विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः)

डा. दीपिका · 2022-11-01 · अंक 357

चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः)
डा. दीपिका
(स्वतन्त्रलेखिका वेदवती-महाविद्यालयस्य प्राक्तनप्राध्यापिका च)
(विगते उच्छ्वासे अस्मिन् ग्रन्थे यानि अनेकानि वैशिष्ट्यानि दृग्गोचरीभवन्ति मया तेषां विवरणं प्रदत्तम्। प्रकृते उच्छ्वासे वर्णनवैचित्र्यस्य नैषधदृशा तुलनात्मकं विवरणं प्रस्तूयते।)
सामान्येन नलचम्पूग्रन्थे नैषधदृशा क्वचिच्छाम्यं तु क्वचित् वैषम्यं धारयति।
साम्यम्
*नैषधे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् अस्ति तथैव नलचम्पूग्रन्थे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् अस्ति
*निषधदेशस्य[1] वर्णनम् उभयत्र वर्तते
*हंसवर्णन[2] वर्णनम् उभयत्र वर्तते
वैषम्यम्
*नैषधे नलदमयन्तीभ्यां प्रणयवर्णनम् उभयत्र अस्ति विवरणम् अत्यन्तं भिन्नं दृश्यते।
*नैषधीयचरिते नलः एकान्तवासाय उपवनं याति[3] अत्र नलः शूकरवधार्थं[4] गच्छति
निषधदेशस्य निषधानगर्याः[5] वर्णनं केवलं अत्रैव वर्तते न तु नैषधीयचरिते प्राप्यते
*हंसवर्णन[6] वर्णनम् उभयत्र वर्तते किन्तु नैषधीयचरिते हंसविलापो[7] दृश्यते किन्तु अत्र आकाशवाणी भवति यत् अयं हंसः एव दमयन्तीं प्रति तव सहायकः भवति।
*एवमेव नलचम्पूग्रन्थे हंसिनी नलं धिक्करोति।
*नैषधीयचरिते प्राकृतिकवस्तूनां पदे-पदे वैलक्षण्येन वैचित्र्यवर्णनं वर्तते[8] किन्तु नलचम्पूग्रन्थे वर्षर्तूनामेवेदं[9] वर्णनम्
इत्थं चम्पूकाव्यस्य विशिष्य नलचम्पूवर्णनं नैषधदृशा अस्माभिः दृष्टम्। विस्तृतविवरणार्थं ग्रन्थद्वयोरालोकनमेव वरमिति शम् ।
[1] नलस्य पृष्टा निषधागता गुणान्मिषेण दूतद्विजबन्दिचारणाः ।
निपीय तत्कीर्तिकथामथानया चिराय तस्थे विमनायमानया ॥ १.३७ ॥
[2] न वासयोग्या वसुधेयमीदृशस्त्वमङ्ग यस्याः पतिरुज्झितस्थितिः ।
इति प्रहाय क्षितिमाश्रिता नभः खगास्तमाचुक्रुशुरारवैः खलु ॥ १.१२८ ॥
[3] अकारि तेन श्रवणातिथिर्गुणः क्षमाभुजा भीमनृपात्मजालयः ।
तदुच्चधैर्यव्ययसंहितेषुणा स्मरेण च स्वात्मशरासनाश्रयः ॥ १.४४ ॥
[4] किं स्यादञ्जनपर्वतः स्फटिकयोर्द्वन्द्वं दधदीर्घयोः।
[5] तस्य विषयस्य मध्ये निषधो नामास्ति जनपदः प्रथितः।
[6] पयोधिलक्ष्मीमुषि केलिपल्वले रिरंसुहंसीकलनादसादरम् ।
स तत्र चित्रं विचरन्तमन्तिके हिरण्मयं हंसमबोधि नैषधः ॥ १.११७ ॥
[7] मदेकपुत्राजननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी ।
गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे त्वां करुणा रुणद्धि न ॥ १.१३५ ॥
[8] नवा लता गन्धवहेन चुम्बिता करम्बिताङ्गी मकरन्दशीकरैः ।
दृशा नृपेण स्मितशोभिकुङ्मला दरादराभ्यां दरकम्पिनी पपे ॥ १.८५ ॥
[9] अथ कदाचिदुन्नमत्पयोधरान्तर्....
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Suggested citation: डा. दीपिका. “चम्पूसाहित्ययशो विलासः (चतुर्थोच्छवासः).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 357, 2022-11-01. https://www.videha.co.in/research/2022/357/चम्पूसाहित्ययशो-विलासः-चतुर्थोच्छवासः.htm

मूल विदेह अंक / Original issue