विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

कौशिकी जनपदक लोक-संस्कृति- इतिहासक शिकारी

अरविन्द ठाकुर · 2021-05-15 · अंक 322

२.२.मुन्नाजी- मुक्ति (बीहनि कथा)
२.३.सुभाष कुमार कामत- बीहनि कथा-अस्पताल
२.४.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)
२.५.नन्द विलास राय- जान-मे-जान आएल
अरविन्द ठाकुर
कौशिकी जनपदक लोक-संस्कृति- इतिहासक शिकारी
महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक एकटा कथन सं विषय-प्रवेश करैत चली। अचेबे कहने रहथि जे “जा तक हरिणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखता,ता तक हरिणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथासभ गाबल जाइत रहत”।
भारतीयसभ पर ई आरोप छनि जे ई सभ इतिहासक उपेक्षा कएलनि।देशक घटनासभ कें क्रमबद्ध लिखलनि नहि। पुरनका भारतीय साहित्य पर विहंगम दृष्टि फेरला पर मात्र पुराणहिसभ एहन ग्रंथ देखाइत अछि,जहि मे किछु पुरान घटना आ व्यक्तिसभक उल्लेख भेटैत अछि।फेर एकटा दीर्घ अन्तरालक बाद ई जिम्मेदारी विदेशी इतिहासकार लोकनि द्वारा निभाएल गेल अछि।कौशिकी जनपदक त दुर्भाग्यहिसभ सं वास्ता पड़ैत रहल अछि आ एकर आन-आन दुर्भाग्यसभक संग एकटा नमहर दुर्भाग्य इएह रहल अछि जे कहियो कोय व्यवस्थित रूप सं एहि क्षेत्र-विशेष कें केन्द्र मे राखि एकर इतिहास लिखबाक जिम्मेदारी नहि लेलक। एकर परिणाम वएह भेलए,जेकर चेतावनी चेनुआ अचेबे देने रहथि। इतिहासक कतिपय मध्ययुगीन-मानसिकताधारी पुरोहितसभ इतिहास आ मिथिहासक खिचड़ी कें अपन दुराग्रहक नून दए कए पकएलक आ इतिहासक नाम पर प्रपंच-गाथासभ लिखि कए ढेरिआए देलक। धर्म-ग्रंथसभ मे संस्कृतक पण्डितलोकनि सैंकड़ाक सैंकड़ा वर्ष सं समय-समय पर यथास्थान क्षेपकसभक प्रविष्टि कए एहि प्रपंच-गाथासभक पृष्टभूमि पहिनही सं तैयार कए कए राखनहि छला।पराश्रयी-बुद्धिजीविताक प्रतीक लकीरक फकीर विद्वानसभ आ महापण्डित पत्रकारसभ ओहि प्रपंच-गाथासभ कें जांचल-परखल उद्धरण मानि कए बेर-बेर ओकर हवाला देलनि,बेर-बेर ओकरा दोहरएलनि।स्थिति वएह भेल जे हिटलरक कुख्यात प्रचार-सहायक गोएबेल्स पैदा कएने छल।बेर-बेर दोहराएल जाए कए झूठ परम-सत्यक एहन रूप लए लेलक,जाहि मे सं सत्यक लेशहु निकालब घूराक नमहर सन बुताएल ढेरी सं कोनो नान्हि सन चिनगी वा सुइया कें खोजबाक सदृश्य कठिन भए गेलए।
कौशिकी जनपदक मूल-समाजक आमजन एहि वैचारिक साम्राज्यवादक प्रति सजग नहि छथि आ बुद्धिजीविता पर आइअहु अभिजात्यक कब्जा छै।एकटा जाति-विशेषक कतिपय सियासी-मिजाज धूर-धुरन्धर-गिरोह सुनियोजित तरीका सं इतिहासक एहि छ्द्म कें आधार बनाए कए ने मात्र अपन जातीय विधि-विधान कें एहि क्षेत्रक संस्कृति पर लाधबाक कुप्रयास कए रहल अछि,बल्कि विभिन्न जनपदसभ कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश मे हड़पि कए दाखिल करबाक आपराधिक कृत्य सेहो कए रहल अछि।जे काज धर्मग्रंथक मिथकीय चरित्र ‘जनक’ अपन सौंसे जीता-जिनगी मे नहि कए सकला,ओ काज वर्त्तमान युग मे हुनक बन्धुआ मानस-पुत्रलोकनि कए धरबाक ठानि लेने छथि।रामकथा पढनिहारसभ कें ओहि कथाक अनेक राजा-महाराजालोकनिक ओहि बात सं वाकिफ हएबाक अपेक्षा कएल जाएब वाजिब अछि जहि मे अयोध्या सन विशाल राज्यक राजकुमारक एतेक छोट-छीन राज्यक राजकुमारि सं विवाह हएबा पर अचरज व्यक्त कएल गेल छल।अजुका अचरज ई अछि जे त्रेतायुग मे जनकक राज भनहि अजुका कोनो ग्राम-पंचायतक क्षेत्रफलहु सं छोट रहल हुअए,कलियुग मे अपार क्षैतिक विस्तार लए कए महाविशाल भए गेल अछि आ एहि मे कौशिकी जनपदक गप के कहए,अंग-गंग-बंग आ अंगुत्तराप-पौण्ड्रवर्द्धण सहित छोटानागपुर आ मगध तक सम्मिलित भए गेल अछि।एहि नबका भूगोलक संग-संग एकर सांस्कृतिक उपनिवेशक विस्तार सेहो जारी अछि आ जं एकर राकेटीय-गति मे ब्रेक नहि लागलए त ई भारतक सुदूर दक्षिण तक टपि जाएत।इतिहास-भूगोलक जे दुर्दशा कएल जाए रहल अछि आ तहि सं बनल भ्रमक जे महाजाल पसरल अछि,तेकर परिणामक दू टा उदाहरण त कोसी-प्रतिष्ठानक एहि अयोजनक स्मारिका सं लेल जाए सकैत अछि।एहिमे एक ठाम ‘मधुबनी पेन्टिंग’क चर्चा करैत कहल गेल अछि जे ई वस्तुत: ‘मिथिला पेन्टिंग’ अछि आ दोसर ठाम कोशी-क्षेत्र कें मिथिलाक भाग कहल गेल अछि।जखनि स्वयं कें प्रगतिशील आ वैज्ञानिक चेतना सं लैस कहनिहार बुद्धिजीवी समाजक शीर्ष-दस्ता सेहो एहि प्रपंच-गाथासभक दबाव मे आबि भ्रमित भए सकैत अछि त ‘लिख लोढा,पढ पत्थर’बला आम लोक-वेदक कोन मोजर?सच्चाई ई छै जे ई पेन्टिंग निर्विवाद रूप सं मधुबनी पेन्टिंग छिऐ आ एकर नाम कें विवादग्रस्त करब,एकर नाम बदलब मधुबनी-क्षेत्रक अस्मिताक संग खेलौर करब,एकरा ठोकर मारब सदृश्य अछि।मधुबनीक अतिरिक्त आन कोनो एहन इलाका नहि अछि,जेतय ई कला घर-घरक संस्कृति बनल हुअए।ई अलग बात जे ललित नारायण मिश्र द्वारा रेल-मंत्रीक रूप मे देल गेल संरक्षण आ प्रोत्साहनक बाद एहि कलाक प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुंचल अछि आ एहि मे कमाईक संभावना देखि बिहारहि नहि,देशक आन-आन क्षेत्र मे सेहो एहि कलाक विकास भेल अछि,किन्तु छिऐ ई मधुबनीअहि पेन्टिंग।एहि तरहें ईहो निर्विवाद अछि जे पौराणिक मिथिलाक पूर्वी सीमा कोशी नदी अछि।एहन शास्त्रसम्मत सेहो अछि आ अकबरक एकटा पट्टा मे सेहो ‘अज कोसी ता बोसी’ लिखल जएबाक प्रमाण अछि। 1704 मे कोशी नदी पुर्णियां शहरक निकट रहए आ 1952 मे त्रियुगा (तिलयुगा) कें पार करैत तत्कालीन दरभंगा जिला मे घुसि गेल रहए।मने जे एहि 250 वर्ष मे कोशी 70 मील सीधे पच्छिम चलि आएल।मिथिला राज्य नामक कोनो वस्तुअ रहए,तेकर कोनो ऐतिहासिक प्रमाण वा साक्ष्य उप्लब्ध नहि अछि,किन्तु हजार वर्ष पहिनहुं निर्विवाद रूप सं कोशी नदीक अस्तित्व रहए। एतेक वर्ष पहिने जं कोनो मिथिला नामक राज्यक अस्तित्व रहबहु कएल हएतए त ओहि काल-विशेष मे ई नदी दरभंगहु सं बहुत-बहुत पच्छिम दिस बहैत हुअए त कोनो अचरजक गप नहि।तें कौशिकी जनपद कें कोनो मिथिलाक हिस्सा बताएब कोनो जातीय जिदक हिस्सा त भए सकैत अछि,तथ्य आ बुधियारीक हिस्सा त कथमपि नहि।ई आवश्यक नहि जे साहित्य आ पत्रकारिता सं जुड़ल लोक इतिहासहुक जानकार होथि,किन्तु ई लोकनि इतिहासक छद्म कें चिन्हथि आ एहि छद्मनिर्मित असत्य कें त्रुटिवशहु नहि दोहराबथि,एहि विवेकक अपेक्षा त हुनकासभ सं कएलहि जाए सकैत अछि।ई सभ बात विषय सं असम्बद्ध भनहि लागए,असम्बद्ध अछि नहि।एकर चर्चा एहु कारण सं आवश्यक अछि जे एकर आलोक मे कौशिकी जनपदक सन्दर्भ मे चेनुआ अचेबेक कथनक उपयोगिता/ प्रासंगिकता/ सत्यता देखल जाए सकए।देखल जाए सकए जे नागर,शिष्ट आ अभिजात साहित्य मे शिकारीसभक गाथा केहन निधोख आ निर्लज्ज भए कए गाबल जाए रहल अछि।
हरिणसभक शौर्य-गाथा
कौशिकी जनपद दिआ ई सत्य छै जे एकर भौगोलिक स्थिति विकट रहए।जंगल,नदी आ अनगिनत छाड़न नदी-धार आदिक कारण एहि क्षेत्र मे आवागमन एकटा विकट समस्या रहए।इएह कारण रहए जे पुरना समय मे वा त अधिकांश केन्द्रीय सत्तासभ एहिपर अपन आधिपत्यक प्रति रुचि नहि राखलक,चाहना नहि कएलक,आ जं कएबहु कएलक त एहि क्षेत्रक मूल-निवासी समुदायक जातीय मनिजन,सरदार वा सामन्त लोकनि केन्द्रीय सत्ताक एहि कामना कें फलीभूत नहि हुअए देलक।बादक कालावधि मे एकटा एहनहु व्यवस्थाक झलक देखाइत अछि,जाहि मे केन्द्रीय सत्ता कूटनीतिक-समझौताक तहत स्थानीय सरदारलोकनिकें अपन माध्यम बनाए कए एहि क्षेत्र पर अपन शासन कायम कएलक।एहि सम्बन्ध मे इतिहासक झिर्रीसभ सं आबैत किरिणसभ एतेक मद्धम अछि जे ओकर रोशनी मे वस्तुस्थिति कें ओकर वास्तविक आ सही रूप मे देख पाएब कठिन अछि।बुकानन हेमिल्टनक विभिन्न वृतांत आ पी सी रायचौधुरीक जिला गजेटियर मे यत्र-तत्र विभिन्न काल मे एहि क्षेत्रक स्वायत्त हएबाक सूत्र-संकेत भेटैत अछि,किन्तु ओसभ यथेष्ट नहि अछि।
एतहि जाए कए हमरासभ कें अभिजात्य साहित्यक आंचर छोड़ि कए लोकक शरण मे जएबाक बाध्यता बनैत अछि आ हमसभ देखए छी जे अभिजात्य साहित्य/इतिहास मे भनहि शिकारीसभक शौर्य-गाथासभ लिखित रूप मे गाबल जाइत रहल हुअए,हरिणसभ लोक-साहित्य मे अपन गाथासभ मौखिक परम्परा मे गाबि-गाबि कए एतहुका भुंइयां पर एहि तरहें टंकित कए देने छथि जे ओकरा मेटा पाएब सम्भव नहि।
स्मरण करैत चली जे सामान्यत: साहित्यक दू प्रकार मानल गेल अछि – शिष्ट साहित्य आ लोक साहित्य।शिष्ट वा नागर वा अभिजात साहित्य हमरासभक विवेच्य विषयक हिस्सा फिलहाल नहि अछि।लोक आ ओकर साहित्यक विचारणक दिशा मे आगू बढैत किछु विद्वानलोकनिक टिप्पणीसभ कें एतय उद्धृत करब प्रासंगिक हएत। ‘लोक’ कें परिभाषित करैत डा सत्येन्द्र कहए छथि – ‘लोक मनुष्य समाजक ओ वर्ग अछि जे आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाण्डित्य चेतना आ पाण्डित्यक अहंकार सं शून्य अछि आ जे एकटा परम्पराक प्रवाह मे जीवित रहैत अछि’ तथा ‘लोक एकटा एहन समुदाय अछि,जे आधुनिक सभ्यता एवं शिक्षा सं वंचित होइतहु प्राचीन विश्वास आ अनुष्ठानादि कें सुरक्षित राखने अछि’। डा हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक-साहित्य कें परिभाषित करैत कहए छथि – ‘एना मानि लेल जाए सकैत अछि जे जे वस्तुसभ लोकचित्त सं सीधे उत्पन्न भए सर्वसाधारण कें आन्दोलित ,चालित आ प्रभावित करैत अछि,वएह लोक-साहित्य, लोक-शिल्प,लोक-नाट्य,लोक-कथानक आदि नाम सं बजाएल जाए सकैत अछि’। ‘लोकचित्त’क अभिप्राय कें स्पष्ट करैत द्विवेदी जी आगू कहए छथि – ‘लोकचित्त सं तात्पर्य ओहि जनताक चित्त सं अछि,जे परम्परा-प्रथित आ बौद्धिक विवेचनापरक शास्त्रसभ आ ओहि पर कएल गेल टीका-टिप्पणीक साहित्य सं अपरिचित होइत अछि’।
कौशिकी जनपदक ओ काल,जे इतिहासक दृष्टि मे आएल,आ ओ काल जे ‘अन्धकार-युग’क कारण इतिहासक दृष्टि सं ओझल रहल,ओहि सभटा कालावधि मे अभिजात साहित्य जे कएने हो,किन्तु लोक-साहित्यक अजस्र धारा एहि सभ काल मे निर्बाध गति सं प्रस्फुटित आ नि:स्सरित होइत रहल अछि आ लोक-कंठक माध्यम सं जन-मन कें सिंचित करैत रहल अछि।
एहन एकटा लोक-गाथा आ ओकर नायक भीम केवट कें जानी-सुनी त ने मात्र गौरवपूर्ण आनन्दक अनुभूति सं मन भरि उठैत अछि,बल्कि एहि जनपदक समस्त संरचनात्मक वैविध्य अपन सम्पूर्ण ओजक संग आंखिक आगू जगमगाए उठैत अछि।वैशाली जनपद कें जं ‘जनतंत्रक जननी’ हएबाक सौभाग्य प्राप्त अछि त कौशिकी जनपद कें ‘जनतंत्रक सखा-सहायक’ आ ‘जनविद्रोहक सूत्रधार’ दुनू हएबाक गौरव प्राप्त अछि।
गुप्तवंशक अन्तिम राजा जीवितगुप्त द्वितीयक सन 725 मे पतनक बाद जे अराजकता आ मत्स्यन्यायक दुख:द दौर चलल,तहि सं तंग आ आजिज भए जनता-जनार्दन जखनि पालवंशक संस्थापक ‘गोपाल’क चयन कएलक त ओहि मे कौशिकी जनपदक सेहो नमहर आ महत्वपूर्ण भुमिका रहए।एहि जनपदक जातीय सरदारलोकनि ओकरा चुनबाक आ ओकर शासन-व्यवस्था मे सहयोग देबाक महत्वपूर्ण आ निर्णायक जिम्मेदारी निभएने छला।एहन एकटा वीरपुंगव ‘दिब्बोक’ छला,जे पाल शासकक प्रभावशाली सामन्त रहथि। अपन क्षेत्र कें व्यवस्थित आ विकसित करबा मे पाल शासक लोकनिक अवदान उल्लेखनीय अछि।किन्तु जखनि इएह पालवंशक शासक महिपाल सत्ताक मद मे बौराएल त इएह कौशिकी जनपद ओकरा चुनौती दए बैसल।एहि विद्रोह वा जनान्दोलनक नेतृत्व ‘भीम केवट’ कएने रहथि। कथा बतबैत अछि जे दिब्बोक आ हुनकर भातिज भीम केवट ने मात्र निषादलोकनिक बाइस उपजातिसभ कें एकजुट कए लामबन्द कएलनि,बल्कि एहि विद्रोह मे पौण्डरीक,कोंच,नागर आ दुसाध आदि जातिक लोक सेहो हुनकासभक संग मिलिकए लड़ल आ जीत सेहो हासिल कएलक।भीम केवटक शासन भनहि मात्र चारिअहि वर्ष तक चलल,किन्तु ई एहि बातक प्रमाण अछि जे एहि जनपदक मूल निवासीसभ मे निषाद बहुसंख्यक रहथि,बलशाली रहथि आ हुनकासभ कें अपन अस्मिताक पहचान सेहो रहनि।कथा मे किरातसभक संग भीम केवटक मुठभेड़क जिक्र सेहो आबैत अछि,जे महाभारत-कालीन किरात राजा विराटक जातिक एहि क्षेत्र मे सशक्त उपस्थिति कें दर्शाबैत अछि।ज्ञातव्य अछि जे एकलव्य एहि जातिक छला आ कोशी-गीत मे बहुचर्चित रन्नू सरदार सेहो। एहि क्षेत्र मे किरातक बहुलांशता आ हुनकासभक द्वारा लगभग दू सौ वर्ष तक एहि क्षेत्र पर शासन कएल जएबाक प्रमाण उप्लब्ध अछि।एहि जाति कें कालान्तर मे व्यवस्थाकारलोकनि शेष समाजक लेल त्याज्य आ कुपथ्य (बांतर) घोषित कए देलनि। अजुका समय मे ई जाति ‘बांतर’ नाम सं प्रसिद्ध अछि।
कौशिकी जनपदक लोक-गीत,लोक-भजन वा भगैत मे जननायक भीम केवट आइअहु जीवित छथि आ ठसकाक संग उपस्थित छथि। निषादसभक बाइसहु उपजाति मे हिनकर एकहि सनक लोक-गीत प्रचलित अछि।कोशी जनपद पर अपन महीन आ तीक्ष्ण दृष्टि राखनिहार विद्वान हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’क शब्द मे कही त –‘लोक-भाषा मे काव्यादिक संचय-संकलन त बहुलांश मे भेल अछि,किन्तु भीम कैवर्तक लोक-गाथा जातीय काव्य हएबाक चलते आइ तक उपयुक्त स्थान नहि पाबि सकल अछि।बाइस उपजातिक कंठ मे समाहित वीरपुंगव भीम कैवर्तक लोक-भजन मे अक्षय जीवनी-शक्ति अछि।बुद्धिजीवीलोकनि भनहि एहि गाथाक उपेक्षा कएलनि,किन्तु अति-पिछड़ल वर्गक एहि विशाल समुदाय मे,जे युग-युग सं पीड़ित,दलित,पराजित आ अपमानित रहल छथि, हुनकासभक अन्तस्तल मे भीम कैवर्तक गाथा बज्राक्षर मे अंकित अछि,भनहि ओकरा कागजक सादा पन्ना नहि भेटि सकल हुअए’।
लोक-गीत कोनो संस्कृतिक मुंह-बाजैत चित्र होइत अछि।भनहि हमसभ एकर रचनाक तिथि नहि तय कए पाबी, ई सभ अपन समयक दस्तावेज अछि।भीम केवटक गीत-गाथा जकां लौरिक मनियारक गीत सेहो तत्कालीन समाजिक संरचनाक चित्रमय रूप अछि।लौरिकक गाथा ओहि समय कें शब्द दैत अछि,जखनि 12म शताब्दीक आसपास पच्छिम भारतक नदीसभक सुखि जएबाक कारण भारी संख्यां मे पशुचारक समाजक लोक गंगाक कात-कात होइत कौशिकी जनपद मे आबि एतय अपन वास-स्थल बनबए छथि। लौरिकक कथा बतबैत अछि जे कौशिकी जनपद भीम केवटक काल सं आगू निकलि चुकल अछि।मत्स्यक्षेत्र आ वनक्षेत्र बहुत हद तक कृषि क्षेत्र मे परिवर्तित भए चुकल अछि।आवागमनक सुविधा पहिने सं बेहतर भेल अछि। किरात,निषाद आदिक क्षेत्र मे यादव आ परमारलोकनि अपन उपस्थिति बनाए लेने छथि।बेसी सम्भावना एहि बातक लागैत अछि जे पशुचारकलोकनिक नमहर समूहक आगमन सं एकाध सदी पहिने लौरिकक कथाकाल हुअए।एहि कथा मे प्राय: सभटा पात्र निम्न जातिक छथि। एकटा उघरा पमार नामक पात्र परमार वंशक कोनो चरित्रहीन आ उपद्रवी व्यक्ति प्रतीत होइत अछि,जे हरबा-बरबा दू भाइक कुटुम सेहो अछि आ ई हरबा नौहट्टाक( वर्त्तमान मे सहरसा जिलान्तर्गत एकटा प्रखण्ड) राजा छल।एकर अतिरिक्त एहि कथा मे दुहबी-सुहबी नामक दूटा ब्राह्माण कुमारीक चर्चा आबैत अछि।एहि सं अनुमान कएल जाए सकैत अछि जे ब्राह्मणलोकनिक छिटपुट उपस्थिति सेहो एहि क्षेत्र मे भए गेल रहए।कौशिकी जनपद मे प्रचलित लौरिक-गाथा मे विशेष बात ई अछि जे एहिमे वर्णित अनेक गाम वा त एहि जनपदक अछि वा पड़ोसी मधुबनी जिलाक।पात्रसभ मे निम्न(सोल्हकन) आ अतिनिम्न(दलित) जातिक लोक छथि जे एहि क्षेत्रक रहाइशक स्थिति कें पुष्ट करैत अछि जे ई इलाका हुनकहिसभक छल,आइअहु अछि,बस ओहिमे सवर्ण जातिक हल्लुक-सन दखल शुरू भए गेल अछि।कौशिकी जनपदक सुपौल आ सिंहेश्वर स्थानक बीच एकटा प्रसिद्ध गाम अछि – हरदी।एतय लोकदेव लौरिकक गढ रहल अछि आ तें गर्व सं एकरा हरदी गढ कहल जाइत अछि।एतहुक प्रसिद्ध वनदेवी लौरिकक अराध्या रहल छथि।लौरिकक स्मृति मे एतय प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसर पर विशाल मेला लागैत अछि आ ई स्मृति मेला एहि बातक साक्ष्य अछि जे लोक-समाज मे लौरिकक आइअहु कतेक सम्मान छै।लौरिक पर विभिन्न भाषा मे गीत-कथासभ पसरल अछि।भोजपुरी लौरिकायन मे लौरिक भनहि आतंक आ अपहरणक पर्याय रहल होथि,किन्तु कौशिकी जनपदक लौरिक-गाथा मे लौरिक दुष्ट-संहारक,सज्जन-उद्धारक आ अबला नारीक रक्षक छथि।लौरिकक ई लोकगाथा मात्र एक व्यक्तिक उत्थान-पतनक मार्मिक गाथा-मात्र नहि अछि,एहि क्षेत्र-विशेषक मूल-समाजक अस्मिताक गौरव-गान अछि। राजल धोबी,बारू दुसाध,बंठा चमार,गांगे क्षत्री सन-सन मित्र-पात्र हुअए वा करना कुम्हार,गज भीमल, कौल्हमकड़ा सन-सन शत्रु-पात्र,कथा मे एहिसभक बल आ पराक्रमक चर्चा अद्भुत छै।वर्णनक अतिरेकहु एतेक मोहक छै जे सुननिहार एकदम सं मन्त्रमुग्ध भए जाए।लौरिकक बियाह मे ओकर पिता कुब्बे सत्ताइस मन दूध पीबि जाइत अछि,सात सौ तौला दही चाटि जाइत अछि,सत्तर माठ सकरौरी सुड़कि लएत अछि आ आग्रह कएला पर एक सौ हांड़ी मलाइ कंठक नीचां उतारि लएत अछि।लौरिकक नव-ब्याहता मांजरि उठैत अछि त अकस्मात जेना बिजली छिटकैत अछि,आकासतारा पटोर लहराबैत अछि,माणिक-कंचुकी झलझलाए उठैत अछि,रतन-नथिया हिलैत अछि,मणिमय-कुंडल झुलैत अछि आ बज्र-चूड़ी झनझनाए उठैत अछि।एहि लोक-गाथाक एहेन अनेक प्रसंग सुनि कए एकर अज्ञात रचनाकारक प्रति अनायासहि अनन्त श्रद्धा सं माथ झुकि जाइत अछि।
लोक देव-देवीसभक अवतरण
कौशिकी जनपदक मानस-भूमि लोक-नायकलोकनिक संग-संग लोक-देव-देवीसभक अनेक गाथा-गीतसभ सं आप्लावित अछि।एहि देव-देवीसभ मे एहि जनपदक त्रस्त-मानस ने मात्र आसरा लेलक अछि,बल्कि हुनकासभ सं संघर्ष आ पुरुषार्थक सीख आ प्रेरणा सेहो ग्रहण कएलक अछि।एहि मे धार्मिकता कें सेहो एक कारकक रूप मे देखल जाए सकैत अछि,किन्तु एकटा स्पष्ट रेखा एहि धार्मिकता कें अभिजात्य आ लोक मे विभाजित सेहो करैत अछि।एहि मे संशय नहि जे धर्मक उत्पत्तिक जड़ि मे भय रहए। आकाश मे बिजली तड़कल,वर्षा हुअए लागलए, ओला खसलए,अन्धर उमड़ि पड़ल,जल-प्लावन भए गेलए आ आदिकालक मनुष्य भयभीत भए गेल। ई बुझि पाएब कठिन रहए जे एहि प्राकृतिक प्रकोपी खेलक पाछू कारण की छै।भयाक्रान्त भए कए ओसभ कोनो अज्ञात शक्ति कें एकर कारण मानि लेलक आ ओकरा सुविधानुसार देव वा दानवक नाम दए देलक। निवारणार्थ ओसभ किछु टोटका गढलक आ पूजादिक पद्धति बनएलक।प्राकृतिक क्रीड़ासभक अतिरिक्त भौगोलिक परिस्थिति, हिंसक जीव-जन्तु,दैहिक बीमारीसभक बीच अपन अस्तित्वक रक्षाक लेल सेहो मनुष्य एहि दैवी-शक्तिसभक शरण गहलक।मानव-जीवनक आदिम चरण आ बादहु मे स्त्री आ भूमि कें लए कए संघर्षक स्थिति बनैत रहल।संघर्ष मे विजय-प्राप्ति आ भविष्यहु मे विजयी हएबाक कामना,पराजित पक्ष द्वारा बदला लेबाक आ विजयी हएबाक अभिलाषा सेहो अज्ञात-शक्तिसभक कल्पना कें सुदृढ कएलक।कालान्तर मे एकर दू धारा बनि गेल। अभिजात्य पुराणादिक माध्यम सं अपन देवी-देवता रचलक त लोक भिन्न देवक कल्पना रचलक। अभिजात्य त अपन अनदेखल आ काल्पनिक देव-देवीसभ मे ओझराएल रहि गेल,किन्तु लोक ओहि सं आगू बढि प्रत्यक्ष आ साक्षात नायकलोकनि मे अपन देवसभक स्थापना कए लेलक।एहि ‘लोक’ मे सेहो पहिने कबीला आ फेर जातिसभक आधार पर भिन्न-भिन्न देव-देवीसभक विभाजन होइत रहल आ संग-संग हुनकसभक गाथासभ प्रवहमान होइत रहल।कौशिकी जनपदक लोक चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज, छेछना डोम,दीना भदरी,सलहेस,अमर बाबा,उगरी महाराज,कारू खिरहर,खेदन महाराज,सोनाय महाराज, स्वरूप महाराज,बीशू राउत सन अनेक देवलोकनिक आराधना-गाथासभ मे विभोर भए गेल।
डा विश्वनाथ झा एहि लोकदेवसभक सम्बन्ध मे किछु स्थापनासभ देने छथि,जे एहि प्रकार अछि – (1) लोकदेवी-देवतासभक उदय ब्राह्मणवादक विरोध मे भेल अछि। हिनकरसभक पूजोपासना मे कर्मकाण्डीय आडम्बरसभक अभाव अछि। हिनकर निजी पहचान सहजोपासना अछि। (2)सांस्कृतिक पृष्टभूमि मे एकर आधार जातीय अछि। (3) हिनकर प्रतिष्ठा अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़ल जातिसभ मे अपेक्षाकृत बेसी अछि। (4)हिनकरसभक पूजोपासना राग-ताल एवं लय-छन्द मे निबद्ध अछि।एहि सं सम्बद्ध गीत-गाथा,नृत्य-संगीत, चित्र-मूर्ति,लोकोत्सव आदि एकर प्रमाण अछि। (5) ई जातीय-सोच,कलात्मक-संचेतना,सामाजिक-आचार आदि कें बढावा देलक अछि।
जं पुर्वाग्रह वा दुराग्रह नहि हुअए त डा विश्वनाथ झाक एहि स्थापनासभ सं असहमत हएबाक कोनोटा कारण नहि देखाइत अछि।एतबहि नहि, जं दृष्टि मे ईमान हुअए,ओहि पर अभिजात्यक मोतियाबिन्द नहि चढल हुअए त कौशिकी जनपदक परिपेक्ष्य मे ई बात साफ-साफ देखाइत अछि जे ई जनपद लग-पासक जनपदहि सं नहि, दूर-दराजक जनपदहुसभ सं एकदम अलहदा,अनन्य आ विशिष्ट अछि।ई बहुत स्पष्ट अछि जे कौशिकी जनपद मे लोक-नायक,देव-देवीसभक विभिन्न गाथासभक धारा ने मात्र अभिजात्यक धाराक समानान्तर अछि,बल्कि एहिमे अभिजात्य-धाराक प्रति नकार आ प्रबल प्रतिद्वन्द्विताक भाव उपस्थित अछि।एक दिस अभिजात्य सुन्दरीसभक अनूप-रूप,ओकर कदली-जंघा आ ओकर कूचद्वयक दृढ-उतुंगतादिक वर्णन कए अपन प्रतिपालक सामन्तलोकनिक महफिल कें रौनक दए रहल छल त दोसर दिस लोक अपन क्षत-विक्षत जीवन कें गीतसभ मे ढालि ओहि सं अपार जीजिविषा ग्रहण कए रहल छल। अभिजात्य लग अभिसारिका छल त लोक लग कोशी छल। अभिजात्य लग गिनल-गूथल सत्तासीन नायक रहए त लोक लग ओकर समानान्तर अनगिनत संघर्षशील नायकसभक फौज रहए। अभिजात्यक भीम जं चालीस हाथीक बल राखैत छल आ पवनतनय हनुमानक बल पवन-समाना रहए त लौरिक मनियारक खण्डा सेहो अस्सी मनक आ रन्नू सरदारक कोदारि अस्सी मनक त रहबे करए,ओहि कोदारि मे बेरासी मनक बेंट सेहो लागल रहए। ई रन्नू सरदार भैंसा सन मरद छै,जेकर देह बज्र सन छै आ ओकर मोंछ बांसक बत्ती सं बनल बहिंगा सन। अद्भुत!
कोशी-गीतसभक भाव-वैविध्य
लोक-नायक आ विविध लोकदेवी-देवसभक गीत-गाथासभक अतिरिक्त जे चीज कौशिकी जनपद कें खास आ अनन्य बनबैत अछि,से अछि कोशी नदी आ एहि क्षेत्रक जन-मन मे अदौं-अदौं सं बसल ओकरा सं सम्बन्धित कोशी-गीत।
“कोसी-जनित विषम परिस्थितिसभक चपेट मे पड़ल कोसी निवासीसभक आकुल-व्याकुल प्राण सं आह रूप मे नि:सृत उच्छवास-गीतसभ मे ओकरसभक आक्रान्त जीवन अपन सर्वांगीन रूप मे सजीव भए उठल अछि।एतय जीवन दुखहु मे गतिपूर्ण अछि।ई दुखक पहाड़ सं टकराबैत अछि,खसैत अछि,खसि-खसि कए उठैत अछि आ फेर ओहि पहाड़क चोटी पर चढि कए मुस्काबैत अछि।विपत्तिसभक अनेक झंझावातक बीच पड़ल एकर जीवन-नैया लड़खड़ाइत अछि,लहरिसभक प्रचण्डता एकर साहसिकता कें डेग-डेग पर धोखा देबए चाहैत अछि,कष्टसभक दलदल मे पड़ि कए नैया रहरहां फंसि जाइत अछि,तखनिअहु अलमस्त नाविक मस्त तरानासभक संग बढितहि जाइत अछि,एकटा वीर योद्धा जकां दुख आ विपत्तिसभ सं मोर्चा लएत रहैत।कठिन जीवनक एहि दुर्गम घाटीसभ सं बहैत एहि कोसी-गीतसभ मे कोसी निवासीसभक जीवनक प्रचूर अभिव्यक्ति भेल अछि।प्रलयंकर बाढि,उफनाइत लहरसभ,घहराइत तूफान सं लादल पूजा-गीतसभ मे हमसभ पाबए छी कोसी निवासीसभक ईश्वर पर दृढ विश्वास,जे दुखक अनवरत झंझावातहु मे अटल रहैत अछि। निरुपाय,असहाय,निरबलम्ब कोसी निवासीसभक स्वानुभूत सुख-दुखसभ सं परिप्लावित,मधुत भावनापन्न कोसी-गीतसभ कें हृदयंगम कए सहसा एहन बोध होइत अछि जे एतहुका बच्चा-बच्चा प्रकृतिक विकरालता सं संत्रस्त होइतहु ओकरा चुनौती दएत, दुखसभ सं पराजित होइतहु पराजय कें चिढबैत,अनन्त विपत्ति मे पड़ितहु ओकरा ललकारा दएत गौरवपूर्ण भाव सं कवीन्द्र रवीन्द्रक शब्द मे अन्तर्मनक भावात्मक अभिव्यक्ति करैत घोषणा कए रहल अछि – ‘हे दिव्यधामी देवतालोकनि! तोरे जकां हमहुसभ अमृतक पुत्र छी,हमहुसभ अमृतक पुत्र छी’।“
कोशी-गीतसभ दिआ किछु कहबाक लेल एहि सं नीक कोनो शब्द आ अभिव्यक्ति नहि भए सकैत अछि,जे उपरोक्त पंक्तिसभ मे कोसी-गीतक संकलनकर्त्ता ब्रजेश्वर मल्लिक जी अनेक दशक पुर्व कहलनि।ई कोशी-गीतसभ जेना एहि जनपदक मानसक गाबैत-बतिआबैत दस्तावेज अछि।विभिन्न जाति-वर्ग अपन-अपन तरीका सं कोशी-गीतसभ मे अपन मन-हृदय-आत्मा कें डुबाए कए अपन अभिव्यक्ति कें अंकित कएने अछि।एहि गीतसभ मे दुख, आक्रोष,प्रार्थना,विद्रोह सन सन परस्पर विरोधी किन्तु परस्पर पूरक भाव अछि त वैयक्तिक आनन्दक संग-संग जातीय अस्मिताक प्रदर्शन सेहो अछि। किछु गीत मे सामाजिक समरसताक अद्भुत चित्र अभरि कए आएल अछि।कोशी कें अनेकठाम चिरकुमारीक रूप मे देखाएल गेल अछि आ एहि नदीक उद्याम निरंकुशता कें ओकर कुमारी रहि जाएबहि सं जोड़ल जाइत अछि।किन्तु लोक-कल्पना की कोनो सीमा,कोनो बन्हन मानए छै?ओ अपन ठेठ लौकिकताक विस्तार मे कोशीक विवाहक कल्पना सेहो करैत अछि। कोशी (कन्यारूप मे) क विवाहक प्रसंग मे एकटा गीत अछि जहि मे समाजक प्रत्येक जाति-वर्गक लोकक सहयोगी भूमिका कें रेखांकित कएल गेल अछि।कोशीक विवाह भादो मास मे भए रहल अछि।एकर तैयारी चलि रहल छै।एहि मे माली मोर उठएतए आ नगरक समस्त लोक बराती सजएतए।दुलहिन कोशीक लेल डोम डाला ओढएतए,कपड़िया साड़ी ओढएतए, चुड़िहारा चूड़ी पिन्हएतए,दर्जी चोली सीतए,सोनार हंसुली गढतए,तेली तेल लगएतए,बहिन कमला उबटन लगएतए आ रन्नू सरदार टीका आ टिकुली पिन्हएतए।बेटी त सम्पूर्ण समाजक जिम्मेएदारी छै,त एहि मे सभक सहयोग सेहो चाही आ एहि प्रकार अलग-अलग जातिक होइतहु सभगोटा एकहि समाजक पूरक आ अभिन्न अंग अछि,जेकरा एहि गीत मे नीक जकां देखल जाए सकैत अछि।
गीतसभ सं हुलकैत संस्कृति
विद्वानलोकनि द्वारा लोक-गीतसभ कें सेहो विभिन्न श्रेणीसभ मे विभक्त कएल गेल अछि आ संस्कार गीत कें सेहो एकर एक श्रेणी मे राखल गेल अछि।गर्भाधान सं अन्तर्धान धरिक सोलह संस्कार मानल गेल अछि आ प्राय: प्रत्येक संस्कार-कर्म पुरोहिती-व्यवस्था आ कर्मकाण्डक उत्पत्ति अछि,तें एकरा लोक-संस्कृतिक हिस्सा मानब कतेकहु लोकक लेल कनी कठिन अछि।एकर अधिकांश गीतसभ मे अभिजात्यक छाप सेहो अछि।किन्तु जन्म, मरण, विवाह आदि त सम्पूर्ण मानव-जातिक जीवनक अभिन्न कारोबार अछि।एहि अवसरसभक लेल सेहो लोक एहन आचार-व्यवहारक समृद्ध परम्परा बनाए लेने अछि,जेकर पुरोहिती कर्मकाण्ड सं कोनो लेब-देब नहि अछि।उच्च जातिक विभिन्न संस्कारसभ मे सेहो स्त्री-वर्ग एहन अनेक रस्म-रिवाज/बीध-विधान बनाए राखलनि अछि,जे पुरोहिती मंत्र-विधि-पद्धतिक दायरा सं एकदम बाहर अछि।कखनहु-कखनहु त ई लागैत अछि जे विवाहादिक कर्म शुद्धत: स्त्रीगणक अधिकार-क्षेत्रक काज रहए,जहि मे बहुत बाद मे जाए कए पुरोहिती हस्तक्षेप भेलए।जे-से! गौर सं देखी त एहि संस्कार-गीतसभ मे सेहो ठाम-ठाम लोक आ अभिजात्यक फर्क देखाइ पड़त।ओना पीड़ा आ खुशी एहन चीज अछि जेकर कारण आ प्रकार भनहि अलग-अलग हुअए,लोक आ अभिजात्यक अन्तर कें समाप्त भनहि नहि करए,न्यून अवश्य कए दैत अछि।
कौशिकी जनपदक संस्कार-गीतक विविधता आ प्रचूरता अचरज मे डालि देबएबला अछि।उदाहरणक लेल विवाह-संस्कार कें ली त एहि मे विभिन्न विधानक अनुरूप विभिन्न गीतसभक भण्डार भरल पड़ल अछि।एहि मे लगन,तिलक,उबटन,कासा भुजाय,दल-धोय,मटकोर,बिलौकी,बटगमनी,ओमौर,लहछू,द्वार-छेकाय सं लए कए विवाह,सुहाग,मड़बा,मिलन,कन्या-निरीक्षण,परिछन,अठोंगर,भांवर,कन्यादान,जोगपिसाय,लाबाभुज्जी,कंगन बंधाय,सिन्दूरदान,कोहबर,घुंघट,चतुर्थी,पनबिछी,दुरागमन,बेटी बिदाय,समधी मिलन,खीर खबाय आदिक संग-संग भतखय मे समधी आ बराती कें पढल जाएबला गारि-गीतसभक बहार अछि।एहि गीतसभक भाव विधान-विशेषक विधि मात्र तक सीमित नहि अछि।एकर माध्यम सं स्त्रीगण ने मात्र अपन पीड़ासभ कें अभिव्यक्ति देलनि अछि,बल्कि सामाजिक कुरीतिसभ पर प्रहार सेहो कएलनि अछि।
कोनो एकटा गीत मे बेटी अपन अल्पवयस हएबाक दोहाइ दए कए पिता सं अखनि विवाह नहि करबाक विनती करैत अछि,त कोनो गीत मे बेटी कें बापक लेल ग्रहण जकां बताएल गेल अछि।एकटा गीतक भाव अछि जे जहि तरहे आम बिना आमक घौदा आ कोयल बिना गाछक डारि सून लागैत अछि ,तहिना बेटीक ससुरारि चलि गेलाक बाद पिताक घर सून भए जाइत अछि।एहिना कोनो गीत मे विवाहक बाद बेटीक आजादी छिनाए जएबाक दुख व्यक्त भेल अछि।एकटा गीत मे बेटीक माय धमकीक स्वर मे कहैत अछि जे जं बूढ जमाय भेल त ओ अपन अंगना मे नहि रहत,मने अंगना त्यागि देत।आगू ओ कहैत अछि जे जं एना भेल त ओ सभटा पोथी-पतरा जराए देत आ जं नारद बाभन बीच मे किछु बाजबाक हिमाकति करता त ओ हुनकर दाढी पकड़ि कए घिसिअएती।भगवान शंकरक कथा सं जुड़ल एहि गीतक पृष्टभूमि अभिजात्यक अछि जाहि मे कोशी-कमला परिक्षेत्रक एकटा जाति-विशेष मे बेटीसभ कें जातीय श्रेष्टताक नाम पर बूढ भलमानुसलोकनि सं बियाहि देबाक रुग्ण परिपाटी नमहर कालावधि तक चलल।किन्तु गीत मे व्यक्त आक्रोश आ विद्रोहक स्वर खांटी रूप सं लौकिक (अनभिजात्य) अछि। पुराणादिअहु मे कतिपय स्थल पर और कुछ कोशी-गीतसभ मे सेहो कोशी कें बाभनक बेटी आ कुमारि सेहो कहल गेल अछि।अचरज नहि जे लोक-मन एहि गीतक माध्यम सं कोशी कें अदृश्य प्रतीक मानि कए एहि विद्रोहक मानसिक समर्थन कएने हुअए जे कोनो बूढ आ कुपात्र सं बियाहल जएबाक सत्ती ओ कुमारि रहब बेसी नीक बुझैत अछि।एतय ई ध्यातव्य अछि जे लोक-मान्यता मे कोशी आ कमला सहोदर बहिन अछि।सहोदरा होइतहु कमला परम्परा कें आंखि मुनिकए स्वीकार करैत अपन नियति सं समझौता कएनिहारि छथि,जखनिकि कोशीक रग-रग मे विद्रोहक विस्फोटक भरल अछि।इएह अन्तर कोशी आ कमला जनपदक मानसिकता मे सेहो देखाइ पड़ैत अछि।एतय इहो ध्यातव्य अछि जे अनेक लोकगीतकारलोकनि गीत रचिकए ओहिमे ‘विद्यापति’ भनिताक प्रयोग कए ओकरा उदारतापूर्वक लोक-समाज मे वितरित कए देलनि अछि।तें ई आवश्यक नहि जे जहि गीतसभ मे विद्यापति भनिता लागल हुअए,ओ राज्याश्रय मे रहिकए अपन पालन-पोषणकर्ता सामन्तक लेल ‘कीर्तिलता’ सन दरबारी रचना करनिहार विद्यापतिअहिक रचल हुअए।एहि जनपद मे ‘विदापत नाच’ प्रसिद्ध अछि,एहि मे विद्यापतिक लोक-उच्चरित विदापत नाम जुड़ल अछि;किन्तु ई नाच हुनकर रचल नहि छनि। ओहुना एहि आ एहन अन्य गीतसभक अभिव्यक्तिक तेवर विद्यापतिक समझौतावादी कवि-मानस सं मेल नहि खाइत अछि।
संस्कार गीतसभक अतिरिक्त एहि जनपद मे बिरहा,बरहमासा,झूमर,कजरी,चैता,निर्गुण,जंतसार,लोरी,नारदीय, मर्सिया आ खेतीक विविध काजक बेर मे गाएल जाएबला गीतसभक अपार भण्डार अछि। इहो कहि सकए छी जे लोक-जीवन-जगतक कोनो एहन क्षण नहि अछि,जेकरा लेल लोक-कविगण गीत नहि रचलनि आ एकर माध्यम सं अपन विविध भावना कें अभिव्यक्ति नहि देलनि।
एहि जनपद मे निम्नवर्गक संख्यां अधिक अछि आ हुनकरसभक अतीत गरीबीक अछैतहु गौरवमय रहल अछि। खुदमुख्तियारी हिनकासभक शोणित मे रहल अछि।एना मे स्वाभाविक अछि जे हिनकरसभक मानस मे उच्चवर्गक प्रति एकटा खास किस्मक अवहेलना-भाव बैसल अछि। आधुनिक लोकतांत्रिक पद्धति मे ओसभ एकरा समय-समय पर वोटक माध्यम सं व्यक्तहु कएने छथि।कांग्रेसक चला-चलतीक जमाना रहितहु एहि क्षेत्र मे समाजवादी विचारधाराबला पार्टीक मजबूत उपस्थिति रहल अछि।लोक-गीतसभ मे सेहो एहि अवहेलना-भावक अभिव्यक्ति होइत रहल अछि।एकटा लोकगीतकार त कबीरक बेलौस भाव मे व्यंग्य करैत कहैत अछि – “अरे हो,बुड़बक बभना,चुम्मा लए मे जाति नहि रे जाए?जोलहा,धुनियां,तेलिया-तेलिनियां के पीबए ने छुअल पनियां,नटिनी के जोबनमा के गंगा-जमुनमा मे डुबकी लगाए कए नहनियां”।एहि लोकगीतसभ मे एहन तीर जकां भोंकाएबला अनेकरास टीपक भरमार छै। अनेक लोक-गीत मे कोशी स्वयं कें श्रेष्ट-कुल-जाया कहैत अछि। तेकर बावजूद ओ वीर कोहला वा रन्नू सरदार सन निम्नजातिक लोकक संग सम्बन्ध जोड़ैत अछि त ई लोक-मनक वएह भावनाक अभिव्यक्ति प्रतीत होइत अछि। होलीक जोगीरा-गीतसभ मे त ई भावना अपन चरम उत्कर्ष पर होइत अछि,जखनि जोगीराक टोली दरबज्जा पर चढिकए ठमकक संग अभिजात्य कें रस लए-लए कए गरियाबैत अछि,ओकरा निर्मम हास्यक संग बेपर्द करैत अछि।
एहि लोकगीतसभ मे एहि जनपदक मानस मानू जेना अपन सभटा दुखक समाधान,सुखक सन्धान आ श्रमक उत्सवधर्मिता कें खोजि लेलक अछि आ खोजि कए ओकरा सहेज लेलक अछि।
नाचसभक कौशिकीकरण
भावसभक प्रबलता जं गीतसभ कें जन्म दएत अछि त आनन्द आ पुलकक अतिरेक नाचबाक लेल बाध्य कए दएत अछि।ई एकटा अनबुझ बुझौवलहि जकां अछि जे कौशिकी जनपदक जनजीवन जखनि असुविधा,कष्ट,विपत्ति आ संघर्षक मारि झेल रहल छल,तखनि एतय गीत,नाच आदिक एतेक नमहर समृद्ध परम्परा बनल;आ आइ जखनि जन-सुविधासभक विस्तार भेल अछि,अनेक भौतिक वस्तु आ संरचनात्माक ढांचाक निर्माण आ उप्लब्धता भए गेल अछि त ई सभ परम्परा प्राय: समाप्तिक कगार पर ठाढ अछि।एहि जनपद मे छोट-छोट मेला आ विभिन्न नाच-तमाशाक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि।एहि नाचसभ मे पुरुषहि स्त्री-वेश मे नाचैत रहला अछि। आन-आन क्षेत्र मे एहन नाच कें “लौंडा नाच”क संज्ञा देल गेल अछि।किन्तु कौशिकी जनपदक लोक-मानसक भलमनसाही देखिऔ जे एतय ई हीनताबोधक,ग्लानिदायक शब्द कबूल नहि अछि। एमहर एहन नर्तकसभ कें “नटुआ” कहल जाइत रहल अछि।एमहरका नाचसभ मे बिदापत नाच,राजा सलहेस,नैका-बनजारा,दुलरा दयाल,कुमर बृजभान, आल्हा-ऊदल,जालिम सिंह,कमला मैया,कोशी मैया, रमखेलिया आदि खेलल जाइत रहल अछि।एहि नाचसभ कें जं एहि जनपदक मौलिक निर्मिति नहिअहु मानी,तखनहु एहि बात मे कोनो संशय नहि जे एतहुका लोक-कलाकारलोकनि एहि नाचसभक पुर्ण नहिअहु त बहुत हद तक एकर कौशिकीकरण अवश्य कए देने छथि। विशेषतया नाचक “बिकटा”सभ एहि काज मे खास आ विपुल योगदान देने छथि।नाचक दौरान एहि बिकटासभक मारूक टिप्पणीसभ मे एहि जनपद-विशेषक विभिन्न आ विशिष्ट परिचितिसभक उल्लेख बेर-बेर होइत अछि। एहि नाचसभ आ एहि बिकटासभक ‘विकट’ टिप्पणीसभ मे अभिजात्य कें फूहड़ता आ अश्लीलताक दर्शन भए सकैत अछि,होइतहु अछि,किन्तु ईसभ वस्तुत: सरल लोक-मानसक निर्मल अभिव्यक्ति अछि।बिकटा सं ओकर शिक्षा दिआ पुछला पर ओकर उत्तर होइत अछि – “गाय-माल चराबए आ छौड़ी पटिआबए के चक्कर मे कोशी-बान्ह तक त नहि,बस गजना धार तक कोनो-कोनो तरहे पढि सकलिऐ”! एहिना एकटा बिकटा अपन बापक भूमिका करैत व्यक्ति सं पुछैत अछि जे की ओ ओकर (बिकटाक) माय सं बियाह केने रहए?उत्तर मे ‘हं’ सुनितहि बिकटा तपाक सं कहैत अछि – ‘तब त हम्हूं तोहर माय सं बियाह करबह’। एहि बिकटासभक जांघ मे बोखार होइत अछि आ इलाजक लेल ओ ईंटाक टैबलेट खाइत अछि।
अभिजात्यक लेल एक त पुरुष द्वारा स्त्रीक स्वांग भरिकए नाचबहि आपत्तिजनक अछि,तहि पर सं एहन भदेस टिप्पणीसभ त एकदम सं नाकाबिले-बर्दाश्त सन बात भए जाए त कोन अचरज!किन्तु लोक-मानस कें एहि मे ‘रस’ आबैत अछि आ एहनहि मजाकसभ ओकर ठोर पर मुस्की आनैत अछि,ओकरा ठहाका लगाबैक लेल बाध्य कए दएत अछि।
एहि नटुआ-नाचसभक अतिरिक्त ‘सामा-चकेबा’ आ ‘जट-जटिन’ नाच अछि,किन्तु एहि पर शुद्ध रूप सं स्त्री-समाजक आधिपत्य आ एकाधिकार अछि।किन्तु कमाल अछि जे अहू नाचसभ मे ‘कोशी’क उपस्थिति रहैत अछि। हमर घर सं प्राय: पचास डेगक दूरी पर धानुक-टोली अछि।धानुक अर्थात कौशिकी-कक्ष वा जनपदक सर्वाधिक पुरान डीही आ मूल-निवासी निषादलोकनिक एक उपजाति। कृषि-कार्यक कारण एहि टोल सं हमर परिवारक घनगर सम्बन्ध रहल अछि – परिवार जकां।एहि टोलक प्राय: प्रत्येक परिवारक जन-जनी हमर खेतीक काज सम्हारय मे योगदान दएत रहल अछि। अपन समाजवादी प्रतिबद्धता आ सामासिक विचार-व्यवहारक चलते हमर पिता एहि टोलक अधिकांश लोकक लेल ‘मालिक’ नहि,’दादा’ वा ‘बाबा’ बनल रहला,कहाइत रहला। सम्बन्धक ई सिलसिला हमरा एहि टोलक अनेक महिलाक ‘देवर’ बनबैत रहए त अनेक महिला ‘कका’ कहितहुं हमरा अपन हंसी-मजाकक घेर मे लए लएत छली।सम्बन्धक इएह आंच हमरा दू-एक बेर ‘जट-जटिन’ नाच देखबाक अवसर देने रहए,जेकरा ओसभ नाच नहि,’खेला’ कहैत छली,जे मात्र महिलासभक बीच खेलल जाइत अछि आ जेतय कोनो पुरूषक उपस्थिति कठोर रूप सं वर्जित रहैत अछि।एक त हमर किशोरवय,दोसर देवरबला रसमय सम्बन्ध,हमर उपस्थिति ने मात्र ओकरासभ कें आह्लादित करैत छल,बल्कि कएक बेर हमरा ओहि नाचक बीच खींचकए ओ रसविभोर महिला सभ हमरहु ओहि ‘खेला’क प्रतिभागी मानि/बनाए हमरा संग छेड़खानीक आनन्द सेहो लएत छली। हमर स्मृति मे ओहि नाचक किछुअहि हिस्सा सुरक्षित अछि,जहि मे सं एक अछि ‘जट’क भूमिका करैत महिला द्वारा मोरंग जएबाक अनुमति मांगला पर ‘जटिन’ बनल महिलाक “कोशीक एहन नाह खेबबाक मजा मोरंग मे कतए भेटतौ रे जटा” गाबैत अपन एक अंग-विशेष दिस इशारा करब आ ओहि अंग कें बेर-बेर उचकाएब।
‘जट-जटिन’क ‘खेला’ त खेलनिहार महिलालोकनिक लेल जेना मदनोत्सवक नाच अछि।एकर विपरीत ‘सामा-चकेबा’क प्रस्तुति मे अपेक्षाकृत शालीनता अछि।यद्यपि कि इहो महिलासभक दूटा समूह द्वारा एक-दोसराक डांढ मे हाथ फंसाए कए खेलल जाइत अछि,किन्तु महिलालोकनिक आपसी चुहल इहो नाच मे चलैत रहैत अछि। प्रसिद्ध नाटककार अनिल पतंगक अनुसार सामा मोरंग नरेश राजा रतिनाहक पुत्री तथा चक्रवाक अथवा चकेबा मद्र-देशक राजा लक्ष्मण सेनक पुत्र छला आ वृन्दावन नामक जंगल सहरसा जिला मे सिमरी-बख्तियारपुरक उत्तर अवस्थित अछि।एहि स्थापना कें अनिल पतंग इतिहाससम्मत कहए छथि।एहि सूचना आ तथ्यक आलोक मे ‘सामा-चकेबा’क खेल कें कौशिकी जनपदक मौलिक उत्पत्ति मानल जाए सकैत अछि।
ईसभ नाच एहि बातक प्रतीक अछि जे आनन्दक क्षणसभ कें कोनो पूर्व तैयारी वा तामझामक बेगरता नहि अछि। पुरुषलोकनिक नाच मे लगपासक घरसभक सुतबा मे उपयोग होइबला काठक बनल आठ-दस टा चौकी जुटाए कए आपस मे जोड़ि देल गेल,प्रकाशक लेल कोनो छोट-मोट प्रबन्ध कए लेल गेल आ नाच शुरू। पुरुषलोकनिक मेक-अप लेल जं भुषणा पौडर भेटि गेल त वाह-वाह,नहि भेटल त वाह-वाह।किन्तु स्त्रीलोकनिक नाच मे त ने मंचक झमेल,ने मेक-अपक,अंगनाक भुइयां हुअए वा खेतक,नाचक स्थल बनल-बनाएल उप्लब्ध।
क्षरणोन्मुख लोक आ बदलैत परिदृश्य
घर-परिवारक बेहतरीक लेल मजदूर आ मिस्त्रीक काज करनिहार पीतांबर कहियो नटुआ भेल करैत रहए। नाचैत काल ओकर पैरक धमक सं चौकीसभक टुटबाक रेकार्ड बनल रहए।बहुत रास लोक तहिया पीतांबर नटुआक नाम सुनि अपन कमजोरहा चौकी देबए सं नठि जाइत छला।नाचक डिमाण्ड कम भए गेलए,पीतांबर सीजनल मजदूर भए गेल,कखनहु देबाल जोड़बाक काज आ कखनहु खेतक काज करए लागल। आइ पीतांबर लकवाग्रस्त भेल घर मे पड़ल अछि आ ओकर परिजनसभ मे सं दूर-दूरतक केकरहु कोनो नाच सं कोनो सम्बन्ध, कोनो सरोकार नहि अछि।पीतांबर स्वस्थ रहए त कहैत छल जे आब त उत्सवसभ मे डीजेक कानफाड़ू ध्वनि पर ‘टिंकू जिया’ , ‘दिल करे चूं-चांय चूं-चांय-चांय’ वा ‘तनिक जींस ढीला करा’ सन-सन गीतसभपर लोक बेहुदा ढंग सं उछलि-कुदिकए नाचए मे अपन शान बुझैत अछि,आब हमरसभक नाच के देखए?
नथुनी मण्डल पर गोसांइक ‘भाओ’ आबैत रहनि। ढ़ोल,हरमुनियां,झालि आ गायनक बीच नथुनी भगतक माध्यम सं गोसांइ लोकसभक उपचार आ विभिन्न समस्याक समाधान हेतु सलाह दएत छला। आब लोकसभ कें अस्पताल उप्लब्ध छै,डाक्टर उप्लब्ध छै आ रोगसभक उपचारक आधुनिक तंत्र उप्लब्ध भेल छै त नथुनी भगत पर ‘भाओ’ आएब ठमकि गेल अछि आ ओहि सं सम्बन्धित सभटा वाद्य-यंत्र आ गायन-कला कोनटा धए लेलक अछि।जं भक्तहि नहि,त ‘भाओ’ कतय!
आब धनुकटोलीक स्त्रीगण ‘जट-जटिन’ नहि खेलए छथि।पुछिऔ त लजाए जाएत अछि।मरौनाबाली कहैत अछि जे डिल्ली-पनिजाब कमाबएबला बेटासभ मना कए देने छनि। आब ओसभ खेतहुक काज लेल उप्लब्ध नहि छथि, बेगरतहि नहि छनि।लए-दए कए सामा-चकेबाक खेल रहि गेल अछि,जेकरा ओसभ गीत गाबैत कोनो टटका जोतल खेत मे खेलि आबए छथि,एकर नाच त खतमहि बुझू।
खेतीक विभिन्न अवसर पर गाएल जाएबला गीतसभक सूनब आब सपना भए गेल अछि।खेती आब उत्सव नहि रहल। मिक्सीक युग आबि गेल अछि आ पिसाएल पैक्ड सामग्री उप्लब्ध अछि त आब जांता,ढेकी आ उखरि-समाठ कें के पुछैत अछि जे एकर गीतसभ गाएल जाएत।
सुकरातीक दिन सजल-धजल बड़द आ महिष द्वारा सुगरक शिकारक खेल “हुरिआहा” आब अपन दिवंगत हएबाक स्वर्ण-जयन्ती मनाए रहल अछि।लार-पुआर आ संठीक बोझक पाछू नुकाए कए ‘आस-पास’ खेलाइत बेदरासभ आब नहि देखाइत अछि।एक पैर पर कुदैत माटिक खपटा सं ‘ति ति’ वा ‘तिक-तिक’ आ गुड़ी कबड्डी खेलाइत नन्हकिरबा-नन्हकिरबी नहि देखाइत अछि।कबड्डी सेहो पुरान जमानाक गप भए गेलए। आब गली-बाट पर क्रिकेटक राज चलि रहल छै।
ढोल,हारमोनियम,झालि,करताल,मृदंग आदि वाद्य-यंत्र कें डीजे पुरातत्वक वस्तु बनाए देने अछि। ‘रेणु’क ‘पंचकौड़ी मिरदंगिया’क अंगुरीसभ टेढ भए गेल अछि आ ओकर ‘रसप्रिया’ जानि कोन कबाड़खाना मे पड़ल कानि रहल अछि।प्रेमचन्दक ‘होरी’ ‘गोबर’क डगर धए पनिजाब-डिल्ली कमाबैत अछि,त ‘हरखू’ बिछौना परक कम्बल के कहए,तोशक पर रजाइ ओढिकए सुतैत अछि आ बाहर घुमबाक लेल बेटाक देल ‘जैकेट’ पहिरैत अछि।
हरबाहासभ आब गिरहतनी सं ‘बसिया भात’क लेल रुसैत-झगड़ैत नहि छथि। हुनकासभ कें मनपसन्द भोजनक लेल नगद पैसा चाही।ओनाहितहु आब हर-बड़द सं खेती के करैत अछि?रोटीक पौष्टिकता आब अभिजात्यक व्यंजन-सूची मे सम्मिलित भए गेल अछि आ भात खाएब आब लोकक अभिजात्य भए गेल अछि।
आब किल्लत नामक कोनो चीज नहि रहल।की छोट,की नमहर,सभ गोटा मे घर कें ईंटा-सीमेन्ट सं बनएबाक प्रतियोगिता चलि रहल अछि।खढ-फूसक छौनी आ टाट कें माटि सं लेबकए सुन्दर देबाल बनाए देबाक कलासभ आउट आफ डेट भए गेल अछि। फूसक बेगरता नहि रहल त खढहोरि सेहो विलीन हुअए लागल अछि। छप्परक स्थान छत लए लेलक त बंसबिट्टीसभक बेगरता नहि रहल।बांस रहल नहि आ बांसक उत्पादक कोय खरीदनिहारहि नहि त एहि सं जुड़ल कलासभ कें कालक गाल मे जएबाकहि अछि।
स्वामी सहजानन्द 1947 मे कोशी-मुक्त अंचलक भीमनगर,प्रतापगंज आ छातापुर थाना क्षेत्रक भ्रमण पर अएला त ओ एतहुका रस्तासभ कें नरकक रस्ता सं बदतर कहने छला। आइ एतहुका 95% सड़क चकाचक अछि आ एहिपर तेज सं तेज भागबाक लेल वाहनसभ मे होड़ मचल अछि।एना मे बड़दगाड़ी कें के पुछए? से ‘हीरामन’ सेहो अपन गाड़ी आ बड़द दुनू बेचि आएल।
कोशीक बाढि आबैत रहए त माटि आ बालुक भरान सं झौआ,कास आ पटेरक नमहर आ घनगर जंगल बनि जाइत रहए। कोशीक लोक एहि क्षुद्र सन देखाइत उप्लब्धता कें अपन इलिम आ श्रमक सम्मिलित प्रयास सं आर्थिक उप्लब्धि मे परिणत कए देने रहए। प्रत्यक्षत: अनेरुआ आ फिजूल सन देखाइत एहि वस्तु कें कच्चा-माल मानिकए एतहुका लोक एकरा अपन कलात्मकता सं उपयोगी वस्तुसभ मे ढालि लेबाक परिपाटी बनाए देलक। चटाइ,पटिया,दौरी,मौनी,चंगेरी-चंगेरा,खर्रा आदि वस्तुक निर्माण एहि सं हुअए लागल।जल-जमाव पटुआक खेती लेल अनुकूल रहए,त एकर खेती खूब लोकप्रिय भेल। नमहर स्तर पर पटुआक खेती भेल आ एकर कलकत्ता तक निर्यात भेल। लोकक हाथ मे नगद रकम अएलए आ स्थानीय स्तर पर एकर डोरी-रस्सा-सुतरी आदि बनैबाक कला सेहो विकसित भेल। बांसक उत्पाद आ उपयोगक विविधता त औरहु अद्भुत अछि। घरक टाट-छप्पर सं लए कए घेराबन्दी आदि मे एकर उपयोग त होइतहि रहल अछि,एहि सं छिट्टा,सूप,हाथक पंखा आ बेदरासभक घिरनी,गाड़ी आदि खिलौना आदिक अतिरिक्त विभिन्न सजावटी समान सेहो बनैत रहल अछि। प्लास्टिकक आगमन आ पक्का मकान बनैबाक बढैत प्रवृति एकहि संग एहिसभ उत्पाद,उत्पादक आ एहि कला पर हमला बोलि देलक अछि आ एकर परम्परागत कलाकारसभक रोजी-रोटी पर संकट ठाढ कए देलक अछि।
आधुनिकताक आरा पर लोक-संस्कृतिक काठ
अजुका समय क्षेत्रीय पहचान आ अस्मिता पर घहराबैत संकटक समय अछि।एक दिस सूचना-प्रौद्योगिकी तथा कम्प्यूटर-तकनीकसभक पीठ पर सवार पूंजीवाद ‘विश्वग्राम’ आ ‘उन्मुक्त-अर्थव्यवस्था’क नाम पर सामाजिक ताना-बाना कें छिन्न-भिन्न करएबला अराजकता कें जन्म देलक अछि,त दोसर दिस मध्ययुगीन विचारधाराक आधुनिक महारथी लोकनि सेहो सक्रिय छथि,जे धर्मक पुरोहिती-संस्कृतिक पुनरावृति कें प्रोत्साहित,पुनर्स्थापित करबाक जी-तोड़ प्रयास मे लागल-भिड़ल छथि। अभिजात्यहि जकां पूंजीवादहु मानैत अछि जे लोक-संस्कृति प्राक-आधुनिक समाजक संस्कृति अछि आ एहि समाजक विघटनक बाद ‘लोक’ कें सेहो अन्तत: विघटित भए जएबाक अछि।पूंजीक अभिजात्य-साम्राज्यवाद अपन संचार-क्रांति,भूमण्डलीकरण,उदारीकरण,बाजारीकरण आदि-इत्यादिक वैचारिक अस्त्रसभक माध्यम सं एहि विघटनक प्रक्रिया कें तेज करबाक हर संभव प्रयास मे लागल अछि।मध्ययुगीन विचारधाराक अभिजात्य त सदा-सर्वदा सं ‘लोक’ कें अपन शत्रु मानैत आएल अछि। सर्वविदित अछि जे मध्ययुगीन विचारधारा मिथ्याचेतना पर आधारित अछि,जे लोकक विवेक कें कुन्द करबाक कोशिश मे लागल रहैत अछि।एहि तरहें लोक आ ओकर संस्कृति वर्त्तमान मे दुतरफा आक्रमणक बीच घेराएल अछि।सम्पूर्ण विश्वक लोक पर एहि संकटक यम-छाया पसरल अछि,त कौशिकी जनपदहि एकरा सं अनछुअल केना रहत?
पूंजीक साम्राज्यवादक छत्रच्छाया मे,संरक्षण मे बाजार व्यापक भए कए गली-मोहल्ला सं होइत घरसभ मे घुसपैठ कए चुकल अछि।बाजारक सौदागरसभ फटाफटक संस्कृति कें फैशन बनाए देलक अछि आ ई फैशन वायरल भेल जाए रहल अछि।इन्सटैन्ट कौफी,टू मिनट नुडल्स आ पैक्ड फूड आब लोकक दिनचर्याक अनिवार्य हिस्सा बनैत जाए रहल अछि। भावानासभ पर चालाकीक कला हावी भए रहल अछि।
लोक-कलासभ धैर्य आ इत्मीनानक कला-साधना अछि आ ई नमहर समय,अभ्यास आ जीवनक नमहर हिस्सा मांगैत अछि।फास्ट लाइफ आ फास्ट फूडक एहि दौर मे लोकसभ लग धैर्य आ इत्मीनान कतय?गीत-नाद,नाच आदि भावना सं जुड़ल अभिव्यक्ति अछि,एकरासभ कें चालाकी लग जएबाक इलिम कतय?
त यक्ष-प्रश्न अछि जे एना मे लोक-संस्कृतिक पंच-प्रकारसभ (लोक-गीत,लोक-गाथा,लोक-कथा,लोक-नाट्य आ सुभाषित वा लोकोक्ति) आ लौकिक-तत्वसभ (मानव-जीवनक विभिन्न संस्कार,सामाजिक उत्सव,पर्व-त्योहार, मनोरंजनक साधन,रहन-सहन,वेश-भूषा,अलंकरण-प्रसाधान,भोजन व पेय-पदार्थ,सामाजिक रुढि, लोक-विश्वास,मान्यतादि,कला,शिल्प,परम्परादि,प्रथा)क रक्षा आखिर केना हुअए,के करए?
नव-संकल्प आ प्रतिबद्धताक बेगरता
एहन प्रश्नसभ आ आसन्न भयक चलते लोक-संस्कृतिक भविष्य कें लए कए तीन तरहक विचार-दृष्टि सोझां आबैत अछि – नियतिवादी,संरक्षणवादी आ बहु-भाषिकतावादी।एहि तीनू मे नियतिवादी मास-कल्चरक मुकाबिला कए सकबा मे लोक-संस्कृति कें असमर्थ पाबए छथि आ मानए छथि जे ओकरा आगू समर्पण कए देबाक अतिरिक्त आन कोनो रस्ता नहि। एतय जखनि मृत्यु कें नियति मानि लेल गेल अछि,तखनि त रक्षाक चर्चहि व्यर्थ अछि। संरक्षणवादीसभक विश्वास छनि जे राज्य अपन प्रयत्न सं लोक-संस्कृति कें जीवित राखबाक लेल संकल्पित हुअए त ओकरा बचाएल जाए सकैत अछि।एतय ई प्रश्न उठि कए ठाढ भए जाइत अछि जे लोकक संरक्षणक गोहार ओहि राजसत्ता सं केना कएल जाए जे सदा-सर्वदा सं अभिजात्यक पक्षपाती रहल अछि आ जे लोकतांत्रिक युगहु मे तथाकथित विकासक नाम पर प्रारम्भहि सं लोक-परम्परासभक अनदेखी कएलक अछि,यद्यपिकि ओकर भंगिमासभ मे संस्कृति आ परम्परासभ कें सम्मान देनिहार उदारता परिलक्षित होइत रहल अछि।तेसर दृष्टि बहु-भाषिकतावादक अछि जे ई मानैत अछि जे देशक जहि-जहि क्षेत्र मे ओतहुका स्थानीय भाषा मे शिक्षणक काज भेल अछि,ओहि-ओहि क्षेत्रसभ मे साक्षरताक बयार सं ओतहुका लोक-संस्कृति समृद्ध भेल अछि।एतय संकट ई अछि जे कौशिकी जनपदक भाषा कें सेहो अभिजात्य अपन उपनिवेश बनाए लेने अछि।
वर्ष 1986 मे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद राधावल्लभ शर्मा द्वारा संग्रहित 320 संस्कार-गीतक संग्रह प्रकाशित कएलक। खेदक विषय अछि जे एकर शत-प्रतिशत गीत अभिजात्य सं जुड़ल अछि।एडविन प्रीडो आ ब्रजेश्वर मल्लिक एहि सम्बन्ध मे समर्पण आ रुचिपूर्वक काज कएलनि,किन्तु हुनकरसभक संग्रहक काज मात्र कोशी-गीतहि तक सीमित रहल अछि।बादक समय मे कतिपय विद्वानलोकनि एहि पर काज कएलनि,किन्तु वा त ओसभ अधिकतर पुनरावृति अछि वा यथेष्ट नहि अछि आ इहो काज कोशी-गीतहि तक सीमित अछि।
आवश्यकता अछि जे कौशिकी जनपदक लोक-गीत,लोक-गाथा,लोकोक्तिसभ आ संस्कृति सं जुड़ल आन-आन सामग्रीसभक संग्रह कागजक पन्ना पर उतरए आ ओकरा नव-जीवन भेटए।एकरा लेल संरक्षणवाद आ बहु-भाषिकतावादक उत्तम समन्वयहि सं रस्ता बहराए सकैत अछि।ईसभ चीज स्थानीय भाषा मे अछि आ एकरा इएह भाषा मे अएबाक अछि।लोक-कलाकारलोकनि रचयिताक रूप मे अपन-अपन काज कए गेला,अपन भूमिका निबाहि देलनि। आब हुनकासभ कें आगू अएबाक छनि जिनकर एहि साहित्य-संस्कृतिक प्रति निष्ठा हुअए,जे एहि काजक प्रति सुच्चा वैचारिक-प्रतिबद्धताक संग समर्पित होथि आ एकर दस्तावेजीकरणक काज मे दक्ष आ समर्थ सेहो होथि। ई निराशाजनक पक्ष रहल अछि जे एहि तरहक काजक नाम पर जे किछु खानापुरी भेल अछि,तहिमे लोक-पक्षक लेखकलोकनि अभिजात्यक बाहबाही लेबाक लोभ मे अर्थक अनर्थ कएने छथि आ हुनकरसभक लेखन पर अभिजात्यक दिशा-निर्देशक छाप साफ-साफ-देखाइत अछि।ई खतरा अखनिअहु अछि, तखनिअहु दस्तावेजीकरणक काज लेल कोनो व्यक्ति जं लोक-पक्षहि सं आबथि त से तुलनात्मक रूप सं नीक आ बेहतर रहत।
कौशिकी जनपदक लोक-साहित्य पर प्रत्येक पीढीक समान अधिकार बनैत अछि। आमजन कें ई बात जानबाकहि चाही जे कौशिकी जनपदक लोक-अन्तस सदा-सर्वदा सं सक्रिय आ गतिमान रहल अछि,अपन संघर्ष आ पुरुषार्थ पर अतीव विश्वास राखैत रहल अछि आ प्रत्येक कठिनाह आ विपत्तिक कालहु मे जीन जैक्स रूसोक एहि शब्द मे अपन स्वायत्त-अभिमानक समवेत घोषणा करैत रहल अछि – “हम कोनहु टा ना-इन्साफी कें बर्दाश्त नहि करब। हमसभ शिकारी-समुदाय कें बताए देबनि जे दुनियाँ हुनकरसभक बपौती नहि अछि”।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
मुन्नाजी
मुक्ति (बीहनि कथा)
-- हे भगवान, अहाँक घर देर ऐछ अन्हेर नै ! आइ बुझलौं।
-- की यौ, केसक निबटारा भ' गेल की ?
-- नै !
-- कनिञा नै देखाइ छथि ?
-- आइ हम दु सँ तीन भ' गेलौं
--आठम आश्चर्य , झूट्ठा नहितन !
-- कीए ?
-- विआहक तीने मास भेल, आ कहै छी तेसर....!
-- सत्ते कहै छी.
-- कतौ सेटिंग छलनि की ?
-- हँ।
-- तहन खुशी ?
--आइ ओकरे संग दोसर विआह क' लेलनि ! (श्री राज कें समर्पित)
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सुभाष कुमार कामत
बीहनि कथा
अस्पताल
- आयं हौ ! मुन्ना सूनबै एल "जे अस्पताल मे एकोटा बेड नै बाचल छै"
- ठीके सुनलो कक्का
- हौ ! तखन लोक बिना इलाज केँ कोना बचत
- कक्का अहिं कहूं तँ हम अहाँ अस्पतालक लेल लड़लिय कहिया । हम अहाँ तँ लड़लिय बस मंदिर - मस्जिदक लेल आओर आई ओ बंद अछि
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
रबीन्द्र नारायण मिश्र
लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)
२०म खेप

बहादुरकेँ अस्पताल आ बटुककेँ पुलिस हाजतिमे बंद रहबाक कारण हम असगरे दोकानक सभटा काज करए लगलहुँ। कोनो उपायो नहि रहैक । एतेक जलदी जानकार मिस्त्री भेटब संभव नहि रहैक । हम दिन-राति एक कए काज करए लगलहुँ । तकर फएदा भेल जे हमरा काजक बहुत नीक जानकारी भए गेल। हम एहि हालतमे भए गेल रही जे जँ ई काज छुटिओ जाएत तँ अपनो काज ठाढ़ कए सकैत छलहुँ । ओना काज छुटितए किएक? मदान बाबू हमर ततेक प्रशंसा करथि जकर अंत नहि । ततबे नहि,एहि मासक दरमाहा जखन भेटलैक तँ लिफाफा खोलिकए आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ । जहिना हम मेहनति केने रही तहिना हमरा इनामो भेटल । हम तँ सपनोमे नहि सोचने रही जे हमर दरमाहा एतेक भए जाएत । एतेक टाकाकेँ खर्च कोना करब? की सभ कीनब ,ककरा-ककरा देबैक सएह सभ सोचैत -सोचैत कहि नहि कखन सुता गेल ।
भोरे जखन काजपर पहुँचलहुँ तँ मदनबाबू हमरा पुछैत छथि-" प्रशन्न छी ने?"
"सभ अहाँक आशीर्वाद छैक ।"
"आइ भए सकैत अछि जे बटुक सेहो आबि जाए । ओकरा जमानत भए गेलैक अछि। अहाँक भार कम भए जाएत।"
हमरा चिंता होबए लागल जे बटुककेँ आबिगेलाक बाद कहीं हमर दरमाहा ने कम भए जाए । से बात ओ बुझलाह । अपने कहैत छथि-
" अहाँ चिंतित बुझाइत छी । अहाँक काज ततेक नीक होइत अछि जे दरमाहा बढ़बे करत, घटक तँ सबाले नहि अछि ।"
एहिबातसँ हम आश्वस्त भए जोर-सोरसँ काजमे लागि गेलहुँ ।
दूपहर बाद बटुक आएल ।ताबे मदनबाबू कतहु चलि गेल रहथि ।ओ हमरा देखितहिकानए लागल ।
"किएक परेसान छी । जीवनमे उठापटक होइत रहैत छैक । जे भेलैक, से भेलैक । बिसरि जाउ ।"
" भाइ़़!एतेक आसान नहि छैक सभ किछु बिसरि जाएब। बहादुर हमर सभ किछु चौपट कए देलक । अपने तँ नष्ट भेबे कएल हमरो बरबाद कए देलक ।"
"आब तँ सभ किछु सलटि गेल ने?"
"की सलटत कपार । जे किछु पाइ छल सभ लुटा गेल । ऊपरसँ कर्जो भए गेल । तखन तँ जमानत भेल अछि । केस चलिए रहल अछि । घरबाली से गामचलि गेलि। अएबाक नामे नहि लए रहल छथि ।"
"अहाँ एहि चक्करमे कोना पड़ि गेलहुँ?"
"की कहू?ई बहादुर जे ने करए । एकरा ओहिदिन केओ नहि भेटलैक तँ हमरा फुसला लेलक। हमरा एहिसभक कोनो अनुभव नहि रहए । पीबए लगलिऐक तँ बेसी पिआ गेल ।तकरबाद तँ की भेलैक,की नहि अपनो मोन नहि अछि ।मास दिनसँ जहलमे सड़ि रहल छलहुँ। कहुना कए आइ बहार भेलहुँ । ओहो धन कही मदनबाबूकेँ जे मदति लेल ठाढ़ भेलाह । नहि तँ पता नहि कतेक दिन आओर जहलमे सड़ैत रहितहुँ।"
"दुखक बात तँ भैए गेलैक । मुदा आब ओकरा धेनेबैसल तँ नहिरहल जा सकैत अछि।"
" से तँ सत्ते । मुदा करिऔ की?घरबाली बात नहि बुझलक ।कैकबेर फोन केलिऐक जे ई तमसेबाक उचित समय नहि अछि मुदा ओकरापर कोनो प्रभाव नहि भए रहल अछि । लगैत अछि जे गाम जाए पड़त ।"
" बेसी चिंता नहि करू ।समयसँ सभ अपने ठीकभए जेतैक। भगवानपर विश्वास बनओने रहू ।"
"बात तँ ठीके कहि रहल छी। ओएह पार लगओताह ।"एतेक बजैत-बजैत ओकर आँखि नोरसँ डबडबा गेलैक । ओ ठाढ़ नहि रहि सकल । ठामहि सामने राखल बेंचपर बैसि गेल ।
कहि नहि कखनमदनबाबू आबि गेल रहथिमुदा बटुकक संगे गप्पमे लागल रहि गेल रही । हुनका नहि देखि सकलिअनि। ओ कार्यालयमे कागज-पत्तर सभ देखि रहल छलाह । बटुककेँ कनैत देखि बाहर भेलाह।
" तूँ एतेक परेसान नहि रहह । सभसँ पहिने गाम जाह । घरबालीकेँ लए आनह ।एहिठामक झंझट सलटएमे किछु समय तँ लगबे करतैक । बहादुर अस्पतालसँ छुटएबलाअछि। हम ओकराबुझेबाक प्रयास करब।"
"बात बहादुरे धरि रहितैक तखन ने । पुलिस केस भए गेल छैक आ सेहो हत्याक दफा३०२ लागल छैक।"
"खाली चिंता केलासँ की हेतह? परिस्थितिसँ सामंजस्य करह । सभ ठीक भए जेतैक।"
मदनबाबूकेँ बूझल रहनि जे बटुक नीक लोक अछि । संयोगवश फसादमे पड़ि गेल । आब जखन बात बढ़ि गेल अछि तँ ओकरा सलटएमे समय तँलगबे करत ।
मदनबाबू जेबीसँ किछु टाका निकालि बटुककेँ देलखिन, टिकटक जोगार सेहो कए देने रहथिन । कहलखिन -
" गामसँ घुरि-फिरि आबह । "
"ठीक छैक "- से कहि बटुक सोझे टीसन बिदा भए गेल।
कहल नहि जा सकैत अछि जे दिल्लीसँ मधुबनी धरिक यात्रा ओहो स्लीपर किलासमे ओ कोना केलक? दोसरदिन साँझमेजखन गाम पहुँचल तँ गौँवासभ ओकरा चिन्हि नहि सकलैक । गामक रस्ता जेना बिसरा गेलैक । बससँ उतरि कनीकाल ठामहि ठाढ़ रहल । ताबे बच्चाक संगीगोलू भेटि गेलैक । ओ धर दए चिन्हि गेलेक ।
"बटुक भाइ! बहुत दिनपर मोन पड़ल। नीके छी ने?"
" की नीक रहब । बड़का फसादमे पड़ि गेल छी ।"
"की बात?"
"चैनसँ कहबह । हमर घरनीक समाचार कहह? ।
से सुनितहि ओ मुँह टेढ़ कए लेलक आ बाजल-"की कहू?"।
"की बात छैक से साफ -साफ किएक नहि कहैत छह?"
" ओ तँ माधवसंगे कतहु चलि गेलि । "
ई बात सुनितहि बटुककमाथपर जेना बज्र खसलैक । ओ चोट्टे घुमल ।गोलू कतबो कहलकैक जे थाकल छह , सुस्ता लएह, मुदाओ नहि रुकल । गामसँ कनीके हटि कए धार रहैक । भादवक महिना छलैक। धारमे पानि उमड़ि रहल छलैक । साँझक समय छलैक ।कतहु केओ नहि रहैक । बटुक आँखि मुनलक आ कूदि गेल । गोलू ओकरा पाछा-पाछा भागलछल । “रुकि जाउ,रुकि जाउ"- आबाज लगबैत रहल ।जाबे ओ धार लग पहुँचल बटुक डुबि चुकल छल । पानिकप्रवाह ततेक तेज छलैक जे किछुए कालमे बटुक निपत्ता भए गेल ।
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नन्द विलास राय
जान-मे-जान आएल
जन्माष्टमीक दिन। हमरा ओहिठाम बेस चहल-पहल छल। किएक तँ अपनो दरबज्जापर भगवान श्री कृष्णक जन्म-उत्सव मनौल जाइत अछि। से आइयेसँ नहि, बाबूएक अमलदारीसँ।
दस बजे रातिमे भगवान श्री कृष्णक मुरुतकेँ नयन पड़ल। तेकर पछाइत विधि-पूर्वक पूजा-पाठ भेल। कीर्तनियाँ मण्डली कीर्तन गौलैथ आ दाइ-माइ लोकैन भगवान श्री कृष्णक गीतक संग भगवती आ महादेवक गीत सेहो गौलैन। भगवानकेँ भोग लगलाक बाद परसाद बाँटल गेल। तेकर बाद परिवारक लोक भोजन केलैन। ओना, बाल-बोध सभ खेनाइ खा नेने रहए। साढ़े बारह बजे रातिमे हम जा कऽ ओछाइनपर सुति रहलौं।
लगभग दू-अढ़ाइ बजे रातिमे नीन टुटल। सेहो नीन ओहिना नहि टुटल, अँगनाक गल-गुल सुनि कऽ नीन टुटल छल। ओछाइनेपर सँ सुनलौं, भैया कहैत रहैथ-
“बिलम्ब करब नीक नहि हएत। जतेक जल्दी अस्पताल पहुँचब तेते नीक रहत।”
तैपर हमर जेठका भातीज मनोज बाजल-
“गाड़ीबलाकेँ फोन केलिऐ हेन, जइ घड़ी ने पहुँचल।”
ओछाइनपर सँ उठि कऽ ओसारपर एलौं तँ हम अपन पत्नीकेँ हम अपन भौजाइसँ गप करैत देखलयैन। हम पत्नीकेँ लगमे बजा पुछलयैन-
“की बात छिऐ, कथीक फजगज होइ छै?”
तैपर पत्नी कहलैन-
“छोटकी कनियाँकेँ बच्चा होनिहार छै। दरद शुरू भऽ गेलै हेन। मासो पुरले छै।”
हम कहलयैन-
“तखन तँ अस्पताल लऽ जाए पड़तै किने?”
पत्नी बजली-
“रातिमे एम्बुलेन्सबला औत कि नहि तँए स्कारपिओ गाड़ीबलाकेँ फोन केलकै हेन। ओ गाड़ी लऽ कऽ आबि रहल छै। रेफरल अस्पताल फुलपरास लऽ जेतइ। रीनाक माए हमरो संगे जाइले कहलक हेन।”
रीना हमर जेठकी भतीजीक नाओं छी आ छोटकी कनियाँ हमरा भैयाक छोटकी पुतोहु भेली। हम पत्नीसँ कहलयैन-
“जखन संगे जाइलऽ कहलक हेन तखन नइ जेबै से हएत। जाउ तैयार भऽ जाउ आ जाइयौ। पाइयो-कौरी लेबइ?”
पत्नी बजली-
“साए-पचास टका संगमे रहत तँ नीक्के रहत किने। कखनो चाहे-ताहे पीबैक मन हएत तँ केकरासँ मंगबै ग।”
हम पत्नीक विचारकेँ समर्थन करैत कहलयैन-
“से तँ ठीके।”
एकटा पचसटकही आ पाँचटा दसटकही नोट पत्नीकेँ दैत कहलयैन-
“लिअ, एक साए टाका रखि लिअ। खुदरा अछि। खर्चो करैमे असान हएत।”
दसे मिनट बाद गाड़ी आबि कऽ डेढ़ियाक सामने खड़ा भऽ गेल। स्कारपिओ गाड़ी रहए। बीचला सीटपर छोटकी कनियाँकेँ आरामसँ लेटाएल गेल। बगलमे हमर पत्नी बैसली। भैया आ एकटा गामक डॉक्टर ऐगला सीटपर (ड्राइवरक बगलमे) बैसला। भौजी आ भातीज पैछला सीटपर बैसल। सभकेँ बैसते ड्राइवर गाड़ीकेँ स्टार्ट केलक आ विदा भऽ गेल। हमहूँ जा कऽ ओछाइनपर सुति रहलौं।
अबेर-कऽ सुतल रही तँए अबेर-कऽ नीन टुटल। गोहाली घरसँ महींसकेँ निकालि बाहरक नादिपर बान्हि सानी लगा पोखैर दिस विदा भऽ गेलौं। नित्यक्रियासँ निवृत भऽ गामपर एलौं तँ छेाटका भातीज अजयसँ पुछलिऐ-
“हउ, रौतुका समाचार नइ बुझलौं।”
तैपर अजय बाजल-
“रेफरल अस्पताल फुलपरासमे बच्चा नहि जनमलै तँ रीता नायकक नरसिंग होम लहेरियासराय लऽ गेलै। ओतए पेट खोलि कऽ बच्चा भेलइ।”
हम पुछलिऐ-
“कोन बच्चा छिऐ?”
अजय बाजल-
“लड़का छिऐ।”
लड़काक नाओं सुनि थोड़ेक संतोष भेल। संतोष ऐ लेल भेल जे पेट खोलि कऽ बच्चा भेल रहए। अखन बेटीक बिआहमे दहेजक जे समस्या खड़ा भऽ गेल अछि ओ बेस जटिल भऽ गेल अछि। जइ परिवारमे बाहरी आमदनी नइ छै, ओइ परिवारमे जँ बेटीक बिआह हएत तँ बिना जमीन बेचने दोसर कोनो उपाय नइ। खाएर दहेजक जे समस्या छै, जेतए छै तेतए रहह। हम अजयसँ पुछलिऐ-
“बच्चा आ जच्चा ठीक छै किने?”
अजय हमर मुँह तकैत बाजल-
“की जच्चा?”
हम अजयकेँ समझाबैत कहलिऐ-
“बच्चा भेल नवजात शिशु जे जनमल हेन आ जच्चा भेल बच्चाक माए, जेकरा प्रसूती सेहो कहल जाइ छै।”
ई गप-सप्प होइते रहए कि हमर भतीजी मोबाइल नेने आएल आ हमरा कहलक-
“काका, मनोज भाइजी अहाँसँ बात करता। ओ लाइनेपर छथिन।”
हम मोबाइल लऽ मुँह लग मोबाइल सटा बजलौं-
“हेल्लौ, की कहै छीही?”
ओम्हरसँ अबाज आएल-
“लहेरियासराय आबहक ने। हम तँ पूजापर बैसब। तँए गाम आबए पड़त आ भगवानकेँ पूजा-पाठ, धुप-आरती कए भोग लगबए पड़त। जाबे मुरुत नइ भँसत ताबे हमरा गामेमे रहि कऽ भोर-साँझ धूप-आरती करए पड़त।”
हम पुछलिऐ-
“बच्चा आ जच्चा ठीक छै किने।”
ओम्हरसँ अबाज आएल-
“हँ, सभ ठीक छै। तूँ एबहक तखने हम गामक लेल विदा हएब।”
हम कहलिऐ-
“बस पाँच मिनटमे हम विदा भऽ जाइ छी।”
सएह केलौं। एकटा लूंगी, एकटा गमछा आ अन्दरपैन्ट झोरामे लऽ कऽ विदा भऽ गेलौं। संयोग नीक रहल। एन.एच.पर एलौं कि बस भेट गेल। साढ़े आठे बजे रीता नायकक नरसिंग होम पहुँच गेलौं। भातीज मनोज कहलक-
“बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ बौआकेँ देखौलिऐ हेन। डॉक्टर साहैबक कम्पाउन्डर बौआक खूनो जाँच करए लऽ गेला हेन। पाँच बजे साँझमे डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ भेँट कऽ ओ की कहै छैथ बुझि लिहह। जँ बच्चाक डॉक्टर दबाइ लिखथिन तँ दबाइ कीनि कऽ आनि लिहह। ढौआ माएकेँ दऽ देलिऐ हेन।”
ई कहैत भैया आ भातीज विदा भऽ गेला।
पहिने जा कऽ बच्चाकेँ देखलौं। बड़ सुन्दर, गोर-नार, नमहर-नमहर आँखि, मुदा दुबरे-पातर बच्चा रहए। पत्नी सेहो बच्चेक पाँजरमे बैसल छेली। पत्नी हमरा पुछली-
“महींसकेँ केकरो जिम्मा लगा कऽ एलिऐ हेन किने।”
हम कहलयैन-
“हँ, माएकेँ कहि कऽ एलिऐ हेन।”
पत्नी पुछली-
“चाह पीने छिऐ?”
हम कहलयैन-
“नहि, चाह नइ पीने छिऐ। समैये नइ भेटल। आब जाइ छी, बिस्कुटो खाएब आ चाहो पीब।”
पत्नी आढ़ैत दैत बजली-
“एक कप चाह हमरो लेल नेने आएब।”
हम पुछलयैन-
“गिलास अछि?”
पत्नी स्टीलक गिलास दैत बजली-
“लिअ, अहीमे चाह नेने आएब।”
हम फेर पुछलयैन-
“आ रीनाक माए चाह नइ पीयत।”
तैपर पत्नी बजली-
“नइ रीनाक माए चाह कहाँ पीबैत अछि।चाह पीलासँ ओकरा गैस बनि जाइ छै।”
हम गिलास लऽविदा भऽ गेलौं। चाहक दोकान नर्सिंग होमक बगलेमे। एक कप चाह आ पाँच टकाबला एक डिब्बा ड्रीमलाइट बिस्कुट हम पत्नीकेँ दऽ एलिऐन। पछाइत अपनो बिस्कुट खा पानि पीब चाह पीलौं।
पाँच बजे साँझमे बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीक क्लिनिकपर गेलौं। कम्पाउन्डरकेँ कहलयैन-
“हम रीता नायकक नर्सिंग होमसँ एलौं हेन। भोरमे एकटा नवजात शिशुकेँ डॉक्टर साहैब देखने रहथिन।”
तैपर कम्पाउन्डर कहलैन-
“हँ, बच्चाक खूनक जाँच रिपोर्ट आबि गेल हेन भीतरक आदमी निकलै छैथ तँ अहाँकेँ डॉक्टर साहैबसँ मिला दइ छी।”
पाँचे मिनट बाद एकटा बेकती एकटा पाँच-छह बर्खक बच्चाक संगे क्लिनिकसँ बाहर निकलला तँ कम्पाउन्डर भीतर गेला। दुइये-तीन मिनटक बाद डॉ. बिपिन मुखर्जी हमरा भीतर बजौलैथ आ बजला-
“देखिये, आपके बच्चा को के.बी. मेमोरियलमे आइ.सी.यू.मे भरती करना पड़ेगा।”
तैपर हम पुछलयैन-
“क्या आइ.सी.यू.मे रखना जरूरी है?”
तैपर डॉ. मुखर्जी बजला-
“तो क्या मैं वैसे कह रहा हूँ। सुरक्षा के ख्याल से बच्चा को आइ.सी.यू.मे रखना जरूरी है।”
ई कहैत डॉक्टर बच्चाक प्रिसकेप्सन दैत पुन: बजला-
“जाइये जल्दी कीजिए।”
यौ बाबू हमर तँ पएर तरक जमीने घुसैक गेल। बूझू हमर पाद-उकासी दुनू बन्न भऽ गेल। भैया-भातीज बच्चाक सभ जवाबदेही हमरा दऽ कृष्ण भगवानक पूजा-पाठ करए गाम चल गेला। हमरा माथपर बड़का भार छल। हम रीता नायकक नर्सिंग होम आबि अपना पत्नी आ भौजाइकेँ सभ बात कहलयैन। पत्नी, भौजाइ आ पुतोहुजनी सभ चिन्तित भऽ गेली। पत्नी कहलैन-
“गामपर फोन कऽ मनोजकेँ पुछियौ जे की कहैए।”
सएह केलौं। मोबाइल निकालि मनोजकेँ फोन लगेलौं। ओमहरसँ हल्लोक अबाज आएल तँ बच्चाक डॉक्टरसँ जेतेक गप भेल छल सभ गप कहलिऐ। तैपर मनोज कहलक-
“नइ, के.बी. मेमोरियलमे बच्चाकेँ भरती नइ करबै आ ने आइ.सी.यू.मे बच्चाकेँ राखबै। बड़ खर्च पड़त।”
ई कहि ओ फोन काटि देलक।
अपना किछु फुरेबे ने करए। सच पुछी तँ आई.सी.यू. की होइ छै से बुझबे ने करिऐ। भैया-भातीज गाममे छल। टोटल जवाबदेही अपना ऊपरमे छल, किछो राजा-दैब हएत तँ दोखी अपने बनब। पता चलल जे के.बी. मेमोरियलमे बच्चाकेँ भर्ती करैसँ पहिने दस हजार टका अग्रिम देमए पड़ै छै। अपना लग मात्र पाँच साए टका रहए। भौजी लग सेहो दुइये हजार टका छेलइ। सोचलौं जे डॉक्टर ऑपरेशन कऽ बच्चा निकाललक, तेकरासँ पुछै छिऐ जे ओ की कहै छैथ। सएह केलौं।
डॉ. रीता नायकसँ भेँट कऽ बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ जे बात भेल रहए आ ओ (बच्चाक डॉक्टर) जे कहने रहैथ, सभ बात डॉ. रीता नायककेँ कहलयैन। तैपर ओ बजली-
“बच्चेलेल ने हमरा ऐठाम आएल छिऐ।”
हम कहलयैन-
“हँ, से तँ बच्चेलेल आएल छिऐ।”
डॉ. रीता नायक कहलैन-
“तखन, बच्चाक डॉक्टर जे कहलैथ से करियौ। यानी बच्चाकेँ आइ.सी.यू.मे भर्ती करियौ।”
ले बलैया, आब तँ भेल आर पहपैट। सोचलौं जे डॉ. रीता नायक किछु दोसर बात कहती मुदा ओहो तँ डॉ. बिपिने मुखर्जीक बातकेँ समर्थन कऽ देली। हम बच्चाक लग गेलौं आ बच्चाकेँ गौरसँ देखलौं। बच्चा हमरा पूर्ण स्वस्थ लागल। हमरा मनमे भेल जे ई बच्चाक डॉक्टर आ डॉ. रीता नायक दलाली तँ नइ कऽ रहली हेन। हमरा पैछला बात मोन पड़ि गेल।
हमर जेठकी बेटी विभाकेँ बच्चा होइले छेलइ। भोरे आठ बजे दर्द शुरू भेलै तँ रेफरल अस्पताल फुलपरास अनलिऐ। बारह बजे तक बच्चा नइ भेलै। अस्पतालक कर्मचारी, जइमे महिला आ पुरुख दुनू छेलै, कहए लगलै केश बिगैड़ रहल अछि। तँए प्राइवेट नर्सिंग होममे लऽ जा कऽ भरती कऽ दियौ। हमर पत्नी सेहो घबड़ाए गेली।
हम अस्पतालक एकटा महिला कर्मचारीसँ पुछलयैन-
“केतए अछि प्राइवेट नर्सिंग होम आ ओतए केतेक खर्च पड़त?”
तैपर ओ महिला कर्मचारी बतेली-
“रोडसँ उत्तर रेफरल अस्पताल अछि आ रोडसँ दक्षिण सड़के कातमे गायत्री नरसिंग होम छै। जँ नॉरमल डिलेवरी भऽ जाएत तँ पन्द्रह-बीस हजार टकामे फरिछा जाएत आ जँ सीजर करए पड़ल तँ तीस-पैंतीस हजारक लपेट लागि जाएत।”
हम पुछलयैन-
“सीजर केकरा कहै छै?”
ओ महिला कर्मचारी बजली-
“पेट खोलि कऽ जे बच्चा होइ छै ओकरा सीजर कहल जा छै।”
ई गप होइते रहए कि एकटा नर्स आएल आ कहलक-
“विभाक पिताजी अहीं छिऐ।”
हम कहलिऐ-
“हँ, हमहीं विभाक पिता छिऐ। की बात?”
तैपर ओ बाजल-
“मामला सीरियस अछि, जल्दी गायत्री नरसिंग होम लऽ जाइयौ।”
ओइ नर्सक बात सुनि चिन्तित भऽ गेलौं। पाइयो-कौरीक अभावे रहए। मात्र चारिये हजार टका छेलए। दिमाग काजे ने करए। सोचलौं दस मिनट देख लइ छिऐ। पछाइत देखल जेतइ। मन भेल एक कप चाह पीब ली। सएह केलौं। चाह पीबए चाहक दोकानपर गेलौं तँ ओतए विवेकजी भेँट भऽ गेला। ओ हमर राजनीतिक मित्र। दुनू गोरे एक्के दलमे छी। विवेकजीसँ कुशल समाचार भेल। हुनका सभ बात बतौलिऐन। तैपर ओ कहलैन-
“केतौ ने जेबाक अछि। ऐ अस्पतालक कर्मचारी सभ पाइवेट नरसिंग होमक दलाली करैत अछि। अहाँ धैर्य आ साहस राखू। नॉरमल डिलेवरी हेतइ।”
सएह भेलै। एक घन्टाक बाद नॉरमल डिलेवरी भेलइ। विभा एकटा सुन्दर बालककेँ जन्म देलकै। मनमे पूरा विश्वास जमि गेल जे डॉ. रीता नायक आ डॉ. मुखर्जी के.बी. मेमोरियलक दलाल छी।
हम रिक्सा केलौं आ बच्चाकेँ पत्नीक कोरामे दऽ सभ कियो सरकारी अस्पताल पहुँचलौं। ऐठाम कम्प्यूटरमे पुरजा बनाए डॉक्टर लग गेलौं। डॉक्टर नवजात शिशुकेँ देखलैथ। आला लगा कऽ सेहो जाँचलखिन। डॉक्टर बजला-
“आपका बच्चा पूर्ण स्वस्थ है। क्या दिक्कत है, जो यहाँ लाये हैं?”
हम डॉ. विपिन मुखर्जी आ रीता नायकसँ भेल सभ बात कहलयैन। तैपर बच्चा अस्पतालक डॉक्टर कहलैथ-
“कहीं भरती नहीं कराना है। बच्चा को ले जाइये। किसी भी समय कोई दिक्कत हो तो इस अस्पतालमे ले आइयेगा। यह चौबीसो घन्टा खुला रहता है।”
बच्चा अस्पतालक डॉक्टरक बात सुनि जान-मे-जान आएल।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: अरविन्द ठाकुर. “कौशिकी जनपदक लोक-संस्कृति- इतिहासक शिकारी.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 322, 2021-05-15. https://www.videha.co.in/research/2021/322/कौशिकी-जनपदक-लोक-संस्कृति--इतिहासक-शिकारी.htm

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