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रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हुनक रचना आ जनमानस केर उदासीनता
हमरा लोकनि अपन मानवीय धरोहरक सम्मान आ सत्कारमे कने कंजूस रहल छी। ई संस्कार आजुक नहि अछि, अदौसँ मानवीय धरोहर केर प्रति निष्क्रियताक स्थानीय धरोहर अथवा संस्कारक रूपमे आबि रहल अछि। आब मैथिल समुदाय बहुत पोखगर अनुपातमे प्रवास आ अपन योगदानक कारणे वैश्विक भऽ रहल अछि। हम सब वैश्विक सोच आ शारीरिक उपस्थिति दुनू रूपमे भऽ रहल छी। वैश्विक भऽ रहल छी तँ हमर सबहक ई दायित्व बनैत अछि जे हमरा लोकनि वैश्विक संस्कृतिक नीक बात, प्रथा, परम्परा आ संस्कारकेँ अंगीकार करी। ई कहब सहज छैक जे हमर संस्कृति, संस्कार, लोक व्यवहार सर्वोत्तम अछि, मुदा ओहूसँ पैघ बात अपन संस्कृतिमे जे घाव अछि तकरा ठीक करब। कायाकेँ निरोग रखबा लेल रुग्ण अंगक समुचित चिकित्सा आ जरुरी पड़ला पर शल्यचिकित्सा सेहो आवश्यक। अहिसँ भले प्रारम्भमे कने कष्टक अनुभूति हो, बादमे जीवन सुखद भऽ जाइत छैक।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर दीर्घ आयु जिबैत मृत्युलोकसँ अनन्तक यात्रा हेतु प्रस्थान कऽ गेलाह। आब ओ हमर सबहक नित्य स्मरणीय पितर छथि। हुनक रचना पर किछु लिखब नब नहि हएत। एक बात अवश्य जे ओ जन-जनमे व्याप्त गीतकार छथि। हुनकर रचना लोक पढ़ि कऽ कम आ सुनि कऽ, दोहरा कऽ, गुनगुना कऽ, अनुकरण, अनुशरण करैत सीख लैत अछि। अगर बिना पोथी देखने हुनकर रचनाक संकलन करबाक हो तँ 45 आ 80 बरखक बीच केर करीब एक सए स्त्री पुरुष लग चर्च करू, सब मिलि हुनक सब गीत लिखा देताह। अगर ओहूमे आलस्य भऽ रहल अछि तँ सोशल साइट पर लोक सबसँ निवेदन करू, किछुए दिनमे अहाँक संकलन तैयार। लोक कंठमे अहि तरहक कमोवेश मिथिला भूमि – अहि पार, ओहि पार आ तमाम भौगोलिक उपक्षेत्र अथवा पॉकेटमे लिंगभेद ओ जातिक आरि तोड़बाक मोनोपोली महाकवि विद्यापतिक बाद अगर ककरो भेटल अछि तँ ओ छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। हुनक गीत जखन महेन्द्र जीक गलाक चिपमे सेट भऽ जाईत छल तँ ओकर भाव देसी राहरिक दालिमे घी संग तेजपत, जीरक फोरन जकाँ भऽ जाइत छल। मिथिलामे जन सरोकारक गीत काशीकांत मिश्र “मधुप”, स्नेहलता (कपिल देव ठाकुर), मैथिलीपुत्र प्रदीप आदि लिखलनि। सभक रचना अपना आपमे अपूर्व छल। मधुप स्वयं गबैत नहि छलाह। गीतक वेरिएशन सीमित छलनि; स्नेहलता राधा-कृष्ण आ सीता-राम भक्तिमे एकनिष्ठ योगी जकाँ केन्द्रित रहला; प्रदीप किछु गीत समाजिक व्यवस्थापर केन्द्रित करैत अन्ततः सीता-राम, जगदम्बा आ भगवान भजनमे सन्तक डेगसँ लिखैत रहला। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की नहि लिखलनि? हिनक रचनामे नायक –नायिकाक प्रेम, तरुणक प्रेमक उद्वेग, मिथिला भूमिक कण-कण केर गान, सीताक बेदनाक चित्रण, ओकर ओहि पर सोच, चिंतन, मनन, राम संग लड़बाक हिम्मत, पुरुख मोनमे नारी भावक व्यवस्थापन, बाल गीतमे नेना मोनक अबैत जाइत मनोवैज्ञानिक भावक छोट-छोट खाटी शब्द आ कवित्तसँ प्रस्तुतिकरण भेटत। हिनक गीतमे नाटक भेटत, स्त्री-पुरुषक प्रेम, नोक-झोक भेटत। हिनक गीतमे परदेसिया मैथिलक दर्द, माता पिताक समस्या, जनरेशन गैप, संगतुरिया मस्ती, पर्यटन, यायावरी प्रवृति, गामक लोकक शहर अथवा नगर केर जीवनक अनुभव, ओकर विवेचन, गाम आ नगरमे तुलनात्मक विवेचन सब किछु भेटत । हिनकर गीतमे अतिवादी सेहो लोकवादी बनल अल्हड़ बनल भेटता। हिनक गीतमे की मधुबनी, की पुरनिया, बेगुसराय, सीतामढ़ी, दड़िभंगा आ नेपालक मिथिला सब एकाकार भेटत। रवीन्द्रनाथ जी शब्दक जादूगर छलाह। भावक आ गीत आ छंदक पेटार छलाह। चूँकि स्वयं स्टेज पर गीत गबैत छलाह तँ उतार-चढ़ाव सब बात बुझैत छलाह। श्रोता संग आँखि आ बॉडी लैंग्वेजसँ वार्तालाप करैत तदनुकूल रचना करैत छलाह। हुनक गीतक कुनो एक उदाहरणसँ हम अतए स्थानकेँ अनेरे नहि छेकए चाहैत छी। ताहि हम बिना उदाहरणकेँ अपन बात लिखैत छी। पढ़ैत रहू।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी केर गीत संग मिथिलाक हवा, पानि, पोखरि, इनार, नदी, खेत , पथार, चिड़इ-चुनमुन सब मस्त छैक। सब हँसै छै। सब पात्र छैक। सभक अभिनय छैक। एक लड़की जे सासुरसँ नैहर जा रहल छैक, आ नदी उमटाम भरल छैक, तकरा लेल मलाह मात्र मल्लाह नहि भैया छैक। वएह धार पार करेतैक। परदेशी मिथिला चलैत मस्त हवासँ वार्तालाप करैत छैक। तप, जप, काम सब किछु छैक। की नहि छैक। अगर किछु नहि छैक तँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल उचित सम्मान। से कियैक ?
रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर तुलना हमर बउआइत मोन असमिया गीत लेखक आ गायक भूपेन हजारिकासँ करैत अछि। संयोग देखू जे दूनु गोटे समकालीन छलाह। मिथिला अनेक प्राकृतिक आ सांस्कृतिक वैविध्य केर आधारपर असमसँ बहुत लगीच अछि। मल्लाह, हवा, धार, जन मानस, स्थानीय प्रेम आ खाँटी देशी शब्द भूपेन हजारिका आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर दुनुक रहल छनि। दूनू अपन-अपन मातृभाषा क्रमशः असमिया आ मैथिलीसँ बहुत सिनेह करैत छलाह। दूनुक रचना काल एक रहल छनि। ओना भूपेन हजारिका रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ दस बरख पैघ छलाह। दस बरख पैघ छलाह तँ हुनक मृत्यु सेहो रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ लगभग दस वर्ष पहिने 2011मे भेलनि। मुदा दुनूमे आसमान जमीनक स्पष्ट अंतर छनि। की? भूपेन हजारिका स्टार नहि सुपर आमेगा स्टार छथि। हुनका फालके पुरस्कार भेटल छनि। ओ देशरत्न थिकाह। असम केर लोक भूपेन हजारिकामे भगवान देखैत छल। एखनो देखैत अछि । भूपेन हजारिका केर मृत्यु केर बाद हुनका पद्मविभूषण, आ भारतरत्न भेटलनि। भारतरत्न तँ मृत्यक 8 वर्ष बाद भेटलनि। ई सब बात हुनका अलग व्यक्तित्व प्रदान करैत छनि। चाहे असमिया कुनो जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्रक हो, भूपेन हजारिका सबहक पूज्य छथि, असमिया संस्कृति केर नायक छथि। कनेक्टिंग फैक्टर छथि। ई बात ई प्रमाणित करैत अछि जे असम केर लोक अपन मानवीय धरोहर केर सम्मान करब जनैत अछि। हमरा लोकनि अर्थात मैथिल रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ जिबैतमे सेहो दूर धकेलने रहलहुँ अछि। मानवीय धरोहर केर सम्मान कोना करी ई कला हमरा सभकेँ मराठीसँ सिखबाक चाही। ध्यानचंद, कपिलदेव, अमिताभ बच्चन सन धुरंधर लाइनमे लागल रहलनि आ अपन एकता आ मुखर प्रवृति केर बलपर मराठी सब सचिन तेंदुलकरकेँ भारतरत्न दिया लेलक। सचिन केर कंटेम्पररी धोनी मुँह देखैत रहि गेलाह। एकरा कहैत छैक मराठी मानुष केर संस्कार। अपनामे भले लड़ब मुदा अपन आइकॉन लेल, अपन संस्कृति संरक्षण लेल एक रहब। किन्सियाइत ई गुण मैथिल मानुषमे आबि गेल रहैत !
ठीक छैक, मैथिल साहित्यकार केर लॉबी रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ वंचित रखने रहलनि। साहित्यकार लोकनि हुनक प्रयोग जे ओ साहित्यमे गीत लेखनकेँ छोड़ि आन दिशा जेना गद्य लेखन, कविता आदिमे केलनि तकरा संज्ञानमे नहि लेलनि। बहुत रास बात भेल। मुदा ताहि लेल जनताक आक्रोश कहाँ भेटल? मिथिला, पटना आ दिल्लीमे कार्यरत असंख्य संस्था कहाँ कोनो उचावच केलक हिनका लेल! सब सुतल रहल। जनता आ दरभंगा, पटना, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि नगर आ महानगरक संस्थाक सभक सहयोगसँ, निष्ठा आ आन्दोलनसँ राजनीतिक दबाबसँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल पद्मश्री आ पद्मभूषण बहुत छोट चीज छल। मुदा, हाय रे मिथिलाक दुर्भाग्य! अहि लेल संस्था सब सोचबो ने केलक। अपना आपके समाजक प्रतिनिधित्व कहय बला संस्था आ संगठन घोड़ा बेचि सुतल रहल।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर जेना महेन्द्र जी संग अपन स्टेजकेँ जोड़ी बनेलाह तहिना किछु जोड़ी स्त्री-पुरुष केर तैयार कएल जा सकैत छल। स्त्री पुरुष केर जोड़ी बनलासँ गीत सभहक प्रस्तुति आरो नीक भऽ सकैत छल। यद्यपि 1970 आ 80 केर दशकमे अनेक ठाम पुरूखक जोड़ी बनल मुदा कूनो शाश्वत जोड़ी नहि बनि सकल। बेर-बेर ईमानदारीसँ कहि रहल छी जे हमरा लोकनिकेँ अपन मानवीय धरोहर केर प्रति कनि साकांक्ष होबाक दरकार अछि। साकांक्ष होबा लेल समस्त समाजमे अपन संस्कृति संरक्षण हेतु सामूहिक सिनेह उत्पन्न भेनाइ आवश्यक। कतेक उदाहरण देखैत छी जाहिमे हम सब विध पुरौआ काज करैत लोककेँ, समाजकेँ आ अपना आपकेँ ओहिना मनबैत छी जेना कोनो माता अपन छोट नेनाकेँ पानिसँ भरल थारीमे चान केर प्रतिबिम्ब देखा ओकरा मना दैत छथि जे चान थारीमे आबि चुकल अछि।
बहुत दुखद स्थिति अछि। हम सब एखनो धरि चंदा झा (कवि चन्द्र), यात्री, प्रदीप आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल किछु नहि कऽ पाबि रहल छी। तीन महिना जखन मृत्युकेँ भऽ जाइत छनि तखन अपना आपके पैघ कहए बला संस्था लिली रे केर स्मृतिमे शोक सभा बजबैत अछि। कतेक संस्था सब तँ facebook आ सोशल साइट्स पर लिख काज चला लैत अछि। हम एक प्रयोजनसँ किछु दिन लेल अप्रैलमे पटना गेल रही। ओतय कियोक सूचना देलाह जे दिल्ली आ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रक तमाम मिथिला मैथिली लेल कार्यरत संस्था श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर सम्मानमे बहुत पैघ कार्यक्रम केर आयोजन नॉएडामे कऽ रहल अछि। ई बात सुनि आनंदित भेल रही। बादमे पता चलल जे ओ कार्यकर्म अति सामान्य रहैक। सब कियोक रुग्ण भेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर संग फोटो घिचा अपन व्यक्तिगत आ संस्थागत आर्काइव्जमे संचित कऽ लेलाह। जखन ओ आब नहि छथि तँ सब कियोक हुनकर छवि संग अपन छवि बला फोटोकेँ साथ शोक सन्देश प्रेषित कएलनि। दिल्ली आ राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्रमे लगभग 100 जाग्रत संस्था अछि। सब कियोक सांस्कृतिक कार्यक्रम करैत रहैत छथि। दिल्लीमे मैथिली भोजपुरी अकादमी सनक दिल्ली सरकार केर संस्था अछि। अहि संस्था केर उपाध्यक्ष संजीव झा मैथिल छथि, तीन बेरसँ विधायक छथि, आ दिल्ली सरकारमे हिनक बहुत नीक प्रतिष्ठा छनि। मैथिली-भोजपुरी अकादमी लेल अगर हुनकासँ सब संस्थाक कर्ता-धर्ता लोकनि वार्तालाप केने रहितथि तँ असगरे मैथिली भोजपुरी अकादमी पचास लाख टका आसानीसँ अहि कार्यक्रममे खर्च कऽ सकैत छल। सब संस्था अगर एक-एक लाख खर्च करैत तँ एक करोड़ सहजतासँ भऽ सकैत छल। दिल्ली केर मैथिल उद्योगपति, एवं जन मानस सेहो यथाशक्ति अपन सहयोग दऽ सकैत छलाह। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा उपराष्ट्रपतिकेँ अहि आयोजन केर मुख्य अतिथि बनाओल जा सकैत छल। मुंबईसँ उदित नारायण, दिल्लीसँ मैथिली ठाकुर, बिहारसँ शारदा सिन्हा आदिकेँ आमंत्रित कएल जा सकैत छल। अहिसँ दिल्लीक लोक आन भाषा भाषी, मीडिया, नेता, सभ कियोक बुझैत जे एहेन मैथिल आइकॉन छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। अतबे मात्र केलासँ हुनका लेल पद्मश्री आसानीसँ भेट सकैत छल। कनिक तत्परता, कने सिनेह, कने समर्पण बहुत किछु कऽ सकैत छल। मुदा भेल की! हुनकर कदकेँ आरो छोट कऽ देल गेल। मुदा दोष आयोजक केर नहि, दोष तँ हमरा लोकनिक सोचक अछि। भऽ सकैत अछि बहुत लोक हमर अहि बातसँ बिलबिला उठथि आ हमरे पर नाना तरहक प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करथि। मुदा ताहिसँ स्थिति थोड़े ने बदलि जायत?
मैथिल समुदाय चाहे मिथिला भूमि केर होथि अथवा प्रवासी होथि,मे विद्वान, समाजिक संस्था, युवा संगठन आ विद्यार्थी संगठन अथवा यूनियन केर मध्य सामन्जस्य नहि भेटैत अछि। ई बात आजुक नहि ऐतिहासिक अछि। भोगेन्द्र जीमे सब गुण छलनि मुदा ओ विद्वान सभ कें दिल्ली केर अखिल भारतीय मिथिला संघ केर कोर समितिमे बहुत सघन भूमिकामे नहि आबय देलथिन्ह। भोगेन्द्र जी ओना तँ अखिल भारतीय मिथिला संघ केर पदाधिकारी नहि छलाह मुदा सही अर्थमे वएह सर्वेसर्वा छलाह। ई प्रसंग लिखबाक प्रयोजन ई जे एखनो हमरा लोकनि अहि सब बात पर गंभीर होइ आ सब तरहक समायोजन करी। एखनो हम सब अपन रत्न: लिली रे, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, फणीश्वर नाथ “रेनू”, यात्री, स्नेहलता, प्रदीप लेल बहुत किछु कऽ सकैत छी। कोआर्डिनेशन ताहि लेल बहुत आवश्यक।
बहुत बात लिखा गेल। लेकिन सोचब तँ हमरा बातमे कोनो ने कोनो समाधान भेटत। स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर मिथिलाक अनुपम रत्न छथि। ओ सदैव अपना रचनाक संग जनमानस केर ह्रदयमे जीवंत रहताह।
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