व्यंग्य लिखब असान गप नहिँ छै। तै पर ठाहि-पठाहि । महाग मुश्किल । ई बात श्री अशोकजी स्वयं कहैत छथि मुदा सेहो काज अखबार हिन्दुस्तान ,हिनकासँ करबाइए लेलकनि ।भलें ई अपनाकेँ कथाकार मानथु (मानिते छथि ,तैं ने फेसबुकपर अपन नामक पहिने कथाकार लिखने छथि) नीके केने छथि ,हिनकर नामधारी अनेको फेसबुकपर छिड़िआयल छथि ,तै मे ,हिनका बिकछायब कठिन काज भय सकैत छलैक् सामान्य पाठककेँ , से काज ई स्वयं कय देने छथि ।
ई स्वयं नहिँ ,मैथिली साहित्य संसार हिनका मैथिलीक विशिष्ट कथाकार मानि चुकल छनि । मुदा इहो बात सत्य जे हिनकर अध्ययनशीलता , हिनकर बजबाक शैली ,हिनकर बॉडी लैंग्वेज ,हिनकर सोचक विस्तार,हिनकर लिखबाक कला आ मैथिलीक हेतु सदिखन चिन्ता रखबाक कारणे हिनका कथा लिखबामे स्थिर नहिँ रहय देलकनि । मैथिलीकेँ जेतय जेहन जेना जरूरत पड़लैक ,हिनकर उपयोग कयलकनि । साहित्यिक मंच हो ,संयोजनक आ उद्घोषकक प्रयोजन पड़तैक ,तँ श्री अशोक सामने ठाढ़ । कथा तँ सहजहिं ,कोनो पत्रिकाक लेल कोनो समीक्षाक विशेषक प्रयोजन पड़तैक ,तँ श्री अशोक । कविताक पोथीसँ अपन यात्रा प्रारंभ केनिहारि श्री अशोक एक विधा डेबने नहिँ रहि सकलाह ,जतय जेना जाहि तरहक प्रयोजन पड़लैक ,लिखैत चल गेलाह आ बजैत चल आबि रहल छथि ,तैं ने विविध विधामे हिनक अनेक पुस्तक प्रकाशित छनि ।
हिनकर व्यंग्य साहित्यपर चर्चा करबासँ पहिने ,हिनकहिं मुँहे सुनल गप्प कहय चाहैत छी ,जे ओ कमजोड़ी हमरोपर लागू अछि । जखन हमर यात्रा संस्मरण निकलल ,तँ एक पाठक (नाम स्मरण नहिँ अछि ,अछियो तँ एतय नहिँ कहब) पढलनि आ जखन ओ रूस गेलाह तँ हुनको यात्रा संस्मरण लिखबाक मन भेलनि ,ई बुझि जे लिखब बहुत आसान काज छैक , जे देखलियै ,सुनलियै , गुनलयै ओकरा लिखब कोन भारी बात ! मुदा ओ एक पेजसँ बेसी नहिँ बढ़ा सकलाह ,लिखल नहिँ भेलनि ।
सत्त्ते लिखब बहुत दुरूह काज छैक ,खास क' साहित्य । ओ सभ बूते नहिँ भय सकैत छैक ,ओना आइ काल्हिपर ई लागू नहिँ अछि ,ने फेसबुकपर ,ने पत्र-पत्रिकामे आ ने सुन्दर ,सुव्यस्थित मोट गेटअप-सेटअपमे प्रकाशित किताबपर ।जेना मोन भेल लिखि देलहुँ ,जकरासँ मोन भेल प्रसंशा करबा लेलहुँ आ समयानुकूल जोगाड़मे लागि गेलहुँ । साहित्यकार भेनाइ बहुत विरल आ कठिन काज छैक , जकरामे ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा रहैत छैक ,निरन्तर साधनारत रहैत छथि ,वैह साहित्यकारक रूपमे चिन्हल ,जानल आ मानल जाइत रहताह । बाँकी वर्तमानमे जे लूटि लेथु , वर्तमाने टामे रहताह । आगू क्यो नामो लेनिहार नहिँ !
श्री अशोकजी ओहि विरल साहित्यकारमे छथि ,जनिक मैथिलीकेँ खगता छैक । कथासँ समीक्षा दिस झुकाब , ई तँ अधिकांश लोक हिनकर विषयमे बुझैत छनि ,मुदा ई व्यंग्यो लिखलाह , ई बात हमरा जनैत कम लोक बुझैत हेतनि । जेना ऊपरमे कहलहुँ ,सेहो काज हिनकासँ 2014सँ 2016क बीचमे पटनाक दैनिक हिन्दुस्तान लिखबा लेलकनि । दू सालमे 31 टा लिखलनि आ ओ स्तम्भ बन्द भय गेलैक तँ हिनको व्यंग्य लिखब बन्द भय गेलनि ,ई एहिसँ बुझा पड़ैत अछि जे ओकर दू सालक बाद पुस्तक प्रकाशित भेलनि ,ओहिमे ओएह 31टा । एको टा बेसी नहिँ । तैं जे लिखलनि से मजबूरीवश लिखने हेताह ,मुदा लिखलनि तँ ओ सर्वत्र प्रसंशित भेलनि ,चर्चित भेलनि । हिन्दीक अखबारमे मैथिलीक स्तम्भ छपब ,ओहो हिन्दुस्तान सन प्रसिद्ध अखबारमे , जकर एक अलग आ सजग पाठक रहैत छैक , निश्चिते प्रत्येक मैथिली जननिहार पढ़ेत छल होयताह आ तै श्री अशोकजी नीके केलनि ,एकर पुस्तकाकार प्रकाशित कय ,स्थायी महत्वक बना लेलनि ,। फेर कोनो अखबार पकड़तनि ,तखने हिनकर कलम एहि विधा लेल ससरतनि । श्री अशोकजी स्वयं स्वीकारैत छथि -
अखबारक कारणे चर्चित भेलहुँ । जे सभ हमर कोनो पोथी नहिँ पढ़ने रहथि सेहो एकरा पढलनि ।कतेक लोक फोन क' कए प्रसंशो कहियो क' करथि ।सेवा जीवनक त' कतेको सहकर्मी हमर लेखनसँ एही माध्यमे परिचित भेलाह ।*
आब एहि पुस्तकक विषयमे । एखन बाढ़िक समयअछि , मिथिलाक बहुल क्षेत्र बाढ़िमे डूबल अछि । हिनकर एक व्यंग्य छनि "निचू चाड़ तर सोहाय मलार * । कतेक सटीक व्यंग्य छनि - जखने कारी-कारी मेघ लगैए तखने कोढ़ कॉपय लगैए । अंतमे कहैत छथि - एहन घर हो जाहिमे चुआठ नहिँ हो । निचू घर रहत तखन ने सोहायत मलार। स्मार्ट सिटीसँ लय नेपाल सरकार सँ वार्तापर तक नीक व्यंग्य छनि ।
*धूर्त समागम *मे कहैत छथि । नाटक देखि चकबिदोर लागि गेल । चकविदोर एहि दुआरे जे एक्केइसम शताब्दीक गप चौदहमे देखाओल गेल छल । सात सौ वर्षहुमे लोकमे कोनो बदलाव नहिँ । बढियाँ तुलनात्मक व्यंग्य कयने छथि ।
चुनावक फगुआ पहिल व्यंग्य छनि । बढियाँ जकाँ पार्टी सभकेँ क्लास लेलानि अछि ।
22 मई 2014 क लिखल व्यंग्य *नीक दिनक बाइस्कोप* जाहि नामपर किताबोक नामकरण पडल अछि ,पाँच सालक बाद पढि रहल छी , नीक "बाइस्कोप" देखेने छलाह ।
एहिना एकसँ एक व्यंग्य छनि , किछु व्यंग्य तँ बहुत नीक सुतरलनि अछि ,ओना सभ रचना अपन नाम(शीर्षक)क सार्थकता देखबैत अछि । पुरनो लिखल व्यंग्य एखन टटका लगैत अछि । आ आगुओ पढ़ब तँ लागत एखनुक तँ बात थिक । यैह एहि पुस्तकक सार्थकता अछि ।
शेखर प्रकाशन,पटनासँ प्रकाशित ई पोथी मात्र ₹50/-मे उपलब्ध अछि ।तैं हम आब हिनकर अन्य रचनापर नहिँ कहब । स्वयं पढ़ी आ अपने निर्णय करी । हमरा विश्वास अछि ,हमरासँ अपने पूर्ण सहमत होयब ।
हँ ! श्री अशोकजीक कोनो विधा साहित्यक अमूल्य निधि भय मैथिली साहित्यमे सभ दिन पढ़ल जयताह आ से एक मानदंड साबितक संग ।
-संपर्क-09430743070