पर शोधक पी.एच.डी भेटलनि।डॉ.गोबर गणेश जे विद्यापतिक नायिकाक नूआ पर शोध क' सम्मानित भेलाह। तेसर-डॉ. खेसारी खबास जे विद्यापतिक अन्तर्वस्त्रक रिसर्च स्कॉलर छथि। अहिना जुत्ता, छड़ी, पाग, दोपटा महात्म्यक परिचर्यामे विद्यापतिक बर्खी सब बेर अपन किछु नव कीर्तिमान स्थापित करैए।
कुर्सी महात्म्य- डॉ. नास एम.ए। त्रिपाठी.एच.डी, डीलिट्। अठारह पुराणक रचना केलनि। ताहिमे एक अछि कुर्सी पुराण।ओइपर कहियो राम बैसल कहियो कृष्ण आ तकर पछाति नै जानि कते नरसंहारी। मुदा आब ओ कुर्सी कोनो साधारण जनता प्राप्त कऽ सकैए जे फकीर रहए। कोटि कोटि आ कुटि कुटि के व्यंग्यक निष्पादन करैत कथा।सत्तामे बैसल वा पावरफुल व्यक्ति कखनो ककरो कटबाक आदेश दऽ सकैए।कखन कोन विपत्ति ककरा पर आइब जाए से कहब अनिश्चित! मुदा घेंट जोड़बामे सब व्यस्त आ खुश।- विप्लव!
ब्रम्हाक श्राप- अइ कथामे सत्ताक शताब्दीक व्याख्या कएल गेल अछि! दुनिया एडवांस भऽ रहलै। ब्रम्हा जीक संग अंग्रेज़ी वार्तालाप तकरे प्रतीक थिक।
अमरावती उपकथा--कमीशनखोर सब कोना नेताकें फँसा कऽ रखैछ। आ काज बेर कोना अपने फँसि व्यस्त भऽ मालो माल होइ छथि।
सबटा कथा कतेको दशक पहिनेक मुदा आइयो स्थिति परिवर्तन नै। तें आइयो पूर्ण प्रासंगिक।
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सुरेन्द्र ठाकुर- संपर्क-9903398512
मैथिली सेवी कवि श्री रामलोचन ठाकुर जी
ओह! हम की कहू नहि कहू। हम तखन बहुत मोश्किलमे पड़ि जाइत छी जखन हम अपनासँ कनिष्ठ बा ज्येष्ठ कोनो मैथिली सेवीक व्यक्तित्व,कृतित्व आ कीर्तित्वक विषयमे किछु लिखबाक लेल हाथमे कलम पकड़ैत छी।तखन मोनमे होइत रहैत अछि जे ओहि मैथिली सेवीक संबंधमे कतहुँ कोनो मौलिक तथ्य छुटि ने जाए बा एहेन कोनो बात नहि लिखा जाए जाहिसँ हम उपहासक पात्र बनि जाइ! आखिर हम की करबैक? एखन तँ हमरा लिखहे पड़ि रहल अछि। प्रसंगवश्, उलेख्य महानुभाव छथि मैथिलीक कवि-लेखक साहित्यकार आदरणीय श्रीमान् रामलोचन ठाकुर जी। ओना हम ई०सन्--१९७५ क २६ जनवरी क' कलकत्ताक धरती पर पैर रखलहुँ। हमर अजिया ससुर श्री उदित नारायण झा आ ससुर श्री बुद्धदेव झा जीक कलकतास्थ रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालयक जोड़ासाँको प्रांगण स्थित निवास स्थानपर यदा-कदा बा छुट्टी दिन क' सामान्य मैथिलक अतिरिक्त किछु मैथिली सेवी यथा श्री महेन्द्र झा(बेलौंजा),श्री राजन्दन लाल दास(कर्णामृतक सम्पादक)आ नाट्यकार द्वय श्री दयानन्द झा(नागदह) आ श्री गंगा झा(परजुआरि,डीह) आदि प्रमुख मैथिलीसेवी सभ उपस्थित भ' जाथि। मिथिला-मैथिली विषयक वार्तालापमे हुनका सभकें संग देथिन्ह नाट्यकार श्री कृष्णचन्द्र झा'रसिक'(परजुआरि,डीह)।ओही समयसँ हुनका सभक मुँहें सुनियन्हि आदरणीय श्री रामलोचन ठाकुर जीक नाम। ओना तखन तक हम कलकत्ताक मिथिला-मैथिलीक गतिविधिसँ संलग्ने नहि छलहुँ। मुदा,बादमे हम विशेष रुचि लेबय लगलहुँ। ज्ञातव्य हो कि एहिसँ पूर्व पटना शहरमे रहैत ओतुका मैथिलक गतिविधिसँ रुचि रखैत रही। ई०सन् १९८६क एकटा घटना! हम मैथिली-सेनानी श्री बाबू साहेब चौधरी जीक विशेष आग्रहपर अखिल भारतीय मिथिला संघ कलकत्त्ताक सदस्य बनलहुँ। आ सक्रिय रुपेण संघक लेल काज करय लगलहुँ। तखन हम रिषड़ा(हुगली)मे रहैतरही। उपरोक्त 'संघ' आ श्रद्धेय चौधरी जीक सानिध्यमे रहैत चर्चाक्रममे हमरा ज्ञातव्य भेल जे आदरणीय श्री रामलोचन ठाकुरजी 'संघ'क सक्रिय सदस्य छलाह। प्राय:नब्बे दशकक प्रथम उतरार्धमे एक दिन 'अस्वस्थ्य' चौधरी जी हमरा आग्रह कयने रहथि:---"सुरेन्द्र जी! विशेष सूत्रसँ हमरा ज्ञात भेल अछि जे श्री रामलोचन ठाकुर जी बहुत अस्वस्थ्य छथि। अपनहि लोक छथि। अपन 'संघ'क शुभ चिंतक छथि।जौ आहाँसँ सम्भव हो तँ 'संघ'क दिशिसँ, हमरा दिशिसँ आ अपनहुँ दिशिसँ कृपया भेट क' अबितियन्हि तँ बहुत बढ़ियाँ होइत।।" हम हुनक प्रस्ताव के सहर्ष स्वीकारल आ कहने रहियन्हि---"चौधरी जी,कृपया, अपने हुनक पूरा पता-ठिकाना दी। हम एखनहि हुनकासँ भेट करबाक लेल जाएब।" की कहू! हम चौधरी जीसँ प्राप्त पता-ठिकाना ल' क' श्री राम लोचन ठाकुर जीक लेक गार्डेन्स स्थित निवास स्थानपर चारि बजे बेरु पहर पहुँचि गेल रही। हुनक कोठली तक पहुँचैत हम अजीबो गरीब स्थितिमे पड़ि गेल रही। देखने रही जे एकटा व्यक्ति अपन विस्तरपर पड़ल छथि आ हुनक एकटा पैरसँ डोरीसँ लागल -बान्हल किछु ईंटा विस्तरक फ्रेमसँ नीचा लटकि रहल छैक। हम पूर्वानुमाने पूर्ण आश्वश्त भेल रही जे इएह छथि ----'श्री मान् राम लोचन ठाकुर जी। हम हुनक पैर छुबि गोर लागल आ अपन पूर्ण परिचय दैत कहने रहियन्हि----"हमरा अपनेक ओतय अपनेक जिज्ञासार्थ एखन पठौलन्हि अछि श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी। आ, आग्रह कयलन्हि अछि जे हुनक सेवा उपलब्ध करैबाक जौं बात होई से ठाकूर जी अबस्से कहथि। हम पूर्ण रुपेण तैयार छी| संगहि ,पूर्ण स्वस्थ्य भेला पर हम अबस्से भेट करबन्हि|" हमर बात सुनि ठाकुर जी बाज़ल रहथि:-" ठीक छैक ।आहाँ चौधरी जीकें कहबन्हि जे हम उतरोत्तर ठीक भ' रहल छी।आ,जौं हमरा हुनक कोनो सेवा लेबाक जरुरति पड़त तँ हम हुनका अबस्से सूचना देबन्हि।पहिने ओ स्वयं स्वस्थ्य होथि,से हमर कामना अछि। जे किछु,ठाकुर जीक घरमे किनको नञि देखि हम पूछने रहियन्हि:-"ठाकुर जी! अपनेक घरमे हम किनको नञि देखैत छियन्हि। एखन एहिठाम किओ छथि की नञि।"ओ आगा कहने रहथि:-"एखन किओ नहि छथि। सभ किओ गामेपर छथि।।"हम पुनि आगा पूछने लहियन्हि:-"की आहाँ अपना संबंधमे अपन पारिवारिक लोककें गाम पर सूचना देने छियन्हि।" ओ आगा बाजल रहथि:-"नहि, हुनका सभकें हम कोनो तरहक सूचना नहि देने छियन्हि ।आ,ने देबन्हि।हमर आग्रह अछि ,जे आहाँ बा चौधरी जी 'क अलाबे जेकियो होथि ,हमरा सम्बन्धमे,हमर गाम पर, हमर पारिवारिक कोनो सदस्यकें ,अपने लोकनि कोनो तरहक सूचना नहि पठबियन्हि।कारण,ओ लोकनि सुनितहिं घबड़ा जयताह आ दौड़ले कलकत्ता चलि औताह। तखन हमर सभ योजना बिगड़ि जाएत।" ठाकुर जीक उपरोक्त बात सुनि हम हुनका कहने रहियन्हि:-ठाकुर जी,एवमस्तु! हम सभ अपनेक निर्देशके अबस्से पूर्ण पालन करब। चिन्ता जुनि करी।" हम ठाकुर जीसँ पुन: पूछने रहियन्हि:-"ठाकुर जी! अपनेक संग ई दुर्घटना केना भ'गेल।ओ बाजल रहथि:-"सुरेन्द्रजी! हड़बड़ीमे हमर पैर 'स्लीप' क' गेल। ओकर बाद घरहिंपर डाक्टरी सलाह लेल। एक्स-रे कराओल गेल। पैरक हड्डी टुटि गेल। संबंधित डाक्टर प्लास्टर कयलन्हि। सूई-दबाई सभ देलन्हि। आ,कहलन्हि -'घरे पर आबि क' हम पुन: देखैत-सुनैत रहब। से आहाँ देखिते छी,हम ' ट्रैकिंग' पर छी।" हम पुन: आगा पूछने रहियन्हि:- ठाकुर जी !अपनेक क्रिया-कर्म आ घरेलू काज केना चलि रहल अछि? ओ बाजल रहथि:--"डाक्टरक अलाबे सभ दिन क' एकटा नर्स अबैत अछि।एकर अलाबे सभ दिन क' अही ठामक एकटा महिला(आया) भानस-भात क' दैत अछि। कपड़ा-लत्ता,बर्तन-बासन आ घर'क सफाई आदि क' दैत अछि। हम स्वयं 'स्टीक'क सहारे नित्य क्रिया-कर्म कहुना क' खूब सावधानीक संग क' लैत छी। आर की कहू,कष्ट तँ थोड़ेक अछिए। 'हम तखने अनुभव कयने रही जे ठाकुर जी एकटा बहुत जीवटगर आ संघर्षशील लोक छथि। हम पुन: आगा पूछने रहियन्हि-"ठाकुर जी!अपनेक ई प्लास्टर कहिया धरि कटत?" बाजल रहथि ठाकुर जी:-"हॅ, डाक्टर कहैत छथि जे पन्द्रह दिनक बादे प्लास्टर कटि सकैत अछि। आ,एखन धरि हमर स्थिति तँ ईएह अछि।मुदा,दुख अछि जे हम एखन आहाँ के चाहो नञि पीआ सकैत छी।कारण, चाह लाबय बला किओ नहि अछि। जे चाह थरमसमे छल से हम आहाँ आबयसँ पहिनहि पीबि चुकल छी।'"हम कहने रहियन्हि:-अपने एहि लेल बेशी चिन्ता नञि करी।" उपरोक्त बातचीतक बाद हम प्रस्थान करबाक लेल उद्यत भेल रही कि ठाकुर जी बाज़ार रहथि:-सुरेन्द्र जी!कनेक आर ठहरू।"ई कहैत ओ हमरा अपन लिखल एकटा मैथिली पोथी उपहार स्वरुप देने रहथि।हम कहने रहियन्हि:-ठाकुर जी!हम एखन उपहार स्वरुप ई पोथी नञि लेब।हम कोनो मैथिली पुस्तक प्राय:उपहार स्वरुपमे नञि लैत छी।कीन लैत छी। अपने लोकनि अपन निजी टाकासँ पोथी छपबैत छी।जौ उपहारे स्वरुप सभकें पोथी देबैकतँ दोसर-तेसर पोथी कोनो छपाएब?आहाँ सन मैथिली लेखक सभ प्राय: गरीबे होइत छथि।तैं हम एखन टाका देबे करब।अन्यथा नञि बुझी। जौं,सम्भब हैत तँ हमरा बादेमे उपयुक्त समयपर उपहार द'देब।" तत्काल हम टाका देल आ पोथी ल'लेल। मुदा,ठाकुर जी हमर तथाकथित उपकारकें नहि बिसरलाह। आ,पूर्ण स्वस्थ्य भेला पर कोनो उपयुक्त समय पर ओ अपन लिखल एकटा दोसर पोथी हमरा दए देलन्हि। ओकर बादो दोसर लेखकक लिखल 'फ्री'मे बाँटय बला पोथी सेहो समय-समय पर दैत रहलाह।धन्य छथि हमर सभक ठाकुर जी अर्थात्---श्री राम लोचन ठाकुर जी !! ओकर बाद श्री ठाकुर जीसँ अनुमति ल' हम पुन: हुनक पैर छुबि प्रणाम करैत प्रस्थान कयने रही!! ओही दिनक प्राय: आठ बजे साँझक समय हम श्री चौधरी जीकें श्री ठाकुर जीक स्वास्थ्य सुधारक संबंधमे सभ बात आबि कहने रहियन्हि।ओ बहुत खुशी भेल रहथिआ कहने रहथि:-"ठीक छैक । हम सभ हुनक स्वास्थ्यक संबंधमे कोनो सूचना हुनक गाम पर एकदम्में नहि पठयबन्हि। ओकर बाद चौधरी जी रुकलाह नहि। अबाध गतिएं ओ कहब शुरु कयने रहथि:-सुरेन्द्र जी! श्री शुकदेव ठाकुर जी आ श्री राम लोचन ठाकुर जी दुनू निज पितियौत भाई छथि। श्री शुकदेव जी कलकत्ता ट्राम (वेज)कंपनीमे काज करैत छथि। आ श्री राम लोचन जी एत्तहिं इनकम टैक्स विभागमे काज करैत छथि। दुनू भाई कर्मठ लोक छथि। दुनू भाई 'मिथिला संघ'क लोक छथि।शुकदेव जी 'संघ'अध्यक्ष रहथि।आ राम लोचन जी से हो 'संघ'क सचिव रहि चुकल छथि।बादमे ओ 'संघ'क नाटक विभागक प्रभारी बनाओल गेल रहथि।दुनू भांई नाटकक मांजल कलाकार छथि।राम लोचन जी तँ हमरा संग हमर लिखित नाटक 'चाणक्य'मे चन्द्र गुप्तक भूमिकामे रहथि। आ,हम चाणक्यक भूमिकामे रही। लोक सभ एखनो धरि कहैत छथि उक्त दुनूक भूमिकामे ऊक्त नाटक बेश मंचित भेल छल।जकर पुनरावृति भविष्यमे पुन: हैत कि नहि,से नञि जानि।एखन समयाभावमे दुनू भांई समय नञि द'रहल छथि।" ताहि पर हम आगा कहने रहियन्हि-"चौधरी जी! अपने ठीके कहैत छी। हम सेहो कलकत्ताक कतेको लोकक मुँहे ई बात सुनने छी। विशेष क' हमरा श्रीवैद्यनाथ झा जी(डुमराबला)सेहो एहि संबंधमे कहने छथि।" श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी हमरा आगा कहने रहथि :-सुरेन्द्र जी! राम लोचन ठाकुर जी एकटा नीक जुझारू मैथिली क्रान्तिकारी छथि। ओ 'मैथिली मुक्ति मोर्चा बना क' पटनामे सफल आन्दोलन सेहो कयने छथि। ओ मैथिली जगतमे जानल-मानल लोक छथि। हमरा ओ ईहो कहने रहथि जे ओ मैथिलीक एकटा नीक कवि-लेखक आ साहित्यकार छथि। लेखन हेतु जे किओ हुनका प्रोत्साहित कयने हेथिन्ह ताहिमे हम सेहो एकटा लोक छी। ओ किछु मैथिली पोथीक प्रकाशन सेहो कयने छथि। आ,उतरोत्तर करैत रहताह। ओ मैथिली पत्र-पत्रिकाक सम्पादन सेहो करैत छथि" महामना श्रद्धेय चौधरी जी हमरा ईहो कहने रहथि:-सुरेन्द्र जी! श्री शुकदेव ठाकुर जी आ श्री राम लोचन ठाकुर जी हमर समधि सेहो छथि। हमर कनिष्ठ भ्राता राम प्रसाद(चौधरी)क जयेष्ठ बालककें शुकदेव ठाकुरजीक अपन एकटा कन्यासँ विवाह हमहीं करबौने छी। तैं हमरा सभक बीचमे एतेक आपकता अछि आ रहत।" आब श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी नहि छथि। मुदा,ओ हमरा श्री रामलोचन ठाकुर जीक संबंधमे जे बात सभ कहि गेल छथि से एखनो धरि अक्षरशः मिलैत अछि। आ,हम पूर्ण अनुभव कयल अछि जे श्री राम लोचनजी अद्यावधि मिथिला-मैथिलीक नि: स्वार्थ सेवा क' रहल छथि। ओ हाल तक बहुतो मैथिली पुस्तकक प्रकाशन क' चुकल छथि। ओ विभिन्न पत्र- पत्रिकामे आलेख लिखैत रहलाह। कखनो छद्म नामसँ त' कखनो अपनहिं नामसँ। ओ हमरा सभ के कहला पर अ०भा०मिथिला संघ'क लेल श्रद्धेय (स्व०)श्री बाबू साहेब चौधरी जी द्वारा स्थापित-प्रकाशित पत्रिका' मैथिली दर्शन'क पुन: सम्पादन -प्रकाशनक भार उठौलन्हि। उक्त पत्रिका जनवरी २००४सॅ शुरु भेल । आ, दिसम्बर२००५तक प्रकाशित होइत रहल। मुदा,सन-२००६क जनवरी माहसँ 'संघ'क भूतपूर्व मुख पत्र आ मासिक पत्रिका'मिथिला दर्शन'क पुन: प्रकाशन शुरु भेल श्री मान् उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'जीक प्रधान सम्पादकत्वमे। आ ,श्री ठाकुर जी उक्त पत्रिकाक कार्यकारी सम्पादककें रुपमे काज करय लगलाह। फलस्वरुप 'मैथिली दर्शन'क प्रकाशन बन्द भ'गेल। तथापि श्री ठाकुर जीक सर्वस्तरीय सहयोग प्रसंशनीय रहल छल। एहि सभ उपरोक्त तथ्यक अतिरिक्त श्री राम लोचन ठाकुर जी समय -समय कोलकाता आ एकर उपनगरक मिथिला-मैथिलीक विभिन्न कार्यक्रममे सक्रिय रुपसँ भाग लैत रहलाह। ओ अपन सम्पादकीय लेखन आ भाषण सभमे प्राय: मौलिक तथ्य के सदा उल्लेख करैत रहलाह। जाहिसँ नवागत पीढ़ीक लोक सभ मिथिला -मैथिलीक अतीत आ वर्तमानक समस्या सभसँ अवगत होइत रहथि। हमरा दृष्टिएं श्री राम लोचन ठाकुर जी राजनैतिक रुपसँ एकटा सुच्चा कम्यूनिष्ट छथि। ओ अपना स्तरक उचितवक्ता आ सफल मैथिलीवादी लोक छथि। नोकरी करब हुनकर एकटा मजबूरी छलन्हि। लेखन हुनक एकटा व्यसन छन्हि। मिथिला-मैथिलीक निरन्तर सेवा करब हुनक परम धेय छन्हि। एहि अंतर्गत सम्पूर्ण मिथिलामे प्राथमिक स्तर पर शिक्षाक माध्यम मैथिलीए हेबाक सिद्धान्तक पक्षधर छथि। संगहि, 'मिथिला राज' निर्माणक प्रबल समर्थक छथि। एखन 'मिथिला दर्शन' पत्रिका पुन: चालू भेल अछि। परन्तु किछु मास पहिने एहि मासिक पत्रिका'क प्रकाशन हठात् बन्द भ' गेल छलैक। ओही समयमे ज्ञातव्य भेल छल जे श्री राम लोचन ठाकुर जी अपन शारीरिक अस्वस्थ्यताक कारणें एकर सम्पादन सहयोग बन्द क' देलन्हि अछि। आ,ओ चिकित्सा करबा रहल छथि।एक दिनक बात।प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक श्रीगंगा झा जी फोनक कयलन्हि जे हम श्री ठाकुर जीसँ भेटकरबाक हेतु हुनक निवास स्थान पर जाएब।कृपया अपने अबस्से आउ। एकहिं संगे दुनू आदमी जाएब। सैह भेल।दुनू आदमी हुनका भेंट केलियन्हि। देखल जे उत्तरोत्तर हुनक स्वास्थ्यमे सुधार भ' रहल छन्हि।हुनका संग प्राय:एक घंटा बातचीत कयल। ओ चाह पीऔलन्हि। अंतमे हम दुनू व्यक्ति हुनक सुखद स्वास्थ्यक कामना करैत प्रस्थान कयल।
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योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’-संपर्क-9831037532
रामलोचन ठाकुरक व्यक्तित्व : एक दृष्टिकोण
रामलोचन ठाकुर कें हम पछिला सोलह-सत्रह साल सँ जनैत छिऐनि। हुनकर किछु साहित्यिक कृति पढ़ल अछि। साहित्यक मूल्यांकन करबाक अवगति हमरा नहि अछि, मात्र हम हुनक व्यक्तित्वक किछु खास अंश पर अपन अवलोकन एतए प्रस्तुत करैत छी।
2004 के अन्त अथवा 2005 के शुरु के समय, हम कलकतिया साहित्यिक समाज मे घोंसियेबाक चेष्टा करैत रही आ सम्पर्कक मासिक बैसार मे जाएब शुरु कएने रही। ओहि समय ई बैसार कॉलेज स्ट्रीट बला राजेन्द्र छात्र निवास मे कोनो कोठरी मे भेल करै। एहने एक बैसार मे अकस्मात रामलोचन जी अपन एकटा पुस्तक ‘स्मृतिक धोखरल रंग’ लेने अएलाह आ एतबा कहि जे ‘एकर विमोचन वैज्ञानिकजी करताह’ हमरा हाथें ओकर विमोचन करबौलनि। ओ किताब हमरा पहिने सँ देखल नहि छल। हम ओहि विषय पर किछु बजबा मे असमर्थ छलहुँ, मुदा विमोचनक प्रक्रिया सम्पन्न भेल। किताब मे हमरा पहिल बेर किछु अटपट लागल — मुखपृष्ट पर किताबक नाम आ लेखकक नाम मात्र मिथिलाक्षर (जकरा हम सब बच्चा मे तिरहुता लिपि नामे सिखने छलहुँ) मे लीखल। देवनागरी निपत्ता। बगल के फ्लैप पर जरूर देवनागरी मे ओएह बात लीखल छलैक, किन्तु एहन व्यवहार हम पहिल बेर देखि रहल छलहुँ। पुरान मैथिली लेखक लोकनिक कतेको पुस्तक एहन देखने छी जाहि मे मिथिलाक्षरक व्यवहार भेल छलैक मुदा संगहि देवनागरी सेहो रहितहिं छलैक, से बरू छोटे अक्षर मे किएक ने होइक।तकर बाद हुनकर आनो पुस्तक सब देखबाक आ पढ़बाक अवसर भेटल। हुनकर पुरना किताब सब, जेना ‘मैथिली लोककथा’ (1983), ‘अपूर्वा’ (1996), ‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ (2003) आदि सब मे ओएह ढाठी। ‘आँखि मुनने आँखि खोलने’ (2005) मे देखैत छी मुखपृष्ट पर दूनू लिपिक व्यवहार। तकर बाद अनुवाद बला किताब सब मे मिथिलाक्षर निपत्ता।
बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे एहि प्रयोगक की औचित्य छलैक ? किछु गोटे एकरा रामलोचनजीक हठधर्मिता कहि सकैत छथि मुदा हमरा विचारें एकर गूढ़ अर्थ छलैक। मैथिली सेनानी रामलोचन ठाकुरक लेल मैथिली भाषाक संगहिं लिपिक महत्ता समतुल्ये छलनि। ओ मैथिल समाज कें इएह सन्देश देबऽ चाहैत छलखिन जे अपन लिपि कें बिसरब उचित नहि। मिथिलाक्षरक हटा देब मैथिली लेल कतेक लाभदायक आ कि हानिकारक भेलैक ताहि बहस मे हम एतए नहि जाए चाहैत छी मुदा एतबा बता देब जरूरी बुझैत छी जे मिथिलाक बाहर जे विद्वान मैथिली भाषा आ संस्कृति सँ सिनेह रखैत छथि आ भाषाक संग लिपिक महत्व बुझैत छथिन, हुनका नजरि मे लिपि कें हटा देब मैथिली लेल महान गलती भेल। ओना तऽ अनेको एहन उद्धरण देल जा सकैत अछि, मुदा एहि प्रसंग हम अपन अनुभव बतबैत छी। 2014 मे केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तेजपुर (असाम) मे भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) के वार्षिक मीटिंग भेल छलैक। ओहि मे असमियाक प्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर नगेन साइकिया अतिथि वक्ताक रूप मे अपन व्याख्यान प्रस्तुत कएने रहथि। व्याख्यानक अन्त मे हमरा हुनका संग किछु गप-सप भेल छल। ओही क्रम मे ओ ई विचार व्यक्त केलनि जे लिपि कें हटाएब मैथिलीक लेल बहुत हानिकारक भेलैक।
समयक संग रामलोचनजीक एहि विचार मे किछु परिवर्तन भेल। एकटा आर अवलोकन — मिथिलाक्षर बला किताब सन हिनकर स्वयं प्रकाशित छलनि। एकर विपरीत अनुवाद पुस्तक सब अन्य प्रकाशन सँ — जेना ‘पद्मा नदीक माझी’ (2009) मिथिला सांस्कृतिक परिषद कलकत्ता सँ, ‘कठपुतरी नाचक इतिकथा’ (2016) साहित्य अकादमी सँ आ ‘अयाची संधान’ (2018) किसुन संकल्प लोक, सुपौल सँ। की मिथिलाक्षरक अनुपस्थिति कें प्रकाशक सँ जोड़ि सकैत छिऐक ? आ कि लेखक स्वयं एहि निष्कर्ष पर आबि गेलाह जे ई व्यवहार अनुपयोगी भऽ गेलैक ? कहब कठिन कारण एहि विषय पर हमरा हुनका संग चर्चा नहि भेल।
‘स्मृतिक धोखरल रंग’ नामहि सँ बुझना जाइछ जे पुस्तक संस्मरणात्मक लेख सबहिक संकलन अछि। एहि मे मुख्यतः चर्चा अछि मैथिली आन्दोलन मे कलकत्ताक योगदान, जाहि मे रामलोचनजी कोनो ने कोनो रूप मे अपने सहभागी छलाह। पुस्तक पढ़ला सँ हम मैथिली आन्दोलन मे कलकतिया मैथिल समाजक योगदान बूझि पौलहुँ।
‘मैथिली लोककथा’ पहिल बेर छपल 1983 मे। ई कोनो मौलिक कृति नहि कहल जेतैक मुदा समाजक धरोहरि कें सम्हारि कए एकत्रित करबाक काज भेलैक। खिस्सा पिहानी बच्चा मे सब गोटे सुनने छी माए-बाबू, काका-काकी, दादा-दादी, नाना-नानी अथवा परिवारक आ समाजक अन्य लोक सबसँ। विश्वक सब समाज मे अनेक रूप मे ई खिस्सा-पिहानी प्रचलित छैक जाहि सँ बच्चाक लेल मनोरंजनक अतिरिक्त बहुमूल्य शिक्षा सेहो भेटैत छैक। सब भाषा मे एहन खिस्सा सब के छोट-पैघ संकलन सेहो कएल गेल छैक। सत्य बजबाक नीक फल, झूठ बजबाक खराप फल, इमानदारीक महत्व, परिश्रमक फल, अतिथि सत्कारक महत्व, कर्तव्याकर्तव्यक बोध आदि अनेको विषयक परिचय आदि काल सँ बच्चा कें एहि खिस्सा सब सँ भेटैत रहलैक अछि। लोककथाक स्वरूप देश-कोस बदलि गेला सँ बदलि जाएब स्वाभाविके। एके गाम मे दूटा कथा वाचक एके कथा कें कलेवर कने बदलैत सुनबैत भेटि जाएब असम्भव नहि। कतहु कने पात्र बदलि गेल तऽ कतहु कने दृश्य। ई खिस्सा सब छिड़िआएल छैक आ समयक संग बहुतो खिस्सा लोक बिसरि जाइत रहल अछि। खास कऽ कए बदलैत सामाजिक परिवेश मे, जतए नानी, दादी बला संयुक्त परिवार उठि गेलैकए आ युवा पति-पत्नीक न्यूक्लियर परिवार रहि गेलैकए, खिस्सा कहबाक लेल पुस्तक बहुते आवश्यक बुझाइत छैक। रामलोचनजी एहि आवश्यकता कें बुझलनि बहुत पहिनहि आ तें संकलित केलनि लोककथा कें।
लोककथाक संकलित साहित्य सब विकसित भाषा मे बहुत समृद्ध छैक। ए. के. रामानुजन लिखित अंग्रेजी किताब Folktales from India, जाहि मे भारतक बाइस भाषाक चूनल 110 टा लोककथा छैक, एतेक उपयोगी भेलैक जे ओकरा बंगला अनुवाद केलनि महान विदुषी लेखिका महाश्वेता देवी। एकर मैथिली अनुवाद सम्भवतः नहिए भेल छैक। बंगला भाषा मे अनेको पुस्तक छैक लोककथा विषय पर। तथापि महाश्वेता देवी सन महान साहित्यकार ए. के. रामानुजन लिखित अंग्रेजी किताब के बंगला अनुवाद केलनि। बाइस भाषा मे ई नहि मानि बैसबैक जे मैथिलीओ छैक। एहि अंग्रेजी किताब मे मैथिलीक कोनो कथा नहि छैक।
छिड़िआएल लोककथा सब कें एक ठाम लीखि कए पाठक कें परोसि देब महत्वपूर्ण योगदान बूझल जेबाक चाही। रामलोचनजी अपन एहि पुस्तक कें समर्पित केलनि मैथिली लोकसाहित्यक अनन्य उपासक डा० ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, राजेश्वर झा आ अणिमा सिंह कें। एहि मे कुल 36 गोट कथा छैक, सब रुचिगर। विध-विधाताक खिस्सा सँ लऽ कए समाजक प्रायः सब वर्गक प्रतिनिधित्व छैक एहि संग्रह मे। ठक, आलसी, चतुर, सेठ-साहूकार, लोभी, दानी, विद्वान आ महामूर्ख सब के खिस्सा भेटत अपने कें एहि संकलन मे। मैथिली लोककथाक छोटमोट संकलन पहिनहु प्रकाशित भेल छलैक किन्तु एतेक पैघ नहि। पाठकवर्ग सेहो एकर महत्व कें बुझलक आ पुस्तक के पहिल संस्करण जल्दीए शेष भऽ गेल। तखन 2006 मे आएल दोसर संस्करण। बहुत दिन बाद 2017 मे किछु आर बेसी खिस्साक संग आएल योगानद झा संकलित आ साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘मिथिलाक लोककथा संचय’।
रामलोचनजीक ई प्रयास एकटा अमूल्य निधि भेलैक मैथिली साहित्य लेल। अस्वस्थताक कारण वर्तमान मे ओ निष्क्रिय भऽ गेल छथि। ईश्वर सँ प्रार्थना जे हुनका शीध्रे स्वस्थ कराबथि जाहि सँ मैथिली साहित्यक भंडार मे किछु आर योगदान होइक।
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प्रदीप बिहारी-संपर्क-6202140561
मशाल लेने चलैत अग्रदूत
राम लोचन ठाकुर माटिपानिक एकटा एहन कवि, कथाकार, अनुवादक, सम्पादक आ रंगकर्मी छथि, जिनक रचनाक कण-कणसं मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति अनुराग छिटकैत अछि। जें मिथिला आ मैथिलीक सर्वांगीण विकास हेतु आग्रह छनि, तें मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक प्रति सरकारी उपेक्षाक विरोध सेहो हिनक रचनामे पाओल जाइत अछि।
सन् 1987 ई. मे अपन उपन्यास "विसूवियस" क विमोचन समारोहमे कोलकाता (ताहि समयक कलकत्ता) गेल रही। ताधरि भाइ श्री रामलोचन ठाकुर हमरा लेल फड़िछायल परिचित भ' चुकल छलाह। हिनक पोथी सभ, यथा- माटिपानिक गीत, देशक नाम छलै सोनचिड़ैया आ आजुक कविता (सम्पादित) पढ़ि चुकल रही। एतबे नहि, विभिन्न पत्र-पत्रिका सभमे 'कह लोचन कविराय' सेहो पढ़ने रही। 'अग्रदूत' आ 'कुमारेश काश्यप' नामसं कथा आ हास्य-व्यंग्य सेहो पढ़ने रही आ फरिछौट भ' गेल रहय जे अग्रदूत आ कुमारेश काश्यप केओ आर नहि, दुर्घर्ष अग्नि हस्ताक्षर राम लोचन ठाकुर छथि। एतबे नहि, मुर्तजा हुसैन सेहो यैह छथि। हिनक सम्पादनमे बहरायल नाट्य पत्रिका 'रंगमंच' देखि चुकल रही आ प्रभावित भेल रही। एहन अग्रदूत सं भेंट आ भरिपोख गप करबाक सेहन्ता लेने सेहो कलकत्ता गेल रही। मुदा, दुखित होयबाक कारणें ओ उल्लेखित विमोचन समारोहमे नहि आबि सकलाह। हमहीं हुनका भेंट कर' गेल रहियनि। मिथिला आ मैथिलीक विभिन्न समस्या पर गप भेल छल। रंगमंचक अधुनातन शिल्प पर गप कयलनि।हमरा प्रसन्नता भेल रहय जे हमर ताधरिक अधिकांश कथाक कथावस्तु आ पात्रक नाम धरि मोन छलनि। जे नीक लागल रहनि, तकर बड़ आवेशसं प्रशंसा कयलनि । आ, जे नीक नहि लगलनि, जत' त्रुटि बुझायल रहनि वा कोनो वैचारिक मतभेद बुझायल रहनि, तकर स्पष्ट रूपें आलोचना कयने रहथि। हिनक ई गुण हमरा तहियो नीक लागल रहय आ आइयो नीक लगैत अछि।
नीककें नीक आ बेजायकें बेजाय कहबाक हिम्मति रामलोचन भाइमे एखनहुं छनि। ओ मुंह देखि मुंगबा कहियो ने परसलनि। हुनक ई गुण हुनका बहुतोसं बेरबैत छनि। अपन एहि गुणक कारणें बरोबरि कतिआयल जाइत रहलाह अछि। मुदा तकर परबाहि ओ कहियो ने कयलनि अछि। हुनका लेल अपन सोचक मानदंड बेसी महत्वपूर्ण छनि। हुनका स्वयं पर भरोस छनि। आ तें ओ अपन रचनामे आ व्यवहारमे परम्पराक रूढ़िकें तोड़ैत रहलाह अछि।
राम लोचन ठाकुर एकटा एहन गीतकार छथि, जे अपन गीतसं मिथिलाक बिसरल जाइत उत्सवकें मोन पाड़ैत छथि। बिसरल जाइत खेलकें अपन गीतक विषय बना ओकरा जिअ'बैत छथि। 'माटि पानिक गीत' नामक संग्रहमे देखल जा सकैत अछि जे हिनक प्रत्येक गीतक आखर-आखरसं मिथिला आ मैथिली अनुगुंजित होइत अछि। एहि संग्रहक खेल शीर्षकसं लिखल गीत हो वा कोनो आने, ऊपरसं तं सोझ-सोझ बुझाइत छनि, मुदा भीतरसं मरखाह आ आक्रमक होइत छनि। हिनक काव्य रचना पढ़ने बुझाइछ जे ई सोझे-सोझी बात कहबाक आग्रही छथि। तथापि विषय वस्तुक अनुसार छन्द गढ़बाक हिनक लूरि सहजहिं देखबामे अबैत अछि। कुण्डलिया छन्दमे हिनक रचना 'कह लोचन कविराय' खूबे चर्चित भेल छल।
राम लोचन ठाकुर अपन कविता सभमे मातृभूमि आ मातृभाषाक विकास आ समृद्धि हेतु अपन व्याकुलताक संग देखाइत रहैत छथि। संगहि, वैमनस्य आ वैमनस्यकें प्रश्रय देल जाइत व्यवस्थाक विरोध करैत छथि। अपन रचना सभमे नव निर्माण लेल व्याकुल देखाइत छथि। नव निर्माण लेल रचैत छथि आ विद्रोह सेहो करैत छथि।
ओ आंखि खोलने सभठाम आ सदिखन ठाढ़ देखाइत छथि। सामाजिक व्यवस्था आ सांस्कृतिक मूल्यक क्षरण होअय वा शोषित-प्रतारितक दुख, राम लोचन ठाकुर सभक भंगठी लेल कलम उठौने देखाइत छथि। हमरा जनैत हिनका मोनमे अभाव घुरमुरिया दैत रहैत छनि। जत' अभाव देखैत छथि, तकर निवारण लेल तैयार भ' जाइत छथि, उठा लैत छथि कलम। ई गुण हिनक रंगकर्मी होयबाक कारणें सेहो छनि प्राय:। प्रस्तुतिक उत्कृष्टताक लेल जेना रंगकर्मी नाटक आ रंगमंचक कोनहु काज लेल तत्पर रहैत अछि, तहिना राम लोचन ठाकुर अपन कलम उठौने तत्पर रहैत छथि। आ तें बहुत विधामे रचना कयलनि अछि।
राम लोचन ठाकुर बहुत विधामे लिखलनि। अग्रदूतक नामसं कथा, कुमारेश कश्यपक नामसं व्यंग्य। आदि, आदि। मैथिलीमे जत'-जत' रिक्तता बुझयलनि, अपन कलमसं भरबाक प्रयास कयलनि अछि आ सफल भेलाह अछि। बिसरल जाइत लोक साहित्यकें 'मैथिलीक लोक कथा' नामक पोथीमे परसलनि अछि।
राम लोचन ठाकुर कुशल अनुवादक छथि। अनुवादक प्राय: दस गोट पोथी प्रकाशित छनि। हिनक मूल लेखक आ अनुवादक, दुनू एक पर एक। हिनका द्वारा अनूदित कृति सेहो मौलिके सन लगैत छैक। एकर प्राय: इहो कारण छैक जे स्रोत भाषासं सोझे लक्ष्य भाषामे अनुवाद करैत छथि। एखनि मैथिली मे बड़ कम अनुवादक छथि, जनिका अनुवादमे संपर्क भाषाक खगता नहि होइत छनि। बांग्लासं अनूदित पोथी सभ छनि। जे महत्वपूर्ण वस्तु अपना भाषामे आनबाक खगता बुझयलनि, जे पूरे इमानदारीसं आनलनि। कहल गेलैए जे नीक अनुवाद वैह, जे पढ़ैत काल अनूदित सन नहि लागय। से, हिनका द्वारा अनूदित नाटक होअय, काव्य संग्रह होअय वा उपन्यास, उत्तम कोटिक अनुवाद मानल जा सकैत अछि। लक्ष्य भाषामे स्रोत भाषाक लोकोक्ति आ मुहावराक सटीक अनुवाद ताकबामे हिनक कारीगरी महत्वपूर्ण छनि। एहन देखल गेलैक अछि जे स्रोत भाषाक समाजक चलन-प्रचलनक अर्थ लक्ष्य भाषाक समाजमे उनटि जाइत छैक। ओहिठामक नीक एहिठाम अधलाह भ' जाइत छैक। ई अनुवादकक लेल चैलेंजक स्थिति भ' जाइत छैक। किछु अनुवादक एकर शार्टकट विकल्प ताकि ससरि जाइत छथि। एहना स्थिति मे अनुवादककें बेसी सतर्क होयबाक खगता होइत छनि। ई कहैत हर्ख होइत अछि जे राम लोचन ठाकुर अपन अनुवादमे एहन कोनो शार्टकट ताकि ससरलाह नहि अछि, जकर बानगी हिनका द्वारा अनूदित उपन्यास नन्दित नरके, पद्मानदीक माझी, कठपुतरी नाचक इतिकथा, अयाचीक संधान आ काव्य-संग्रह 'जा सकै छी, किन्तु किए जाउ' मे देखल जा सकैत अछि।
राम लोचन ठाकुर एकटा कुशल संपादक छथि। जखन बुझयलनि जे कवितामे रजनी-सजनी लिखल जाइत छैक, तं 1984 ई. मे 'आजुक कविता' नामक कविताक पोथीक संपादन क' कविताक चित्र स्पष्ट करबाक प्रयास कयलनि अछि। एहि पोथीमे सोमदेवसं विभूति आनन्द धरिक तेरह गोट कविक कविताक संकलन-संपादन क' कविताकें वर्तमान परिवेश प्रसूत मानसिकताक प्रतिफलनक रूपमे प्रस्तुत कयलनि अछि।
बहुत रास पत्र-पत्रिकाक संपादनक बाद हेबनि धरि 'मिथिला दर्शन'क कुशल संपादन कयलनि अछि।
अपन बेसी पोथीक प्रकाशक ओ स्वयं छथि। ओना मैथिलीमे ई बात मानल जाइत अछि जे लेखक स्वयं प्रकाशक होइत छथि। ई बात सांच सेहो अछि। मुदा, पूरा-पूरी सांच नहि। जाहि समय हिनक पोथी सभ अबैत छल, ताहि समय कलकत्तामे बहुत रास संस्था सभ छल। ई संस्था सभ बहुत रास पोथी छापलक। मुदा...अपन स्पष्टवादी स्वभाव आ ठाहिं-पठाहिं उचित-अनुचित कहैत रहबाक कारणें राम लोचन ठाकुर बहुत गोटेकें नहि पचलाह, बहुत संस्थो कें नहि। मुदा, एहि सभक परबाहि ओ कहियो ने कयलनि। लेखककें असल मान पाठके दैत छनि। से, पाठक हिनको मान-सम्मान देलकनि अछि। खूब पढ़ल गेलाह अछि। अपन धुनमे मस्त अपन उद्देश्यक लेल बढ़ैत रहलाह अछि। साहित्य आ समाजक गोलैसीसं फराक रहैत अखण्ड मिथिला आ मैथिली लेल सोचैत रहलाह अछि। मुदा, एहन-एहन गोलैसीकें इंगित करबामे चुकलाह नहि अछि। काव्य-संग्रह 'अपूर्वा'क स्मृति-चित्र शीर्षक कविताक ई पद देखल जा सकैछ- सुनह वियोगी कान दय भलमानुष के बात। मैथिलीक साहित्य मे सब सं पैघ गतात। राम लोचन ठाकुर ईमानदारीपूर्वक मिथिलाकें मिथिला लिखैत छथि। जिनका सभकें हिनकासं पत्राचार भेल छनि, सभ एहि बातसं सहमति होयताह । पत्र पर लिखल ठेकान पर जिलाक बाद मिथिला लिखैत छथि। जेना, जिला-बेगूसराय (मिथिला)। सभ ठाम एहि तरहक ठेकान लिखल देखैत रहबाक सपनाक संग राम लोचन ठाकुर एखनो जीबि रहल छथि। अपन क्रान्ति-यात्रामे मशाल बला हाथकें नोतैत जीबि रहल छथि।
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कामेश्वर झा "कमल"
श्री रामलोचन ठाकुर आ हुनक व्यापक काव्य संसार (रचना पढ़बाक लेल क्लिक करू)
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डॉ कैलाश कुमार मिश्र-संपर्क-9810326983
रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना
कोलकाता मिथिलासँ बाहर बहुत झमटगर सृजन भूमि रहल अछि मैथिली डायस्पोरा लेल। एकर स्पष्ट कारण शायद ई रहल अछि जे लोक कोलकाता तँ जरूर जाइत छलाह काजक तलाशमे मुदा आत्मासँ गामे रहैत छलाह। ऊपरसँ ओहि भूमिमे भेंट जाइत छलथिन गामक लोक, दोसर गामक सम्बंधी, हित-मित्र, जानकार आ कियोक नहि तँ मैथिली भाषा बजनिहार। बस भऽ जाइत छलनि आप्त प्रेम, सरोकार,परदेसमे अपन देसक लोक आ बात विचार। फेर बनि जाइत छल अड्डा नौकरीकेँ बादक नौकरी तकबाक भऽ जाइत छल ओ स्थान रोजगार कार्यालय। सब पुरान लोक लागि जाइत छलाह अपन-अपन तरीकासँ नौकरीकेँ जोगारमे। आ शुरू भऽ जाइत छल कविता साहित्य, नाटक, आदिक निर्माण । ई सब एहि लेल होइत छल जे लोक अपन गामक कमीक अनुभव नहि करथि। ओहुनासँस्कृति स्वभावसँ नॉस्टैल्जिक होइत अछि। नोस्टाल्जिया तखन अपन प्रभाव देखेतैक जखन लोक अपन जड़िसँ फुनगी दिस बढ़तैक। कोलकातामे सएह भेलैक। रामलोचन ठाकुर ओहिपरदेसमे देसक खोज करैत छलाह। मैथिली जेना हुनका भंगिया देने होनि! लगातार रचना आ बादमे पत्रिका केरसँपादन आ देखरेखमे व्यस्त रहला। की-की कएलनि से किनकोसँ छुपल नहि अछि।
आब अबैत छी रामलोचन ठाकुरक एक पोथीपर। पोथीक नाम छैक "मैथिली लोककथा"। नामे ज्ञाने ई कथा नेनपनसँ लेखककेँ सुनल कथा केर स्मरण करैत लिपिबद्ध करबाक यत्न कएल गेल छैक। निश्चित रूपसँ ई उत्तम प्रयोग आ पोथी छैक। कथा लोकक छैक। लोककंठसँ सुनल छैक तँ स्वाभाविक छैक जे कथापर लोकक अधिकार छैक। अहि पोथीमे कुल जमा 36 कथाकसँचयन छैक: 1. हिरामनि सुग्गा 2. अबकी बेर फतंग 3. महाराज बिक्रमादित्य4. गदहा खेने कोनो ने दोष 5. एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया 6. काजरि7. सदबा-बदबा 8. एकटा बुढ़िया रहय 9. एकटा गरीब बाभन रहथि 10. नारदमुनि आ सांप 11. लाल बुझक्कर 12. जामुन अन्त न पाबेउ 13. राभणो नतु रावण 14. मीतारे 15. ठठपाल 16. एकटा रहथि राजा 17. एकटा गरीब बाभन रहथि18. महाकाली19. पतिबरता 20. एगो रहथि राजा 21. चिन्ता रोग 22. हम देवी चंडिके23. एगो रहए जोलहा 24. चतुर भागिन 25. चिल्हो सियारो 26. शीत-बसंत 27. हंसराज-वंशराज28. झोड़ाकपरताप 29. मोहन बरही 30. पड़ोसियाक दुनू 31. चारबाह राजा 32. अहदी 33. कुल्टा34. दिलजान साहु35. गल हस्तेन धोधरः 36. लिखलाहालोक बहुत सहज आ बहुत जटिल शब्द छैक। एकरा सब कियोक बुझैत छी आ सब कियोक भ्रममे रहैत छी। एहेने भ्रमक स्थिति रामलोचन ठाकुरकेँ छनि। ओ पहिने शास्त्रीय, प्रमाण, हिंदी साहित्यक प्रमाण आ वैश्विक प्रमाणसँ लोक शब्दक व्याख्या सन्दर्भ-कथामे (अथवा भूमिका) करैत छथि। वृहद्विष्णुपुराणसँ शुरू करैत, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति होइत हज़ारीप्रसाद द्विवेदीसँग मैक्सिम गोर्की तक केर भाव स्पष्ट करैत हुनकर लोकक भावसँ पाठककेँ अवगत करेबाक लघु किन्तु गंभीर प्रयास करैत छथि. मुदा एक बात, हमरा बेर-बेर एना बुझना गेल जेना ओ लोकक अर्थ ओहेन जन सामान्यसँ बूइझ रहल होथि जे बहुत शिक्षित आ विकसित नहि होथि। ई लोकसँग साहित्य आ तथाकथित एडवांस विषय अथवा शास्त्रीय विचारधारा केर विद्वानक वायरस जकाँ अछि। लोक, लोककथा, लोकविद्या अलग-अलग बात भेल। लोकविद्या ओ विधा भेल जाहिमे लोक ज्ञान, लोक ज्योतिष, लोक चिकित्सा, लोककृषि, लोकगीत, लोकसँगीत, लोककथा, जेंडर स्टडीज, नूतन प्रयोग, श्रृंगार, समाज आदिक बातपर विचार होइत अछि। जकरा ई लोक कहैत छथि तकरा पश्चिमक लोक पोपुलर कहैत अछि। तखन लोक की भेल? लोक भेल एक निश्चित भूभागमे रहय बला मानव समुदाय जे अपन भाषा,सँस्कृति, प्रकृति, स्थानीय ज्ञान, परंपरासँग रहैत अछि जाहिमे स्त्री, पुरुख, बच्चा, बुढ़, सब कियोक अबैत छथि। जाहिमे माटिक लोक आ माटिसँ बाहर रहनिहार प्रवासी सेहो अबैत छथि। आजुक युगमे लोक एक प्रजातान्त्रिक समूह छैक। आजुक युगमे एक व्यक्ति लोक छथि आ वैह मॉडर्न अथवा शास्त्रीय सेहो छथि। तखन लोक भेल की? लोकक मादे ई प्रश्न एखनो ठाढ़े अछि।
लोक कहीं ओ तँ नहि जे लिखल नहि हो? आ शास्त्र ओ जे लिखल हो? नहि, ईहो बात नहि अछि। उपलब्ध ज्ञान आ डाटाबेस कहैत अछि जे मौखिकपरम्परा आ लोक अलग-अलग बात अछि। कतेक मौखिकपरम्परा एहेन अछि जे लोक नहि अछि, आ कतेक लिखितपरम्परा एहेन अछि जे लोक अछि। उदहारण स्वरुप वेद, उपनिषद तँ श्रुतिपरम्परा अछि मुदा लोक नहि अछि। सुकरात कहियो अपन बात नहि लिखलनि। ओ बजैत रहला आ हुनक शिष्य सब सुनैत रहल। ओ कहैत छलाह जे लिखलासँ ओहि बातक उपयोगिता खत्म भले नहि होइक लघु अवश्य भऽ जाइत छैक। ओ लिखित ज्ञानकेँसँग्रहालयमे राखल मृत वस्तुसँ तुलना करैत छथि। आर-त-आर रामलोचन ठाकुर जीक अहि पोथीक अंतिम कथाक नाम छनि "लिखलाहा"। लिखब केर अर्थ भेल ठोस प्रमाण; अंतिम सत्य; शब्द ब्रम्ह; अथवा तुलसीदासक रामचरितमानसक प्रसंगसँ बात करी तँ सत्यम शिवम् सुन्दरम। मुदा लिखब सेहो लोक भेल। विद्यापति अपन गीत अवश्य लिखने हेताह। बादमे ओकर महत्ता देखैत लोक ओकरा अपन कंठक चिपमे सदा सर्वदा हेतु सेव कऽ लेने हयत। ई भ्रम ओना तँ बहुत ठाम अछि मुदा भारत आ विशेष रूपसँ मिथिलामे अधिक अछि कारण जे लोकपर फोकलोर, एथनोग्राफी, मानवविज्ञान आदिक विद्वान सब काज नहि कऽ रहल छथि। अतेक स्पष्टीकरण देने बिना हम अपन बात कें आगा नहि कहि सकैत छी। ताहि कनि चर्च कएल।
आब पुनः पोथी दिस बढैत छी। कथा लिखित हो अथवा श्रौत जखन लोकमे अबैत छैक तँ लोक ओहि कथाक मूलकेँ रखैत अछि आ अपन ज्ञान, शब्दावली, भाव, भंगिमासँ ओकरा अपन अंदाजमे प्रस्तुत करैत अछि लोकक मादे मौखिक कथा सब दिन सब ठाम, नव शब्द सबसँ नित नूतन स्वरुप ग्रहण करैत छैक यद्यपि कथाक मूल भाव शास्वत रहैत छैक। लोककथा (वाचन कथा या कथा वाचन) मूलतः तीन ढंगसँ लिपिबद्ध होइत अछि:पहिल, ओहि समाजसँ कोनो बाहर केर व्यक्ति द्वारे। ई काज मानवविज्ञान, फोकलोर अथवा एथनोग्राफी केर लोक करैत छथि। हुनका एहेन ट्रेनिंग रहैत छनि जे जाहि तरहे कथा वाचक हुनका सुना रहल छथिन तहिना ओ लिखथि। ओहिमे कोनो तरहक सुधार अथवा अपना दिससँ किछु नहि जोड़ैथ।सँभव हो तँ एक कथा अलग-अलग व्यक्तिसँ सुनिक लिखथि। दोसर, कतेक स्थिति एहेन होइत छैक जखन लोक अपन समाजमे काज करैत छथि। मुदा हुनकासँ आशा ई रहैत अछि जे ओ ई बिसरि जाथि जे ओ ओहि समाजक हिस्सा थिकाह। आ गंभीरतासँ ओतबे लिखथि जे कथा वाचक अथवा वाचिका कहि रहल होथि। ई कनि सहज काज नहि छैक। लोक नहियो चाहैत पूर्वाग्रही भऽ सकैत छथि। एहि तरहक काज करेबला लोककेँ ऑटो- अन्थ्रोपोलोजिस्ट कहल जाईत छनि। चंदा झा आदि विद्यापति गीत लोकसँ सुनबाक क्रममे अहि धरमक पालन नहि कऽ सकल छलाह। मुदा तकर प्रयोजन अते नहि अछि. अहिपर विस्तारसँ कहियो लिखब.
तेसर, एहेन जे जखन लोक अपन समाजमे प्रचलित सुनल कथाकेँ बहुत दिनक बाद अपन स्मरणसँ लिखैत अछि। रामलोचन ठाकुर तेसर श्रेणीक लोक छथि। हिनको कथावाचक कहल जा सकैत अछि। कहल की जा सकैत अछि, ई छथिए। जेना कोनो कथा वाचक कथाकेँ अपन भाव, भंगिमा, आ शब्दावलीसँ मनोरंजक आ प्रभावी बना सुनबैत अछि तहिना ई कथा सबकें अपन श्बवालीसँ सजेने छथि। ओहिमे व्याकरण, आ श्ब्द्संयोजनासँ आकर्षण उत्पन्न केने छथि। ताहिं हिनक कथा मूल कथा बुझल जाए। उपरसँ अपन दाई पितियाइनसँ सुनने छथि से ई स्पष्ट करैत अछि जे कथापरम्परासँ एक पुस्तसँ दोसर पुस्त दने चलैत हिनका लग आबि गेल छनि। आब ई कथाकेँ कहि कऽ नहि लिख कऽ अपना पीढ़ी आ आबय बला पीढ़ीकेँ शास्वत प्रमाण केर रूपमे हस्तांतरित कऽ रहल छथि - चरैवेति- चरैवेतिक निनादसँ कथा बढ़ि रहल अछि।कहैत चली जे रामलोचन ठाकुर बहुत साकांक्ष भेल कथा लिख रहल छथि। कोनो कथा एहेन नहि भेटत जाहिमे ठोस आ ठेस मैथिली केर शब्दावली नहि भेटत। नीक तँ ई हएत जे आलेख केर अंत मे हिनका द्वारे व्यवहृत ठेठ शब्दक एक ग्लोसरी बना दी। मुदा ताहि अवस्थामे अएबाक हेतु अहि पोथीपर कमसँ कम तीन खेप लिखनाई जरुरी अछि। प्रमाणक रुपमे किछु शब्द कें देखल जा सकैत अछि:“पातर, ओजीर, भोजन-साजन, हेट, दिवड़ा भीड़, पएर दाबि, पहरुआ, दू टूक, करमान, कौआ टाहि, ईतस्ततः, फुरफुरा क उठल, यार कें बाझ,हरलनि ने फुरलनि, टहाटही, मन मेछंत, चौर-चाचर, लहालोट, अहर बीतल, पहर बीतल,ठकमुरी,घेंट,चिड़ै मड़ा कें,डिगडिगिया,हरबिड़रो,सीधा सम्मर,नग्र,बिसनाइत,पहरू सभ,फूलें-फलें माति उठल,गाजु,पोखरिक भीड़,ले बलैया,खा लौक,कन-साग,गदहा बौरि गेल,मिस पड़ै छल,गदहा डोभ चरन्त, झी-चाकर,बोरसी,धुरखुर,बरबरना,लगे दाढ़ी पड़ोसे छूरा,कपारपर टिटही मरडाइ छइ,उफांट,पतिया-पराछुत,किछु मुनियां,चीन,फूजल ऊक,खलोदर,दरेग,अगहरी पात,मन मेछंत,तरबाक लहरि टिकासन,ठेसी,मकुनीहाथी,डांरथि,चुट्टीक धारी, सितुआ चोख”एखन अतबे अहि पोथीपर लिखब सहज बात नहि अछि। एकर अनेक बिंदु, कहबाक शैली, बातक प्रमाणिकता, आ लेखक महोदय केर निष्ठा किछु एहेन बात अछि जाहिपर गंभीर भेने नहि लिखल जा सकैत अछि।
आब कथा दिस फेरो बढ़ी। जेना-जेना हिनकरसँकलित आ हिनक मस्तिष्क केर मेमोरीसँ निकसल कथा सभ पढ़ने जायब, एक पाठकक रूपमे लोक सङ्ग लोक भेल जायब। जेना लोकमे होइत छैक तहिना हिनको कथा सभमे प्रकृति अर्थात चिड़ै चुनमुन, जानवर सब बजैत छैक। बाजब प्रमाण छैक। अतेक ठोस प्रमाण जे प्रकृति केर मानवीकरण कखनो अहाँकेँ बनाबटी अथवा अनसोहात सन नहि लागत। लोककथामे नदीक प्रवाह, बटोहीक चलब, फुलवारी, सब किछु अबैत छैक। धोबिया घाट, ब्राह्मणक दरिद्रता, जोलहाक चतुराई, सब किछु अबैत छैक। लोककथा लोककेँ कथा सङ्ग जोड़ैत छैक। रसद सङ्ग चलैत बैलगाड़ी बनिया आदि सेहो अपन भूमिका सङ्ग रहैत छैक। लोककथा यथार्थक कल्पनाशीलता छैक। अहु बातक भान कथा सङ्ग एक गंभीर पाठक केर रूपमे अहाँ अवश्ये देख सकैत छी। लोककथा अपन भावकसँवेदना अनेक भाषा आ भाषाक प्रसंग जेना की फकड़ा , गीत, दोहा आदिक मादे प्रयुक्त होइत छैक। लोककथा अहि तरहें मोनोलॉग नहि मल्टी डायमेंशनल डायलाग होइत छैक। लोककथा एकरंगी विधवा परिधान नहि अपितु बहुरंगी चुनरी होइत छैक। अतय कनि कम साकांक्ष छथि रामलोचन ठाकुर जी। ओ गद्य जखन लिखैत छथि ताहि काल ओ अपन भाषासँ अलग लोकक आत्मामे नहि जा पबैत छथि। एकरा एना बुझु: कहियो कखनो मधुश्रावणी कथा सुनने हएब, अथवा गाम घरमे ककरो कथा सुनने हएब। ताहिमे अगर बनिया छैक तँ दोसर भाषा बजतैक। अगर पात्र दोसर भूमिकेँ छैक तँ कथा वाचक (अथवा वाचिका) ओकरा लेल अलग भषा केर प्रयोग करतैक। कथा वाचिक बात कहतैक, भंगिमा प्रदर्शित करतैक। ओ नाटकीयता कनि खटकि रहल छैक। मुदा रामलोचन ठाकुर एकरा लोकक एक ओहेन श्रेणी जे वाचिककेँ लिखितपरम्परामे बदलैत छथि, मूल कें यथावत रखने ओकर विन्यास आ सौंदर्यमे परिवर्तन करैत छथि तँ ईहो स्वीकार होबाक चाही।
मुदा जखने प्रसंग पद्यक अबैत छैक तँ लोकक निश्छल स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होमय लगैत छैक। उदाहरण स्वरूप "अबकी बेर फतंग" कथाकेँ देखू। ई कथा अपन शब्द शैलीमे स्मरणक पिटारासँ लिख रहल छथि लेखक । जहाँ की पद्य अबैत छैक लोक जेना जागि जाइत छैक:"थप्पा गनि-गनि रोटी पकओलनि गदहा ढोभ चरन्तघोड़ा बांस फसन्त निनिआ कहैत जे नेनिआ आएलिघर-पछुआर मे भुस्सा तइ मे ल गेल मुस्सा अबकी बेर फतंग" (पृ. 25 )
एहने सन भाव "गदहा खेने कोनो ने दोष" मे भेटैत छैक। ई एकर किछु मात्रक शब्दक दू आखर पूरा कथाक सीख बनि जाइत छैक। अंतिममे जखन ई कहैत छैक:"तीन राड़ एकसँतोष गदहा खेने कोनो ने दोष"
एकर आशय भेल जे तीन बुरीलेल (मुरखक बाहुल्य) अपन बेबकूफीसँ गलत काज करैत अछि तँ ओहिमे केहेन आश्चर्य! एकरसँदर्भसँ बुझक दरकार होइत छैक।
लोककथा गतिमान होइत छैक। कथा कहनहार आ सूनयबला दुनू गतिशील होइत छैक। गति सङ्ग जेना ट्रेन अथवा बसक सवारीमे खिड़की लगसँ नदी, पहाड़, झरना, धरतीक वैविध्य अबैत जाइत रहैत छैक आ यात्री गतिशील भेल रहैत अछि तहिना लोककथा केर कथानक पाठककेँ गतिशील बनने रहैत छैक। ई गतिशीलता कनि आरो डायनामिक भऽ जाई ताहि लेल गद्यमे पद्यक प्रवेश होइत छैक। रामलोचन जी बहुत गंभीरतासँ ई बात बुईझ पबैत छथि आ ओ पद्य सब हेरि अनैत छथि। एक उदाहरण "एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया"सँ देखल जाओ:
"बरदबला भाइ !परबत पहाड़पर खोंता रे खोंताभूखे मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइयातइलए पकड़ने जाइए "।
उपरोक्त पद पूरा कथाक आत्मा छैक आ पारिस्थिकीसँतुलन केर वेद मंत्र जेना काज क रहल छैक। कथाक पात्र मुनिया ई पद्य घोड़हिया, हाथीबला, आ खुद्दीबला सबसँ कहैत छैक आ ओकर समस्या केर समाधान भऽ जाइत छैक।
एक स्पष्ट उदाहरण देखू जाहिमे भावकसँवेदना आ कथ्यक गंभीरताकेँ डायनामिक बना भाषा केर देबार कोना तोड़ैत छैक श्रुतिकथा। ई पद्य "लालबुझक्कर" कथामे भेटत:"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पएर मे उखड़ि बान्हि कें हरिन चरक्का होइ।।"
कथा आगा बढ़ैत छैक। फेरो उपरोक्त पदक प्रथम पंक्ति केर बेस बनबैत दोसर पंक्ति केर मादे बात स्पष्ट होइत छैक :"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पहुँचे लगसँ काइट दो कि अपने बाहिर होइ।।"
आ अंततः कथा अपन यात्राक अंतिम पड़ाव दिस अबैत छैक:"लालबुझक्कर देखितहि बूझकि हो हाथी की अमरूद।"
बात बायोडायवर्सिटी केर लोककथा के मादेसँरक्षण केर बात करैत रही। एकर प्रमाण भेटैत अछि "जामुन अन्त न पाबेउ" नामक कथा मे। ई कथा अपन नामकरणसँ शुरू होइतसँस्कार धरि समस्त स्वरूपमे बायोडायवर्सिटीकेँ हारमनी प्रदर्शित करैत छैक। कोना लोक शास्त्रपर कखनोकाल बीस पड़ैत छैक आ कोना अपन पारिस्थितिकी ज्ञानसँ अब्बल होइत छैक तकर प्रमाण छैक ई कथा। जखन चारि दोस्त सामान्य वेश भूषामे राजा लग अबैत छैक त शास्त्रीय विद्वान लोकनि ओकरापर हँसैत छथिन। मुदा जखन ओ चारु लोकज्ञानी एक चारि पंक्ति केर पद्य मिल कऽ सुनबैत छैक त सभक होश उड़ि जाइत छैक। पद्य छैक:"जामुन अन्त न पाबेउ पीपर आनेउ नार उमर कटंती जानि क वर तर ठानेउ राड़।" आब कोना एकरा चारि मित्र कहैत छैक से देखल जाओ:"चारु दोस्त उठि क ठाढ़ भेल।पहिल कहलकै --- जामुन अन्त न पाबेउ दोसर कहलकै -- पीपर आनेउ नार तेसर कहलकै -- उमर कटंती जानि कचारिम कहलकै -- वर तर ठानेउ राड़।“ हमरा लगैत अछि ई कथा कनि विस्तृत विवरण आ विवेचना मँगैत छैक। से केना? एना जे किछु लोक जे अनेड़े लोकपर शास्त्र थोपने रहैत छथि आ अपना कें सर्वक्षेष्ठ स्थापित करैत छथि, एहेन लोकपर ई कथा निर्मम प्रहार छैक। ई कथा बतबैत छैक "सावधान भऽ जाऊ! लोक अहाँकेँ विद्याक सम्मान करैत अछि मुदा लोकक ज्ञान अगाध छैक। एकर विशालताकेँ अहूँ सम्मान करू। से नहि करब त लोक कखनो अहूँकेँ धोबिया पाट दऽ देत!"ई पोथी अनेक तरहें उपयोगी छैक। मैथिली साहित्य अनुरागी सब एकरा अधिकसँ अधिक पढ़थि। एकर अनेक पक्षपर बहुत गंभीरतासँ फैलसँ लिखबाक दरकार छैक। एहि पोथीपर एक अखिल भारतीय स्तरक सेमिनार आयोजित कएल जा सकैत अछि। एकर अनुवाद अनेक भाषामे होबाक चाही। हिंदी आ अंग्रेजीमे तुरत होबाक चाही। अहिपर बात होइत रहक चाही। एकर पट दरपरत खुजिते रहक चाही। एक एहेन मैथिली केर साधक रामलोचन ठाकुर जे एकरा अपनसँस्मरणसँ शब्द देलनि तिनका प्रतिसँवेदनशील भेनाइ हमर सभक सम्मिलित जवाबदेही अछि। एहि पोथीपर हम तँ लिखते रहब आरो लोक सब लिखथि।
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रमण कुमार सिंह-संपर्क-9711261789
मैथिली कविताक विद्रोही स्वर रामलोचन ठाकुर
मैथिलीक सुप्रसिद्ध आ निस्सन कवि रामलोचन ठाकुर संघर्षशील आ प्रतिरोधी चेतनाक प्रतिनिधि कवि छथि। ओ मैथिलीक अग्निजीवी पीढ़ीक संभवतः सबसं प्रखर कवि छथि। शिखा प्रकाशन, कोलकाता सं अग्निलेखन सं संबंधित जे साहित्य प्रकाशनक क्रम शुरू भेल छल, ओहि शृंखलाक पहिल पुष्प रामलोचन ठाकुर कें पोथी इतिहासहंता छल। एहि पोथीक प्रकाशनक पछाति मैथिली साहित्य-सरोवरक ठमकल पानि मे भारी हिलकोर उठल। कियैक त अग्निलेखन साहित्य यथास्थितिक प्रति अतिशय असहिष्णु छल। मार्क्सवादी चिंतन सं लैस संघर्ष-चेतनाक निर्माण लेल प्रतिबद्ध अग्निलेखन साहित्य में आक्रोशक तीक्ष्ण अभिव्यक्ति भेल छल। नक्सलवादी आंदोलन सं प्रभावित एहि पीढ़ी केर मानब छल जे नवनिर्माण लेल विध्वंस बहुत जरूरी अछि, कियैक तं सामाजिक-आर्थिक असमानता तखने खत्म भ सकैत अछि। तें कवि रामलोचन ठाकुर अपन कविता मे कहैत छथि-
विध्वंस मात्र विध्वंस
करत जे
पथ प्रशस्त
नव निर्माणक
नइ हैत जतय पुनि
अनाहार वा रंग-भेद
केओ ऊंच-नीच वा
छोट-पैघ । (1)
नाटक, निर्देशक आ एक गोट कविता शीर्षक कविता मे कवि जाहि मंच आ नाटकक मंचन के आख्यान कहैत छथि, ओ कोनो मिथकीय देशकाल केर नाटक नहि थिक, बरू अपने देशक तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक जीवनक वीभत्स यथार्थक आख्यान अछि, जतय दर्शक दीर्घा सं कोनो युवती कें उठा कें मंच पर ल गेल जाइत अछि आ ओखरा संगे लोकतंत्रक अभिनयक नाम पर कयल जाइत अछि सामूहिक बलात्कार। ई कविता पूर्णतः राजनीतिक कविता थिक जे नक्सलवादी आंदोलन केर दमन केर नग्न आ वीभत्स यथार्थ कें संवेदनशीलताक संग प्रस्तुत कयने छथि। एहि कविता कें पढ़ि हमरा महाश्वेता देवीक 1084 की मां उपन्यास मोन पड़ि जाइत अछि। एहि कविता मे ओपन्यासिक अथवा महाकाव्यात्मक विस्तारक संभावना अछि। किछु काव्य पंक्ति द्रष्टव्य अछि-
जखन मंच सं उतरैए
कुनू एक कलाकार
दर्शक दीर्घा सं उठा कें ल जाइए
एगो युवती कें
प्रतिवादी भाइक हत्याक पश्चात
मंच पर कएल जाइए ओकरा संग
सामूहिक बलात्कार
अभिनयक नाम पर
तैयो शांत-एकदम चुप्पी आ
आनन्दोन्मत अभिनेता सभ
क रहल ए गंरिथैया नाच (2)
देश कें आजादी जखन भेटल छल तं आम लोकक मोन मे उम्मेदक नव किरिण फूटल छल, मुदा थोड़बे काल पछाति देशक राजनीतिक व्यवस्था सं लोकक मोहभंग भ गेल आ ई प्रश्न उठय लागल जे एहन तरहक प्रजातांत्रिक व्यवस्था राजतांत्रिक व्यवस्था सं कोन तरहें भिन्न अछि। असल मे जखन सत्ता अधिनायकवादी चरित्र कें अपना भीतर अंगेजि लैत अछि, त ऊ सत्ता मात्र प्रदर्शन पर निर्भर रहि जाइत अछि, जाहि मे ढोल तं प्रजातंत्रक बजाओल जाइत अछि, मुदा ओहि मे जनजीवनक सरोकार कतहु नहि देखार दैत अछि। निहित स्वार्थ पर केंद्रित ई सत्ता नहि मात्र आत्म-मुग्धताक शिकार होइत अछि, अपितु निरीह जनताक शोषण आ दमन सेहो बर्बरता सं करैत अछि। अपन अग्रज कवि आ मैथिली मे अग्निजीवी आंदोलन के दिशा-निर्देशन करय बला कवि सोमदेव जी लेल लिखल अपन कविता अग्रजक नाम/प्रजातंत्र मे कवि लिखैत छथि-
आ आइ
हुनक (प्रधानमंत्रीक) सुपुत्रक जन्मदिनक अवसर पर
अमरावतीक सबसं पैघ
शीत-ताप नियंत्रित होटल मे
विराट पार्टीक आयोजन भेल अछि
कोरमा, पोलाव...
पानि जकां बहि रहल
विदेशी शराब
(कहियो एहि देश मे दूधक नदी बहैत छल)
समाजवादक लेल
गरीबी हटेबाक लेल
प्रत्येक दिन बान्हल जाइछ
नव-नव
प्रत्यक्ष आ अप्रत्यक्ष कर
आ शांति रक्षार्थ
रोजे होइए पुलिसक तांडव नृत्य (3)
रामलोचन ठाकुरक काव्य-भाषा एतेक विलक्षण आ बेधक अछि, जे सीधे मर्म धरि पहुंचैत अछि आ पाठक कें बेचैन क दैत अछि। हुनक एहि संग्रहक कविता सभक चरित्र भारतीय राजनीतिक व्यवस्था केर जन-विरोधी क्रियाकलाप सं उपजल अछि। सत्ता नहि खाली अपन विरोधी सभ कें दुश्मन मानैत अछि, बल्कि ओ सामासिक संस्कृति कें नष्ट करैत हिंसक रुख अख्तियार क लेने अछि। कवि रामलोचन ठाकुर एकटा सजग आ जिम्मेदार नागरिक जकां सत्ता के एहि जन-विरोधी क्रियाकलापक प्रति असहमति आ प्रतिरोध रचैत छथि आ बेहतर भविष्यक नव निर्माण लेल विध्वंस कें जरूरी बुझैत छथि। केहन लागत अहां कें शीर्षक कविता मे ओ सत्ताक हिंसक, बर्बर आ कुत्सित क्रियाकलाप कें बहुत संवेदनशीलता सं रेखांकित कयने छथि-
केहन लागत अहां कें
जं भनसाघर कुनू
कसाइखाना-कम-किचेन-कम रेस्टोरेंट
बनि गेल हो

अहांक अनुजक ससड़ी काटल खलड़ी ओदारल
देह झुलत हो पछुअति मे
ओकर टटका मांसक कबाब

टटका रक्तक शराब बेचल जाइत हो
त केहन लागत (4)
एहन राजनीतिक-सामाजिक वातावरण मे स्वाभाविक अछि जे लोक अपन भाषिक संवेदना आ ओकर आत्मीय संस्पर्श बिसरि जाय। अपन अग्रज कवि जीवकांतक लेल लिखल कविता मे कवि रामलोचन ठाकुर एहने दुखद आ दयनीय स्थिति कें रेखांकित करैत लिखैत छथि-
सरिपहुं हम नइ लिखि सकब
भरिसक ओ भाषा
जाइ मे लिखल जाइत छैक पत्र
अपन आत्मीयक नाम
हम बिसरि गेल छी। (5)
रामलोचन जीक काव्य स्वर एतेक तीक्ष्ण छनि जे बहुत रास यथास्थिवादी पाठक कें हुनक कविता नहि अघरतनि, मुदा सत्य के ठांय-पठांय कहबाक निर्भीकता आ यथास्थितिवादक प्रति असहमति दर्ज करायब हुनक काव्य-नायकक खास पहिचान थिक। जाहि देश मे कर्ण सन शूर-वीरक पराक्रम सं डेरायल व्यवस्था ओकरा अवैध संतान घोषित क दैत छैक, जतय कोनो आचार्य द्वारा एकलव्यक ओंठा काटि देल जाइत छैक, जतय तपस्या करै के अपराध मे कुनू शुद्रक हत्या मर्यादा पुरुषोत्तम द्वारा कयल जाइत छैक, आ अनेक तरहक अन्याय -अत्याचार होइत छैक, ओकर इतिहास पुराण के होलिकादाह करबाक आ ओहन रामराज्य पर थूकि देबाक आह्वान करैत कवि कहैत छथि जे-
समय आबि गेल अछि
हमरा सभ कें अपनहिं लिखबाक अइ
अपन इतिहास
जे सरिपहुं थिक संघर्षक
वर्ग संघर्षक
घुरा देबाक अइ ओकर अस्त्र
ओकरे दिस। (6)
रामलोचन ठाकुरक पहिल काव्य संग्रह इतिहासहंता मैथिलीक विद्रोही कविताक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। एहि संग्रह मे हुनक कथ्य, कहबाक नव ढंग आ काव्य-शिल्प बेछप अछि। हुनक रचनात्मक प्रौढ़ता, राजनीतिक यथार्थ केर नग्नता कें उद्घाटित करैत काव्य-विवेक आ सर्वहारा जीवनक छवि कें संवेदनशीलता सं चित्रित करैत कविता मैथिलीक काव्य-साहित्यक धरोहर थिक।
हुनक आरो कविता पोथी सभ प्रकाशित छनि आ सब संग्रह में हुनक एहने काव्य विशेषता परिलक्षित होइत अछि। माटि-पानिक गीत (1985), देशक नाम छलै सोन चिरैया (1986) , अपूर्वा (1996) आ लाख प्रश्न अनुत्तरित (2003), आदि हुनक आन काव्य-पोथी सभ प्रकाशित अछि। आंदोलन, रंगमंच, पत्रकारिता करैत अपन साहित्यिक सफर मे रामलोचन ठाकुर बहुत रास उकृष्ट साहित्य मैथिल समाज कें देलनि, मुदा मैथिल समाज हुनका ओकर प्रतिदाय नहि द सकल। अपन संपूर्ण जीवन ओ संत जकां एकनिष्ठ भाव सं मैथिली साहित्यक सेवा कयलनि। हुनक निष्ठा पर कहियो केओ संदेह नहि क सकैत अछि। आलोचकीय दृष्टि सं विचार करी, तं हुनक काव्य-रचनाक दू धारा परिलक्षित होइत अछि, जाहि मे सं एक धारा मे इतिहासहंता आ देशक नाम छलै सोन चिरैया, आ लाख प्रश्न अनुत्तरित केर कविता कें राखल जा सकैत अछि, त दोसर धारा मे माटि-पानिक गीत, अपूर्वा कें राखल जा सकैत अछि। ओ छंदबद्ध काव्य आ आधुनिक नव कविता दुनू लिखलनि। छंदबद्धता पद्यक मूल लक्षण होइत छैक, मुदा काव्यक नहि। एकरा एहि तरहें बूझल जा सकैत अछि जे जं पद्य आ काव्य एक्के होइतियै, तखन पूर्वआधुनिक वैद्यक, ज्योतिष आदि संबंधी ग्रंथ छंदोबद्ध हेबाक कारणें काव्य मे परिगणित होइतियै, मुदा ओकरा काव्य नहि मानल जाइत छैक। काव्य लेल काव्यात्मकता सबसं जरूरी छैक आ से गुण रामलोचन जीक आधुनिक काव्य मे भरपूर भेटैत अछि।
रामलोचन जी कविता आ छंदोबद्ध पद्यक अलावे धरगर व्यंग्य सेहो लिखने छथि। हुनक व्यंग्य रचना बेताल कथा (1981) कुमारेश काश्यप के नाम सं विदेह पब्लिकेशंस, कलकत्ता सं प्रकाशित अछि। एकर अलावे लेख आ संस्मरण विधा सं संबंधित हुनक रचना स्मृतिक धोखरल रंग (2004) , आंखि मुनने, आंखि खोलने (2005) सेहो प्रकाशित छनि। धिया-पुताक लेल मैथिली लोककथा (1983) लिखलनि आ बहुत रास अनुवाद एवं संपादननक काज सेहो करैत रहलाह। हुनक रचनादिक फेर सं परायण एवं अनुपलब्ध रचनाक प्रकाशन मैथिल समाजक जिम्मेदारी अछि। कियैक तं हुनकहि शब्द मे-'ओना इहो निर्विवाद अछि जे जे कोनो जाति अपन विभूति कें बिसरि जाइत अछि, ओकर अधःपतन अनिवार्य छैक। ' (7)
संदर्भ-
1-कविता-विध्वंस मात्र, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -11, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
2-कविता-नाटक, निर्देशक आ एक गोट कविता, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -13, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
3-कविता-अग्रजक नाम/प्रजातंत्र, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -17, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
4-कविता-केहन लागत अहां कें, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -19, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
5-कविता-हम बिसरि गेल छी, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -21, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
6-कविता-समानधर्माक लेल/ओना होइत त इएह आयल अछि, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -25, शिखा प्रकाशन, कोलकाता
7-मिथिलाक विभूति महाकवि डाक, रामलोचन ठाकुर, आंखि मुनने, आंखि खोलने, पृष्ठ -19, अरुणोदय प्रकाशन, बाबूपाली/कोलकाता
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डॉ अनमोल झा
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रामलोचन ठाकुरक काव्य-युद्ध
रामलोचन ठाकुरक रचना-संसार बहु-आयामी अछि। हिनक अनूदित नाटक (जादूगर) हास्य-व्यंग (बैताल-कथा) आ मैथिली लोक-कथाक संकलन दिस हिनक विशेष अभिरुचि चौंकबैत अछि। मैथिली आन्दोलनक प्रति कटिबद्धता, हिन्दीक साम्राज्यवादी कूटनीतिक विरोध, लोकभाषा-लोकसंस्कृति आ अग्निलेखनक प्रति क्रियाशीलता एकटा नीक पृष्ठभूमिक निर्माण करैछ, जकरा आधार पर हिनक व्यक्तित्व, कृतित्व, जीवन आ साहित्यक मूल्यांकन निकें-नाँ कयल जा सकैछ। मैथिलीमे अग्नि-लेखनक परम्पराकेँ अपन अशेष ऊर्जस्वितासँ सम्पोषित कयनिहार मैथिली आ साहित्यक ई सिपाही, गंभीरतापूर्वक मूल्यांकित नहि कयल जा सकलाह एखन-पर्यन्त, से मैथिली-आलोचना-क्षेत्रमे व्याप्त जड़ताक अलावे आर किछु नहि थिक। हिनक एखन धरिक जीवनक आन तरहक आ साहित्यक क्रियाकलापमे तादात्म्य परिलक्षित अछि। आ हिनक साहित्यकारक वैचारिक विकास-यात्रा तार्किक, वैज्ञानिक आ सुस्पष्ट अछि।
माओ-त्से-तुंग, हो-चि-मिन्ह, ब्रेख्त, पैट्रिक लुमुम्बा, लू शुन आ पाब्लो नेरुदाक कविताक मैथिलीमे आइसँ चौदह वर्ष पूर्व अनुवाद प्रस्तुत करबाक उद्देश्य, - दृष्टि सम्पन्नता आ प्रतिबद्धताक मादे बहुत किछु कहैत अछि। अपन अनूदित काव्य-पोथी ‘प्रतिध्वनि’मे ‘आजुक कविता’ आ कविताक मादे व्यक्त विचार हिनक जीवन-संघर्ष, जीवन-दर्शन आ लेखनक अनुकूलहिं अछि। पिरथीक विभिन्न भागक मनुक्खक संघर्षक एकरुपताक बात कयनिहारकेँ जँ अफ्रीका आ मिथिलाक संघर्षमे साम्य नजरि अबैत हो तँ से समीचीने थिक। ‘प्रतिध्वनि’क आमुखक शीर्षक ‘आजुक कविता’ राखब आ ताही शीर्षककेँ अपन सम्पादित काव्य-संग्रह (आजुक कविता)क शीर्षक पुनः बनायब, कवि-सम्पादकक एकटा विशेष आग्रह दिस इंगित करैत अछि। ओ अपन ‘मिथिला’केँ आजुक कविताक मादे जे वक्तव्य देलनि ‘प्रतिध्वनि’मे तकर नमूना वा झाँकी ‘आजुक कविता’(काव्य-संग्रह -सं॰)मे प्रस्तुत कयलनि अछि। ई एकटा योजना आ रणनीति थिक, जे कोनों योद्धासँ अपेक्षित रहैत अछि।
विदेशी-कविताक मैथिली-रूपान्तर ‘प्रतिध्वनि’ ‘मैथिलीक दधीचि बाबू भोलालाल दास आ वीर-रसक ऐतिहासिक कवि पं॰ राघवाचार्य’केँ समर्पित कयलनि अछि ठाकुरजी। अपन ‘मैथिली लोककथा’ नामक संकलन ‘अपना गामक डिहबार’केँ समर्पित कयलनि अछि। अपन काव्यपोथी ‘देसक नाम छलै सोनचिड़ैया’’ ठाकुर जी, ‘मुक्ति-युद्धक विगत, आगत ओ वर्तमान अनाम योद्धा-लोकनिकेँ अपन असीम श्रद्धा, सम्पूर्ण आस्था ओ विश्वासक संग’ - समर्पित कयलनि अछि। ई तीनू समर्पण अपना- आपमे बहुत किछु कहैत अछि आ हिनकर संघर्षशील छवि आ जनवादी तेवरकेँ सुस्थापित करैत अछि। हिनक विदेशी काव्यानुवाद आ लोक-कथाक चयन-दृष्टिकोण आ भाखाक स्वरूपो, हिनका ताहि रूपमे परिचित करैत अछि।
मैथिली कवितामे अग्नि-लेखन-युगक कटिबद्ध हस्ताक्षर ठाकुरजी रहल छथि। अभिनेता, निर्देशक, कथाकार रूपमे ‘अग्रदूत’, व्यंग्यकारक रूपमे ‘कुमारेश काश्यप’, मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष क्रांति आ विध्वंसक अवश्यंभाविताक चेता, ‘अग्निपत्र’क संपादक आ अग्नि लेखनक स्तंभ, स्वभाव आ विचारमे अद्भुत तादात्म्य, व्यवहारमे सुच्चा सर्वहारा - हिनक से परिचय स्थापित करैत ‘कुणाल’ अविश्वसनीय नहि लगैत छथि, तकर कारण ई जे, ठाकुरजीक वैचारिकता, व्यक्तित्व, जीवन-संघर्ष, क्रियाकलाप आ साहित्य आदि-आदिमे सुखद एकात्मकता अछि। ‘माटि-पानिक गीत’सँ सभ प्रेम नहि कऽ सकैछ। आजुक कविताक अनुसंधान, परिचय स्थापन, संकलन, संपादन, आयात-निर्यात कोनो दृष्टिसम्पन्ने हस्ताक्षर क’ सकैत अछि। मैथिली-मुक्ति मोर्चाक संयोजन-संचालन आ ‘सुल्फा’ उसाहब, सबहक बसक बात नहि थिक। कोनो क्रांति-चेतनाकेँ जिआयब, ओकरा हवा देब, ओकरा लेल जीयब-मरब आ ओकरा भूमि, संस्कृति, साहित्यमे स्थापित करबा लेल खून-पसेना एक करबाक नाँ जँ रामलोचन ठाकुर थिक, तँ ई नाँ हमरा पीढ़ीकेँ आश्वस्ति देबाक योग्यता रखैत अछि।
परिचयक एहेन निस्सन पृष्ठभूमिक आधार पर जखन हमरा लोकनि रामलोचन ठाकुरक कविताक पड़ताल करय बैसैत छी, तँ काव्य-सम्बन्धी हुनक मान्यता बूझब अनिवार्य भ’ जाइत अछि। ‘‘इतिहासहंता’’ कविक पहिल काव्यपोथी थिक, जकरा कुणाल ‘अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज’ मानलनि अछि आ हुनके माध्यमे हम सब मानि सकैत छी जे ठाकुरजी कविताकेँ मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक ‘यूटोपिया’ नहि मानैत छथि। क्रांति-विध्वंस आ नवनिर्माणक जमीन तैयार करबाक लेल, दिसाबोधक निर्देश करबाक लेल कविताकेँ ओ हथियार मानैत छथि।
‘इतिहासहंता’, हिनक पहिल काव्यपोथी (1972-77)क मध्य लीखल गेल कविताक संकलन थिक आ दोसर काव्य-पोथी ‘देशक नाम छलै सोनचिड़ैया’ (1971सँ 1985)धरिक कविताक संकलन थिक। स्पष्ट अछि जे दोसरो कृतिमे प्रारम्भिक कविताक समावेश भेल अछि आ पहिलमेसँ तँ अछिए। दोसरमे एहेन समावेशक पाछू विशेष आग्रह आ प्रतिबद्धता विचारणीय अछि, जे पहिल काव्य-पोथीमे स्थान किऐक नहि पाबि सकल?
ठाकुरजीक पहिल काव्यपोथीक कालखण्ड अत्यंत उथल-पुथलवला थिक, राजनीतिक रूपसँ। 1972सँ 1977ई॰ धरिक कालखण्ड पोखरण परमाणु-विस्फोट, जयप्रकाश आन्दोलन, आपातकाल आ जनता पार्टीक समारोहणक काल थिक। तें समय-सापेक्ष साहित्यमे तकर झलक भेटब स्वाभाविक थिक।
ठाकुरजी शास्त्र-पुराणक भ्रष्टाचार आ कर्मकाण्डी जटिलताक उचिते विरोध करैत छथि। तेहेन मिथकीय उदाहरण सभसँ हिनक दुनू पोथी भरल-पुरल अछि। मिथक सबहक शोषण ई साहित्य आ जनसामान्यक पक्षमे करैत छथि। हुनक सहानुभूति गरीब-गुरबा, भिखमंगा आ रिक्शाबलाक पक्षमे रहब अपेक्षित अछि। जनभाषा आ जनसंस्कृतिक प्रवक्ता ओ तेहने कट्टर छथि, जेहने किसुनजी नवकविताक छलाह। यथास्थितिक सभ व्यवस्थाक ध्वंस हुनका काम्य छनि। कोनो तरहक सुधारवाद वा संशोधनवादक ओ विपक्षी छथि। मुदा प्रलयोपरान्त नव सृष्टिक सिद्धान्तमे आस्था रखनिहार, भावनाक व्याख्यामे शब्दकेँ, मुदा, सक्षम नहि मानय, से आश्चर्यित करैत अछि।
हिनक अनेकानेक संबोधनात्मक आ उद्बोधनात्मक कविता अग्रज, अनुज आ समानधर्मा लोकनिक नाम लीखल गेल अछि। मिथिला-मैथिलीपरक कविता सभ वीर-रसक उद्रेक करैत अछि आ समर्पित सम्बोधनबला कविता सभ विकृतिक चित्रण करैत अपन वक्तव्य सेहो पाठक धरि सम्प्रेषित करैत अछि। मुदा कथ्य, शिल्प, भाव आ कलापक्ष, हिनक एहेन कविता सभमे, चरम उत्कर्ष प्राप्त नहि करैत अछि। अपन ‘इतिहासहंता’ नामक कवितामे कवि, क्रान्तिकारीगण आ क्रांति-भूमिक नाम गांथि क’ कविताक आरम्भ के कमजोर कयलनि अछि। अग्निलेखनक ओहि युगमे ‘भाला’, ‘लाल टुहटुह रक्त’ - आदि कवितामे आयब अस्वाभाविक नहि छल। व्यवस्थाक नाम चेतौनी फेकबाक आवश्यकता, ठाकरजी अपन दुनू पोथीकालमे बुझलनि अछि। पहिल पोथीक अधिकांश कविता जतय जीवनक सरलीकृत व्याख्या आ सपाटबयानीक शिकार भेल अछि, कविताकेँ अति-सहज बनयबाक अतिरिक्त उत्साहमे ततहि, ‘जेठुआमेघ’ आ ‘सांझ हमरा आङनमे’ आदि कवितामे काव्य-रसक उचित परिपाक भेल अछि।
नामपट, अग्रज-अनुज, भाइ, सम्बोधन-उद्बोधन, चेतौनी, पोस्टर, आह्वान, आशावादिता आदि अनेकानेक बेर दोहराओल गेल अछि, जे काव्यक सौंदर्य-बोधकेँ छिटकी मारैत अछि। हिनक दोसर काव्यपोथीक कालखण्ड जनता-पार्टीक बिखराव, इन्दिरा गाँधीक सत्ता-वापसी, हत्या आदि घटनाक्रमक बीचक अछि। सन् 1977 बादक मोहभंगक व्याख्या ‘मंत्र’ नामक कविता करैत अछि त’ समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीतिमे व्याप्त रङ-विरङकष् षडयंत्र आ छद्मशीलताक लेल जादूक छड़ी देखबैत अछि। ‘चारण हम ओकरहि छी’ - ठाकुरजीकेँ किरणजीक नजदीक ठाढ़ करैत अछि।
कए ठाम, कए टा कविता, उत्साहक अतिरेक थिक। जखन कविता पर भावना वा वैचारिकता-कोनो एक पक्ष हावी भ’ जाइत छैक, संतुलन डगमगा जाइत छैक आ वर्णनक शब्दजालमे कविता फँसय लगैत छै, त’ कथ्य आ काव्यरूप विकृत भ’ जाइत छै। धूमिलेक कथनकेँ लेल जाय त’ - ‘हरेक सही कविता ‘पहले’ एक सार्थक वक्तव्य होती है’ -सँ स्पष्ट अछि, जे कविताक बादमे ‘आर किछु’ आवश्यक रूपसँ होइत छै। मात्र वक्तव्य कविता नहि थिक आ धूमिलक एहि विचारमे ‘पहले’ शब्द महत्वपूर्ण अछि।
कविता समाजमे व्याप्त विकृतिक समीक्षा करैत अछि। साहित्य समाजक आलोचना थिक। मुदा कविताक स्वरूपमे ओकर मौलिक सौंदर्यबोध शाश्वत थिक आ रहत। एतहि काव्यक तेसर पक्ष, जे वस्तुतः पहिल पक्ष थिक, सोद्येश्यता आ प्रतिबद्धताक प्रासंगिकता महत्वपूर्ण भ’ जाइछ। तकरा संग काव्यक आन तत्वक तालमेल बैसायब आ तकर क्षमता, काव्योत्कर्षक चरम-बिन्दु अथवा स्खलन अथवा ‘सपाटबयानी’ तय करैत अछि। स्वतंत्रताक बादक सैंतीस बरखक लेखा-जोखा आ चौक पर कोनो माउगिकेँ नाङट करबाक विरोध काव्यक विषय अवश्य बनत, मुदा तकरा लेल काव्यभाषा आ साहित्यक सौंदर्य शास्त्रक उपयोग वा प्रयोग, आवश्यक अछि। कोनो राजनीतिक खलनायिकाक जीवनक वर्णनमे एगारह पृष्ठ अनेरो खर्चलासँ कविताक कोनो नव प्रतिमानक स्थापना नहि भ’ पबैछ। ओना तानाशाह वा खलनायिकाक विकृत जीवन पर लीखब, अग्निलेखनक परम्पराक अनुकूलहिं अछि।
रामलोचन ठाकुरक अपन भाषा-संस्कार छनि। तेहेन शब्द-सामर्थ्यक अछैतहुँ, अङरेजी शब्दक भरखरि उपयोग अनावश्यक रूपे भेल अछि। एहेन जनभाषा आ माटिपानिक सुगंधि-प्रेमी कविसँ, से अपेक्षा राखब कठिन अछि। किछु क्षणिका सूक्ष्म अर्थगर्भित आ किछु स्थूलकाय चलि सकैछ। मुदा एहेन क्रांतिधर्मी आ अग्निजीवी कविक ‘विधिक विधान’, ‘भाग्यफल’ वा ‘लिखलाहाक आगू चलिते छैक ककर वश’ आदि-आदि, कोनो तानाशाहक लेल व्यंगार्थ रखितो, शेष कविताक निहितार्थक संग तादात्म्य नहि स्थापित क’ पबैछ।
मुदा, किछु अपन नैसर्गिक सीमा आ किछु अग्निलेखनक सीमाक अछैतहुँ, कवि अपन जीवन-संघर्ष, साहित्य आ जीवन-दर्शनमे जाहि जीवट, इमानदारी, संघर्षशीलता आ प्रगतिवादक परिचय देलनि अछि, से अपन काल-सापेक्षतामे बहुत प्रासंगिक अछि। अपन समयक जड़ताकेँ तोड़बामे आ नवीन व्यवस्थाक स्थापनाक लेल जाहि कछमछीक ओ प्रदर्शन करैत छथि, से मिथिला, मैथिली, मानवता, समाज आ साहित्यकेँ बहुत-बहुत आश्वस्त करैत अछि। ठाकुरजी अपन आन्दोलनी जीवन, क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व आ प्रगतिवादी छविक अनुकूल कार्यलीन छथि आ तकर निर्वाह साहित्योमे इमानदारीक संग करब, कोनो न्यून बात नहि। जीवन आ साहित्यमे एहेन सामंजस्य किछुए साहित्यकार क’ पबैत छथि। आ ठाकुरजी एखनहुँ कएटा ‘अग्निकवि’ जकाँ ‘चुकलाह’ नहि अछि। अपन सम्पूर्ण सामर्थ्यक संग ओ गतिमान छथि। ठाकुरजीक अशेष ऊर्जस्विता, परवर्ती पीढ़ीक लेल प्रेरणास्पद भ’ सकैछ।
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आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759
पारंपरिक-प्रगतिशील
1
भगवान शंकर विरोधाभासक देवता छथि। गलामे साँप मुदा बेटा मयूर पोसने। संगमे बाघ मुदा बड़दक सवारी। योगशास्त्रक जन्मदाता मुदा पत्नी लेल पागल। एहन-एहन बहुत रास विरोधाभास छनि हुनका ओ हुनका परिवारमे। एहि विरोधाभासक बहुत ढ़ंगसँ परिभाषित कएल गेलै। कियो एहि विरोधाभासकेँ कोनो परिवारक मुखियाक रूपमे देखै छथि तँ कियो एकरा शंकरक जीवनमे अभवाक रूपमे चित्रित करै छथि।
2
विश्वास ओ अंधविश्वासमे की अंतर छै? अंतर अतबे जे कोनो एहन प्रथा वा एहन नियम जाहिसँ समाजकेँ वा केकरो हानि नै हो से भेल विश्वास आ एहन प्रथा वा नियम जाहिसँ समाज वा केकरो हानि होइ से भेल अंधविश्वास। तँ मानवक विरोधाभास जँ अपनामे रहै तँ ओ ओतेक खतरनाक नै छै जेना कियो नास्तिक छै मुदा ओकर घरक लोक पूजा करै छै वा केकरो कहलापर पूजामे प्रणाम कऽ लैत छै। मुदा जखन कियो अपन फायदा लेल बलि दै छै वा तेहने सन काज करैत छै तखन ई अंधविश्वास भेल।
साहित्यमे ई विश्वास-अंधविश्वास परिभाषित भऽ जाइत छै आचरणसँ। कोनो लेखक अपन आचरणमे जे रहैत छै (चाहे खराप किए ने हो) आ ओकर लेखनमे ओहने बात आबै छै तँ ओहि लेखककेँ नीक मानल जाइत छै आ एहिसँ समाजमे लेखनक प्रति सकारात्मक प्रभाव पड़ैत छै। रैदास-कबीरसँ लऽ कऽ तुलसीदास (उदाहरण स्वरूप) आदिक प्रभाव देखि सकै छी। मुदा जँ कोनो लेखक लिखित वा वाचिक तौरपर शोषित केर पक्षमे रहैत छै आ मनसा-कर्मणा शोषक केर पक्षमे तँ ई विरोधाभास पाखंडकेँ जन्म दैत छै आ समाज लेल हानिकारक होइत छै। अधिकांश आधुनिक लेखक लिखित तौरपर शोषित केर पक्षमे छथि तँ कर्ममे शोषक वा शोषक केर पक्षमे। तँइ वर्तमान समयमे समाज लेखन ओ लेखकपर संदेहक नजरिसँ देखै छै।
3
देवता सेहो एक तरहँक मानव छथि तँइ हुनके जकाँ मानव सेहो विरोधाभाषी होइत अछि। रामलोचन ठाकुर आन किछु हेबाकसँ पहिने मानव छथि तँइ हुनकोमे विरोधाभास हएब स्वाभाविक। केकरामे विरोधाभास नै छै? हमरा जनैत रामलोचनजीक सभ विरोधाभास मात्र समाजिक दायरामे रहल हेतनि तँइ ओ पाखंडकेँ जन्म नै दऽ सकल। समाजिक दायरासँ हमर मतलब जे दैनिक काज चलेबाक लेल जतेक समौझता एक सामान्य आदमी द्वारा कएल जाइत छै जेना कोनो पहिचान बलाक काज जल्दी कऽ देब, अपन पहिचानसँ कोनो सरकारी इस्कूलमे भर्ती करा देब आ एहने सन आन काज। रामलोचन ठाकुर सेहो अपन जीवनमे समाजिकता वश एहन समझौता केने हेता। मुदा ई समझौता पाखंडक जन्म नै दै छै। पाखंड तखन जन्मै छै जखन कि अपन सौख पूरा करबाक लेल वा कोनो भविष्यक लाभ लेल एहन समझौता कएल जाए। तँइ हुनक सभ विरोधाभास समाजक लेल हानिकारक एखन धरि नै भेलै। एखन धरि नै भेलै तँ निश्चिते ई मानल जा सकैए जे आगुओ नै हेतै।
लगभग एहने सन विरोधाभास हुनकर लेखनमे सेहो छनि। ओ केखन कोन रूप धऽ लेताह से नै जानि। केखनो अग्निलेखक बनि इतिहास हनन करए निकलि जाइत छथि तँ केखनो मिथिला इतिहासक वंदना करए लागै छथि। आन लेखक, आलोचक आदिकेँ हुनकर ई विरोधाभास बहुत अखरै छनि।
4
रामलोचन ठाकुर मूलतः साहित्यकार नै छलाह। ओ मूलतः मिथिला-मैथिलीक एक्टीभिस्ट छलाह। एक्टीभिस्टकेँ साहित्यकार हेबाक चाही वा कि नै, अथवा साहित्यकारकेँ एक्टीभिस्ट हेबाक चाही कि नै ताहिपर कियो एकमत नहि छथि। पहिने तँ इएह प्रश्न छै जे एक्टीभिस्टकेँ परिभाषा की छै तँ ओ परिभाषा जनसेवक केर नजदीक पहुँचै छै। आ ई जनसेवक पारंपरिक अर्थमे नेता धरि सेहो पहुँचै छै। मुदा ई एक्टीभिस्ट के भऽ सकैए? वर्तमानमे बहुत मैथिली साहित्यकार जे नौकरीक स्तरपर सेटल छथि (सरकारी नौकरी) ओ सभ कोनो मंचपर जा कऽ भाषण झाड़ि अबै छथि आ अपन नामक आगू एक्टीभिस्ट लगा लै छथि। एहन लोककेँ कतेक दूर धरि एक्टीभिस्ट छथि से समाज ओ समय तय करत मुदा एतेक निश्चित जे सरकारी नौकरीमे रहैत ओ सभ मात्र थ्योरी रूपमे एक्टीभिस्ट छथि प्रैक्टिकल नै। प्रैक्टीकल एक्टीभिस्ट बनबाक प्रयास उत्तर प्रदेशक आइ.पी.एस अमिताभ ठाकुर केने छलाह हुनका योगी सरकार नौकरी खत्म कऽ जबरदस्ती घर बैसा देलकनि। रहलै बात प्राइभेट नौकरी बलाक तँ ओ रविदिन कोनो संस्थाक कार्यक्रममे चलि जाइत छथि, कोनो सचिव-अध्यक्षसँ जान-पहिचान भऽ जाइत छनि आ ओ अपनाकेँ एक्टीभिस्ट मानि लै छथि।
जेना कि उपरे कहलहुँ जे रामलोचन जी मूलतः एक्टीभिस्ट छलाह साहित्यकार नै। शुरूआती दौरक एक्टीभिज्म लेल हुनका जे-जे आन चीजक जरूरति पड़लनि से-से ओ केलाह। मुदा जीवनक्रममे ओ सरकारी नौकरी केलाह आ क्रमशः ओ अपन एक्टीभिज्मकेँ रचनामे बदलि देलाह। जहिया हुनका बुझेलनि जे नाटक केलासँ मिथिला-मैथिलीक मुद्दा बेसी लोक लग जाएत तँ ओ नाटकमे एलाह। जखन हुनका बुझेलनि जे मिथिला-मैथिलीक मुद्दा कविताक माध्यमसँ बुद्धिजीवी लग जेतै तँ ओ कविता लिखलाह। जहिया बुझेलनि जे इतिहासक हनन केलासँ मिथिलाक भला हेतै तँ ओ इतिहासक हनन केलाह। जहिया हुनका बुझेलनि जे मिथिलाक वंदन केलासँ नीक हेतै तँ ओहो केलाह। कुल मिला कऽ ओ साहित्य लेल साहित्य केर रचना नै केलाह ओ अपन एक्टीभिज्म लेल अपन रचना केलाह। आ इएह कारण छै जे हुनकर रचनात्मक विचारधारामे घोर विरोधाभाषा देखाइत छै मुदा विरोधाभास नै छै कारण ओ सभ रचना ओ अपन एक्टीभिज्म लेल केने छथिन। हम एखन धरि जे लिखलहुँ ताहि आधारपर आन कोनो लेखक सेहो कहि सकैए जे हमर रचना हमर एक्टीभिज्मक अछि। मुदा धेआन देबए बला बात जे रामलोचन ठाकुर पहिने एक्टीभीस्ट छलाह। जँ पहिने ओ एक्टीभिस्ट नै रहितथि तखन निश्चिते हुनकर विरोधाभास केर आलोचना हम करितहुँ। आन लेखक केर रचनाक एक्टीभिज्म जँचबाक लेल हम इएह पैमाना रखने छी।
एकटा बात तँ निश्चिते जे रामलोचनजीकेँ एक्टीभिज्मक परिभाषा ओ सरकारी नौकरीक मर्यादा दूनू बुझल छलनि तँइ ओ नौकरी समयमे अपन एक्टीभिज्मकेँ बिसरि गेलाह। जँ ओ चाहितथि तँ नकली एक्टीभिस्ट जकाँ निर्वाह कऽ सकै छलाह मुदा से हुनका काम्य नै रहल हेतनि।
5
कुल मिला कऽ रामलोचनजीक साहित्य हुनकर एक्टीभिज्म लेल एकटा साधन छै साध्य नै। तँइ बहुत विरोधाभास छै। जँ कोनो आलोचककेँ हुनकर विचारधारामे ओझराहटि बुझाइत छनि तँ अही कारणसँ बुझाइत छनि। जँ आलोचक हुनकर एक्टीभिज्मक रस्तासँ हुनकर साहित्य धरि पहुँचए तखन फेर कोनो ओझराहटि नै हेतनि। साहित्यक तौरपर रामलोचनजीक सभ विचारधाराकेँ देखैत हुनका हम "पारंपरिक-प्रगतिशील" मानैत छी। ई "पारंपरिक-प्रगतिशील" शब्द युग्म मैथिलीमे नै अछि मुदा एकर प्रयोग हम रामलोचनजी लेल कऽ रहल छी। ई शब्दयुग्म हुनकर रचनाक सभ विचारधाराकेँ सामने राखि दैत अछि।
संपादकीय नोट-आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह ओ अनचिन्हार आखरपर रामलोचन ठाकुरजीसँ संबंधित अन्य सामग्री-
1) https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/313661235378678/
2) https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2012/05/blog-post_16.html
3) https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/316679568410178
4) https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2012/05/blog-post_22.html
5)https://sites.google.com/a/videha.com/videha/Home/Videha200.pdf?attredirects=0&d=1 , लिंक 1 ओ 2 एवं 3 ओ 4 केर सामग्री एकै अछि मुदा लिंक अलग-अलग।
उपरका लिंक सभ पढ़लाक बाद गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा रामलोचनजीक उपर एकटा तथ्य पढ़बाक लेल निच्चाक एहि लिंकपर जाउ-
https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_6385.html
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३. गद्य- पद्य
३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर (आत्म-कथा)
३.२.सुभाष कुमार कामत- फाटल जिंस
३.३.आनन्द दास “गौतम”-फाग
जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ सम्पर्क -8789616115
आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ( आत्म-कथा )
आँखिमे चित्र हो मैथिली केर
9.शुभे हो शुभे
हमर शुभचिन्तकगणमे प्रमुख हमर मामा सभ छलाह | मझिला मामा रहिका हाई स्कूलमे अध्यापक छलाह | हुनक परिचयक क्षेत्र व्यापक छलनि | ओ हमर घरक स्थितिसं अवगत छलाह |शनि दिन गाम जाइत काल हमरा गामक कैटोला चौक पर हमर सबहक समाचार प्राप्त करैत आ आवश्यक लगै छलनि त हमरा ओत’ सबहक भेंट-घांट करैत अपन गाम रुचौल जाइत छलाह |
मामा हमरा घरक समस्याकें दूर करबाक प्रयासमे लोकप्रिय समाधान ताक’मे लागल छलाह | सभ साल कोनो-ने-कोनो परिचित लोकक कन्यादान अथवा वरदानमे मदति करैत छलाह | तें एकर नीक अनुभव छलनि |
रहिकासं सौराठक दूरी कम छै |
सभ साल सौराठ-सभाक आयोजन ओहि समय होइत छलै जखन गाछमे आम पाक’ लगैत छलै | दस दिनक ई आयोजन दर्शनीय रहैत छल | मिथिलाक कोनो कोनमे बसैत मैथिल ब्राह्मण, सभ साल एको दिनक लेल एत’ अवश्य एबाक कोशिश करैत छलाह | ई सुनैत आएल छलहुँ जे जाहि दिन सबा लाख मैथिल जमा भ’ जाइ छथि, ओहि दिन ओत’ उपस्थित बरक गाछ मौला जाइ छै | इहो एकटा आकर्षणक विषय होइत छल | हमहूँ कय सालसं ककरो-ने-ककरो संगे एक दिन जाइत छलहुँ |
कन्यादान एकटा पैघ समस्या छलै | लोक कन्याक शिक्षाक लेल चिन्ता नहि करैत छल, एतबे शिक्षा जरूरी बुझैत छल जे चिट्ठी लीख’ आबि जाइ जे नोकरी करबा लेल कलकत्ता गेल अपन घरबलाकें चिट्ठी लिखि सकय | लोक कन्याक बियाहक लेल परिश्रम करैत छल | गामे-गामे अपनासं भिन्न गोत्रक उपयुक्त लड्काक तलाश करैत छल | एहिमे सालो लागि जाइ छलै |
सौराठ सभाक महत्वपूर्ण भूमिका छलै लोकक समस्याक निदानमे |
एहि ठाम विभिन्न गामक लोकसभसं एकेठाम भेंट भ’ जाइ छलै | विकल्प बहुत भेटि जाइ छलै |
मोन कें एकठाम स्थिर करबाक लेल अनुभवी लोकक आवश्यकता होइ छलै, सेहो एतय भेटि जाइ छलखिन | एहेन लोकक भूमिका सेहो महत्वपूर्ण होइत छलनि जे दुनू पक्षकें जनैत होथि अथवा दुनू पक्षकें अपन तर्कसं संतुष्ट क’ सकथि |सेहो एत’
भेटि जाइ छलखिन |
एहि सूत्रक उपयोग खूब कएल जाइत छलै जे कन्यादानमे कतहु झूठो बजलासं पाप नहि होइत छैक | कन्यादानमे कोनो तरहें मदति करब धर्म मानल जाइत छलै | तें कन्यागतक कोनो त्रुटिकें लोक झाँपि दैत छल | परिणामस्वरुप कयठाम अनमेल विवाह सेहो भ’ जाइत छलै | दिव्यांग लड़कीक सेहो विवाह भ’ जाइ छलै, मुदा विवाह भेलाक बाद कोनो लड़का कोनो लड़कीक त्याग नहि करैत छल आ ने स्वयं आत्महत्या करैत छल, ई छलै मिथिलाक संस्कृति | एहेन उदाहरण अछि जे एहेन परिवारमे सेहो एक-सं-एक विद्वान आ पुरुषार्थी लोक सभ भेलाह अछि |
कय बेर दिव्यांग लड़का सबहक सेहो विवाह भ’ जाइत छलै नीक लडकीक संग आ लड़की परम्पराक अनुरूप सभ पावनि करैत वरक दीर्घायु हेबाक कामना आ नीक संततिक प्रतीक्षा करैत छलीह | कियो हुनक पतिक शिकायत करनि त ओकरासं गप केनाइ बन्द क’ लैत छलीह |
विवाह भ’ गेलाक बाद सभ ई सोचि संतोष क’ लैत छल जे ओकरा भाग्यमे यैह लिखल छलै | लोक एकरा भगवानक निर्णय मानि लैत छल, तें मोन स्थिर भ’ जाइत छलै, पाछू नहि तकैत छल, आगाँ जे काज रहैत छलै, ताहिमे लागि जाइत छल | मधुश्रावनी कोना हेतै, कोजगरा कोना हेतै, जराउर कोना हेतै ई सभ सोच’ लगैत छल |
ई पैघ बात छलै |
घरसं बाहर जे युवक पढ़’ जाइत छलाह अथवा जिनका शहरक हावा लागि जाइत छलनि हुनका इच्छानुकूल विवाह नै भेलापर मोन स्थिर करबामे समय लगैत छलनि |
शहरमे सिनेमा छलै | उपन्यास छलै |
सिनेमा सिखबैत छलै, विवाहसं पहिने लड़की-लड़काक बीच प्रेम हेबाक चाही |
संस्कृति सिखबैत छलै, जकरासं विवाह होइ, ओकरासं प्रेम करक चाही |
परम्परा कहैत छलै, प्रेम-त्रेम नै करक चाही, स्त्रीकें जरूरतिसं बेशी महत्व नै देबाक चाही, ओकरा अपना काबूमे जातन द’ क’ राखक चाही |
हमरा सोझां कखनो क’ ‘कन्यादान’क बेचारा सी सी मिश्र आबि जाइत छलाह आ कखनो काल दूर, बहुत दूरसं दोसर बुच्ची दाइक स्वर सुनाइ देब’ लगैत छल :
‘तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब ........
एकदिन मामाक समाद पहुंचल, काल्हि अहाँ सभ तैयारे भ’ क’ अबै जाउ |
वरियातीकें ध्यानमे राखि किछु गोटेकें तैयार भ’क’ चल’ लेल अनुरोध कएल गेलनि | सभाक समय सभ घरमे नील-टिनोपाल द’ क’ लोक धोती-कुरता तैयार रखैत छलाह , की पता काल्हि ककर विवाह ठीक भ’ जाइ आ वरियाती जाए पडनि |
हमर शर्ट लोककें नीक नै लगलै | बच्चू भाइ झट द’ अपना घरसं प्रेस कएल एकटा शर्ट नेने एलाह | विवाह भेलाक बादे लोक नीक कपड़ा पहिरैत छल | वयसमे बच्चू भाइ हमरासं छोट छलाह, मुदा विवाह भ’ चुकल छलनि |
टोलक किछु गोटेक संग हम सभ पहुँचलहुँ सौराठ सभा |
भुस्कौलक एकटा परिचित भेटलाह | हमरे तुरिया छलाह | गप भेल | हिनकासं मामा गाममे कए बेर भेंट भेल छल | ओ हमरा नीक जकां जनैत छलाह | हुनका हमर पढाइक विषयमे सभ किछु बूझल छलनि | ओ एक गोटेसं परिचय करौलनि | हुनकर मुंह चिन्हार लगैत छल | आर. के. कॉलेज, मधुबनीमे प्री-साइंसमे दोसर सेक्शनमे छलाह | देखने रहियनि मुदा गप-शप नै भेल छल | आइ गप भेल | लदारी घर छनि | बहिनक विवाहक प्रयासमे छथि | हुनकर बड़का भाए आ बाबू सेहो गामक किछु गोटेक संग आएल छलखिन |
दोसर दिससं मामा एलाह, बाबू संग छलखिन | मामा अपन स्कूलक सचिव भिनाइ बाबू द्वारा अनुमोदित एकटा प्रस्तावक सूचना देलनि | पता चलल एखने जाहि व्यक्तिक संग परिचय भेल छल,हुनके बहिन छथिन कन्या |
मामा कन्या पक्षक बहुत गुणगान करैत हमरा आ हमर बाबूजीकें स्वीकार करबाक हेतु तैयार कर’ लगलाह | बाबू हमरा दिस तकैत छलाह, हमरा पर दबाब देब’ नै चाहैत छलाह | हम कन्याक पिताकें देखलाक बाद मामाकें कहि देलियनि जे ई कथा हमरा पसन्द नै अछि | हमरा बुझा गेल जे लड़की पढ़ल-लिखल नै छै | मामा लड़कीक पढाइ-लिखाइक सम्बन्धमे किछु नै कहैत छलाह |
मामाक किछु और परिचित लोक सभ आबि गेलाह | सभ हमरा बुझब’ लगलाह जे कुमरजी जे कहैत छथि ताहिपर आँखि मूनिक’ विश्वास कएल जा सकैत अछि, कथा काट’ योग्य नै छै | जे सभ कहियो लदारी नै गेल हेताह, सेहो सभ लडकीक शिक्षित हेबाक गारन्टी देब’ लगलाह | हमरा बूझल छल जे कन्याक विवाह लेल झूठो बाजब लोक धर्मक काज बुझैत छल | तें हम लोकक बातसं प्रभावित नै भ’ रहल छलहुँ |
बाबूजी गुम्म भ’ गेल छलाह | मामा दुखी भ’ गेल छलाह | बरियाती जाइ लेल जे गामपरसं तैयार भेल आएल छलाह ओहो सभ अगुता रहल छलाह, जल्दी नौ-छौ होइ | कन्यागतकें होइ छलनि जे कियो लड़की द’ गलत बात कहिक’ लड़काकें भड़का देलकैए | ओ सभ हमरा संतुष्ट करबाक लेल जोर लगा रहल छलाह |
सहसा मामा कहलनि तों तीन बेर हमरा कहि दैह जे हम एहि ठाम विवाह नै करब त आइ दिनसं हम एहि विवाहक चर्चे नै करब |
‘की ?’
‘नै’
‘नै?’
‘नै’
बाबू कहलखिन, छोडि दियौ देविन्दर, अहाँ परेशान नै होउ, हम किछु खेत बेचि देबै पढ़ाइक लेल, जबरदस्ती विवाह नै हेतै |
तखने देखलियनि एकटा मास्टर साहेबकें | हाइ स्कूलमे हमरा पढौने छलाह |चारि बरखक बाद आइ सभामे देखलियनि | प्रणाम केलियनि | मास्टर साहेब कहलनि, हमर बेटी पढ़ितो अछि आ घरक काज करबामे सेहो दक्ष अछि | हम आकर्षित भेलहुँ | मधुबनीक एकटा डॉक्टर साहेब जे हमरा आ मास्टर साहेब दूनू गोटेकें जनैत छलाह, मास्टर साहेबसं किछु विवरण प्राप्त कर’ लगलाह |
अही बीच एकाएक दुर्गा बाबू प्रगट भेलाह | मिडिल स्कूलमे पढौने छलाह | हमरा कने कात ल’ जाक’ कहलनि, कुमरजीक बात काटिक’ ठीक नै क’ रहल छह | हुनका कतेक दुःख भ’ रहल छनि, से नै सोचै छहक, आखिर तोरा किए ई कथा पसन्द नै छह ?
हम कहलियनि जे हमरा लगैत अछि जे लड़कीक शिक्षा शून्य छै, तें हमरा पसन्द नै अछि |
मास्टर साहेब कह’ लगलाह : ई तोहर भ्रम छह, जकरा पास एतेक सम्पति रह्तै तकर बेटी कतहु अशिक्षित होइ, हमरा पता अछि ओइ ठाम मिडिल स्कूल छै, हाइ स्कूल छै, ओहि गामक लड़की अशिक्षित भइए नै सकैत छै | तों व्यर्थ कुमरजी कें दुखी क’ रहल छहुन, आखिर जेठ-श्रेष्ठक आशीर्वाद प्राप्त करबाक चाही |
तेसर बेर मामा हमरासं पुछ्लनि : बाजह, की ?
हमर बकार बन्द भ’ गेल |
दुर्गा बाबू बजलाह : जाइ जाउ, सिद्धान्त लिखाउ |
चहल-पहल शुरू भ’ गेल | सभ गोटे विभिन्न दिशामे अलग-अलग काज लेल सक्रिय भ’ गेलाह |
एक गोटे, जिनका वरियाती नहि जेबाक छलनि, से अपन साइकिलसं समाद ल’क’ गाम पठाओल गेलाह |
पन्द्रह गोटे वरियाती जाइ लेल तैयार कएल गेलाह |
जे गामसं साइकिलसं आएल छलाह, से अपने साइकिलसं विदा भेलाह | शेष गोटेक लेल रिक्शाक व्यवस्था भेल | लदारीसं जे सभ साइकिलसं आएल छलाह, से निकलि गेलाह गाम समाद ल’क’ विधि-व्यवहार आ और वस्तुक ओरिआओन करयबा लेल |
एकटा रिक्शापर हमरा संगे लड़कीक पिता विदा भेलाह जे पचास बीघाक मालिक, सात बहिनक एकमात्र भाए आ दूटा शिक्षित पुत्र, तीन टा अशिक्षित कन्याक पिता छलाह |
सौराठसं रहिका, कपिलेश्वर स्थान, बसौली, औंसी, केवटी, दड़िमा होइत लदारी पहुँचबामे दू घंटासं बेशी लागल हेतै | बाटेमे रही त अन्हार भ’ गेल रहै |
हाजीपुर चौकसं थोड़े दूर पूब आबि आमक गाछी सबहक बीच होइत एकटा पोखरिक कात द’ क’ दरबज्जापर पहुंचलापर आंगनसं किछु हूलि-मालि सुनाइ पडल | एकर अतिरिक्त कोनो और आयोजन देखबामे नहि अबैत छल जाहिसं बुझाइ जे एत’ कोनो लड़कीक विवाह होम’ वला छै |
हमरा मोनक भीतर एकटा सी सी मिश्र परेशान भ’ रहल छलाह |
हम एकटा स्वचालित मशीन भ’ गेल छलहुँ |
हमरा किछु मधुर खुआक’ परिक्षण क’ क’ आंगन ल’ जाइ गेलीह, त हमरा भीतरक सी सी मिश्र और व्यथित भ’ गेलाह | बलि-वेदीपर चढ़बासं पहिने हम मामासं एक बेर सम्पर्क कर’ चाहलहुँ |
कोठलीक गेटक एक कात हम छलहुँ, दोसर कात मामा छलाह |
हम मामाकें कहलियनि जे लड़कीक विषयमे हमर अनुमान सही छल |
मामा न्यायाधीशक आसन धेलनि,’आब लड़की कनाहि होइ, घेघाहि होइ, चिन्ता करबाक काज नै छै | सभटा भगवानपर छोडि दहुन |’
आंगनमे लोक सभ चिन्तित छलाह जे कियो हमरा कहि देलक अछि जे लड़की कनाहि छै |
हम जे मामासं गप करैत छलहुँ त कियो नुकाक’ सुनबाक कोशिश केलनि आ हमरा मूंहसं एकटा शब्द ‘लड़की’ आ मामाक एकटा शब्द ‘कनाहि’, यैह दूटा शब्दकें मिलाक’ उपस्थित लघु कथाकार सभ तुरंत एकटा लघु कथा तैयार क’ लेलनि जे कियो लड़काकें भड़का देलकैए जे लडकी कनाहि छै | सी बी आइ तुरंत रिपोर्ट द’ देलकै जे ई काज फल्लाँ गामक लोकक अछि, ओ सभ एत’ विवाह कर’ चाहै छलै, नै भेलै तें ई उडा देलकै जे लड़की कनाहि छै, जाहिसं लड़का कहै जे हम वियाह नै करब |
दरबज्जापर हमर पिता चिन्तित छलाह | चिन्तित छलाह वरियातीमे आएल किछु लोक, हुनका होइ छलनि जे लड़का कहीं भागि ने जाइ अथवा कहीं ई ने कहि दै जे हम नै करब विवाह | एहेन स्थितिमे हुनकर सबहक की हाल हेतनि, एहि आस-पासमे कोनो कुटुम्ब नै छथिन जत’ जाक’ रहताह आ एते रातिमे पन्द्रह-बीस किलोमीटर गाम कोना घुरताह | हुनका सोझां कयटा सूनल कथा छलनि जे लड़का बेदीतरसं भागि गेलै अथवा भगा देल गेलै आ वरियाती सभ जेना-तेना अपन जान बचाक’ पडेलाह |
हमरा सोझां प्रगट भेलाह एकटा बड़का कल्लावला लोक मार्कंडेय ठाकुर,’ ठाकुरजी अहाँ पहिने हमरा कन्याकें देखि लिय’, कोनो त्रुटि बुझाय त नै करू विवाह |’
हम कहलियनि जे काज आगू बढ़ाउ, हमरा आब कोनो आपत्ति नै अछि |
तुरंत दृश्य बदलि गेलै | गीत-नाद शुरू भेल | पंडित जुगेश्वर झा अपन पोथी-पतरा ल’क’ आसन धेलनि, हजाम अपन काजमे लागि गेलाह |
बुच्ची दाइ, क्षमा करब,बच्ची दाइ अपने एतेटा घोघ तनने हमरा बगलमे छलीह |
हमरा भीतर एकटा बच्चा छल जकर बैलून फूटि गेल छलै आ ओ कानि रहल छल |
हमरा भीतर एकटा सी सी मिश्र छलाह जे एहि विवाहक आलोचना क’ रहल छलाह : जकर-जकर विवाह भ’ रहल छै ओ एक-दोसरकें देखबो ने केने अछि तखन एहि गीत-नाद आ मंत्रोच्चारक की प्रयोजन ?
हमरा भीतर अनिलजी छलाह जे गीत सुनबामे आ ओकर अर्थ बुझबामे लागल छलाह, ओहि गीत सभमे सुधार कर’ चाहैत छलाह, ओकरा स्थानपर नव रचनामे
लागल छलाह |
हमरा भीतर रहिका हाइ स्कूलक उप-प्रधानाध्यापक श्री देवेन्द्र कुमरक एकटा आज्ञाकारी भागिन छलाह जे पंडितजी जेना-जेना कहैत छलखिन, तेना-तेना केने जा रहल छलाह, जे-जे पढ्बैत छलखिन, से-से पढने जा रहल छलाह |
हमरा भीतर तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोलीक द्वितीय वर्षक एकटा छात्र छल जे पढ़ाइक खर्चक चिन्तासं मुक्त भ’ गेल छल किन्तु अपना चारुकात एकटा देबाल देखि रहल छल |
हमरा भीतर क्यो छल जे हमरा बुझा रहल छल, यैह कहबैत छै ‘भावी’, देखि लेलहुं ने, अहाँकें कुदला आ फनलासं की भेल, वैह भ’ रहल छै जे अस्तित्व चाहै छै |
आब हमरा आ हुनका स्थितिमे एतबे अंतर रहि गेल छल जे हम घोघ नहि तनने छलहुँ, ओ घोघ तनने छलीह |
( क्रमशः )
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सुभाष कुमार कामत
फाटल जिंस
दोसर पर एक आँगुर
उठाबै सँ पहिने
अपन चारि आँगुर दिस
सेहौ देखियौ
कोनो महिलाक पहिरल
पहनावा आओर फाटल जिंस देखि
अहाँक लाज आओर शर्म होएत अछि
मुदा हम पुरूख वर्ग
पहिरी फाटल जींस
आ नांगट रही
तँऽ समाजक कोनो हर्ज नै
कियाक तँऽ
अखनो पृत सतात्मक समाज अछि
सैह नऽ
आबि नै पहिरत
कोनो लड़की
फाटल जिंस
हम आश्वासन दै छी
मुदा ओं सँ पहिने
हमरा अहाँ ई आश्वासन दियै
जे हमर अहाँक बुद्धि विवेक
ओ फाटल जिंस सँ बेसी
चिथरा चिथरा भ गेलि अछि
ओ कहिया धरि
बदलब।
©सुभाष कुमार कामत
नौआबाखर, घोघरडीहा
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आनन्द दास “गौतम”
फागु
एलयफगुआ
फागुनके रंग, आई मचत हुड़दंग।
मुंह अछि पान आ मिजाजमे भंग।।
बाजै ढ़ोलक पर थाप, नाचय नटुआ।
एलय फगुआ, हो... एलय फगुआ।।
साईर सबके देखिते, गेलथि चौन्हरा।
पिचकारी ल' पाहुन, गेलथि ओन्घरा।।
सार सब देलकनि, एगो टोलीमे फंसा।
नटुआ संग नाचि-नाचि, भेलथि नटुआ।।
एलय फगुआ, हो...
भौजी देलथि गटकि, दु गो लस्सी गिलास।
रंग लगबति लेलथि, भायजीके किलास।।
फगुनिया फगुआयल, आबि कानमे बाजल।
आऊ होलीमे सासुर, मिलत भांगक पुआ।।
एलय फगुआ, हो...
(फगुनिया :भायजीके साईर)
मस्ती कोनों जुर्म नहि आ जोगीरा... इहो कोनों कम नहि।
गाल लाल अछि, चश्मा पीयर।
आऊ ना डिअर नियर।।
फागमे भंग संग, रंग मनायब।
हम अहीं दीदीक दीयर।।
जोगीरा... सर र ररर...
फगुनियाएलि बाहिर, त' मोनमे जागल आस।
या त' लागत गुलाल, या त' ठामहि सन्यास।।
फगुनिया शातिर खिलाड़ी, केने ख़ूब रास तैयारी।
फेक रंगक गुब्बार स', देलखिन्ह गर्दा उड़ा।।
एलय फगुआ, हो...
झुमका झमकदार देखि, जुआन बुढ़बो नाचथि।
मधुजाम लय बैसल कक्का, मोने मोन बाचथि।।
आई त' अपने हाथे, हमहुं खुएबै निमालपुआ।
एलखिन्ह य एहोलीमे गाम…,
आब हेतै…फगुए फगुआ, हेतै फगुए फगुआ।।
बाजै ढ़ोलकपर थाप, नाचै नटुआ।
एलय फगुआ, हो... एलय फगुआ।।
- आनन्ददास “गौतम”, "बाबाअंगना", नवानी,

Suggested citation: आमोद झा. “सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 319, 2021-04-01. https://www.videha.co.in/research/2021/319/सत्यक-एकपेरिया-पर-काव्य-वितान.htm

मूल विदेह अंक / Original issue