गजेन्द्र ठाकुर
सझिया रोपनि (संपादक डा. प्रमोद कुमार)- ४३ टा बीहनि कथा लेखकक सझिया संग्रहक समीक्षा
१
सझिया-साझ बीहनि कथा संग्रह माने ४३ टा बीहनि कथा लेखक माने १.घनश्याम घनेरो, २.मुन्नाजी, ३.नारायणजी, ४.प्रमोद कुमार झा 'गोकुल ', ५.डा. प्रमोद कुमार, ६.मुन्नी कामत, ७.अमरेश कुमार लाभ, ८.विद्या चन्द्र झा 'बमबम', ९.सत्येन्द्र कर्ण, १०.विन्देश्वर ठाकुर, ११.आभा झा, १२.शिव कुमार, १३.प्रियंवदा, १४.महाकान्त प्रसाद, १५.प्रभाष अकिंचन, १६.आशीष अनचिन्हार, १७.पूनम झा, १८.शुभ्रा संतोष, १९.जवाहर लाल कश्यप, २०.सुभाष कुमार कामत, २१.नीरज कर्ण, २२.कुमारी आरती, २३.कल्पना झा-१ (बोकारो), २४.कल्पना झा-२ (पटना), २५.सबिता झा 'सोनी', २६.विनीता ठाकुर, २७.मृणाल आशुतोष, २८.अमर ठाकुर, २९.मनीषा झा, ३०.रूबी झा, ३१.ओम प्रकाश झा, ३२.हिमाद्रि मिश्र 'हिम', ३३.इरा मल्लिक, ३४.कंचन कंठ, ३५.राजेश वर्मा 'भवादित्य', ३६.मिसिदा, ३७.जयन्ती कुमारी, ३८.कल्पना कुमारी, ३९.सांत्वना मिश्रा, ४०.नन्दनी झा, ४१.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश', ४२.अमर कान्त लाल आ ४३.दीपा मिश्रा। २३ गोट पुरुष आ २० गोट महिल बीहनि कथाक अछि ई संग्रह।
संग्रहक पुरुष बीहनि कथाकार
१.घनश्याम घनेरो, २.मुन्नाजी, ३.नारायणजी, ४.प्रमोद कुमार झा 'गोकुल ', ५.डा. प्रमोद कुमार, ६.अमरेश कुमार लाभ, ७.विद्या चन्द्र झा 'बमबम', ८.सत्येन्द्र कर्ण, ९.विन्देश्वर ठाकुर, १०.शिव कुमार, ११.महाकान्त प्रसाद, १२.प्रभाष अकिंचन, १३.आशीष अनचिन्हार, १४.जवाहर लाल कश्यप, १५.सुभाष कुमार कामत, १६.नीरज कर्ण, १७.मृणाल आशुतोष, १८.अमर ठाकुर, १९.ओम प्रकाश झा, २०.राजेश वर्मा 'भवादित्य', २१.मिसिदा, २२.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश', २३.अमर कान्त लाल।
संग्रहक महिला बीहनि कथाकार
१. मुन्नी कामत, २.आभा झा, ३.प्रियंवदा, ४.पूनम झा, ५.शुभ्रा संतोष, ६.कुमारी आरती, ७.कल्पना झा-१ (बोकारो), ८.कल्पना झा-२ (पटना), ९.सबिता झा 'सोनी', १०.विनीता ठाकुर, ११.मनीषा झा, १२.रूबी झा, १३.हिमाद्रि मिश्र 'हिम', १४.इरा मल्लिक, १५.कंचन कंठ, १६.जयन्ती कुमारी, १७.कल्पना कुमारी, १८.सांत्वना मिश्रा, १९.नन्दनी झा, आ २०.दीपा मिश्रा।
महिला बीहनि कथा लेखकक ई संख्या आह्लादकारी अछि। आ तइ लेल सम्पादकक अपक्ष दृष्टिकोण प्रशंसनीय अछि। सम्पादकक अपक्ष रहब अखनो मैथिलीमे एकटा गुण सन अछि, से कष्टकारी धरि अवश्य अछि।
२
४३ गोट लेखकक ८६ टा बीहनि कथाक सझिया-साझ रोपनि भेल अछि।
घनश्याम घनेरोक “अछोप” मैथिलीकेँ सोंगर दऽ ठाढ़ रखबाक सम्पादकीय प्रयास दिस लक्षित हुअए बा नै मुदा कटाह अछि तँ मुन्नाजीक “फोकस!” खट-मिठाह। नारायणजीक “कुशल” राजमोहन झा केर बीहनि कथा “चलह”(देखू विदेहक ६७म बीहनि कथा विशेषांक https://videha123.files.wordpress.com/2010/10/videha_01_10_2010.pdf) सन मानव प्रकृतिकेँ देखबैत अछि आ एक्के प्लॉटपर अछि। से बीहनि कथामे सेहो प्लॉट होइत अछि आ एक्के प्लॉटपर दू तरहक बीहनि कथा लीखल जा सकैए से सिद्ध भेल। प्रमोद कुमार झा “गोकुल”क बीहनि कथा अलंकृत आ क्लासिकल दृश्यक निर्माण करैत अछि, से बीहनि कथामे तकर पलखति नै, से कहैबला गलत सिद्ध भेला। मैथिलीकेँ सोंगर दऽ ठाढ़ रखबाक सम्पादकीय प्रयासक सम्पादक डॉ प्रमोद कुमारक ५ टा बीहनि कथा ऐ संग्रहमे अछि। आ से बच्चा उचिते कहै छन्हि जे मायकेँ बिरयानी नै बनबऽ अएलै तँ ओ पिछड़ल भेल तँ ओहो गूगल, क्लासरूम आ पी.पी.टी आ किदनि सभ नै बुझने कोरोना-पश्चात कालमे पिछड़ल भेलाह। मुन्नी कामतक फेमिनिज्म “गर्ल्स हॉस्टल”क “फेरसँ देहकेँ स्वतंत्र करबाक प्रयास” सँ परिलक्षित होइत अछि। से बीहनि कथा फेमिनिज्म लेखन लेल सेहो औजार बनबाक योग्यता रखैत अछि। अमरेश कुमार लाभक “करिकी”मे ई मत आर पुष्ट भेल अछि- “पढ़ि लिखि ने लैक आ कोइ बड़का नोकरी लागि ने जाइक!”, आ से कारीसँ गोर हेबाक नव मलहम छी, आ तखन बऽर हेरैमे कोनो मौगति नै हएत। विद्या चन्द्र झा “बमबम” प्रेम-पिशाचसँ अपने ग्रसित छथि “माफ कऽ सकी तँ”मे; आ कक्काकेँ ऐमे ओ सान्हैत छथि “प्रभा”मे आ ऐ पिशाचेकेँ सत्येन्द्र कर्ण बाबाजीक “दिमाग फूजब” कहैत छथि….. अन्तिम सत्य। विन्देश्वर ठाकुर धरि पुरातन लोक छथि हुनका ने बेटाक बदमाशी “सोकाज”मे पसिन्न छन्हि आ ने पुतोहुक बदमाशी “बहसल कनिया” मे। आभा झा केर “लाज” पुरुखक नैतिकताक परिभाषापर चोट अछि। शिव कुमार सेहो “फर्मलिटी”मे परिवारमे नव अर्थव्यस्थाक वातावरणमे होइत झमेलकेँ चिन्हित करैत छथि। प्रियम्वदा “स्वाभिमान”मे- “बेटी केर विवाहक मूल्य”क विरोधमे छथि। महाकान्त प्रसाद “गोली”मे प्रधानमंत्रीक “मोनक बात”क गोलीसँ तुलना करैत छथि, हँ प्रधानमंत्री शब्दक ओ प्रयोग नै केने छथि। प्रभाष अकिंचन विवाहसँ ठामे पूर्व मोन पड़ैत उपनयन संस्कारक सम्बन्धमे “कपरछिल्ला” लिखैत छथि। आशीष अनचिन्हारक “स्थिति” विवाह-पूर्व आ विवाह पश्चात स्त्रीक अवस्थापर अछि तँ पूनम झा “उपदेश”क मादेँ फरिछा दै छथि जे कोना लोकक उपदेश आ करनी मे अन्तर होइ छै। शुभ्रा संतोष “मोल भाव” मे पुरुखक वीभत्स रूप देखबै छथि आ संगे नारीक भितरका शक्ति सेहो। जवाहर लाल कश्यप “कुक्कुर”मे मालिक आ कुक्कुरक मनोविज्ञानमे जाइत छथि आ “हीरो”मे सेक्सपियर सन “गुलाब गुलाबे सन सुगंधित रहत भने ओकर नाम किछु आर भऽ जाय” नाम-चलीसापर लिखै छथि। सुभाष कुमार कामत “कोड वर्ड”क माध्यमसँ देखबै छथि जे बेटीक जन्मक समाचार लोककेँ प्रसन्न करैत छै मुदा समाजक घटनाक डरे ओ ओकरा जन्म नै देमऽ चाहैए। मुन्ना प्रसन्न भेलाह मुदा सुधा टेलीविजन समाचार देखि चिन्तित भऽ गेली। नीरज कर्ण “फादर्स डे” केर माध्यमसँ कुटिलतापर प्रहार करै छथि। कुमारी आरतीक “जीवनसंगी” मुदा स्त्री-पुरुखक पत्नी-पति रूपमे सहमेलू हेबाक सेहो आस बनेने रखैत अछि। कल्पना झा-१ (बोकारो)क “संताप” गंगाक प्रदूषणपर टिप्पणी अछि तँ “सप्पत” बेटा आ साँय केर खाइत देखि बेटीक आक्रोशकेँ गहिंकी नजरिसँ देखबैत अछि। कल्पना झा-२ (पटना) “फेसबुकिया जिनगी” मे वृद्धावस्थाक समस्याक संग फेसबुक पोस्टपर संगे टिप्पणी कऽ जाइत छथि, से बीहनि कथामे छोट आकारक बादो दूटा प्लॉट संगे समाहित भऽ सकैए सेहो सिद्ध करै छथि। सबिता झा “सोनी”क स्त्री-विमर्श “नौत”मे देखार होइत अछि, भूख पुरुखकेँ पहिने लगैत छै की? विनीता ठाकुरक “समय केर मारल” ’समयक फेर’ भूखक माध्यसँ बतेबाक प्रयास थिक। मृणाल आशुतोषक “न्यूटन के थर्ड लॉ” लीव-इन रिलेशनमे रहनिहारि स्त्रीक दशा देखबैत अछि मुदा समापन विवशतासँ नै मुदा क्रिया-प्रतिक्रिया (“न्यूटन के थर्ड लॉ”)क माध्यसँ करैत अछि ओना क्रिया-प्रतिक्रिया शब्दक प्रयोग ओ नै करैत छथि कारण मिथिलामे एतेक साक्षरता तँ आबिये गेल छै जे “न्यूटन के थर्ड लॉ” कहने लोक ओकर अर्थ “क्रिया-प्रतिक्रिया” बुझि जेतै। अमर ठाकुर “नाम उच्च कान बुच्च” मे “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर” केर अर्थ फरिछबैत छथि। मनीषा झा “निपुत्र” केर माध्यमसँ एक्के गोटेक ’अपना का” आ ’अनका काल’ दुनू काल दू तरहक व्यक्तित्व होएब देखबैत छथि। रुबी झा “आस”मे माय आ बच्चाक दू परिस्थितिमे हठ आ “टुगर” मे मनुक्ख आ पशु दुनू क एक्के सन कष्ट अनुभव करबाक विवेचना केने छथि। ओम प्रकाश झा केर “पुरना दलान”- “नव घर उठे, पुरान घर खसे” केर विपरीत पुरना दलानक खसबाक कथा नै वरन चिड़ैक जोड़क आश्रय-स्थानक कथा अछि। बीहनि कथाक ई समीचीन अन्त अछि, हुनकर “स्पेशल परमिट” जे विदेह मैथिली विहनि कथा [विदेह सदेह ५] मे संकलित भेल छल सेहो अही तरहक कबीर-उलटबासी सन अछि। बीहनि कथाक अन्त अही तरहक हेबाक चाही, से गप हम बीहनि कथाक समीक्षाशास्त्र [विदेह सदेह ५] मे लिखने छी। हिमाद्रि मिश्र “हिम” केर “अधिकार” मे सासु-पुतोहुक उतराचौड़ी वर्णित अछि। इरा मल्लिक “पीड़ न जाने कोय” मे दुख बिसरबाक लेल राति भरि जाँत पिसबाक उदाहरण दऽ बीहनि कथामे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करबाक क्षमताकेँ देखबैत छथि, राति काटब मोश्किल होइ छै, दिन तँ कटि जाइ छै। कंचन कण्ठ बराबरीमे बीहनि कथाक अन्त हास्यसँ करैत छथि। राजेश वर्मा “भवादित्य” वर्तमानक भूत बनब आ फेर दुनूमे विवाद हएब केर माध्यम सँ किछु आर कहि जाइ छथि। मनुक्ख रोल बदललापर अपन विचारो अहिना तँ बदलैत अछि। मिसिदा अपन बीहनि कथा “सपना” सेहो ऐ गपकेँ साहित्य, रचना आ राजनीति केर तीन संकल्पनाक माध्यमसँ पाँच पाँतिमे फरिछा दइ छथि।जयन्ती कुमारीक बोल्ड बीहनि कथा अछि “खौंझी”, तामसमे किचेनमे बर्तन पटकबसँ शुरू भेल ई बीहनि कथा घरेलू सहायिका सोनी केर स्त्री विमर्शसँ शुरू भेल मुदा मलकिनी रेखा सेहो ओइ विमर्शक हीस छथि ओतऽ जा कऽ खतम, आ ई करबाक सामर्थ्य, जकरा एपेक्स-समापन कहि सकै छिऐ, लेखिकामे छन्हि। कल्पना कुमारीक “झमारल मोन” हिस्सा-बखड़ापर केन्द्रित अछि। सांत्वना मिश्रे धरि “भगवती जनम लेली” मे स्त्रीक समस्या लेल स्त्रीये दोखी बा स्त्रीयो दोखी बजैत सुनाइत छथि। नन्दिनी झा मुदा “भदबा” मे एकरा उनटि दैत छथि आ सासुक प्रगतिशील हेबाक प्रमाण प्रस्तुत करैत छथि। भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश” अपन “सहमत” मे बकथोथीकेँ प्रयुक्त करैत हास्य उत्पन्न करैत छथि आ सएह अमर कान्त लाल अपन “एम आर पी” मे करैत छथि। दीपा मिश्राकेँ बुझल छन्हि जे “चलाक” बेशी स्त्री होइत अछि मुदा कहै छथि “पुरुखे होइत हेतै” आ से कहि ढेर रास काज पुरुखसँ करबा लैत छथि।
३
सझिया रोपनि (सझिया बीहनि कथा-संग्रह) केर सम्पादक डॉ. प्रमोद कुमार ऐ संग्रहक भूमिकामे बीहनि कथाक गुणक विषयमे लिखैत छथि जे “एकरा मे एगो पैघ कथाक सब गुण होइछ। जेना कथोपकथन, वातावरण, शिल्प, तथ्यक गांभीर्य, उद्देश्य आ प्रासंगिकता आदि।”
हुनकर बीहनि कथाक नपना अछि कठोर रूपसँ १०० शब्द जे पढ़ल जा सकय २ मिनटमे- एनामे २ मिनट नूडल्सक विज्ञापन मोन पड़नाइ स्वाभाविक। हुनकर सम्पादकीय सामर्थ्य अछि जे किछु हास्य तँ किछु गम्भीर, किछु स्त्री-विमर्श तँ किछु कोरोना आ फेसबुक सन्दर्भित सभ तरहक बीहनि-कथा ओ ऐ संग्रहमे देलनि। से हास्य कणिका सेहो संदर्भयुक्त रहलापर बीहनि कथाक रूपमे चिन्हित आ संकलित भऽ सकैत अछि (देखू बीहनि कथाक समीक्षाशास्त्र- विदेह सदेह ५) ओ से सिद्ध केलनि। अष्टाध्यायीक भाष्य ओकर आकारक कएक गुणा बेशी आकारमे कएल जेबाक खगता ओकर रचनाक मोटामोटी ५ सय बर्खक बादे अनुभूत भेल आ से भेबो कएल। तहिना ऐ संग्रहक बीहनि कथा सभक समीक्षा संग्रहक हीसक रूपमे नै वरन् स्वतंत्र रूपेँ सेहो जँ कएल जाय तँ ओ सभ अपन आकारसँ कएक गुणा बेशी स्थान छेकत। आ से ऐ संग्रहक संकलित बीहनि कथा सभक विशेषता अछि आ त्इ लेल संकलनकर्ता-सम्पादक धन्यवादक पात्र छथि।
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रबीन्द्र नारायण मिश्र- मातृभूमि (उपन्यास)-७म खेप
६
नागपर्वतपर चंद्रिका जाइत-जाइत अधमरु भए गेल रहथि। हुनकर साँस जोर-जोरसँ चलि रहल छलनि । मुँहसँ लार-पोटा खसि रहल छलनि । सभके भेलैक जे आब ई नहि बँचतीह। ताबे नाग बाबा सेहो ओतए पहुँचि गेलाह।
"हम कतए आबि गेलहुँ?"-आँखि खोलितहि चंद्रिका बजलीह। हुनकर चारू कात लोकक करमान लागि गेल छल। सौंसे जानकी धामसँ लोग सभ जुटि गेल रहए। सभक मोनमे एतबे जिज्ञासा रहैक-"चंद्रिकाक की हाल छनि? कालीकान्त अपन पत्नी गौरीक संगे महादेव! महादेव! करैत रहथि।
मुदा संयोग कहू जे नागबाबा सही समयपर भेटि गेलखिन। ओ तुरंत जड़ी-बुटी देलखिन। किछु झाड़फूक सेहो केलखिन। नागबाबाक उपचार सही रहल। चंद्रिकाकेँ होश आबि गेलनि। कनीके कालक बाद चंद्रिका आँखि खोललीह।
चंद्रिकाकेँ होशमे देखि कालीकान्त आ गौरीक प्रसन्नताक अंत नहि छल। ओ चंद्रिकाकेँ वापस अपन घर लए जएबाक हेतु आगा बढ़लाह।
"ठहरू। हिनकर संकट अखन खतम नहि भेल अछि। -नाग बाबा बजलाह।
से सुनि कालीकान्त ओ गौरी दुनू गोटे ठमकि गेलाह, फेर साहस कए पुछैत छथि-
"आब की समस्या आबि गेल?"
"आबि नहि गेल, अएले अछि। चंद्रिकाक देह दिस किएक नहि देखैत छिअनि?"- नाग बाबा बजलाह।
" ई की भए गेल? केहन उज्जर धप-दप एकर वर्ण छल। एकर देह तँ कारी सिआह भए गेल अछि।" –कालीकान्त बजैत छथि। गौरीकेँ तँ बकारे नहि फुटनि।
"बेसक हिनकर प्राण बँचि गेलनि मुदा जहर बहुत भयानक छल। तकरे प्रभावसँ हिनकर शरीरक रंग कारी भए गेल अछि।"
"ई ठीक भए सकैत अछि कि नहि? –कालीकान्त बजैत छथि।
"हम सब तँ प्रयासे करब आगा महादेवपर निर्भर करैत अछि।"
"अपने सही निदान बताउ। हम सभ एहि हेतु अपनेक बहुत आभारी रहब। चंद्रिकाक जहिना जान बँचि गेल तहिना हिनकर रूपक रक्षा कएल जाए।"
“जहर सौंसे देह पसरि गेल छल। जँ कनिको देरी होइत तँ हिनकर प्राण नहि बँचैत।"
"किछु उपाय करिऔक जाहिसँ चंद्रिका अपन मौलिक स्वरुपकेँ प्राप्त करथि।"
"हम अवश्य प्रयास करब।”
"हिनकर देहक रंग ठीक हेबाक आधा-आधी संभावना अछि । "
जाहिसँ चंद्रिकाक स्वास्थ ठीक भए जानि से कएल जाए "- कालीकान्त बजलाह।
“चंद्रिकाक इलाजमे किछु समय लागत । बढ़ियां होएत जे ओ हमर आश्रमेमे दू-तीन दिन रहि जाथि।”
"कोनो हर्जा नहि । अहाँ तँ हुनकर पितातुल्य छिअनि । हुनकर कल्याणक चिंता हमरासँ बेसी अपने कए सकैत छी ।"- कालीकान्त बजलाह।
चंद्रिकाक हालत देखि जयन्त बहुत दुखी रहथि। हुनका चिंतित देखि आचार्यजी कहलखिन-
"जयन्त अहाँ बहुत चिंतित लागि रहल छी।"
ओ की बजितथि? चंद्रिकाक प्रति हुनकर मोह कष्टक कारण छल। आचार्यजी तँ ज्ञानी छलाह। हुनकर मोनक बात बुझलखिन।
"अहाँ विद्वान छी। भावी प्रवल होइत अछि। एकरा के टारि सकैत अछि। इलाज चलिए रहल छनि। समयक संगे सभ किछु अपने ठीक भए जेतैक । अस्तु, हमरा लोकनिकेँ सही समयक प्रतीक्षा करबाक चाही ।"- आचार्य बजलाह।
आचार्यक बात मानि जयन्त हुनका संगे शारदा कुंज लौटि गेलाह। संगे-संगे आश्रमक समस्त विद्यार्थी सेहो लौटि गेलाह। नागबाबाक परामर्श मानि कालीकान्त सेहो गौरीक संगे त्रिकुट भवन लौटि गेलाह। ओ सभ चंद्रिकाकेँ इलाजकेँ प्रधानता देलथि। असलमे हुनकर रंग ततेक कारी भए गेल छल जे ककरो चिंता भए जेतैक, फेर ओ सभ तँ ओकर माता-पिता रहथिन। फेर नाग बाबापर हुनका सभकेँ पूर्ण विश्वास छलनि । नागबाबाकेँ इलाकामे के नहि जनैत छल? अपना क्षेत्रमे ओ बहुत यशस्वी छलाह ।
चंद्रिकाक संगे भेल एहि दुर्घटनाक बाद जयन्त बहुत परेसान रहैत छलाह । हुनका मोनमे कतहु-ने-कतहु रहनि जे हुनके चलते चंद्रिकाक ई हाल भेलनि । ने ओ हिनका लग अबितथि, ने हुनका साँप कटितनि । दिन-राति ओही विषय सभपर सोचैत रहैत छलाह।
"अहाँ बहुत परेसान लागि रहल छी ।"-आचार्यजी कहलखिन।
"हमरा तँ किछु फुराइते नहि अछि। लाख कोशिश करैत छी मोन रहि-रहि कए ओतहि पहुँचि जाइत अछि।"
"ई नीक लक्षण नहि अछि, जयन्त! अहाँकेँ विद्याध्ययनपर ध्यान देबाक चाही। शेष वस्तु गौण थिक।"
जयन्त किछु नहि बाजि सकलाह। जखन दू-तीन दिन एहिना छटपट करैत बीतल तँ जयन्तकेँ नहि रहल गेलनि। ओ चुपचाप नाग पर्वतपर पहुँचि गेलाह। संयोगसँ थोड़बे कालक बाद कालीकान्त गौरीक संगे सेहो ओतए अएलथि। ओहि ठाम जयन्त परेसान एमहर-ओमहर टहलि रहल छलाह ।
“अहाँ बहुत परेसान बुझा रहल छी?"- कालीकान्त पुछैत छथि।
ओ किछु नहि बाजि सकलाह। चंद्रिकाक स्वास्थक चिंतासँ जयन्तक हालत खराप भेल जा रहल छल। गौरीक दुखक तँ अंते नहि छल। कालीकान्त तैओ धैर्य राखबे उचित बुझलनि। हुनका नाग बाबापर विश्वास बनल रहनि। ओ मोने-मोन हनुमानजीकेँ गोहराबए लगलाह। नागबाबाक प्रयाससँ चंद्रिका पूर्ण ठीक भए गेल रहथि। हुनका पूर्व अवस्थामे देखि कालीकान्त बहुत प्रसन्न भेलथि। मुदा गौरी अखनो जेना मानसिक अवसादमे होथि।
"आब कथीक चिंतामे पड़ल छी?"- कालीकान्त बजलाह।
"चिंताक तँ बाते अछि। आखिर चंद्रिकाकेँ ई समस्या सभ किएक भेलनि? कहीं ई सभ किछु षड़यंत्र तँ नहि अछि?"
"अहाँक माथा तँ सदिखन उलटे सोचैत रहैत अछि। एकटा दुर्घटना छलैक जकर अंत भए गेल। आब एहिपर बेसी माथापच्चीक कोनो औचित्य नहि अछि।"
कालीकान्त कहैत छथि-
"हमरा लोकनि अहाँक बहुत ॠणी छी । कहि नहि एहि महान उपकारक बदला हम सभ कोना सधा सकब? "
"एहिमे उपकारक कोन बात भेलैक । हम तँ नित्य एहन काज करिते रहैत छी । ई तँ संयोग भेल जे हमरा अपने लोकनिक सेवाक अवसर सेहो भेटल । चंद्रिका पूर्ण स्वस्थ भए गेलीह । हिनका लए कए आब कोनो चिंताक बात नहि अछि । "- नाग बाबा बजलाह। कालीकान्त आ गौरी नाग बाबाकेँ बहुत धन्यवाद देलनि। चंद्रिका आब पहिनेसँ बेसी सुंदर लगैत छलीह। नागबाबाकेँ प्रणाम कए ओ अपन माता-पिताक संगे त्रिकुट भवन लौटि गेलीह। जयन्त असगरे शारदाकुंज वापस चलि गेलथि।
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गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयीक पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास
गजेन्द्र ठाकुर
द ........ फाइल्स
१
हमर नाम छी………..आ गाम “गढ़ नारिकेल”
शुक्र दिन ऑफिससँ दस बजे रातिमे घुरलहुँ तँ डेरा पहुँचिते बेटी स्वागत केलक। बुझा गेल जे रूसल अछि। पुछलिऐ जे की भेल तँ ओ मोन पाड़लक जे अझुका सिनेमा देखबाक प्रोग्राम छलै। हमर एहि जवाबपर कि देरी भऽ गेल अछि आ थाकल छी, ओ सोफापर मुँह घुमा कऽ बैसि गेल आ कथुक उत्तरे नै दिअए। कनियाँकेँ कहलियन्हि जे काल्हि सिनेमा चलै चलब से नै हेतै कारण ८-११ बला शो तँ खतम भऽ गेल हेतै। ओ बेटीसँ पुछि कऽ ओतहियेसँ चिकरि कऽ कहलन्हि जे अहाँ अझुका प्रॉमिस केने रहिऐ। हँ प्रॉमिस तँ केने रहिऐ, तकरा पूरा तँ करैये पड़त। फेर मोन पड़ल जे सरकार नाइट शो देखेबाक अनुमति थियेटर सभकेँ देने छै, से आइ काल्हि ११ सँ २ बजेक शो सेहो देखि सकै छी। “बूक माइ शो” साइटपर ऑनलाइन टिकट कटेलौं आ से देखि बेटीक रुसब खतम भेलै। बेटा, कनियाँ आ माँ तीनू गोटे तैयार भऽ जाइ गेला आ सिनेमो जे पड़ि लागल सेहो सनगर। सालमे एक्के दू टा तँ नीक सिनेमा बनै छै बॉलीवुडमे।
दू बजे रातिमे सिनेमा देखि कऽ घुरि रहल छलौं, रस्तामे गाड़ीक लाइट एकटा बड़का होर्डिंगपर पड़लै, आ ओहने बहुत रास होर्डिंग अबैत गेल।
ओइ होर्डिंग सभपर राज्यक महिला मुख्यमंत्रीक कनी अगरायल सन अभयमुद्राबला फोटो छलै। ओना तँ बेटीसँ बेशी रनिंग कमेण्ट्री हमहीं करै छी, रस्ताक सभटा चीजक विस्तृत विवरण दैत गाड़ी चलबै छी, कखनो काल जखन दुनू हाथ छोड़ि खिस्सा आगू बढ़बै छिऐ तँ ओ टोकितो अछि आ सड़कक सभटा कानून, रेड-लाइट, ग्रीन लाइट, जेब्रा क्रॉसिंग, सभटा ओ बुझबऽ लगैए। मुदा ऐ होर्डिंग सभकेँ हम अनठा देलिऐ ई सोचिकऽ जेजँ कहबै तँ उनटे सुना देत जे ई सभ हमरा बुझले अछि। मुदा ऐबेर से नै भेल। शीसा खोलि कऽ ओ अचरजसँ हमरासँ पुछलक-
“ई ककर फोटो छिऐ डैडी?”
“ईहो नै बूझल अछि, फलना दीदी मुख्यमंत्रीक फोटो छियन्हि ई”।
“मरि गेलखिन्ह की? कहिया?”
कनी काल तँ हमरा बुझबामे नै आएल आ जखन आयल तँ ततेक हँसी लागल जे गाड़ी चलेनाइ मुश्किल। माँ कनियाँ आ बेटाकेँ कहलियन्हि जे ई किताबमे पढ़ैए जे मुइलाक बाद बड़का फोटो आ मूर्ति बनै छै से एकरा भेलै जे मरि गेलीह मुख्यमंत्री आ स्कूलमे एक्को दिनक छुट्टी नै भेटल। मुदा आइ काल्हि तँ जिबितेमे बड़का फोटो आ मूर्ति सभ बनऽ लागल छै। हमरा संगे सभ पेट पकड़ि कऽ हँसऽ लगला। बेटी हतप्रभ सभकेँ देखैत रहल। तखने हमर फोनक घण्टी बाजल आ हम जेबीसँ फोन निकालनहिये रही तखने ओ हमरा दिस इशारा कऽ कय स्टीयरिंगपर ध्यानदेबा लऽ कहलक तँ हम गाड़ीकेँ सड़कक कात लगा कऽ गाड़ी ठाढ़ कऽ लेलौं।
“सूतल छलौं की, उठा देलौं।”- फोनमेसँ अबाज बहराइए।
“नै, एते जल्दी कहाँ सूतै छी, कि कोनो जरूरी गप अछि?”, दू बजे राति कऽ ऑफिसक हाकिम बिना काजेक फोन किए करत, से जकरा इंस्टिंक्ट कहै छै तहिना पुछा गेल छल।
“एम्सक ट्रॉमा सेन्टर आबि सकै छी, आउ तँ फेर आगाँ गप हेतै”।
डेरा पहुँचि, कपड़ा बदलि कऽ ऊबरकेँ बजबै छी, अपन गाड़ी लऽ जायब तँ पार्किंग भेटत आकि नै से सोचि कऽ। गेटपर उतरि कऽ जखने ट्रॉमा सेन्टरक भीतर जाइ छी तँ अबाज अबैए-
“सर, एम्हर छी हम”। हमर इंस्पेक्टर सहैब गालकेँ हाथसँ साटने हमरा शोर करै छथि।
“अहूँ एतै छी, हाकिम बजेने छथि, तेँ हम आयल छी”।
“हमरे दुआरे बजेने छथि, अटैक कऽ देलक गुण्डा सभ”।
“कतऽ, कोना?”
ओ अपन गालपरसँ हाथ हटबै छथि तँ गाल दू टुकड़ी दुनू दिस भेल देखाइत अछि।
हमर “हाँ, हाँ”कहला उत्तर ओ धड़फड़ा कऽ अपन हाथसँ गालकेँ साटि लै छथि।
हम कहै छिएन्हि- “अहिना केने रहू, अहाँकेँ अपन गाल देखा नै पड़ि रहल अछि तेँ अहाँकेँ पता नै अछि जे ….”। चुप भऽ जाइ छी।
“कते कालसँ एतऽ छी?”
“एक घण्टासँ छी। जखन आइ.जी., डी.आइ.जी. सहैब सभ कनी काल पहिने एला तखनसँ कनी ध्यान देलकहेँ। ईहो सभ की करतै, देखै नै छिऐ भीड़”।
एकटा डॉक्टर हुनका बजाकेँ लऽ जाइ छन्हि एकटा कोठलीमे। ओइ कोठलीक बाहर सभ हाकिम जमा छथि, सभ गम्भीर मुद्रा बनेने छथि। लोकल थाना बला सभ सेहो आबि गेल अछि। थाना बला सभ सहटि कऽ हमरा लग आबि गेल।
दरोगाजी हमरा अपन मोबाइल निकालि एकटा वी.डी.ओ. देखबै छथि।
“देखू ऐ गुण्डा सभकेँ, हमरेपर पाथर फेकि रहल अछि”।
हवलदार सहैब टिपलखिन्ह जे ओइ सारकेँ हुजूर जेल पठा देलखिन, सभटा गजेरी-चरसी सभ छै। कोनो डरे-भर नै होइ छै। हुजूरे कऽ मोटरसाइकिल थानेपरसँ चोरा लेलकन्हि, तकर अखनि धरि पते नै चलल छै।
हम दरोगाजीसँ पुछलियन्हि- “अहाँकेँ की लगैए, की ई लॉ एण्ड ऑर्डरक गप छै आकि ऑफिसक काजसँ एकर कोनो सम्बन्ध छै”?
ओ कहै छथि जे मामिलामे पेंच छै। तहकीकात तँ जबरदस्त ढंगसँ हेतै। मुदा ओ सेहो कहै छथि जे मोटा-मोटी ई “लॉ आ ऑर्डरे”क समस्या छिऐ। मुदा देखू तहकीकातमे की निकलैए…
इंसपेक्टर सहैबक गाल सीबि देल गेल छन्हि। इन्सपेक्टर सहैब हमरा कहै छथि जे गाल तँ दू टुकड़ी भऽ गेल छलै से हुनका बुझले नै छलन्हि, सीलाक बाद डॉक्टर अएना देखेने छलन्हि से देखि कऽ पता चललन्हि।
सभ हाकिम अपना-अपना घर दिस बिदा भेला। सरकारी गाड़ी इंस्पेक्टर साहैब कऽ लऽ गेलन्हि आ हम ऊबरकेँ फोन लगेलौं।
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अगिला दिन भोरे-भोर ऑफिस गेलौं तँ अर्दली इशारामे कहलक जे एकटा इनफॉर्मर आयल अछि। हम कहलिऐ जे ककरोसँ भेँट करा दैतिऐ, एतेक गोटे ऑफिसमे अछि तँ कहलक जे कहैए जे अहींसँ भेँट करत, कहैए जे हमर इलाकाक हाकिम छथि, अनकापर ओकरा भरोस नै छै।
“हमर इलाकाक छी? कतुक्का छी? नामो-गाम बता देलक की?”
“नाम तँ नै बतेलक मुदा कहलक जे गामक नाम कहि दियौन्ह हाकिमकेँ, अपने बजा लेता। गामक नाम जे कहलक से विचित्रे…. किदन तँ … “गढ़ नारिकेल”!”
२
कएक दिन बीति गेल, डेटा, डेटा, डेटा…
बैलेंस शीट, एक्सेल फाइल, फेक अकाउण्ट, फेक इनवोइस..
फेर सभ फेक अकाउण्ट लेल एकटा कनसोलिडेटेड इनवोइस..आ तइसँ बनल ट्रायल बैलेंस… आ से डेटा गेल चार्टर्ड अकाउण्टेण्ट लग। आ तखन बनल ऑडिटेड बैलेंस शीट.. पकिया बला!
“एतेक सामग्री अहाँ लग अछि, अहाँ कोनो पैघे लोक छी, कारण कोनो संगठनक छोट-छीन लोकक हाथमे एतेक डेटा नै एतै। गढ़-नारिकेल एकटा रहस्य छै आ ई रहस्ये छिऐ ई दुनियाँ”।
“हमहूँ छी एकटा रहस्ये। गढ़-नारिकेलक कर्ज। हम सभटा गप कहब, किछुओ नुकाएब नै अहाँसँ, से समए आएत। एकबेर जखने शुरू कऽ देलौं अहाँ ई काज, तखने हम निश्चिन्त भऽ गेलौं। हमरा बुझल छल जे अनका ई डेटा देखेबै तँ ओ बुझबो करत आकि नै, आ जँ बुझि कय डेरा बा बिका जाय। आइक बाद हमरा आ अहाँक भेँट नै हएत, कोनो सूचनाक आदान-प्रदान आइक बाद आब डार्क-वेब टा पर हएत”।
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आ ओ चलि गेल।
ओकरा जिताएब हम।
ओ जीतत तँ जीतब हम।
एतेक सूचना, एतेक धरि खसि गेल लूकक सूचना?
सूचना आ डेटा बनि गेल अछि बड़का खेल। सभकेँ बूझल छै सभटा गप आ सभ गबदी मारने अछि बैसल।
डर..
कियो एकर कारण घर्-द्वार-परिवारकेँ बचाएब कहैए, फैमिली बला छी, अपन नै तँ परिवारक चिन्ता तँ करैए पड़त, तँ अपना लेल नै परिवारक लेल डेराइत छी… ओकरा की छै, ने आगू नाथ ने पाछू पगहा…
आ कियो-कियो होइत अछि बताह, ने अपन चिन्ता आ ने परिवारक.. बौआइत छै ओकर परिवार…
कियो कनी कालमे थम्हि जाइत अछि कियो कोनो पैघ दुर्घटनाक बाद थम्हैत अछि आ कियो किछुअ भऽ जाउ थम्हिते नै अछि… आ एहनो लोक सभ अछि जकरा संग दुर्घटना होइते नै छै.. से ओ किए थम्हत.. बुझाइ छै जे ओकर बड़कति होइत छै अधलाह काज केने..,.
लागि रहल अछि जे कोनो अन्हार तरहड़ि मे उतरल जा रहल छी, सीढ़ी नीचाँ दिसि जाइ छाइ, पहिने कनी-मनी इजोत, फेर झलफल, फेर राति सन अन्हार आ फेर अन्हार गुज-गुज, आगिपरक खापड़िक अधोभाग…
इजोत कोनो आस नै? आ जँ आबि जाएत इजोत तँ भऽ नै जाइ आन्हर…
इजोतसँ डेरा रहल लोक?
अन्हारेमे लागि रहल छै मोन आकि लगा रहल अछि मोन…
आ जे अछि बताह?
शोनितक रङ देखा पड़ि रहल अछि डेटामे, शोनित-शोनितामे… मुदा शोनितक रङ सेहो कारी, अन्हार-गुज्ज… शोनित तँ होइत अछि लाल टुह-टुह… मुदा ऐ डेटाकेँ हमरा लग अबैत-अबैत देरी भऽ गेलै.. लाल-रङ बेसी गाढ़ भेने कारी भऽ जाइ छै, आ देरी भेने सेहो…
देरी किए भेलै? बताह लोकक कमी तँ कहियो नै छलै ऐ लोकमे… मुदा लगैए जे आब भऽ गेल छै, आ से नै रहितै तँ एतेक शोनित युक्त डेटा, एतेक मात्रामे कोना थकिया जइतैक? आ जँ रहबो करितैक तँ तकर रङ लाल रहितैक, गरम रहितैक, कारी-पपड़ी पड़ल नै रहितैक।
सीढ़ी पहुँचि गेल अछि तरहड़िमे… तेहन ब्लैक-होलमे जतऽ जा कऽ सभ किछु गुरुतवाकर्षणक अधीन भऽ जाइत अछि, जकर मध्य विचित्र आकृति अछि जन्म लऽ लेने, डेराओन आ ध्वनि उत्पन्न करैत… जेना समुद्रमे उठल अछि चक्रवात…
सभ आकृति घेर लैत अछि हमरा… पहिने हमर गप सुनू तँ पहिने हमर… हॉस्पीटलमे जे हालत होइत छै डॉक्टरक, रोगी सभ जखन घेरने रहै छाइ ओकरा… ओतऽ तँ रोगीक सङ ओकर परिवारक लोक सेहो रहै छै, मुदा एतऽ तँ मात्र रोगीये टा छै..
पहिल फाइल
“सभ मानैए जे एकटा दैवीय शक्ति होइ छै, सभ तरहेँ नीक, सभसँ बेशी जानकार आ सभसँ बेशी शक्तिशाली, जकरामे कोनो अवगुण नहि अछि, जे सभ ठाम अनुभव कएल जा सकय आ जे अछि सभटा बौस्तुक ज्ञाता अछि। मुदा फेर दुष्ट शक्तिक कोन तरहेँ व्याख्या हएत? फेर कोना होइए दुष्ट कृति, किए होमए दैत अछि ओ ई दुष्कृति”?
अन्हारसँ निकलि रहल ई अबाज, दर्शनक एकटा समस्याकेँ अनैत अछि। नाम छियै गोप कुमार।
“सभ हमरे दोखी मानैत अछि, मुदा दोखी कएक तरहक होइत छै, एकटा होइ छै गैंगस्टर, एकटा नक्सल आ एकटा आतंकवादी आ एकटा हमरो सभ सन लोक”।
“तीनूमे हमरा लेखेँ कोनो अन्तर नै छै, जे राज्यक विरुद्ध शस्त्र उठेलक से भेल दोखी, आ तकरा भेटतै सजा”।
“मुदा जँ गैंगस्टर कहए जे ओ देशभक्त अछि आ अहाँकेँ नक्सल आ अतंकवादीक विरुद्ध अपन सहयोग देत, तखन”?
“तखन ओकर सहयोग लैत छी हम, मुदा ओइसँ ओकर केलहा माफ नै होइ छै। हँ, ओकरा पश्चातापक एकटा अवसर भेटै छै। आ से तँ नक्सली आ आतंकवादीकेँ सेहो भेटै छै”।
आ ओ कथा शुरू करैत अछि, सत्यकथा। मानवक समस्त प्रकृतिपर विजयक पश्चात, मानवक मानवसँ संघर्षक कथा। दोसर महाभारतक प्रारम्भ, वैश्विक कुरुक्षेत्रक युद्धस्थलपर। देखा चाही कतेक निअम टुटैत अछि एहि महाभारतमे, कतेक नव निअम बनैत अछि एहि क्रीड़ाक। कएकटा आशाक संचार होइत अछि आ कएकटा निराशाक। गढ़ नारिकेल बला ओ इन्फॉर्मर फेरसँ हमरा भीतर कृष्णक चपलता आनि देने अछि।
“जे अहाँ करबै सएह सही हएत आ जकर अहाँ विरोध करबै से गलत हएत”। यएह कहने रहए गढ़ नारिकेलक बसिन्दा आ यएह कहि रहल अछि गोप कुमार।
हमर बड़ाइ कऽ कय जान लऽ जाइ जो- हम सोचैत छी।
“बड़ाइ नै अछि ई। दुष्ट शक्तिक कोन तरहेँ व्याख्या हएत? बुझू जे ई छी प्रारब्ध जे अहाँकेँ एतए आनल गेल अछि। सर्वज्ञानी, सर्वशक्तिमान आ सभठाम उपस्थित शक्तिक अछैत दुष्ट शक्तिक व्याख्याक द्वार खुजत”।
हमर सोचलाहो गपक उत्तर दऽ रहल अछि गोप कुमार। ई एकटा नव अनुभूति अछि हमरा लेल। आइसँ पहिने हमर सोचलाहा गपक उत्तर स्वप्नमे कोनो शक्ति दऽ दइ छल, बा अर्द्ध-चेतनावस्थामे। अर्द्ध-चेतनावस्थामे माने जखन हम सोचब बन्द करैत छी, थाकि जाइ छी जे आब एकर उत्तर नै भेटत, तखने कइएक घण्टाक बाद कोनो ट्रैफिक जाममे बा सिनेमा देखैत काल बा खाइत काल, कइएक बेर सरल समाधान भेटि जाइत अछि। स्वप्नक समाधानकेँ तँ हम दैवीय हस्तक्षेप मानैत छलहुँ मुदा अर्द्ध-चेतनावस्थामे भेटल सरल समाधानकेँ शुरुहमे अपन ताकल समाधान मानैत छलौं। आर तँ आर अर्द्ध-चेतनावस्थाकेँ चेतनावस्थे मानैत छलौं शुरुहमे। मुदा स्वप्न कालक बढ़ैत सरल समाधान अर्द्ध-चेतनावस्थाकेँ परिभाषित केलक आ अर्द्ध-चेतनावस्थामे भेटल सरल समाधानकेँ सेहो दैवीय हस्तक्षेप सिद्ध केलक।