विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

राम लोचन ठाकुरजीक गद्य रचना

आशीष अनचिन्हार · 2022-05-01 · अंक 345

आशीष अनचिन्हार
राम लोचन ठाकुरजीक गद्य रचना

काव्य माने रचना से चाहे जे रचना हो। बहुत लोक जानि-बूझि कऽ अपन स्वार्थ सिद्ध करबाक लेल काव्यकेँ मात्र कविता धरि लऽ जाइत छथि। रचनाकारक अपन प्रकृतिक हिसाबसँ काव्य केर प्रकृति भऽ जाइत छै जाहिमे दू टा मुख्य प्रवृति ताकल गेल पहिल सरस दोसर शुष्क। सरस काव्यकेँ पद्य कहल गेल तँ शुष्क काव्यकेँ गद्य। आब पद्योमे छंद, कथन एवं वर्णनक हिसाबें बहुत भेद भेल जेना ॠचा, मंत्र, गाथा, महाकाव्य, गीत गजल, आधुनिक कविता तेनाहिते गद्योमे बहुत भेद भेल जेना खिस्सा, कथा, उपन्यास, समीक्षा, आलोचना, लेख, निबंध व्यंग्य कथा आदि-आदि।

आधुनिक युगमे गद्य केर प्रधानता भेल मुदा ताहि संगे एकटा भ्रम सेहो शुरू भेल। भ्रम ई जे किछु लोक गद्यकेँ मात्र कथा-उपन्यास धरि लऽ जाइत छथि। एहन लोक सभकेँ कहैत छथि जे गद्य लीखू मुदा हुनकर दृष्टि मात्र कथा रहैत छनि। कथाकार-उपन्यासकार सभ लेख, निबंध, आलोचना, नाटक आदिकेँ गद्य मानिते नै छथि। लेखककेँ एहि तरहक भ्रमसँ बचि कऽ रहबाक चाही।

रामलोचन ठाकुर मैथिली गद्यमे नीक काज केने छथि आ से गद्य केर विभिन्न रूपमे जेना नाटक, लेख-निबंध, व्यंग्य, कथा, संपादकीय, अनुवाद आदि। जँ एकरा हम वर्गीकरण करी तँ एना हएत--

1) अनुवादित नाटक-जादूगर, फाँस, रिहर्सल, चारि पहर, किशुन जी विशुन जी, बाह रे बच्चा राम (6 टा पोथी)
2) व्यंग्य- बेताल कथा (1 टा पोथी)
3) मैथिली लोककथा (1 टा पोथी)
4) आलेख-निबंध- स्मृतिक धोखरल रंग, आँखि मुनने आँखि खोलने (2 टा पोथी)
5) अनुवादित उपन्यास- पद्मा नदीक माँझी, नन्दितनरके, कठपुतरी नाचक इतिकथा, अयाची संधान, रानी गाइदिन्ल्यू (5 टा पोथी)
6) आत्मकथा- सागर लहरि समाना (1 टा पोथी)

कविताक संग रामलोचनजी नाटकमे काज केलाह से काज भने अनुवाद किएक ने हो। ई नाटकक अनुवाद रामलोचनजीक गद्यकेँ बेसी ठोस केलक। नीक नाटक लेल छोट वाक्य बेसी प्रभावी होइत छै। नाटकेक प्रभाव थिक जे रामलोचनजीक आन गद्यक वाक्य छोट अछि। आन काज संगे आलोचक रामलोचन ठाकुरजीक भाषापर काज करथि तँ नीक विषय भऽ सकैए। एहिठाम हम मात्र संकेत केलहुँ अछि।
साहित्यसँ हटि हम किछु काल लेल क्रिकेट दिस चली। एहि खेलमे किछु एहन खेलाड़ी भेलाह जिनका बारेमे विशेषज्ञ सभ कहै छथि जे ओ सभ अपन खेल बालर तौरपर शुरू केने रहथि जेना सनथ जयसूर्या, मनोज प्रभाकर, रवि शास्त्री, शोएब मलिक आदि। मुदा ई सभ बादमे बैटिंगमे आबि गेलाह एवं अंतमे हिनकर सभहक पहिल पहिचान बैट्समैन केर भऽ गेल।

एखन धरि रामलोचन जीक कुल 16 टा पोथी गद्य केर अछि आ कुल 8 टा पोथी पद्य केर। एहि 16 टामे ओ संपादकीय सभ जोड़ब बाँकी अछि जे कि ओ विभिन्न पत्रिकाक संपादन क्रममे लिखने छथि। एकर मतलब जे समग्र रूपमे रामलोचनजीक गद्य केर संख्या पद्यसँ बेसी अछि। अइठाम आबि हम जोर दऽ कऽ कहब जे रामलोचन ठाकुर अपन साहित्य भने पद्यसँ शुरू केने हेताह मुदा ओ भेलाह गद्यकार। संगमे ईहो हम जोड़ब जे ओ अपन साहित्यिक यात्राक बीचसँ जे गद्यकेँ पकड़लनि से ओ अंत धरि नै छुटलनि आ तँइ हुनकर अंतिम समयक रचना सभ गद्ये टामे भेटत।

आब रामलोचन ठाकुरजीक पहिचान गद्यकार रूपमे छनि।

( ३ अप्रैल २०२२ केँ मिथिला विकास परिषद, कोलकाता द्वारा कार्यक्रममे पठित)
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रबीन्द्र नारायण मिश्र
मातृभूमि (उपन्यास)- चारिम खेप
मातृभूमि़

जहिना सोना आगिमे तपओलासँ आओर चमकए लगैत अछि तहिना सुसंगति पाबि शारदाकुंजमेज यन्तक प्रतिभा चरमोत्कर्षपर पहुँच िगेल।
आश्रमवासी विद्यार्थी लोकनि आचार्यजीक संग वसंतपंचमीक अवसरपर सरस्वती आराधनामे तल्लीन छलाह। जानकीधामक समस्त विद्वान आलग-पासक प्रतिष्ठित लोकसभ एहि कार्यक्रममे आमंत्रित छलाह । कालीकान्त स्वयं सभ काज छोड़ि ओहि कार्यक्रममे भाग लए रहल छलाह । कार्यक्रमक प्रारंभ सरस्वती वंदनासँ भेल।
"वरदे! वीणावादिनी वर दे.................”
" विद्यार्थी लोकनि एहि गीतक सस्वर पाठ कए रहल छलाह । स्वरक मधुरता आविद्यार्थी लोकनिक समर्पणभावसँ के नहि प्रभावित छल? अनकर तँ गप्पे छोड़ू । कालीकान्त स्वयं प्रार्थना समाप्त होइतहि आसन छोड़ि विद्यार्थीसभ लग पहुँचि कहैत छथि-
" ई बालक के छथि? हिनकर स्वरमे तँ जेना सरस्वतीक साक्षात बास अछि । हम हिनकर दर्शन कए धन्य छी । धन्य छथि हिनकर आचार्य आएहि आश्रमक समस्त विद्यार्थी लोकनि ।"
अपन शिष्यलोकनिक एहि तरहें प्रशंसा सुनि आचार्यजी गद-गद भए गेलाह ।
" ई सभ अपनके क्षत्र-छायामे भए रहल अछि । बिना अपनेक अनुकंपाकेँ एहिठाम किछु संभव नहि छल ।"
" ई अपनेक महानता अछि आचार्यवर! से कहि कालीकान्त अपन गरदनिमेसँ हीराक हार निकालि जयन्तकेँ पहिरेबाक प्रयास केलनि।
"क्षमा कएल जाए । ई आभूषण अपनेकेँ शोभा दैत अछि । हमरा एकर कोन प्रयोजन?"- से कहि जयन्त हीराक हार कालीकान्तकेँ वापस कए देलाह ।
"हिनका क्षमाकएल जाए । ई बालक कौलिक संस्कारसँ बान्हल छथि । ई ककरो सँ किछु नहि लेबाक संकल्पकेने छथि ।'
कालीकान्त छगुन्तामे पड़ि गेलाह ।
"कोनो बात नहि । हिनकर भावनाक हम सम्मान करैत छी । जखन कखनो हमरासँ किछु सहायताक प्रयोजन होइ तँ अवश्य सूचित करब । "-से कहि कालीकान्त प्रस्थान कए गेलाह ।
(अनुवर्तते)
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डॉ. किशन कारीगर
बीहनि कथा- बाबा भक्त कटाक्ष
बाबा- एं हौ मैथिलीयो मे पत्रकारिता होई छै आ सम्मानो बँटा रहलै की?
भक्त- हं त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका सबके पत्रकारिता कैह देल जाइ छै. मैथिली दैनिक वा चैनल रहितै त मैथिलीवला धनछोहा?
बाबा- एं हौ साहित्यिक दलाल सब सेहो खूब करामात करै लागल?
भक्त- ई सब त शेयर आ कोठा दलाल के पछुआ देलकै? दलाले दलाल?
बाबा- बरहम बाबा तोहरे भरोसे? हे डाइन जोगिन के तकैत रहू?
भक्त- हे झिझिया वाली दाई सब? लोक नृत्य कैह आरो अंधविश्वास के बढ़ाउ?
बाबा- मोछ के मधमनी दिस घुमा देब? लहान मे आँखि के अपरेशन करा देब? पामर बला चशमा पहिरा देब?
भक्त- यौ बाबा हम छी अहाँ के फैंस मिस ने करू डिल्ली बम्बई कमाई के चैंस? लोंगी डैंस लोंगी डैंस
-डाॅ किशन कारीगर (मूल नाम- डाॅ कृष्ण कुमार राय)

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “राम लोचन ठाकुरजीक गद्य रचना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 345, 2022-05-01. https://www.videha.co.in/research/2022/345/राम-लोचन-ठाकुरजीक-गद्य-रचना.htm

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