२.१.नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर)
नित नवल दिनेश कुमार मिश्र (लेखक गजेन्द्र ठाकुर)
दिनेश कुमार मिश्र, मिथिलाक बाढ़ि, धार आ ओइपर बनाओल छहर/ बान्ह, सन्दर्भ हुनकर बन्दिनी महानन्दा, बागमतीक सद्गति!, दुइ पाटनक बीच.. (कोसी धारक कथा), ने घाट ने घर, बगावत पर मजबूर मिथिलाक कमला धार, भुतही धार आ तकनीकी झाड़ा-फूंकी।
मैथिलीमे छद्म समीक्षा आ कमलानन्द झा प्रसङ
कमलानन्द झाक पोथी "मैथिली उपन्यास: समय समाज आ सवाल" (२०२१) क शीर्षक भ्रामक अछि। ई हुनकर किछु सवर्ण उपन्यासकारपर किछु सिण्डिकेटेड कथित समीक्षात्मक आलेखक संग्रह अछि, २६३ पन्नाक ई पोथी हार्डबाउण्डमे लाइब्रेरीकेँ मात्र बेचल जा सकत, जतऽ ई सड़ि जायत, अमेजनसँ हम ई चारि सय पाँच टाकामे किनलौं मुदा ऐमे पाँचो पाइक सामिग्री नै अछि। ई अपन बायोडाटामे गएर सवर्णसँ छीनि कऽ, समानान्तर धाराक लोकक हककेँ मारि कऽ लेल साहित्य अकादेमीक मैथिल अनुवाद असाइनमेण्टक गर्वसँ चर्चा करैत छथि। आ ई असाइनमेण्ट हिनका मेरिटसँ नै जातिगत टाइटिलसँ भेटल छन्हि, अही सभ किरदानीक एवजमे भेटल छन्हि। हिनका सन लोक लेल मैथिली बायोडेटाक एकटा पाँति अछि, समानान्तर धारा लेल जीवन-मरणक प्रश्न।
दिनेश कुमार मिश्रक 'दुइ पाटन के बीच मे' कोसी नदीक ऐतिहासिक आत्मकथा थीक, ओ मिथिलाक आन धार सभक ऐतिहासिक आत्मकथा सेहो लिखने छथि जेना बन्दिनी महानन्दा, बागमती की सद्गति!, दुइ पाटन के बीच में.. (कोसी नदी की कहानी), न घाट न घर, बगावत पर मजबूर मिथिला की कमला नदी, भुतही नदी और तकनीकी झाड़-फूंक, The Kamla River and People On Collision Course, Bhutahi Balan- Story of a ghost river and engineering witchcraft, Refugees of the Kosi Embankments। साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य पंकज झा पराशर द्वारा हिनकर पोथी सभसँ पैराक पैरा मैथिली अनुवाद कऽ अपना नामे उपन्यास छपबाओल गेल अछि, जकरा छद्म समीक्षक कमलानन्द झा ऐ चोर लेखकक रिसर्च कहै छथि! एतऽ स्पष्ट कऽ दी जे ई चोर लेखक आ छद्म समीक्षक दुनू अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालयक हिन्दी विभागमे छथि। ई रिसर्च दिनेश कुमार मिश्रक थीक, जे आइ.आइ.टी. खड़गपुरसँ सिविल इन्जीनियरिङ मे बी. टेक. १९६८मे आ स्ट्रक्चरल इन्जीनियरिङमे एम.टेक. १९७०मे केने छथि, आ ओइ रिसर्च लेल क्वालिफाइड छथि। जखन कोनो विषयमे नामांकन नै होइ छै तखन लोक हारि-थाकि हिन्दीमे नामांकन लइए, नै तँ कमलानन्द झा केँ बुझऽ मे आबि जइतन्हि जे ई रिसर्च कोनो सिविल इन्जीनियरेक भऽ सकैत अछि, भऽ सकैए बुझलो होइन्ह। हिन्दी मूल आ मैथिलीक स्क्रीनशॉट आँगा संलग्न अछि।
दिनेश कुमार मिश्र मिथिलाक नै छथि मुदा मिथिलाक सभ धारक कथा ओ लिखने छथि, हम सभ हुनका प्रति कृतज्ञ छी आ हुनकर ऋणसँ मिथिलावासी कहियो उऋण नै भऽ सकता, मुदा मूलधाराक पुरस्कार आ पाइ लोलुप लोकसँ कृतघ्नते भेटत से फेर सिद्ध भेल। ऐ लेखककेँ दस बारह बर्ख पहिने सेहो तारानन्द वियोगी उद्धारक भेटल छलखिन्ह जे लिखने रहथिन्ह जे ओ कवितामे प्रभावित भऽ अनायासे अपन रचनामे दोसरक सामिग्री चोरि कऽ लइ छथि, एहने सन। आब ऐ कमलानन्द झा क आश्रय तकलन्हि मुदा दुर्भाग्य! जइ हिसाबे ब्राह्मणवादकेँ आगाँ बढ़बैले कमलानन्द झा वामपंथक सोङर पकड़ै छथि आ सामाजिक न्यायक बलि चढ़बऽ चाहै छथि, तकर प्रति समानान्तर धारा सचेत अछि। सीलिंगसँ बचबा लेल जमीन-जत्थाबला लोक कम्यूनिस्ट बनला आ आब ब्राह्मणवाद बचेबालेल वामपंथक शरण, एहेन लोक सभसँ कम्यूनिज्मकेँ बहुत नुकसान भेल छै।
दिनेश क़ुमार मिश्रक सभटा पोथी आब हुनकर अनुमतिसँ उपलब्ध अछि विदेह आर्काइवमेः
http://videha.co.in/pothi.htm
एतऽ एकटा गप मोन पाड़ि दी जे जखन बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे की ओ एक्स बॉक्स भारतमे पाइरेशीक डरसँ देरीसँ आनि रहल छथि? तँ हुनकर उत्तर रहन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेशीक डरे कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। से विदेह पेटारमे हम सभ ऐ तरहक रिस्क रहितो एकरा आर समृद्ध करैत रहब, कारण समानान्तर धारामे सड़ल माँछ द्वारे पोखरिक सभ माँछ नै सड़ैए, एतुक्का मलाह गोट-गोट कऽ सड़ल माँछ निकालैत रहल छथि, निकालैत रहता।
सिण्डीकेटेड समीक्षापर अन्तिम प्रहार।
मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): यह ध्यान देने की बात है कि 1923 से 1946 के बीच कोसी क्षेत्र में मलेरिया से 5,10,000, कालाजार से 2,10,000, हैजे से 60,000 तथा चेचक से 3,000 मौतें (कुल 7,83,000) हुईं।
चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०३)]:
मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): भारतवर्ष में बिहार में कोसी नदी को बांधने का काम 12वीं शताब्दी में किसी राजा लक्ष्मण द्वितीय ने करवाया था और इस काम के लिए उसने प्रजा से 'बीर' की उपाधि पाई और नदी का तटबन्ध 'बीर बांध' कहलाया। इस तटबन्ध के अवशेष अभी भी सुपौल जिले में भीम नगर से कोई 5 किलोमीटर दक्षिण में दिखाई पड़ते हैं। डॉ. फ्रांसिस बुकानन (1810-11) का अनुमान था कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा के लिए बनी बाहरी दीवार रहा होगा क्योंकि यह बांध धौस नदी के पश्चिमी किनारे पर तिलयुगा से उसके संगम तक 32 किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ था। डॉ. डब्लू.डब्लू. हन्टर (1877) बुकानन के इस तर्क के साथ सहमत नहीं थे कि यह बांध किसी किले की सुरक्षा दीवार था। स्थानीय लोगों के हवाले से हन्टर का मानना था कि अधिकांश लोग इसे किले की दीवार नहीं मानते और उनके हिसाब से यह कुछ और ही चीज थी मगर वह निश्चित रूप से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी जो आम धारणा बनती है वह यह है कि यह कोसी नदी के किनारे बना कोई तटबन्ध रहा होगा जिससे नदी की धारा को पश्चिम की ओर खिसकने से रोका जा सके। लोगों का यह भी कहना था कि ऐसा लगता था कि इस तटबन्ध का निर्माण कार्य एकाएक रोक दिया गया होगा।
छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा चोर उपन्यासकारक पीठ ठोकब, देखू छद्म समीक्षक कमलानन्द झा द्वारा उद्धृत चोर पंकज झा पराशर (मैथिली उपन्यास, समय, समाज आ सवाल पृ. २५७-२५८):
चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. ३१)]:
मूल दिनेश कुमार मिश्र (दुइ पाटन के बीच में... २००६): कोसी के प्रवाह कि भयावहता की एक झलकफिरोजशाह तुगलक की फौज के सन् 1354 में बंगाल से दिल्ली लौटने के समय मिलती है। बताया जाता है कि जब सुल्तान की फौजें कोसी के किनारे पहुँचीं तो देखा कि नदी के दूसरे किनारे पर हाजी शम्सुद्दीन इलियास की फौजें मुकाबले के लिए तैयार खड़ी हैं। यह वही हाजी शम्सुद्दीन थे जिन्होंने हाजीपुर तथा समस्तीपुर शहर बसाये थे। फिरोज की फौजें शायद कुरसेला के आस-पास किसी जगह पर कोसी के किनारे सोच में पड़ गईं। नदी की रफ्तार उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। आखिरकार फैसला हुआ कि नदी के साथ-साथ उत्तर की ओर बढ़ा जाय और जहाँ नदी पार करने लायक हो जाय वहाँ पानी की थाह ली जाये। सुल्तान की फौजें प्रायः सौ कोस ऊपर गईं और जियारन के पास, जो कि उसी स्थान पर अवस्थित था जहाँ नदी पहाड़ों से मैदानों में उतरती थी, नदी को पार किया। नदी की धारा तो यहाँ पतली जरूर थी पर प्रवाह इतना तेज था कि पाँच-पाँच सौ मन के भारी पत्थर नदी में तिनकों की तरह बह रहे थे। जहाँ नदी को पार करना मुमकिन लगा उसके दोनों ओर सुल्तान ने हाथियों की कतार खड़ी कर दी और नीचे वाली कतार में रस्से लटकाये गये जिससे कि यदि कोई आदमी बहता हुआ हो तो इस रस्सों की मदद से उसे बचाया जा सके। शम्सुद्दीन ने कभी सोचा भी न था कि सुल्तान की फौजें कोसी को पार कर लेंगी और जब उस को इस बात का पता लगा कि सुलतान की फौजों ने कोसी को पार करने में कामयाबी पा ली है तो वह भाग निकला।
चोर पंकज झा पराशर (साहित्य अकादेमीक मैथिली परामर्शदात्री समितिक सदस्य) [जलप्रांतर २०१७ (पृ. १०५)]:
(... शीघ्र अही लिंकपर आर स्क्रीनशॉट अपडेट कएल जायत।)
मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ जुझैत रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक, बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाउ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतऽ शुरू भऽ गेल। मुदा ओइ क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नै अबैत अछि, कहियो अबितो रहय तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका लोक अ नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेला। हमरा मोन अछि ओ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जेबाक लेल हमरा बाढ़िक समयमे एबा लेल कहल गेल छल कारण ओइ समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता-चभच्चामे नाओ नै चलि पबैत अछि आ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कऽ कऽ ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक २००८ ई.क प्रकोप ओइ दुष्प्रचारकेँ खतम कऽ सकल। पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि? ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आ एतऽ बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन ऐत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नै भऽ सकल। किए? कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल ऐ छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे खतम भऽ गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किए नै बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भऽ जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नै केलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाइए, तखन सभ साल बान्हक ऊँचाई बढ़ाबैए पड़त। जइ साल ई कार्य समयसँ नै शुरू होइए ओइ साल प्रलय अबैए। सएह बभल २००८ मे, फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्हमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम अपन आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ह लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भऽ गेलै एक ठामसँ, आ आँखिक सोझाँ हम देखलौं जे केना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भऽ गेल छल। आ ई कारण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कऽ एकटा नव धार पकड़बाक आ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल छल। भीमनगर बैरेज आब कोशीक एकटा सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल रहय। जइ राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओइ राज्यक दौड़ा करैत अछि आ अपन रिपोर्ट दैत अछि जइपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आ ओ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि बा नै। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छला, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौड़ा कऽ एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित केलन्हि। कारण ई लेवल-तेन केर आपदा छल आ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे- नहिये वित्तक लिहाजसँ आ नहिये राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ- पार पायब संभव नै छल। तखन राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल गेल, किसानक ऋण-माफी सेहो भेल। कुशेश्वर स्थानक आपदा सभ-साल अबैए, से सभ ओकरा बिसरिये जकाँ गेल। दामोदर घाटीक आ मयूरक्षी परियोजना जकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आ बागमतीपर किए सम्भव नै भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किए सफल अछि? नेपाल सरकारपर दोषारोपण कऽ हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब? एकर एकमात्र उपाय अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ह बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कऽ हटाउ आ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण करू। नेपाल सरकारसँ वार्ता कऽ आ त्वरित समाधन हुअय। आ जाधरि ई नै होइए तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि से करब, जेना बरखा आबयसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाउ, बरखा एबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करू, आ ऐ सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखू। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबा हेतु कइएकटा बान्ह बनाबऽ पड़त आ ओ सभ एकर समाधान कहिओ नै बनि सकत। कमला धारक नहरिसँ भेल लाभ हानिसँ सीखू। एक तँ कच्ची नहरि आ तइपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त हएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतऽ धरतीक ढलान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की हएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल ऐ नहर रूपी बान्हसँ पटौनी हुअय वा नै एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपे डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नै चलि जाय, से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि ! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आ ऐसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भऽ गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ कुशेश्वरक वर्णनसँ स्पष्ट अछि। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया ऐ सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नै अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल, तइ कारणेँ ऐ तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भऽ गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाट लग १९५४ मे- मिलि गेली, हिमालयसँ बहि कऽ कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर ऐ धारमे २ मीटरसँ बेशी बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भऽ गेल आ ई माँग शुरू भऽ गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाय! कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आ गौरी-शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशीमे, जइमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आ तामर कोसी सम्मिलित अछि। ऐमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आ दूध कोसी मिलि कऽ सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आ अपन पानि कंचनजंघा पर्वत श्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतऽसँ दस किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैए जतऽ महाकोसी, सप्तकोसी बा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः पचास किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर-भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आ भारतमे लगभग एक सय तीस किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइ छथि। कोसीमे बागमती आ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह बारहम शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे अखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ तेइस किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आ राजनीतिमे ओझरा गेल। ऐ बैराजसँ दूटा फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितय, दोसर ऐसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जइसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फायदा होइतय। मुदा ऐ बैरेज निर्माण लेल पाइ आबंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नै देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा अखनो धरि ओइमे काज भइये रहल अछि। कोसी लेल किछु नै भऽ सकल। विचार आयल तँ योजना अस्वीकृत भऽ गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे तकैत रहल! एनामे विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन। हैदराबादसँ बिरासेी माइल दूर मूसी आ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्ह, हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कऽ देलन्हि। विश्वेश्वरैय्या निचुलका भागक चौड़ाइ बढ़ा कऽ ई कमी पूरा कऽ लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कऽ आ मलेरियाग्रस्त आ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाजले डॉक्टर बहाली कऽ, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कऽ आ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा समयक क्षतिपूर्ति केलन्हि। देशभक्त तेहन छला जे सीमेन्ट आयात नै केलन्हि वरन् बालु, कैल्सियम, पाथर आ पाकल ईटाक बुकनी मिला कऽ निर्मित सुरखीसँ ऐ बान्हक निर्माण केलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहिये द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कऽ लेल गेल। प्रधानमंत्री आपदा कोष आ मुख्यमंत्री आपदा कोषक खगता नै हुअय से जरूरी अछि, संगहि सरकारपर दवाब बनाउ जे स्कूल कॉलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समयमे छुट्टी दिअय। सी.बी एस.ई आ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नै कऽ सकल अछि। भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कयल जाय, कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कऽ लेने अछि। ऐमे फण्ड रेलवे आ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाय कारण ऐपर रेल आ सड़क सेहो बनि सकैए आ से बनबाके चाही। बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाय। कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कऽ हटा देल जाय आ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाय, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाय्। बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य हुअब सन देखा रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कऽ, युद्ध-स्तरपर ऐ सभपर काज शुरू कएल जाय। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह जखन पूर्ण हएत तखने धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत।
आब प्रस्तुत अछि दिनेश कुमार मिश्र जीक रिसर्चक सारांश मैथिलीमे, बेरा-बेरी बन्दिनी महानन्दा, बागमतीक सद्गति!, दुइ पाटनक बीच.. (कोसी धारक कथा), ने घाट ने घर, बगावत पर मजबूर मिथिलाक कमला धार, भुतही धार आ तकनीकी झाड़ा-फूंकी।
बन्दिनी महानन्दा
जखन कखनो भारतक गौरवशाली अतीतक चर्चा होइत अछि तँ पहिने बिहारक नाम लेल जाइए । जखन देव-दानव मिलि कऽ सागर मथैत छला, तखन सागर मथबामे मन्दार पहाड़क उपयोग होइ छल । ई स्थान वर्तमान भागलपुर जिला मे पड़ैए, भऽ सकैए समुद्रक सीमा ओइ समय एतऽ तक छल । ऐ क्षेत्रक कथा राजा जनकक समयसँ सुनल जाइत अछि । बिहार प्राचीन काल सँ याज्ञवलक्य, गौतम, च्यवन, श्रृंग, विश्वामित्र, अष्टावक्र, कात्यायन, पतंजलि, वर्ष, उपवर्ष, पाणिनी, अश्वघोष, वात्स्यायन, आर्यभट्ट आ वराहमिहिरा सन विद्वान आ कारीगर पर गर्व करैत रहल अछि । मिथिला प्राचीन कालमे संस्कृति, शिक्षा, कला आ साहित्यक एकटा पैघ केंद्र छल जे देशक विभिन्न क्षेत्रक विद्वानकेँ आकर्षित करै छल । भगवान महावीर ऐ धरती सँ समस्त संसारकेँ प्रेम, करुणा, सौहार्द आ सहिष्णुताक उपदेश देलनि । एतहिये राजकुमार सिद्धार्थ भगवान बुद्ध बनला, जिनकर वचनामृत सम्पूर्ण विश्वमे भेल । वाल्मीकि रामायणमे भगवान् राम अपन भाइ लक्ष्मण, भरत आ शत्रुघ्न संग विवाहक उद्देश्य सँ जनकपुर गेला। ऐ यात्रामे ओ बक्सर लग तारकाकेँ मारि सिद्धाश्रम, अहिल्या-आश्रम, गौतम आश्रम आ वैशाली होइत जनकपुर गेला । महाभारतक काल जरासंधक राजधानी वर्तमानमे राजगृह आ कर्णक अंग देशक राजधानी चम्पनागरी (भागलपुर) छल । पाण्डवक निर्वासन आ गुप्त निवासक बहुत समय पूर्णियाक जंगलमे बीतल । भीम कहियो मोदागिरी (वर्तमान मुंगेर) पर विजय प्राप्त केने छला आ खड़गपुर हवेलीक समीप अवस्थित भीम बांध भीम सँ संबंधित मानल जाइए । सोनपुर (छपरा) लग हरिहर क्षेत्रक संबंधमे कहल जाइए जे भगवान विष्णु एक बेर पशुपति नंदीक नेतृत्वमे एतऽ बहुत रास गाय अनने छला । जइ लेल ऐ स्थानक नाम हरिहर क्षेत्र राखल गेल । ऐ स्थान पर गज आ ग्राहक बीच झगड़ा भेल, भगवान विष्णुकेँ स्वयं खुल्ले पएर, बिना गरुड़क सवारीक गजक रक्षा लेल आबय पड़लनि। ऐतिहासिक कालमे बिहारक वर्णन संभवतः मगधक बिम्बसार (कॉमन एरा पूर्व छअम शताब्दी) सँ शुरू होइए आ मानल जाइए जे भगवान वर्धमान महावीर आ भगवान बुद्धक उदय ऐ कालमे भेल। ऐ कालक आसपास वैशालीमे लिच्छवी राज्य अपन सिद्धि प्राप्त कऽ रहल छल । नन्द वंशक पतनक संग मगधमे चंद्रगुप्त मौर्यक साम्राज्यक स्थापना ३२१ कॉमन एरा.पू.भेल। चन्द्र गुप्त मौर्यक उदयमे चाणक्य (कौटिल्य) क भूमिका महत्वपूर्ण छल। चाणक्य स्वयं कोन स्थानक निवासी छल तइ मे किछु मतभेद अछि । किछु लोक हुनका तक्षशिलाक निवासी मानै छथि जखनिकि दोसर मान्यताक अनुसार चाणक्य वर्तमान पश्चिम चंपारणक निवासी छला । मौर्य वंशक एकटा आर महत्वपूर्ण नाम सम्राट अशोक अछि जे २७२-२३२ कॉमन एरा पू. कलिंग विजयक बाद युद्ध आ बर्बरतासँ दुखी भऽ गेल आ ओ अपन शेष जीवन बौद्ध धर्मक प्रचारमे बिता देलक। मौर्यवंशक अंतिम सम्राट बृहद्रथक वध कऽ पुष्यमित्र १८७ कॉमन एरा पू. आ तकर बाद यूनानी, शक, कुशान आदि सन् ३२० धरि मगध पर शासन केलनि, जखन धरि चन्द्रगुप्त पाटलिपुत्रमे गुप्त साम्राज्यकेँ सुदृढ़ नै कऽ केलनि। गुप्त वंशक राजा चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य आदि एक बेर फेर मगधकेँ अपन पुरान वैभव वापस दियेलनि । मुदा पाँचम शताब्दीक अन्तमे हून सभक आक्रमणसँ एक बेर फेर मगधक समृद्धि अवरुद्ध भेल आ हून लोकनि सातम शताब्दीक मध्य धरि एतऽ ओतऽ रहला, जखन पाटलिपुत्रपर हर्षवर्धन सन् ६४१ मे कब्जा क लेलनि। मुदा ई स्थायी नै भऽ सकल । आठम शताब्दी धरि ई शासनमे रहल आ गुप्त वंशक बाद बारहम शताब्दीक आरम्भ धरि पाल वंशक शासन पाटलिपुत्रपर बनल रहल। इन्द्रद्युम्न ऐ वंशक अंतिम राजा छल । बख्तियार खिलजी अपन समयमे मगधपर हमला केने छल। बिहारक कोनो चर्चा नालंदा आ विक्रमशिला विश्वविद्यालयक चर्चा केने बिना पूरा नै भऽ सकैए। सन् ४०५-४११ क बीच भारतमे रहयबला चीनी यात्री फा-हियान अपन लेखनीमे नालंदा बौद्ध विहारक वर्णन करै छथि मुदा ओ विश्वविद्यालयक विषयमे चुप छथि । लेकिन हुएन-त्सांग (भारतमे निवास सन् ६३०-६४३) नालंदाक शैक्षणिक वैभवक प्रशंसा निश्चित रूप सँ केने छथि। देशक विभिन्न शैक्षणिक वैभवसँ ऐ विश्वविद्यालयक बहुत प्रशंसा भेल अछि। ऐ विश्वविद्यालयमे देश-विदेशक विभिन्न कोन-कोनसँ करीब दस हजार विद्यार्थी ओतहिये रहै छला आ शिक्षा प्राप्त करै छला। ओतऽ व्याकरण, विधि, साहित्य, दर्शन आदि अनेक विषयक पढ़ाइ होइ छल । विश्वविद्यालयमे प्रवेश लेल कोनो विद्यार्थीकेँ दरबज्जेपर परीक्षा देमऽ पड़ै छलै आ संतुष्टिक बादे विद्यार्थीक प्रवेश होइ छलै। ई विश्वविद्यालय गुप्त वंशक राजा सभ द्वारा पाँचम शताब्दीमे स्थापित कयल गेल छल आ एकरा राजश्रयक अधीन राखल गेल छल । किंवदंती अछि जे नालंदा विश्वविद्यालयक निर्माण सम्राट अशोक द्वारा कएल गेल, मुदा तकर कोनो प्रमाण नै अछि। विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना पाल वंशक राजा सभ द्वारा आठम शताब्दीमे वर्तमान भागलपुरसँ लगभग ४० किलोमीटर दक्षिण-पूर्वमे पाथरघाट पर्वतमे भेल। ऐ विश्वविद्यालयक मुख्य आचार्य आतिश श्रीज्ञान दीपंकर बहुत प्रसिद्ध भेला जे एगारहम शताब्दीमे तिब्बतक राजा द्वारा धर्म प्रचार लेल तिब्बत बजाओल गेल छला। ऐ विश्वविद्यालयमे १०८ टा आचार्य काज करै छला आ आठ हजार लोक एक संग बैसि कऽ एकर हॉलमे धार्मिक चर्चा सुनि सकै छला। एतऽ वेद, वेदांत, सांख्ययोग, मीमांसा, बौद्ध दर्शन आदि विषयक पढ़ाइ होइ छल । मुदा सन् १२०६ मे जखन तिब्बती भिक्षु-यात्री धर्मस्वामी ऐ क्षेत्रमे आयल छला तखन हुनका ऐ विश्वविद्यालयक खंडहर मात्र देखबामे एलन्हि। ऐ दुनू विश्वविद्यालयक अलाबे ओदांतपुरी विहार (वर्तमान बिहार शरीफ) नालंदा लग छल। ई विहार नवम शताब्दीमे पाल वंशक राजा लोकनि द्वारा स्थापित कएल गेल, मुदा ई कहियो नालंदा वा विक्रमशिलासँ प्रतिस्पर्धा नै कऽ सकल। तहिना आठम शताब्दीमे महिषी (वर्तमान सहरसा) मे आदिशंकराचार्य आ मंडन मिश्रक बीच बहस भेल छल। जकर मध्यस्थता मंडन मिश्रक विदुषी पत्नी भारती केने छली। मंडन मिश्र ऐ बहसमे हारल छला, मुदा भारती स्वयं शंकराचार्यसँ शंकराचार्य सँ बहस कऽ हुनका अतिरिक्त अध्ययन लेल समय मांगय लेल बाध्य कऽ देलखिन्ह। ओना विवाद अछि जे ई महिषी वएह महिष्मती अछि जतय शंकराचार्य आ मंडन मिश्रक शास्त्रार्थ भेल छल बा नै। विद्वान परम्परामे मिथिलाक भानुदत्त मिश्र, रत्नेश्वर, ज्योतिश्वर, भागदत्त, पृथिविधर आचार्य, गंगेश्वर उपाध्याय, जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र, वाचस्पति मिश्र आ प्रभाकर मिश्र आदि प्रमुख छथि। विद्यापति मिथिलाक घरे-घर बसि गेल छथि। ओ सम्पूर्ण हिन्दी आ बंगला साहित्यकेँ दिशा देबाक काज सेहो कयलनि अछि। मिथिलाक विद्वान महिला कोनो अर्थमे पुरुषसँ पाछू नै रहल छथि। ऋषि मैत्रेयी आ गार्गीक अलाबे १५ म शताब्दीमे लछिमा देवी, लखिया देवी, विश्वास देवी आ चंद्रकला देवी आदि साहित्य आ दर्शनक क्षेत्रमे अभूतपूर्व काज केलनि। बारहम शताब्दीक अंतमे अफगान आ तुर्कक हमला बिहारपर शुरू भऽ गेल। बख्तियार खिलजी पाल वंशक राजा लोकनिसँ हुनकर क्षेत्र छीन लेलनि आ ऐ सँ प्रशासनिक अस्थिरताक काल शुरू भेल । शासन दिल्लीक सुल्तानक, कखनो आगराक, कखनो जौनपुर बा गौर (बंगाल) क हाथमे रहल। मुदा पूरा बिहारपर हुनका सभक हाथ नै लागि सकल आ अलग-अलग भागमे हुनकर शासन जारी रहल। ऐ क्रममे कुतुबुद्दीन ऐबक, सुल्तान घियासुद्दीन, फिरोज शाह, सिकंदर लोधी धरि बहुत रास सम्राट आबि गेला। शेरशाह (सन १५४०-१५४५) एकमात्र शासक छल जे अपन साम्राज्यकेँ व्यवस्थित रूपसँ स्थापित करबाक प्रयास केलक। शेरशाह पटनाकेँ अपन पुरान वैभवमे वापस आनऽ चाहै छल आ ऐ दिशामे काज करऽ लागल। बख्तियार खिलजीक समयसँ चलि रहल राजधानी बिहार शरीफकेँ पटना अनलक आ नव किला बनौलक। ओ अपन राज्यक सीमाक विस्तार जोधपुर, ग्वालियर, मालवा आ रणथम्भौर धरि केलक आ एकटा सुशासन प्रणालीक पुनर्स्थापना केलक। बंगालसँ पंजाब धरि सड़क बनेबाक श्रेय शेरशाहकेँ छै। मुदा मुगलक बढ़ैत सत्ता शेरशाहक उत्तराधिकारी नै सम्हारि सकल आ अकबरक समयमे बिहार मुगलक हाथमे चलि गेल। बिहारक राजा/ जागीरदार लोकनि एहन बाहरी शक्तिकेँ सामान्य जकाँ स्वीकार नै केलनि। औरंगजेबक पोता अजीम-उशानक शासन कालमे अजीमाबादक महिमा (ई शहर अजीम-उशान द्वारा बनाओल गेल छल आ वर्तमान पटना शहरक इलाका कहल जाइत अछि) घुरल आ पटना आ बंगालक व्यापार बढ़ल। मुर्शिद कुली खान १७०४ मे बंगालक शासक बनल आ १७०७ मे औरंगजेबक मृत्युक बाद अजीमाबाद ओकर नियंत्रणमे आबि गेलै। १७४० मे अलीवर्दी खान मुर्शिदाबादमे शासन सम्हारलक आ ऐ क्रममे शासनक बागडोर जैरुद्दीन अहमद आ सिराजुद्दौलाक हाथमे चलि गेलै, जे अंग्रेज द्वारा मारल गेल। तकर बाद मीर जाफर आ मीर कासिम अली शासक बनि गेल। ओहो सभ समय नै रहल आ अंग्रेज सन् १७६५ मे अपन साम्राज्यक जड़ि मजगूत कऽ लेलक। बिहारमे ने अफगान, तुर्क आ ने मुगल शासक आसानीसँ रहला, आ ने अंग्रेजकेँ रहय देलनि। सन् १८५७ मे जगदीशपुरक बाबू कुंवर सिंह आ बाबू अमर सिंह अंग्रेजक विरोध केलनि। ऐ क्रममे बाबू कुंवर सिंहकेँ एक बेर आजमगढ़ भागय पड़लनि, मुदा ओ बहादुरीसँ वापस आबि गेला आ अप्रैल सन् १८५८ मे गुलामीक बदला मृत्युकेँ स्वीकार केलनि। बादमे बाबू अमर सिंह सेहो सएह केलनि। दोसर दिस संथाल परगनाक सिद्ध, कान्हू, चांद आ भैरब भाइ १८५५-५७ क बीचमे दक्षिण बिहारमे अंग्रेज शासनक खिलाफ विद्रोहक झंडा फहरा देलखिन, फेर बिरसा भगवान १८९५-२००० क बीच छोटनागपुरक जंगलमे अशांतिक आगि जराबैत रहल। हिनके सभक संग तिलका मांझीक नाम सेहो बहुत श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि। सन् १९०८ मे खुदीराम बोस आ प्रफुल्ल
चाकी बंगालक दुर्नाम कलेक्टर किंग्सफोर्ड पर मुजफ्फरपुरमे बम फेंकलथि। कलेक्टर बचि गेल मुदा प्रफुल्ला चाकी पकड़ाइसँ पहिने आत्महत्या कऽ लेलनि आ किशोर खुदी राम बोसकेँ फाँसीपर लटका देल गेल। अप्रैल १९१७ मे चंपारणक किसान राजकुमार शुक्लक आग्रहपर महात्मा गांधी चंपारण आबि पहिल बेर गोराक अत्याचारक खिलाफ आवाज उठौलनि। तकर बाद स्वतंत्रता आन्दोलनमे बिहारमे बहुत रास नामी नेता जेना सर्व श्री ब्रज किशोर प्रसाद, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्री कृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, वैद्यनाथ झा, जयप्रकाश नारायण आ बाबू जगजीवन राम आदिक श्रृंखलाक अबैत अछि। बहुत रास विद्वान/स्वतंत्रता सेनानी बिहारकेँ अपन कार्यस्थल बनौलनि, जइमे आचार्य कृपालानी, महापंडित राहुल सांकृत्ययन, श्री काशी प्रसाद जायसवाल आ स्वामी सहजानंद सरस्वतीक नाम उल्लेख योग्य अछि। जतऽ बिहारमे विदेशी गुलामीसँ मुक्ति पाबय लेल बहुत आन्दोलन भेल छल, साहित्यक रसदार धारा बहेनिहार कृतवीर सेहो समय-समय पर ऐ धरतीपर जन्म लइ छलाह। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, आचार्य शिवपूजन सहाय, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, श्री फनीश्वर नाथ 'रेणु', राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर', नागार्जुन आ शाद अजीमाबादीक रचनामे देशक माटिक गंध आ चिंतन भेटत। बिहार (पटना) श्री गुरु गोविंद सिंह जी क जन्मभूमि अछि । अंग्रेजक आगमनक बादसँ बिहारमे कलकत्तासँ प्रशासनिक शासन होइत छल । सन् १८५७ क विद्रोहक समयसँ लोकमे बिहारकेँ अलग प्रांतक रूपमे देखबाक इच्छा छल। श्री सच्चिदानंद सिन्हा, बाबू शालीग्राम सिंह आ बाबू विशेश्वर सिंहक नेतृत्वमे आन्दोलनक फलस्वरूप अप्रैल १९१२ मे बिहार आ उड़ीसा अलग राज्य बनल । उड़ीसा सेहो अप्रैल १९३६ मे बिहारसँ अलग भऽ गेल। पचासक दशकमे राज्य पुनर्गठन आयोगक सिफारिशक अनुसार बिहारक वर्तमान भौगोलिक रूप सोझाँ आयल अछि। पूर्वमे पश्चिम बंगाल, पश्चिममे उत्तर प्रदेश, दक्षिणमे मध्य प्रदेश आ उड़ीसा आ उत्तरमे नेपालसँ घेरल ई राज्य पश्चिमसँ पूर्व दिस बहैत गंगा नदीसँ विभाजित अछि।
भौगोलिक रूपेँ बिहार तीन भागमे विभाजित अछि।
पहिल अछि उत्तर बिहारक गंगा क्षेत्र। बिहारक बीस टा जिला बिहारक ऐ मैदानी क्षेत्रमे अबैत अछि, जे नेपालक तराई आ गंडकक उत्तरी तटक बीच स्थित अछि। एकरा अलाबे भागलपुर जिलाक नवगछिया उपमंडल उत्तर बिहारमे पड़ै छै। ई पूरा इलाका उत्तर बिहारक नामसँ प्रसिद्ध अछि। मैदान आ नदीसँ भरल हेबाक कारणे उत्तर बिहार कृषिक दृष्टिकोणसँ बहुत समृद्ध रहल अछि।
(अगिला अंकमे जारी)