डा.योगानन्द झा
प्रवासीक स्नेहसँ ओतप्रोत मातृभूमि
स्वनामधन्य श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र बहुआयामी लेखक छथि ।हिन्दी,मैथिली, ओ अंग्रेजीमे समानाधिकार रखनिहार एहि एकान्तसेवी रचनाकारक दर्जनाधिकपोथी प्रकाशित छनि जाहिमे अधिकांश प्रणयन ई मातृभाषा मैथिलीमे कयने छथि । विभिन्न विधामे सिद्धहस्त श्रीमिश्र आत्मकथा,यात्रा-वृतान्त,निबन्ध-प्रबन्ध,कथा ओ उपन्यास आदि अनेक विधामे रचना कयने छथि।खास कऽ हिनक रुचिउपन्यास विधाक प्रणयनमे छनि आ एहि विधामे ई मैथिलीक उपवनमे क्रमशःनमस्तस्यै,महराज, लजकोटर,सीमाक ओहि पार,मातृभूमि,स्वप्नलोक ,शंखनाद, ढहैत देबाल, हम आबि रहल छी,प्रलयक परात,बीति गेल समयआप्रतिबिम्बअभिदानसँ रंग-विरंगक पुष्प-पादप लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि आआधुनिक मैथिली उपन्यास विधाकेँ समपुष्ट कयलनि अछि । हिनक उपन्याससभ समाज ओ राष्ट्रकअभ्युत्थानक प्रति हिनक चिन्तनक विराट आयामकेँ प्रस्तुत कयने अछि । मातृभूमि उपन्यासक माध्यमे ई मातृभाषा ओ मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक कर्त्तव्य बुद्धिक परिष्कारदिस उन्मुख देखि पड़ैत छथि ।
एहि उपन्यासक नायक जयन्त थिकाह ।हिनकहि चरित्रकेँ केन्द्रमे राखि उपन्यासक कथावस्तु बुनल गेल अछि ।जयन्तक पिता विद्या-व्यसनी छलथिन आ अपना गाममे निःशुल्क पाठशाला चलाय शिक्षाक प्रचार-प्रसारमे लागल छलाह ।मुदा हुनक असमय मृत्यु भऽ जाइत छनि आ पाठशालाक व्यवस्था छिन्न-भिन्न भऽ जाइत छैक। असहाय जयन्त कौलिक मर्यादाक रक्षा ओजीवन-यापनमे कठिनताक कारणे मृत्युकेँ वरण करबाक विचार कय नदीमे कूदि पड़ैत छथि । मुदा हुनके गामक एकगोट संत नागाबाबा हुनका बचा लैत छथिन । ओ हुनका शारदाकुंज स्थानपर लऽ जाइत छथिन जतऽ निःशुल्क शिक्षाक व्यवस्था छैक ।अपन नैसर्गिक प्रतिभाक वलें जयन्त आश्रममे रहि विविध विषयक शिक्षा ग्रहण करबामे समर्थ होइत छथि । अन्ततः ओ मिथिलाक विद्वत परंपरापर एकगोट शोधग्रन्थक प्रणयन करैत छथि आ ततःपर गाम घुरि अपन पिता द्वारा स्थापित विद्यालयकेँ पुनः स्थापित करबाक प्रयासमे दत्तचित्त होइत छथि । अनेक विघ्न-बाधाकेँ पार करैत जयन्त अपन एहि अभियानमे सफल होइत छथि तथा प्रवासीलोकनिकअपन मातृभूमिक प्रति स्नेहकेँ जगाय हुनका लोकनिक द्वारा गामक उत्कर्ष हेतु नागबाबा विश्वविद्यालयक स्थापना कऽ उच्च शिक्षाकेँ गाम-समाजक हेतु सहज बनयबामे सफल होइत छथि । ई एकगोट आदर्शोन्मुख यथार्थवादी उपन्यास थिक जाहिमे शिक्षाक अभावमे गाम-समाजक दुरवस्थाक यथार्थक चित्रण तँ भेले अछि संगहि उपन्यासकार ई चिन्तन प्रस्तुत कयलनि अछिजे जँ गामक प्रवासीलोकनि प्रवासमे जीवन-यापन करैतअपन मातृभूमिक सम्पर्क-सान्निध्यमे बनल रहथि आ ओकर अभ्युत्थानमे योगदान दैत रहथि तँ मिथिलाकग्राम्यजीवनक विकासमार्ग निरन्तर प्रशस्त होइत चलत ।ई प्रवासीलोकनिक अपन मातृभूमिक प्रति उदासीनते थिक जकर कारणे मिथिलाक ग्राम्यजीवन अधोगतिकेँ प्राप्त करैत जा रहल अछि ।
सामान्यतः जखन प्रवासीलोकनि अपन जीवन-यापनक हेतु गाम छोड़ि दैत छथि तँ जेना मातृभूमिक प्रति सर्वथा उदासीन भऽ गेल करैत छथि । स्वकीय अर्जन-शक्तिसँ भने ओ सभ प्रवासमे जतबा प्रगति कऽ जाथि मुदा ताहिसँ गामकेँ कोनो लाभ नहि भेटि पबैत छैक । एमहर दयादवादलोकनि हुनक वर्षानुवर्ष अनुपस्थितिक लाभ उठाय हुनक ग्राम्य संपत्तिक अपहरण करबाक उद्देश्यसँअनेक प्रकारक षड़यंत्र करऽ लगैत छथि । जँ कोनो प्रवासी अवकाश प्राप्तिक बाद गाम घुरितो छथि तँ हुनका अनेक प्रकारेँ उछन्नर देल जाइत छनि आ अंततः ओ अपन संपत्ति किछु लऽ दऽ बेचि बिकीन कऽ पुनः प्रवासेमे प्रत्यावर्तिति भऽ जायब लाभकर बुझैत छथि ।एकर परिणामस्वरुप मोनबढ़ू प्रवृत्तिक लोक प्रवासीकेँ गामसँ उपटयबामे समर्थ भऽ जाइत छथि । मातृभूमि उपन्यासक सुधाकर एहने खलनायक थिकाह जे अत्यधिक समय बितलाक उपरान्तजयन्तक घर घुरलापर हुनक पाठशालावला जमीन बलजोरी कब्जा कऽ लेबऽ चाहैत छथिन आ हुनक हत्या पर्यन्त कऽ कऽ हुनका गामसँ उपटाबय चाहैत छथि ।गामक लोकक संगहि सरकारी महकमा ओ पुलिस आ न्याय व्यवस्था सेहो ओहने लोकक संग दैत छैक ।मुदा जयन्त अनशनक माध्यमे सत्याग्रह करैत छथि आ प्रवासी राजीव सन अधिकारीक सहायतासँसुधाकरकेँसकपंज करयबामे समर्थ होइत छथि ।ओ विश्वविद्यालयक हेतु अपन पिताक स्थापित विद्यालयक जमीन पर अबैध कब्जाकेँ हटयबामे सफल होइत छथि । ततबे नहि ओ विश्वविद्यालयक हेतु अतिरिक्त चन्दासँ जमीन कीनि उपटल प्रवासीलोकनिकेँ सेहो बसयबाक उद्योग करैत छथि ।
एहि उपन्यासमे किछुगोट प्रेम कथा सेहो अनुगुम्फित अछि । पहिल कथा थिक शीलाक जेजयन्तक प्रति एकनिष्ठ प्रेम करैत छथि मुदा सामाजिक दबाबक कारणे हुनक पिता हुनका अजग्गि कहला जयबाक भयसँ एकटा अन्य वरसँ विवाह करा दैत छथिन ।शीला सुशील ओ पतिव्रता छथि,तेँ अपन नियतिकेँ अंङ्गीकार कऽ लैत छथि। मुदा हुनकर वर पूर्वहि विआहल रहैत छथि जकर परिणामस्वरुप शीला अपन ससुरक आश्रममे परित्यक्ताक जीवन व्यतीत करबाक हेतु बाध्य भऽ जाइत छथि । कुलीनताक परिचय दैत शीला आग्रह कयलो उत्तर दोसर विवाहक हेतु स्वीकृति प्रदान नहि करैत छथि आ अपन जीवनक लक्ष्य विश्वविद्यालयक सेवा ओ विकासहिकेँ बना लैत छथि।
दोसर प्रेमकथा चन्द्रिका ओ जयन्त सँ सम्वद्ध अछि जाहिमे चन्द्रिका केँ सर्पदंश सँ लऽ कऽ उपचार धरिक कथा अतिव्यापकताक सृजन करैत अछि । हुनक पिताक प्रयासेँ अन्ततः चन्द्रिका ओ जयन्त वैवाहिक बन्धनमे बन्हा जाइत छथि आ उपन्यासक सुखद अन्तक द्योतक बनैत छथि।
अपन आत्माक बात सुनि सुधाकरक समर्पण आकस्मिक घटना जकाँ बुझना जाइत अछि जे औपन्यासिक संघर्षकेँ कमजोर कऽ देलक अछि तथापि एहि उपन्यासकेँ परस्पर विरोधी पात्र सभक सृजनपूर्वक आदर्शक उपस्थापनाक दृष्टिये उत्तम मानल जा सकैत अछि ।
उपन्यासक भाषा प्रसादगुण सम्पन्न,सहज ओ रोचक अछि ।पात्र सभक मनोभावक विश्लेषणमे उपन्यासकार सफल भेल छथि।वस्तु विन्यास युग जीवनक यथार्थपर आधारित अछि।मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक दायित्वक उद्बोधनउपन्यासकारक जीवन-दर्शन ओ जननी-जन्मभूमिक प्रति सहज सिनेहकेँ पल्लवित करैत अछि ।
-योगानन्द झा, भगवतीस्थान मार्ग,कबिलपुर, लहेरियासराय,दरभंगा-846001(बिहार), मो-9334493330
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गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास
गजेन्द्र ठाकुर
द ........ फाइल्स
(दोसर खेप)
२
कएक दिन बीति गेल, डेटा, डेटा, डेटा…
बैलेंस शीट, एक्सेल फाइल, फेक अकाउण्ट, फेक इनवोइस..
फेर सभ फेक अकाउण्ट लेल एकटा कनसोलिडेटेड इनवोइस..आ तइसँ बनल ट्रायल बैलेंस… आ से डेटा गेल चार्टर्ड अकाउण्टेण्ट लग। आ तखन बनल ऑडिटेड बैलेंस शीट.. पकिया बला!
“एतेक सामग्री अहाँ लग अछि, अहाँ कोनो पैघे लोक छी, कारण कोनो संगठनक छोट-छीन लोकक हाथमे एतेक डेटा नै एतै। गढ़-नारिकेल एकटा रहस्य छै आ ई रहस्ये छिऐ ई दुनियाँ”।
“हमहूँ छी एकटा रहस्ये। गढ़-नारिकेलक कर्ज। हम सभटा गप कहब, किछुओ नुकाएब नै अहाँसँ, से समए आएत। एकबेर जखने शुरू कऽ देलौं अहाँ ई काज, तखने हम निश्चिन्त भऽ गेलौं। हमरा बुझल छल जे अनका ई डेटा देखेबै तँ ओ बुझबो करत आकि नै, आ जँ बुझि कय डेरा बा बिका जाय। आइक बाद हमरा आ अहाँक भेँट नै हएत, कोनो सूचनाक आदान-प्रदान आइक बाद आब डार्क-वेब टा पर हएत”।
…………………………………
आ ओ चलि गेल।
ओकरा जिताएब हम।
ओ जीतत तँ जीतब हम।
एतेक सूचना, एतेक धरि खसि गेल लूकक सूचना?
सूचना आ डेटा बनि गेल अछि बड़का खेल। सभकेँ बूझल छै सभटा गप आ सभ गबदी मारने अछि बैसल।
डर..
कियो एकर कारण घर्-द्वार-परिवारकेँ बचाएब कहैए, फैमिली बला छी, अपन नै तँ परिवारक चिन्ता तँ करैए पड़त, तँ अपना लेल नै परिवारक लेल डेराइत छी… ओकरा की छै, ने आगू नाथ ने पाछू पगहा…
आ कियो-कियो होइत अछि बताह, ने अपन चिन्ता आ ने परिवारक.. बौआइत छै ओकर परिवार…
कियो कनी कालमे थम्हि जाइत अछि कियो कोनो पैघ दुर्घटनाक बाद थम्हैत अछि आ कियो किछुअ भऽ जाउ थम्हिते नै अछि… आ एहनो लोक सभ अछि जकरा संग दुर्घटना होइते नै छै.. से ओ किए थम्हत.. बुझाइ छै जे ओकर बड़कति होइत छै अधलाह काज केने..,.
लागि रहल अछि जे कोनो अन्हार तरहड़ि मे उतरल जा रहल छी, सीढ़ी नीचाँ दिसि जाइ छाइ, पहिने कनी-मनी इजोत, फेर झलफल, फेर राति सन अन्हार आ फेर अन्हार गुज-गुज, आगिपरक खापड़िक अधोभाग…
इजोत कोनो आस नै? आ जँ आबि जाएत इजोत तँ भऽ नै जाइ आन्हर…
इजोतसँ डेरा रहल लोक?
अन्हारेमे लागि रहल छै मोन आकि लगा रहल अछि मोन…
आ जे अछि बताह?
शोनितक रङ देखा पड़ि रहल अछि डेटामे, शोनित-शोनितामे… मुदा शोतितक रङ सेहो करी, अन्हार-गुज्ज… शोनित तँ होइत अछि लाल टुह-टुह… मुदा ऐ डेटाकेँ हमरा लग अबैत-अबैत देरी भऽ गेलै.. लाल-रङ बेसी गाढ़ भेने कारी भऽ जाइ छै, आ देरी भेने सेहो…
देरी किए भेलै? बताह लोकक कमी तँ कहियो नै छलै ऐ लोकमे… मुदा लगैए जे आब भऽ गेल छै, आ से नै रहितै तँ एतेक शोनित युक्त डेटा, एतेक मात्रामे कोना थकिया जइतैक?आ जँ अबो करितैक तँ तकर रङ लाल रहितैक, गरम रहितैक, कारी-पपड़ी पड़ल नै रहितैक।
सीढ़ी पहुँचि गेल अछि तरहड़िमे… तेहन ब्लैक-होलमे जतऽ जा कऽ सभ किछु गुरुतवाकर्षणक अधीन भऽ जाइत अछि, जकर मध्य विचित्र आकृति अछि जन्म लऽ लेने, डेराओन आ ध्वनि उत्पन्न करैत… जेना समुद्रमे उठल अछि चक्रवात…
सभ आकृति घेर लैत अछि हम्जरा… पहिने हमर गप सुनू तँ पहिने हमर… हॉस्पीटलमे जे हालत होइत छै डॉक्टरक, रोगी सभ जखन घेरने रहै छाइ ओकरा… ओतऽ तँ रोगीक सङ ओकर परिवारक लोक सेहो रहै छै, मुदा एतऽ तँ मात्र रोगीये टा छै..
(अनुवर्तते)