२.१.पाठक हमर पोथी किए पढ़थि- गजेन्द्र ठाकुर
जेम्स जॉयसक ओना तँ पोथी सभ प्रकाशनसँ पूर्वे प्रसिद्ध हेबऽ लागल छलन्हि मुदा एक बेर एहनो भेल जखन हुनका अपन रचनाकेँ व्याख्यायित करऽ पड़लन्हि आ प्रश्न उठल जे लेखक अपन रचना लिखलाक बाद ओइपरसँ अपन समीक्षाक अधिकार छोड़ि दिअए आ ओकर समीक्षा आने लोक मात्र करथि, जेम्स जॉयसक उत्तर छल- नै।
आ तइ अनुरूपेँ "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"- लेखक द्वारा अप्पन पोथी/ रचनाक समीक्षा सीरीज मे पहिल खेपमे अहाँ पढ़लौं "आशीष अनचिन्हारकेँ:-
http://www.videha.co.in/new_page_89.htm
१. आशीष अनचिन्हार ०१ अगस्त २०२१
दोसर खेपमे "गजेन्द्र ठाकुर" लिखि रहल छथि जे लोक हुनकर पोथी सभ किए पढ़न्हु।
२. गजेन्द्र ठाकुर ०१ सितम्बर २०२२
पाठक हमर पोथी किए पढ़थि- गजेन्द्र ठाकुर
पहिल गप जे रचना सुनने छिऐ नीक छै मुदा पोथी भेटत केना? पहिने नेपाल पठेलापर डाकखर्च भारते जकाँ रहै आब तँ पोथी/ पत्रिकासँ महग डाकखर्च से आब नेपाल पोथी नै जाइए। हम न्यू जर्सीमे रहै छी, मधुबनी-दरभङ्गामे मैथिली पोथी-पत्रिका भेटिते नै अछि तँ यूगाण्डा, यू.एस.ए. आ ऑस्ट्रेलियामे कतऽ भेटत।
तइ लेल अहाँ सभकेँ हम कहब जे हमर सभटा रचना अन्तर्जालपर उपलब्ध अछि ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_90.htm , से भौगोलिक सीमाक समाप्तिक घोषणा भेल, उपलब्ध्ताक सेहो कोनो स्टॉक लिमिट नै।
आब हम अपन पोथीक विवरण देब निम्न खण्डमे-
मूल
पद्य (सामान्य कविता, गीत-प्रबन्ध, गजल आ बाल कविता-गजल)
गद्य (सामान्य कथा-उपन्यास-समालोचना-निबन्ध-प्रबन्ध-नाटक-सम्पादकीय आ बाल साहित्य)
अनूदित
गद्य- हमर अनूदित सामान्य कथा आ बाल साहित्य
पद्य- हमर अनूदित पद्य साहित्य
पहिने पद्य पर आबी, उदय नारायण सिंह जी हमर किछु पद्यकेँ उद्घृत केने छलाह, हुनका नीक लागल छलन्हि, हुनकर विश्लेषण नीचाँ दऽ रहल छी-
"कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि, जेना कि
"ढहैत भावनाक देबाल
खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़
आकांक्षाक बखारी अछि भरल
प्रतीक बनि ठाढ़
घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक मन्दिर आकि
ओसारापर राखल तुलसीक गाछ
प्रतीक सहृदयताक मात्र"
अथवा, निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ :
"सुनैत शून्यक दृश्य
प्रकृतिक कैनवासक
हहाइत समुद्रक चित्र
अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द
क्यो देखत नहि हमर ई चित्र अन्हार मे
तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर"
मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा-कवितामे। एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ, आ नव-नव चित्र, ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि ।
कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि-
"मन्दाकिनी जे आकाश मध्य
देखल आइ पृथ्वीक ऊपर..."
अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि, व्यक्तित्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी �सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि, मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि ।
अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि, राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि। ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि। ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह, क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे, तँ क्यो तीरन्दाजीमे, आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह। आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठक (मेटाटेक्सट) खूबी कहब। नहि तँ ओ कियेक लिखताह-
देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत
मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल
गुनधुनी बला स्वप्न
बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक
अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान
दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त
कारिख चित्रित रातिक निन्न
टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य
...
एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक, आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। ।"
राजदेव मण्डल लिखै छथि:-
"सहस्त्राब्दीक चौपड़पर बैसल अहाँ जिनगीक खेल देख रहल अछि। गहन अन्वेषण करैत एक-एकटा चित्रक रचना कऽ रहल छी आ ओइ उमंगमे डूबि रहल छी।
असीम समुद्रक कातक दृश्य
हृदय भेल उमंगसँ पूरित....।
अहाँक अन्तरक कवि रविक चित्र उपस्थित करैत कहैत अछि-
"सूर्य किरण पसरि छल गेल
कतेक रहस्य बिलाएल
तिमिरक धुँध भेल अछि कातर
मुदा ई की.......।
संग्रहमे किछु हैकू पढ़बाक सुअवसर भेटल। किछु सुआद बदलबाक लेल....। मिथिलांचलक गमकसँ अहाँक कविता हमरा सबहक मोनकेँ गमका रहल अछि :
"मोन पाड़ैत छी धानक खेत
झिल्ली कचौड़ी
लोढ़ैत काटल धानक झट्टा
ओहि बीछल शीसक पाइसँ कीनल
लालझड़ी
जेकरे नाओं लाल छड़ी आ
सत धरिआ खेल....।"
प्रवासमे रहैत स्मरण होइत गाम घर। ऐ पाँतिमे वियोगक ओइ व्याथाक वर्णन भेटैत अछि। एकटा नवीन लयक संग-
"पता नहि घुरि कऽ जाएब
आकि एतहि मरि-खपि
बिलाएब.....।"
ऐ व्यंग्यमे स्पष्ट दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि।
"लाठी मारबामे कोनो देरी नहि
बाछी भेलापर शोको थोड़ नहि
परन्तु छी पूजनीया अहाँ....।"
बाढ़सँ उत्पन्न भेल समस्या आ ओकरा छोट-छीन पाँतिमे समेटनाइ गागरमे सागर भरबाक प्रयास ऐ पाँतिमे परिलक्षित भऽ रहल अछि-
"ठाम-ठाम कटल छल हठहर
ऊपरसँ बुन्नी पड़ि रहल
सभटा धान चाउर भीतक कोठी
टटि खसल पानिक भेल ग्रास...।"
नव-नव बिम्बसँ कविता सभ पूरित अछि-
"सहस्त्रबाढ़नि जकाँ दानवाकार
घटनाक्रमक जंजाल
फूलि गेल साँस
हड़बड़ा कऽ उठलहुँ हम....।"
हड़बड़ा कऽ नै बल्कि अहाँ सचेत भऽ कऽ उठलहुँ। नव-नव चित्र ध्वनि लऽ कऽ नवीन दृष्टिक संगे। पता नै कतऽ धरि जाएब। कतऽ गन्तव्य अछि अहाँक।
"विश्वक मंथनमे
होएत किछु बहार आब....
पथक पथ ताकब.....
प्रयाण दीर्घ भेल आब....।""
ई सभ कविता अहाँकेँ भेट जायत हमर पोथी "सहस्राब्दीक चौपड़पर" मे।
आब हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ दू टा कविता प्रस्तुत अछि।
नजरि लागि जाइ छै
माए कहै छथि
जे नजरि लागि जाइ छै
बेटाकेँ देखि जे लागैए ओ आइ सुन्दर
साँझमे छाह पड़ि जाइ छै ओकर मुँहपर
से तँ सत्ते! हमरा सन ककर बेटा
मुदा मोनमे ई अबिते नजरि लागि जाइ छै
कोनो काज शुरू करैए
मारिते रास काज एक्के बेर
खतम हेबा धरि सुधि नै रहै छै
कियो कहैए जे कतेक नीक अछि अहाँक बेटा
तँ माएक करेज धकसँ रहि जाइ छै
करेज बैसऽ लगै छै
की करै छै?
कोन सुन्दर छै?
मुदा कहैत रहै छथि माए
जे नजरि लागि जाइ छै
बाते-बातपर हमर बेटाकेँ
कनियाँ कहै छथि सासुकेँ
माँ अहाँक बेटा घबराइ बला नै अछि
दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ
माए मुदा शनि दिन, सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ जड़बै छथि
सुरसुरी लागि जेतै ओकरा तँ बुझब जे नजरि नै लागल छै
आ सुरसुरी जे नै लागतै तँ बुझब जे नजरि लागि जाइ छै
कने काल सुरसुरी नै लगलापर माए होइ छथि चिन्तित
देखियौ ने, हमरा बेटाकेँ नजरि लागै छै छोटो-छोट गपपर..
नजरि लागि जाइ छै... बाते-बातपर हमर बेटाकेँ...
मुदा तखने छिकैत छन्हि बेटा, ओकरा सुरसुरी लागि जाइ छै
माएक मुँहपर अबै छन्हि मुस्की
सरिसौ-तोरी आ मेरचाइ सरबामे कनेक आर दऽ दै छथि...
कहलियन्हि ने माँ दुष्टक नजरि नै लगै छै अहाँक बेटाकेँ
कटिहारी
१
कनकनी छै बसातमे
हाड़मे ढुकि जाएत ई कनकनी
पोस्टमार्टम कएल शरीर जे राखल अछि
सातटा मोटका शिल्लपर, जड़त कनीकालमे
गोइठामे आगि जे अनलन्हिहेँ सुमनजी
राखि देल नीचाँ
कनकनाइत पानिमे डूम दऽ
गोइठाक आगिसँ आगि लऽ
शरीरकेँ गति-सद्गति देबा लेल
कऽ देलन्हि अग्निकेँ समर्पित
तृण, काठ आ घृत समेत
घुरि कऽ जेता सभ
लोह, पाथर, आगि आ जल नांघि, छूबि
डेढ़ मासक बच्चाकेँ कोरामे लेने माएकेँ छोड़ि
घर सभ घुरै छथि
एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम रातिक भोरमे
मुदा नै छै कोनो अन्तर
पहिरावा आ पुरुखपातकेँ छोड़ि दियौ
महिलाक अवस्था देखू
ऐ कनकनाइत बसातसँ बेशी मारुख
हाड़मे ढुकल जाइत अछि
कमला कात नै यमुनाक कात
हजार माइल दूर गामसँ आबि
मिज्झर होइत अछि खररखवाली काकीक श्वेत वस्त्र
साठि साल पूर्वक वएह खिस्सा
वएह समाज
मात्र पहिराबा बदलि गेल
मात्र नदी-धार बदलि गेल
सातटा शिल्लपर राखल ओ शरीर
अग्नि लीलि रहल सुड्डाह कऽ रहल
एकटा परिवार फेरसँ बनबए पड़त
आ तीस बर्खक बाद देखब ओकर परिणाम
ताधरि हाड़मे ढुकल रहत ई सर्द कनकनी
ऐ बसातक कनकनीसँ बड्ड बेशी सर्द
२
गोपीचानन, गंगौट, माला, उज्जर नव वस्त्र
मुँहमे तुलसीदल, सुवर्ण खण्ड गंगाजल
कुश पसारल भूमि तुलसी गाछ लग
उत्तर मुँहे
पोस्टमार्टम कएल शरीर
सुमनजी सेहो नव उज्जर वस्त्र पहीरि
जनौ, उत्तरी पहीरि, नव माटिक बर्तनक जलसँ
तेकुशासँ पूब मुँहे मंत्र पढ़ै छथि
आ ओइ जलसँ मृतककेँ शिक्त करै छथि
वामा हाथमे ऊक लऽ गोइठाक आगिसँ धधकबै छथि
तीन बेर मृतकक प्रदीक्षणा कऽ
मुँहमे आगि अर्पित होइत अछि
कपास, काठ, घृत, धूमन, कर्पूर, चानन
कपोतवेश मृतक
पाँच-पाँचटा लकड़ी सभ दै छथि
कपोतक दग्ध शरीरावशेष सन मांसपिण्ड भऽ गेलापर
सतकठिया लऽ सात बेर प्रदक्षिणा कऽ
कुरहरिसँ ओइ ऊकक सात छौ सँ खण्ड कऽ
सातो बन्धनकेँ काटि
सातो सतकठिया आगिमे फेंकि
बाल-वृद्धकेँ आगाँ कऽ
एड़ी-दौड़ी बचबैत
नहाइले जाइ छथि
तिलाञ्जलि मोड़ा-तिल-जलसँ
बिनु देह पोछने
आ फेर मृतकक आंगनमे
द्वारपर क्रमसँ लोह, पाथर, आगि आ पानि
स्पर्श कऽ घर घुरि जाइ छथि
मणिकान्त दास लिखलन्हि "त्वञ्चाहञ्च" बड्ड नीक लागल।
हमर गजल
ओम प्रकाश झा लिखैत छथि-
"ओना तँ सभ बाल गजल कहनिहार गजलकार सभ ऐ मे सक्षम छथि आ नीक सँ नीक बाल गजल लिख रहल छथि, मुदा ऐ सन्दर्भ मे हम श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक बाल गजलक उल्लेख करब उचित बूझि रहल छी। हुनकर एकटा बाल गजलक मतला अछिः-
कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी
जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी
ऐ गजल केँ पूरा पढि कऽ कने देखियौ। ई गजल कनिया पुतराक उल्लेख करैत नेना-भुटकाक मनोरंजन तँ करिते अछि, संगहि अजुका बाजारवादक बलिवेदी पर कुर्बान भेल मनुक्खक मार्मिक विवेचना सेहो करैत अछि।"
ओ लिखि रहल छथि अ रचनाक मादेँ-
बाल गजल
कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी
जँ रंग गुलाबी छै तँ जानू बार्बी
बोने-बोने फिरैए जे दैता सभ
वनसप्तो लऽ घूरलि मानू बार्बी
सात रंग लऽ भोर भेले गाममे
परी रहैए गाम अकानू बार्बी
कननी दूर हेतै बच्चा सभमे
भरल आँखि बिसरी ठानू बार्बी
पानि अकास धरती जा-जा घूमी
पंख लगा टिकुली अकानू बार्बी
धम्म गुड़िया संग खेलू कूदू
राति सपनाउ निन्न आनू बार्बी
सुता दियौ ऐ गुड़ियाकेँ आ सुतू
चढ़ि ऐरावत दिन गानू बार्बी
ई संकलित अछि हमर मोटा-मोटी सय पन्नाक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ" जइमे गजल ४० पन्नामे छै आ ६० पन्नामे मैथिली गजलशास्त्र छै।
ऐ पोथीक "टाइटल गजल" एतऽ दऽ रहल छी-
अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ
धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथजँ
निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी
फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ
निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल
बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तँ
अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे
जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ
खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे
धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ
मुन्ना जी हमरासँ साक्षात्कारमे पुछने छलाह जे उपलब्ध अछि विदेह:सदेह ३३ पृ. ४१५ पर ओकर किछु अंश दऽ रहल छी
मुन्नाजी:एतेक काज केलाक पछातियो एखन धरि अहाँक कोनो मूल्यांकन (व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक) नै भऽ सकल। अइ सँ अपनाकेँ प्रभावित तँ नै पबै छी?
गजेन्द्र ठाकुर: नै, एहिसँ हम सहमत नै छी। हमरा प्राप्त ई-पत्र आ चिट्ठी सभ, पाठकक प्रशंसापत्र, पाण्डुलिपि सभक परिरक्षणक हमर योजनाक सफलता आ भाषा-विज्ञानक हमर शोध ई सभ हमरा संतुष्टि देने अछि। खराब लोक सेहो अहाँकेँ नीक कहत से कोना सम्भव? से हमरा चाहबो नै करी। व्यक्तित्व आ कृतित्व दुनूक मूल्यांकन मैथिली की आनो भाषामे मृत्युक बादे होइ छै।
मन ऐसो निर्मल भयो जैसे गंगा नीर।
पीछे पीछे हरि फिरें कहत कबीर कबीर।।
(कबीर)
(मोन एहन निर्मल भऽ गेल जेना ई गंगाक जल अछि। पाछाँ-पाछाँ भगवान कबीर-कबीर कहैत पछोर धेने छथि।-कबीर)
खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे
धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ
(लोककेँ काज केलाक बाद दाम भेटै छै हमरा अगूबारे पेने छी।)
जगदानन्द झा "मनु"- "गजेन्द्र ठाकुर जीक ई उक्ति सय टका ठीक छैन -"जे जतेक बच्चा बनि जेता ओ ओतेक नीक बाल गजल कहता|"
चन्दन कुमार झा- "गजेन्द्र जी गजल व्याकरणकेँ पुष्ट करैत नहि खाली गजल लिखलाह अपितु सरल वर्णिक आ' सरल मात्रिक बहरक रूप मे मैथिली गजल संसार केँ दूटा अनमोल बहर वा गजल-छंदक ढाँचा देलखिन्ह जे हमरा सन-सन कतेको नवतुरिया आ' नवसिखुआ केs लेल गजल लिखबा हेतु सहायक सिद्ध भेल अछि.एहि सँ मैथिली गजल केँ अभूतपूर्व समृद्धि भेटि रहल छैक।"
आशीष अनचिन्हार लिखै छथि-
"मुदा हालहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा बहरे-मुतकारिबमे सफलतापूर्वक गजल लिखल गेल। तँए आब एकर चर्चा आवश्यक। ओना मैथिलीमे वार्णिक बहरक खोज सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल अछि जकर अनुकरण प्रायः हरेक नव गजलकार कए रहल छथि।"
ओ गजल नीचाँ देल जा रहल अछि।
बहरे मुतकारिब
बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ रुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर
अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे
जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे
हहारो उठेलौं उदासी गबेलौं
सिहाबै किए छी मदारी अनेरे
जतेको नबारी छबारी बुरैए
घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे
घरोमे उपासे बहारो निरासे
दहारे अकाले नचारी अनेरे
चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे
भसाठी अबैए विचारी अनेरे
आ अही गजल संग्रहक गजल सभसँ किछु शेर अहाँ लेल, जँ अन्त जाइत-जाइत कना जाय तँ नीचाँमे देल ई-मेलपर अवश्य सूचित करी।
उड़ैए चिड़ै आ बहैए अनेरे ऐ नील अकाश बिच
ऐरावत-मन जखन उधियाइए अङेजब कोना
देखल जानल सेहो आइए
रक्षादीप से मिझा रहल अछि
ककरा की कहबै के पतिआएत
गह-गहमे अर्थात बहुत अछि
अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ
घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि
चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर
छल छोट से बनल आब छेबगर
आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच
पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ
आजुक बात खतम होएत यौ
भोरुका बसात से बिर्रो बनल
पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो
नव विहान किए छल रोकल
आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात
अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्तै
माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर
प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि
तेजगर छी से छद्म ज्ञान भेल
खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल
नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि
तोहूँ हमरे सन अछि देखल
डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार
ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो बाढ़ि दुर्भिक्ष
ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल
चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै
एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक
आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची
बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकितौं
आ देखल मेघक टिक्कर खसि रहल छै अकासमे
हुलसि ताकल खेत दिस उल्लास पर्वत चढ़ल ऐ
जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल
अन्हरिया राति आ जिनगी झूर-झाम जे भेल
इजोरिया छैक कतबो छै तँ रातिये सगरो
दिनोमे ग्रहण आ सगरो अन्हार पसरल
हनिकय फेकी विचार मोनक
फड़िच्छ भेने बेसम्हार भऽ गेलै
गोंहि आएल अछि हमरा टोल
जलसमाधि तँ व्योपार भऽ गेलै
ऐरावत गज-ग्राहक गज नै
दुनूमे मेलक नियार भऽ गेलै
आँखि ओङठल जाइए कहू की करी
नै बुझलौं तमसाइए कहू की करी
धान छै खखरी बनल अहिठाम आ
धानी आगि धुधुआइए कहू की करी
देखि छूबि अनुभूतिक क्षण
ई पाँती इतिहास बनत नै
बान्हक कातमे घर बनेने बाट जोही
बाट बिसरि कऽ नै बिलमैए हमरा की
झूठक बहैत धार छै जे थमकल
उनटि बहलै तँ डाह दैए रहि रहि
डंकक अबैत चोट सुनैत भेल दिन कतेक
ऊहि अबिते अबैत विभिन्न भेल उसरि गेल
लच्छनो तँ बापक जिद्द गुनलकै
नीक तीक भूलि सएह बनलिऐ
बूझि सकलौं नै निशाभाग राशिक खेरहा
लूझि सकलौं नै परातीक पाँतिक खेरहा
बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे
कहैए हितैषी ई शिकारी बड़ा रे
क्रूर स्वप्न आ सुन्दर जीवन देखलौं निन्नसँ जगलापर
कोना हम मानब जँ कियो ई कहलक किछु नै बदलैए
कहैए ई मिलेबै आइ नोरोमे कने गोला
जँ भांगे पीबि एतै भावना पीतै लगैए ई
कोन पक्का रंगसँ ढौराबी जे धोखराए नै
मोनक रंगो धोखराइए चलू घुरि चली
भोरे उदासी उड़ियाइत जाइत
जे बुन्नी बुनिऐल छिच्चा अहीं तँ छी
चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर
उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी
ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान
बनैत बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी
कोनटा बचल नै एकान्ती ले एकोटा
अन्हरोखे उठै छी आ गनती गनै छी
पिआ गेलाह देशान्तर दूरस्त देस
कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी
उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने
उतर दछिन डगहर बहैब तखन किने
कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ
सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने
पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ
गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने
जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे
उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक
जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी
चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक
हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि
ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक
आदति जे लागल वेदना सहबाक
गेंठ बनैए से सोहनगर लगैए
बनि माँछ अकुलाइ छी बाझब जालमे कक्खन
जँ फँसि त्राण पाएब आँखि बओने से देखतै ओ
नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात
देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि
हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ
जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि
ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल
बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि
आब आउ हमर किछु हाइकू/ शेनर्यू/ टनका/ हैबून
बीहनि कथा सन ई विधा सीरियस नै मानल जाइ छै।मुदा जँ निचुलका रचना सभ (हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ) अहाँकेँ गम्भीर लगैए तँ बुझू जे हमर काज सफल भेल।
१
प्रकृति रोष
कुश तिल जलसँ
विधवा बनि
सधवा की विभेद
दूबि अक्षत जल (टनका/ वाका)
करबीरसँ
घर गाछ पहाड़
घेरल अछि (हाइकू)
बनैया लोक
घरक पनिबह
बिदति नहि (शेनर्यू)
करहड़ उपारि कऽ खाउ, प्रकृतिकेँ घरमे बसाउ, फुलवारी बनाउ, पहाड़क फोटो बना कऽ घरमे लटकाउ। आ भऽ जाउ प्रकृति प्रेमी। गामकेँ नग्रमे लऽ आउ, चित्रकारीसँ, कलाकारीसँ, बुधियारीसँ।
खेलाइ हम
करियाझुम्मरिमे
नीचाँ अकास
एकपेड़िया सड़क कतऽ पाबी आब, आब तँ चारि लेन सेहो कम चकरगर मानल जाइए। छह लेन, आठ लेन। अकास मलिछोंह, गाछक हरियरी मलिछोंह। मोन मलिछोंह। मुदा सड़क, घर सभ फोटो सन चिक्कन चुनमुन। लिखी चित्रसँ
घरक खाका आइ
छी जङलाह
(हैबून)
२
१.
तागि प्रकृति
ताकैले भेलौं पार
सुखल पात
(हाइकू)
२.
ई फूल फल
चढ़ैत जाइ आगाँ
कम होइए
उनटि देखी फेर
लगमे कम दूरे बेशी
(टनका/ वाका)
३.
रंग छाड़ल
पहाड़ आर गाछ
मुदा जीवन
(शेनर्यू)
४.
झझायल रंग कतेको वर्णक। बच्चाक किताबोसँ बेशी चमकैए ई प्रकृति, फूल, पात, बाट आ अकास। आ एकरा सभकेँ तँ छोड़ू ई बरफ, जे रेगिस्ताने ने छी, बालुक बदला बरफ। मुदा नै अछि ऑक्सीजन आ नहिये फूल-पात। मुदा एकर सेहो देखियौ शान। जइ रस्तासँ अबै छलौं से ओतेक कहाँ चमकै छल। जखन ओइ प्रकृतिक लग छलौं तँ कहाँ ओकर रूप निङहारि पाबै छलौं। कियो दूरसँ देखैत हएत तँ निङहारि पबैत हएत हमरो, प्रकृतिक बीचमे हमहूँ प्रकृति बनल हएब। मुदा ऐ शिखरपर आबि जे सनगर लगैए ई प्रकृति।
गाछ भेल छै
असगरुआ बौआ
पात भेल छै
खिलौना प्रकृतिक
शिखर देखि
मुदा आब ऐ शिखरपर एलाक बाद लगैए जे बेकारे एलौं एतऽ। ऐ शिखरकेँ ओइ ठामसँ देखै छलौं तँ कतेक सुन्नर लगै छल ई शिखर। मुदा शिखरपर एलाक बाद आब तँ वएह गाम नीक लगैए। तुलना तखने ने हएत जखन गामक प्रकृतिकेँ शिखरसँ देखबै। गामसँ शिखर आ शिखरसँ गाम। मुदा लिलसासँ हाइ रे हाइ। आब चलै छी शिखरक ओइ पार। देखै छी ओइ दिसुका लोक समाज। दूरसँ लगैए दुनू कातक गाम नीक, तराउपड़ी। मुदा ओइ कातक गामसँ शिखर ओतेक सुन्नर लागत जतेक ऐ पारक गामसँ लगैए।
नै ठाढ़ होउ
चलू चली घुरैले
बनिजार छी
लोकक बीचमे छी
जाइत घुरैत छी
(हैबून)
३
चतरल छै/ लतरल टाट ई/ झोरा कऽ खाउ
ई बिजलौका/ जड़िक शिरा सन/ पसरैए
जड़िसँ फूटि /ई कड़कड़ाइत/ दिग दिगन्त/ पसरत सगरे/ करत आच्छादित
कारण नै छै/ हारि लेल, विजय/ लेल नै गर्व
लोक पताली/ जहाज अकासमे / उनटि गेल / विश्व लोक ब्रह्माण्ड / बात विचार सभ
जल दुनियाँ/ समुद्र तलपर/ अद्भुत रंग
बिनु हरदि/ चाणक्यक बिखाहि / विषकन्या ओ
बिनु हरदि/ बनलि बिखाहि ओ / विषकन्या जे/ पालित भेल छलि/ बिनु हरदिक जे
हरदि, गुणे-गुण, सर्दी भेल, दूधमे घी आ हरदि दियौ आ आँखि मूनि घोंटि जाउ। चोट लागल हरदिमे डोकाबला चून मिलाउ आ लेप दियौ। हरदि बिना ने दालि आ ने खिच्चरि लागत पियरगर। खिच्चरि भऽ जाएत मरसटका आ दालि भटरंग। देखैमे लगैए जेना वैजयन्ती फूलक गाछ हुअए, मुदा ई बाड़ीमे होइए, वैजयन्ती सन पोखरिक महारपर नै। हरदि गाछ/ नुकौने जड़िमे ई/ अपन गुण (हैबून)
४
आसक अछि/ पनिसोखा उगल/ चलू बढ़ै छी (हाइकू)
भेल उबेर/ उगल पनिसोखा/ काज करै छी/ बहराइ घरसँ/ बाट भेटल अछि (टनका)
पनिसोखा ई/ उगल अकासमे/ उपरे ऊपर! (शेनर्यू)
आह, आब हएत उबेर, उगि गेल अछि पनिसोखा, खुजि गेल अछि बाट, बनिहार बिदा भेल बनिज करए, आ किसान बीया उखारि रोपनि लेल आ हम बिदा भेलौं कोनो अकाजक काज लेल, अन्तहीन बाटपर, सुकाजक काज लेल , दिशाहीन ठमकल चौबटिया दिस।
बाट तकैत
ताकी अकास दिस
विचित्र भ्रम
जेना ई पनिसोखा
उगि खोलत बाट
तखन फेरसँ ताकब, हेरब अपन समान, आ बर्खा होइ धरि चलैत रहब। तँ ई कहब जे बर्खा होइ धरि चलैत रहब कोनो पलायन तँ नै। पनिसोखा उगले अछि, बाट खुजले अछि आ हम बाट ताकि रहल छी आबैबला बर्खाक?
सतरंगिया
अछि ई आस
उगैए आस
डुबबाले अकास
बनि गेल संत्रास
(हैबून -दू टा गद्य आ दूटा टनका युक्त)
फेर कुण्डलिया (हमर पोथी "सहस्रजित्" सँ)
कुण्डलिया
१
सत असत मे भेद करू, राखू नै किछु रोख
ततमत नै करू कनियो, जे छै होनी लेख
जे छै होनी लेख, हुए से नीक निकेना
सत्यक जीत हएत, जँ करबै अकसतिकस ने
डर संग असत केर, डर ढाहू मध्य हृदयक
ऐरावतक बुझैत, यएह छी असत्यक सत
२
छत्ता घुरछा पल्लौसँ, भेल दिने अन्हार।
दिन बितलापर घर घुरी, काल भेल विकराल॥
काल भेल विकराल, पोरे-पोर सिहरैए।
सुनत केओ सवाल, बोल बगहा लगबैए।
ऐरावत बेहाल, बोल कतऽ भेल निपत्ता।
घुरियाए बनि काल, पैसि बिच घोरन छत्ता।।
३
विजय बिन गर्व हएत जँ, बुझू तखन ई नीक
हारि भेने घबराउ नै, बात बुझू ई मीत
बात बुझू ई मीत, हुअए जँ एक झमेला
हारि मानि बढ़ि जाउ, करू ने फेर बखेरा
भेल काज प्रसन्न जतऽ, नीक अछि टा सएह
मोन ऐरावत बुझि, देखि ली हारि-विजय
४
बोल वचन हुअए नीक, बूझि बाजी जँ बात
गुम्म रहनाइए ठीक, हुए जँ नमहर जाल
हुए जँ नमहर जाल, लेत ओ लप दऽ भीतर
हल्ला बनि जाएत, नै अछि जँ बेर उचित पर
सुनू हमर ई बात, बात होइए अनमोल
ऐरावत कहि जाय, कहू नै ओल सन बोल
आब पढ़ू मिथिलाक ध्वज ग़ीत (सहस्राब्दीक चौपड़पर सँ)
मिथिलाक ध्वज ग़ीत
मिथिलाक ध्वज फहरायत जगतमे,
माँ रूषलि,भूषलि,दूषलि, देखल हम,
अकुलाइत छी, भँसियाइत अछि मन।
छी विद्याक उद्योगक कर्मभूमि सँ,
पछाड़ि आयत सन्तति अहाँक पुनि,
बुद्धि, चातुर्यक आ शौर्यक करसँ,
विजयक प्रति करू अहँ शंका जुनि।
मैथिली छथि अल्पप्राण भेल जौँ,
सन्ध्यक्षर बाजि करब हम न्योरा,
वर्ण स्फोटक बनत स्पर्शसँ हमर,
ध्वज खसत नहि हे मातु मिथिला।
(विद्यापति शब्दावलीक प्रयोग)
आब ऐ बाल-गीतक माध्यमसँ सभ जानवर-चिड़ैक बोली सीखू (बाङक बङौरा सँ)
बड़द करैए दाउन ने यौ
हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि
हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि
ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर
लिह लिह बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ
अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी
कैटी पिसू-पिसू आएत की?
चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल,
भागी छोड़ि बाट हम ताकी
अर्र बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ
ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू
साँढ़ आओत खरिहानमे यौ
आव ठामे रे हे, हौरे हौ
बड़द करैए दाउन ने यौ
आब बीहनि कथा
जँ बीहनि कथाक नामपर अहाँ हास्य-कणिका पढ़ने छी तँ ई विधा अहाँकेँ सीरियस नै लागत। तँ पढ़ू एकटा बीहनि कथा (गल्प गुच्छ सँ), आ एकसँ बेशी बेर पढ़ए पड़ए तँ पढ़ू, आ हमरा विश्वास अछि जे हाइकू-हैबून सन अहाँ एकरो गम्भीरतासँ लेमऽ लागब।
बहुपत्नी विवाह आ हिजड़ा
"मरि गेलि बेचारी "। गौआँ सभ फलना बाबूक तेसर कनिआँक मुइलापर कहलन्हि ।
"फलना बाबू तेसर कनियाँक गरदनि काटि लेलन्हि"। एक गोटे कहलान्हि।
"से ठीके कहैत छी । पहिल कनियाँमे बच्चा नहि भेलैक तँ दोसर बियाह कएलक । मुदा जखन दोसरोमे बच्चा नहि भेलैक तँ बुझबाक चाही छलए ने"।- दोसर गोटे कहलन्हि ।
"हँ आ उनटे तेसर कनियाँकेँ कहैत रहथि जे भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तेँ भगवान बच्चा नहि देलन्हि । बुझू"?-तेसर गोटे कहलन्हि ।
"हिजड़ा सार"।- चारिम गोटे सभा समाप्त करैत बाजल ।
मुदा चारि गोटेक ई महा-सम्मेलन एहि गपपर सहमति मे छल जे पहिल दू टा बियाह करब उचित रहए।
हमर उपन्यास
शिव कुमार झा "टिल्लू" "मैथिली उपन्यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण" निबन्धमे लिखैत छथि-
"गजेन्द्र ठाकुरक "सहस्त्रबाढ़नि"मे दम्माक जड़ी एकटा आदिवासी द्वारा आनव आ िकछु वर्ख वाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दिस संकेत करैत अछि तँ हुनकर "सहस्त्रशीर्षा"मे मिथिलाक लगभग सभ दलित जातिक विष्तृत विवेचना करैत अछि। तीनटा घरक रहलोपर धोविया टोली एकटा टोल बनि गेल अछि। झंझारपुर धरि मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि। महिसवार ब्रह्मण सभ जे बरियातीमे बेलवटम झाड़ि कऽ सीटि-सीटि कऽ निकलैत छथि से कोनो अपन कपड़ा पहिरि कऽ। बैह मंगनिया कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दिन लेल भाड़ापर हिनका सभकेँ दैत छथिन्ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि। डोमी साफी आब डोमी दास छथि, कारण कबीरपंथी जोतै छथि। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि। चमार- मुखदेब राम आ कपिलदेव राम। पहिने गामसँ बाहर रहए, बसबिट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि कऽ उपटाए देने अछि आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एहि चमरटोली धरि आबि गेल अछि। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसिते रहैत अछि। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सिंगा बजेबा धरिमे हिनकर सबहक सहयोग अपेक्षित। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि ई सभ उठा कऽ नहि लऽ जाइत छथि लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक निचुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्वर स्थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि कऽ दूध दैत देखने रहथि तँ ओहि स्थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्थापित ई महादेव गेना हजारीक ताकल।
मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधिकारी छथिन्ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्कूलक प्रचार्य छथि, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि।
1967ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि नहि सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि तँ हुनका देखेने रहन्हि सभ जे कोना एतए सँ बिसॉढ़ कोड़ि कऽ मुसहर सभ खाइत छथि। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओहि मुक्ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि, रहैए मुदा किशनगढ़मे। चप्पल, जुताक मरो-म्मतिक अलावे तालाक डुप्लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीखि लेने अछि। कुंजी अछि तँ ओकर डुप्लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि तँ तकर डुप्लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्हि तँ तकर फीस दू सए टाका अतिरिक्त। मुसहर बिचकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीखि लेने अछि। वसंत कुंजक एकटा व्यवसायीक ओहिठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि किसनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्लिक बेटा श्रीमंत सेक्टरक मेन्टेन्सक ठेका लेने छथि। हुनका लग दू सए गोटे छन्हि जे सभ क्वार्टरक कूड़ा सभ दिन भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि। एहिमे सँ किछु गोटे विशेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महिनवारी दू सए टाकामे पोछै छथि आ अखबारक हॉकर बनल छथि। रहै छथि किशनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बिचकुन सदाय।"
दुर्गानन्द मंडल लिखै छथि-
"विदेह पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक सिनेहसँ हमरा अपनामे सृजनात्मक शक्तिक संचार भेल। बहुत रास एहेन शब्द सभ जे मैथिली साहित्यमे अप्रयुक्त छल। जेकरा ठेंठ कहल जाइ छलै ओ जखन ठाकुर जीक लिखल पोथी कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक पढ़ि देलखहुँ आ जनलहुँ तँ आरो विश्वास भऽ गेल।"
राजेन्द्र कुमार प्रधान लिखै छथि-
"श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक उपन्यास- सहस्रबाढ़नि ढेर रास रजनैतिक आ ब्यूरियोक्रेटिक उथाल-पुथलक गबाह अछि, तँ हुनकर सहस्रशीर्षा दलित गबैय्या मोहनक भारतक स्वतंत्रतासँ सूचनाक अधिकार धरि गीतक माध्यमसँ राजनैतिक चेतना पसारबाक अद्भुत सफल प्रयास अछि, तँ एकर बीचमे सन्हिआएल गामक आ बाढ़िक राजनीति गामसँ दिल्ली धरि पसरल अछि।"
एकटा काल्पनिक मुदा मिथिलाक गाम "गढ़ नारिकेल" उपन्यास-त्रयीमे सहस्रशीर्षाक बाद दोसर उपन्यास सेहो विदेहपर धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि।
जगदीश प्रसाद मंडल लिखै छथि- "गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक।"
उमेश मण्डल लिखै छथि-
"गजेन्द्र ठाकुर जीक लिखल "सहस्त्रवाढ़नि" उपन्यासक आखर-आखरमे संवेदनाक स्वर झलकैत अछि। संवेदनाक बिम्ब उद्दाध आ सम्यक अर्थनीतिसँ भरल मार्मिक चित्रण- जाहिमे एकटा कर्तव्यनिष्ट आ इमानदार व्यक्ति नन्दकेँ गृहस्त धर्मक संग-संग सामाजिक दायित्वक पालन करवाक क्रममे उद्वेलित व्यथा प्रस्तुत कएल गेल अछि।"
सहस्रबाढ़नि (उपन्यास)
सहस्रशीर्षा (उपन्यास)
लघुकथा
सर-समाज आ बाणवीर पढ़ू गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) सँ
सिद्ध महावीर, शब्दशास्त्रम्, दिल्ली आ तस्कर पढ़ू- शब्दशास्त्रम् (लघुकथा संग्रह) सँ
योगानन्द झा लिखै छथि-
"कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक- ई पोथी श्री गजेन्द्र ठाकुरक विभिन्न विधाक रचनाक संकलन थिक। एकर सातम खंडमे बालकथाक रूपमे तेइस गोट कथा संग्रहीत अछि। ऐ कथा सभमे अधिकांश मिथिलाक लोकनायक सबहक कथा िथक तथापि अाधा दर्जनक लगभग कथाकेँ बाल-लोककथा कहल जा सकैछ, यद्यपि ओकरो सबहक भाषा पूर्णत: शास्त्रीय प्रकृतिक अछि। बाललोक कथाक संकलनक क्षेत्रमे चलैत प्रयास सबहक नमूनाक रूपमे एकरा महत्वपूर्ण कहल जा सकैछ।"
सुभाष चन्द्र यादव लिखै छथि-
"गजेन्द्र ठाकुर अद्भुत व्यक्ति छथि। प्रखर मेधा आ प्रचण्ड ऊर्जा सँ सम्पन्न।हुनक प्रतिभाक पसार बहुत व्यापक छनि। ओ भाषा, साहित्य आ समाजक उत्थानमे जी-जान सँ लागल छथि। गजेन्द्र ठाकुर बहुभाषाविद् छथि। हुनक ई गुण शब्दकोश-निर्माण, अनेक भाषा मे पारस्परिक अनुवाद आ विभिन्न प्रकारक अनुसंधान मे प्रतिफलित भऽ रहल अछि। ओ मैथिलीक पहिल ई-पत्रिका "विदेह"क जनक छथि। "विदेह" मैथिली केँ वैश्विक मंच प्रदान कयलक अछि। मैथिल संस्कृतिक संरक्षण आ विकासक लेल ओ एकटा विलक्षण आर्काइवक निर्माण कयने छथि जे निरन्तर संवर्धनशील अछि।सात खंड मे प्रकाशित "कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक" गजेन्द्र ठाकुरक सृजन आ विमर्शक फुलबाड़ी थिक। साहित्यक कोनो विधा गजेन्द्र बाबू सँ छूटल नहि छनि। हुनक साहित्यिक बहुरंगी दुनिया बहुत प्रांजल आ लोकहितकारी अछि।बाल-साहित्य मे तऽ हुनक कलाक उत्कर्ष आ निखार अनुपम अछि।"
आ आब जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (विदेह:सदेह ३५ पृ. ११०५-१२५०)
०
सन् सैंतालीस...
भारतक स्वतंत्र त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।
मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।
असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...
मिथिलाक एकटा गाम...
जन्म भेल रहए एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...
ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भारतमे...
पिताक मृत्यु...गरीबी.. केस मोकदमा...
वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....
आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..
ओइ गाममे जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...
पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..
संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...
जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी... गजेन्द्र ठाकुर द्वारा
हमर नाटक
उल्कामुख
उल्कामुख (नाटक)
-गंगेश आ वल्लभाक प्रेम ऐ नाटकक विषय अछि। मुदा पहिल दू अंकक बाद तेसर आ चारिम अंक बदलि जाइए। आ आबि जाइ छथि सोझाँ उदयन, दीना, भदरी, आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी। आ शुरू भऽ जाइए इतिहासक एकटा षडयंत्रक अनुपालन। मुदा चारिम कल्लोलक अन्तमे भगता कहि दै छथि अपन शिष्यकेँ एकटा रहस्य.......जे विस्मरणक बादो आबि जाएत स्मरणमे।...बनि उल्कामुख...
- पाँचम कल्लोलसँ संकेतक बदला वास्तविकता, कल्पनाक बदला सत्य...
-पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल रहत, पाँचम कल्लोलसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत।
- गंगेशक तत्त्वचिन्तामणिपर ढेर रास टीका उपलब्ध अछि, गंगेशकेँ कहल जाइ छन्हि तत्वचितामणिकारक गंगेश; मुदा हुनकर कविता भऽ गेल छन्हि "उल्कामुख"!!!
मैथिली नाटककेँ.....................
नाटकक नव युगमे प्रवेश प्रवेश करबैत अछि.......
उल्कामुख.........................................................
विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित............................
निर्देशक रहथि बेचन ठाकुर..................................................................
मंच परिकल्पना रहए भरत नाट्यशास्त्रक अनुरूप ..
मैथिली समीक्षाशास्त्र, मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त, मैथिली गजलशास्त्र
अतुलेश्वर लिखै छथि- हेमनिमे गजेन्द्र ठाकुरक एकटा पत्र आयल छल जे ई षडयंत्र नहि थिक जे कोनो गोष्ठी (सगर राति दीप जरए, जे वर्तमानमे कथा गोष्ठी सँ बेशी अनर्गल गोष्ठी भ गेल अछि ) मे एहि तथ्य पर नहि आलोचना होइत अछि जे एहि कथामे कोन कमजोरी अछि वा कोन-कोन नव तथ्य आयल अछि, बल्कि जाइत, खाइतकेर सङ्ग रमानाथी-शैली पर चर्चा कएल जाइत अछि?
मायानन्द मिश्र लिखलन्हि- "कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... " समालोचनाकेँ विरोधमे लेब की उचित?
मैथिली समीक्षाशास्त्र
(सिद्धांत लेल)
मैथिली समीक्षाशास्त्र (विदेह:सदेह ३५ पृ. १३२२-१४१६)
(प्रयोग लेल)
बूच जीक कविताक -मार्क्सवाद, ऐतिहासिक दृष्टि, संरचनावाद, जादू-वास्तविकतावाद, उत्तर-आधुनिक , नारीवादी आ विखण्डनवाद दृष्टिसँ अध्ययन संगमे भारतीय सौन्दर्यशास्त्रक दृष्टिसँ सेहो अध्ययन
विदेह:सदेह ३३ पृ. २०१-२०६)
मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त
मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त (विदेह:सदेह ३० पृ. १३१-१३५)
मैथिली गजलशास्त्र
मैथिली गजलशास्त्र (विदेह:सदेह ३५ पृ. १२५१-१३२१)
विद्यापतिक बिदेसिया
विदेह:सदेह ३३ पृ. १९२-१९८
प्रतियोगी परीक्षार्थी लेल
NTA-UGC/ UPSC/ BPSC MAITHILI OPTIONAL- गजेन्द्र ठाकुर
[Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)]
(Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates)
(ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।)
(बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली)
(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति)
(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति)
(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी)
(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत)
(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री)
(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण)
(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास)
(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार)
(तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास)
अनुलग्नक-१-२-३ अनुलग्नक- ४-५
(मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-"ए", क्रम-५])
[मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल]
NTA_UGC_NET_MAITHILI_01- गजेन्द्र ठाकुर
NTA_UGC_NET_MAITHILI_02- गजेन्द्र ठाकुर
TEST SERIES-1- गजेन्द्र ठाकुर
TEST SERIES-2- गजेन्द्र ठाकुर
GS (Pre)
TOPIC 1 - गजेन्द्र ठाकुर
हमर अनूदित साहित्य
हमर जोर आन भाषासँ मैथिली अनुवादक बेशी रहल अछि ओना मैथिलीसँ अंग्रेजीमे हम सेहो अनुवाद केने छी। तकर पाछाँ हमर दूटा उद्देश्य अछि। पहिल जे ऐ सँ मैथिली समृद्ध हएत आ दोसर जखन हम अपन आ अनकर भाषाक साहित्य नै पढ़ब तँ आन किए पढ़त। नीचाँक पहिल लिंक सामान्य पाठ लेल अछि आ एतऽ मैथिलीमे अनूदित एकटा कथा आ किछु कविता अछि। दोसर लिंक ३५ टा बाल साहित्यक सचित्र पोथी अछि आ सायास द्विभाषिक (मैथिली-अंग्रेजी) राखल गेल अछि।
१
अनूदित साहित्य (आन भाषासँ)- गजेन्द्र ठाकुर
विदेह:सदेह २७ (गजेन्द्र ठाकुर आ रवि भूषण पाठकक आन भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य- अंक १-३५० सँ)
२
बाल साहित्य (अनुवाद- द्विभाषिक- मैथिली-अंग्रेजी)- गजेन्द्र ठाकुर
टोस्ट
बड़ीटा! कनियेटा!
एतऽ हम सभ रहै छी
भारतोल्लक राजकुमारी
भारतोल्लक राजकुमारी (बिनु शब्दक)
वुयो
कच-कच कचाक
चुन्नू-मुन्नूक नहेनाइ
नेना जे बैलूनसँ डेराइत छल
अद्भुत फिबोनाची अंक-शृंखला
हारू
अखन नै, अखन नै!
जन्मदिनक उत्सव भोज
मोट राजा पातर-दुब्बड़ कुकुड़
बचिया जे अपन हँसी नै रोकि सकैत छलि
अंग्रेजी
हम सूंघि सकै छी
छोट लाल-टुहटुह डोरी
करू नीक, भोगू नीक
ई सभटा बिलाड़िक दोख अछि!
चोभा आम!
हमर टोलक बाट
जखन इकड़ू स्कूल गेल
माछी फेर आउ टाटा!
अमाचीक जुलुम मशीन सभ
टिंग टोंग
पाउ-म्याऊ-वाह
कुकुड़क एकटा दिन
हमरा नीक लगैए
रीताक नव-स्कूलमे पहिल दिन
कनी हँसियौ ने!
लाल बरसाती
भूत-प्रेतक नाट्यशाला
आउ पएर गानी
कतऽ अछि ई अंक ५?
मुन्ना जी हमरासँ साक्षात्कारमे पुछने छलाह जे उपलब्ध अछि विदेह:सदेह ३३ पृ. ४१५ पर ओकर किछु अंश दऽ रहल छी
मुन्नाजी:अहाँक मैथिली पत्रकारिताकेँ दूरि हेबासँ बचेबाक वा सत्यक खोजक कारणेँ गारि-गंजनक पछातियो एक स्टंपपर अड़ल रहबाक दृढ़ संकल्प कतेक दिन धरि निमहता हएत?
गजेन्द्र ठाकुर: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक समर्पणमे हम लिखने रही-
पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे
तहिये बुझने रही जे
त्याग नहि कएल होएत
रस्ता ई अछि जे जिदियाहवला।
आ ई पढ़ि गामक बहुत गोटे कानए लागल छलाह। हुनका सभकेँ बुझल छन्हि, मुदा अहाँकेँ हम यएह कहि सकै छी जे एकर निर्धारण भविष्य़ करत।
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