रबीन्द्र नारायण मिश्र
लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)
२७म खेप
-२७-
नीरजक घरक कोना-कोना मालती देखि आएल रहथि । कतए कोन वस्तु राखलअछि तकर सटीक सूचना ओ दामोदर आ किशुनकेँ देलथि । दामोदर मोंछपर ताव दैत बजलाह-" भागिन,आब हमरासभकेँ विलंब नहि करक चाही ।"
"शुभस्य शिघ्रम्"-किशुन बजलाह ।फेर दुनू मामा-भागिन किछु-किछु कनफुसकी केलथि । ओही राति नीरजक घरमे डाका पड़ल।नीरजक हाथ तँ टुटले रहैक । हालेमे प्लास्टर खुजल छैक। हाथ नीकसँ सोझो नहि होइक । ओही हाथमे फेर चोट पड़लैक ।डकैतसभ सोझे ओकर सयनकक्षमे पैसल । ओकरा सुतलसँ उठओलक । नीरजऔंघाएल छलाह।उठबामे किछु विलंब भेलनि । डकैतबा तेहनकए हाथ मरोड़लक जे बाप! बाप! चिचिआ उठलाह । दोसर डकैत पेस्तौल तानि देलक ।
“हे भगवान!"- नीरजक मुँहसँ निकलि गेल ।
“खबरदार! जँकिछु बजबह तँ सोझे ऊपर जेबह । कुंजी निकालह"-दोसर डकैत बाजल ।
नीरज टेबुलक दराज दिस इसाराकेलथि ।एकटा डकैत कुंजीक झाबा निकाललक आ दोसर हुनका मुँहमे लत्ता ठुसि टेप साटि देलक । हाथ-पैर बान्हि कए ऊपरसँ सीरक राखि देलक। हल्ला-गुल्ला सुनि कए लताक निन्न टुटि गेलैक । ओबाहर आबए चाहली। डकैतसभ हुनको ओएह हाल केलक । केबारक कुंडी बाहरसँ बंद कए देलक । ओ छटपटा कए रहि गेलीह ।
गोट-गोटक समानसभ डकैतसभ ट्रकपर लादलक आ चंपत भए गेल । जाइत-जाइत नीरजकेँ नीकसँ पिटाइ कए देलक ।
भोरभेने काजबालीसभ घरक हालत देखि हल्ला केलक। बहुत रास लोक जमा भए गेल । ओहीमेसँ केओ पुलिसकेँ फोन कए देलक । लगीचेमे पुलिस चौकी छल । आश्चर्यक बात जे ओकरासभकेँ किछु पता नहि चललैक आ ट्रकपर लादि-लादि सभटा समान डकैत बिना कोनो रोकटोककेँ चल गेल। पुलिस घरमे पैसितहि गुम्म पड़ि गेल ।सौंसेघर तहस-नहस भेल छल। लताक कोठरीक कुंडि खोललक तँ देखैत अछि जे ओकर हाथ-पैर बान्हल अछि,मुँहपर टेप साटल अछि । पुलिस ओकर हाथ-पैर खोललक। मुँहपरसँ टेप हटेलक । गिलासमे पानि देलकैक । लता ततेक हतप्रभ छलि जेहुनका किछु बजले नहि होनि।
पुलिस नीरज दिस बढ़ल । ओ बेसुध छलाह । मुँहपरसँ पट्टी खोललक । हाथ-पैर खोललक ।देह हिलओलक तँ सौंसे देह हीलि गेल । नीरजक सौंसेदेह अकड़िगेल छल । नीरजक प्राणान्त भए गेल छलनि।अपन पिताक हालत देखि लता भोखासी पाड़ि कए कानए लगलीह ।संयोग छल जे घरक सीसीटीभी काज कए रहल छल । पुलिस फूटेजक छानबीन केलक। डकैतसभ नकाब पहिरने छल तेँ चिन्हबामे दिक्कत भए रहल छलैक । मुदा एतबा पता लागि रहल छलैक जे ओ सभ तीनगोटे छल जाहिमे एकटा महिला सेहो छलि । सभसँ आश्चर्यक बात छल जे ओ सभलताकेँ किछु बिगाड़ नहि केलक । ओकरा सभकेँ नीरजसँ कोनोबातक कुन्नह छलैक सेहो बुझा रहल छल । मुदा ओ सभ छल के?
कहबी छैक जे कतबो बुधिआरी करू ,किछु-ने-किछु गड़बड़ी भइए जाइत छैक । हरबरीमे एकटा डकैतक मोबाइलफोन ओतहि छुटि गेलैक। पुलिसकेँ ओहि मोबाइल आ सीसीटीभीसँ बहुत किछु जानकारी भेटलैक ।जाँच-पड़तालसँ पता लागि गेल जे ओ फोन दामोदरक छल आ ओ एखन ट्रेनमे चढ़बाक फिराक मे अछि ।पुलिस तुरंत ओकरा टीसनेपर घेरि लेलक । किशुन सेहो पकड़ल गेल । बहुतरास कीमती समानसभ सेहो ओकराससभसँ भेटल ।
एतेक जलदी बदमाससभ पकड़मे आबि जाएत से साइत पुलिसो नहि सोचने छल । असलमे विजय दामोदरक मदतिगार रहैत छलैक जाहिसँ ओकरा पुलिस किछु कए नहि पबैक। आब तँ ओहो नहि अछि । पापक घैल कखनो-ने-कखनो भरबाक छलैक से भरि गेलैक।दामोदरकअसली रूप प्रकट भए गेल ।