ईसे हमरा लोकनि जनिते की, आईने अनेकानेक ग्राम देखा हो, मुदा पहिने गामक संख्या एक हिरक जे-जे पाळू जाएब, गाम काख्या वृद्धि लगाम वा नगर गेल । मुदा गामक नामकरण कोना भेलैक, तकर कि विचार एए हम कर चाह ।
प्राचीनकालमे जहिया राजा-महाराज लोकनिक युग की महाभारत काल क परवर्ती कालभरि हरेक राज्यमे अपन-अपन सैन्य व्यवस्था लेक इतिहासाशी अछि जे प्रत्येक ५०० हाथी ५०० रथ, १५०० घोड़ा आ २५० पदाति (पैर चलता अवश्य छोट सामन्त होइत छलाह तनिक लग कि--किछु सेना अवश्य रहेत छलनि। महाभारत कमानीतं पदाति सेनामे क्रमश: 'पति', 'गुल्म' आ 'गण' होइत छलैक। जत ५५ व्यक्ति 'पति' होत छल ओहि तीन पति मिलाकै एक 'गुल्म' बनेत छल तथा तीन गुल्म लए एक 'गण' होइत छल आन नियम एक्के रङ अलि, मुदा शुक्रनीति पति के लक्षण किन्तु भित्र भेटेछ । एकर अनुसार २५४०) पाँच-छ सैनिकक टुकड़ी 'पति' कहबैत अछि । आजुक भांति पहिनहुँ छावनी छलैक, किन्तु अलग-अलग, कहुँ पतितं कहुँ गुल्म आउ कतहुँ गण गण, जेना कहल अछि नव पतिक अर्थात् तीन गुल्मक होइत छल आ से गणक संख्या कम होइत रहैक । जाहि-जाहि स्थानमे पति वा गुल्म रहेत छल, तकरा बादमे ओही आधारपर नाम देल आइत छलैक। अर्थात् पतिक स्थानके पति वा पत्ती ओ गुल्मक स्थानकें गुल्म । पछाति इह पत्ती 'पट्टी मे परिवर्तित भए गेल अथवा एही शब्द व्यवहत होमय लागल । इएह सभ चिक आजुक शुगापट्टी, कलापट्टी, जयदेवपट्टी, लालापट्टी, किसनीपट्टी, अललपट्टी, बेनीपट्टी, लालमणिपट्टी, मनहरपट्टी, कामेपट्टी, सीतापट्टी आदि । पट्टीक संख्या बेशी रहने उदाहरणो बेशी भेटेछ । एहिना जतए-जताए 'गुल्म' छल, से आई गुल्मा, गुल्मरिया, गुलमन्ती, गुलमिया आदिक नामसँ जानल जाइत अछि ।
सुनल थिक जे एक गुल्मक प्रधान रहथि बल्लोझा किन्तु हुनक असावधानीवश अथवा आने कोनो कारण ओहि गुल्ममे चोरी भए गेल । संयोगसं चोर पकड़ायल आ ओकरा राजाक सम्मुख आनल गेल । राजा निर्णय देलनि जे' 'गुल्मा-चोर बल्लोझाक कपार' । अभिप्राय ई जे एकर निर्णय हम नहि बल्लोझा करताह । अस्तु ।
प्रत्येक राज्य ओ राजाक लेल सेनाक होएब नितान्त आवश्यक मानल गेल अछि, ई सभ जनिते छी, तें राजाकै 'चारचक्षुषाः' कहलो गेल अछि । 'चार' मात्र चाकरे नहि थिक, आजुक CID, CBI एवं सैन्यकेँ सेहो कहल जाइत छलैक, अस्तु । मुदा ई बड़ कम लोक जनैत होएताह जे पहिने सेना कतोक प्रकारक होइत छल । जेना आई सेनाक जल-थल नभ रूपमे पहिने तीन भेद देखल जाइत अछि तत: पर BSF, CISF. कमाण्डो आदि उपभेदें कतोक भेद देखबामे अबैछ । तहिना प्राचीन कालमे सेनाकै केयो चारि से केयो छः भेदक स्वीकार करैत छथि । महाभारतक अनुसार (महाभारत, शान्तिपर्व-५९/४१/४१) एकर आठ अंग कहल गेल अछि हस्ती, अशी, रथी, पदाति, विष्टि, नाव, चर एवं देशिक । आने देशक भाँति मिथिलहुँक राजाकै एहि सभ प्रकारक सैन्य छलनि, जकर रहबाक स्थानके सैन्य-भेदहिक नामपर नामकरण कएल गेल छल । यथा हथौड़ी, हतगढ़ा, असवैया, रथनाहा, रोधान, रथीटोल, रथवाड़ा (रतवाड़ा), दाति (दाती), बिष्टुपुर, बिष्टशैल, नवेल, नवस्थ, चरमा, चरमपट्टी (घरमापट्टी), दिशौल, दशका आदि । ई सभ आधुनिक ग्राम ओही प्राचीन इतिवृत्तकें देखा रहल अछि । स्मरणीय थिक जे जेना पहिने सेनामे पथप्रदर्शककै 'देशिक' कहल जाइत छलैक, तहिना विशेष आयुध-सञ्चालन- दक्षव्यक्तिकें 'विष्टि' कहल जाइत छलैक से इतिहाससिद्ध प्रसिद्ध कथा थिक ।
गामक नामकरण मात्र सैन्य छावनियैक नामपर नहि, अपितु आयुधहुँक नामपर अस्त्र-शस्त्रहुक नामपर राखल जाइत छल । नीतिप्रकाशिकामे बहुतो रास आयुधक वर्णन भेल अछि (अध्याय दूस पाँच धरि), जकरा चारि श्रेणी ओतए विभाजित कएल गेल छैक मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त आऽ मन्त्रमुक्त । एहि सभ आयुधक की परिचय वा लक्षण से फरिछाएब हमर प्रबन्धक उद्देश्य नहि थिक आड़ से जैं करय लागव तं प्रबन्ध विस्तारक भय, तें तकरा छाड़ि देल अछि । किन्तु ई कहब आवश्यक जे उपर्युक्त चारू कोटिक आयुध एक ठाम नहि रहैत छल । आयुधक सञ्चालको अपन अपन आयुध-क्षेत्रहिं रहैत छलाह । आवश्यकता पड़लापर ओ लोकनि अपन-अपन अस्त्र-शस्त्र
हाथ लएनिर्धारित स्थानपर जाइत छलाह जे हो, मुदा स्मर्तव्य धिक मे, जे आयुध जतए रहैत छल, तकरा अर्थात् ओहि स्थानके, ओहे आयुधक आधारपर नामकरण होइत रहेक। जेना कि 'मुक्तायुधपुर' एहिमे 'युध पद आई लुप्तभए आकार मुक्तपदक संग मोलि (सन्धि संयोग) 'मुक्तापुर' भए गेल अछि हमरा जनैत 'मुक्ताम' (मोताम) वा "मुक्तामा" के सम्बन्ध सेहो रही मुक्तायुध रहल होएत ।
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र ओ शिलालेख समे भाँति भौतिक 'कर' के उल्लेख भेटैत अछि। एहिने 'कर' लेनिहार, देनिहारक पृथक-पृथक स्थान छलैक। किछु गाम एहनो छल, जाहिपर राजाद्वारा विशेष कर लगाओल गेल रहैक । कि ग्राम करमुक्तो छ कोनो-ने-कोनो कारण ओहि गामक लोक राजा कर नहि लैत रहथि। एही प्रकारक गाममे अकरिया, अकौह, अकड़ी, अकरमपुर (मकरमपुर) आदि धिक। मुदा जाहि गामपर कर लागल जल अथवा जाहि गामक वासी कर दैत छलाह अथवा जाहि गाममे कर असूलनिहार राजाक प्रतिनिधि रहेत छलाह, ताहि गामक संख्या आपेक्षिक अधिक छ एहि कोटिक गाममे पुरानो गामसभ अबैत छल, जकर नामकरण 'कर'क आधारपर नहि भेल. रहेक। परन्तु नव नव गाम से बसल वा बसल छल, तकर नामकरण एही 'कर के आधारपर भेल। यथा-करडिया, करहरा, करिहर, करुभरि, करैया, केरमा आदि। राजाकै दातव्य 'कर मे एक प्रकारक कर छल 'बलि' । ऋग्वेदमे एही कारण साधारण व्यक्तिक लेल 'बलिहत' शब्दक प्रयोग भेल अछि./६/१०/१७३६) जकर अर्थ राजाक लेल बलि अननिहार। तैत्तिरीय ब्राह्मणहुँमे 'हरन्त्यस्मै विशो बलिम्' (-२/७/१८/३) र प्रयोग देखल जाइत अति । ऐतरेय ब्राह्मणक अनुसार (ऐ.बा.३/३) 'बलिकृत' वैश्यमात्रे होइत छलाह, जे बलि दैत छलाह । बलि, सामान्यतः व्यापार किंवा आयात-निर्यातहिपर लगैत छल । ब्राह्मण वा क्षत्रिय विशेष परिस्थितिकै छोड़ि कर मुक्त होइत रहत्थे । अतएव जाहि गामक वासी बलि दातव्य होइत छलनि, तकर नामकरण एही बलिक कारण भेल होएत। यथा बलिगाँव, बालो, बलाल, बलिया, बलियाही, बलिनगर, बल्लीपुर आदि किन्तु किछु एहनो लोक सभ रहथि जे राज- दरवारमे अथवा प्रतिनिधि लग जाए स्वयं बलि जमा नहि करैत रहथि । ई लोकनि 'हस्तबलि के माध्यमे अपन बलि (क) राजकोशमे जमा करैत छलाह। एहि हस्तबलिक नियुक्ति स्वयं राजा करैत छलाह । सम्भव धिक जे ई "हस्तबलि' जाहि गाममे रहैत छलाह, तकरा हुनके नाम वा पदनामपर जानल जाय लागल। जेना आजुक 'हतबलिया ओ 'हेठीबाली' ओकरे आभास दिया रहल अछि ।
नगर, पुर, पुरी, पत्तनक अर्थमे 'हट्ट' शब्दहुँक प्रयोग देखल जाइत अछि । राजनीतिप्रकाशमे देवीपुराणक वाक्य उधृत भेल अछि, जे एकर प्रमाण धिक । श्रीधरो अपन भागवत व्याख्यानमे कहैत छथि 'ग्रामा हट्टादिशून्याः, पुरो हट्टादिमत्यः, ता एव महत्य: पत्तनानि.... (भाग भाष्य- ४ / १८/३१) । कदाचित् एही हट्टक कारणें मिथिलहुँमे ग्रामक नामकरण कएल गेल हो । यथा हटनी, हटरिया, हाटी, सिरपुर हाटी, बगड़हट्टी आदि ।
ऋग्वेदमे 'ग्राम शब्दक प्रयोग बहुश: भेल अछि, यथा ग्रामजितो नरः' (ऋ. ५/५४/८), 'यथा शमसद् द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्' (क. १/१९४/१) आदि (ऋ. १०/६२/११. १०/१०९/५)। तैत्तिरीय संहितहुँमे "विद्वान् ब्राह्मणग्रामणी' (तै.सं.-२/५/४/४) आदि कहल गेल अछि। एतए स्मर्तव्य धिक जे 'ग्राम' शब्दक अर्थ गामे नहि छल, अपितु नगर सेहो होइत छल। ओना तँ नगर, पुर, पुरा, पत्तन, गाँव आदि शब्द कोनो गामक नाममे रहिते अछि, किन्तु एतए पर्यायवाची नहि बूझि नगरक अर्थ शहर वा छोट मोट शहर बुझबाक थिक ग्राम प्रमुखकै 'ग्रामणी' वा 'ग्रामिक' (७/११५-१६), ग्रामाधिपति (कौटिल्य ३/३०), ग्रामकूट (एपिण्डिका, जिल्द-७, ५.३९. १८३. १८८०. १९ पू.३०४. ३१०) आठ पट्टकिल (इमिड एण्टीक्वेरी, जिल्द-६, पृ. ५१, ५३: जिल्द - १८, पृ.३२२) कहल जाइत छलैक। इएह शब्द आई मुखिया आऽ मेयर दुह् कहबैछ । पट्टकिलक सन्तान जाहि-जाहि गाममे बसैत रहथि, ताहू गामक संग 'पट्टी' जुड़ैत छल । तें स्मरणीय चिक जे पट्टीयुक्त गामक नामकरण मात्र पत्ति, पत्तीक कारणहिं नहि, प्रत्युत पट्टकिलक हेतुजे सेहो भेल अछि ।
शुक्रनीतिक अनुसार एक 'ग्राम' विस्तारमे एक कोशक होइत छल (शु.नी. - १ / १२३) । गामक आधा भाग 'पल्ली' कहबैत छल, जकर उदाहरणमे 'सरिसब' गामक आर्द्धभाग 'पाही के लेल जा सकैछ, जे किछु गोटेक मतमे पल्लीक अपभ्रंशो थिक । परन्तु एक अन्य अवधारणा वा प्राकृत वैयाकरणक अनुसार गामक अर्द्धभाग 'पल्ली क उदाहरण जगदलपल्ली, मलकानपल्ली, रूपाली, पाली आदि तं भए सकैछ, परन्तु 'पाही' नहि ।
हेमाद्रि अपन दानखण्डमे मार्कण्डेयपुराणके उधृत करैत पुर, खेट, खवंट एवं ग्रामक परिभाषा प्रस्तुत करने थि । जखनि कि हिनकहुँस पूर्व महर्षि याज्ञवल्क्यक अनुसार चारागाहक विस्तारकै ध्यानमे राखि ग्राम, खर्वट, नगर सभ एक्के अर्थ द्योतित करैत अछि, मात्र एकर क्षेत्रफल ओ नागरिकक स्तरमे भेद पाओल जाइत अछि। एहीसभक
कारणें प्रायः संस्कृतक अलङ्कारशास्त्री लोकनि 'पाम्य दोष देखओने होएताह हमरा जनैत एही सभमे कोनो 'खर्वट' पछाति 'खरंख' (खड़रख) भए गेल होएत। हमर एक मित्र एक समय कहने र जे पहिने एतय खड़क बोन छल अकरा काटि लोक बसल ते 'खरख' आठ कालान्तरमे 'खर' भए गेल जेना सर्वप सरिसबक कल्पना तहिना खदखदरक, जे हो हमरा एहिमे कि हास्य उपहास्यक पुट बुझना जाइल जे गाम वा भूमि खड़कें रखलक से भेल खरख आबादमे खहरख ।
एहिना चोर-चपाटीर्स रक्षा करब, चोर-डाकू समा दिएव 'चौरोद्धरणिक' वा 'कोपाल (काल) कार्य होइत ११३५.१ ३.४) जखनि कि कौटिल्य मते कार्य 'धीररज्जुक' करैत छलाह (३)। अधिकारी बोरीक क्षतिपूर्तियो करबैत रहथि। सम्भव क्षेत्र विशेषक 'चौररज्जुक' तयरत लाह से कालान्तरमे रजीह, रज्जुका (रजुका), रजुआही, बोड़जबा आदि भए गेल हो ।
किन्तु गाम जातिक नामपर सेहो बसल वा बसाओल गेल, जाहिमे बनियाम, सिंहवार, तेलियाना, तेलिया तेलगामा, भीर, नौआ-वाखरि, कैथवार, कैचिनियाँ, एकम्मा, बरही, राजपाम, उगमारा, कर्णपुर, सिसवारि आदिकें लेल जा सकैछ 'घर' जातिक क्षत्रियबहुल गाम 'भोर' छल, जे बादमे खण्डवला कुलक राजा लोकनिक गाम भेने 'राजपाम' सेहो कहओलक सिसवा क्षत्रिय, जकर शाखा सिसोदिया धिक, तकरा भगाए, जतय गाम वा वस्ती बसल, सैह भेल सिसवारि (सिसवा अरि) । एही तरहैं व्यक्तिक नामपर सेहो कतोक गामक नामकरण भेल अछि, जेना सीताजीक नामपर सीतामढ़ी, सीतापट्टी: गौरीक नामपर गौरिया: उमाक नामपर उमगाँव, मधुसिंहक नामपर मधुबनी धर्मनाथ ठाकुरक नामपर धर्मपुर: कल्याण झाक नामपर कल्याणपुर: माखनसिंहक नामपर माखनपुरा, राजा कसनारायणक नामपर कंसी (सिमरी); एक अज्ञात शुक्लाक नामपर शुक्लाराही आदि ।
एतय इहो स्मर्तव्य थिक जे' एक्के नामक अनेको गाम अनेको ठाम छैक, ताहि सभक नामकरणक पाछू कोनो एक कारण वा इतिहास नहि रहलैक अछि जेना लोहनारोडक सनिकट धर्मपुर मात्र धर्मनाथ ठाकुर बसओलन्हि, जखनि कि आनो ठाम धर्मपुर पाओल जाइत अछि एहिना सरिसब-पाहीक निकटक 'कल्याणपुर' मात्र कल्याण झाक द्वारा बसाओल गाम अछि, आन नहि बक्सर जिलामे स्थित 'अहरौली' के अहल्याक नामपर स्थापित कहल जाइत अछि, जखनि कि इएह कारण 'अहियारी 'क संग सेहो देल जाइत रहल अछि ।
मिथिलाक किछु एहनो गाम अछि, जकर नामकरणक पाछू एक इतिहास रहलैक अछि, भारतीय राजनीतिक वा सांस्कृतिक इतिहास । जेना विराटपुर, विराटनगर, बनाटपुर, वैराटीक नामकरणक पाछाँ मिथिलहिक एक भागक अर्थात् मत्सदेशक राजा विराटक सम्बन्ध जुड़ल छनि, जनिक दरवारमे पाण्डव लोकनि अपन अज्ञातवासक अवधि बितओने रहथि । मिथिलाक तत्कालीन जनपद सभमे विदेह, वैशाली, मत्स्य आदि देश प्रमुख छल । जखनि कि पाण्डवहिक बसाओल वर्तमान 'पण्डौल' अछि, जे पाण्डवालयक अपभ्रंश थिक । परम्परया ई श्रुत थिक जे अज्ञात वास हेतु जएबाकाल पाण्डव लोकनि एतहुँ रात्रि विश्राम कएने रहथि बेनीपट्टी थानामध्य जे वनाटपुर गाम अछि, तकर सुनैत छी प्राचीन नाम विराटपुरे रहैक । एकर निकटहि अछि 'उत्तरा' नामक गाम, जे विराटराजक पुत्री ओ अभिमन्युक पत्नीक नामपर बसल अछि । उत्तरासँ किछु हटि 'कीचकवाहा' नामक स्थान अछि, जतए विराटक सार कीचककें घिसिया-घिसिया मारल गेल छल । ओना ओकर वासस्थान छलैक किछु हटिकें, जे आई 'कछरा' कहवैत अछि । कीचकसँ किचरा, पुनः कचरा आऽ अन्तमे कछरा भेल होएत, जे सभ मत्सदेशमे अबैत छल। एकरे लगपासमे अछि विष्णुपुर आ मधवापुर, जतए माधव (श्रीकृष्ण) अपन विष्णुरूप देखओने रहथि । स्मरणीय अछि जे ई सभ गाम 'भाला' प्रगन्नामे पड़ैत अछि। एही विष्णुपुर लग अर्जुन अपन अज्ञातवासक समय गाण्डीव आऽ बाण नुकओने रहथि जाहि स्थानपर आई 'गाण्डीवेश्वर महादेव' एवं 'बाणेश्वर महादेव' क मन्दिर अवस्थित अछि । एहिना नेपालक मोरंग जिलामे वर्त्तमान विराटनगर ओ चम्पारणक वैराटी गामक सम्बन्ध सेहो विराटराजहिसँ जुड़ल अछि, जे ऊपर कहि आएल छी ।
राजा सीरध्वज जनकक पुष्पोद्याने आजुक फुलहर गाम थिक, जतए गिरिजामन्दिर 'गिरिजास्थान'सँ प्रसिद्ध अछि आओर एतहि जगज्जननी सीताक भेंट श्रीरामसँ भेल रहन्हि। एही ठाम हरलाखी थानामे विश्वामित्रक शिविर छल, जे आई 'विशौल' कहबैत अछि । सौराठ ओ रहिकाक सन्निकटे विद्यमान 'कपिलेश्वरस्थान' भगवान् कपिलक आश्रम स्मरण करा रहल अछि, संगहि इहो परम्परया श्रुत अछि जे एहि शिवक स्थापना स्वयं कपिले मुनि कएने रहथि । गौतमऋषिक जतए आश्रम छल, से ब्रह्मपुर आई विकृत भएकै 'बदमपुर' भए गेल अछि, जखनि कि कमतौलक एही परिसरमे अहल्यापुरीस प्रसिद्ध प्राचीन नगरीक नाम अपभ्रंश भए 'अहियारी' भए गेल अछि ।
सीतामढ़ी जनपद सीताजीक उद्भवस्थान लक्ष्मणानदीक तटपर अवस्थित तत्कालीन 'पुण्य ऊर्वी' आई विकृतभए 'पुनौरा' नामे प्रसिद्ध अछि। एही ठाम पुण्डरीक ऋषिक आश्रम सेहो छल, जनिका नामपर पुनरी-सरोवर (पुण्डरीक सरोवर) प्रख्यात अछि । एकरे बगलमे स्थित गिरभिशानी नामक गाममे खथि पुराण प्रसिद्ध 'हलेश्वरनाथ महादेव', जनिक अनतिदूरेमे प्राचीन कालक 'उर्विजा वारिजा', उरिया बेरिया नामे प्रसिद्ध अछि। सुरसण्ड ओ जनकपुर रोडपर आई जे 'पन्ध-पाकड़ि' पाओल जाइल, सुनैत छी वह स्थान धिक, जतए पाकड़िक गाछतर सीताजीके अयोध्या लए जयबाक क्रममे कहार सभ सुस्तेबाक हेतु रखने रहनि ।
नेपालक महोत्तरी जिलामे जलेश्वर महादेवस्थानक बगलहिमे एकटा गाम अछि सुग्गा । एतहि राजर्षि जनकक द्वारा व्यासपुत्र शुकदेवजीक आवास व्यवस्था कराओल गेल छल । बादमे इएह शुकाश्रम शुकासँ 'शुक्का' होत 'सुम्मा' भए गेल अछि । शुकदेवजी मिथिला अएवाकाल रास्तामे चम्पारणक बेतिया लग सेहो स्कूल रहथि जे स्थान आई 'सुगाओ" से जानल जाइत अछि । जनकपुरसं दश मील दूर हटि 'धनुषा' नामक स्थान जतए रामचन्द्रजीक द्वारा कएल गेल धनुषभंगक कथा स्मरण दियचैत अछि, ओतहिं मुजफ्फरपुरक 'रोगा' ओ रेवारी (ऋग्वारि), सीतामढीक 'अथरी", "यजुआर आर मधुवनीक समौल क्रमशः ऋग्वेद, अथर्वेद, यजुर्वेद ओ सामवेदक तत्कालीन अध्ययन- अध्यापनक स्थानकै स्मृति पटलपर अनैत अछि । धनुषा जिलामे अवस्थित 'कुसुमा' ग्राम यद्यपि किछु गोटे याज्ञवल्क्य ऋषिक आश्रमस्थल मानैत छथि, मुदा ओहि गाममे वाजश्रवा ऋषिक आश्रम छलनि से बहुतो प्रमाणसं प्रमाणित अछि, हिनके पुत्र रहथिन नचिकेता । याज्ञवल्क्यक आश्रम तं योगिवनमे छल, जे आई हीरापट्टी- जगवन कहबैत अछि । ई गाम अछि मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी थानामे ।
मधेपुरा जिलाक सिंहेश्वरस्थानक सम्बन्ध रामायणकालीन ऋषि शृंगीसँ रहल अछि, जनिक आश्रम एतए छलन्हि आ जनिका द्वारा स्थापित 'शृंगीश्वरनाथ महादेव' आई सिंहेश्वरसँ प्रसिद्ध छथि । भागलपुरक कहलगाँवमे एकटा पहाड़पर दुर्वासाऋषिक आश्रम छल आओर सुलतानगञ्जमे गङ्गानदीक पार्श्वमे एकगोट पहाड़पर जह्रुरुषिक आश्रम रहन्हि, जे आई जह्नुगिरिक अपभ्रंश भए 'जहाँगिरा' कहबैत अछि । विद्वान् अन्वेषकक ई धारणा रहलन्हि अछि जे पालवंशीय सुप्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय, एही जह्न-आश्रमक निकटमे छलैक ।
दरभंगाक नाम कोना पड़ल से विवाद एखनो हल नहि भए पाओल अछि, कारण 'मुण्डे मुण्डे मतिभिंत्रा' । तथापि अनेक किंवदन्तीमेस किछुके एतए उधृत करैत छी । जेना किछु गोटे द्वारबंग (बंगालक द्वार) सँ दरभंगाक कल्पना करैत छधि त केयो दरभंगीखाँ नामक कोनो पैघ व्यक्तिकें आनि बैसाओल आठ कहल जे इएह दरभंगाक निर्माण कएलन्हि । जँ १८म शतकक सुबेदार दरभंगीखाँक नामपर दरभंगाक स्थापना मानि ली तँ एहिसँ पूर्व 'दरभंगा क चर्चा कोना भेटैत अछि ? तहिना यदि बंगालक द्वारसँ 'द्वारबंग 'क कल्पना करी तँ 'बंगद्वार' होएबाक चाही, न कि द्वारबंग, संगहि दरभंगाक कोन स्थानसँ बंगालमे प्रवेश कएल जा सकैछ, सेहो एक प्रश्न अछि । किनको- किनको अनुसार इहो श्रुत अछि जे राजा शिवसिंहक दल (सेना) के मुश्लिम आक्रान्ता जखनि भंग (नाश) कएलक, तकर बादे एकर नाम 'दलभंगा' भेल आ संस्कृतक 'रलयोरभेद के मानि ई दरभंगा कहओलक अथवा उच्चारण- सौविध्यक कारणें दरभंगा भेल । शिवसिंहक एतूका तत्कालीन पड़ाव स्थलकें आइयो लोकसब 'शिवधारा'सँ जनैत अछि । परन्तु एहि शहरक नामकरणमे उपर्युक्त कोनोटा कारण समुपयुक्त प्रतीत नहि होइछ । हमरा जनैत आठम-नम शदीमे जे चौरासी गोट सिद्धलोकनि भेलाह, ताहिमध्य मिथिलहुँक कतोक सिद्ध प्रसिद्ध रहथि। हुनके सभक नामपर हुनक स्थान- विशेषर्के परवर्ती कालमे नामकरण कएल गेल होएत, जेना दरिःपाद' (दरिपा) सँ दरिभंगा ओ 'हरि पाद' सँ हरिभंगा, 'भर: पाद' सँ भरभंगा (आजुक नाम भरंगा), 'शंकरपाद' सँ शकरी वा सकरी, एहिना शबरपा से सबौर आदि।
विभाण्डकमुनिक आश्रम रहनि कालीवनमे, जे पछाति करियन कहओलक आ आई ई समस्तीपुर जिलामे 'करियन- बलहा 'सं प्रसिद्ध अछि। स्मरणीय थिक जे' एही गाममे परवर्ती कालमे उदयनाचार्य, गोवर्धनाचार्य आदि मिथिला-विभूति भेल रहथि। एही कालखण्डमे, मुदा किछु पूर्व भेल छथि 'रत्नकीर्ति' नामक प्रसिद्ध आऽ निविष्ट बौद्धविद्वान्, जे धर्मपालक शिष्य ओ विक्रमशिला विश्वविद्यालयक आचार्यो रहथि । हिनक परोक्ष भेलापर हिनकास प्रभावित समाज हिनक गामक नाम राखि देलक 'रत्नपुर', जे आई बिगरिकें 'रतनपुर' भए गेल अछि । एकरे अनति दूरपर स्थित अछि 'किरतिनिया', जे हिनकहिं नामार्धक लए बसाओल गेल प्रतीत होइछ आऽ 'रतनपुर-किरतिनियाँ' कहबैत अछि ।
मिथिलाञ्चलक किछु गामक नामकरण ओतूका राजा वा जमीनदारक कारणें सेहो भेल अछि, एहने गाम वा
स्थानसभमे सुप्रसिद्ध अनि राजर्षि जनकक 'जनकपुर', राजा बलिक राजधानी- स्वरूप 'बलिराजपुर (बाबूबरही लग), अलर्कक सम्पत्ति राजा बननिहार कर्णाटवंशीय राजा नान्यपदेवक नामपर सीतामढ़ीक 'नानपुर' राजा कंशनारायणक नामपर 'कसी' (कसी-सिमरो) आदि । तहिना ओइनिवार मूलक राजा कामेश्वर ठाकुरक पूर्वज ओएनठाकुरक स्थापित 'ओइनी' (ओएनी) गाम आई-काल्हि समस्तीपुरक ताजपुर थानामे पुसारोड स्टेशनलग ओइनी-बैनीस प्रसिद्ध अछि। एही वंशक राजा शिवसिंहक पिता देवसिंह अपन नामपर 'देवकुली' गाम स्थापित कएल, जे आई लहेरियासराय लग 'देकुली से जानल जाइत अछि । शिवसिंह, पचसिंह सभक बाद भेल राजा धीरनारायणक भाई कुमार लक्ष्मीनारायण सेहो अपन नामपर एक ग्राम बसाओल, जे' देकुलिये लग 'लक्ष्मीनारायणपुर' से प्रसिद्ध अछि । धीरनारायणक पात् राजा भेनिहार रामभद्रनारायण ओ कसनारायण दुनू गोटे अपन-अपन नामपर गाम वा राजधानी बनाओल वै चिक 'रामभद्रपुर' आ 'कंसनरैनी' किंवा 'कंसी-सिमरी', जकर चर्च पहिने कए चुकल छी । तहिना 'महेशपट्टी', 'शुभंकरपुर' ओ 'सुन्दरपुर के सम्बन्ध क्रमशः महेशठाकुर, शुभङ्करठाकुर ओ सुन्दरठाकुरक संग रहल अछि । बेगूसराय जिलामे राजा जयसिंह अपन ओ पत्नी मङ्गलादेवीक नामपर जतय 'जय मङ्गलागढ़ के स्थापना कएल, ओतहि नौलागढ़ (बेगूसराय), अलौलीगढ़ (खगड़िया), कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर) आदिक सम्बन्ध सेहो ओतूका राजा लोकनिक संग रहल अछि बिहारक मिथिलाक्षेत्र, मगध ओ भोजपुरक्षेत्र अथवा बिहारक बाहर राजस्थान प्रभृतिमे स्थित 'पाली', 'पाल' वा 'पाल' शब्दयुक्त गामसभक सम्बन्ध कदाचित् प्राचीनकालक पालवंशीय राजासभक संग रहल होइन्हि, ताहू सम्भावनाकै नकारल नहि जा सकैछ एहीमे अछि मिथिलाक 'पाली', 'जगदलपाली', 'घनश्यामपुर पाली', 'रानीपाल' आदि गाम ।
'सुगौना' पहिने सुगौनमूलक ब्राह्मण जमीनदार लोकनिक गाम छल, जतय बादमे ओइनिबारमूलक एक ब्राह्मण शाखा सेो आदि बसल । ई ग्राम मधुबनी जिलामे कपिलेश्वरस्थान लग अवस्थित अछि । एकर पूबमे भामतीकार बृद्धवाचस्पति मिश्रक आश्रयदाता नवम शताब्दीक राजानृगक राजधानी 'नगवार से प्रसिद्ध अछि, जे' ओहि समय नृगपट्टी आदि नामक रहल होएत। एही कोटिक गामसभमे अबैत अछि जगतसिंह, शक्तिसिंह, लखिमारानी, गंगदेव, राघवसिंह, माधवसिंह, दुलारसिंह, महिनाथ ठाकुर आदिद्वारा संस्थापित जगतपुर, शक्तिपुर (शकतपुर), रानीपुर, गंगद्वार (गंगदुआरि), गंगोली (गनोली-पहटन), राघवपुर (राघोपुर), माधवपुर (माधोपुर), दुलारपुर, महिनाथपुर आदि
मिथिला ओ मिथिलाक बाहरक किछु गाम वा स्थान एहनो अछि, जकर नामकरण सनातनधर्मक साम्प्रदायपर राखल गेल अछि । यथा-विष्णुपुर, हरिपुर, हरिनगर, हरिदासपुर, हरियाहरि, नारायणपुर, गोविन्दपुर, मोहनपुर, चक्रधरपुर, माधवपुर मधवापुर, श्यामपुर (मोजा), दामोदरपुर, रामपुर, रामभद्रपुर, रामनगर, रामचन्द्रपुर, रामदयालपुर, रामदयाल, राघवपुर, जयदेवपट्टी, बेलमोहन, घनश्यामपुर, चकरिया (भगवान्क चक्रपर राखल गेल नाम), लक्ष्मणपुर, भरतपुर आदि जतय वैष्णवनाम थिक, ओतहिं शैवनाममे प्रमुख अछि शिवपुर, शिवनगर, शङ्करपुर, शङ्करसराय, शम्भुआर, महादेवनगर, महादेवपुर, महदेवा, रुद्रपुर, ईशानचक, ईशपुर आदि एही तरहें शिवपञ्चायतन नामपर राखल गेल नाम धिक कुमारपुरा (कार्तिकेयक नामपर ), गनपतिया (गणेशक नामपर ), बरदहट्टा (बसहा बरद वा नन्दीक नामपर ), गंगजला (गंगाजल पर) आदि । तहिना शाक्त-साम्प्रदायिक गाममे परिगणनीय धिक भवानीपुर, भगवतीपुर, लक्ष्मीपुर, शारदापुर, शक्तिपुर, दुर्गापुर, दुर्गागञ्ज, गंगापुर, कमलापुर (कमलपुर-बिठुआर भिन्न अछि), उमगाँव (उमागाँव), अपर्णा (अपरना), पारोगाँव (ई पार्वतीगाँवक अपभ्रंश बुझाइत अछि), कालीपुर, कालिकापुर, सीतापट्टी, शेरपुर आदि सौरग्राममे सूरजगढ़ा, भानुपुरा, सूरजनगर, रवियाही आदि जतय उल्लेखनीय अछि ओतहि 'बहिनपुरा' नामक गामकै 'वह्निपुर'क अपभ्रंश मानि सकैत छी । जखनि कि हनुमाननगर, मदना, मदनपुरा, ब्रह्मपुर, ब्रह्मपुरा, ब्रह्मोत्तरा, चानपुर, चानपुरा, चनौर आदि सेहो जतय हनुमानजी, कामदेव, ब्रह्मा ओ चन्द्रमाक नामपर बसल ग्राम प्रतीत होइछ, ओतहि देवहार, भगवानपुर आदि सामान्य देवतापर आधारित गाम कहल जा सकैछ ।
किछु गामक नाम तँ अस्त्र-शस्त्र अथवा धातुपर आधारित कोनो विशेष कारणें राखल गेल होएत, जेना कि भालपट्टी (भाला), करौच (किरीच), तलवारि (तरुआरि), कुरहरिया (कुरहरि), लोहा (सौराठ), लोहार (भवानीपुर), सोनाली (सोना), रुपौली (रूपा), रजतपुर (चान्दी), रजतपुरा (चान्दी), सोनपुर (स्वर्ण) आदि ।
-डॉ. उदयनाथ झा 'अशोक'- वरीय आचार्य, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, श्रीसदाशिव परिसर
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