विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिला मैथिली आन्दोलनक पाथेय: श्रद्धेय रवीन्द्र जी

अजित कुमार झा · 2022-06-15 · अंक 348

अजित कुमार झा, मुजफ्फरपुर, संपर्क-9472834926
मिथिला मैथिली आन्दोलनक पाथेय: श्रद्धेय रवीन्द्र जी
जीबैत मुदा उपेक्षित लेखक सब पर विदेह डाट काम जे कार्य क' रहल छथि से निस्संदेह प्रशंसनीय अछि। श्रद्धेय राम लोचन ठाकुर जी एवं श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी पर नीँक काज भेल मुदा ईश्वर केँ मंजूर नहि छलनि जे हुनका सबहक जीबैत मे ई कार्य पूर्ण होइत। खैर अपना हाथ मे त' प्रयासेटा अछि। शेष ईश्वर केर मर्जी। अहि कड़ी मे आशीष जी द्वारा अगिला नाम श्रद्धेय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी केर घोषणा भेल आ अहि महान मिथिला विभूति पर किछु लिखबाक हेतु हमरो आग्रह भेल। जीवन केर आपाधापी मे अहि कार्य हेतु अग्रसर नहि भ' सकल छलहुँ मुदा आइ श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू केर अवतरण दिवस केर अवसर पर आशीष जी केर पोस्ट देखि अपन शिथिलता केँ त्यागि किछु लिखबाक हेतु प्रेरित भेलहुँ। वास्तव मे पुछु त' श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू पर अपन मोनक उद्गार केँ व्यक्त करबाक लोभ हम संवरण नहि क' पाबि रहल छी। प्रत्यक्ष रुप सँ श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू सँ गप्प करबाक हमरा सौभाग्य नहि प्राप्त भेल अछि मुदा तैयो हम अपना आप केँ अति सौभाग्य वान बुझैत छी जे मिथिला मैथिलीक मंच सँ अपन शब्दक जादूगरी सँ दर्शकवृन्द केँ सम्मोहित करैत हिनका हम लगभग दस-पन्द्रह बेर देखने छियनि। नेना भुटका रही आ मिथिला मैथिलीक लेशमात्र ज्ञान नहि छल तखनो ई मंच अपन चुम्बकीय शक्ति सँ हमरा खिँचैत छल तकर एकमात्र कारण छल श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू आ हुनक पार्टनर महेन्द्र जी। एक गोटे शब्दक जादूगर तँ दोसर स्वर सम्राट। श्रद्धेय रवीन्द्रजी ओना त' साहित्यक हर विधा मे लिखलनि आ धुरझार लिखलनि मुदा हमर मोनक कणकण मे हुनका लेल एकटा प्राकृतिक गीतकारक छवि बसल अछि। गाम-घर, बाध-वन, खेत-खरिहान, पाबनि-तिहार, विवाह दान, मुड़न-उपनयन आ अन्य समस्त अवसर हेतु सुपरहिट गीत हिनकर कलम सँ निकलल छन्हि। धीया-पुता, नवयुवक-नवयुवती सँ ल' क' सबहक मोनक उद्गार केँअपन अनुपम शब्द सँ गढ़ि माँ मैथिलीक कंठहार सजौने छथि।
देशक विभिन्न शहरमे अतेक सालक अनवरत मिथिला मैथिली आंदोलनक उपरांत एखनधरि जे स्थिति छैक से बहुत हद तक निराश करय वाला अछि। मात्र आन्दोलन सँ जुड़ल संग्रामी मिथिला विभूति सबहक नाम पर एखनहु भीड़ नहि जुटैत अछि आ जखन भीड़े नहि जुटतै तखन आंदोलन हेतु प्रेरित किनका करबनि? गरीबक धीया-पुता पेट भरि भोजनक लोभ मे सरकारी स्कूल जाइत अछि ' मिड डे मील' लेल जाहि सँ अपन जठराग्नि केँ शान्त क' सकय आ ओहू लाथे किछु ज्ञान सेहो अर्जित क' लैत अछि । कम सँ कम शिक्षाक महत्व त' बूझय लगैत अछि। ठीक तहिना ( ई हमर व्यक्तिगत सोच अछि) श्रद्धेय रवीन्द्र जी मिथिला मैथिली आन्दोलन मे पाथेय केँ रुप मे कार्यरत रहला अछि। वास्तव मे हिनकर योगदान स्वर्णाक्षर सँ अंकित करबा योग्य अछि। हिनकर कणकण मे संगीत रचल बसल छन्हि। पूरा परिवारे संगीतमय छन्हि। ई ओहिकाल मे मंचक शोभा छलथि जखन अहि मंच पर साज बाज नहि पहुँचल छल तथापि हिनकर एक-एकटा शब्द कान मे मिसरी घोरि दैत छल। हिनकर गीत मे उत्सव, खुशी एवं टीसक अनुभूति होइत छल। ई कखनो हँसाबैत छलथि त' कखनो गुदगुदाबैत छलथि। कखनो प्रेमक अथाह सागर मे डुबकी लगबाबैत छलथि त' कखनो नयन सँ दहोबहो नोर झहराबैत छलथि। अद्भुत शब्द संयोजन आ सुमधुर कंठक आशीष हिनका माँ सरस्वती सँ भेटल छलनि।
एकबेर एकटा कार्यक्रम मे राजकमल जी हिनका सँ जमसम निवासी महेन्द्र जी केँ भेँट करबेने छलखिन आ हिनका अपन गीत गाबय लेल देबाक आग्रह केने छलखिन। आखिरकार एक दिन अवसर भेटलनि आ दुनुगोटे संयुक्त रूप सँ एक कार्यक्रम मे " बाबा दंडोत, बच्चा जय सियाराम" गीत सँ जे धूम मचौलनि से फेर जीवन मे कहियो घुरि क' पाछू नहि तकलनि। एक केँ बाद एक एवं एक सँ बढ़ि एक सुपरहिट गीत सँ माँ मैथिलीक अक्षय कोष केँ परिपूर्ण करैत रहलाह। पिरिये परान नाथ सादर परनाम, चलू चलू बहिना जहिना छी तहिना, अहाँ लटर पटर कने कम करु, बाँहि मे रहू ने रहू, निहुरि निहुरि क' रोपय बहिना जन बोनिहारिन धान गे, पढ़ क का मे कि की कु कू बदाम के कै को कौ कं कः राम, बिलमि जो गुजरिया अहि मिथिला केँ धाम गे, रोटी अछि त' दुनिया हरियर बिनु रोटी के फाँका रोटी खातिर घेँट कटैया रोटी खातिर डाका आकि हम सच कहै छी नहि यौ आ कि हम गप्प हँकै छी नहि यौ (भांगड़ा धुन पर), की थिक मिथिला के छथि मैथिल हम कहैत छी ओरे सँ मिथिला वासी सुनु पिहानी हम कहैत छी ओरे सँ सन सन नाहि जानि कतेको कालजयी गीतक रचना कयने छथि श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू। पहिल मैथिली फिल्म " ममता गाबय गीत" मे विद्यापतिक एकटा गीत केँ छोड़ि अन्य समस्त गीत हिनके कलम सँ लिखायल अछि। एक सँ बढ़ि एक अद्भुत गीत अछि जेना:
१. भरि नगरी मे सोर बौआ मामी तोहर गोर, मामा चान सन केँ..
२. अर्र बकरी घास खो, छोड़ि गोठुल्ला बाहर जो ......
३. घर घर घुमि घुमि तोहर कथा ई
बहि बहि कहत बयार
चलल कहरिया जे कौने नगरिया..
४. मिथिला केर ई माटि उड़ल अछि
छूबय गगनक छाती
भरि दुनिया केँ मंगल हो
जन जन गाबय प्राती
हाँ रे कहू भैया रामे राम हो भाई
माता जे बिराजै मिथिले देश मे...
मैथिली फिल्म " ममता गाबय गीत " केर निर्माता श्री केदार नाथ चौधरी आ महंथ मदन मोहन दास जी छथि आ एकर निर्माणक क्रम मे नाना प्रकारक झंझावात सहैत आगू बढ़ैत गेलाह मुदा पैसाक तंगी आ निराशाक क्षण मे एक दिन अपन स्वप्न केँ मझधार मे छोड़ि भारी मोन सँ केदार बाबू अपन जीवनपथ पर आगू बढ़बाक हेतु सनफ्रांसिस्को विदा भेलाह। पहिल मैथिली फिल्म डिब्बा मे बन्द भ' गेल। जाहि फिल्म केँ महंथ मदन मोहन दास जी लाचारी मे भविष्यक जिम्मा लगा देने छलखिन तकर रील केँ लगभग अठारह वर्षक बाद बन्द डिब्बा सँ निकालि सिनेमा हाल मे प्रदर्शित करबाबय केर दुर्लभ काज अहि फिल्मक गीतकार श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी महंथ जी सँ लिखित अधिकार प्राप्त कयलाक उपरांत पूर्ण कयलनि। महंथ जी केँ शब्द मे- "रवीन्द्रे जी वीर बहादुर बनलाह" ।
श्रद्धेय रवीन्द्र जी केँ विषय मे केदार बाबूक शब्द जौँ हूबहू राखी त' - " उपनयनक समय मे ढ़ोल पिपहीक धमगज्जर ध्वनि मे लपेटल गीत, चतुर्थी रातिक कनियाँ-वरक प्रथम मिलन मे लजायल-सकुचायल सिहरैत गीत, दुरागमनक समय मे बेटीक नोर मे भीजल गीत, गामक छौंड़ीक काँख तर दाबल छिट्टा खुरपीक खनखन गीत। सभ गीत मे मिथिलाक माटिक अनुपम सुगन्धि"। अहि फिल्मक तेसर निर्माता भानु बाबूजे स्वयं अपन लिखल गीत अहि फिल्म मे देबय चाहैत छलथि से हिनकर गीत सुनि मंत्र मुग्ध होइत बाजल रहथि- " ई व्यक्ति जनिकर नाम रवीन्द्र नाथ ठाकुर अछि, विलक्षण प्रतिभाक स्वामी छथि। हिनकर गीत मे मिथिलाक संवेदनशीलता मुखरित होइए। हिनकर प्रत्येक गीत सँ एक नव खिस्साक निर्माण भ' सकैए। रवीन्द्रक गीत मिथिला मे गीत संगीतक एकटा नवयुग आनत तकर हम कल्पना करैत छी"।
कतेक सटिक कहलनि केदार बाबू आ भानु बाबू। वास्तव मे गीत संगीतक एकटा नवयुग अनलनि ताहि मे कोनो संदेह नहि। सच पुछु त' हिनक विपुल रचना संसारक ज्ञान हमरा नहि अछि मुदा हिनकर पंच कन्या आ रवीन्द्र पदावली एखनो अछि हमरा पास मे। किछु पुस्तक केओ ल' गेलाह से फेर द' नहि गेलाह। ई पोथी सब हमर बाबू जी स्वयं श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू सँ हुनक कलकत्ता ( एखुनका कोलकाता) यात्राक क्रम मे प्राप्त केने छलथि। हिनकर रचना सब एकठाम संकलित कय पुनः प्रकाशित होयबाक चाही। एकटा कार्यक्रम मे श्रद्धेय रवीन्द्र बाबूक उपस्थिति मे मंच पर हिनकर रचना केँ कोनो सज्जन अपन टटका रचना बाजि पाठ कयने छलाह। एहन धृष्टता जौँ हुनका सामने भ' सकैया तखन परोक्ष मे के देखय जायत? एकर संरक्षणक आवश्यकता छैक। अपन आबय वाला पीढ़ी केँ आखिर कोना सही बातक जानकारी भेटतनि। मात्र पोथी प्रकाशनेटा नहि मुदा डिजिटल रुप मे सेहो आनल जाय। मिथिला मैथिली आन्दोलन मे हिनक योगदान केँ बिसरल नहि जा सकैत अछि। हिनक शब्द अमर छन्हि, हिनक स्वर अमर छन्हि। अंत मे जौँ एकटा गीतक चर्चा नहि करब त' हमर मोनक उद्गार अधूरा रहि जायत किएक त' माँ आओर मातृभाषाक अनादर पाप अछि आ नहि जानि कतेक बेर ई गीत सुनि हमर नयन सँ अश्रुधार बहल अछि-
जन्म देलनि माय थिकीह, सेहो कने सोचू
हमरा कि हमरा त' उसरल बजार बुझु
चिट्ठी केँ तार बुझु, बुढ़िया बेमार बुझु
.............................................
विशेष: श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू केँ सादर समर्पित करैत छियन। ओ स्वस्थ रहथि आ हुनक आशीष हमरा सब पर बनल रहय। कोनो गलती भेल होएत त' क्षमा करब।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-संपर्क-8789616115
सभटा सोनारकें नहि गढ़बाक कला होइछ (गजलक समीक्षा : पोथी ‘लेखनी एक रंग अनेक’)
एकटा समय छल जखन मैथिली गजलक नामपर जे किछु लीखल जा रहल छल तकरा भक्ति-भावसँ लोक ग्रहण करैत जा रहल छल | समय बदलल | ओकरा राजनीतिक चश्मासँ देखल जाए लागल | मुदा रचना स्वस्थ दृष्टिसँ नहि पढल जा रहल छल | प्रगति भेल अछि | आब ठीकसँ पढल जा रहल अछि | ओ गजल अछियो कि नहि सेहो देखल जा रहल अछि | कोनहु रचनाक सार्थकता सेहो अहीमे अछि जे ओकरा स्वस्थ दृष्टिसँ पढल जाए, ओकर समीक्षा हुए, कमजोर पक्षक आलोचना हुए, नीक पक्षक प्रशंसा हुए | मुदा, सभसँ पहिने त ई देखब जरूरी अछि जे ओ रचना जाहि विधाक लेल लीखल गेल अछि ओकर योग्यता रखैत अछि कि नहि | मैथिली गजलकें भक्ति-भावसँ अथवा राजनीतिक दृष्टिसँ देखब ओकर उपेक्षा करब हएत | जाहि समयमे, मैथिलीमे गजलक व्याकरण उपलब्ध नहि छल, 111 टा रचना ल’ क’ ‘लेखनी एक रंग अनेक’ प्रकाशित भेल छल, ओहि समय ई एकटा स्पष्ट घोषणा छल जे मैथिलीमे गजल अवश्य लीखल जा सकैत अछि | ई एकटा क्रान्ति छल किएक त ओहि समय किछु साहित्यकार कहैत छलाह जे मैथिलीमे गजल लिखले नहि जा सकैत अछि | एहि धारणाक खण्डन छल ई संग्रह | रचनाकारक गीते जकाँ तथाकथित किछु शेर सभ लोककें आकर्षित केलक | शब्द सभमे गीतहि जकाँ वैह मिथिलाक माटि-पानि आ बसातक सुगन्धि ! मिथिला मिहिरमे पढल किछु शेर सभ हमरो बहुत आकर्षित केलक:
‘हम जे मैथिल थिकहुँ से मूर्ख कालिदास सन
जतय बैसल छी सैह डारि काटि रहल छी’
‘चली जखनसँ सदिखन सोची एखन दहिन की बाम चलै छी
राखू अपने विश्व-नगर भरि, हम त अपना गाम चलै छी’
‘सुखकेर हो कि दुखक बीतैये घड़ी सभटा
हो बाँस आ कि बेंतक टुटैये छड़ी सभटा’
एहि संग्रहक रचना सभक जन्म अस्पतालमे भेल छल | अस्पतालसँ बाहर आबि ई शेर सभ दहाड़ मारिक’ चिकरल :
‘गजल मैथिलीक मर्म आब जानि लेने छैक
गजल मिथिलामे घर अपन बान्हि लेने छैक’
जे सभ कहैत छलाह जे मैथिलीमे गजल नहि लिखल जा सकैत छैक, सभ शान्त भ’ गेलाह | गीतक महाराजक अश्वमेघक घोड़ा निकलि गेल गजलक मैदानमे | लव-कुशक हाथें पकड़ल गेल घोड़ा | रामक कृत्यक सार्थकता सेहो अहीमे अछि जे घोड़ा पकड़ल जाए लव-कुश द्वारा | अनचिन्हार आखरक साइटपर गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार द्वारा गजल शास्त्र एलाक बाद जाँच-पड़ताल हुअ’ लागल जे गजलक नामपर जे किछु लिखा रहल अछि से गजल अछियो कि नहि | ई पाछाँ मूहें घुसक’ बला बात नहि भेलै | ई पछिला पीढ़ीक कृत्यकें आगाँ ल’ जेबाक, गौरव प्रदान करबाक,ओकरा परिपूर्ण करबाक, स्वस्थ आ समृद्ध करबाक दिशामे आन्दोलन भेलै | हमहूँ त भक्ति –भावसँ सभ रचनाकें गजल मानिए नेने रही | अनचिन्हार आखर साइटपर उपलब्ध व्याकरणसँ परिचित भेलाक बाद ई पोथी पढ़ि जे किछु नीक –बेजाए देखबामे आएल अछि ताहिसँ अवगत करयबाक प्रयास क’ रहल छी :
(1) 109 टा गजलमे 587 टा शेर अछि | एहि संग किछु ‘कतआ’ अछि |
(2) 26 टा बिना रदीफक गजल अछि |
(3) 5 टा गजलमे मतलाक अभाव अछि ( गजल क्रमांक 35,42,45,54,90 )
(4) 4 टा गजलमे रदीफ मतलामे अछि मुदा ओकर पालन सभ शेरमे नहि भेल अछि ( गजल क्रमांक :49,62,81,82 )
(5) 9 टा गजलक कयटा शेरमे समान काफियाबला शब्द अछि (गजल क्रमांक :65,68,72,77,89,103,105,107,108)
(6) 10 टा गजलक मतला छोड़ि सभ शेरमे अनुपयुक्त काफियाबला शब्द अछि ( गजल क्रमांक :5,10,11,23,41,43,62,70,83,93 )
(7) 7 टा गजलक मतलामे काफिया नियमित नहि अछि ( गजल क्रमांक :48,50,63.99,100,101,106 )
(8) 16 टा गजलक एक अथवा अधिक शेरक काफियाबला शब्द सभ उपयुक्त नहि अछि ( गजल क्रमांक : 15,21,25,29,30,31,46,49,59,75,86,87,88,94,97,109 )
(9) रचना सभ ओहि समय लिखल गेल अछि जखन रचनाकारक पयरमे प्लास्टर पड़ल छलनि, ओ अस्पतालमे छलाह |
(10) भरिसक मैथिली गजलक नामपर एतेक संख्यामे रचनाक ई पहिल संकलन अछि |
(11) कतहु-कतहुसँ किछु गजलक अवलोकनसँ पता चलैत अछि जे बहरक उपेक्षा भेल अछि |
(12) किछुए रचनाकें छोड़िक’ सभक अंतिम दू-पाँतीमे रचनाकारक नाम अछि |
(13) नमहर भूमिका द्वारा पाठककें आतंकित करबाक अथवा रचनाक त्रुटिकें झाँपन देबाक प्रयास नहि कयल गेल अछि, रचना सभमे पाठककें गुद्गुदयबाक, आनन्द प्रदान करबाक आ जीवनक विभिन्न पक्षक रहस्यकें शालीनताक संग प्रस्तुत करबाक सामर्थ्य छैक | उदाहरणस्वरूप किछु पाँती प्रस्तुत कएल जा रहल अछि :
‘जतय सभ किछु देखार, जकर सभ किछु नुकैल
गजल गागरमे सागर तमाशा थिकैक’
‘मोट मडुआकेर रोटीपर रैंचीकेर साग
गजल जीवन केर स्वादहु ठेकानि लेने छैक’
‘मनसँ मनकेर संचार-सेतु ओहि महासेतुकेर नाम गजल
कहलहुँ से गजल, सुनलहुँ से गजल, कहबामे कहू की शेष रहल’
‘रवीन्द्र’ प्रेम-पंथी से छंदकार जानथि
किछुए गजल एहन जे पढ़बाले’ होइत अछि’
‘रवीन्द्र’ रह-रहाँ एतय होइत अछि एहन
कि जैह क’र मूँह धरी, ताहीमे केस’
‘दाग चेहराक हो कि वस्त्रक, सब दाग थिकै दागे
साधूकें छोड़ि चट-पट सब चोरकें धरक चाही’
‘औंठा ने कटय ध्यान रहय, एहि बातकेर
कि कोन गुरु केर अहाँ शिष्य बनल छी’
‘अस्मिताक प्रश्न अछि त एक भ’ ‘रवीन्द्र’
प्रगट होइत जाउ जे अदृश्य बनल छी’
‘धकियाय आगू गेल जे, बुधियार छल सब लोक से
नाव एखनहुँ अछि हमर, ओहिना पड़ल मझधारमे’
‘किछुओ ने बचा सकलहुँ किछुओ ने बचा पायब
सूझय ने जाल लेकिन, जंजालमे फसल छी’
‘दर्द अपन गुपचुप सह्बाले होइत अछि
हरेक बात नहि हरेककें कहबाले होइत अछि’
‘आँचर रहयसमेटल,बरु केस रहयफूजल
किछु बात त चौपेतिक’ धरबाले’ होइत अछि’
‘ई बात खानगीमे कहबाक मोन होइछ
बैद्य एहन के जे चीन्हैये जड़ी सबटा’
‘बात केर बात अछि त एक बात हम कहि दी
कि बात, बात-बातमे हो, बात से जरूरी नहि’
‘गुलाब जलक शीशी भरि, पयर धोइत शोषक
नोरक इन्होरमे नहाइत अछि लोक’
‘गाइयो हँ, बड़दो हँ, एहने व्यवस्थामे
आँटाक सङे घून सन पिसाइत अछि लोक’
(14) संकलनक कोनो रचनामे मैथिलीसँ इतर कोनो आन भाषाक शब्द नहि लेल गेल अछि |एहि दृष्टिसँ ई संकलन मैथिली गजल-लेखन लेल पथ-प्रदर्शकक योग्यता रखैत अछि |मैथिली गजलक बहुमंजिला भवनकक निर्माणमे एहि संकलनक आधारक उपयोग कयल जा सकैत अछि |
प्रकाशनक छत्तीस बरखक बाद एहि संकलनक समीक्षा कि आलोचनाक प्रस्तुति एकटा सादर आ सविनय आश्वस्ति अछि जे ‘लेखनी एक रंग अनेक’ पढल गेल अछि, गुनल गेल अछि आ आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी द्वारा रोपल गेल गाछ आब फुला रहल अछि |
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
नारायणजी- संपर्क-9431836445
आधुनिक मैथिली गीतक सजग उन्नायक
संसारक सभ भाषामक साहित्य पद्यसँ आरम्भ भेल अछि। पद्यमे गेयधर्मिता रहैत अछि जे छन्दक बलें पाओल जाइत अछि, जे गीतक निजी विशेषता थिक जे पद्यमे सृजन करबाक लेल सृजनकर्ताकेँ सभ दिनसँ विशेष प्रभावित करैत रहल अछि, आ तँइ कोनो भाषा-साहित्यक आदि रचना पद्यमे भेटैत अछि। स्पष्ट रूपसँ पद्य विधा लोकगीतसँ रसग्रहण कऽ साकार होइत अछि अथवा अपन पथ प्रशस्त करैत अछि।
लोकगीत अनाम धर्मा साहित्य थिक से महाकवि विद्यापति धरिकेँ रचनाशील होएबाक लेल प्रेरित कएने रहनि, तकर एकटा उदाहरणस्वरूप देखल जा सकैछ, विद्यापति पदावलीमे संग्रहीत विद्यापतिक गीत ...."मोरा रे अँगनमा चनन केर गछिया.."एहन मानल जाइत हछि जे महाकवि विद्यापति तँइ कतेको लोकगीतक संपादन टा कएलनि। आ मैथिली साहित्यक आरम्भ जे कवि शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुरसँ मानल जाइत अछि, से वास्तवमे गीतेसँ आरम्भ भेल हएत जे लिखित रूपमे नष्ट भए गेल हएत। महाकवि विद्यापतिक गीतिधाराक भाव, भाषा,विषय, विधा ओ रागक प्रबल वेगमे एकटा कृत्रिम काव्यभाषाक जन्म भेल भऽ गेल जकर नाम "ब्रजबुलि" पड़ि गेल। से थिक जनभाषामे गीति काव्यक अतुल सामर्थ्य आ से बीसम शताब्दीक पूर्वार्ध धरि मैथिलीमे लिखाइत रहल आ जनमानस गीति काव्यक रससँ आलोड़ित होइत रहलाह। एहन विशिष्ट परंपरासँ भिन्न सेहो मैथिलीमे लिखल जाइत रहल हएत, आ से लोक द्वारा अभिनय कएल जाइत रामलीला आ महारासमे, नाचमे, जाहिमे जन-जीवनक राग आ हास्य अवश्य छल हएत, जकरा सभकेँ सुसंस्कारित गीतक परंपरामे फूहड़ बूझल गेल हएत आ जाहि गीत सभकेँ संकलित कए लिखित रूप नहि देल गेल हएत। मुदा मैथिली गीतमे नवताक प्रवेश भेल, जखन अपनामे श्रव्य आ दृश्य-काव्य समेटने अभिनय कएल जाइत लीला, मनोरंजन लेल होइत नाचसँ फूट सिनेमाक पदार्पण भेल आ सिनेमाक गीतक लोकमे प्रिय होबए लागल आ गाओल जाइत मैथिली गीतक लोकप्रियता घटए लागल। मधुपजी लोकमानसमे पसरैत रोग अर्थात घटैत लोकप्रियताकेँ अकानि सिनेमा गीत सभक भासपर मैथिलीमे गीत रचए लगलाह आ से सभ बेस लोकप्रिय भेल। यद्यपि, मधुपजीक संग किछु आर गीतकार सभ गीत रचना केलनि मुदा हुनका लोकनिक छविमे ओ निखार नहि आबि सकल जे मधुपजीमे रहलनि। यद्यपि, प्रदीपजी किछु मौलिक गीतक अवश्य रचना केलनि जे सभ अपन समयमे अनेक मंचसँ गाओल जाइत रहल, मुदा हुनकर रचल गीत सभ सिनेमाक गीतक सोझाँ झूस होइत छल तथा नवताक माँग करैत छल एवं ओ गीत सभ सिनेमाक भासपर रचित मधुपजीक गीतक आगू हल्लुक लगैत छल। मैथिली गीतक लेल व्याप्त एहने दारुण समयमे मैथिलीक गीति-साहित्यिक आकाशमे मैथिलमे पसरल आ परसल जाइत गीत सभमे पाओल जाइत त्रुटिकेँ संपूर्ण सजगतासँ अकानि मैथिली गीतकेँ लोकप्रियताक शिखर धरि लए जेबाक लेल समस्त नवता-बोधसँ युक्त उन्नायक बनि, गीतकारक रवीन्द्र नाथ ठाकुर जे प्रकट होइत छथि से मैथिली गीतक स्वर्णकाल लए जेबाक एकटा चकित करैत घटना थिक।
गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर, देखलनि जे सिनेमाक गीतक भासक आधारपर जखन लोक मैथिली गीत पसिन्न करैत अछि तखन मैथिलीक सिनेमाकेँ सेहो पसिन्न करत, तँइ ओ मैथिलीमे सिनेमा सेहो बनौलनि जकर नाम "ममता गाबए गीत" थिक जकरा लोकप्रिय बनेबाक लेल, हिंदी सिनेमाक चर्चित अभिनेत्री अजराकेँ सिनेमामे रखलनि तथा चर्चित गायिकासँ गीत गबौलनि, जकर गीतकार आ संगीतकार, हमर थोड़ जनतबमे अछि आ स्वंय रहथि।
रवीन्द्र नाथ ठाकुर मैथिलीमे गीत रचनाक लेल एहि क्षेत्रक जनजीवनकेँ गीतक विषय बनौलनि जाहिमे दुःखे-दुःख आएल। कदाचित् हुनकर मानब छलनि जे दुःख लोक सूनए चाहैत अछि। हमर तँ मानब अछि जे विद्यापतिक गीत "कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ" आइयो लोक गबैत अछि आ लोकप्रिय अछि जे ओहिमे दुःखक गप्प भेल अछि। आ हिंदीक कवि मदन कश्यपक कविताक तँ एकटा पाँति अछि जे "मुझको
विद्यापति का दुख चाहिये"।
गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपन गीत रचनाक लेल एक दिस जँ एहि क्षेत्रक जनजीवनक विषयक चुनाव केलनि तँ दोसर दिस ओ अपन गीत लेल अपन लयक सेहो अविष्कार केलनि। एहि दूनूक संगे रवीन्द्रनाथ ठाकुर मिथिलामे प्रचलित पौराणिक पात्रकेँ अपन गीत लेल लेलनि, जाहि लेल हुनका जगज्जननी जानकी, हुनकर कष्टमय जीवन आ हुनकर वेदनामय वाणीसँ बहराएल समाद पर्याप्त छलनि। हुनकर गीतक पाँति द्रष्टव्य अछि--
कने बाजू हे प्राण अहाँ ई की केलहुँ
कोना सोनाके अहाँ मानि सीता लेलहुँ
हम विदेहक धिया तें विदेही भेलहुँ
तथ्य राखब नुकाय हमर सन्तान सँ।।
मिथिलाक सभ दिनसँ मुख्य व्यवसाय खेती रहल। खेती, परिवारक सभ सौख-सेहंता पूर्ति नहि कऽ सकैत छल तँइ एहिठामक लोक सभ दिनसँ कमेबाक लेल परदेस जाइत रहल छथि। महाकवि विद्यापतिक गीतमे सेहो एहिठामक लोकक परदेस कमाए लेल जेबाक वर्णन भेटैत अछि। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक रचित गीतमे एहिठामक लोकक परदेस जेबाक जे चर्च भेल अछि तकर मूलमे अभाव थिक। से एहिठामक लोक कतेक अभावमे जीवन बितबैत छल तथा जनसाधारण कतेक बेसी अपमानित आ निर्धनताक जीवन जिबैत छल तकर हृदय विदीर्ण करए बला एकटा बानगी देखू--
बरद एक्केटा छल, सेहो पहिने मरल
खेत अनके दखल, तै पर करजा लदल
तँ जैह-सैह आबि , जैह-सैह कहि जाइछ
सहिते-सहैत आब भथि गेल इनार बुझु
काया लचार बुझु, वैदक उधार बुझु
कतेक बात लिखब की आफत हजार बुझु...
मैथिली साहित्यक समर्पण आ प्रेम सभ दिनसँ मुख्य स्वर रहल अछि। प्रेमक अविरल धारामे बहेबामे मैथिली साहित्य अग्रगामी रहल अछि जाहिमे परकीया प्रेमक स्वर सर्वाधिक मुखर रहल अछि। मुदा दाम्पत्य-प्रेमक जीवनमे अप्रतिम महत्व सर्था रहलैक अछि। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक एकटा गीतक अधोलिखित पाँतिक अवलोकन करू जाहिमे मैथिल संस्कृतिक ओहि विधिकेँ उजागर कएल जाइत अछि जे द्विरागमनक पूर्व हजाम अबैत अछि, तकरा चित्रात्मक अभिव्यक्ति कतेक सहजतासँ देलनि अछि जे मुग्ध आ मोहित करैत अछि-
बन्हने छलियै केश फलकौआ
कोंचा बला नुआ छलै आँचर घुमौआ
लेलक अझक्के मे देखि मुँहझौंसा
अहीँ के गामक बुढ़बा हजाम
पिरिये पिराननाथ सादर परनाम।
गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक गीत सभमे नवताक प्रवेश हुनकर अपन प्रतिभा, मैथिली गीतक प्रति सर्वोत्तम समर्पणक बले भेल अछि जाहिमे भाषा आ ओहि प्रचलित शब्दक अप्रतिम योगदान अछि जे शब्द सभ उर्दू-फारसीक थिक आ मैथिल समाजमे बाजल जाइत अछि।
गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर मैथिली गीतकेँ, गीतक लोकप्रियताकेँ ध्यानमे राखि जे स्तरोन्नयन केलनि ताहि बाटकेँ प्रशस्त करबामे अनेक गीतकार लागल छथि जाहिमे डा. चंद्रमणि प्रमुख छथि।
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Suggested citation: अजित कुमार झा. “मिथिला मैथिली आन्दोलनक पाथेय: श्रद्धेय रवीन्द्र जी.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 348, 2022-06-15. https://www.videha.co.in/research/2022/348/मिथिला-मैथिली-आन्दोलनक-पाथेय-श्रद्धेय-रवीन्द्र-जी.htm

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