विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा

आभा झा · 2023-05-01 · अंक 369 · पृष्ठ 29–33

संस्कृत में एकटा वाक्यांश छैक -' गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' अर्थात् कवित्वक कसौटी गद्य होइछ।छन्द,लय गति यतिक बन्धनसॅं मुक्त हयबाक कारण गद्यमे भाषागत अथवा विषयगत छूट भेटबाक कोनो गुंजाइश नहि होइत छैक।एत' एकटा गप ध्यातव्य अछि जे संस्कृतमे गद्य,पद्य,नाटक, चम्पू सभ काव्यक श्रेणीमे अबैत अछि।
कथाकार अशोक मैथिली कथाक सुस्थापित नाम छथि। यद्यपि ओ पाठकवर्गकेॅं कविता- संग्रह एवं आलोचना आदि विधामे सेहो सशक्त रचनाक उपहार देने छथिन,तथापि स्पेशलाइजेशन कथाक्षेत्रीये।
आइ किछु गप हुनक कथासंग्रह 'डैडीगाम'क।प्रारंभ करैत छी शीर्षकथासॅं। प्रवास मनुक्ख लेल विवशतो अछि आ महत्त्वाकांक्षा सेहो। मुदा जेना- जेना वयस बितैत छैक,कार्यालयीय दायित्व क'म होइत छैक,धिया-पुताक जिम्मेवारी खतम जकाॅं होइत बुझाइत छैक,यानी समयक फरागति होइ छैक,अपन जड़ि तीव्रताक(शिद्दत) संग मोन पड़ैत छैक। किछु एहने सन अनुभव होइत छनि कथानायक रघुवंश बाबूकेॅं जीवनक सान्ध्यवेलामे आ ओ विकल होमए लगैत छथि गाम घुरबा लेल। मुदा एत' सकारात्मक पक्ष ई जे पत्नी आ धिया-पुता सेहो रघुवंश बाबूक इच्छाक समर्थक। यद्यपि देखल गेलै अछि जे बाहर रहनिहार बालबच्चा सभ एतेक मैटेरियलिस्टिक भ' जाइत छैक जे मायबापक भावना सेहो हानि- लाभक बटखरा पर जोखैत अछि । मुदा साहित्यकारक काज मात्र यथार्थ देखायब नहि,ओहि धरातल पर आदर्श स्थितिक सृजन सेहो होइत अछि।से कथाकार एत' परोक्षत: कह' चाहैत छल हेताह- एहनो भ' सकैछ, प्रयास त' करह।
गामक लोक मंदिर-निर्माणक नाम पर स्वागत करत,एतेक दिन धरि कयल गामक उपेक्षा मोन नहि पाड़त, तैं राममंदिर- निर्माण निर्णय कए रघुवंश बाबू सपरिवार गाम एलाह।मुदा गामक नवयुवकक प्रश्नक मादें लेखक संभवतः अपन मनोभाव व्यक्त करबाक प्रयास करैत छथि, धनिक प्रवासीकेॅं कर्त्तव्य मोन पाड़ैत छथि-
'कने विचारि क' देखियौ माणिक बाबू, कतेकरास मंदिर तँ अछिये चारूकात। तै पर फेर एक नव मंदिर बनि क' की होयत? जोहो त' एक टा 'लाइबिलीटीये' भ' जायत। एहि सँ बरु अहाँ सभ अस्पताल बनबितहुँ । स्कूल खोलि दितहुँ। कॉलेजक निर्माण करितहुँ । दुनियामे एक सॅं एक ज्ञानक प्रचार-प्रसार भ' रहल छै। ओकरे शिक्षण-प्रशिक्षणक व्यवस्था करितहुँ । लोक के कत्ते उपकार होइतै।'
एत' एक दिशि गामक नवयुवक लोकनिक जागरूकता व्यक्त भेल अछि त'दोसर दिशि धनाढ्य लोकनिक सामंती प्रवृत्ति पर चोट सेहो पड़ैत अछि।'गामक लोकक एतबहि टा अकाश' एहि सोचमे परिवर्तनक खगता देखाओल गेल अछि।
ई एकटा आशावादी कथा अछि,जाहिमे सभ बुझनुक बुझना जाइत छथि,कथानायक,हुनक पुत्रद्वय,पत्नी आ समाज सभ।आ सभ मिलि जीवनक सुखमय राग गबैत अछि।
'गामक कातक हाइवे' भौतिक विकासक संग गामक ग्राम्यपन,निश्छलता आ नैसर्गिकताक अंत देखि भावुक भेल साहित्यकारक अंतर्वेदनाक उद्गार अछि ।
'छुट्टीक एक दिन' समयक संग सामञ्जस्य-विधान करैत लेखकक एकटा सुखान्त कथा अछि,जाहिमे दू टा शिक्षित युवक- युवती सामाजिक विधानक विरुद्ध प्रेम विवाह करितो मैथिली साहित्य एवं मैथिल समाजक प्रति अक्षुण्ण अनुराग रखैत छथि।
किछु अही भाव पर आधारित कथा सन बुझाइत अछि 'स्वाधीन'।मुदा,ओत' वैवाहिक बलात्कारक पुरजोर विरोध देखाओल गेल अछि।एकटा स्वाभिमानिनी स्त्री कोनहु परिस्थितिमे ओ गर्भ रखबा लेल तैयार नहि छथि,जे जबर्दस्तीक सम्बन्धक प्रतिफल होमए। हॅं,ओ बुझैत छथि जे जबर्दस्ती करैबला पुरुष नितान्त अधलाह लोक नहि छथि, तैं तलाक नहि लैत छथि,ई कहैत जे 'हम खिस्सा खतम नहि शुरू कर' चाहैत छी'।मुदा तैंयों वैवाहिक मूल्यक अवहेलना स्वीकार नहि करैत छथि।
स्त्रीक अस्मिता- दलन कुपुरुषक प्रवृत्ति रहल अछि, मुदा स्त्रीक ओहि चोटसॅं उपजल टीसक अनुभूति सेहो पुरुष लेखक कए सकैत अछि,कारण लिखबा काल ने ओ पुरुष रहैछ आ ने स्त्री,ओ रहैछ मात्र ओ पात्र।पात्रक संग मानवीकरण आ समानुभूति नीक लेखकक चेन्ह होइत अछि।से अनुभव करैत लेखक अपन टीस कथामे नायिकाक मोनक संवेदना लिखैत छथि -
जेल मे शान्त आ स्थिर भेल बैसल बिमला के बेर-बेर एक्केटा बात मोन मे घूमि-फीरि कं' अबैत छलनि-' अध्यक्ष बनौलनि त' अध्यक्षक काज किए नहि देलनि? हम त' हुनकर सहधर्मी छलियनि। सहकर्मी किए नहि बनौलनि? हमरो दसखत किए अपने क' देलथिन ? एहन बेइमानी किए? की बेइमान समठाम बेइमाने होइत अछि? बाहरो मे बेइमान आ घरो मे बेइमान। '
'उमकी' ऊपरसॅं प्रेमकथा बुझाइत अछि, परञ्च 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' सिद्धांतक अनुसार ओकर अंत आतंकित करैत अछि।की प्रेमक एहनो रूप भ' सकैत छैक?की प्रेमक सेहो कोटा होइत छैक -एतबा जरूरति,एतबा आपूर्ति,तकर बाद कोनो सुख,दु:खक असरि नहि?
निस्संदेह नहि, तैं नाम थिक उमकी।
मनुष्य कतबो व्यस्त रहओ,कतबो दायित्वमे किऐक नहि ओझरायल रहओ,ओकरा अपन रुचि- प्रवृत्ति पर अवश्य ध्यान देबाक चाही ‌।लोक की कहत?हमर इमेज की अछि? आदि- आदि निरर्थक सोचमे अपन खुशीक आहुति देब बुद्धिमानी नहि, परञ्च ओहि एक क्षणक खुशीक अनुभव करब जिनगीमे न'ब ऊर्जा भरैछ,ई सार अछि 'लाथ' कथाक।
'छल' कथा जबरदस्त नाटकीय कथा अछि। कोनो व्यक्ति (भोलीझा)किछु क्षणक लेल कोनो पार्ट लैत अछि त' जेना ओ ओएह भ' जाइत अछि ।अभिनयक जीवन्तताक उत्कृष्ट निदर्शन अछि एहि कथामे।
'मनसूबा' मे कैरियरमे बुलंदी पयबाक उन्मादमे युवावर्ग द्वारा घ'र-गृहस्थीक जिम्मेवारीसॅं पलायनक बढ़ैत प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करैत छथि लेखक त' 'खुशीक नाम जीवन' मे अन्तर्जातीय विवाह पर स्वीकृतिक मोहर लगबैत छथि।एत' लेखकक मध्यमार्गीय दृष्टिक पोषण, सामाजिक स्वीकृति आदि बदलैत समयक संग कदमताल करैत अछि जे आवश्यको।
आशावादी दृष्टिकोण देखबैत अछि कथा 'अभयक बेटाकेॅं दूटा दांत भेलनि अछि' त' मानसिक बीमारी दिशि इंगित करैत अछि 'एना भ' क' कियो'।एकर अतिरिक्त 'ओ दुनू साइकिल सिखैत अछि','राग','लेमन आइसक्रीम' आदि कथा नीक बनल अछि।
संक्षेपमे जॅं कही त' डैडीगाम एकटा संवेदनशील कथाकारक पन्द्रह गोट रमणगर कथाक संग्रह अछि।कथाक प्रस्तुतिक छटा सुंदर आ मोहक अछि।मात्र चिंता व्यक्त करब, साहित्यकारक उद्देश्य नहि, अपितु अपन पात्रक माध्यमसॅं ओकर निवारणक उपाय देखायब,मुदा एना सन जेना हम कहाॅं किछु कहलहुॅं,हम त' खिस्सा कहैत छलहुॅं।
कथाकारकेॅं एकटा अत्यंत सामान्य पाठकक अभिनन्दन!

Suggested citation: आभा झा. “डैडीगाम- मध्यमार्गक अन्वेषणक कथा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 369, pp. 29–33, 2023-05-01. https://www.videha.co.in/research/2023/369/डैडीगाम--मध्यमार्गक-अन्वेषणक-कथा.htm

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