अशोकजीक कथामे मैथिली कथापर विमर्श आकर्षित करैत अछि ।
मैथिली कथाक अतीत, वर्त्तमान आ भविष्यपर विमर्श अशोकजीक 'छुट्टीक एक दिन' सँ पहिने कोनो कथामे हम नहि पढने छी । वर्तमान स्थिति ई अछि जे बहुत घरमे गप-सपमे मैथिलीक प्रयोग कम भ' गेल अछि । माइयो अपन धिया-पूतासँ मैथिलीमे गप नहि करै छथि, पढ़ाइ-लिखाइ, नोकरी-चाकरी,बजार-हाट,टी.भी.-सिनेमा सभ ठाम हिन्दी-अंग्रेजी पसरल अछि । जीवनमे मैथिलीक लेल स्थान बहुत कम भ' गेल अछि, जकर परिणाम अछि जे मैथिलीक प्रति अपनत्व आ ममत्व कमल जा रहल अछि ।
बहुत मैथिल एहेन छथि जे मैथिली बाजि त लै छथि मुदा पढ़ल-लिखल नहि होइत छनि । जखन मैथिली पढले ने होइ छनि तखन मैथिली कथा-कविता कोना पढ़ता ? पोथी पत्रिका कोना बिकेतै ? प्रकाशन व्यवसायक लेल व्यवसायी बुद्धि वला पूजीपति आगाँ कोना एताह ? मैथिलीक बजार नहि रहतै त साहित्यकार मैथिलीमे किए लिखताह ?
बहुत साहित्यकार जे मैथिलीमे सोचैत छथि ,अपन भाषामे अपनाकें बेसी नीक जकाँ अभिव्यक्त क' सकैत छथि,से मैथिलीमे लिखैत छथि, तें एखन पोथी त छपि रहल अछि ।
अतीत ई कहैत अछि जे हरिमोहन झाक साहित्य पढबाक लेल बहुत गोटे मैथिली सिखलनि । वर्तमानमे सेहो हरिमोहन बाबू आ यात्रीजीक साहित्य खूब पढल जा रहल अछि आ हिनकासभक पोथी सभसँ बेसी बिकाइयो रहल अछि । तखन स्थिति चिंताजनक किए लागि रहल अछि ? की मैथिलीमे पढबा जोगर साहित्य नहि रचल जा रहल अछि ? की मैथिलीक साहित्यकार खाली एक-दोसरक खिधांसमे लागल रहैत छथि ?
हरिमोहन बाबूक साहित्यक जे सामाजिक सौन्दर्य छनि से आइयो हुनका प्रासंगिक बनौने छनि ।
की आजुक रचनामे सामाजिक सौन्दर्यक अभाव अछि ? की साहित्यमे कलात्मकताक संग सामाजिक चिन्ताक अभाव रहैत अछि ? की सामाजिक सरोकारक व्यापकताक उपेक्षा होइत अछि ? की रचनाकारक जुड़ाओ आ लगाओ समाजसँ कम भ' गेल छनि ? की मैथिल समाज आगू भ' गेल अछि आ साहित्य पाछू चलि रहल अछि ?
युवा वर्गक सोच बदलि रहल अछि ।
हरिमोहन बाबू अपन कन्यादान उपन्यासमे ई कामना व्यक्त केने छलाह जे शारीरिक ओ मानसिक स्तर पर समान स्थितिक युवक-युवती यदि स्वेच्छापूर्वक विवाह करैत छथि त यैह आदर्श विवाह थिक, एहिसँ समाज बदलत ।
से भ' रहल अछि । प्रेम-विवाह भ' रहल अछि, जाति आ धर्मक बन्धन टूटि रहल अछि । समाज बदलि रहल अछि, नव समाज बनि रहल अछि, मुदा साहित्यमे जेना अभिव्यक्त हेबाक चाही से नहि भ' रहल अछि । प्रश्न इहो उठैत अछि जे हमर समाज धन अथवा जातिक हानिके सहर्ष स्वीकार क' रहल अछि अथवा अभिभावकक असह्मतिक कारण युवक-युवतीकें कोर्टक शरणमे जाय पड़ैत छनि ।
प्रश्न अछि जे नव समाजक हलचल मैथिली साहित्यमे किए नहि देखाइ द' रहल अछि ? परिवर्तनक आकांक्षी युवा पीढ़ीक लेल की साहित्यक अभाव भ' गेल अछि ? की मैथिलीमे प्रेम प्रगट करबाक लेल 'आइ लव यू' सन शब्दक अभाव अछि ? यैह सब किछु प्रश्न अछि जाहिपर विमर्श अछि एहि कथामे ।
विमर्शमे चारि गोटे भाग लैत छथि अभिनव,अंकिता,नीलम आ स्वयं कथाकार ।
अभिनव एम बी ए क' क' नोकिया मोबाइल कम्पनीमे काज करैत छथि, अंकिता अंग्रेजी साहित्यसँ एम. ए. कय पी.एच.डी. क'रहल छथि,नीलम डी.ए.बी.मे विज्ञानक शिक्षक छथि ।
अभिनव आ अंकिता अंतरजातीय प्रेम विवाह केने छथि । अंकिताकें साहित्यमे रूचि छनि, कथा, कविता सभ पढैत छथि, अनुवादक माध्यमसँ सभ भाषाक कविता,कथा पढैत रहैत छथि, मैथिलीसँ लगाओ छनि, मैथिली साहित्य बेसी नहि पढने छथि मुदा, पढबाक इच्छा रहैत छनि । बजारमे ओल किनबाक लेल अभिनव आ अंकिताक बीच मतान्तरक बात कथाकें सरस बनबैत अछि ।
अभिनव आ अंकितासँ इहो पता चलैत अछि जे समाज एखन एहि परिवर्तनके सहज स्वीकृति देबामे सक्षम नहि भेल अछि, एकटा पक्ष एकरा धनक हानि बुझैत अछि आ दोसर जातिक हानि ।
हिनका दुनू गोटेकें सेहो कोर्टक शरणमे जाय पड़लनि । साहित्यमे एहि तरहक सोचपर कम रचना एबाक ईहो एकटा कारण भ' सकैत अछि ।
हिनका लोकनिक माध्यमसँ मैथिली साहित्यक प्रति शिक्षित युवा वर्ग,अन्य प्रौढ़ शिक्षित वर्ग आ मैथिली लेखकक दृष्टिकोण बुझबाक आ समस्याक समाधानक लेल सार्थक चिन्तन भेल अछि एहि कथामे ।
वस्तुतः मातृभाषाक अस्तित्वपर जे संकट आएल अछि ताहिपर सेहो संवाद चलैत अछि कथामे ।
ई कहब पूर्णतः सत्य नहि अछि जे नव समाजक हलचल वर्त्तमान मैथिली साहित्यमे नहि आएल अछि अथवा मैथिलीमे प्रेमकथाक अभाव अछि, तथापि जतेक अछि ततेकसँ संतुष्ट होयब उचित नहि अछि ।
प्राथमिक कक्षामे मातृभाषाक माध्यमसँ पढाइ नहि हेबाक विषय पर ई कथा मौन अछि, तथापि मैथिलीक संकटक समाधानक दिशामे एकटा स्वस्थ चिन्तन लेल प्रेरित करैत अछि अशोकजीक चर्चित कथासंग्रह 'डैडीगाम'क कथा 'छुट्टीक एक दिन' ।
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