विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि

कल्पना झा · 2023-05-01 · अंक 369 · पृष्ठ 25–28

विदेह मैथिली पोथीक आर्काइव पर जखन आदरणीय अशोक सर रचित पोथी सभक लिस्ट देखलहुँ, तँ कथा संग्रह, कविता संग्रह,साक्षात्कार संग्रह, यात्रा कथा,आलोचना, विविध आ नव कविताक पोथी सभक संग एक गोट व्यंग्य संग्रह पर नजरि पड़ल। "नीक दिनक बाइस्कोप" शीर्षक व्यंग्य संग्रह पर नजरि पड़ितहि हम बिनु एकहु क्षण गमओने एहि पोथी केँ डाउनलोड केलहुँ।मोन मे आएल "अशोक सर आ व्यंग्य संग्रह?" कनि अविश्वसनीय सन लागल,तैँ जिज्ञासा अत्यधिक प्रबल छलए, जे देखी,आखिर केहन अछि पोथी।जतबा हम अशोक सर केँ देखलियनि/सुनलियनि,स्वभाव सँ ओ बहुत बेसी सौम्य, मृदुभाषी लोक बुझेलथि हमरा। तैँ अविश्वसनीय सन बात लागल,जे एहन लोक व्यंग्य कोना लिखि सकैत छथि। ककरो पर कटाक्ष करब,ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि । आ जखन ओ स्वभावक विपरीत हुअए, तखन तँ आरो नहि। ठाँहि-पठाहिँ बात अधिक काल कटुए होइत छै,आ कटु बाजब सभक बुत्ताक बात नहि।
पोथी पढ़ब सुरुह केलहुँ, तँ लेखक द्वारा दू शब्द कहबाक क्रम मे "कहबाक अछि......"मे सभटा खिस्सा लिखल देखलहुँ/पढ़लहुँ,जे कोना संजोग बनलनि दैनिक हिन्दुस्तानक एकटा स्तम्भ "ठाँहि-पठाहिँ" लेल व्यंग्य लिखबाक। आ कतेक अबूह लागैत छलनि लेखक केँ व्यंग्य लिखब,तकर चर्चा सेहो केलनि अछि। लेखक स्वयं ई बात स्वीकार कएने छथि,जे "ठाँहि-पठाहिँ लिखब महाग मुश्किल।" आगाँ लेखक इहो बात स्वीकार करैत छथि जे एहि स्तम्भ लेल लिखैत "किछु सामयिक घटना-समाचार पर सोचबा-विचारबाक अवसर भेटल।संगहि इहो महत्वपूर्ण रहल जे अपन स्वभावक विपरीत कने-मने ठाँहि-पठाहिँ कहबाक-बजबाक अवगति भेल। हिम्मति भेल।"अवगतिए टा नहि भेल सर ! खूब सुतरल व्यंग्य लिखब। आगाँ आरो एहन व्यंग्य संग्रह पढ़बालेल भेटए,से अपेक्षा।
सभ सँ पहिने गप्प करब जीवनक लेल सभ सँ महत्वपूर्ण प्राणवायुक श्रोत गाछ-वृक्ष सँ संबंधित विषय पर लिखल गेल "हाइवे पर हरियाली"क। लेखक कतेक नीक संदेश देलनि अछि से देखल जाउ-"हाइवेक निर्माण मे जेना वृक्ष-संहार होइत अछि,से जीवन लेल मारुक भ' रहल अछि। मुदा सरकारे पर सभटा दोष मढ़ि देब,अपन जिम्मेदारी सँ भागब भेल। तैँ सरकारक संग हमरो सभ केँ योजनाक शत-प्रतिशत पालन लेल मोस्तैद रह' पड़त।जँ अपने चाँकि नहि रहत,त' आन केँ कोन गरज छै।"
लेखकक मोन फगुआ आ चुनावक गठबंधन देखि गारडेन गारडेन भेल छलनि, हमरा तँ "अतत्तह" पढ़ि मोन गारडेन गारडेन भ' गेल। कतेक सूक्ष्म ऑब्जर्वेशन ! मित्रता त'अतत्तह,शत्रुता त' अतत्तह। सत्ते,प्रकृति आ स्वभाव मे आइ काल्हि अति के डंका बाजि रहल अछि।अतत्तह भ' रहल अछि। कोनो सीमाक आब मोजर नहि रहि गेल अछि।सेहन्ता तँ सीमा पार। प्रेम तँ सीमा तोड़ि क'। क्रोध तँ अकास ठेकल।
ओना "अतत्तह" सन आरो बहुत टॉपिक सभ बहुत नीक लागल पढ़ैत। "भ्रमक कुहेस", "मुखौटा","सपनाक रेल",सभटा बेजोड़ टॉपिक।
"बिलाइत गाम"मे यथार्थक चित्रण करैत लिखैत छथि -"गाम अछि कि गायब भ' गेल।निट्ठाहे गायब भ' गेल कि किछुओ बचल अछि।छहर आ बाँध ओकरा गीड़ि गेल।डैम ओकर अस्तित्व लोप क' देलक।" गामक चिन्हास विशाल बड़क गाछ,घनगर पीपड़क गाछ,झोंटहा पाकड़िक गाछक चर्चा, बड़द-गाए-महीसक चर्चा,कुमहर,खम्हाउर,ओल,पोरोक सागक चर्चा करैत बिलाइत गामक मार्मिक चित्रण केलनि अछि। लेखकक कहब छनि जे शहर सभक आधुनिकीकरण मे बेहाल सरकार गामे केँ एना बसा दिअए,जे काज-रोजगारो भेटए आ अपन समाज-परिवारक संग रहियो सकी। मुदा एहिलेल बाजत के?
"गुनक करु मान"मे अपना मिथिलाक प्रचलित फकड़ा सभ पढ़ि नीक लागल। कतेक सार्थक, सटीक होइत छलए, सभटा फकड़ा सभ।जे आब बोलचाल मे एकदम प्रयोग मे नहि रहि गेल। अपना केँ पैघ लोक आ मॉडर्न शो करबाक चक्कर मे ओझराएल समाज आब ई गमैआ,देहाती फकड़ा सभ किएक बाजत। बहुत रास प्रश्न ठाढ़ केलनि अछि लेखक,जाहि पर विचार करबाक बेगरता छै-"ई कोना भेल जे हित-अहितक बात बिसरि पैघ-छोटक फेर मे पड़ि गेलहुँ ?एना एक दिसाह,एक भगाह किएक भ' रहल छी हमसभ ?"
"पोखरि सभ के कहिया उड़ाहब" बहुत महत्वपूर्ण विषय लागल। मरणासन्न भेल हुकुर-हुकुर करैत पोखरि सभ लेल लेखकक चिंता उचिते छनि। लेखक कहैत छथि,"अपना सभक इलाका नदी- पोखरिक मामला मे धनीक रहए। मुदा आब तहिना गरीब आ विपन्न भेल जा रहल अछि।"एकटा चौंका देमए बला आँकड़ाक उल्लेख सेहो केलनि अछि लेखक। देशक आजादीक समय अपना मिथिला मे जाहिठाम चौबीस लाख पोखरि छलए ताहिठाम आब मात्र साढ़े पाँच लाख बाँचल अछि। विडम्बना ई जे (लेखकक शब्द मे)-
"गाम-गाम मे पूजा-पाठ बढ़ि रहल अछि। जत' कहियो बासंती दुर्गा पूजा नहि होइत छल,ओतहु लाख-लाख खर्च क' धूमधाम सँ पूजा भ' रहल अछि।भरि-भरि राति भिडियो चलैत अछि।नाच-गान होइत अछि।मुदा कूपोत्सव,तरागोत्सव नहि होइत अछि।इनार आ पोखरि खुना क' उत्सव नहि मनाओल जाइत अछि।एहन उत्सव नहि होइत अछि जाहि सँ लोकक उपकार हुअए।"समाज केँ चेतबति लेखक कहैत छथि-" पानि बिना की जीवन।पोखरि बिना की गाम घर। आउ,जीवन बचाओल जाए।पोखरि खुनाओल जाए।"
सभटा विषय-वस्तु बहुत महत्वपूर्ण आ सार्थक चुनल गेल अछि लेखक द्वारा। समसामयिक विषय सभ,जाहि मे राजनीति आ राज नेता सभ पर व्यंग्य सेहो सम्मिलित अछि। "चुनावक फगुआ","ई ककर बजार छियै हो भाइ","टमाटर आ पियाजक सत्ता सुख" एहि श्रेणी मे आएत। मौसमक मिजाज सँ संबंधित सेहो किछु विषय अछि,जेना-"नामी भेल पटनाक गर्मी" ,"आब' हे अखाढ़!"समाजोपयोगी काज दिस लोकक ध्यान दिअबैत विषय सभ सेहो अछि। समाजक प्रति सेहो हमर सभक किछु जिम्मेदारी अछि,से आबक लोककेँ विस्मृत भ' गेल छनि। सभ अपनेलेल बेहाल रहैए। लोक आत्ममंथन करए।मनुष्य-जन्मक सार्थकता मात्र अपनालेल जीबए मे नहि छै,से लोक बूझए।
कथेतर साहित्यक श्रेणी मे आबए बला पोथी "नीक दिनक बाइस्कोप" समाजक लेल उपयोगी तँ अछिए,संगहि रोचक सेहो लगतनि पाठक केँ।

Suggested citation: कल्पना झा. “ठाँहि-पठाहिँ बाजब/लिखब सहज नहि.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 369, pp. 25–28, 2023-05-01. https://www.videha.co.in/research/2023/369/ठाँहि-पठाहिँ-बाजब-लिखब-सहज-नहि.htm

मूल विदेह अंक / Original issue