विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

कामसूत्र के बिना कोनो चित्र शैली नहि छैक- लोककला के साक्षात विश्वविद्यालय गुमनाम नायक कृष्ण कुमार कश्यप (आ शशिबाला)*

गोविन्द चन्द्र दास · 2023-04-15 · अंक 368 · पृष्ठ 56–59

मिथिला लोककला आर संस्कृति केर महान केन्द्र थीक। मुदा एकरा वैश्विक पटल पर अनबा मे कृष्ण कुमार कश्यप कें विशिष्ट योगदान छन्हि। ओना त ई एकटा समाज सुधारक, नारी उत्थान केर संस्कृति दूत छलाह, मुदा विवाद सेहो हिनक संग लागल रहल। कश्यप जी आई कोनो परिचयक मोहताज नहि छथि। मिथिलाक संस्कृति विशेष क कला के संदर्भ मे हिनक अवदान के कोई बिसरि नहि सकैछ आओर नहि बिसरबाक चाही। एकर बावजूद समाज आर समालोचक कश्यप जीक संग न्याय नहि केलनि। हिनक मूल्यांकन उचित ढंग सं नहि कएल गेल। हिनका प्रति समाजक दृष्टिकोण बेस कठोर रहलैक। ओना त मिथिला कला संस्कृति अखनो समालोचनाक दृष्टि सं वंचित जकां अछि। मुदा सोशल मीडिया केर युग मे यदा-कदा नीक-बेजाय के विमर्श होमय लागल अछि। हालांकि कश्यप जी कें कामकाज केर आलोचना त भए सकैछ, मुदा ताहि स्तरक कोनो अथॉरिटी नहि बुझना जाइछ, जे हिनक उचित आकलन कए सकैथ।समाजक वास्ते कश्यप जी कें कतेक पैघ योगदान छन्हि से बुझनाई अत्यंत आवश्यक अछि। मुदा से नहीं, हिनक बनाओल चित्रकारी मे बेस सहजता सं अश्लीलताक अन्वेषण क लेल जाइछ। मुदा एतबे बात नहि छैक। पहिल बात जे कला रसविहीन नहि भए सकैछ।
भारतीय मानस मे नवरसक अवधारणा छैक। ताहि कोनो कलाकार रस सं विरत भए नहि सकैछ। दोसर बात जे प्रत्येक कलाकार आर कथाकार के अपन शैली होइत छैक आ तेकर पहचान समाज के करय पड़तै।
बातचीत के क्रम में एक बेर हम कश्यप जी कें कथित आपत्तिजनक पेंटिंग पर प्रश्न केलियन्हि त हुनक कहनाम रहैन जे बहुजन के जनतब मे मिथिला चित्र तखन एलै जखन एकर बाजार शुरू भेल रहैक। चाहे कोनो जाति के महिला एकरा बनबथि होथि चाहे कायस्थ समाज मे एकर बेसी चलन छैक त सबके बुझबा मे तखने एलैक जखन 30-35 बरख पहिने बाजार मे समान गेलैक। एकर मतलब ई नहि छैक जे एकर परम्परा मे कामसूत्र नहि छैक। कामसूत्र के बिना कोनो चित्र शैली नहि छैक। हुनक कहनाम रहनि जे पहिने कोहबर घर मे जाहिठाम कोठी राखल रहए ताहिठाम एकटा पार्टीशन होइत रहैक। सुनै छियै जे शब्द अछि कोनी-खोन्ही। ओ खोन्ही कोहबर घरक एकटा गुप्त भाग छैक। जाहिठाम सबहक आवाजाही नहि रहैत रहैक तेकरे खोन्ही कहल जाएत रहैक। ताहि खोन्ही मे नवरस कामदेवक चित्र रहैत रहैक। त कामसूत्र जे छैक ताहि सं वंचित कोनो कला शैली नहि छैक। आओर जखन मिथिला चित्र के बाजारीकरण भेलैक त एकरा बाजार मे अनलथिन के?... गंगा देवी, सीता देवी, जगदम्बा देवी। ओ सब वृद्ध स्त्री, विधवा स्त्री चाहे ताहि एज मे जे श्रीरामक भजन बेसी आओर दोसर चीज के चर्च-बर्च बेसी नहि कए सकैत छलथिन।
कश्यप जी कें नाम सं विवाद कें वितंडावाद ठाढ़ कएल गेल से उचित नहि। जाहि मिथिला चित्रकला कें ओ आजीविका आओर उपयोगितावाद सं जोड़बाक प्रयास केलैथ ओकरा नजरंदाज नहि कएल जा सकैछ। हिनक कृतित्व मे प्रतीक आर बिम्ब के माध्यमे निर्भीकता आर आत्मविश्वास सं चित्रण साहस के बात छैक। कश्यप जी कें लेखन वा चित्रकारी पर प्रश्न उठाओल जाइत अछि, मुदा ओ समाजक सच छैक। आर सत्य केर प्रकटीकरण केनाइ कोनो कलाकारक अधिकार छैक। ताहि विषय पर वाद विवाद भए सकैछ, मुदा एहि मे केवल अश्लीलता देखनाइ कोनो कलाकार के संग अन्याय छैक। ताहि कश्यप जी कें काम कें अश्लीलताक संज्ञा दए खारिज नहि कएल जा सकैछ। यदि इएह बात छैक त कालिदास केर कालजयी रचना कुमार संभव आओर काशीनाथ सिंह कें "काशी का अस्सी" के खारिज कएल जा सकैछ की?
कश्यप जी जाहि पृष्ठभूमि सं छथि, ताहि मे ई बड़ साहसक बात छै। जाहि अभावक जिनगी (फीस जमा नहि करबाक कारणे स्कूल सं निकालि देल गेला) सं गुजरलाक बादो निजी स्वार्थ कें छोड़ि क समाज कें जे देलखिन ओ स्वयं मे एकटा उपन्यास छथि। हुनक मोन मे ई एकदम स्पष्ट रहनि जे नारी उत्थानक आ ओकरा स्वावलंबी बनेबाक काज करब। ओ गाम गाम घूमि मिथिला पेंटिंग के केंद्र स्थापित कए महिला सब कें जोड़ि हुनका सब के स्वावलंबी बनौलनि। पेंटिंग कें महज सजावटी वस्तु केर सोच सं बाहर निकालि क ओकरा उपयोगिताक सामग्री के रूप मे मान्यता दियाब केर प्रयोग हिनके देन छनि आर ई प्रयोग मिथिला केर बहुत परिवार कें संबल बनल। एहि सच के क्यो नकारि नहि सकैछ। बाद मे ओ आत्मकथा लिखला बासमती जाहि कें अध्ययन केला पर लोकक भृकुटी तनि सकैछ मुदा एतेक बेबाकी आर ईमानदारी सं अपन सच लिखनाई बड़ हिम्मत के बात छैक।
लोकतांत्रिक समाज मे आलोचना केर अधिकार त सबकें छैक, मुदा आलोचना आओर आरोप मे फर्क होइत छैक। एतबा धरि नहि, कश्यप जी जाहि पहचान आओर सम्मान कें हकदार छलाह, ओ हुनका नहि भेटलनि। मुदा मोनक कोनो कोण मे टीस रहबे करैत छैक। सौराठ मे पहिल मिथिला लोक कला विश्वविद्यालयक स्थापना कएल गेलैक। विश्वविद्यालय त बनि गेल, मुदा सबसं पैघ संकट रहै जे एकर पाठ्यक्रम की होयत आओर के बनेता? त कश्यप जी कें योग्यता आओर अनुभव के देखैत ई काज हिनके सुपुर्द कएल गेल। एकर अलावा गरीब बच्चा या भिखमंगनी सबहक बच्चा के पढ़ेनाई हिनक लक्ष्य रहनि। ताहि मे सेहो विरोधक सामना करऽ पड़लनि। कुल मिलाकऽ कहल जा सकैछ जे महिला, दलित, पिछड़ल आर वंचित कें उत्थानक लेल सदिखन अथक प्रयास करैत दुनिया सं विदा भए गेलाह।
*(आ शशिबाला)*- सम्पादक द्वारा जोड़ल गेल। ऐ आलेखमे जतऽ जतऽ कश्यप जीक नाम अछि ओतऽ *आ शशिबाला सेहो पढ़ल जाय, कारण कश्यप जीक जिबैत कोनो चित्र एहेन नै अछि जे मात्र कश्यप जी आ शशिबाला संयुक्त रूपे नै बनेलनि।- सम्पादक

Suggested citation: गोविन्द चन्द्र दास. “कामसूत्र के बिना कोनो चित्र शैली नहि छैक- लोककला के साक्षात विश्वविद्यालय गुमनाम नायक कृष्ण कुमार कश्यप (आ शशिबाला)*.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 368, pp. 56–59, 2023-04-15. https://www.videha.co.in/research/2023/368/कामसूत्र-के-बिना-कोनो-चित्र-शैली-नहि-छैक--लोककला-के-साक्षात-व-850d42a3f9.htm

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