विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट (घूमक्कर वाचक)

डाॅ. किशन कारीगर · 2021-11-15 · अंक 334

डाॅ. किशन कारीगर- मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट(घूमक्कर वाचक)
२.२.मणिकांत ठाकुर- चिंता मामा
२.३.ज्ञानवर्द्धन कंठ- अभिनव दधीचि
२.४.आशीष अनचिन्हार- गजलक रखबार सूतल अछि
२.५.मुन्नाजी- बीहनि कथाक विकास मे रचनाकारक योगदान
२.६.संतोष कुमार राय 'बटोही'- मंगरौना (धारावाहिक उपन्यास)-पहिल खेप
२.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- लजकोटर- ३१म खेप
डाॅ. किशन कारीगर
मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट(घूमक्कर वाचक)
अहूं कहब ग ने जे बलू कारीगर भैंट जेका किए बड़बड़ाइए हइ.? अहां सुनियौ ने जे ओइ बड़बड़ि मे कते काजक गप होइ छै आ लोक के रमनगरो लगै छै? भांट हमरा जनतबे बुढ़ पुरान के मुँहे सुनल जे हइ एना किए भैंट जेका बजैत रहै छैं. ताबे दोसर गोटे बाजल जे उ भैंट बजै की छै से सुनीयै ने?
मिथिला मे भैंट सब गामे गाम घूमि के लोक सब लक मनोरंजनात्मक रूप मे बजै गबै छलै. जै मे गाम लोक के खिदहांस, बड़ाई, उकटा पैंची, छल कपट, बैमानी शैतानी, झगड़ा सलाह, आदि के वर्णन उ फकड़ा रूपे बाजि,कहि,गाबि के करैत रहै.
भांटि के घूमक्कर वाचक सेहो कहि सकब. ओकर मुख्य काज रहै गामे गाम जाके लोक के दूरे दरब्बजे जा के वाचक लोक शैली मे मनोरंजन करब. आ लोक तेकरा बदला मे भैंट के धान चाउर, रूपैया, चीज बौस जेकरा जे जुड़ै से दै. अहि स भैंट के गुजर बसर होइत रहै.
भैंट अपना वाचक प्रस्तुति मे समाजिक बेबस्था बैमानी शैतानी नीक बेजाए पर बेस कटाक्ष करै आ हंसि गाबि के तेना जे लोक के अनसोंहातो नै लगै..
भैंटक कहल फकड़ा…
कारी मुँह मे उज्जर दांत देखलों
उज्जर मुँह मे कारी दांत देखलों
धन रहैतो खाइ लै औनी पथारी देखलों
बाबूए सीरे खा बमफलाट छौंड़ा देखलो
बुढ़बा के केकरो स पटरी खाइत ने देखलो
बज्र कोढ़िया के दूरा सर कुटमार ने देखलो
अपने मे लड़ै जाइए दियादी मिलान ने देखलों
उनटे भैंटे के गरिअबैत फलां बाबू के देखलों
सर समाज लै काज करैत चिंला बाबू के देखलों
अनके भरोसे बैसल रहैए बाबूू के देखलौं
साउस पुतौह के झगड़ा मे आगि लगाएब टोलबैया के देखलों
झगड़ा भेल पंचैति काल पंच बाबू के नीपत्ता देखलों
(इ फकड़ा सब बुढ़ पुरान क मुँहे सुनल.. जे कहांदिनु हमरो गाम मंगरौना मे (भरौड़ा) गोनू झा के गाम स भैंट सब अबै आ फकड़ा बचै इ सब कहै)
फकड़ा स्पष्टीकरण भ रहल जे ओ भैंट सब समाजक सब स्वरूप के देखार चिनहार लोक शैली फकड़ा रूपे क के लोक के मनोरंजन करै. तकरा बाद लोक ओकरा जे जुरै से दै आ ओकर आजीविका चलै.
पमरीया जेका भैंटो सबके गाम आ इलाका बांटल रहै आ सब अपना इलाका मे घूमी घूमी बिशुद्ध रूपे लोकक मनोरंजन करै. अपना मे मिलानी बाद भैंट सब एक दोसरा के इलाका मे सेहो जाइत रहै.
आब भैंट किनसाइते कतौह देखबा मे अबै छै. जेना उ भैंट सब मिथिला स बिलुप्त भेल जा रहल. ओइ भैंट सब के फेर स ताकि ओकरा संरक्षित करबाक सीमूहिक प्रयास हेबाक चाही.
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मणिकांत ठाकुर
चिंता मामा
चिंता मामा हुनक नाम नहि छलैन- हमही सभ से कहैत छलियनि।हमर पित्ती सभ आ गामक अंतरंग लोक सभ हुनका चिंता बाबू कहैत छलथिन मुदा नाम छलनि चिंतामणि मिश्र। हमरा मात्रिक में हमरे जकाँ ओहो पूर्वक भगिनमाने छलाह।सात भाई छलाह आ सभ भाई छ-फुट्टा जवान छलाह। रंग म्लान छलनि मुदा मोंछ स भड़क़दार लगैत छलाह। अधोवस्त्र नहि रहने बेशीकाल एकटा चद्दरिए ओढ़ने रहैत छलाह आ ताही परिवेश में हमरो गाम अबैत छलाह। परिवार निर्धन आ ज़मीन कम, तैं सभ एक्के संग रहथि, खेती-पथाड़ी सभ संगे करथि।
आन भाई सभ द त नहि ज्ञात भेल कहियो मुदा चिंता मामा ज़रूर अपना बहीन अर्थात् हमरा माय आ धीयापूता अर्थात् हमरा लोकनि के कुशल मंगलक जिज्ञासा करए साल में दू-तीन बेर हमरा ओतए आबिए जाइत छलाह। अप्पन माम साल-दू साल पर अबैत छलाह मुदा चिंता मामा के अबाई अधिक नियमित छलनि। हुनका पर अतिथिक ऐतिहासिक परिभाषा बहुत किछु लागू होईत छल- “अतति निरंतरं गच्छति भ्रमति इति अतिथिः “ । हमरा ओहि ठाम स निवृत्त भ ओ अपना एकटा बहीन छलथिन लदारी गाम में - हुनके ओतए चलि जाइत रहथि। कहथि- जखन घर स निकलले छी त एक धाप ओहू ठाम जाए कुशल मंगल बुझिए आबी। हमरा घर में जे भनसिया छली से हुनका चलि गेला पर बहुत आफ़ियत अनुभव करैत छली जे एक कोहा अतिरिक्त भात आब नहि रान्हय पड़तनि। चिंतामामा कहिया औताह से अज्ञात रहितो हिनक़ा एबाक ख़बरि सहजे पूरा टोल में तुरंत पसरि जाइत छल।
चिंता मामाक अबाई के सभ स पैघ आकर्षण रहैत छल हिनकर भोजनक प्रति स्नेह।भोजन काल में राति हो या दिन, कम स कम आठ-दास गोटा हुनका देखबा लेल त आबिए जाइत छलाह। ई सिलसिला चारि पाँच दिन चलिते छल।हिनक़ा आगू में सब स बड़का थारी में भरि क केवल भाते परसल जाइत छलनि सहो बिना सँठने किएक त शीघ्रे दोसर परिथन के प्रयोजन भ जाइत छलैक।ओ थारी लगभग हिनके एला पर बाहर होईत छल सुविधा ललेल। भातक हरेक परसन संग एक बट्टा क दालि, तकर तरकारी, चटनी आदि ज़रूर पडैत छलनि। तरकारी में अधिक काल सजमनि, क़दीमा, भाँटा बारीक सीम आदि बनैत छल। तरुआ, पापड़, दनौरी आदिक आवश्यकता नहि बुझल जाइत छलैक। ओ भोजन करए काल जल ग्रहण नहि करितथि कियेक त वैदजीक मनाही छलनि। लोको कहनि- औ सुअन्न खाऊ ने, पानि त घरो पर भेटत। एहि बात सभक अधलाह नहि मानैत छलाह- अवधारने छलाह।सज्जन लोक, धुआ-धाजाक हिसाबे बज़ैत कम छलाह।
एक बेर चिंता मामा विदा होईत काल कहलनि- बौआ राति क जाड़ बहुत होईत अछि, से एकटा अंगा कि गंजी होईत त नीक। हमरा डर भेल जे हिनक़ा ने त हमर अंगे अँटतनि आ ने गंजीए देह पर चढ़ि सकतनि। देह हमरा स तिनगुन्ना।तखन निर्णय शीघ्र करबाक़ दबाव में हम कहल- मामा, अहां बरू हमर स्वेटरे ल लीअ। नमरि क आंशिको रूपे शरीर के ठंढा स सुरक्षा करत त हैत जे देह पर किछु सटल अछि। ओ तुरंते मानि गेलाह आ जखन आनि क देलियनि त पहिरियो लेलनि घीचि तीर क । छोट रहने कहुना आधा पेट पर आबि स्वेटर लटकि गेलनि। ओ ताहि स कनियों क्षुब्ध नहि भेला। हम तकरा बाद चरण-स्पर्श कैल आ ओ ख़ुशी ख़ुशी पच्छिम मुँह बिदा भेला।
आहि रे बा, ओ चारियो डेग ने देने हेता कि पूब स झौं झौं करैत हमरा भाई के अलशीशियन कुकुर “बिजली”हुनका पर टूटल। ओ बाप-बाप करैत पड़ैलाह मुदा कुकुर छड़पि क हुनका लग तुरंत पहुँचि गेल। मामा पड़ा रहल छलाह आ कुकुर खेहारि रहल छल। लोक कुकुर के रोकबा लेल तरह तरह के आवाज़ क रहल छल मुदा बिजली लेखे किछु ने। आख़िर, हुनका घुट्टा धोती के पकड़ि क फाड़ि देलकनि। ओ दूनू हाथे कुकुर के प्रतिकार अथक प्रयास स हौ-हौ द्वारा करबा में व्यस्त छलाह आ ओमहर कुकुर छल जे मानए बला नहि। छाबा में हबकियए लेलकनि। कुकुर के पकडल गेल ताधरि देरी भ चुकल छल। तखन जल्दी स एकटा लालटेम आनि ओकरा मटिया तेल तेल के घाव पर भुभकाएल गेल। घाव के तेल स भिजा देल गेल जे बिक्ख नहि लगैन्ह। मामा आहत आ डेराएल घंटा भरि बिलमि कि आख़िर बिदा भ गेलाह।
चारि पाँच मास गुदस्त भ गेल। बेचारी बिजली कुकुर एहि बीच शरीर छोडि देलक। हमर परिवार बहुत दिन धरि शोक-ग्रस्त रहल। ओ मनुक्ख जकाँ बात बुझैत छलि। गेंद पोखरि में फेकि देल जाइक आ जाड़काला क सर्द जलो में छड़पि क ओ बीच पोखरि स हेलि क गेंद आनि दैक आ मुँह दिश ताकि अगिला आदेशक प्रतीक्षा करैक। से बिजली हमरा सभ के छोडि क जा चुकल छल। ताही बीच चिंता मामा एक दिन समागत भेला। साँझ पड़बाक प्रतीक्षा ओ गामक बाहरे बैसि क कए लेने छलाह कुकुरक डsरे आ तखने चोरा नुका क कहुना दरबज्जा पर पाएर देलनि।अबिये हमरे स पूछि बैसलाह-बौआ कुकुर कहाँ अछि? हम उदास होईत कहल- बेचारी चलि गेल छोडि क हमरा सभ के। निश्चित करबा लेल पुनः पुछलनि- कहाँ गेल अछि? हम कहल- भगवान लग। की ने की बुझयलनि, तs फेर जिज्ञासा कैलनि- भगवानपुर में के छथि? हम ज़ोर स कहल- भगवानपुर नहि, भगवान ओतए।त बजलाह- की ओ कटही कुकुर मरि गेल? हम चुप्पे रहलहुँ। ओ तुरंत बजलाह- चलू नीक भेल, एहेन कुकुर केओ राखए ? मरि गेल, नीके भेल। मोन भेल जे कहियनि- अहीं ओकरा बदला मरि गेल रहितहुँ त नीक…।
दरबजा पर पोखरि में महाजाल पड़ल छलैक। बहुतो फड़ीक रहु मांछ ऊपर भेल रहैक।संयोग जे चिंता मामा हमरे ओहिठाम छलाह आ वापस गाम जाइए बला छलाह। माए कहलथिन- भैया, दू टा रहु मांछक कुट्टी तरि क दैत छी एकटा चंगेरा में। कनी, हमरा भाई के घर पर आइए पहुँचा देबैक।हमरा भाई के मांछ नीक लगैत छनि। चिंता मामा सहर्ष स्वीकार क लेलथिन। अपनो भरि पेट मांछ भात खा क चंगेरा भरि तरल मांछक सनेश ल क बिदा भेला।समय बीति गेलैक। किछु मास पश्चात हमर मामा हमरा ओतए संयोग स पहुँचला। माय मांछक चर्चा केलथिन त मामा चुप।माए खरियारि कि फेर पुछलथिन त हुनक जवाब छलनि- नहि, हमरा सभ के त एकटा गैंचीओ ने भेटल, रहुक कोन कथा? तकरा बाद मामा चलि गेलाह। दसे दिन बाद संयोग स चिंता मामा पहुँचला।भोजन काल माए जिज्ञासा केलथिन- भैया, पछिला बेर थोडेक मांछ देने रही…। एतबा सुनब छल कि चिंता मामा भयातुर चेहरा बनबैत बजलाह- बच्चा, पूछू नहि। हमर त जाने बांचि गेल। बुझू जे अपटी खेत में प्राण चलि गेल छल। मांछक सुगंध पर कहाँ ने कहाँ स एकटा साँढ़ पहुंचि गेल। हमरा चारु नाल पटकि क सभटा तरल मांछ खा गेल। हम कहुना चंगेरा ओकरे लग छोडि लंक लगा क भगलहुँ जे जान बांचल।एहन साँढ़ नहि देखल बच्चा। हमर माए की बजितथि? कहलथिन- ओ ज़रूर पूर्व-जन्मक कुकुर रहल हैत…। फेर एकर चर्चा कहियो ने भेल। सनेस पठेबाक सिलसिला सहो बंद भ गेल।
एक बेरक खिस्सा अछि, एकटा हिनकर पड़ोसी अपना भीजल खेत में बूट छीटए चाहैत छलाह। मुदा कातिक मास रहने, जन-बनिहारक बेशी कमी छलैक आ बेरो बीतल जा रहल छलैक। चिंता मामा सभ के संयोग स पता चललनि त अपना भैयारी में सलाह कए बेरिए में खेतबला ओतए पहुँचलाह। कहलथिन जे ई सभ बूट के टोभक प्रबंध क लेता आ खेत बला चिंता नहि करथि। 5 कट्ठा के कोला छलैक, मुदा बियाक जोगार भ गेलैन। बेशी घरे में रहनि मुदा किछु फरीक स पैंच ल क खेत पर जा, कोला भरि बूट छींटि एला। छलनि जे राति भरि में बूट फूलि जेतैक त भोरे पाँचो भाई जा क ओकरा टोभि लेब। खा पिबि क सभ भाई घूर लग बैसि गपशप कए रहल छलाह। ततबे में खेत बला ओतए धमकलाह आ ओसा क एक्केठाम कहि देलखिन - सुनू, बटाई के मादे हमर बिचार बदलि गेल अछि। खेत हम सभ अपने करब, बिया आ जनक प्रबंध सहो भ गेल अछि।मामा कहलथिन- हौ, हम सभ त जा क बीयो छीटि देल, आब ई कोन तमाशा करैत छह? वाद-विवाद भेल, मुदा खेत बला किन्नहु ने मानलक। कहलकनि- हम सवाई लगा क बिया काल्हि द देब, मुदा हमर अपने जन भोरे जा क टोभत बूट। ई बाजि क खेत बला चल जाइत रहलाह।मामा लोकनि विचारए लगलाह- झगड़ा झाँटी आब व्यर्थ। एना करी जे भोरे हुनकर जन तावत् पहुँचत, ताहि स पहिने हमहि सभ भाई आरि पर पहुँचि जाई आ बाओग भेल बूट के खेत में स बीछब शुरू कए दी।बूट फूलल रहतैक त की, घर आनि, धो-पका क जलखै क लेब। सैह भेल। जाधरि खेत बला जन ल क खेत पर पहुँछथि, मामा पाँचो भाई आधा स बेशी खेतक बूट बीछि चुकल छलाह। एहन कहियो ने सुनल ने देखल गेल छल। खेत बला आ पाँचो जन के त जेना अठबज्जर मारि देलकनि ओ दृश्य देखि क। मुदा आब कैए की सकैत छलाह? एमहर मामा सभ घर पहुँचलाह आ ओमहर खेतबला चिकरैत-भोकरैत गाम में पैसला। लोको सुनैक त आश्चर्ये करैक। मामा कहलखिन- औ पंच लोकनि, ई कनी टा बात नहि, खेत द क आ बूट छिटबा क तखन बात बदलि गेलाह। एहन कतहुँ लोक कएलक अछि? चलू, बूट त एक तरहें व्यर्थ नहि भेल मुदा हुनको अढ़ाएल जन के हर्ज क देला स हमरा सभ के ख़ुशी अछि।
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ज्ञानवर्द्धन कंठ
अभिनव दधीचि
अप्रैल,2021।इंदिरा गाँधी अस्पताल,नागपुर।आनल जाइत छथि एकटा पचासी सालक वयोवृद्ध।नाम छियनि नारायण दाभलकर।ऑक्सीजन-लेभेल भ' गेल छनि बहुत डाउन।लगैए,गछारने छनि कोरोना।बड्ड दिक्कम-सिक्कम छैक बेडक।बेड कम, रोगी बेसी।बेडक लेल अछरा-पछरी चलि रहल छैक।एत्तहि नहि, सभतरि।सगर देशमे यैह हालति छैक।कोनहुना जोगार लागि जाइत छैक, वयोवृद्धक लेल एकटा बेडक।राहत भेटैत छनि।
दू घंटाक अभ्यंतर कोनो महिलाक कातर स्वर कर्णगत होइत छैक।ओकरो चाही अपन पतिक लेल एकटा बेड।कोनो भाइ-बहिन दया क' देथुन।सिउथक सिन्नूर बचा देथुन।प्राण आब-तब भेल छनि।साँस उपरे-उपर भेल छनि।गे मैया गे मैया!हा विधाता!
नारायण सुनि लैत छथिन।दाभलकर अपन बेडसँ नीचाँ उतरैत छथि।सिस्टर दौड़ैत छनि-
"हाँ-हाँ, अहाँ किएक बेडसँ नीचाँ उतरलहुँ?केमहर विदा भेलहुँ?बाथरूम जेबैक?नहि?घर आपस जेबैक?माथा खराप भ' गेल अछि?एहि हालतिमे?नहि-नहि।किन्नहुँ नहि..."
डाक्टर लोकनिक मत छनि जे एहन हालतिमे जोखिम लेनाइ उचित नहि।नारायण जिद्द ध' लैत छथिन-
"हम पचासी बरखक छी।अपन जिनगी जी चुकल छी।ओहि महिलाक पतिक बयस चालीससँ बेसी नहि हेतनि।छोट-छोट धीया-पुता हेतनि।हुनकर जिनगी जियान नहि हेबाक चाही।हम अपन बेड हुनका लेल रिक्त कर' चाहैत छी।"
अस्पताल-प्रबंधन बुझेलकनि जे एहन कोनो नियम नहि छैक जे रिक्त बेड हुनके भेटनि,मुदा नारायण नहि-के-नहिये मानलथिन।बेटीक बात सेहो बेठीक लगलनि।घर आपस भ' गेलथिन।ओहि व्यक्तिकेँ बेड द' देल गेलैक।तेसर दिन दाभलकरक उर्ध्व-साँस चल' लगलनि।किछुए कालक बाद कालक कोरमे चलि गेलाह ओ अभिनव दधीचि।

Suggested citation: डाॅ. किशन कारीगर. “मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट (घूमक्कर वाचक).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 334, 2021-11-15. https://www.videha.co.in/research/2021/334/मिथिला-मे-बिलुप्त-भेल-जा-रहल-भांट-भैंट-घूमक्कर-वाचक.htm

मूल विदेह अंक / Original issue