विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

“चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म

अरविन्द ठाकुर · 2021-11-01 · अंक 333

“चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म
मैथिली साहित्यक विविध रचना आ ओकर रचनाकार कें प्रकाश मे आनबा मे कलकत्ता सं प्रकाशित ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक अमुल्य योगदान रहल अछि। मैथिलीक प्रायः ई एकमात्र पत्रिका अछि जे अनवरत तीन दशक सं बेसी अवधि तक बहराइत रहल अछि आ एकर अहि निरन्तरताक एकमात्र श्रेय जं किनको छनि त से राजनन्दन लाल दास छथि।कर्णामृत आ कर्ण गोष्ठी तक पहुंचए सं पहिने राजनन्दन जी मिथिला दर्शन आ आखर सं सेहो जुड़ला।पत्रिका प्रकाशनक हुनक जिद एहन रहनि जे ओ शुरुआती विरोधक बावजूद जातीय संगठन सं जुड़बाक समझौता सेहो कएलनि।तीन दशक सं बेसी अवधि तक कर्णामृतक माध्यम सं मैथिली पत्रिका प्रकाशनक निरन्तरता कायम राखि राजनन्दन जी मैथिली मे एकटा इतिहास बनैनिहार अनन्य व्यक्तित्व छथि।अहि मामला मे हुनक कर्मठता, हुनक लगन,हुनक पुरुषार्थ पर कोनो संदेह नहि कएल जाए सकैत अछि,खास तौर पर ई देखैत जे ओ ने कोनो शुद्ध साहित्यकार रहथि आ ने कोनो मौलिक चिन्तक।
पत्रिका प्रकाशनक अहि क्रम मे ओ सम्पादकीय आ अन्य टिप्पणीक माध्यम सं जे किछु कहलनि,से हुनक ‘चित्रा-विचित्रा’ नामक संग्रह मे संकलित भेल अछि आ तेकर संकलन आ संपादन करनिहार डा प्रेमशंकर सिंह तहि पर एकटा दीर्घ आलेख लिखने छथि।संग्रहक प्रकाशक कर्णगोष्ठी अछि,तें एकर प्रकाशकीय मे अर्जुनलाल करण सेहो अपन लघु टिप्पणी कएने छथि।मैथिलीक जे परम्परा रहल अछि,तेकर निर्वहन करैत लेखक आ ओकर लेखनक प्रशंसा करबाक काज अहि दुनू लेखक माध्यम सं भेल अछि।
कोनोटा मैथिली पोथीक प्रकाशन सं अचल-अटल रहनिहार लीकजीवी बौद्धिकताक लेल एतेक सामग्री यथेष्ट अछि।किऐ त ओसभ पेटे सं पढिकए आएल छथि आ आब हुनका किछु पढबाक बेगरता बुझाइते नहि छनि।एकरहु नहि पढता। नारा,समारोह,हुड़दंग आ चंदा-चिट्ठारत आन्दोलनजीवी बौद्धिकताक लेल त ई संग्रह नित्य पारायण करबा योग्य मानल जाए सकैत अछि।किऐ त मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं समय-समय पर झूठ-सांच,अर्द्धसत्य,छद्म,वायवीय कल्पना,मिथक आदि-इत्यादिक सहमेल सं यत्नपूर्वक गढल प्रचार साहित्य अहि संग्रह मे बहुलता सं उपस्थित अछि।ओलोकनि अपन काजक वस्तु एकेठाम पाबि सकए छथि,पढि सकए छथि आ विभिन्न मंडली आ मंच पर एकरा बेर-बेर दोहराए सकए छथि।यथार्थ,वस्तुसत्य आ सार्थकताक आग्रही विश्लेष्णात्मक बौद्धिकताक लेल सेहो अहि संग्रहक उपस्थिति सुविधाजनक छै।एकटा वर्ग-विशेष द्वारा भाषा कें अपन उपकरण बनाए ओकर माध्यम सं अपन उपनिवेश स्थापित करबाक ,अपन वर्चस्ववादी संस्कृति कें सर्वहाराक बहुमत पर लादबाक जे प्रयास दीर्घकाल सं चलैत आबि रहल छै,तेकर प्रायः समग्र दस्तावेज राजनन्दन लाल दास जीक अहि संग्रह मे उपस्थित छै।प्रगतिशील बौद्धिकता अपन अन्वेषण,अपन तार्किकताक छूरी-चक्कू सं एकर चीरफाड़ कए सकैत अछि।
पश्चिमी महायुद्धक बाद ओतहुका बौद्धिक जगत मे एकटा वैचारिक हवा बहल रहए,जहि मे अहि बातक वकालत कएल जाइत रहए जे सभ्यता दिस अग्रसर हएबे गलत अछि,बेजाय अछि आ सभ्यताहीन आदिम मनुष्यलोकनि सं आवासित अंचल/क्षेत्र मे जाए नुकाएबहि त्राणक एकमात्र रस्ता अछि।पाछू दिस घुरि जएबा कें श्रेयस्कर माननिहार अहि पंथ/विचार कें प्रिमिटिविज्म (primitivism) कहल गेल रहए,जेकरा मैथिली मे आदिमवाद वा प्राचीनवाद कहि सकए छी।ई पंथ त पश्चिमी महायुद्धक बाद अस्तित्व मे आएल रहए,किन्तु मैथिलीक शाश्वत प्रति-क्रिया-पंथीलोकनि द्वारा अहि ‘प्रिमिटिविज्म’ कें सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ मंत्र मानि लेल गेल अछि। ‘चित्रा-विचित्रा’ अहि मैथिल प्रिमिटिविज्मक लिखित दस्तावेज अछि।
एना नहि छै जे राजनन्दन लाल दास कें तीरभुक्तिक सामाजिक संरचना,ओकर जीवन-पद्धति,ओकर लोकाचार आ भाषा-संस्कृतिक यथार्थक भान नहि छनि। अहि संग्रहक अनेक आलेख मे हुनक ई समझ सोझां आबैत अछि आ फरिच्छ भए कए आबैत अछि।किन्तु हुनक अहि समझ पर आन्दोलनजीविताक भ्रमजाल तेना कए हावी भए जाइत अछि जे निष्कर्ष पर पहुंचए सं पहिनहि हुनक लेखन भुतलाए कए ओझराए जाइत अछि। अहि भ्रामकताक कारण कलकत्ताक प्रवासी मानसिकता मे खोजल जाए सकैत अछि।कलकत्ता गेल तिरहुत क्षेत्रक सर्वहारा कें अपन मेहनत-मजूरी पर भरोस रहए आ ओ अपन श्रमक बल पर अपन रोजी-रोटीक जोगार करए मे सक्षम रहल। निष्ठापूर्वक खटैत रहल आ तहि सं जे भेटल,तेकरा पेट मे राखि निश्चिन्तताक नींद सुतैत रहल। ई सुख किन्तु अभिजात्य प्रवासीलोकनि कें नसीब नहि भेलनि।ओसभ असुरक्षाक भाव सं ग्रसित त भेबे कएला,अपन श्रेष्टताक प्रदर्शन लेल सदैव व्याकुलता सं भरल रहला।एकरे परिणामस्वरूप ओतय मिथिलाक परिकल्पना वैचारिक अस्तित्व मे आएल।एकर माध्यम सं ओलोकनि संगठित त भेबे कएला, बंगालीसभक बीच हुनकरसभक पहचान सेहो बनलनि।एक बेर ई पहचान बनलाक बाद किछु खास वर्गक वर्चस्ववादी मानसिकता जोर मारए लागल आ अपन जन्मस्थानहि जकां कलकत्ताक समाज मे सेहो अपन जन्मना-कुलीनताक स्थापनाक स्वप्न देखए लगला। कलकत्ताक समय-समय पर बनैत-टुटैत संगठनसभ एकर प्रमाण अछि।कलकत्तो मे वएहसभ कठखेल चललए जे तिरहुत मे चलैत रहल रहए।गैरमैथिललोकनि पर अपन वर्चस्व स्थापित करबाक लेल जे प्रोपगंडाक सिलसिला चलल,तेकर प्रभाव मे लक्ष्य-जाति त अएबे केलए,एकर रचयितालोकनि सेहो एकर दुष्प्रभाव सं नहि बचि सकला।झूठ जखनि बेर-बेर अनवरत रूप सं दोहराएल जाइ छै त एकटा खास अवधिक बाद ओ सत्यक भ्रमाभास दिअए लागए छै आ एकर उत्पादक आ उपभोक्ता दुनू एकर शिकार बनैत अछि।ई कलकत्ता मे भेलए आ एकर प्रभाव ओतय रहनिहार आन रचनाकारलोकनिक संग-संग राजनन्दन जी पर स्वाभाविक रूप सं पड़लनि।‘चित्रा-विचित्रा’क आलेख-टिप्पणी आदि मे अहि कुप्रभावक प्रभाव देखल जाए सकैत अछि।
एकर उदाहरणक क्रम अहि पोथीक प्रथमहि आलेख सं शुरू भए जाइत अछि। अहि आलेख मे ओ मैथिलीक भाषा-शैली पर गंभीरता सं चिन्तित देखाइ छथि आ अहि पर विचारणक क्रम मे विभिन्न बिन्दूसभ कें छुबए छथि। आलेख 1967क अछि,तें समय कें देखैत अहि मे नवता मानल जाए सकैत अछि,नहि त ईसभ बेर-बेर दोहराएल गेल गपसभ छै।ओ मानए छथि जे अहि भाषाक दू रूप अछि – एक संस्कृत निष्ठ परिमार्जित मैथिली जे बाबू-भैया बाजए छथि आ दोसर जन-बोनिहार लोकनिक खांटी मैथिली।ई बाबू-भैया लोकनि के छथि,से ओ स्पष्ट नहि कएने छथि।किन्तु अहि आलेख समेत सम्पूर्ण संकलन मे जहि तरहें अनगिनत बेर ‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग भेल अछि,तहि सं अनुमान लगाएल जाए सकैत अछि जे ‘बाबू-भैया’ सं हुनक अभिप्राय मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थहि सं छनि। आम सामाजिक स्थापना मे राजपूत,भुमिहार ब्राह्मण आ अम्बष्ट कायस्थ सेहो ‘बाबू-भैया’क श्रेणी मे आबए छथि। हुनकर सभक भाषा कोन रूपक अन्तर्गत आबैत अछि? बाबू भैया आ जन बोनिहार सं अलग एकटा वणिक-समाज सेहो छै,ओसभ की बाजए छथि?स्पष्ट छै जे अहि रूप-विभाजन मे राजनन्दन जी सं चूक भेल छनि आ ओ आन्दोलनजीवी मैथिल आंखि सं एतहुका सामाजिक संरचना कें देखलनि अछि।इएह दृष्टि-भ्रम छै जे संबंधित आलेख मे हुनका भाषाइ एकरूपताक सन्दर्भ मे कोनो स्पष्ट कार्यक्रम वा सुझाव देबए मे अक्षम कएलकनि अछि। आलेखक अंत मे ओ आरोप लगबए छथि जे ‘मैथिलीक विरुद्ध मे हिन्दीक अड़ख्स अंगिका आ बज्जिका कें गढि कए ठाढ कएल अछि’।एहन आरोप विकट अछि आ निस्संकोच हास्यास्पदताक श्रेणी मे राखि देल जेबाक जोगर अछि।कोय मुर्खहि अहि बात पर विश्वास कए सकैत अछि जे एहनो कोनो वीर-पुंगव जनम लेने छथि जे दू-दू टा भाषा गढिकए ठाढ करबाक उद्योग कए सकैत अछि। अहि आलेखक समापन ओ अहि आह्वान सं करए छथि जे ‘मैथिलीक विद्वानलोकनिक ई कर्तव्य थिकनि जे मैथिली भाषाक मौलिकताक रक्षा करैत एहन शैलीक प्रचार करथि जाहि सं मैथिली नेपाल सं संथालपरगना धरि आ चम्पारण सं पुरनिया धरि जनप्रिय साहित्यिक भाषा बनि सकै,संगहि आन समाजक लेल सरल तथा आकर्षक बनायब सेहो जरूरी’।ई अद्भुत आ भयंकर विरोधाभासी दिवास्वप्न अछि। अहि एकटा पंक्ति सं अनेकानेक प्रश्न उठि ठाढ होइत अछि। ‘मैथिलीक मौलिकता’ की छिअए? एहन विद्वानलोकनि कोन लोक सं अवतरित हेता? नेपाल सं संथालपरगना आ चम्पारण सं पुरनिया बला भौगोलिक क्षेत्र कोन ग्रह पर अवस्थित छै? ई ‘आन समाज’ कोन समाज छिअए? ‘सरल आ आकर्षक’क कोन परिभाषा छै? एहन-एहन अनेकानेक प्रश्नबला ई आह्वान शुद्ध किताबी छै।मैथिली भाषाक साहित्य अकादेमीय इतिहास अहि बातक साक्षी छै जे मैथिली सं प्राप्त सभटा आमदनी एक जाति-विशेषक झोड़ा मे जाइत रहल अछि। हिनकरसभक वश चलए त मैथिली कें अपन टोल तक सीमित कए लेता।एकर क्षेत्रफल बढाए कए दावेदारसभक संख्या किऐ बढएता? क्षेत्रफल बढाएब नाराबाजी थिक,प्रपंच थिक,धोखा थिक आ क्षेत्रफल घोंकचाएब वास्तविकता। नाराबाजिए करबाक अछि त एहन संकोच किऐ? एकरा कश्मीर सं कन्याकुमारी आ दिल्ली सं भाया काठमाण्डू होइत तिब्बत आ चीन तक लए जाऊ! ईसभ गप राजनन्दन जी कें नहि बुझल छनि,से बात नहि। अहि संग्रहक विभिन्न आलेख मे ई बात सभ दबलहि स्वर मे,किन्तु उपस्थित अछि।ई अलग बात जे हुनक मानस पर मिथिला-मैथिलक प्रोपगण्डा साहित्यक तेहन प्रभाव छनि जे ई सभ बात ओकर प्रभाव मे दबि कए मौन भए जाइत अछि। हुनकर लेखन आन्दोलनजीविता आ मैथिलवाद कें भने शक्ति दैत हुअए साहित्यक लेल नुकसानदेह भए जाइत अछि।
‘भारतीय जनतंत्र आ मैथिली’ शीर्षक आलेख मे ओ 1940क एकटा घटनाक चर्चा करए छथि। हुनका अनुसार बिहार सरकार द्वारा गठित प्राथमिक शिक्षा व्यवस्थाक पुनर्गठन लेल बनाएल गेल समितिक सदस्य अमरनाथ झा मैथिली कें मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनैबाक मांग कएने छला जेकरा नकारि देल गेल। अहि पर राजनन्दन जीक शब्द छनि—‘एहि मांग पर समितिक अन्य वरिष्ठ सदस्य लोकनि कोनो ध्यान नहि दए आसानी सं टारि देलनि।कारण बूझल छलनि जे ॠषि मुनिक संतान मैथिल लोकनि अपन अधिकारक रक्षा करबा मे पूर्ण अक्षम छथि’। अहिना ‘बिसरल नहि जाइछ’ मे हुनक उद्गार छनि – ‘माछ देखि कए आ दही खाय कए यात्रा करब मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा थिक।मैथिल संस्कार।‘ स्पष्ट करबाक बेगरता नहि जे राजनन्दन जी मैथिल केकरा मानए छथि। अहि श्रेणी मे गैर ॠषि-मुनिक संतान (जेकरा ॠषि-मुनिक संतानलोकनि द्वारा चाण्डाल,शुद्र,सोल्हकन,राड़,नान्ह जाति आदि-आदि सम्बोधन सं विभुषित कएल जाइत रहल अछि) नहि छथि आ सएह यथार्थहु छै। अहि यथार्थक भान होइतहु,लिखित रूप मे स्वीकार करितहु राजनन्दन जी अपन आन-आन लेख मे एकटा मृत-राज्यक काल्पनिक क्षेत्र मे रहनिहार समग्र जन-समुदाय कें मैथिल कहि ओकरासभ कें भ्रमित करबाक अपराधक सहकर्मी होइ छथि त ई कोनो गुप्त एजेंडाक लेल जतेक उपयोगी हुअए, ‘सहितस्य भाव साहित्यम’ लेल बहुत दुखद आ अस्वीकार्य। अहि आरोप सं हुनकर बरी हएबाक एकहि टा उपाय बचैत अछि जे चित्रा-विचित्रा मे संकलित लेखन कें साहित्यक श्रेणी मे नहि राखि,प्रचार-साहित्यक (propaganda literature) श्रेणी मे राखि देल जाइ।
कलकत्ताक मनोविज्ञान दिआ एकटा बात मशहूर छै जे एतहुका रहवासी अपन सभटा दुख,अपन समग्र समस्याक समाधान/निदान साम्यवाद मे देखैत रहल अछि। स्वाभाविक जे ओतय अपन नियोजनार्थ गेल लोकहु पर एकर प्रभाव पड़ल।मूल बंगाली कलकतिया लेल ई मनोविज्ञान स्वाभाविक रहए किन्तु प्रवासीसभक लेल ई शख वा मजबूरी जकां रहल,तें ई एकदम ओढल जकां—सुविधानुसार ओढी,असुविधा हुअए त उतारि दी। अहुना पुरोहिती संस्कारक लोक लेल वामपंथी हएब प्रायः असंभव जकां मानल जाइत अछि। राजनन्दन जीक जीवनी कहैत अछि जे ओ 1967 तक सीपीआईक कार्ड-होल्डर रहला।किन्तु ‘चित्रा-विचित्रा’क एकहु टा आलेख मे हुनक वामपंथी रूपक दरस नहि होइत अछि।एना बुझाइत अछि जे रोजगारजनित परिस्थिति आ मैथिलवादी तत्वक संगतिक प्रभाव मे हुनक शिक्षा आ वैचारिकता छाउर भए गेलनि। हुनक लेखन मे व्यक्त विचारसभ शुद्ध रूप सं परम्परावादी आ कर्मकांडीय स्थापनासभक पुष्टि मात्र करैत चलैत अछि। अमरकान्त झा होथि वा आन कोनो झा-वादक प्रवक्ता,तिनकरसभक स्थापना कें वामपंथक द्वन्द्ववाद पर परखबाक कोनोटा प्रयास हुनक लेखन मे नहि देखाइत अछि।मैथिली कें मैथिल आ मिथिलाक संग साटि कए जे मायावी प्रपंचजाल पसारल गेल अछि,तेकरा ओ शब्दसः स्वीकार कए लेने बुझाइ छथि।शंका करब,विश्लेषण करब आ तहि सं सत्य कें बाहर करब,तहि प्रगतिवादी,वैज्ञानिक बौद्धिक श्रमक बेगरता हुनका नहि बुझाएल छनि।एना बुझाइत अछि जे हुनका ई त बुझाइए गेल रहनि जे अतीतवाद आ प्रगतिवाद कें एकहि संग साधब हुनक बुत्ताक बात नहि छनि आ कोनो मृतयुगक कोनो कल्पना कें अजुका युग मे साकार करबाक स्वप्न देखब,तहि लेल हूलेलेले करबाक कर्मकांडीय खेलौर करब आधुनिकताक लेल हास्यास्पद अछि।ई बुझितहु ओ आधुनिक हेबाक सत्ती पुरातनपंथी हेबाक मार्ग चुनलनि जे कलकत्ताक अधिकांश प्रवासी द्वारा चुनल गेल छल आ जे कलकत्ताक तहि कालक मैथिलवाद कें आर्थिक सम्पन्नता सं दहोबोर सेहो करैत रहए।दुनियादार लोक सदैव बहुमतक संग रहबाक सुविधाजनक मार्ग चुनए छथि,राजनन्दन जी सेहो चुनलनि।सर्वहाराक संग देब,ओकरा संग समानताक व्यवहार करैत ओकरा अपन पथक सहयात्री बनाएब एकटा दीर्घ आ श्रमसाध्य प्रक्रिया छै,जे आश्रय आ सुविधाभोगी समुदाय कें कहियो पसिन्न नहि भेल अछि।तें राजनन्दन जी पहिने मैथिल महासभा आ अंततः कर्ण कायस्थक जातीय सभा दिस घुरि जएबाक सुगम आ सरल मार्ग चुनि लेलनि। अहि लेल हुनका दोषहु नहि देल जाए सकैत अछि।एहने वातावरण रहए,छै। इएह चहुदिस होइत रहए,भए रहल छै।
अचरजक गप छै जे ‘परम्पराक सिक्कड़िमे कर्णकायस्थ’ सन विद्रोही तेवर आ प्रगतिशील चेतना सं आप्लावित लेख लिखनिहार राजनन्दन जीक समग्र लेखन एना अधोमुख किऐ भेल! अहि आलेख मे राजनन्दन जीक लेखनी सर्वाधिक उन्मुक्त,लक्ष्य-बिन्दू पर केन्द्रित आ निष्ठुर आलोचनाक संग प्रगट भेल अछि।एतय हुनका जाति-व्यवस्थाक कुचक्र,पुरोहितवाद सं भेल सामाजिक क्षति आदि खूब फरिच्छ भए कए देखाइ पड़लनि अछि। अहि आलेख मे ओ पुरोहितवाद आ पंजी-प्रबन्ध व्यवस्था कें नीक जकां बेनंगन करए छथि।रमानाथ झाक उक्ति ‘सभी वंशों में कलंक है,जो पांजि के रूप में व्यक्तियों के साथ लगे हैं। अतएव पंजी का गौरव करना अज्ञानता है’ कें उद्धृत करैत हुनक आलोचक अपन आक्रामक प्रखरताक संग प्रबल भेल अछि। ‘कर्णकायस्थ लोकनि संस्कृतक विद्वान होइत छलाह,मुदा पुरोहितवादक आगां हुनका लोकनि कें कोनो स्थान नहि भेटलनि।राजदरबारक राजपंडित तं ब्राह्मणे भए सकैत छलाह चाहे हुनका सं अधिक योग्य कोनो कर्णकायस्थ किएक ने होथि’, ‘पुरोहितवादक दोषपूर्ण प्रभाव सं एखनो कर्णकायस्थ लोकनि मुक्त नहि भेलाह अछि’, ‘श्राद्ध आदि मे दान दक्षिणाक परम्परा एक ढकोसला मात्र थिक।ई सब सं पैघ हथियार रहल अछि कर्णकायस्थक आर्थिक शोषणक’, ‘कर्णकायस्थ समाज ब्राह्मणे जकां पंजीप्रथाक ओझराहटि मे पड़ि गेल।पंजीप्रथाक द्वारा ब्राह्मण एवं कर्णकायस्थ मे जातिगत शुद्धता कें अक्षुण्ण रखबाक लेल एवं विदेशी प्रभाव सं बचेबाक असफल प्रयास कएल गेल।कारण हिन्दूक एहन कोनो जाति नहि,जाहि मे विदेशी मिश्रण समय-समय पर नहि भेल हो’ , ‘कर्णकायस्थ लोकनि श्रमक महत्व कें बुझथि,पुरोहितवादक कुचक्र सं अपना कें मुक्त करथि,जाहि सं व्यक्तिक आर्थिक विपन्नता उत्पन्न होइत छैक’ – ई सभ पंक्ति अही आलेखक अछि आ से कोनो उद्धरण नहि,राजनन्दन जीक अपन विचार छनि। अचरज होइत अछि जे आन्दोलनजीवी मैथिलवादक पक्ष मे जाइतहि राजनन्दन जीक जातीय वा व्यक्तिगत विश्लेषणात्मक बुद्धि,सत्यान्वेषण वृत्ति आ प्रगतिशीलता कतय अलोपित भए जाइ छनि,मिथिला-मैथिल दिस जाइतहि ओ पुरोहिती मायाजालक ओझरी मे किऐ ओझराए जाइ छथि।ई समझ सं बाहरक गप अछि जे जे व्यक्ति अपन जातिक लोक कें अतीत आ पुरोहितवाद सं मुक्त भए आधुनिक आ प्रगतिशील हेबाक आह्वान कए रहल अछि,वएह व्यक्ति अपन समग्र लेखन मे बेर-बेर आन लोक-समाज कें अतीतक कोनो मिथकीय खोह मे घुरि कए सन्हिआए जएबाक आ पुरोहिती प्रपंच मे फंसि जएबाक ललकारा केना दए सकैत अछि,अतीतजीविताक पैरोकारी केना कए सकैत अछि?भोलालाल दास पर लिखैत ‘पुरना संस्कार आ कुरीतिक भार सं समाजक जर्जर हएब आ कुहरबाक’ चर्चा करनिहार आन ठाम इएह संस्कार आ कुरीतिसभ कें भाषाक अढ मे आधुनिक युग,आधुनिक पीढी पर लाधबाक अनुशंसा केना कए सकैत अछि?
‘कर्णकायस्थ मे विवाहक समस्या’ मे ओ ‘इतिहास गवाही अछि जे मिथिला किऐक संपूर्ण भारतक कोनो जाति सुच्चा नहि अछि’, ’कायस्थ समाज मूलतः बुद्धिजीवी होइतहु आइ बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे सेहो मध्ययुगीन धारणा तथा कुसंस्कार सं मुक्त नहि भए रहल अछि’, ‘परम्परागत मध्ययुगीन धारणा तथा मध्यवित्त परिवारक कुसंस्कार सं ऊपर उठि कोनो तरहक प्रगतिशील डेग उठायब अथवा आदर्श स्थापित करबाक साहस कर्णकायस्थलोकनिक युवक-युवती मे नहि छनि’ सन-सन अतिक्रांतिकारी गप कहए छथि आ जातीय संरचनाक किछु विरोधाभाससभ कें चिन्हित सेहो करए छथि।किन्तु प्रो रामशरण शर्माक किछु उद्धरण दैत आ राजा हरिसिंह देवक चर्चा करैत अहि आलेखक मुख्य बिन्दू कर्णकायस्थलोकनिक वैवाहिक सुधार अछि।प्रायः दुनू उद्धरणक माध्यम सं कर्ण कायस्थ कें मैथिल ब्राह्मणक समकक्ष वा समान देखएबाक प्रयास भेल अछि। हरिसिंह देव पंजी प्रबन्ध मे मैथिल ब्राह्मणक संग कर्ण कायस्थ कें सम्मिलित कएलनि आ रामशरण शर्माक उद्धृत कथन कहैत अछि जे लोकनाथ नामक ब्राह्मण पिता-पक्ष सं करण लोकनिक पुर्वज रहथि।जातीय संरचनाक यथार्थ स्थितिक आभास हुनका छनि,जेकर प्रमाण हुनक अहि पंक्तिसभ मे देखल जाए सकैत अछि—‘चौदहम शताब्दी मे आबि राजा हरिसिंह देव मिथिला मे मैथिल ब्राह्मण तथा करणकायस्थ लोकनि कें आर्थिक हैसियतक आधार पर विभिन्न मूल मे विभाजित कए देलनि।ब्राह्मण लोकनि 180 मूल मे बांटल गेलाह जे परवर्ती काल मे लगभग एक हजार उपमूल अथवा उपजाति कें जन्म देलक।तहिना करण कायस्थ लोकनि मे सेहो अनेको मूल तथा उपमूलक जन्म भेल।एहि तरहें ब्राह्मण तथा कायस्थ लोकनि मूलक अतिरिक्त क्षेत्रीय आधार पर सेहो विभिन्न उपजाति तथा उपमूल मे बंटि गेलाह।एहि सं स्पष्ट अछि जे प्रत्येक जाति मे पैघ आ छोटक मान्यताक उत्पति मध्ययुगीन धारणा थिक तथा एकर आधार व्यक्तिक आचार-विचार,क्रिया,विद्वता,समाज सेवा आदि नहि बल्कि आर्थिक उप्लब्धि रहल अछि।जाहि मूलक लोक मध्ययुग मे पैघ मानल जाइत छलाह से आइयो पैघ मानल जाइत छथि चाहे ओ आइ कतबो दरिद्र किएक नहि होथि।व्यक्तिक निजी संस्कार,आचार-विचार,विद्वता आदिक कोनो महत्व नहि रहल।एहि तरहक विभाजन राजतंत्र तथा सामंतवाद कें जीवित राखबाक लेल उपयुक्त छल।‘ राजनन्दन जीक स्पष्ट मत छनि जे पंजी-प्रबंध जातीय श्रेष्टताक नहि आर्थिक श्रेष्टताक आधार पर बनल आ ई अहि मे सम्मिलित दुनू जाति कें जोड़बाक बदला विभाजित कएलक।एतय ई प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठैत अछि जे जखनि ओ अहि दू जातिक स्थितिक एहन सटीक आकलन कए पाबि रहल छथि त अहि दू जाति सं इतर समाजक आकलन मे किऐ चूकए छथि आ शेष-समाज कें सब धन बाइस पसेरी मानि ओकरा पुरोहिती पाखण्डक मायाजाल मे ओझराएल रहबाक लेल अपन लेखन मे मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक शंखनाद किऐ करए छथि? हुनक वैचारिकताक सीमा मैथिल महासभा धरि सीमित अछि अथवा अपन अस्तित्वक व्यक्तिगत पहचान बनएबा वा बनएने राखबा लेल कलकत्ताक प्रवासी-समाजक मानसिकताक संग समझौता कए ओकर सुर मे सुर मिलाए रहल छथि? आकि दुनू जातिक मूलतः एके हेबाक भावना हुनका अहि बात लेल प्रेरित करैत अछि जे नीक-बेजाय दुनू मे एक दोसराक पीठ पर रहब भैयारी-कर्तव्य अछि?
क्वालालम्पुर,मलेशिया मे 10 अक्टूबर,1998 कें प्रथम विश्व दलित सम्मेलन कें सम्बोधित करैत कांशीराम कहने रहथि—‘हम जातिक विरुद्ध जातिक इस्तेमाल करए छी। आब जातिक तलवार एकतरफा नहि रहल।किछु हमरासभ कें काटैत अछि,त किछु ओमहरकासभ कें सेहो काटत।‘ कर्णकायस्थ सं सम्बन्धित राजनन्दन जीक लेखसभ कें पढलाक बाद नहि जानि किऐ हमरा ई टिप्पणी मन पड़ि गेल।
‘भारत मे क्षेत्रीय भाषाक भविष्य’ अविश्वसनीय आंकड़ासभ सं भरल अछि। ई लेख प्रकारान्तर सं इहो साबित करैत अछि जे कमजोर तर्क पर ठाढ व्यक्ति अपन दुर्बलता आ असफलताक लेल दोसर कें दोषी ठहराबैत अछि आ ओ दोसर जं अस्तित्व मे नहि हुअए तखनि कोनो काल्पनिक दुश्मन ठाढ करैत अछि। हुनक कहब छनि जे ‘मैथिलीभाषी सम्पूर्ण बिहार मे बहुसंख्यक छथि—50% सं अधिक’। कोनो महा-सनकल लोक वा कोनो महा-निरक्षर-भट्टाचार्यक गप छोड़ू,मिथिला-मैथिलक नाम पर दिन-राति हूले-लेले करैत कोनो महा-आन्दोलनीक गप छोड़ू,मैथिलीक बल पर अपन सौंसे खानदान कें धन आ पुरस्कार सं तिरपित करनिहारक गप छोड़ू, स्वयं राजनन्दन जी कें अहि बात पर विश्वास नहि रहल हेतनि आ लिखलाक बाद तहि क्षण-विशेष मे संभवतः ओहो अपन अहि मजाक पर खूब हंसल हेता जहि क्षण ओ मैथिलवादी प्रोपगंडाक दुष्प्रभाव सं मुक्त भए सामान्य भाव मे रहैत हेता।एकटा खूब प्रचलित कहबी छै जे झूठ तीन प्रकारक होइत अछि—झूठ,सफेद झूठ आ सांख्यिकी।मैथिलवादी आन्दोलनजीवी लोकनि अहि तीनू प्रकारक झूठक धुरझार प्रयोग कएने छथि आ खूब निधोख भए कए कएने छथि। हिनकरसभक सांख्यिकी परिस्थिति आ सुविधानुसार ऊपर-नीचां होइत रहैत अछि। समाज कें भ्रमित करबाक लेल आ सरकारक समक्ष अपन मांग आ दाबी राखबाक लेल ई लोकनि जहि संख्यां कें करोड़क करोड़ कहता,जहि पर जोर देबाक लेल ‘कोटि-कोटि’क हर्स्व कें दीर्घ लगाए ‘कोटी-कोटी’ मे परिणत कए देता,तहि संख्यां कें लाभ हंसोथैत बेर सैकड़ा वा दर्जन कए परिवार आ जाति तक सीमित कए देता। हो-हल्ला मचैबाक बेर,शक्ति-प्रदर्शन बेर सम्पूर्ण जन-समुदायक सहयोग चाही,लाभक बंटवारा बेर परिवार वा गोधिया-दायाद तक सीमित रहबाक चाही।व्याकरणाचार्य लोकनिक समाज अछि,हर्स्व कें दीर्घ आ दीर्घ कें हर्स्व करबाक लेल कोनो आन आश्रम त जेबाक नहि अछि।
‘मिथिला चित्रकलाक सर्वहाराक मसीहा कृष्णकुमार कश्यप’ लेखक शीर्षकहि दोषपूर्ण आ भ्रामक अछि,त ओकर अन्तर्वस्तुक तेहने हएब स्वाभाविक।जहि चित्रकलाक चर्चा राजनन्दन जी कए रहल छथि,से मधुबनी क्षेत्र-विशेषक कला अछि,मधुबनीक अस्मिता सं जुड़ल अछि आ मूलतः सर्वहारा वर्गक जनि-जातिक कला अछि। एकरा मिथिलाक कला कहब तहिना अछि जेना महमूद गजनवी सोमनाथ मन्दिरक निर्माता हएबाक दाबी ठोकए। आमदनीक नीक माध्यम भए गेलाक कारण आइ ई कला भने अनेक महानगर तक प्रसार पाबि लेलक अछि,सोल्हकनसभक घर-आंगन सं बहराए द्विजलोकनिक स्त्रीगण तक पहुंच गेल अछि,क्षेत्रीयताक सीमा तोड़ि आन-आन क्षेत्र तक खुदरिया रूप मे विस्तार पाबि लेलक अछि,किन्तु एकर मूल आ थोक उद्भव-स्थल मधुबनीए अछि आ सेहो मधुबनीक सर्वहारा समुदायक घर-आंगन। अहि कला कें ‘मधुबनी कला’ छोड़ि आन कोनो नाम देब प्रचण्ड थेथरपनीक अतिरिक्त आर किछु नहि। अहि आलेख मे राजनन्दन जी लिखए छथि—‘हम पुछलियनि,ई चित्रकला त मात्र मैथिल ब्राह्मण तथा कर्णकायस्थक परिवार सभ मे प्रचलित अछि जकरा महिला लोकनि अपन नानी,दादी,माय आदि सं सीखने छथि।तखन स्कूलक की प्रयोजन?’ राजनन्दन जीक ई प्रश्न हुनक अज्ञानता सं उपजल अछि कि ओ अहि विषय मे अल्पसूचित-भ्रमित छथि आकि जानि-बुझि कए एकर नव-नामकरणक स्वघोषित पुरोहित बनि रहल छथि,से निर्णय करब कठिन। आ जं राजनन्दन जीक प्रश्नक उत्तर मे अहि लेखक चरितनायक कश्यप जी एकरा ब्राह्मण,कायस्थक अतिरिक्त डोम,दुसाध,मुशहर आ मुसलमान आदिक कन्यालोकनिक माध्यम सं अहि कला कें सार्वजनिक आ सर्वसुलभ बनैबाक दाबी करए छथि त ई प्रपंच-पाखण्डक पारावार अछि।जहि लुरि कें कश्यप जी मां सरस्वतीक वरदान कहए छथि,से वस्तुतः मंथराक कूटबुद्धि बुझाइत अछि।
‘स्मृति किएक?’ मे राजनन्दन जी गछए छथि जे ‘मैथिली मिथिलाक लोक भाषा थिक,लोक चेतनाक संवाहक थिक’। किन्तु एकर बाद हुनक कहब छनि जे ‘एहि मे लोक जीवनक संघर्षक गाथा सभ समाहित अछि,मुदा मैथिली अपनहि संतान द्वारा अवहेलित अछि’।जं अहि अवहेलना सं संबंधित हुनक आरोप सर्वहारा वर्ग पर अछि त अहि आरोप सं सहमत हएबा मे कोनो अतस्तितह नहि हएबाक चाही।ई सत्य छै जे ई भाषा मूलतः गैर मैथिल लोकनिक थिक आ अहि मे लोकजीवनक संघर्ष गाथासभ ठीके समाहित छै,आ से लिखित रूप मे नहि,लोककंठ मे बसल छै।तेकरा लिखि कए दस्तावेजीकृत करबा मे निस्सन्देह ई लोक-समाज चूकल अछि।एतय सोचबाक गप ई छै जे लोकजीवनक संघर्ष गाथा कें लिखित रूप मे आनबाक लेल पढब-लिखब अनिवार्य छै आ जेकरा पर एकर जिम्मेदारी रहए तेकरा पढबा-लिखबा सं वर्जित करनिहारे आइ अहि भाषा पर अपन आधिपत्य जमएने छथि।किन्तु राजनन्दन जीक अपन सीमा छनि।ओ विश्लेषणक प्रक्रिया मे जाइ सं बचए छथि।ओ सरलीकरणक रस्ता चुनए छथि,कोनो बातक चर्चा कए देब,तहि पर चिन्ता व्यक्त कए देब हुनका यथेष्ट बुझाइ छनि। तें ओ चर्चा आ चिन्ता व्यक्त करबाक औपचारिकताक निर्वहन कए सीधे अभिजात्यक लिखल साहित्य दिस आबि जाइ छथि आ कहए छथि जे ‘मैथिलीक वर्त्तमान काव्य साहित्य,कथा साहित्य तथा नाटक भारतक कोनो समृद्ध भाषा साहित्यक समकक्ष ठाढ हैबाक सामर्थ्य रखैत अछि’। अपन अहि कथनक समर्थन मे ओ कोनो लेखक वा कोनो कृतिक उदाहरण देब आवश्यक नहि बुझए छथि। हुनका मात्र ई कहबाक छनि जे तें ओ कर्णामृतक माध्यम सं मैथिलीक साहित्यकार तथा मैथिली आन्दोलन सं जुड़ल सेनानी (?) लोकनिक स्मरण करए छथि।राजनन्दन जीक अपन एजेंडा छनि।तहि पर ओ चलथि तहि मे केकरो की एतराज भए सकैत अछि?किन्तु एकटा पाठकक मन मे ई सभ पढि जे अनगिनत प्रश्न उठैत अछि,तहि सं हुनकहु कोनो एतराज नहि हएबाक चाही।जं मैथिली लोक भाषा अछि त अहि मे संस्कृत परम्परा सं आविर्भूत भेल बाबू-भैयासभ अपन मनिजनी किऐ चलाए रहल छथि? अहि भाषा मे लोकजीवनक गाथासभ समाहित अछि त से लोक-कंठहि तक सीमित किऐ रहि गेल आ एकर लिखित साहित्य मे अभिजात्य गाथाक गान किऐ कएल जाए रहल अछि?मैथिली-मिथिलाक इतिहास लोक-जीवनक इतिहास नहि भए कए पुरोहित लोकनिक मरौसीक खतियान किऐ बनल अछि?मणिपद्म छोड़ि आन कोनो लेखक लोक-गाथाक संग्रहण-संकलन आ ओकर लिखित दस्तावेजीकरणक प्रयत्न किऐ नहि कएलनि?मैथिली लोक भाषाक मौलिक रूप मे एकटा श्रमजीवी स्त्री जकां निश्छल, निर्दोष आ पवित्र अछि।तेकरा मैथिलत्वक सोलह वा छप्पन शृंगार कए नगरवधु किऐ बनाए देल गेल?राजनन्दन जी द्वारा अहि भाषा कें लोक भाषा घोषित करैत क्रमानुसार जहि साहित्यकार लोकनि कें स्मरित कएल गेल अछि,तहि मे सं किनकरसभक एकरा लोक भाषाक रूप मे प्रतिष्ठित करबा मे,लोक गाथासभ कें प्रकाशित-सम्मानित करबा मे,भाषा कें लोक चेतनाक संवाहक बनाए कए राखबा मे कोन-कोन आ कतेक योगदान रहल अछि?वर्तनी सं लए कए एकर सभटा वाह्याभ्यन्तर स्वरूप,एकर इतिहास,एकर व्याकरण आ एकर अन्तर्वस्तु पर्यन्त कें एकटा विशिष्ट जातिगत अभिजात्यक जाल मे फांसि कए किऐ बान्हि देल गेल अछि आ अहि काज मे प्रायः सभ आन्दोलनजीवी लोकनि सहभागी किऐ भेल छथि? अद्भुत त इहो गप छै जे अपवादक रूप मे एकटा प्रबोध नारायण सिंह कें छोड़ि,कर्णामृत जतेक लोक कें स्मरण कएलक अछि,से सभ गोटे मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिए सं आबए छथि।रहल मैथिली साहित्यक भारतक कोनो भाषा साहित्यक समकक्ष हएबाक गप,त ई नुकाएल गप नहि अछि जे ई भाषा आइ तक विद्यापति कें छोड़ि आन कोनो अखिल भारतीय व्यक्तित्व नहि दए सकल।साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत कृतिसभ कें जं अहि भाषाक प्रतिनिधि साहित्य मानि ली ( मानबाकहि चाही) त अहि मे सं अधिकांश लेखन आन भाषाक समक्ष ठाढ हएबाक सामर्थ्य नहि राखैत अछि।
मणिपद्मक चर्चा करैत लिखल गेल अछि जे, ‘मणिपद्म जी अपन साहित्यिक प्रतिभा सं मिथिलाक प्राचीन गौरव कें जन जीवनक आशा-आकांक्षा कें अपन लेखनी द्वारा लोकतांत्रिक धरातल पर अनलनि। हुनक ई लोकतांत्रिक प्रवृति मिथिला मे भावात्मक एकता आ मैथिलत्व बोधक कुंजी सिद्ध भेल’। मणिपद्मक योगदान निस्सन्देह अनमोल अछि। ओ अहि क्षेत्र-विशेषक लोक-संस्कृति कें लिखित आ दस्तावेजीकृत करबा लेल जे श्रमसाध्य काज कएलनि अछि,तहि लेल ओ सदैव मन पाड़ल जेता। किन्तु राजनन्दन जीक उक्त वक्तव्य परस्पर विरोधाभासी आ वायवीय अछि।राजतंत्रीय गौरव आ लोकतांत्रिक धरातल दुनू दू चीज छिअए।तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति आ मैथिलत्व बोध सेहो विपरीतार्थक छै।भावात्मक एकताक गप आ जातीय प्रतिद्वन्द्विता सेहो अलग-अलग गप। ई बात आब नुकाएल नहि रहल जे पौराणिक ‘मिथिला’ कें पुनर्जीवित करब मैथिल महासभाक अनेक रास गुप्त एजेण्डा मे सं एक अछि। अहि पौराणिक कथाक संग एकटा वृहत्तर समाजक धार्मिक भावना जुड़ल रहल अछि,जेकरा खूब नीक जकां भजएबाक काज भेल अछि।वस्तुतः जं कहियो एकर अस्तित्व रहबो करए त विदेह वंशक समाप्तिक बादहि एकर अस्तित्व समाप्त भए गेल।किन्तु एकटा सुनियोजित तरीका सं एकरा त्रेता,द्वापरक युगादि पर सं छड़पाबैत कलियुगक हरिसिंह देव आ घोर कलियुगक दरभंगा सामन्तक शासित क्षेत्र सं जोड़ि देल गेल अछि। पुरोहित समुदाय कें बुझल छनि जे भारतीय जनमानस धार्मिक मामला मे तर्क-वितर्क नहि करैत अछि आ अपन स्वाभावानुसार अहि अविश्वसनीय छड़पान पर सेहो शंका नहि करत। अहि अविश्वसनीय स्थापनाक चौतरफा लाभ पुरोहित लोकनि लेबाक जोगार कएलनि।पहिल ई जे हुनकासभक जातीय शुद्धता पर इतिहास जे शंका उठबैत अछि,से निर्मूल भए जाए आ ‘मिथिला’ शब्द सं ‘मैथिल’ शब्द जोड़ि अपन वंश कें पुराणकालीन समय सं सम्बद्ध कए लेल जाए। दोसर ई जे ठेठी वा पचपनियां वा तिरहुता नाम सं प्रचलित अहि क्षेत्र-विशेषक भाषा कें मैथिली नाम दए एकरा अपन नव यजमनिका वा खबोत्तर बनाएल जाए।तेसर ई जे अहि मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं अहि क्षेत्र विशेष कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश बनाएल जाए।ई फेहरिस्त और नमहर अछि,किन्तु तेकरसभक चर्चा बाद मे कतहु।एतय एतबे जे हुनकासभक दुर्भाग्य सं देश आजाद भए गेल,राजशाही ढहि गेल आ चहुदिस लोकतंत्रक बयार पसरि गेल।युग-युग सं शिक्षा,समानता आ न्याय सं वंचित समुदाय शनैः-शनैः अपन अधिकार चेतना सं लैस हुअए लागल आ ओकरा मे प्रश्न उठएबाक साहस जागृत भेल। अहि जागरणक परिपेक्ष्य मे राजनन्दन जीक उपरोक्त वक्तव्य सेहो प्रश्नक घेरा मे अछि। मिथिला नामक कोनो वस्तु जं रहए त ओ राजतंत्र रहए।इतिहास गवाह अछि जे प्रायः शत-प्रतिशत राजतंत्री व्यवस्था शोषण पर आधारित रहए आ जं मात्र मिथिले नामक राजतंत्रक गप करी त ओहि मे कराल जनक सन-सन क्रूर आ पापी शासक सेहो भेल छथि। सीताक पिता आ रामक ससुर जनक सेहो अपन राजमहल आ शाही ठाठबाठ कोनो प्रेत-विद्या वा जादूगरीक प्रताप सं ठाढ नहि कएने हेता,प्रजाक शोषणक माध्यमहि सं कएने हेता,भनहि ओ अत्याचार प्रजालोकनिक बर्दाश्तक सीमाक भीतरे रहल हुअए।बर्दाश्तक भीतर हुअए वा बर्दाश्तक बाहर,कोनो प्रकारक शोषण गौरवक विषय नहि भए सकैत अछि।तखनि ओ कोन गौरव रहए जेकरा मणिपद्म लोकतांत्रिक धरातल पर आनलनि?किछु अपवाद छोड़ि मणिपद्मक प्रवृति लोकतांत्रिक रहनि,किन्तु ओ त भारतीय गणतंत्रक नागरिक रहथि;तखनि ओ भूतकालक यात्रा कए मिथिला मे भावात्मक एकता केना आनलनि? आ जं राजनन्दन जी वर्त्तमानक क्षेत्र विशेष कें मिथिला सम्बोधित कए रहल छथि त ई तथाकथित भावात्मक एकताक आन-आन ठामक दर्शनक गप छोड़ू,ई त मणिपद्मक पोथीसभक प्रकाशनहु मे नहि लखा दैत अछि। आन गैर-मैथिल जातिक गप सेहो छोड़ि दिअ,मैथिल ब्राह्मणक कोनो संगठन वा मंच अहि दिशा मे आगू नहि आएल आ ई काज अन्ततः कर्ण कायस्थ लोकनिक संगठन कर्णगोष्ठीए कें किऐ करए पड़ल?तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति त मैथिलत्व-बोधक नम्बर एक दुश्मन अछि।मैथिलत्व बोध वस्तुतः फासीवादक पर्याय अछि। जेना अपन गरदनि मे उनटा स्वास्तिक लटकाए कए हिटलर अपन नस्लीय श्रेष्टताक घोषणा करैत आन नस्लक सफायाक मंशा साधने रहए,तहिना गरदनि मे ताग आ माथ पर पाग राखि ई मैथिलत्व कए रहल अछि। रत्ती-भरि अंतर ई जे दक्षिणाजीवी अहि समुदाय कें नरसंहार करबाक कुब्बत नहि छै आ तें एकर कार्य-पद्धति हिटलर सं कने अलग छै।मने नर-संहार नहि,सर्वहाराक संस्कार-संहार अछि।
बाबूसाहेब चौधरी पर लिखल संस्मरण मे मैथिल संगठनसभक जातीय चरित्र प्रकट भेल अछि।किन्तु ई सायास नहि,राजनन्दन जीक व्यक्तिगत अनुभवक अभिव्यक्तिक क्रम मे अनायास भेल बुझाइत अछि। मिथिला संघक मंत्री पद पर अपन निर्वाचनक कथा कहैत ओ लिखए छथि जे, ‘ज्ञातव्य जे एहि सं पूर्व संघक मंत्री कोनो अब्राह्मण नहि भेल छलाह’। ई कथा बाबूसाहेब चौधरीक योगदानक चर्चाक क्रम मे आएल अछि,मिथिला-मैथिल संगठनसभक कारगुजारीक चर्चाक क्रम मे नहि।किन्तु एतबो लिखब कम नहि छै। अहि सभा-समिति-संगठनसभक इएह इतिहास रहल अछि।पांच-सात गो लगुआ-भिरुआ कें जुटाए कए संगठन बनाए लेब,ओहि मे ‘अखिल भारतीय’ शब्द जोड़ि देब आ ओहि मे कोनो गैरमैथिल कें ओहि मे पैसए नहि देब,पैसल त ओकरा पुनकए नहि देब,पैसाएब त ओकरा अपन भरिया वा पचिलगुआ बनाए कए राखब,इएह त होइत रहल अछि। अहि संग्रहक कोनो लेख मे राजनन्दन जी लिखने छथि जे दरभंगाक विद्यापति सेवा संस्थानक संस्थापक मणिपद्म रहथि। आइ अहि संस्थानक की स्थिति छै?एकोहं द्वितियो नास्ति! कहल जाइत अछि जे पटनाक चेतना समिति यात्री जीक परिकल्पना छल—भाषा आ साहित्यक उत्थान लेल।इहो समिति आइ शुद्ध रूप सं मैथिल लोकनिक जातीय संगठन मे तब्दील भए गेल अछि। को बड़ छोट कहऊ अपराधू!
‘विद्यापति स्मृतिपर्वक सूत्रपात’ मे राजनन्दन जी अहि स्मृतिपर्वक शुरुआतक श्रेय नरेन्द्रनाथ दास विद्यालंकार जी कें दए छथि। कतिपय ठाम एकर सूत्रधार कांचीनाथ झा किरण जी कें बताएल जाइत अछि।जे से! ई मैथिल महासभाक भैयारी विवाद भए सकैत अछि,ओएह लोकनि निबटाबथु। आम लोक कें ने एकरा सं कोनो मतलब छै आ ने अहि सं ओकरा कोनो फरक पड़ए छै। महत्वपूर्ण अछि अहि लेख मे व्यक्त राजनन्दन जीक चिन्ता, जे अहि पर्व कें मनैबाक तौर-तरीका सं संबंधित अछि आ सार्वजनिक चिन्ताक विषय अछि। हुनक चिन्ताक सारतत्व ई अछि जे अहि आयोजनसभ मे सभकिछु होइत अछि,बस जिनकर नाम पर होइत अछि,तिनकरे अवदानक कोनो चर्चा समक्ष नहि आबि पाबैत अछि। मैथिली सं जुड़ल के एहन व्यक्ति हएत जे हुनक अहि चिन्ता सं सहमत नहि हएत? किन्तु सोचबाक गप ई छै जे की ई आयोजन विद्यापति कें,हुनक अवदान कें स्मरण करबाक लेल होइ छै वा हुनका विपण्णणक वस्तुक रूप मे प्रस्तुत करबा लेल?एतय त ‘हाथीक दांत देखएबा लेल और,खएबा लेल और’ बला कहबी चरितार्थ भेल छै। नाम विद्यापतिक आ काम व्यक्तिगत विज्ञापन वा अर्थ-संग्रह।तखनि मुश्किल ई छै जे एहन चिन्ता व्यक्त करलाक बादो राजनन्दन जी अहि पैटर्न पर आनो आन कवि,साहित्यकार,गवेषक एवं आन्दोलनकर्ता लोकनिक स्मृतिपर्वक आयोजन करबाक सलाह सेहो दए छथि।विद्यापतिक मूल्य-निर्धारण बंगालक लोकसभ कए चुकल छथि,तें हुनका बेचए मे मैथिल लोकनि कें सुविधा छनि,ग्राहक भेटि जाइत छनि। आनहु कोनो मैथिल महामानव कें तहिना ग्राहक भेटि जएतनि,से के कहत!
‘मिथिलाक अतीत’ मे इतिहास सं सम्बन्धित हुनक चिन्ता अहि शब्द मे व्यक्त भेल अछि—‘सभ सं दुखक कथा जे अद्यावधि मिथिलाक प्रमाणिक ओ निष्पक्ष इतिहास मे अपन पितरक कृतित्वक सही मुल्यांकन उपस्थित नहि भए सकल अछि। अपन अतीतक प्रति एतेक उदासीन भाव अन्यत्र कतहु नहि भेटत’। अहि चिन्ताक क्रम मे ओ सम्पूर्ण भारत मे search for identity (आत्म-परिचिति)क दिशा मे लोकक जागरूकताक चर्चा सेहो करए छथि।ई गप जं गैरमैथिल समाजक लेल कहल गेल रहितए त अही सं शत-प्रतिशत सहमतिक गुंजाइश रहए। पुरोहिती वर्चस्वबला व्यवस्था मे आत्म-विस्मृतिक मारल सर्वहारा गैरमैथिल समुदाय शिक्षा आ शिक्षाजनित चेतनाक अभाव मे अपन इतिहास नहि लिखि सकबाक,अपन पितरलोकनिक पुरुषार्थ आ श्रमजीविताक दस्तावेजीकरण नहि कए सकबाक अपराधी अछि।ई अलग बात जे ओकरासभक अहि अपराधक जिम्मेदारी ओकरासभ कें शिक्षा सं वंचित राखनिहार ब्राह्मणे वर्ग पर अछि। किन्तु जेलोकनि राजनन्दन जीक लेखनक अन्तर्वस्तुक तह मे गेल छथि,तिनका बुझल छनि जे हुनक चिन्ता आ चिन्तनक दायरा मात्र मैथिललोकनि तक सीमित अछि। अहि क्षेत्र विशेषक इतिहास-लेखन दिआ ई नुकाएल गप नहि छै जे अहि क्षेत्रक एकक्षत्र क्षेत्राधिकार मैथिलहि लोकनि हथिअएने रहल छथि,अहि मे मात्र पितरहि लोकनिक गुणगान कएल गेल अछि आ ई गुणगान तहि सीमा तक गेल अछि जे बुद्धि-विवेक सं शुन्य पितरहुं कें पण्डित-महापण्डितक उपाधि सं विभुषित कए देल गेल अछि।इतिहास घटित होइत अछि,निर्देशित नहि।दुर्भाग्यवश मिथिला-मैथिलीक इतिहास-लेखनक नाम पर निर्देशन हाबी रहल अछि आ ई कपोल-कल्पना, मिथक,बनावटी तथ्य आ कालविरोधी कुतर्क आदिक क्षुद्र-समन्वयक फलस्वरूप शुद्ध रूप सं मैथिललोकनिक इतिहास भए गेल अछि।एकर माध्यम सं शेष-समाजक अनदेखी आ मानमर्दनक जे सुनियोजित लिखित षड्यंत्र भेल अछि,से एखनहु चुनौतीहीन अछि, अबाध रूप सं जारी अछि। हं,राजनन्दन जीक अहि वक्तव्य कें कर्ण कायस्थलोकनिक दिस सं छेहा मैथिल-ब्राह्मणीय पितर-पूजनक प्रति दबल स्वरबला प्रतिवाद अवश्य मानल जाए सकैत अछि। अहि प्रतिवादक दोसर रूप हुनक ‘मैथिली मे भ्रष्टाचार’ शीर्षक आलेख मे व्यक्त भेल अछि जेतय ओ महाकवि पंडित लाल दासक रमेश्वरचरित मिथिला रामायणक पुनर्मुद्रण मे डा रामदेव झा द्वारा पोथीक सभटा गूड़ गोबर करबा सं आक्रोषित भए ‘मैथिली मे इतिहास कें अशुद्ध करबाक प्रवृति’ आ ‘इतिहास कें मेटएबाक षड्यन्त्र’ आदिक उल्लेख करए छथि। मैथिलत्वक घटाटोपक बीच सं कर्णत्वक एतबो टा किरिण छटकैत अछि त एकरा भविष्य लेल शुभ लक्षण मानल जएबाक चाही। अहि प्रतिरोधी स्वरक सन्दर्भ मे स्वामी विवेकानन्दक चर्चा करैत चली जे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित एकटा अद्वितीय व्यक्तित्व रहथि जे सनातन धर्मक उदार पक्ष कें जगजियार कएलनि।ओ वैदिक सभ्यताक पैरोकार सेहो रहथि। अहि क्रम मे ओ भारतीय जाति-व्यवस्था सं बहुत ऊपरक व्यक्तित्व भए गेल रहथि। किन्तु अहि देश पर जातिक जे आत्मघाती प्रभाव छै,से हुनको नहि बकसलक। ब्राह्मण लोकनि द्वारा हुनका शुद्र घोषित करबाक गप जखनि हुनक संज्ञान मे अएलनि त हुनका सन वैश्विक व्यक्तित्व कें सेहो स्पष्टीकरण देबए पर मजबूर हुअए पड़ल छलनि।ओहि स्थितिक कल्पना मात्र सं मन उद्वेलनक पराकाष्ठा पर चलि जाइत अछि जे एकटा संन्यासी जे घर-परिवार सं विमुख भए विश्व-मानव बनि गेल छला,तिनका ब्राह्मणलोकनिक एकटा क्षुद्र टिप्पणीक कारण अपन वैश्विकता कें कात राखि जाति-व्यवस्थाक रौरव नरक मे घुरि अपन जन्मना जातिक उच्चताक गप कहए पड़लनि। हुनक कहब रहनि—“ओ लोकनि हमरा शुद्र कहए छथि आ ललकारि कए पुछए छथि जे शुद्र कें संन्यासी हएबाक की अधिकार अछि? हमर उत्तर अछि जे हमर उत्पत्ति ओहि पुरुष सं अछि,जिनकर चरण पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ कहैत पुष्पांजलि समर्पित करैत अछि आ जिनकर वंशज अतिशुद्ध क्षत्रिय छथि ……”।रामदेव झाक करतूत पर राजनन्दन जी द्वारा कएल उपरोक्त टिप्पणीक माध्यम सं इतिहास स्वयं कें दोहरएलक अछि।एतय स्वामी विवेकानन्दक एकटा रोचक टिप्पणीक उल्लेख करबाक इच्छा कें नहि रोकि पाबि रहल छी जे ओ अपन एकटा शिष्यक ‘केकरो छुअल अन्न खएबाक’ जिज्ञासाक प्रत्युत्तर मे कएने रहथि। स्वामी जी अहि सन्दर्भ मे आन-आन बात कहबाक संग व्यंग्यात्मक आक्रोष मे ईहो कहने रहथि—‘कलकता मे जाति-विचार त और मजेदार अछि।देखल जाइत अछि जे अनेक ब्राह्मण आ कायस्थ होटलसभ मे भात खाए रहल छथि,किन्तु ओलोकनि होटल सं बाहर निकलि समाजक नेता बनि रहल छथि,वएह लोकनि दोसरसभक लेल जाति-विचार तथा अन्न-विचारक नियम बनबए छथि। हमर कहब अछि जे की समाज कें ओहि पाखंडीसभक बनाएल नियमक अनुसार चलबाक चाही?’
‘मैथिली बनाम हिन्दी:बदलैत सन्दर्भ’ मे हिन्दीक प्रति हुनक व्यावहारिक आ पुर्वाग्रहमुक्त दृष्टिकोण समक्ष आएल अछि।एतय ओ किरण जीक ‘हिन्दी कुलच्छिनी कें झाड़ू मारि भगएबाक’ प्रतिक्रियावादिता सं दूर छथि। प्रायः एकर कारण ई जे ओ हिन्दीक शक्ति-सामर्थ्य कें बुझए छथि आ अहि भाषाक लाभक भुक्तभोगी रहल छथि।ओहुना कोनो भाषा कोनो भाषाक शत्रु नहि होइत अछि आ इहो बहुत साफ छै जे हिन्दीक विरोध मैथिली सं जुड़ल ओहने तत्व द्वारा भेल अछि जे हीनभावना सं ग्रसित छथि आ हिन्दी मे शुद्ध-शुद्ध दू पंक्ति नहि लिखि सकए छथि। हिन्दी-विरोधी स्वघोषित मैथिली-हितकारी लोकनिक समाजक बीच रहि एहन बौद्धिक साहसक प्रदर्शन लेल राजनन्दन जीक प्रशंसा हएबाक चाही।
‘मैथिलत्वक बोध’ आलेख महासभाइ मानसिकताक उपज अछि। ‘मैथिलत्वक बोध नहि भेने दृष्टिकोण व्यापक नहि भए सकैछ आ हमरालोकनि अपन विभूति,संत ओ मनीषी कें चिन्हि नहि सकैत छी’ सन टिप्पणी सं सहमत हएब कोनो गैरमैथिल लेल संभव नहि अछि।बल्कि अधिकांश प्रगतिशील मैथिलहुं अहि दृष्टि-संकोचक पक्षधर नहि भए सकता।ई मैथिलत्व बोधहि अछि जे मैथिली साहित्य कें नचारी-जगतक मध्ययुगीन भूलभुलैया मे भटकाए रहल अछि आ एकरा आधुनिकता-बोध सं कतिअएने रहल अछि। अहि तथ्य कें प्रमाणक बेगरता नहि छै जे जेलोकनि अहि मैथिलत्व-बोधक प्रतिगामी मार्ग छोड़लनि,वएह लोकनि आन भाषा-साहित्यक समकक्ष अपन रचना कें ठाढ कए सकला अछि।
‘मैथिलीक विरुद्ध कुचक्र’ अन्हार घर मे सांपे-सांप बला फकरा कें प्रमाणित करैत अछि।पहिनहि लिखि चुकल छी जे कट्टरता आत्मनिरीक्षणक पद्धति कें स्वीकार नहि करैत अछि आ अपन क्षुद्रता,अपन निर्बलताक लेल कोनो आन कें दोषी ठहराबैत अछि आ से दोषी प्रत्यक्ष नहि हुअए त काल्पनिक शत्रु कें ठाढ करैत अछि।एतहु दरभंगा आकाशवाणी द्वारा सीतामढी,समस्तीपुर तथा बेगुसराय कें मैथिली भाषी क्षेत्र सं अलग कए देबाक निर्णय पर रोदना ठानल गेल अछि आ तहि लेल मिथिला मैथिलीक विरुद्ध षड्यंत्रक इतिहासक बड़ पुरान हेबाक दोहाइ देल गेल अछि।प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शत्रुसभ कें दोषारोपी बनैबाक जे मैथिल परिपाटी रहल अछि,तेकर पालन सेहो कएल गेल अछि।एतय स्वाभाविक रूप सं ई प्रश्न उठैत अछि जे अपन पुरोहिती गुमान आ नव-नव यजमनिकाक खोज आ निर्माणक क्रम मे अहां मिथिला नामक मिथकीय भूखण्ड कें वर्त्तमान मे उपस्थित कए एकर अन्तर्गत भारत-भूमिक अनेकानेक क्षेत्रक संग नेपालक नमहर भूभाग कें सम्मिलित कए लेलिअए। ठीक छै! वर्त्तमान लोकतंत्रीय भारत मे स्वयं कें धर्म-संस्कृति-व्यवस्थाक स्वघोषित ठेकेदार मानि अहां कें राजतंत्रीय संस्कृतिक खेलौर करबाक अछि,त करू।किन्तु अजुका सजग-सचेत भेल समाज कें मध्ययुगीन मानसिकताबला मुर्ख मानि ओकरासभ सं अपन प्रपंच-कर्मक शब्दसः सम्पुष्टिक अपेक्षाक भ्रम किऐ अछि अहां कें? हिन्दीबला जखनि मैथिली कें हिन्दीक उपभाषा कहैत अछि,त अहांक मगज टीकासन धरि लैत अछि।किन्तु अंगिका,बज्जिका,मगही आदि कें मैथिलीक उपभाषा घोषित करैत काल अपन मैथिलत्वक अहं मे ई बिसरि जाइ छिअए जे अहांक अहि मारण-मंत्रोच्चार सं हुनकोसभक पित्त लहरि जाइत हेतनि। अहां अपन इतिहास कें षड्यंत्र-कुचक्र-प्रपंच-छल-छद्मक रोशनाइ सं लिखि स्वयं अपनहि लिखल सं भ्रमित होउ। ठीक छै! आन लोक जं ओकर वस्तुसत्य जानि ओहि कुचालि मे फंसए सं नठए छथि त हुनकासभ पर कुचक्रक दोष देब कतहु सं उचित नहि अछि।कोनो तर्कक आधारभूमि जं यथार्थ पर टिकल नहि हुअए त ओ कुतर्कक श्रेणीक वस्तु थिक।प्रत्येक इलाका सं दू-एक टा मैथिली लेखकक नाम गिनएने सं ने ओ क्षेत्र मैथिलीभाषी भए जाइ छै आ ने ओ मिथिलाक क्षेत्रांतर्गत आबि त्रेतायुग मे घुरिकए स्थापित भए जाइ छै।कलकत्ता त मैथिलीक लेल खूब गतिशील क्षेत्र रहल अछि,आधुनिक विकासक क्रम मे मारिते रास मैथिलीभाषी लोक देशक आनहु-आन विभिन्न क्षेत्रक रहवासी भए गेला अछि आ तें पटना,दिल्ली,मुम्बई,हैदराबाद आदि अनेक नगर-महानगर मे दू-एक टा मैथिलीक लेखक छथि।तेंकि ई सभटा इलाका मैथिलीभाषी आ मिथिला नामक मृत-प्रदेशक यमशासित क्षेत्रांतर्गत भए गेलए? लेखनक अहि अतिवाद सं बचबाक चाही। अहि सं लेखक विवादग्रस्त भए चर्चाक केन्द्र मे आबि सकैत अछि किन्तु ई अतिवाद भाषाक लेल बहुत घातक अछि।
‘बहुतो संघर्ष आ प्रयासक पश्चात बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा मे एक ऐच्छिक विषयक रूप मे मान्यता प्राप्त भेलैक।जकर प्रतिफल ई भेल जे शताधिक मैथिलीभाषी प्रत्याशी सरकारी नौकरी मे परीक्षा पास कए पदासीन भेलाह।एहि मे अधिकांशतः पछुआएले जाति तथा जन-बोनिहार वर्गक परिवार सं आयल शिक्षित युवक-युवती लाभान्वित होइत गेलीह।‘ 1998 ई मे लिखल ई टिप्पणी ‘केन्द्र सरकार ओ मैथिली’ शीर्षक लेख मे आएल अछि। अहि टिप्पणीक पक्ष मे कोनो आंकड़ा देबाक आवश्यकता नहि बुझल गेल अछि।एहन कोनो आंकड़ा अछिओ नहि।यथार्थ सेहो नहि।सत्य ई छै जे बिहार लोक सेवा आयोग मे मैथिलीक रहला सं मात्र मैथिल लोकनि लाभान्वित भेला अछि।पछुआएल जाति आ जन-बोनिहारक बेटा-बेटीक लाभान्वित हएबाक गप मात्र सरकार कें भ्रमित करबाक लेल कहल गेल अछि।मैथिलीए किऐ,आन-आन भाषा सेहो लोक सेवा आयोगक विषय बनए आ विभिन्न भाषाभाषी अहि सं लाभान्वित होथि,से के नहि चाहत।किन्तु तहि लेल अहि तरहक असत्य आ अपुष्ट सांख्यिकीक दुरुपयोग हुअए,से किनकहु स्वीकार नहि भए सकैत अछि।
‘संविधान मे मैथिलीक प्रवेश’ लेख मे राजनन्दन जी संविधानक आठम अनुसू्ची मे मैथिलीक अएबा सं अत्यधिक भावविभोर भेल छथि आ एकर आठ गो लाभ गिनबैत लाभ संख्यां-3 मे कहए छथि—‘मिथिलांचल आब अहिन्दीभाषी क्षेत्र मानल जाएत तथा एहि अंचलक लोक हिन्दी नहि,मैथिली भाषी मानल जयताह।‘ई रुमानी सोचक पराकाष्ठा छिअए। यथार्थविरहित यथार्थ एकरे कहल जाइ छै। एतबे नहि,लेखक अंत मे ओ दूटा निवेदन करए छथि,जहि मे निवेदन संख्या-1 अछि – ‘मैथिलीभाषी आबहु हीन भावना सं मुक्त होथि तथा अपना कें मैथिलीभाषी तथा मैथिल कहैबा मे गौरवक बोध करथि’।ई केहन निवेदन अछि जे हीन भावना सं मुक्त हएबाक गप करैत अछि आ हीनता दिस जएबाक आग्रह करैत अछि! मैथिलीभाषी कें मैथिलीभाषी कहैबा/कहबा मे की आपत्ति भए सकैत अछि?किन्तु युग-युग सं श्रम आ पौरुषक बल पर अपन जिनगीक गाथा गढनिहार लोकनि अपन मस्तक पर दक्षिणाजीविता आ पराश्रयताक समानार्थी बनल शब्द ‘मैथिल’ लिखाएब/लिखब कें स्वीकार किऐ करता? अपन भुजदण्डक सामर्थ्य पर आस्था राखनिहार श्रमजीवी पुरुष भूखल नहि रहि सकैत अछि आ जं दुर्भाग्यवश एहन कोनो स्थिति आबियो जाएत त ओ भूख सं मरि जाएत,याचना करब वा भीख मांगब कबूल नहि करत।
राजनन्दन जीक मानस पर कलकत्ताक स्वार्थपोषित आन्दोलनी गतिविधि आ ओकर नाराबाजी सभक तेहन प्रभाव पड़ल छनि जे ओ समस्यासभ कें चिन्हितहु ओकर समाधान लेल गगनविहारिताक मार्ग पकड़ि लए छथि,एकदम रूमानी खयालक दुनियां मे चलि जाइ छथि।‘मिथिला-मैथिलीक विकासक प्रश्न’ लेख मे ‘मिथिला मूलतः कृषि प्रधान क्षेत्र रहल अछि।रौदी,दाही,बाढि आदिक प्रकोप सं त्रस्त। आमलोक सामंती व्यवस्था मे शोषणक शिकार रहबे कएल अछि। अन्न-वस्त्र विहीन,दारिद्र्य,अशिक्षा,रोगग्रस्त जीवन मे एकोपल सुख-चैन सं रहबाक स्थिति नहि भेलैक।भय सं त्रस्त,आंखिक नोर कहियो सुखैलैक नहि।…..आइयो स्थिति अनुकूल नहि अछि……ओहिना रौदी,दाही,बाढि,बिजलीक अभाव,बाट-घाटक अभाव,जीवाक हेतु शुद्ध विकार विहीन जलक अभाव,शिक्षाक हेतु विद्यालयक सुविधा, चिकित्साक हेतु डाक्टर,अस्पताल दवाई-विरोधक अभाव आदि,आदि।‘ सन जमीनी वास्तविकताक विवरण लिखनिहार राजनन्दन जी अहिसभक समाधान लेल ‘चेतना समिति,पटना’ सन संस्थाक सक्रियताक कामना करए छथि। ओ लिखय छथि—‘हमरा जनैत चेतना समिति,पटना सन एनजीओ (NGO) संस्था एहि दिशा मे जं क्रियाशील हो त काज किछु भए सकैत अछि’। चेतना समितिक अचेतना, सुप्त-चेतना दिआ किनका नहि बूझल छनि।भाषा-साहित्यक उन्नयन लेल बनल ई संस्था शुद्ध रूप सं जातीय संगठन आ जातिअहुक एकटा गुट-विशेषक रखनी जकां भेल अछि,जेकरा ने लोकतंत्री-पद्धति पर विश्वास छै आ ने गैर-मैथिलक चिन्ता।जे अपन ढेके सम्हारए मे अपस्यांत अछि,ओ आन लेल शमियाना आ दरी-जाजिम बिछाएत,ई अपेक्षा कोनो होशगर लोक केना करत?
जाधरि हम राजनन्दन लाल दास जी कें मात्र ‘कर्णामृतक सम्पादक’ रूप मे देखैत रहलियनि,हमर मन मे हुनकर छवि एकटा कद्दावर साहित्य-सेवी,अल्पायु होइत मैथिली पत्रिकासभक बीच मे ‘कर्णामृत’ कें अपन श्रम आ समर्पणक बदौलत दीर्घजीवन देनिहार एकटा मिशनरी व्यक्तिक बनल रहल। हुनक सम्पादकीय आ अन्य लेखादिक संग्रह ‘चित्रा-विचित्रा’ कें समग्रता मे देखि/पढि हुनक ओ पूर्व छवि खण्डित होइत अछि।तीन मास पर हुनक सम्पादकीय पढबाक क्रम मे कथनसभक पुनरावृति, परम्परा-पोषणक भाव,पाखण्डसभक अंध-संपुष्टि आदिक आभास नहि होइत रहए,जे अहि संग्रहक समग्र अवलोकनक क्रम मे भेल अछि।सम्पूर्ण संग्रह मे मिथिला-मैथिल-मैथिलत्व आदि शब्दक ततेक बेर प्रयोग भेल अछि जे मन एकदम सं खिन्न आ उचाट जकां भए जाइत अछि। पौराणिक पात्र ‘मिथि’क मिथकीय कथा मन पड़ैत अछि,जाहि मे मृत निमिक देह कें ॠषिगण (जे ब्राह्मणे होइत छला) द्वारा मथल गेलाक उपरांत मिथिक प्राकट्य होइत अछि।कथाक अनुसार इएह ‘मिथि’क नाम पर ‘मिथिला’ संज्ञाक उद्भव भेल।ब्राह्मण द्वारा मथल अर्थात ब्राह्मण द्वारा जनित। अजुका युगक कोनो प्रचंड मुर्खहु कें बुझल छै जे कोनो मृत देह कें कतबो मथल जाइ,ओहि सं कोनो जीवित शरीर ठाढ नहि कएल जाए सकैत अछि,चाहे मथनिहार ब्राह्मण हुअए, शुद्र हुअए वा साक्षात अवतरित भेल कोनो विधाता।शाश्वत सत्य छै जे मृत व्यक्ति फेर सं नहि जीबैछ,बीतल राति फेर सं नहि आबैछ आ विगत उच्छ्वास फेर सं नहि घुरैछ। अहि स्थिति मे मनु महाराज द्वारा ‘विदेह’क जे अर्थ देल गेल अछि,से बेसी उपयुक्त आ समीचीन बुझाइत अछि।मनुस्मृतिक अनुसार ब्राह्मण पिता आ वैश्य स्त्री सं उत्पन्न संतान ‘विदेह’ अछि।एतय विदेह शब्दक व्याख्या करब वा ओकर उत्पत्तिक स्रोत खोजब उद्देश्य नहि अछि।एतय मात्र अहि सन्दर्भक चर्चा करब अछि जे पौराणिकताक प्रति अंधताक हद तक जाइत मैथिल-आग्रह हुनकासभ सं ओएहसभ करबा रहल अछि जे पुराणादि मे भेल अछि। ओसभ मानि लेने छथि जे बेर-बेर मथला सं, बेर-बेर गीजला सं मृत देह,मृत विचार,मृत राज्य आदि-इत्यादि कें पुनर्जीवित कएल जाए सकैत अछि। ई भने सायास नहि हुअए,संगतिक प्रभाव सं हुअए,राजनन्दन जीक मानस पर तेकर असर छनि।गोएबल्सक संगति मे रहनिहार हिटलर-दल सेहो एहने प्रभाव मे पड़ल रहए।परिणति की भेलए,से सभ कें बूझल छै।
अहि संग्रहक पाठ-यात्रा करैत,एकर आलेखसभ पर नजरि खिरएलाक बाद निष्कर्षतः ई कहि सकए छी जे राजनन्दन जीक आलेख-संग्रह कें साहित्यिक कृति मानला सं अनेक रास विवाद भए सकैत अछि, अहि पर तथ्यमूलक टिप्पणी करबाक परिणामस्वरूप अप्रिय स्थिति बनि सकैत अछि,एकर लोकपक्षी समालोचना सं पुरोहित समुदायक आबालवृद्धलोकनि क्रुद्ध भए गारि-सराप पर उतरि सकए छथि। तें ‘चित्रा-विचित्रा’ कें आन्दोलनजीवी लोकनिक प्रचार-साहित्य/प्रोपगण्डा लिटरेचर मानि लेब सभ सं सुरक्षित विकल्प अछि। हं, ई कहबा/मानबा मे कोनो संकोच नहि जे मैथिलवादी-गिरोह द्वारा अपन एजेण्डाक क्रियान्वयन लेल समय-समय पर की-की अनर्गल प्रचारित कएल गेल आ तेकर प्रभाव मे आबि पढलो-लिखल समाज केना भ्रमित भेल,तेकर अधिकांश कें समग्रता मे जानबाक-बुझबाक लेल ‘चित्रा-विचित्रा’ बहुत उपयोगी संग्रह अछि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
विजय इस्सर"वत्स"

Suggested citation: अरविन्द ठाकुर. ““चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 333, 2021-11-01. https://www.videha.co.in/research/2021/333/चित्रा-विचित्रा-सं-प्रदर्शित-होइत-मैथिल-प्रिमिटिविज्म.htm

मूल विदेह अंक / Original issue