विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल

आभा झा · 2022-11-01 · अंक 357 · पृष्ठ 60–66

जखन लेखक अपन जीवनक अनन्त स्मृतिक धरोहरमेसॅं किछु रमणीय अनुभूतिकेॅं चित्रात्मकता ओ तटस्थताक संग कलात्मक शैलीमे लिखैत अछि त' ओ संस्मरण कहाइत अछि।मुदा संस्मरण तखनहिॅं अपन प्रभाव पाठकक म'न-मस्तिष्क पर छोड़ि सकैछ जखन संस्मरण-लेखक आत्मीयतासॅं कोनो स्मृतिकेॅं शब्दाकार परसैत अछि। संगहिं इहो आवश्यक जे लेखक कोनो पुरुष अथवा चरित्रक ओहि पक्षकेॅं मजगूतीसॅं सोझां आनि सकय जे जेना ओ स्वयं ओहि क्षणविशेषकेॅं म'न पाड़बा लेल विवश भेल तहिना पाठककेर सेहो तादात्म्य स्थापित भए सकए।
संस्मरण शब्दक जॅं व्युत्पत्ति पर गौर करी त' सम् उपसर्ग पूर्वक स्मृ धातु संग ल्युट् प्रत्यय लगलासॅं संस्मरण शब्द बनैत अछि जकर अर्थ होइछ- संस्कार- जन्य -ज्ञान । अर्थात् ज्ञातवस्तुक अनुभवक अधीन संस्कारसॅं उत्पन्न ज्ञान,चिन्तन अथवा स्मृति।
संस्मरणक एकटा महत्वपूर्ण विशेषता कृतज्ञता सेहो थिक। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति अपन जीवनमे प्रकृति,माता-पिता, परिवार -जनक अतिरिक्त अनेक अन्य लोकसॅं उपकृत होइत अछि,मुदा सभ ओकरा म'न नहिॅं राखैत अछि, किछु म'न रखितो ओकरा अभिव्यक्त नहिॅं कए सकैत अछि आ किछु लोक एहन होइत छथि जे जरूरतिक समय किंवा कोनो सम-विषम परिस्थितिमे किनकहु द्वारा कएल गेल छोटसॅं छोट सहायता वा सेवा लेल हृदयमे ओहि व्यक्तिक प्रति आदर- भाव रखैत छथि, कृतज्ञता अनुभव करैत छथि आ निर्द्वन्द्वभावें शाब्दिक आभार प्रकट करैत छथि। ओहने संवेदनशील कलाकार आ कलमकार छथि श्रीमती प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' जे स्वयंकेॅं मात्र सामान्य रंगकर्मी बुझैत छथि, साहित्यिक व्यक्ति नहिॅं। तैं सम्भवतः अपन लेखनक क्रममे बेर बेर विभूति जीक नाम लैत कहैत छथि-ओ हमरासॅं किछु तीत-मीठ अनुभव लिखबा लैत छथि, हमरा सॅं खिस्सा पिहानी लिखवा लैत छथि,नहिॅं त' हमरा त' मात्र भट्ठा धर' आयल अछि।
ई थिक विनम्रता,ई थिक माटिसॅं जुड़ल रहबाक संस्कार आ इऐह थिक ओ मानवीय गुण जे मनुष्यकेॅं वस्तुत: मनुष्य बनबैत छैक।ई सत्य, जे प्रेमलता मिश्रक नाम लैत देरी मिथिलाक एकटा ओहेन महिलाक व्यक्तित्व आंखिक सोझां अबैत अछि,जे बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्धक शुरूहेमे (१९६४-६५)रंगमंचसॅं जुड़लीह, रंगमंचकेॅं जीवनक पर्याय बनौलनि आ तैंयों अपन पारिवारिक- सामाजिक जीवनमे तालमेल बनौने रहि सकलीह। निस्संदेह ताहि समयमे ई क्रान्तिकारी डेग छलै, जकर आलोचना -प्रत्यालोचना होइते रहलै, तथापि किछु शुभचिंतक आ पतिक सहयोगक बलें ओ ने मात्र स्वयं बढ़ैत रहलीह, अपितु भविष्यक बहुत रास स्त्री लेल प्रेरिका बनलीह।अपन सहज-सरल ममत्वपूर्ण स्वभावक कारणें ओ सभहक मातृतुल्या मानल जाइत छथि । आइ हुनक आभिनयिक नहिॅं, अपितु सरल हृदयक सोझ-सरल भाषामे लिखल संस्मरणक मादें हुनक व्यक्तित्वक कृतज्ञताक संग हुनक जीवनमे आयल किछु श्रेष्ठ जनक व्यक्तित्वक ओहि वैशिष्ट्य सभहक साक्षात्कार करबाक प्रयास करब,जे सामान्य बुझाइतो विशिष्ट अछि,नोटिस लेबा जोगर अछि आ आभार व्यक्त करबा जोगर अछि-
संस्मरणक पहिल अध्यायमे ओ म'न पाड़ैत छथि यात्रीजीकेॅं,हुनक सिद्धान्तकेॅं,हुनक पितृवत्सलताकेॅं,हुनक अकारण वात्सल्य आ निश्छलताकेॅं!
"जाबत धरि हम व्यवस्थित जिनगीमे नहि आबि गेलहुॅं,ताबत धरि हुनक बासा हमर शरणस्थली रहल... "
"ओ हमर पिता छलाह, मित्र आकि मार्गदर्शक-हम निर्णय नहि ल' सकैत छी।"
आकाशवाणीमे अपन प्रवेश लेल, भंगिमा, चेतना समिति आदिमे सक्रियता लेल,स्त्रीक म'नमे अधिकारक जागरूकता लेल प्रेमलताजी हुनका प्रति अपन कृतज्ञता बिसरैत नहिॅं छथि आ लोककेॅं ल' जाइत छथिन यात्री जीक साहित्यिक गुरुताक भूमिसॅं एकटा सहृदय- निश्छल- पितृतुल्य उदार भूमिमे,हुनक सैद्धांतिक कट्टरता आ यायावरी प्रवृत्तिसॅं फराक सिनेहसॅं सानल वात्सल्यक अकृत्रिम माटिमे !
संस्मरणक दोसर फूल समर्पित छनि श्री हरिमोहन झाकेॅं,जनिकासॅं पटना में अपन भेंट आ तदनन्तर विकसित पितृव्य-भतीजी-संबधक स्नेहपूर्ण विवरण आ प्राप्त उचित मार्गदर्शनक उल्लेख करैत हुनकर प्रति अपन स्मरणाञ्जलि अर्पित कएने छथि।हुनक भावप्रवण सिनेहक छिटकासॅं अभिसिंचित,हुनक पत्नीक(प्रेमलताजीक काकीक) घ'रक बाहर बढ़ल डेगसॅं प्रेरित मानैत बहुत श्रद्धा संग हुनका स्मरण करैत छथि। हरिमोहन झाक स्त्री-समानताक स्वप्नकेॅं हुनकहि मुंहसॅं ओ सुनने छलीह -" आइ हमर सपना साकार भेल। एहि दिनक कल्पना हम कयने रही। मैथिल ललना लोकनि आब जागि गेलीह... एहिसॅं बढ़िक' खुशीक बात भइये की सकैत अछि!"
सुधांशु शेखर चौधरी जीक प्रति अपन तेसर स्मृति- पुष्प अर्पित करैत ओ कहैत छथि-"कोनो नाटककारक निधन एकटा कलाकारक हेतु माय- बापक मृत्युसॅं कम नहि होइत छैक।"
शेखरजीक वर्णन करैत ओ पुनः कहैत छथि-"एकटा नाटककार सेहो अपन नाटक लिखबाक समय ओकर प्रत्येक पात्रक भूमिकाक संबंधमे सोचैत अछि, ओकरा हेतु ओहि मात्र दू घंटाक वा किछु समयक नाटकमे किछु तेहने परिवेशक संरचना करैछ जाहिसॅं ओकर प्रत्येक पात्र दर्शकक हृदयमे दीर्घजीवी भ' सकत।तकर निर्वाह शेखर जी अपन नाटकमे पूर्णरूपेण करैत छलाह, खाहे ओ 15-20 मिनटक रेडियो नाटक हो अथवा दू घंटाक रंगमंचीय नाटक।"
प्रेमलता जी प्रायः सुधांशु शेखर चौधरी जीक सभ नाटकमे अभिनय कएलनि आ हुनका मुंहें अपन पात्रताक स्वीकारोक्ति हुनका अत्यंत मुदित कएने छलनि-
" जखन हम नाटक लिखब आरंभ करैत छी,अहाॅं हमरा सोझां आबि जाइत छी आ ओ संवाद हम प्रेमलताक हेतु लिखैत छी।"
हुनक साहित्य पर शोध करबाक प्रेमलता जीक स्वप्न छलनि आ ओ पूरा नहिॅं भेलनि। तैं ओ स्वयंकेॅं कटघरामे ठाढ़ बुझैत छथि।(एहि पोथीक अनुसार)
पं जयनाथ मिश्रकेॅं स्मृति- तर्पण दैत ओ कहैत छथि-
"पं जयनाथ मिश्र एक व्यक्ति नहि अपितु संस्थाक नाम अछि।"
पुनः हुनक तुलना विशाल वटवृक्षसॅं करैत ओ कहैत छथि- "गाछ कोनो वर्ग-भेद, जाति-भेद ,धर्म -भेद नहि बुझैत अछि।ओहन व्यक्तिक हेतु कियो खास नहि होइत छैक, मुदा ओहि व्यक्तित्वक ई विशेषता होइत छैक जे लोक हुनका अपन खास हयबाक दाबी करए लगैत अछि।ओ अपन भाषा संस्कृतिक संगहिं संग मानवताक पुजारी छलाह।"
तदुपरान्त ओ नारी-जागरणक अग्रदूत रूपमे पं गोविन्द झाकेॅं देखैत हुनका प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत छथि-
"पं झाक नाटकक माध्यमें हमरा अपन अभिनय- कलामे विविधताक अवसर भेटल। बेसी नाटकमे एक रंगक भूमिकासॅं उपजल अकुलाहटिकेॅं दूर कए हमरामे स्फूर्ति आनि देलक।"
"पंडित झाक नाटकक पात्र सभ तत्कालमे जे सामाजिक धारा चलि रहल अछि,ओकर धाराक विपरीत परिवर्तन चाहैत अछि।आइसॅं 40 वर्ष पूर्व जे नाटक लिखल गेल,ओहूमे ई भाव छल आ जे नवीनतम कृति (रुक्मणी हरण) छनि ओहूमे अछि।एहि नाटकक जन- बोनिहार यद्यपि अशिक्षित अछि,परंच लिलहा कोठीवलाक अत्याचारसॅं त्राण पएबाक हेतु एक संग भए संघर्ष करैत अछि। ओकरा
लोकनिक एकतासॅं समाजमे परिवर्तन अबैत अछि।"
"पंडित गोविंद झा ओहन सांस्कृतिक पुरुष छथि जनिक जीवनक समस्त स्नेह- बाती अनुज साहित्यकार- कलाकार लेल छनि।जतेक हिनकासॅं रंग-कर्मीकेॅं भेटलैक अथवा भेटि रहल छैक ओतेक आन-कोनो व्यक्तिसॅं नहिॅं।"
गुरुजी रूपमे पं. त्रिलोचन झाक स्मरण करैत प्रेमलता जी कहैत छथि-"सन 1984 -85 मे गुरुजी कोलकाता महानगरी केॅं त्यागि पटनाकेॅं अपन वास- स्थान बनौलनि। हमरा लोकनिक समक्ष एक निर्देशकक रूपमे अयलाह 'चेतना समिति' द्वारा मंचित नाटकक माध्यमे। हुनक कार्यशैलीसॅं सभ कलाकार प्रभावित छल आ संगहि हुनक शिष्यत्व ग्रहण करबाक हेतु उताहुल सेहो।"
मैथिली रंगमंचमे नवीन तकनीकक समावेश आ अभिनव प्रस्तुति द्वारा स्तरोन्नयनक संग रंगमंचकेॅं रोजगारक साधन बनयबा लेल आ पछाति पटनामे चेतना समितिक माध्यमसॅं रंगकर्मी लोकनिक मार्गदर्शन लेल प्रेमलता जी पं त्रिलोचन झाकेॅं श्रद्धाक संग म'न पाड़ैत छथि।
रंगकर्मी श्रीकांत मंडलकेॅं ओ रंगमंचक सिपाही, अग्रदूत, नेता, अभिनेता, निर्देशक, चिंतक आदि विशेषणक संग म'न पाड़ैत छथि।हुनक असमय देहावसान मैथिली रंगमंचक दुनियांक सभ कलाकारक लेल व्यक्तिगत क्षति छल ई कहैत ओ उमेद रखैत छथि जे हुनक अपूर्ण काज पूरा करबा लेल निस्संदेह कोनो कलाचिन्तककेॅं श्रीकांत जी पठौताह।
बालभंगिमाक निर्देशिका प्रमिला जी यद्यपि कहियो अभिनय लेल प्रत्यक्षतः मंच पर नहिॅं अयलीह, मुदा निर्देशन, अनुवाद,रूपसज्जा एवं प्रस्तुतिक लेल सभ टा दायित्व स्वेच्छासॅं वहन करैत ओ एवं अभिनय लेल सभ तरहक सहायता देनिहार हुनक पति श्री नारायण झाक प्रति अपन स्नेह आ कृतज्ञता प्रेमलता सन स्नेहिल व्यक्ति कोना बिसरितथि!खासकए अमैथिलीभाषी बच्चा सभसॅं मैथिली नाटक करयबामे प्रमिलाजीक परिश्रम,लगन आ सतत प्रयास स्मरण योग्य बुझैत छथि आ भंगिमा परिवारकेॅं प्रमिलाजीक ऋणी बुझैत छथि।
एकर अतिरिक्त बटुक भाइ,हुनका संग व्यक्तिगत संबंध आ एहने अनेक व्यक्तिक प्रति ओ अपन कृतज्ञता ज्ञापित कएने छथि,जनिकासॅं हुनका कनियों स्नेह, सम्मान,अवसर वा उपकार भेटलनि।
अवश्य अल्पायुमे मातृ-पितृ-विहीन एकटा कन्या पटना सन शहरमे अपनाकेॅं स्थापित कए सकलीह,रंगकर्मकेॅं अपन जीवनक लक्ष्य बना सम्मान पाबि सकलीह,त' बहुत लोकक सहयोग भेटले हेतनि, किन्तु एहि सभ संघर्ष-यात्रामे हुनक आत्मबल, कठिन परिश्रम,अवसरक लाभ उठयबाक शैक्षणिक ओ अभिनयक जन्मजात क्षमताकेॅं नकारल नहिॅं जा सकैछ। हॅं,'ओ दिन ओ पल' लिखि कए ओ अपन व्यक्तित्वक सकारात्मकताक सबल परिचय देने छथि,समाजक प्रतिकूल धारणाक बादो ओहि क्षेत्रमे मजगूतीक संग ठाढ़ हयबाक प्रेरणा सेहो दैत छथि आ अपन जीवनमे सहायक रहल सभ श्रेष्ठ जनक प्रति कृतज्ञतापूर्ण स्वीकारोक्तिसॅं एकटा आदर्श सोझां रखने छथि।
एहि संस्मरणकेॅं साहित्यक कसौटी पर कसलासॅं भ' सकैछ किछु जर्किंग अनुभव हो, मुदा हृदयक सहज-सरल भावुक उद्गार रूपमे 'ओ दिन ओ पल' अपन एकटा मानवीय पक्षक संग सबल परिचिति आ सशक्त उपस्थिति देखबैत अछि।एखन एतबहि।
आभा झा
२५.१०.२०२२

Suggested citation: आभा झा. “रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रक साहित्यिक छवि- ओ दिन ओ पल.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 357, pp. 60–66, 2022-11-01. https://www.videha.co.in/research/2022/357/रंगकर्मी-प्रेमलता-मिश्रक-साहित्यिक-छवि--ओ-दिन-ओ-पल.htm

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