विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर

डा. नारायणजी · 2022-11-15 · अंक 358

डा. नारायणजी
विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर
श्री शरदिन्दु चौधरी, जे व्यक्ति छथि, आ जिनका मैथिली साहित्यसँ,प्रकाशन,वितरण आ सम्वर्द्धनसँ आइयो प्रगाढ़ प्रेम छनि,हुनका हम थोड़ जनैत छियनि।तकर कारण अछि, जे हम सभदिनसँ गाममे रहैत छी आ ओ राजधानी पटनामे।आ कोनो तेहन नहि काज रहबाक कारणेँ,अथवा रहलो पर अपन असमर्थताक कारणेँ हम पटना थोड़ गेल -आएल छी।तेँ व्यक्ति भाइ शरदिन्दु चौधरीकेँ थोड़ जनैत छियनि।
मुदा,जेँकि मैथिलीक आधुनिक दृष्टि -सम्पन्न कवि -कथाकार श्री पूर्णेन्दु चौधरीक मातृक हमर गाम छियनि आ ओ शरदिन्दु चौधरीक पितियौत भाए छथि, तँ से हुनकासँ भेट होइत छल आ, अपन भेटमे एकदिन ओ गपक क्रममे कहलनि जे हम शरदू (शरदिन्दु चौधरी)केँ कहने रहियनि जे मैथिली साहित्यक संरक्षण आ सम्वर्द्धनमे रुचि राखह, मुदा ताहि लेल शहीद जुनि भए जाह।से सुनि निश्चितरूपसँ भाइ शरदिन्दु चौधरीक एक टा निर्लोभी आत्मोत्सर्गित व्यक्तिक स्वभाव आ स्वरूप हमर सोझाँ उजागर भेल छल,जाहिमे मैथिली साहित्यकेँ संरक्षित करबाक सदिश निष्ठा आ संकल्प देखाएल छल,आ से हुनकर छवि हम आइ धरि पाबि रहल छी।
श्री शरदिन्दु चौधरीक संस्मरणात्मक निबंधक पुस्तक - 'हमर अभाग : हुनक नहि दोष' हमर सोझाँ एखन अछि।महकवि विद्यपतिक ई पंक्ति कृष्णक प्रति गोपीक आत्मव्यथाकेँ प्रकट करैत अछि,जाहिमे कृष्णक प्रति गोपीक सम्पूर्ण समर्पण छनि।मुदा,भाइ शरदिन्दु चौधरीक चर्चित उक्तिक अर्थमे मैथिली साहित्यक सृजनसँ जुड़ल विभिन्न प्रक्रिया आ ओहि प्रक्रियासभमे व्याप्त ओहि विसंगतिसंँ परिचय कराएब थिक,जतए मानवता नष्ट होएबाक नहि मात्र मंद हाहाकार अछि, अपितु,मानवता जगएबाक तीक्ष्ण प्रहार अछि।आ से एहि सम्पूर्ण पुस्तकमे लेखकक एहन विशिष्ट दृष्टि -केन्द्रित अभिव्यक्ति प्रशंसनीय थिक।
श्री शरदिन्दु चौधरी एहि पुस्तकक भूमिकामे अपन विसंगति -बोधक दृष्टिक अभिव्यक्तिक चयन लेल जे निर्णय लेलनि,ताहि सम्बन्धमे स्पष्ट करैत कहैत छथि, '..लेखनकालमे जिनकापर हमर कलम चलैत अछि, तिनक श्याम-पक्षपर केन्द्रित अवश्य रहैत अछि,मुदा हुनका अपमानित करब चेष्टा कथमपि नहि।'
श्री शरदिन्दु चौधरी अपन एहि पुस्तकक 'नव घर उठय - पुरान घर खसय ' शीर्षक निबंधमे नव वर्षक आब होइत आयोजनमे विसांस्कृतिकरणक चिन्ता जनबैत नेनासभमे प्राचीन आ अपन पारम्परिक मूल्यक ज्ञान देबापर बल देलनि आछि,तँ 'हमर अभाग : हुनक नहि दोष'मे मान्य साहित्यकारक अशोभनीय महात्वाकांक्षाकेँ देखबैत छथि।संगहि,'सम्पादक आ पाठकीय पत्र' शीर्षक निबंधमे तँ साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करबाक लेल साहित्यकारक घोर लिप्साकेँ आ आचरणकेँ निस्संकोच उजागर करैत देखाइत छथि।ओ कटूक्ति संग मैथिलीक साहित्यकारक ओहि ज्ञानक उपहास करैत नहि थकैत छथि जिनका कौमा आ पूर्ण विराम धरिक ज्ञान नहि छनि,से ज्ञान बघारैत देखल जाइत छथि। पोथीक ' पैघत्वक अकारण प्रदर्शन...' होअय अथवा 'बइमान होयबाक घोषणा 'शीर्षक निबंध पढ़ि तखन आर बेसी कचोटैत अछि, जखन सुविचारित कोनो स्मारिकासँ कोनो आलेख प्रायः: स्तरहीन बुझि अस्वीकारि देल जाइत अछि,मुदा,जखन वैह आलेख कतहु दोसर ठाम छपि जाइत अछि,तखन नहि अत्यन्त मूल्यवान बूझल जाइत अछि,अपितु, यूपीएससी लेल सेहो अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होइत अछि।पुस्तकक अन्तिम निबंध 'ईर्ष्या द्वेष नहि - समन्वय चाही'क विचार अवश्य मैथिली भषा आ साहित्यक समुचित विकास लेल समन्यक आवश्यकताक अनुरोध करैत अछि।
मुदा,समग्रतामे पुस्तकक सम्पूर्ण केन्द्रीय स्वर मैथिली साहित्यक आजुक विकासक क्रियाकलापमे व्याप्त विसंगतिक प्रति निर्भीकतापूर्वक उदाहरण सहित प्रतिरोधक -स्वरकेँ देखार करब थिक,जाहि स्वरकेँ निचेनसँ अकानल जएबाक चाही।
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२.९.मुन्नी कामत- भाषाविद् श्री शरदिन्दु चौधरी

Suggested citation: डा. नारायणजी. “विसंगतिक विरुद्ध प्रतिरोधक-स्वर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 358, 2022-11-15. https://www.videha.co.in/research/2022/358/विसंगतिक-विरुद्ध-प्रतिरोधक-स्वर.htm

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