ओना तँ अशोक अपनाकेँ आब कथाकार अशोक कहै छथि (हुनकर फेसबुक प्रोफाइलक यएह नाम छन्हि) मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित पोथी अछि एकटा कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' जे प्रकाशित भेल १९८६ केर जनवरी मासमे। ओही वर्ष अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक सम्मिलित कथा संग्रह 'त्रिकोण' प्रकाशित भेल, नवम्बर मासमे, जइमे तीनू गोटेक ५-५ टा कथा छलन्हि।
अशोक कम लिखै छथि, कविता तँ आरो कम। मूलधाराक लेखकमे कम लिखबाक फैशन छै। जखन प्रेमचन्द तीन सय कथा लीखि लेलन्हि तखन जा कऽ ओ एकटा संग्रह बहार केलन्हि- 'मेरी प्रिय कहानियाँ' सन् १९३३ मे। ऐ पोथीमे प्रेमचन्द ई स्वीकार करै छथि जे नै चाहियो कऽ लेखकक सभ रचना नीक नै भऽ पबै छै। आ ईहो जे जँ पाठक एक लेखकक सभ रचना पढ़ि जाय तखन ओ जिन्दगी मे पाँचो छह टा लेखककेँ नै पढ़ि सकत। से हुनकापर दवाब पड़लन्हि जे ओ पाठक लेल ऐ तीन सयमे सँ किछु कथा चुनि कऽ अपन प्रिय कथाक रूपमे प्रस्तुत करथि। हमरो विचारे जहिया एकटा लेखक तीन सय कथा लिखि लिअय तखने ओकरा अपनाकेँ कथाकार घोषित करबाक चाही। ओना ओतऽ प्रेमचन्द ईहो कहि जाइ छथि जे लोककथामे मात्र उड़ैबला घोड़ा आदि होइ छै से कथाक महत्व लोककथासँ बेशी छै। प्रेमचन्दक ऐ गपसँ हम भिन्न विचार रखै छी आ फिराक गोरखपुरीक कथनसँ सहमत छी। फिराक गोरखपुरी अपन रुबाइक संग्रह 'रूप' मे लिखै छथि जे 'हिन्दू लोक गीत' जे हमरा दैत अछि से ओकरा मानवीय आ स्वर्गीय संगीत बना दइ छै, आ से गालिब, इकबाल आ चकबश्त सेहो हमरा नै दऽ सकला। ओ उदाहरण दइ छथि-
"बाबुल मोरा नैहर छूटल जाय,
ऊ ड्योढ़ी पर्वत भयी, आङन भयो विदेश।"
महाभारत आब लोकगीत बनि गेल अछि, लोकगाथा बनि गेल अछि, 'भील महाभारत' तकर उदाहरण अछि। अशोकक 'चक्रव्यूह' महाभारत आधारित किछु कविता अछि, से ओ लोकगीत आधारित अछि, लोकगाथा आधारित अछि।
से हमरा नजरिमे रचनाकार अशोक तीन टा छथि- कवि अशोक, कथाकार अशोक आ कथेतर गद्यक लेखक अशोक। अरविन्द ठाकुर अपन पोथी रोशनाइक लोकपक्षकेँ कथेतर गद्य कहै छथि, से निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना लेल हमहूँ ऐ शब्दावलीकेँ प्रयुक्त कऽ रहल छी।
कथाकार अशोक
त्रिकोण (कथा संग्रह) (१९८६)
स्व. डॉ ब्रज किशोर वर्मा 'मणिपद्म' केँ समर्पित त्रिकोणमे अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्दक ५-५ टा कथा छन्हि।
अशोकक ५ टा कथाक नाम छन्हि- हड्डी, हेयरपिन, अन्तिम शह, एकटा मुस्कुराइत आँखि आ खौंझ।
हड्डी: जागेशर, पत्नी सीमा, बेटी गुड़िया आ बेटा पप्पू। जागेशरकेँ ऑफिसमे देरी भऽ जाइ छै, डेरा ऑफिससँ दूर छै, लगमे महग भेटै छै। एकटा आत्महत्या भेलैहेँ बगलमे प्रायः दहेज लेल देल प्रतारणा, ओकील साहेबक पुतोहु नै सहि सकलि। ऐ मोहल्लामे सभकेँ डर लगै छै। जागेशरकेँ लागै छै जेना कण्ठमे हड्डी फँसि गेलैहेँ आ तेँ कथाक नाम हड्डी। नामकरणसँ लऽ कऽ सम्पूर्ण कथा सामान्य कोटिक अछि।
हेयरपिन: चन्दर आ उर्मिला। पहिल बेर बियाहक बाद दुनू दूर भेल अछि। उर्मिला पाँच दिन पहिले गाम गेल छथि। चन्दर पत्रिका उठबैए, मौगी सबहक फोटो जे पहिन्ने ओकरा पसिन्न नै पड़ै, आइ ओकरा आकृष्ट कऽ रहल छै। दूधबाली आबै छै, पहिने ओ खाली दूधे देखै छल मुदा आइ दूधबालीकेँ सेहो देखैए, पहिने किए नै ओकरा देखलक, दोसर कोठलीमे दूधबाली दूध राखैले जाइए, चन्दर दरबज्जा बन्द कऽ लै छै। दूधबालीकेँ ओकरासँ डर होइ छै मुदा ओ दू सय टाका खोंसि दै छै, दूधबाली सभ बिसरि जाइए आ घर छड़ा जेतै, से सोचैए, ओकरा गाम जेबाक छै, किछु दिन नै एतै। चन्दर बिहाड़िमे उधयाय लगैत अछि, बरखामे भीजऽ लगैत अछि- कथाकार ई दुनू वाक्य संभोग लेल प्रयुक्त केने छथि। फेर कथाकार कहै छथि जे आइ तातिल छिऐ, से आइ काजपर नै जायत, माने बुझि जाउ जे कथा आब उलटवासी दिस जायत। चिट्ठी सभ पढ़ैए चन्दर, ओइमे उर्मिलाकेँ देल रामानन्दक दू मास पुरना चिट्ठी पढ़ि चन्दर क्रोधमे अबैत अछि, ई प्रेमी अछि उर्मिलाक? तँ ओकर प्रेम फूसि। भोरमे उर्मिला रामानन्द संग आयलि। चन्दरकेँ तामस उठै छै, मुदा उर्मिला सिनेमा स्टाइलमे कहैए जे ओ ओकर पिसियौत छिऐ, बियाहक दू मास पहिने कलकत्तामे ओकरा नोकरी भेटि गेल रहै, तेँ बियाहक काजमे नै आयल आ तेँ भेँट नै भेलै। चन्दरक शंका समाप्त, मुदा आब उर्मिलाक बेर एलै, ओकरा दोसर कोठलीमे हेयरपिन भेटलै, ओ हेयरपिन नै लगबैत अछि, तँ ई ककर छिऐ? ओ चन्दरसँ पुछैए। यएह हेयरपिन कथाक शीर्षक अछि, उर्मिलाक हाथमे हेयरपिन चिचिया रहल अछि, कथा समाप्त मुदा हम माने पाठक ठकायल सन अनुभव करै छी। दू सयमे जेना दूधबालीक रेट लागल तइपर ध्यान चलि जाइए, अरघनाइ मोश्किल। मुदा कथाकार चाहै छथि जे स्त्री-पुरुष चरित्रपर, पुरुख केन्द्रित चरित्र दिश पाठकक ध्यान खीची, हिप्पोक्रेसीपर खीची, मुदा से भऽ पाबि असम्भव भऽ गेल छन्हि।
अन्तिम शह: बिशेशर, ओकर स्त्री, बेटा कुशेशर आ पुतोहु फुलेशरी। बेटा कुशेशर रमरचना सङे पटना चलि गेलै रिक्शा चलबै छै। पन्द्रह साल पहिने बिशेशर फूल बाबू सँ दू सय टाका लेने रहय बेटी धनमंतीक बियाह लेल। बेटा कुशेशर छोटे रहै तखन, सुकरातीमे धरमपुरक पहलमानकेँ माटि चढ़ा देने रहै, गिरहथ पीठ ठोकने रहथिन्ह, खूब सर्रो खेलाइए, महीसपर राखि लेने रहथिन्ह, मुदा ओकरा बान्हल-छेकल नीक नै लगै। आ कुशेशर पटनासँ आबि गेलै, किरायाक रिक्शा ओ आब नै चलबै छै, अपन रिक्शा छै, ओकर यूनियन छै। फूलबाबू शतरंज खेला रहल छथि, सूद मूरक दूनासँ बेशी भेटि गेल छन्हि, मुदा सूद जोड़िये रहल छथि। कागज वापस नै करताह, मुदा करऽ पड़लन्हि, जमाना बदलि गेल छै, प्रेमचन्दक हिन्दी कथा 'सवा सेर गेहूँ' सँ बहुत आगाँ। ओम्हर शतरंजोमे मिसरजी 'अन्तिम शह' दऽ कऽ फूल बाबूकेँ हरा देलखिन्ह। आब फुलेशरकेँ हवेली-महर नै जाय पड़तै।
एकटा मुस्कुराइत आंखि: प्रोटैगोनिस्टक एकटा ट्यूशन पढ़ेनिहार मास्टर साहेबक स्मृति, जीवन तेना जीबू जेना अभिनय कऽ रहल छी, से प्रोटैगोनिस्टकेँ लोकक मृत्युसँ बेशी जीवित लोकक दूर गेनाइ असहज करै छन्हि, मुदा अभिनयक बलेँ तकरा तोपि दइ छथि। मास्टर साहेबक फेरसँ बसुली ताकब आ झारि-पोछि अपन शिष्य लेल बजायब, बाँसुरीक उदास तान सुनि दुखीतमे दर्द बिसरि प्रोटैगोनिस्टक सूतब। आ आरो ढेर रास नोस्टालजिक गप प्रोटैगोनिस्टकेँ मोन पड़ै छन्हि।
खौंझ: घूर-धुआँ, रामनारायणक अठन्नी फेकि पानक ऑर्डर देब, रविशेखरक बैग लेने गामसँ आयब, बोर्ड ऑफिसक कोनो काज छै। घरमे कनियाँ सुधीरासँ किछु भेल छै से रामनारायण रविशेखर सङे डेरा दिस बिदा तँ होइए, मुदा लागै छै जेना पएरमे उक्खड़ि बान्हल होइ। फेर गामक नाटकक दुर्गतिक चर्चा, बाइली आमदनीकेँ खराप बुझबाक चर्चा, दूधक अभावमे नेबो चाह। फेर कथाकार कथाकेँ सम्हारऽ चाहलनि, एक्केटा मशहरी छन्हि, चौधरीजी सँ उधारी लऽ अनता, मुदा सुधीरा जोगा कऽ पचास टाका रखने छै, मशहरी लेल देतन्हि। आ सुखान्त, आ तखने बिजलीयो आबि गेलै, रविशेखरक कोठलीक पंखाक अबाज अबै छन्हि, आब बिन मशहरीयो कऽ ओकरा मच्छड़ नै लगतै।
काँच कथाक ऐ संग्रहमे 'एकटा मुस्कुराइत आंखि' भविष्यक प्रति कने आश्वस्त करैत बुझाइत अछि।
ओहि रातिक भोर (कथा संग्रह) (१९९१)
स्व. सुशील झा केँ समर्पित ओहि रातिक भोर मे अशोकक १५ टा कथा छन्हि। ऐ पोथीक 'प्रसंगवश' लिखने छथि कुलानन्द मिश्र जे कथापाठमे बाधा उत्पन्न करैए, जेना कुला बाबू लिखै छथि जे "असामर्थ्य दूर होइत गेल--- अशोक जीक ७७क कथा 'बौका चुप छल' आ हुनक ८९ क कथा 'सरिसबक साग' केँ एक संग पढ़ि बूझल जा सकैछ।" मुदा से केलापर 'बौका चुप छल' उनटे 'सरिसबक साग' सँ बीस पड़ैत अछि, स्त्री-पुरुषक (जे दुनू ठाम पति-पत्नी छथि) मनोविज्ञानमे 'बौका चुप छल' केर पति आ पत्नी दुनू अपन विराट रूप देखेने छथि, मुदा 'सरिसबक साग' केर पति-पत्नी चालू हिन्दी सीरियल सन व्यवहार केने छथि। ऐ संग्रहक कथा सभ एना अछि:
विरामसँ पहिने: समीर परीक्षा छोड़ि देलक, पिता सन्न छथिन। (परीक्षा) केन्द्रक घण्टा बाजल, परीक्षा शुरू हेबाक समय भेलै, ओ परीक्षा छोड़ने अछि, ओकरा बोखार भऽ गेलै। प्लॉट ठीक छल मुदा कथाकार अदहा कथा बितला धरि मुख्य मुद्दा पर नै आबि सकला, अन्तिम पैरामे कथा सम्हारबाक असफल प्रयास केलन्हि।
बौका चुप छल: डाकदर साहेबक कनियाँ गाम गेल छन्हि से इजोरिया गड़ि रहल छन्हि, विवरण कने नमड़ि गेल अछि, मुख्य प्लॉट शुरू होइए बौकाक साँप कटबासँ, डाक्टर साहेब ओत्तऽ बिदा होइ छथि। मुख्य कथा ओत्तऽ छै, बौका सभटा बुझियो कऽ चुप रहैत अछि, माटि काटऽमे पक्का ओस्ताद छल, मुदा बेमारी धऽ लेलकै, स्त्री रधिया देरी कऽ अबै, सेण्ट लगेने, मुदा बौका किछु नै पूछै जे के कतऽ सेण्ट लगेलक। रधिया कहै जे बिगड़ल छी तँ मारू मुदा बौका ओकर केश सोझरा दइ। ओकर दियादनी सेहो रधिया दिया बाजै मुदा बौका किछु नै बाजै। आ मुइल तँ बेमारी सँ नै, साँप कटलासँ। फेर रधियाक हाक्रोश, एतेक सुन्दर मनोविश्लेषणक बाद कथाकार द्वारा, डाक्टरकेँ रधिया कऽ देखि कऽ दोसर तकिया मोन पड़ि एलै, सँ कथाक समाप्ति करबाक आवश्यकता नै छलन्हि। कथाक आरम्भ आ अन्त दुनू ऐ कथाक कमजोरी अछि, आ एतेक सुन्दर कथाक सत्यानाश भऽ गेल अछि। मूलधाराक छद्म समीक्षाक परिणामक ई ज्वलंत उदाहरण अछि।
एकटा दोसर ब्रह्मा: मृत्युक बाद ब्रह्मभोज। छीतनक पाइ कियो ठकि लेलकै, मुदा लोक सभ कहै छै जे भोजक डरे ओ फूसि बजैए, से छीतन जमीनक एवजमे पाइ उठाओत आ भोज करत।
जहलमे टाङल मोन: मुख्य पात्र छथि तमसाह असित ओकर संगी शान्त स्वभावक किशोर आ असितक बहिन मीना। असित जेलमे छै आब एमरजेंसीक बादे छुटतै, असितक पिताक चिट्ठी। मीनाक बियाह असितक परोच्छेमे करऽ पड़ि रहल छै। फेर बैकफ्लैश, मीना आ किशोर, मीना चंचल, टिकुला तोड़ैबाली। मीना एक दिन भैया कहनाइ शुरू केलकै, किशोरकेँ नै नीक लगलै। बियाकक किछुए दिन छै। कथा समाप्त।
एकटा चौक माने चण्डीनाथ: एकटा चौकक विवरण। फेर ओइ चौकपर आबाजाही करैबला चण्डीनाथक विवरण। चण्डीनाथक माय सपता-विपताक कथा कहि, चूल्हा-चेकी बना गूड़ा-खुद्दीक इन्तजाम कऽ लइ छथिन, आब चण्डीनाथक कनियों बाहर निकलऽ लागल छथिन, हँ बाल-बच्चा नै छन्हि। इमरजेंसीमे एक बेर टिकट चेकिङमे जेल गेला, अगत्ती छौड़ा सभ उड़ा देलकन्हि जे नसबन्दी कऽ देलकन्हि, कनियो पुछि देलकन्हि तँ ओकरा मारबो केलखिन्ह। लोकक मुँह बन्द करबा लेल बच्चा आवश्यक छन्हि, मुदा से अखन धरि सम्भव नै भेल छन्हि, आब मुखियामे ठाढ़ हेता। कथा समाप्त।
ओ मनुक्ख भऽ गेल: जिनका अहाँ आइ कथाकार अशोक कहै छियन्हि तकर बीजारोपण ऐ कथामे भेटत। नॉर्मल कमाइ-खटाइबला मनुक्ख बनबाक कथा, जे जीवन खतम हेबाक कथा अछि, हमर संग छोड़बाक कथा अछि, हम बहुत प्रयास केलौं जे तूँ मनुक्ख बनबासँ बचि जाह मुदा पूर्णता तोरा नीक लगै छह, किछु रिक्तता हम रखने रही जइसँ तोहर लेखन आ चिन्तनमे प्रवाह रहतह। नीलू तोहर जीवनमे आबि कऽ दोसराक भऽ गेल कारण ओकरा मनुक्खक भूख छलै आ ओइ समयमे तूँ ओकरा मनुखाह तृप्ति नै दऽ सकलह, कारण तोरामे किछु रिक्त छलह आ तेँ तोहर मानस-प्रेयसी मीनूक जन्म भेलै, मुदा हमरा बुझल अछि जे दुनूमे कोनो अन्तर नै छै। मीनू जीवन छलि ओ कहियो किछु आर नै भऽ सकैत छलि। छात्रावास घटना, कोनो जूनियर विद्यार्थीसँ लगाव, छोट भाइ सन, तोरा छोट भाइ नै रहौ तेँ। मुदा लोकक नाजायज सम्बन्धक आरोप पर तोहर ओ बलात् हँसी, अस्वस्थ मस्तिष्कक उपज, से तूँ सोचलेँ मुदा आरोपकेँ फूसि कहियो नै कहि सकलेँ। हमरा बूझल अछि जे ओ हँसी तोरा लेल कोनो शब्द गढ़ैत छल मुदा अनका लेल एक्के टा अर्थ रखैत छलै, आ ओही अर्थक मूल्यपर तोहर अधिकार बन्हकी रहि गेल ओइठाम, तोरा दुनूक बीच चुप्पीक देबाल ठाढ़ भऽ गेल रहय। बाजा-भुक्की बन्द भेनाइ चिन्तनकेँ गति दैत छै। आइ तोरा लग स्त्री, घर, रुपैया सभ किछु छौ मुदा तूँ कमजोर भऽ गेल छेँ। नीलू आब मरि गेल अछि कहनिहार तूँ सेहो आब मरि गेल छेँ आ से हमहीं टा देखि रहल छियौ, कारण हम नै मरल छी।
तेसर प्रश्न: अति सामान्य कोटिक कथा। रामप्रवेश चौधरी रिटायर कऽ गाम एला, बेटा कृष्णकान्त बेरोजगार, भागि कऽ कलकत्ता गेल, खूब कमेलक। बहिनक बियाह गनि कऽ केलक, रामप्रवेश डाकपर जमीन कीनऽ लगला, हलाल कएल माउस खाय लगला। मुदा पाइ तँ पठबन्हि कृष्णकान्त मुदा गाम नै अबैत रहन्हि,, बहीनक बियाहोमे नै एलन्हि। आ जहिया एलन्हि तँ पाछू सी.बी.आइ.क एरेस्ट वारण्ट संगे एलन्हि, नकली दवाइ बनबैत छला।
डेरबुक: एकटा आर मेडियोकर कथा। सुभाष, आमक कलम, सुभाष आ मंजूमे आमक टिकुलाले झगड़ा होइ छै। मंजूक बियाह ओही साल हेतै। फेर सुभाष अनचोक्के ओकरा भरि पाँज लऽ कऽ गाछक पाछाँ जाइए आकि तेजुआ आ शंकर आबि जाइ छै, लाठी बजरै छै। पंचैती। गामसँ निकालबाक आदेश, सुभाष पड़ा जाइए। दस बरखक बाद आइ घुरल अछि, माय मरि गेलै, भातिज छै। भैया कहै छै जे मंजू बादमे सुभाषक पक्षमे बाजलि, ओ सुभाषसँ बियाह करत, लोक सुभाषकेँ ताकैले गेलै, सुभाष नै भेटलै। मंजूक बियाह टूटि गेलै। आ आब अहाँ बुझिये गेल हेबै जे भौजी मंजूए हेतै, आ सएह छै।
नचनियाँ: आब कन-मने अशोक अपन रङमे आबि रहल छथि। नैनीताल, रजनी शर्मा, जे अछि प्रोटैगोनिस्ट आनन्दक सीतामढ़ीमे कॉलेजक सङी, मुदा आब एकटा नपुंसक दोबर उमेर बलासँ बियाहलि, कारण दहेज। ओकरासँ आनन्दक नैनीताल होटलमे भेंट। आ ओतऽ छल पूर्णियाँक बेरा सोहन मण्डल, दुखी दासक बिदापत मण्डलीक, दुखी दासक मृत्यु, बिदापत नाचक मृत्यु आ सोहन आबि गेल नैनीताल। मेडियोकर कथा होइत होइत बचि गेल ई। अन्तिम आठ पाँतीमे कथाकार कथा सम्हारबाक प्रयास केलन्हि, आ सम्हारियो लेलन्हि। सोहन आ रजनी बियाह कऽ लेलक, सोहन नृत्य सिखैए, प्रोटैगोनिस्टसँ पटनामे भेँट करय एलन्हि दुनू गोटे।
मिर्जा साहब: संग्रहक दसम कथा अछि ई। कथा नै सम्हरलनि। सुशीलक कथा सभ मोन पड़ि गेल, अस्मिता (लघुकथा संग्रह) (विदेह पेटारमे उपलब्ध) मे संकलित 'मस्जिद' आ आन कथा, उत्कृष्ट, खोंइचा छोड़ाओल, कोनो हड़बरी नै। मुदा मिर्जा साहेब मेडियोकर, नीक प्लॉटक अछैत। मिर्जा साहेबक बेगम नावाब परिवारक, माय मरि गेलखिन्ह, पिता पोसलखिन्ह। मामा मामी सभ पाकिस्तानमे, ओतुक्का चर्चा करैत रहैत छली। से मिर्जा साहेबकेँ नै नीक लागनि, फेर पिताक मृत्युक बाद बेगमक नैहरि बुझू पाकिस्तान भऽ गेलन्हि। बियाह पुरैले बेटा सलीमक संग गेली पाकिस्तान। तही बीच बझलै भारत-पाकिस्तानक युद्ध जइमे बहीनक पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि, से तमसा कऽ चिट्ठी लिखलन्हि भारतक विरुद्ध मिर्जा साहेबकेँ। चिट्ठी पत्री फेर शुरु भेल जखन सलीम ओतऽ डॉक्टर बनि गेल, आ जखन सलीम संगे बेगम घुरली तँ मिर्जा साहेबक बम्बै दंगामे मृत्यु भऽ गेलन्हि। प्लॉटे-प्लॉट, कथाक प्रारम्भ आशा जगेने छल, फ्रायडक पद्धतिसँ स्वप्नक विश्लेषण करऽ लागल छलौं। मुदा से धएले रहि गेल।
सरोकार: स्वांग धरैबला संगी सुरेश, बादमे ओकरा पत्नी संग चन्द्रनाथ आ ओकर साथी सब द्वारा सामूहिक बलात्कारक बाद न्याय नै भेटब आ बलात्कारी नेता जे छल एम.पी. एलेक्शनक उम्मेदवार चन्द्रनाथ, तकर हत्या सुरेश द्वारा। अमिताभ बच्चनक आखिरी रास्ताक पीअर कपीश रूप। सभ किछु मेडियोकर, मुदा अन्तिम आठ पाँतीमे कथाकार कथाकेँ कने सम्हारने छथि। सुरेशक बेटा परेश आब प्रोटैगोनिस्टक संग रहै छन्हि, ओहने नटकिया, स्वांग निकालैमे ओस्ताज, मुदा चन्द्रनाथ ओकरा नै जानि केना बेशी मोन छै, ओकर नेता बला स्टाइलक खूब नीक जकाँ स्वांग धरैए।
जहिया सुरुज नहि उगलै: जोगियाक कथा, जोगियाक चारूकातक समाजक कथा। बौआसीनक कथा। जोगियाक बाप मरि गेलै, माय दोसर टोलमे सम्बन्ध कऽ लेने छै, आंगनमे मौसा मौसी रहै छै आ ओ रहैए गिरहत लग, जतऽ बौआसीनकेँ बाँझ हेबाक कलंक दऽ मारि देल जाइ छै, छोटका गिरहत दोसर बिआह करत। ओ जोगियाकेँ गोहार केनै रहै मुक्ति दिआबय लेल। जगियाक मायकेँ मुक्ति भेटलै मुदा बौआसीनकेँ नै। छोटका गिरहत बौआसीनकेँ डाक्टर लग नै लऽ जाइ छै, ओकरा बच्चा नै होइ छै तँ मानि लेल गेल जे बौआसीनेमे गरबड़ी हेतै, बा कोनो आर कारण। कथामे दू समाजक बात व्यवहार आयल अछि, दहेज आयल अछि, मुदा जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, रामविलास साहु, रामानन्द मण्डल, संतोष कुमार राय 'बटोही', कपिलेश्वर राउत, सन्दीप कुमार साफी, उमेश पासवान, उमेश मण्डल, किशन कारीगर, राम चन्द्र राय,लालदेव महतो, आ नन्द विलास रायक विशाल आकाश देखलाक बाद ई सभ झुझुआन लागि रहल अछि।
सरिसवक साग: एकटा आर मेडियोकर कथा। प्रोटैगोनिस्टक कनियाँ जखन आयल रहथिन्ह तँ डेरायल रहै छलखिन्ह। मुदा आब से नै छै। तरकारीबला अपन दुखनामा सुना कऽ महग बेचैए, ठकैए प्रोटैगोनिस्टक कनियाँ केँ। प्रोटैगोनिस्ट ईर्ष्यालु होइ छथि, कनियाँक तरकारीबलासँ हँसि कऽ गप करब हुनका पसिन्न नै मुदा कनियाँ कहै छथिन्ह जे हँसि कऽ गप्प केलासँ जोखो ठीक दै छन्हि आ सस्त सेहो!
धरती गोल छै: मास्कोमे ट्रेनिङ, मनोज, सुधाकान्त आ तपन। गप सरक्का। पी कऽ पार्कमे सूति रहै जाइए। कथाकार अशोकक खाहिश रहै छन्हि जे अन्त कने चौकाबै बला होइ, से एकटा बूढ़ स्त्रीकेँ आनै छथि, ओ रूसी बाजैए आ तपनक माथपर हाथ राखैए, तपनकेँ माय सन लगै छै, स्नेहिल, जेना ओ भेस बदलि कऽ आबि गेल होइ। मुदा अन्त कोनो खास नै लागि रहल अछि।
ओहि रातिक भोर: टाइटल कथा। दू सङी, हीरा ब्राह्मणक पानक दोकान, पुलकित अमातक चाहक दोकान, मुखिया एलेक्शनमे सुबोध मिसर ब्राह्मण आ रैमाक सत्तन मण्डल ठाढ़ रहै, जे पुलकितक जातिक रहै!! भऽ सकैए रैमामे मण्डल टाइटिल अमातक होइत हेतै। दुनू सङीमे एलेक्शनेमे झगड़ा भेलै, सभटा पाइ कौड़ी केस मोकदमामे जखन खतम भऽ गेलै तखन बुइध एलै। फेर अन्तकेँ रोमांचक बनेबाक फेरमे राति एगारह बजे छाहक रूपमे पुलकित केँ आनै छथि कथाकार, हीरा कहै छै जे मारमे तँ फेर मारि ले, मुदा फेर दुनू गरा मिलि लइए।
मातबर (कथा संग्रह) (२००१)
'सगर राति दीप जरय'क सभ सहभागी कें जे कथा सुनलनि आ विचार केलनि' केँ समर्पित मातबरमे अशोकक १८ टा कथा छन्हि। 'एकसँ एकैस' सँ ई प्रारम्भ होइत अछि जकर लेखक छथि गप-सरक्कानुमा मूलधाराक आलोचना लेखक मोहन भारद्वाज। अशोकक समाज अध्ययन हुनका अचम्भित करै छन्हि, मूलाधाराक लोककेँ हेबाको चाही, दुनू (अगड़ा-पिछड़ा) समाजक अध्ययन! अशोक दुनू पक्ष राखै छथि, मुदा बैलेंस निबन्धमे बनाओल जाइ छी, कथाकारकेँ अपनापर ई दवाब लेब अनुचित। फेर ओ अशोकक कथाकेँ मैथिल बनावटिसँ भूषित करैत छथि, आ मैथिल बुनावटिक दू टा लक्षण ओ घोषित करैत छथि- पहिल खिसक्कड़ बनि कऽ आ दोसर यथार्थ वर्णनक विस्तारमे जा कऽ! दोसर लक्षणकेँ ओ मैथिली (मैथिल नै मैथिली) कथा बनबाक शर्त अगिले पैराग्राफमे घोषित करैत छथि। तखन तँ दुनियाँमे किछु गएर मैथिल भेबे नै कएल। ऐ तरहक गप्प सरक्काबला समालोचनाकेँ हमरा गाममे बकथोथी कहल जाइ छै आ नीक नै मानल जाइ छै। फेर ओ अशोककेँ विकासमे विश्वास करैबला आ यथार्थवादी (तकर विस्तार करैत ओ जातीय आ धार्मिक मानसिकताकेँ सेहो यथार्थवादी मानसिकता कहैत छथि!) कहै छथि। ऐ तरहक विचारकेँ आइ काल्हि पाश्चात्य जगतमे 'वोक' कहल जाइ छै आ ओत्तौ तकरा नीक नै मानल जाइ छै। समानान्तर धाराक कथाकार लोकनिक 'सगर राति दीप जरय' मे आगमन पूर्व अही तरहक समालोचनाक जमाना रहै, आ कथापर अही तरहसँ विचार 'सगर राति दीप जरय' मे होइत रहै।
आब आउ मातबरक कथा सभपर विचार करी।
मातबर: 'ओहि रातिक भोर' कथा संग्रहक टाइटल कथा संग्रहक अन्तिम कथा छल। मातबर अछि पहिल कथा 'मातबर' कथा संग्रहक। महराज जी छथि नेटवर्किङ चीफ, आइ काल्हि ऐ तरहक लोक रहै छै जे सिंगल विण्डो सर्विस दइ छै। पाइ कौड़ी बला पोस्टिङ लेल महराज जीसँ बात करत 'ओ', साहेब हरामी छै तेहेन तेहेन काज दइ छै जे एक्को भूरबला पाइक आमदनी नै होइ छै, कने महराज जी ओकरो रगड़तै। सभक मजमा महराज जी ऐठाम लागै छै, पीबि-पाबि कऽ गप-सरक्का करै जाइए, दारू सङे दू-तीन टा चखनाक विवरण कथाकार दइ छथि, उसनल अण्डा आदि। 'ओ' जइ असल काजले गेल रहय तकर की भेलै? घर घुरती कालमे मारि खाइसँ बचि जाइए, प्रायः चोर सभ चीन्हि गेलै। घरमे बेटा आ पत्नी सेहो तमसायल छै। खिस्सा खतम। अति सामान्य कोटिक कथा।
दसखत: एकटा आइ.ए.एस. अफसरक कथा, आंगुरक विवरणसँ प्रारम्भ भऽ औंठाक विवरण धरि। भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता आ लालफीताशाही सभटा रिपोर्ताज सन वर्णित अछि। अन्तमे औंठा काज केनाइ बन्द भऽ जाइ छन्हि, अमेरिका इलाजले जेता, मुदा बिनु दसखते पासपोर्ट केना बनतन्हि, आ ओहीसँ कथाक शर्षक आयल अछि।
कोठा: मंत्रीजीक कथा, रिपोर्ताज। दसखतक आइ.ए.एस. केर रिपोर्ताज सन कथाकेँ आगाँ लऽ जाइ छथि कथाकार। उत्कृष्ट कथा।
सहज-असहज: कथाकार अशोक आब रङमे आबि रहल छथि। कामेशर हाकिम बनि गेल, नग्र आबि गेल, गोटी खा कऽ सुतैए, खाइमे परहेज छै, सफलताक मूल्य चुकबऽ पड़ै छै। राधेश्यामक पढ़ाइ छुटि गेलै मुदा ओ कामेशरक बच्चा सभ लेल कॉमिक्सक सुपरमैन अछि।
जिनिस: पति-पत्नीक घर गृहस्थी, टोना-मानी। सङे ऑफिसक झमेल इटैलिक्समे कथाक बीच-बीचमे, तीन बेर। बाइली आमदनीक हिस्सक, पत्नीकेँ उलहन आ पत्नीक उतारा।
हिस्सक: पाइक उद्योग, पाइ कमेबाक हिस्सक। नीक विश्लेषण। एकरा हास्य-व्यंग्य कथाक श्रेणीमे राखि सकै छी। चेखवक कथा सन किछु किछु अनुभव हएत। प्रोटैगोनिस्टकेँ हाकिम कहै छन्हि जे अहाँ गपशप मारि सकै छी, पाइक उद्योग सम्हारबाक टैलेण्ट अहाँमे नै अछि।
भोज: श्राद्धक भोज उपनयनक एक साल बाद धरि नै खा सकै छी। भोजक मैथिल विमर्श, प्रोटैगोनिस्ट ब्राह्मण बालकक नजरिसँ, बालकथा श्रेणीक उत्कृष्ट कथा।
खुशीक प्रश्न: ईहो बाल मनोविज्ञान आधारित प्रोटैगोनिस्ट बालकक नजरिसँ अपन परिवारक कथा अछि। बालकथा श्रेणीक उत्कृष्ट कथा।
तानपूरा:शास्त्रीय संगीतकेँ भीमसेन जोशी जे ग्लैमर देलन्हि तकर साक्षी अछि हुनकर मर्सीडीज कार आ पछाति भेटल भारत रत्न सम्मान। भारत रत्न सम्मान ग्रहण करैत काल हुनकर ई वक्तव्य जे ओ ई सम्मान संगीतक गुरु लोकनिक प्रतिनिधिक रूपमे लऽ रहल छथि, गरिमापूर्ण छल। वएह संगीत रक्षक लोकनि जे वेस्टर्न क्लैसिकलक सोझाँ दूटा भारतीय क्लैसिकल, हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक शैली केँ अपन पेट काटि कऽ जीवित राखलन्हि। अही तरहक जीविकाक मरि जेबाक कथा अछि तानपूरा। शरदिन्दु चौधरी ऑफसेट मशीन एलाक बाद ब्लॉक प्रिण्टिंग क्षेत्रक हालतिपर अपना शैलीमे संस्मरण लिखने छथि तँ जगदानन्द झा 'मनु' धातुक बासन एलाक बाद माटिक बासन बनेनिहारक स्थितिपर 'माटिक बासन' बालकथा लिखने छथि।
'हरसिंहदेवी' पञ्जी प्रथाक दुष्परिणामपर कथा अछि मुदा विषय वस्तु मात्र नीक अछि, कथा साधारण अछि, निबन्धात्मक।
'सीवन रजकक हितचिन्तक' मे जाति आयल अछि, राजनीति आयल अछि, सीवन रजकक बैंकक नोकरी अयल अछि। अन्तमे आयल '..बाड़ी-झाड़ीसँ उखाड़ि कऽ गमलामे रोपि देलथिन..' सेहो कथाकेँ सम्हारि नै सकल।
'महतो' सेहो जातिक कथा थिक, सर्वसाधारण नोकरिहारा कर्मचारी, मालीक पदपर कार्यरत महतोक कथा थिक। कूट शब्दावली, घूसक पर्सेण्टेजक, महतोक ऑफिसक अलाबे अफसर सभक घरोपर काज करब, ऑफिसक गप्प सरक्का, राजनीति, खिस्सा खतम। अशोकसँ रजक आ महतोक नामपर लिखल कथासँ बेशी आशा छल मुदा ई भाँज पुरायब सन लागि रहल अछि।
'सनेश'मे एक्जीक्यूटिभ इंजीनियर पासवानजी बच्चाक ट्यूशन छोड़ि देलापर पासवानजी द्वारा दिवाकर रविदासकेँ खूब गाड़ि पढ़ल जेबाक चर्चा अछि। किछु निबन्धात्मक दलित विमर्श आयल अछि। फेर अन्तमे कथाकेँ टर्न देबा लेल प्रोटैगोनिस्टक स्टीलक औंठी दिवाकर रविदास द्वारा मांगब आ ओही नापक सोनाक ओंठी आपस देब वर्णित अछि, ऐसँ मात्र कने नाटकीयता आयल अछि, ओ. हेनरीक कथा 'द गिफ्ट ऑफ द मैगी' केर पीअर छाह सन अछि ई कथा।
'राग-विराग' मे पाइबला आ बुधियार लोक सभ द्वारा हुहकारी आ बोलारो दऽ कऽ केना सोझ लोककेँ ठकल जाइ छै ओइपर ई कथा अछि, आ सामान्यसँ ऊपर श्रेणीक अछि।
'आबेस' एकटा मेडियोकर कथा अछि, मायक आबेस वर्णित अछि मुदा किशोर मनोविज्ञानकेँ कथामे दबा देल गेल, आ कथा एकपक्षीय भऽ गेल अछि।
'बूढ़ा जीवैत रहलाह' कथा ओ कथा अछि जे अशोकक वैशिष्ट्य छन्हि जइपर हुनकर एक्सपर्टाइज छन्हि। मुदा मूलधाराक भोथ समालोचनाक दोष अछि जे ओ हिनका तकर भान नै हुअय देलकन्हि, मुदा ओ एकरा चिन्हलन्हि आ अन्तिम कथा संग्रहमे ऐ तरहक आर कथा लिखलन्हि। बूढ़केँ कोनो बियाह-तियाह नै करबाक छन्हि, से ओ अठारह बरखक सँ बेशी बयसक स्त्रीसँ बियाह नै करता, अठारह बर्खक कथा एबो केलन्हि, तँ दोसर कमी निकालि देलन्हि, मुदा घटक सभ लेल जे शर्बत घोरैक परम्परा छै तइसँ बेशी आवभगत ओ करै छथि। स्त्री आ तीन-तीन टा बेटाक मरलोपर ओ हँसै छथि, कारण ओ जीबऽ चाहै छथि। मुदा कुहरैतो हेता, असगरम, आ कुहरला शिष्य सत्तन लग।
'प्रतिलोम' सेहो एकटा मेडियोकर कथा अछि, जइमे गामक पिहकारी, श्राद्ध-बाध, जाति-विमर्श सभटा एक्के कथामे मिज्झर भऽ गेल अछि, निश्चिन्तीसँ फरिछेबाक अवश्यकता छल।
'राँड़' सामान्यसँ ऊपरक कथा अछि, 'बूढ़ा जीवैत रहलाह' कथा सन। ऐ कथामे तीनटा फ्लैश प्वाइंट अछि, पहिल मामीक मनीषसँ पूछब जे सिराजुद्दीन सत्ते खराप छै आ जँ ओ नीक लोक छै तँ मनीष पिताजीकेँ से किए नै बुझा सकल? दोसर फ्लैश प्वाइंट छै मामीक पूछब जे काज कऽ कय पाइ कमेनाइ खराप छिऐ? आ तेसर पतिक मृत्युक बादो मामीक नीक पहिरबा-ओढ़बाक मनीष द्वारा प्रशंसा। मनीष मामीकेँ ऐ रूपमे देखि चौंकल, ई लिखलासँ कथा शिल्प रूपमे कमजोर भेल, मामीक एतेक दृढ़ चरित्र देखेलाक बाद जँ मनीष हुनका उजरा नूआमे देखितैन्ह तखन ओकरा चौंकेबाक चाही छल, एत्तऽ नाटकीयताक जरूरति छलै, से कथाकार चूकि गेला। दूटा फ्लैश प्वाइण्टक बाद ई तेसर फ्लैश प्वाइण्ट कने झुझुआन लागल। ई मामीक कथा छल, प्रारम्भ सेहो ठीक अछि मुदा बैकफ्लैशक पूर्व आ प्रारम्भक बीच कोनो क्रम बा डैश-क्रॉश देल जा सकै छल, आ दोसर शिल्पगत विधिक प्रयोगसँ गामक दोसर विधवाक विवरण देल जाइत तँ ई उत्कृष्ट कथाक श्रेणीमे आबि जाइत।
डैडीगाम (कथा संग्रह) (२०१७)
दीदा (स्व. गीता देवी) केँ समर्पित डैडीगाममे अशोकक १५ टा कथा छन्हि।
'लाथ' अछि लहकदार कुरताक कथा, अति सामान्य कोटिक ई कथा अछि। दैनन्दिनी श्रेणीक।
'छल' कथाकार अशोकक सर्वश्रेष्ठ कथा अछि, ई अति उच्च कोटिक कथा अछि जकर सामान्य कोटिक अंग्रेजी अनुवाद विद्यानन्द झा केने छथि [The Book of Bihari Literature (Abhay K. Editor, Harper Collins, 2022) मे संगृहीत], मुदा कथे तते सशक्त छै जे तहू अनुवादमे जान आबि गेल छै। मनोविज्ञान, अहाँ जकर अभिनय करब, तकर आत्मा अहाँमे पैसि जायत, उगनाक बिछोहमे विद्यापतिक अभिनय करू, अहाँकेँ बिन ग्लिसरीन लगेने नोर चुअय लागत। भोली झा, चुस्त-चलाक, मुदा एहने आत्मा ओकरामे पैसि गेलै।
'स्वाधीन' कथा मैरिटल रेप आधारित कथा अछि, मुदा कथाकार समाजशास्त्रक समस्याक टॉपिकपर लिखबामे व्यस्त भऽ गेला, तेँ कथा सामान्य अछि।
'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि' सेहो समसामयिक समस्याक आधारपर रचित अछि, मुदा ने सएह आबि सकल आ ने कथे सोझरायल।
'डैडीगाम' टाइटल कथा अछि, 'ओहि रातिक भोर' आ 'मातबर' सन अशोक अप्पन सभसँ दुलारू कथाकेँ टाइटल कथा बनबै छथि, सोंगर पर सोंगर लगबै छथि मुदा तीनू टाइटल कथा सामान्ये कोटिक अछि। डैडीगाम मे विकास आ झंझमंझ आदिक सामान्य कथाक्रम अछि।
'राग' सेहो हिन्दू-मुस्लिम दोस्तक सामान्य कथा अछि, मासुपर गपशप।
'लेमन आइसक्रीम' उच्चकोटिक कथा अछि, कथाकार अशोकक कथा। प्रोटैगोनिस्टक कथा, माय नीक बनबनि तँ कहथिन, होटल सन बनल अछि। मुदा पत्नी मीरा केँ होटल पसिन्न नै। गुजरि गेली। बेटा-बेटी जावत संग रहन्हि प्रोटैगोनिस्टकेँ कनियों खेनाइ बनेनाइ नीक नै लागनि। बेटा गाम गेलन्हि, सभ देखैले स्नेहसँ जुमि गेल, हुनकर मायक प्रशंसा, हुनकर प्रशंसा। आ फेर..
'उमकी' उत्कृष्ट कथा होइत होइत बचि गेल। सेक्सिस्ट आचरणपर बहुत रास तथ्य आयल, अन्त सेहो नीक। 'अहाँक संगी तऽ ओहिना हर घड़ी नचबैते रहै छथि। फूटसँ नाच की देखेबनि।' केर संग किछु सस्पेंस। मुदा किछु मिसिंग अछि..
'मनसूबा' मे टुटैत परिवार आ भावनाक खिस्सा कहल गेल अछि। कृत्रिम जिनगीमे भावनाक, सामाजिक संस्थाक कोनो स्थान नै, कथाकार विषयक प्रति क्रूर भऽ गेल छथि आ तेँ कथा सामान्य कोटिक भऽ गेल अछि।
'अभयक बेटा केँ दूटा दाँत भेलनि' उत्कृष्ट कोटिक कथा अछि, गाम रहबा जोग नै रहलै, मुदा..
'खुशीक नाम जीवन' मे कन्हैया बाबूक बेटा बियाह लेल तैयार भऽ गेलनि, ओ खुश छथि, मैथिल ब्राह्मण लड़का आ केरलक नायर लड़की। केरलक कनियाँ अपने सभ सन छै, सँ समाप्त। सामान्य कोटिक कथा।
'टीस' केस फाइलसँ लेल कथासन, केसो बहुत सामान्य, पति द्वारा पत्नीक हस्ताक्षर कऽ गबन करब, पत्नीक सकारब, जेल। कथो तेँ सामान्य कोटिक।
'छुट्टीक एक दिन' कथा अछि मैथिली लेखन आ पाठन समस्यापर, किछु एम्हर-ओम्हरक गप, अन्तर्जातीय प्रेम विवाह, आ अन्तमे कहबी जे झगड़ाउ लोककेँ ओल कबकब लगै छै, अभिनवकेँ नै लगतै। सामान्य कोटिक निबन्धात्मक कथा।
'गामक कातक हाइवे' चकरका सड़क सभक कथा अछि। उमेश पासवान लिखै छथि 'मौतक चौराहा बनल अछि एन.एच. भुतहा मोड़' (भुतहा मोड़, वर्णित रस, २०१२, साहित्य अकादेमी मैथिली युवा पुरस्कारसँ पुरस्कृत पोथी)। एन.एच. मे ठामे-ठाम चौराहा सभक नाम आब भुतहा मोड़ छै, कारण ओतऽ डिजाइनक, फ्लाइओवरक कमीक कारण होइत दुर्घटना। आ हमहूँ लिखने रहौं ऐ विषय पर एकटा कविता:
आ तखन जे देखबा जोग रहितैक शान अपन गामक !
आ देखबा जोग रहितैक शान एहि छह लेन बला सड़कक सेहो !
हमरो सभक अंगपर रहितए जे वस्त्र
ओहने वस्त्र
जेहन ओहि लाल कारमे बैसल बच्चाक रहए !
माए!
हमरा तँ लगैत रहैए जे
अपन गामक ई सड़क
ओहि लाल परदेशीक ओहि लाल कारसँ बेशी अछि लग
दुनू टा लगैए बिदेशी सन
(गजेन्द्र ठाकुर, बड़का सड़क छह लेन बला, कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक, २००९)
गोला मरि गेल, पिचड़ा भऽ गेल, गामकेँ गीड़ऽ चाहैए ई एन.एच.। सौंसे गामक कुकुड़ मरल जा रहल अछि। कथा उच्च कोटिक रिपोर्ताज अछि।
'एना भऽ कऽ कियो' बोरोलीन, बोरोप्लस, श्वेत श्याम टी.भी., रिपोर्ताज नोस्टालजिक, मुदा फेर चौधरी साहेबक वर्णन शुरू, निरुद्देश्य बढ़ैत कथा, सुन्दर लगबाक धुनि, महिला सभक बड़ाइ, फेर एकटा जूनियरक तमसायब आ आँखि खुजब चौधरीजीक। निरुद्देश्य कथा समाप्त, सामान्य कोटिक हास्यक अन्त।
कथाकार अशोक कम कथा लिखने छथि आ तेँ उच्च कोटिक कथा सेहो कम्मे छन्हि। कथाकार अशोकक विशेषता अछि जे ओ आधुनिक सामाजिक समस्याक प्रति सचेत छथि, विषयमे विविधता अनै छथि, मनोविज्ञान केँ भावनाकेँ नीक चीर-फाड़ करै छथि। मुदा विषयकेँ फरिछेबाक कला बेसी काल मारि खाइत छन्हि बेसी काल हुनकर पंचलाइन-एण्डिंगक इच्छाक कारण, कारण ओ पंचलाइन कखनो काल बहुत सामान्य, आ पुनरुक्ति युक्त लगैत अछि। कथाकार सुशीलक माँजल फरिछेबाक कला आ कथा लिखबाक कला, नव आधुनिक कथा लिखबाक कला बेर-बेर मोन पड़ैत अछि।