विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

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शंभु कुमार सिंह · 2022-10-01 · अंक 355 · पृष्ठ 42–47

तार्किक रूपेँ जँ देखल जाए तँ मैथिली साहित्यक ज्ञानक्षेत्रमे हम 'गोबर गणेश' छी। शून्य छी। ओ शून्य जे प्रायः कोनो संख्याक बाम भागमे रहैत अस्तित्वहीन रहैत अछि। मुदा मैथिली साहित्यक ख्याति-लब्ध साहित्यकार, विदेह ई-पत्रिकाक प्रमुख संपादक महोदय आदरणीय श्री गजेन्द्र बाबू से मानबाक लेल तैयार नहि छथि। हुनका भ्रम छनि जे जँ एहि शून्यकेँ घीच कए कोनो संख्याक दहिना भागमे बैसा देल जाए तँ ओहि संख्याक मान 10 गुणा बढ़ि जेतैक (एतए कोनो संख्याकेँ मैथिली भाषा मानल जाए)। मुदा हम की छी से हमरासँ नीक के जानि सकैत अछि? 'गोबर गणेश' हेबाक स्पष्ट प्रमाण हमरा तखन भेटि जाइत अछि जखन हम अपनहि किछु छिटफुट कविता, कथा, निबंध आदि मूल्यांकन करैत छी।
एकटा दीर्घ अंतरालक पश्चात् आइ ओ पुनः मेल पठौने छथि:
"रचना सादर आमंत्रित अछि। गजेन्द्र, व्हाट्सैप..."।
एक मोन भेल, मेलकेँ इग्नोर क' दियैक। फेर मोनमे आएल जे जखन हमरो सन रचनाकारक रचनाकेँ फोकटमे किओ छापि दैत छथि तँ हर्जे की। मुदा प्रश्न छल जे हम हुनकी की पठबिअनि? अनुसंधानात्मक लेख तँ हमरा बसक बात नहि थिक, तखन? बहुत देर धरि गुनधुनमे लागल रहलहुँ। निर्णय केलहुँ जे कोनो नव कथा लिखि कए पठा दैत छियनि। मुदा लाख प्रयासक बावजूद हमरा कोनो एहन 'थीम' (विषय) बुझ'मे नहि आएल जेकरा पर हम अपन कलम चला सकी। तखनहि मोनमे एकटा युक्ति सुझल! आइ कार्यालयसँ घर जएबाक क्रममे एक-एक वस्तु, दृश्य, घटना आदिक गहन अवलोकन करैत जाएब, कतहुँ-ने-कतहुँ सँ कोनो 'थीम' तँ भेटिए जाएत।
सीआईआईएल केर मुख्य द्वार हाइवे सँ एकदम सटल छैक। सड़कक आकृति चौबटिया जकाँ छैक। पैदल पार पथक कोनो निर्देश नहि हेबाक कारण गाड़ी-घोड़ाक आवाजाहीक बीच लोककेँ आर-पार करब एतए कठिन चुनौती सन छैक। हम सड़कक कातमे ठाढ़ भए सड़क खाली हेबाक प्रतीक्षा करए लागलहुँ।
चूँssssss, भड़ाक! आह! ओह!
एकटा स्कूटी सवार कामिनी सोझाक गाड़ीमे धक्का मारि देने रहैक। दुर्योग जे ओहि कामिनीक पाछू बैसल लगभग 20-22 वर्षीय ओहि युवकक पयरक हड्डी टूटि गेल छलैक, जखन की ओ कामिनी आंशिक रूपसँ चोटिल भेल छलीह, एहन बुझाइत छल। हुनका उठएबाक आ सहारा देबाक लेल कैकटा हाथ एकहि संग उठि गेल रहैक जखन की गंभीर रूपसँ घायल ओहि युवकक दिस कम्मे लोकक ध्यान रहैक। बीच सड़क पर भीड़ जमा भ' गेलैक। ई त' कहू जे हुनका सभक भाग्य नीक छलनि जे एतएसँ महज 100 गजक दूरी पर बीएम अस्पताल रहैक, जतए हुनका दुनू गोटे केँ प्राथमिक उपचारक हेतु पठा देल गेलनि।
सड़क पार कएलाक बाद लिंगराजक चाहक दोकान छनि। चाह पीबाक लाथे हमहुँ ओतए बैसि गेलहुँ। एकटा सुन्दर, सौम्य महाशय दनादन सिगरेटक कश लगा रहल छलाह। हुनक खोंखी एहि बातक स्पष्ट संकेत दए रहल छल जे सिगरेट अपन रंग देखाएब आरंभ कए देने छल। जखन कोनो तेहल्ला द्वारा हुनक अभिवादन कएल गेलनि तँ पता लागल जे 'महाशय' बीएम अस्पतालमे डॉक्टर छथि। संतोष भेल, चलू सिगरेट हिनक की बिगाड़ि लेत? ई तँ स्वयं डॉक्टर छथि।
एकटा गरीब-सन लोक पानिक खाली बोतलमे अपन बीमार पत्नीक लेल चाह लए रहल छलाह जे बगलक बीएम अस्पतालमे भर्ती छलीह। हुनका संग कुपोषणक शिकार एकटा 5-6 वर्षीय कनकिरबी रहनि। मैल वस्त्र, ओझराएल केश, आँखिमे काँची, धनुषाकार टाँग आ कदीमा-सन पेट। कोनो बिस्कुटक पैकैट दिस इशारा क' रहल छलीह।
"कतेक दाम छैक एकर?" बाप दोकानदारसँ पुछलकैक।
"दस रूपैया।"
..................
बेचाराक चेहरा उतरि गेलैक। केकक दिस इशारा करैत ओ फेर पूछलक-एकर?
"दू रूपैया।"
'एकटा द' दिऔक।" बाप अपन कनकिरबीकें ओ केक द' कए ओकरा बहलएबाक असफल प्रयास कए रहल छलाह मुदा ओ नहि मानलक। ओ कनकिरबी केक घुमाकए दूर फेकि देलक। बाप केक उठाकए ओकरा झारि-पोछि अपना जेबीमे राखि लेलक। कनकिरबीक अविरल रूदन जारी रहैक। बापक ध्यान आब ओमहर नहि छलैक। ओ अकारणेँ हमरा दिस देखैत बाजए लागलाह:
"की कही भाय! ई अस्पताल वला डकैत छैक, डकैत! रातिक बारह बजे सरकारी अस्पतालमे कोनो डॉक्टर नहि रहैक एहिलेल हम एहि डकैतक फेरमे पड़ि गेलहुँ। एखन धरि 2,500 रू. खर्चा करा देलक अछि आ पता नहि...।"
"भगवान गरीब लोककेँ बीमारी दैते किएक छथिन?" ई बात ओकरा हलकसँ नहि निकलि सकलैक।
हम ओतएसँ आगू बढ़लहुँ।
आब हम दोसर मुख्य सड़क पर छलहुँ। एतए सड़कक बाम भागमे एकटा डॉक्टरक प्राइवेट क्लिनिक छलनि। ओ प्रायः अपन केहुनी टेबुल पर टिकौने अपन गाल थाम्हने बैसल रहैत छथि। सड़कसँ आवाजाही करए वला शायते कोनो लोक हेतैक जेकरा ओ गिद्ध-दृष्टिएँ नहि देखैत होथि। हुनका लोकबागकेँ स्वस्थ देख ईर्ष्या होइत छलनि (संभवतः)। ओ (संभवतः) मोनहि- मोन सोचैत रहैत छलाह, "ई लोक सभ स्वस्थ किएक छैक? बीमार भए हमरा लग ईलाजक हेतु किएक नहि अबैत अछि?"
हम आगू बढ़ैत छी।
किछु दूर चललाक पश्चात्, सड़कक दहिना कात एकटा बुढ़िया फुटपाथ पर साग बेचि रहल छलीह। हुनका छिट्टामे कुल मिलाकए तीन तरहक साग, 15-20 नेबो आ किछुएक किलोक लगपास हरियर मिरचाई छलनि। ओतए एकटा गाड़ी रूकल। ओहि गाड़ीसँ निकलए वला युगलक ठाठ देखबा योग्य रहैत। पुछला पर बुढ़िया कहलकैक, "साग 5 रू. मुट्ठा"। दाम सुनि ओहि युगलकेँ लागलैक जेना ओ बुढ़िया 5 रू. मुट्ठा साग बेचिकए कोनो क्राइम क' रहल छलैक। आब शुरू भेलैक मोल-मोलाय आ अंततः सागक दर तय भेलैक 4 रू. मुट्ठा। युगल एक मुट्ठा साग लेलक 4 रू.केर छुट्टा पाइ ओकरा थमबैत, चलैत बनल। हम ई सभ घटनाक्रम देख चुकल छलहुँ, एहिलेल दर जानब आब हमरा लेल आवश्यक नहि रहि गेल छल। हमहुँ दू मुट्ठा साग लेलहुँ आ दू-टकियाक चारिटा सिक्का ओकरा थमा देलिऐक। एहिपर बुढियाक धैर्य टूटि गेलैक। ओ बाजलि-बाबू टू टका आर दिऔक। हम कहलिऐक, "एखने तँ अहाँ ओकरा सभकेँ दू टके मुट्ठा साग देने छियैक।"
ओ बाजलि-"बाबू, 300 टकाक माल आनने छलियैक, कच्चा सौदा छैक, आइ बुझाइत नै छैक जे पूँजिओ ऊपर भ' सकतै।"
हम कहलियैक, "अच्छा अहाँ एहन करू, हमरा पाँच मुट्ठा साग आर द' दिअ।" ई कहि हम ओकरासँ पूर्वमे देल गेल पाइ घुरा कए 35 टका द' आगू बढ़लहुँ।
ओतएसँ बढ़लाक बाद हम मोनहि-मोन अपन तुलना ओहि कार वलासँ धनिक लोकसँ कए रहल छलहुँ। हमरा नजरिमे ओ तुच्छ लागि रहल छलाह। जखन कि हम स्वयंकेँ बहुत बड़का दयावान बुझि रहल छलहुँ। "आखिर सागक पाँचटा अतिरिक्त मुट्ठा कीनि ओहि बुढ़िया पर उपकार जे केने छलहुँ।"
आब हम धीरे-धीरे अपन घरक (किरायाक) सीढ़ी चढ़ि रहल छलहुँ। कपड़ा बदलि हाथ पयर छोलहुँ, किछु कालक बाद टी.वी ऑन केलहुँ तँ "कौन बनेगा करोड़पति अर्थात् केबीसी" प्रसारित भ' रहल छलैक। हॉट-सीट पर बैसल छलीह महाराष्ट्रक कोनो छोट-सन गामसँ आएल एकटा 30-35 वर्षीय विधवा। कार्यक्रमक संचालक श्री अमिताभ बच्चनसँ गपशपक क्रममे ओ बतौलनि जे, "हुनक पति एक साधारण किसान छलाह, ओ कपासक खेती हेतु बैंकसँ 2 लाख टका ऋण लेने छलाह। ऋण-वसूली हेतु बैंकक ततेक दवाब बढलैक जे ओ दूई वर्ष पूर्व आत्महत्या क' लेलथि। आब हम स्वयं खेतमे काज करैत छी। जँ केबीसी सँ किछु रकम जीत सकलहुँ तँ क्रमशः सात आ तीन वर्षीय बचियाक लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा आदि पर खर्च करब।"
घड़ी देखलहुँ तँ पता चलल जे रातिक 10 बजैत रहैक। कनेक कालक बाद आँखि मुनि चिंतनक मुद्रामे सोचए लागलहुँ जे उक्त घटनाक्रम सभमे सँ कोनो "थीम" उठाओल जा सकैत अछि की? सत्य कही तँ एहि सभ घटनाक्रम मे सँ ई सभ "थीम" तँ भ'ए सकैत छल-विपरीत सेक्सक प्रति सहजाकर्षण, व्यसन विवेककेँ नष्ट कए दैत छैक, गरीबक दुर्भाग्य : बीमारी, बिना विज्ञापन वला डॉक्टर, दयावान, किसानक दुर्दशा आदि।
...लाख प्रयास केलहुँ जे एहिमे सँ कोनो एक थीमकेँ आधार बनाकए किछु लिख ली, मुदा कलम नहि चलि सकल। आब बुझ'मे आबि रहल अछि जे कोनो आन रचनाकारक कविता कथा पर (खराब, आलोचनात्मक नहि) टिप्पणी कए देब कतेक आसान छैक, मुदा अपना बेरमे...।
हम निष्कर्ष पर पहुँच गेल रही जे, "किछु लिखबाक लेल मात्र 'थीम' नहि अपितु भाषा आ अभिव्यक्ति-कौशल सेहो चाही, जेकर हमरामे सर्वथा अभाव अछि।"
आब जँ गजेन्द्र बाबू फेर कहिओ तगेदा करताह तँ ईमानदारीसँ क्षमा प्रार्थना क' लेबनि। आर सक्के की?
-डॉ. शंभु कुमार सिंह, वरीय रिसोर्स पर्सन, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भारतीय भाषा संस्थान, मैसुरू संपर्क सूत्र- 9986890429

Suggested citation: शंभु कुमार सिंह. “थीमक खोज.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 355, pp. 42–47, 2022-10-01. https://www.videha.co.in/research/2022/355/थीमक-खोज.htm

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