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गीतक अप्रतिम शिल्पकार: रवीन्द्र नाथ ठाकुर
गीत साहित्यक सभसँ लोकप्रिय विधा थिक। साहित्यक वर्णमालासँ अपरिचित कोनो गृहस्थ हो वा कहियो विद्यालय नहि गेल घरक कोनो महिला, गीत सभक प्रिय होइत अछि। गाय- महिंसक चरबाही करय बला लोक हो वा कोनो विद्या-विशारद्, गीत सबकेँ आकृष्ट करैत अछि आ गुनगुनेबाक लेल बाध्य करैत अछि। एकर मधुरता आ भावपूर्णता जन सामान्यक हृदयमे स्थापित भ' लोकक कंठमे बसि जाइत अछि। मैथिली साहित्यमे गीति काव्यक सुदृढ परम्परा रहल अछि। यद्यपि मैथिलीक प्रथम पोथी नाट्यशास्त्र आधारित अछि, तथापि विद्यापतिक गीतक बदौलति मैथिलीक विश्व साहित्यक मध्य अपन विशिष्ट पहिचान बनल अछि। विद्यापतिसँ आरंभ भेल गीतक ई क्रम आगूओ बनल रहल। एहने क्रमे आधुनिक कालमे पदार्पण होइत अछि गीतक राजकुमार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीक जन्म हिनक मातृक मधुबनी जिलाक ननौर गाममे आठ अगस्त उन्नीस सय अड़तीसकेँ भेल। हिनक पैतृक पूर्णियाक धमदाहा गाममे छल। प्रारंभमे अपन मातृकमे शिक्षा ग्रहण आरंभ क' तत्पश्चात् अपन पैतृक गाममे प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कयलनि। पूर्णिया कॉलेज, पुर्णियासँ स्नातक धरि शिक्षा ग्रहण क' पहिने विद्यालयमे शिक्षकक रूपमे सेवा देब प्रारंभ केलनि। बादमे, बिहार सरकारक वित्त विभागमे पैघ पद पर नियुक्त भेलाह। अपने मैथिली अकादमीक सहायक निदेशक आ निदेशक केर पदपर सेहो सेवा द' मैथिलीक विकासमे बहुत सहयोग करबाक काज केलौं। रवीन्द्र जीक साहित्य - सृजनक उपवन सदाबहार रहल। ओ कहियो मौलायल नहिं, म्लान नहिं भेल। हिनक अनुसार- "साहित्य सृजन कहियो रूकबाक नहिं चाही, कारण साहित्यसँ भाषाकेँ बल भेटैत छैक ।" कविता, उपन्यास, नाटक जकाँ विभिन्न साहित्यक विधामे रचना करितो गीत हिनक पहिचान रहल। अपन चौदह टा पोथी जे मैथिलीमे लिखलनि ताहिमे अधिकांश गीत संग्रह छल। एक गोट पोथी हिंदीमे सेहो लिखलनि। हिनका विभिन्न संस्था सभक द्वारा बहुतो सम्मान प्राप्त भेल छल यथा- मिथिला विभूति सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, मैथिली सेवा सम्मान, लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान इत्यादि। हिनका प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान(2014) प्राप्त भेल छल। जनकवि यात्री हिनका व्यक्तिगत रूपेण 'अभिनव विद्यापति' सम्मान सँ सेहो सम्मानित केने रहथिन।
विद्यापति मैथिली गीति काव्यक जे पैघ अट्टालिका स्थापित केलनि ओ समस्त मिथिला नहिं, अपितु विश्व भरिक साहित्यक लेल एकटा उदाहरण भेल। 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' केर उद्घोष क' विद्यापति साहित्यकेँ जनमुखी हेबाक मार्गक प्रशस्त केलनि। विद्यापतिक बाद आदरणीय मधुपजी आ रवीन्द्रजी दू गोट पैघ हस्ताक्षर भेलाह जे अइ गीति परम्परा केँ सुचारू ढंगसँ निमाहलनि। ओना एहेन नै छै जे अइ बीचमे गीतकार कवि लोकनि नै भेलाह वा गीतक रचना नहिं भेल, तेहेन कोनो गप्प नहिं। मुदा, जाहि तरहेँ विद्यापति अपन गीत मधुरता, भावक कोमलता आ नव लयमे गीतक प्रस्तुति क' जनसामान्यक मन मोहि लैत छलाह ओहेन सफलता हुनका बाद रवीन्द्रजीकेँ भेटल। आदरणीय मधुप जीक गीत साहित्यिक मूल्य आ मैथिली भाषाक विकासक दृष्टिसँ उत्कृष्ट अछि। मधुपजी विद्यापतिक बाद निस्संदेह महाकवि कहेबाक सामर्थ्य रखैत छथि।
गीतक गेयता ओकर प्रबल पक्ष थिक। जे गाओल नहिं जा सकैत अछि ओ गीत केहेन होयत? तेँ गीतक भास आ लय प्रमुख तत्व थिक। मौलिक भास आ मोहक भावपूर्ण शब्दसँ सजाओल गीत जन-जनकेँ आनंदित करैत अछि, पसिन पड़ैत अछि। ताहि दृष्टिसँ आदरणीय रवीन्द्र जीक महत्ता अहू लेल आर बेसी भ' जाइत अछि जे विद्यापतिक बाद ओ पहिल गीतकार भेलाह जे अपन रचना लेल खाँटी नव ट्यून ल' मंचस्थ होइत छलाह। जहिना रूचिगर रचना, तहिना ओकर भास। चिट्ठीकेँ तार बुझू, भरि नगरीमे शोर, यार कुसियार यार, तांगा हमर अलबेला, हम गुदड़ी पहिरि जीबि लेबै, चलू चलू बहिना, के थिक मैथिल की थिक मिथिला, पिरिये पिराननाथ, चल मिथिलामे चल,चारि पाँति सुनू रामकेर नामसँ जकाँ अपन बहुतो गीत लेल बहुतो नव नव भास तैयार करब, हिनक रचनाधर्मिताकेँ समस्त भारतीय समकालीन गीति- काव्यमे हिनक श्रेष्ठत्व स्थापित करैत अछि। बंगलामे जहिना रवीन्द्र संगीतक परम्परा स्थापित भेल, तहिना ई विद्यापतिक संगीतक बाद नव तरहक मैथिली गीत- संगीतक स्थापना केलनि।
रवीन्द्र जी मैथिली गीत लेखनकेँ स्टारडम दियाबय बला रचनाकार रहथि। महेन्द्र जी संग हिनक जोड़ी जहन मंचस्थ होइत छल त' दूर- दूर सँ लोक आबि क' हिनका सुनबाक लेल भरि राति मंचक आगू बैसल रहैत छल।फरमाइश पर फरमाइश। आग्रह पर आग्रह। आ रवीन्द्र बाबू अपन जोड़ीदार गायक महेन्द्र जीक संग श्रोताक सबटा 'डिमांड' पूरा करैत छलाह।
रवीन्द्र बाबू गीतकेँ घर आंगन, सर-समाज,प्रेम - विरह, माय- बेटा, पूतोहु सँ ल' क' बाध- बोन, खेत -पथार,जन - बोनिहार, रौद- घाम आ पनिभरनी धरि ल' जाइत छथि। ककरो प्रेमिका पनिभरनी सेहो भ' सकैए तकर उन्मुक्त स्वीकारोक्ति रवीन्द्रजीक गीतमे भेलनि। मिथिलाक नारी जीवनक दुरूहता होइ वा रोजगारक लेल पलायन रवीन्द्रजी हरेक विंदुपर नजरि राखि गीतक रचना केलाह। रवीन्द्र जी जनसामान्यक आँखिसँ रचना करैत छथि तेँ हुनक रचना निसंदेह संपूर्ण मिथिलाक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
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