विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

ह्रास होइत सभ्यता संस्कृतिक इतिवृत्तिक अयना : अयना

हितनाथ झा · 2022-08-15 · अंक 352

ह्रास होइत सभ्यता संस्कृतिक इतिवृत्तिक अयना : "अयना"
मिथिलाक सामाजिक -आर्थिक -साहित्यिक-सांस्कृतिक व्यथा-कथा , प्रेम-अनुराग-विरागक सचित्र चित्रण, ह्रास होइत सभ्यता -संस्कृतिक इतिवृत्ति , हाहाकार करैत जीवनक मर्मस्पर्शी कथाक वर्णन ठीक ओहने जेहन अयनाक प्रति छबि देखा पड़ैत छैक, ने कोनो काट-छाँट, ने कोनो कम-बेस, ने कतौ कृत्रिमताक भान, ने कतौसँ शब्दक आयात,ने निर्यात, विशुद्ध अपन भाषाक शब्द-लालित्यक प्रयोग कयने छथि जेना अयनाक सामने ठाढ़ होथि जतय कृत्रिमताक कोनो गुंजाइस नहि,सोझ तँ सोझ,टेढ़ तँ टेढ़, गोल तँ गोल,चाकर तँ चाकर, भोर,दुपहरिया,सांझ,राति,जखन देखब, जेना देखब,जकर देखब, जाहि स्थिति-परिस्थितिमे देखब, ओहिना स्पष्ट रूप झलकि सामनेमे आबि जायत। उपर्युक्त बात हम केदार नाथ चौधरीक 'अयना' उपन्यास पढ़लाक बाद विश्वासक संग कहि रहल छी, जाहिमे कनेको कृत्रिमता नहि अछि,कारण उपन्यासकारक लेखनीक अपन निजता छनि, विशिष्टता छनि, सहजता आ सरलता छनि, ग्रामांचल - शब्दक बहुलता छनि, कथ्य आ तथ्यक प्रचुरता छनि,कल-कल बहैत नदीक जल धाराक सदृश भाषाक प्रवाह छनि, पाठककेँ अपना दिस आकर्षित करबाक पूर्ण क्षमता छनि।
ई पोथी मनलग्गूक संग समाजक कुप्रथापर जबर्दस्त प्रहार अछि, घटना -कल्पनाक समुचित उपयोग उपन्यासक श्रृंगार अछि, ढोंगीक अनुचित व्यवहारक भंडाफोड़ अछि, विद्रूप समाजक कुत्सित व्यवहारक कार्य -कलाप अछि, सामाजिक बन्धन तोड़बाक हेतु लेड़ चुबैत कामवासनाक देखार करैत घुटन अछि, आतंकवादक आतंक अछि, चिन्ताक संग चिंतन अछि, शब्दचित्रक मिथिलाक रंग-विरंगक अचार जकाँ विन्यस्त सचार अछि, राजनीतिमे चलैत भाइ-भतीजाबादक कारणसँ सरकारी कार्यमे अयोग्य व्यक्तिक नियुक्तिसँ कार्यपर पड़ैत प्रभावक चुभन अछि, आर अछि मायक ममता, पिताक निर्ममता, उच्च वर्गक लोलुपता, भाइ -बहिनक स्नेह, ठेला वलाकक उपकारक नेह, बेइमानक इमान आ वचनबद्धताक प्रमाण। प्रारम्भ होइत अछि, मैथिली पोथीक लेखक,प्रकाशक,ग्राहकक चिन्तासँ, लेखकक गोंधियागिरीक हम सुनरी कि पिया सुनरासँ,ढेर लागल किताबक ढेरीमे दीवार खाइत चिन्तासँ, किन्तु विशुद्ध लेखक,कविकेँ एकर कोन चिन्ता,ओ तँ जीवाक लेल लेखनी करैत अछि, ईश्वर प्रदत्त प्रतिभाक उपयोग करैत अछि आ से उपन्यासकार कवि-लेखक उदयचन्द्र झा 'विनोद'क निम्नलिखित पाँतीक उद्धरण कयलनि अछि -' हम लिखैत छी कविता,सूर्यकेँ अर्घ्य दैत छी,ककरो किछु फर्क भने नहि पड़ौक, हमरा पड़ैत अछि।अहाँ पढू वा नहि, हमरा लिखय पड़ैत अछि। हमरा लेल कविता लिखब,आइयो अछि आवश्यक, परमावश्यक अछि जीवाक लेल।"
से सत्ते,जीवाक लेल साहित्यक सृजन होइत छैक, तात्कालिक प्रभाव पड़ौ वा नहि पड़ौ,कालजयी रचनाक पाठक सभ समयमे भेटतैक, सभ पीढ़ीमे भेटतैक, आगाँक पीढ़ीक लेल तत्कालीन समाजक अयनाक काज करतैक,बाँकी माल-जालक निघेस जकाँ आगिक ज्वालामे विलीन भ' जेतैक। साहित्य अखबारक पन्ना नहि अछि,जे तत्काले पढ़ल जायत,नहि तँ बासि भ ' जायत। उत्कृष्ट साहित्य कहियो नहि बासि होइत अछि,अपितु युग-युग ओहिमे निखार अबैत रहैत अछि, ओकर उपयोगितक अनुसन्धानपर अनुसन्धान होइत रहैत अछि,आगाँकक पीढ़ीक लेल अनुकरणीय होइत रहैत अछि।
एहि उपन्यासमे शब्दक लालित्य, जेना पूर्वमे कहलहुँ अद्भुत अछि, एक्कहि डारिये कतेकपर निशाना अछि,तकर मात्र हम एक उद्धरण प्रस्तुत करबाक प्रयास करैत छी, बाँकी पूराक पूरा पोथी अपने जँ पढ़बै,तँ बिना पूरा पढ़ने कतौ निकलि नहि सकबै, कतौ नीरस नहि, रस तँ नैराश्यमे सेहो छैक,किन्तु हिनकर पोथीमे बिज्जू (सरही)आमक रंग -विरंगक स्वाद छनि -मधुर -खटगर-अम्मत-चहटगर।
" हमरे गामक जटाधर मिश्र धनिक लोक तs छथिहे संगहि छथि कलाक पुजेगरी। हुनकर पौत्रक उपनयनमे हमहूँ निमन्त्रित छलहुँ।मुफ्फरपुरसँ दू टा बाइजी आयल छलीह। दुनू बाइजी मानि लिअ इन्द्रक दरबारक परी-मेनका आ तिलोत्तमा।हम सौन्दर्यक उपासक छी से बजबामे हमरा लाज नहि होइए। दुनू बाइजीक नृत्यमे जे छटा छल ताहिसँ रसक बरखा भ ' रहल छल।दुनूक कंठसँ निकलल मधुर गीत स्वतः संगीत बनि हमर मोनकेँ आप्लावित क ' देने छल।हम दुनू बाइजीक अद्भुत नृत्य एवं कर्णप्रिय संगीतमे एतेक ने रमि गेलहुँ जे हमरा समयक ठेकान नहि रहि सकल। लगभग अर्धरात्रिक वेलामे आपस अपन आँगन पहुँचलहुँ।आषाढ़क महिना,तितल अन्हरिया राति,किछुए काल पहिने एक जबर्दस्त अछार भेल रहैक, आँगन पिछर, टोर्चक बैटरी कमजोर, भगजोगनीक इजोत,पैरक चट्टीमे थाल-कादो लेभरल। कहुना दुआरिपर चढ़लहुँ। मुदा पिछरि गेलहुँ। कतबो अपनाकेँ सम्हारलहुँ तइयो दुआरिपर सूतलि फुलकाहीवाली टहलनीक छोटकी बेटी कुसमियाक देहेपर ओघरा गेलहुँ। कुसमिया चिचिया उठल -माइगे माइ ! अनघोल जकाँ भ ' गेलै। कोठलीसँ पत्नी बाहर एलीह। हुनकर हाथक टॉर्चमे पेट्रोमेक्सक प्रकाश।उपस्थित दृष्यकेँ अवलोकन करैत ओ बजलीह - लुच्चा ! मनसाक लुचपना हमरासँ अधिक के बुझत। "
काल -पात्रक समुचित चयन "अयना" उपन्यासक पठनीयता सदैब रहत,ताहि हेतु प्रबोध साहित्य सम्मान एवं केदार सम्मानसँ सम्मानित, मैथिलीक पहिल सिनेमा 'ममता गाबय गीत 'क लेखक,निर्माता श्री केदारनाथ चौधरी बधाइक पात्र छथि।
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अमरनाथ झा- संपर्क-9110932557

Suggested citation: हितनाथ झा. “ह्रास होइत सभ्यता संस्कृतिक इतिवृत्तिक अयना : अयना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 352, 2022-08-15. https://www.videha.co.in/research/2022/352/ह्रास-होइत-सभ्यता-संस्कृतिक-इतिवृत्तिक-अयना-अयना.htm

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