विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलाक इतिहासक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण

डॉ. दीपेश कुमार ठाकुर · 2023-07-15 · अंक 374

शोध-पत्रक शीर्षक:
मिथिलाक इतिहासक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण
लेखकक नाम आ संबद्धता: डॉ दीपेश कुमार ठाकुर,
शिक्षाविद, प्राध्यापक (अंग्रेजी) मानविकी
डीआईटी विश्वविद्यालय, मसूरी रोड, देहरादून, भारत
deepesh1november@gmail.com +91-8527740419
शोध सारांश:
मिथिला जकरा तिरहुत आ तिरभुक्ति कऽ नामसँ सेहो जानल जाइत अछि, भारतक बिहार आ नेपालक दक्षिणपूर्वी भागमे अवस्थित एक भौगोलिक आ सांस्कृतिक क्षेत्र छी। ई क्षेत्र पूर्वमे महानन्दा नदी, दक्षिणमे गङ्गा नदी, पश्चिममे गण्डकी नदी आ उत्तरमे हिमालयक तलसँ घेरल अछि । मिथिला क्षेत्रक मुख्य भाषा मैथिली छी आ ई भाषा बाजनिहार लोकसभकेँ मैथिल कहल जाइत अछि। मिथिला नाम सामान्यतया विदेह साम्राज्यकेँ उल्लेख करवाक लेल प्रयोग कएल जाइत अछि आ सङ्गे आधुनिक-कालक क्षेत्रसभ सेहो विदहक प्राचीन सीमासभक भीतर अबैत अछि। हम शताब्दीमे, जखन मिथिला क्षेत्रकेँ दड़िभङ्गा राजद्वारा शासित कएल गेल छल, ब्रिटिस राज एकरा एक रियासत राज्यक रूपमे पहचान नै दऽ ई क्षेत्रमे कब्जा कऽ लेनए छल। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थसभमे सबसँ पहिने एकर उल्लेख रामायणमे भेटैत अछि। मिथिलाक उल्लेख महाभारत, रामायण, पुराण तथा जैन आ बौद्ध ग्रन्थसभमे सेहो अछि। मान्यता अछि जे मिथिला नाम पौराणिक राजा 'मिथि' कऽ नामसँ कएल गेल। ओ अपन पिता राजा निमी कऽ शरीरसँ बनायल गेल मानल जाइत अछि। कियए तऽ हुनकर उत्पति अपन पिताक देहसँ मन्थन उपरान्त भेल छल, एहि कारण सँ ओ मिथि कहाएल। पौराणिक परम्परामे राजाक शासकीय क्षेत्रक नाम राजाक नामपर राखल जाइत छल। ताहि लेल मिथि कऽ नामपर ई क्षेत्रक नाम मिथिला पड़ल। मिथिला जनकपुरीक राजधानी छल आ राजा मिथि जनकसँ उत्पन्न भेल छल ताहि कारणसँ स्वयं मिथि आ हुनक बादक शासक सेहो जनक कहाएल। एकर बाद मिथिलाक राजासभकेँ जनक कहल जाए लागल। सीताक पिता सीरध्वज जनक छथि जे वाल्मीकि रामायणक हिसाबसँ जनकपुरीक पचीसम राजा भेल छल। देवी भागवतसँ ज्ञात होइत अछि जे निमिक उन्नैसम पीढ़ीमे राजर्षि जनक सीरध्वज भेल छलाह। हिनक विद्वताक चर्च देवी भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु पुराण, वृहद् विष्णुपुराण आ अन्य पौराणिक ग्रन्थमे भेटैत अछि।
कौशिकी, गङ्गा आ गण्डकीधरि एकर सीमा छल ताहि कारणसँ ई क्षेत्र तीरभुक्ति कहाओल।
शाम्भकी, सुवर्ण एवँ तपोवनसँ भुक्तमान होयबाक कारण ई तीरभुक्ति कहाओल।
ऋक, यजु आ साम तीनहुँ वेदसँ आहुति दै बला ब्राम्हणक निवास छल ताहि लेल ई तीरभुक्ति कहाओल।
इक्ष्वाकुतनय निमिक अधिनायकत्वमे, ब्रह्मर्षि गौतमक मार्गदर्शनमे एवं सत्यान्वेषी अग्नि-वैज्ञानिक वैश्वानरक सिद्धान्तक प्रतिफलमे आर्य सभ्यताक एक प्रभाग सिन्धुक कछेरसँ स्थानांतरित भऽ सुदूर पूर्वमे आबि एकटा भौगोलिक, राजनैतिक आ सांस्कृतिक इकाई केँ रूपमे प्रभुत्व स्थापित कएलक, जकर नामकरण “विदेह” भेलैक। कालांतरमे जखन जनक-राजवंशके उत्तराधिकारी जनक कराल भेला, ओ सुप्रतिष्ठित सामाजिक मान्यता आ परम्पराक अतिक्रमण कएलन्हि। तखन कराल जनक के जनता द्वारा हत्या कऽ देल गेल आ मिथिला मे एकटा सर्वथा नुतन शासन-प्रणाली (गणतंत्र प्रणाली) अस्तित्वमे आएल। विदेह गणतंत्र बनल आ एवम प्रकारे विदेह वृज्जिक संग गणतंत्र प्रणालीक प्रणेता बनल। एक समय जखन तुर्क अफगान युगमे भारतक उत्तरी भू-भाग पर मुगलक आक्रमण भऽ रहल छल ओहि समय मिथिला हिन्दु प्रशासकक अधीन अपन स्वतंत्र अस्तित्वके सुरक्षित रखवामे सफल रहल। एहि भू-खण्ड पर कर्नाट राजवंशक शासन 1097 ई० मे प्रारम्भ भेल तदुपरांत ओइनवार वंशक शासन आएल। पहिलबेर सन् 1324 ईस्वीमे तिरहुत/मिथिला, तुगलक साम्राज्यक अधीन भेल आ दरिभंगाक नाम तुगलकपुर कऽ देल गेल। बंगाल विजय अभियानके दौरान फिरोज तुगलक जखन तिरहुत पहुँचल, ओ कामेश्वर ठाकुरक अनुज भोगीश्वर के शासक नियुक्त कएलक, मुदा एहि समयक शासन व्यवस्था स्थिर नहि छल।
मुगल शासन आ महेश ठाकुर:
मुगल शहंशाह जलालुद्दीन अकबर द्वारा महेश ठाकुर केँ मिथिलाक राज सौंपल गेल, तखने सँ प्रारम्भ भेल खंडबाल राजवंश। एतय एकटा ऐतिहासिक दृष्टिकोण अछि जे अकबर अपन कूटनीति सँ मिथिलाक जे पूर्वहिंसँ अपन राजनैतिक ओ भौगोलिक अक्षुण्णता बनाकऽ रखने छल, तकरा विनष्ट कऽ देलक। दरभंगामे शाही फौजदारक नियुक्त्ति भेल, आब तिरहुतकेँ सुबा बिहारक भाग घोषित कऽ देल गेल। एहिसँ पूर्व मिथिला आ बिहार भिन्न छल। अकबरक कूटनीतिसँ मिथिलाक भूमि जकर अपन प्रकृतिक, भौगोलिक आ राजनैतिक स्वतंत्र स्वरूप छल तकरा ग्राहि लेल गेल एकर प्रतिकार कोनो रूपे नहि देखयमे आयल। अद्यावधि मिथिला बिहारक अंशमात्र बनि कऽ रहि गेल। एत्तहिसँ मिथिलाक अधोगति प्रारंभ भऽ गेल, तथापि मिथिला एखनहुँ अपना केँ एकटा सांस्कृतिक इकाई के रूपमे जीवंत रखने अछि। जखन शहंशाह अकबर कालमे एक लाख मालदह आमक गाछ लगाओल गेल जकर नाम देल गेल लक्खा जे कालांतरमे लौकहा नाममे परिवर्तित भऽ गेल, तहिना एक लाख बम्बई आमक गाछक बगीचा लक्खी लगाओल गेल जकर नाम कलांतरमे लौकही पड़ल।
मिथिला पर अंग्रेजी शासनक प्रभाव:
सन् 1764 ईस्वीक बक्सर युद्धक पछाति बंगाल प्रांतक संगहि-संग मिथिला, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनीक अधीन आबि गेल, मुदा ध्यातव्य जे आंग्ल प्रशासनक अधिनस्थतामे मिथिला अपन सांस्कृतिक क्षमता केँ अक्षुण्ण रखबामे सफल रहल। 1815 ईस्वीक आंग्ल-नेपाल युद्धक उपरांत भेल सुगौली_संधि जाहिसँ मिथिलाक राजनैतिक नक्शाके भारत ओ नेपाल के बीच विभाजित कऽ देल गेल, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंहक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आ स्वतंत्रता आंदोलनमे योगदान, विलुप्त होइत मिथिलाक्षर_लिपिक महत्ता आ मिथिलाक दयनीय स्थिति संगहि विकासक नव-दिशा सेहो देखौलन्हि अछि। लेखक कहैत छथि जे कोनहु क्षेत्रक स्वतंत्र अस्तित्वक हेतु ओतुक्का भाषा आ संस्कृति जीवित राखब परम आवश्यक अछि। जँ इ जीवित अछि तऽ जनता केँ जाग्रत होइतें ओ अपन आर्थिक आ राजनीतिक अस्तित्व पुनः प्राप्त कऽ लेत, मुदा सांस्कृतिक उपलब्धि श्रृंखला टुटि जएबाक उपरांत एकरा पुनः हासिल नहि कएल जा सकैत अछि। वर्तमानमे मिथिला भौगोलिक रूपेँ विखंडित अछि, आर्थिक रूपेँ जर्जर अछि आ राजनैतिक दृष्टिएँ अस्त-व्यस्त अछि, मुदा एतय सरस्वती केँ उपासक निवास रहल छथि, एतुका धरती उर्वरा सम्पन्न अछि, एहि क्षेत्रमे जलक प्रचुरता अछि जाहिसँ कृषिगत उद्योगकेँ लेल एतय अपार संभावना विद्यमान छैक। मिथिलाक स्वर्णिम भविष्यक प्रति लेखक आशान्वित छथि जे इतिहास अपनाके दोहराबैत छैक आ एकरे अनुपालनमे मिथिलामे नवयुगक निर्माण होयत आ महाकवि कोकिलक पंचम पुनः गुंजायमान होयत।
माहुरक पहिल खोराक मुगलिया शासन सँ शुरू भेल, लेखक मानैत छथि जे मिथिला प्रशासन पर खंडबाल राज्यारोहण मिथिलाक सूर्यास्त थिक, एहि कृत्यसँ अकबर मिथिलाके सूबा-ए-बिहारक हिस्सा घोषित कऽ देलक। माहुरक अगिला खुराक पाश्चात्य प्रणालीक सामन्तवादी इतिहासकारक आलेखक माध्यमे मिथिलाके देल गेल। अंग्रेज इतिहासकार वी. स्मिथ लिखि देलनि जे प्रजातंत्रक जनन-स्थल वैशाली अछि मुदा ऐतिहासिक रूपेँ ई अनर्गल आ मिथ्या छैक, लेखक कहैत छथि जे उत्तर वैदिक कालीन संस्कृति, पाणिणीक ग्रंथ अष्टाध्यायी, कौटिल्यक अर्थशास्त्र आ अश्वघोषक बुद्धचरित आदि बौद्धसाहित्यमे एकर स्पष्ट उल्लेख अछि जे प्रथम_गणतंत्र_विदेह_अछि। माहुरक अगिला खुराक मिथिला के आंग्ल-नेपाल युद्धक पश्चात सुगौली संधिक माध्यमसँ देल गेल। मिथिलाक अस्मिताके नष्ट करैक प्रयास एक बेर फेर भेल, मिथिलाके माहुरक अगिला खुराक भेटल आ इ खोराक छल खंडबाल राजप्रशासनक वर्नाकुलर भाषा नीति संबंधी सर्कुलर जाहिमे मैथिली भाषाके स्थान पर हिंदी भाषाके स्थान देल गेल। एकर कुपरिणाम इ भेल जे स्वाधीनता प्राप्तिक पछाति जखन राज्य पुनर्गठन आयोग बनल तऽ सब किछु रहितहु मिथिला प्रान्त नहि बनि सकल, जकर मूल कारण रहैक भाषाई आधार। मिथिला कृषिप्रधान क्षेत्र छल, मुदा स्वाधीनता प्राप्तिके बाद भारत सरकार अपन प्रथम प्रहार मिथिलाक कृषिवर्ग पर कएलक। जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के नाम पर प्रथम पांतिक कृषक वर्गक डाढ़ह तोड़ि देल गेल। जखन सन् 1951 ईस्वीमे सर्वोच्य न्यायलय मैथिलक पक्षमे (महाराजा कामेश्वर सिंह) निर्णय दैत एहि अधिनियम के गैरसंवैधानिक घोषित करैत एकरा निरस्त करैक आदेश पारित कएलक। तखन दिल्लीक कार्यपालिका अपन बात पर अडिग रहैक लेल संविधानमे प्रथम संशोधन तक कऽ देलक।
डॉ ग्रियर्सन आ मैथिली भाषा:
भाषाके अपन विषद अध्ययन सँ डॉ. ग्रियर्सन अपन लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डियामे स्थापित कऽ चुकल छथि आ जाहि भाषा के संवैधानिक अष्टम अनुसूचिमे जगह देल गेल छैक, जे नेपालक द्वितीय राजभाषा अछि, जे झारखंडक द्वितीय राजभाषा अछि तकर जन्मस्थलके हिंदी भाषी क्षेत्र मानल जाइत अछि, कारण बिहारके हिंदी भाषी क्षेत्र मानल जाइत अछि। एतुका बासिन्दाक मातृभाषा हिंदी नहि थिकैक परंच गणना हिन्दी भाषी क्षेत्रमे कएल जाइछ। सबकियो जानैत छी जे बिहारक जनसमुदायके मातृभाषा अछि मैथिली, भोजपूरी आ मगही। हिंदी एतुका राजकीय भाषा होय इ एक राजनैतिक फैसला छैक। लेखक कहैत छथि जे “लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई” मैथिली भाषाक संग ई यथार्थ अछि, शताब्दी लागि गेल मैथिली के अष्टम_अनुसूचीमे स्थान पाबैमे। साहित्यकार लोकनि साहित्य अकादमीक पुरस्कारेमे लटपटाएल छथि। मैथिली, कार्यालयक भाषा नहिं बनि सकल अछि जाहि सँ आमजनके सरोकार छैन्ह, संवैधानिक प्रावधान रहितहुँ हम सब एहि दिशामे कुनु ठोस कदम एखनधरि नहि उठा सकलहुँ अछि। लेखक, कहैत छथि जे वर्तमानमे ग्राम पंचायत, राजनीतिक सत्ताक प्रमुख केन्द्र बनि कऽ उभैर रहल अछि। अतः एतय कार्यालयमे मैथिलीक उपयोग अधिक सँ अधिक होयबाक चाही। जनता के अपन जनभाषामे अभिव्यक्ति के अधिकार छैक।
एकटा कहबी छैक जे प्रत्येक चारि कोसक दूरी पर भाषामे लघुआंशिक परिर्वतन होइत छैक, जार्ज ग्रियर्सन सेहो एहि संदर्भ के जिक्र कएने छथि, मुदा मैथिलीके संग राजनीति भऽ रहल अछि, मैथिलीके बांटल जा रहल अछि आ ओकर आस्तित्वके कमजोर कएल जा रहल अछि। वतर्मानमे मैथिलीके पश्चिमी मिथिलामे वज्जिका, पूर्वी मिथिलामे अंगिका आ दक्षिण भागमे खोरठा के नाम सँ दुषप्रचारित कएल जा रहल अछि। मुदा ई परम सत्य अछि जे इ सब मैथिली भाषाक स्वरूप/अंग अछि आ एकर क्षेत्रीय बोली अछि। लेखक एहि विषयमे एकटा व्यापक दृष्टिकोण रखलाह अछि, हिनक कहब छैन्ह जे एहि क्षेत्रके साहित्यके मैथिली साहित्यमे स्थान भेटबाक चाही। एतुका प्रकाशित रचना पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, यात्री पुरस्कार, चेतना पुरस्कार आदि लेल विचार कएल जाए। निःसंदेश एहि सँ एहि दिशा मे प्रतियोगिता कठिन भऽ जायत, मुदा एहि सँ मैथिली भाषाक सामर्थ्य बढ़त, शक्तिक वृद्धि होयत। लेखक, मिथिला क्षेत्रक बिगरैत पर्यावरणके स्थिति सँ सेहो निराश छथि, मिथिला पक्षीक वासक मामलामे धनी रहल अछि। पक्षी विशेषज्ञ चार्ल्स इंगलिश चारि दशकधरि एहि क्षेत्रमे रहिकऽ विशिष्ट अध्ययन कएलन्हि आ अपन अध्ययनक सार “जनरल ऑफ बंबईक नेचुरल हिस्ट्री” प्रकाशित करौलनि जाहिमे ओ कमसँ कम तीन सैय तेरासी प्रजातिक चिड़इक उपस्थिति दर्शौने छथि। मुदा वर्तमानमे कतेको प्रजाती विलुप्त भऽ चुकल अछि वा भऽ रहल अछि। लेखक एहि दिशामे भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य जकाँ मिथिला क्षेत्रमे अभ्यारण्य विकसित करैक बात कऽ रहलाह अछि।
मिथिलासँ बौद्धिक पलायन:
भाषाके महत्ता, हिनक निज भाषाके प्रति भाव-उदगार देखि लगैत अछि जे मैथिली आ मिथिला हिनक धमनीमे सदिखन प्रवाहित रहैत छन्हि। लेखक महोदय, आरक्षण/मंडल कमीशनक विभीषिका के बात कएलन्हि अछि। लेखक, एकरा मिथिलासँ बौद्धिक पलायन के कारण मानैत छथि। लेखक कहैत छथि जे एहि आरक्षण नीतिसँ मैथिल ब्राम्हण युवा के भक्क टुटलै आ ओ शहर दिस पलायन कएलक आ अपन योग्यताक अनुरूप रोजगार कऽ रहल अछि मुदा मिथिला पर एकर कुप्रभाव जबरदस्त भेल छैक, अधिकांश युवा मिथिलासँ कटि जेबापर आतुर छथि। लेखक कहैत छथि जे मातृभाषा मैथिलीक माध्यमे एहि दिशामे संगठित होइक प्रयास कएल जा सकैत अछि।
मानव-संशाधनक सबसँ पैघ निर्यातक मिथिला अछि। एतहिसँ अशिक्षित, अर्धशिक्षित, शिक्षित, सुशिक्षित आ प्रशिक्षित मैथिल सब भारत नहि सर्म्पूण विश्वमे पसरल छथि। लेखक आशावादी छथि, ताहिँ विश्वास छैन्ह जे एक-नै-एक दिन मिथिलाक दिन सेहो घूरत।
स्वतंत्रता आंदोलनमे मिथिलाक योगदान:
स्वतंत्रता आंदोलन मे मिथिलाक भूमिका पर चर्चा करैत, स्वतंत्रता आंदोलनमे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंहक योगदान अविस्मरणीय अछि। एक समय छल जे महाराज काँग्रेस के सबसँ पैघ वित्त प्रदाता रहथि। एहि संदर्भमे लेखक एकटा घटना केँ जिक्र कएलन्हि अछि जे जखन इण्डियन नेशनल काँग्रेसक चतुर्थ अधिवेशन 1888 ईस्वीक 26 सँ 29 दिस्म्बर धरि इलाहाबादमे होएबाक निर्णय भेलैक, अंग्रेज सरकार सँ खुसरो बागमे अधिवेशन अनुमति मांगल गेल छल, मुदा अंत समयमे अंग्रेज सरकार मुकरि गेल। अधिवेशनक मार्गमे ई एकटा विचित्र समस्या उत्पन्न भऽ गेल रहैक। काँग्रेसक दूटा पदाधिकारी एहि समस्याके लऽ कऽ #महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह लग एलखिन्ह। महाराज तुरंत एकरा संज्ञान लैत भरोस देलखिन्ह जे काँग्रेसक अधिवेशन पूर्वनिधारित समयसँ होयत आ एहिके लेल तुरंत इलाहाबादके नवाबसँ बात कऽ “लॉदर कैसल” लीज पर लऽ अधिवेशनक लेल उपलब्ध करा देलखिन। ओहि समयके तत्कालीन अखबार हिन्दू पैट्रियॉट अपन 31 दिसम्बर 1888 के संपादकीयमे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंहक भूरि-भूरि प्रशंसा कएलक।
मिथिलाक गाय, मानव जीवनक सामाजिक आ सांस्कृतिक जाहि आयाम पर नजरि फेरबैक ओतहि अहाँके अपन मिथिला-संस्कृतिक विशिष्टता स्वतंत्र रूपेँ परिलक्षित होएत। मिथिलाक गाय के संबंध मे अति महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक आ तर्कसंगत अछि, जे संस्कृतक वत्स शब्दक मैथिलीमे तद्भव शब्द बनल छैक बाछा, जखन सरकार-ए-तिरहुतक गठन भेलैक तँ एकगोट परगनाक नाम देल गेलैक “बछौर” संभवतः पहिलबेर ई विशेष नाम ओहि क्षेत्रमे रहै बला पशु जातिक नस्लीय नामपर भेल रहैक, दिल्ली सल्तनक धरिक ध्यान एहि ओर आकर्षित भेल छल। वर्तमान मे ई क्षेत्र सीतामढ़ी जिलाक पुपरी अनुमंडलक कोइली-नानपुर आ एकर पार्श्ववर्ती गाम सब अछि, जे इ वयाह नानपुर थिक जकरा कर्णाट वंशक राजा नान्यदेव, मिथिलाक राजधानी बनौने छलाह। ई वैज्ञानिक तथ्य छैक जे मानव हेतु जे कोनो खाद्य पदार्थ अछि ताहिमे मात्र गोदुग्ध अछि जे एक पूर्ण आ संतुलित भोजन थिक। नंदनी संतति गायक दुधमे मनुष्यक शरीरक लेल सब आवश्यक तत्व भेट जाइत अछि। एतय गाय केँ मायक दर्जा देल गेल अछि। 1857 ईस्वीक गदरक पछाति अंग्रेजी शासन प्रत्यक्ष रूप सँ स्थापित भऽ गेल। एतुका गायके उपयोगिता केँ देखैत सन् 1858 सँ 1906 ईस्वीक बीच भारत सँ 266 साँढ़ आ 22 गोट गाय संयुक्त राज्य अमेरिका भेजल गेल छल आ एहि सँ गायक एकटा उत्तम प्रजाति विकसित कएल गेल जकरा नाम “ब्राह्मण गाय” राखल गेल। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघक प्रादुर्भाव भेल आ एकर एकटा शाखा स्थापित कएल गेल जकर नाम अछि “फुड एण्ड एग्रिकल्चरल ऑर्गेनाइजेशन”, जे अपन पहिल बैसारमे भारतीय धेनु-वंशक अनुवांशिक गुणक सर्वेक्षण आ अध्ययनक फैसला लेलक। 1953 ईस्वीमे प्रकाशित डब्लू. फिलिप्स आ एन. आर. जोशीक पोथीमे पृष्ठ संख्या 256-276 पर बछौर प्रजातिक पूर्ण विवरण भेटैत अछि। भारत सरकारक “एनिमल हसबैंड्री विभाक कैरेक्टर्स एण्ड परफार्मेंसज ऑफ बछौर कैटल” प्रकाशित कएलक अछि जाहिमे स्पष्ट लिखल अछि जे इ प्रजाति मात्र मिथिले मे पाओल जाइत अछि। लेखक कहैत छथि जे इ केहेन बिडम्बना अछि जे, जखन सम्पूर्ण विश्व मिथिलाक गायक प्रजाति पर अध्ययन आ शोध कऽ गायक नस्लीय सुधारमे लागल छल तखन हम सब अनभिज्ञ भऽ बेसी दुग्धके उत्पादनक मोहवश जर्सी आ फ्रिजियन नस्लीय गाय आनि रहल छलहुँ। सोना केँ गिल्लट सँ प्रतिस्थापित करैक प्रयास मे लागल छलहुँ।
दहेज प्रथा: दहेज प्रसंग समाजक बदलैत परिवेश आ फॉल्स-इगोइज्म के कारण दहेज बढ़ल अछि। सत्यनारायण भगवानक पूजाक महत्वपूर्ण बात, जे पृथ्वीक दुइ गोट गति छैक, वार्षिक आ दैनिक। सत्यनारायण भगवान पूजाकालमे प्रदक्षिणाक समय दुनु गतिक प्रयोग होइत रहल अछि, मुदा आब इ विशिष्ठ प्रथा लुप्त भऽ चुकल अछि। संगहि मिथिलाक महिला द्वारा तुलसीमे जल देबाक परिपाटी सेहो लुप्तप्राय भेल जा रहल अछि। लेखक अतीत केँ स्मरण करैत कहैत छथि जे देवोत्थान एकादशी दिन बालक केँ विद्यारंभ कराओल जाइत छल, तहिना बालिका केँ मिथिलाक चित्रकलाक पहिल पाठ एहि दिन आंगनमे रंग-बिरंगक अरिपन के माध्यम सँ होइत छल। छठि पूजाक मादे लेखक कहैत छथि जे इ पूजा मात्र हिंदु टा नहि मनबैत छल मैथिल मुस्लिम समुदाय सेहो एहि पूजामे सम्मिलित होइत छल। सहिष्णुता के इ पराकाष्ठा आब भेटब दुर्लभ।
मिथिलाक विशिष्ट व्यंजन माछ: जखन आंग्ल-नेपाल युद्ध केँ उपरांत सुगौली संधि भेल तखन नेपालमे जे मिथिलाक क्षेत्र चलि गेल ओतुका मैथिल लोकनि भारतक मैथिल केँ ‘मोगलान मैथिल’ कहैत छलाह। मैथिलक मत्स्य प्रेम, जे मत्स्य-मांस, आहारक रूपमे कश्मीरी ब्राह्मण, बंगाली ब्राह्मण आ मैथिल ब्राह्मणक बीच सदैव प्रमुख रहल अछि। हाँ, एतय प्याज आ लहसुन वर्जित छल। मैथिलक माछक रेसिपी कने विशिष्ट अछि एतय सरिसो आ आमिलक प्रयोग मसाला जकाँ कएल जाइछ, हींगक छौंक आ ताहि पर जमीरी नेबोक मेजन, बेजोड़ अछि।
मैथिली भाषाक विलक्षण मौलिकता - संस्मारणात्मक उल्लेख, जखन, डॉ. उमेश मिश्र, मिथिला रिसर्च इन्स्टीच्युटक प्रथम निदेशक नियुक्त भऽ प्रयागसँ दरभंगा अयलाह। एतय हुनक पहिल छात्र छलथिन अनन्तलाल ठाकुर। ठाकुर जी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तानसँ विस्थापित भऽ मिथिला आएल छलाह। श्री मिश्र जीक साहित्य संग्रहमे 300 सँ अधिक संस्कृत भाषाक ग्रंथ छल जकर लिपि मिथिलाक्षर छलैक। ठाकुर जी एहि पर एकटा पोथी ‘कैटलॉग ऑफ संस्कृत मैन्युस्क्रिप्ट इन मिथिला’ लिखलैन्हि, एहिक्रम मे ओ पौलाह जे इस्टीट्यूट मे उपलब्ध मनुस्मृति आ मिश्रजी लग उपलब्ध मनुस्मृतिके स्क्रिप्ट जे मिथिलाक्षरमे लिखल रहैन ओहि मे इ बात नहि लिखल छल जे ‘शुद्रक कानमे जँ शास्त्रक वचन वा प्रणवाक्षर पड़ि जाय तँ ओकर कानमे शीशा पिघलाकऽ देल जाय’। एहि संदर्भमे ठाकुर जी कहने रहथिन जे अंग्रेजी-शासन, अपन सत्ता सुरक्षित रखैक लेल अपन एजेंटके माध्यमसँ पंडित लोकनि सँ सम्पर्क कऽ मैनुस्क्रिप्ट इकट्ठा करैत छल आ ओकरा अपन सुविधानुसार दुरुपयोग करैत छल। मनुस्मृतिके ओ पुरान स्क्रिप्ट एकर प्रत्यक्ष प्रमाण छल। इ कहैमे कोनो अतिश्योक्तिमे नहिं जे अपन शासन अक्षुण्ण रखैक कोशिशमे अंग्रेज लोकनि मनुस्मृतिके मूल केँ नष्ट कऽ एकर जाली प्रति जारी कएने होय। लेखक कहैत छथि जे स्वतंत्रता प्राप्तिके बाद सम्पूर्ण देशमे अकारण ब्राह्मण केँ दुश्मन घोषित कऽ देल गेल आ एकर नाम देल गेल मनुवाद, मुदा एकर असली कारण छल जे सुचिता, कर्तव्यपरायणता, त्याग, मनोबल आ बौद्धिक मार्ग पर ब्राह्मणसँ मुकाबला करबाक क्षमता एहि वर्गके नहि रहैक। बस खाली पाँच हजार वर्षक कपोल कल्पित अन्यायक नाम पर एक अंग्रेजक गढ़ल असत्य के आधार बना मनुवाद कहि ब्राह्मण अर्थात विशिष्ट बुद्धिक स्रोत के कतिया देल गेल।
लक्ष्मण संवत -मध्यकालीन युगमे जखन सम्पूर्ण भारतवर्ष पर मुसलमानी अधिपत्य छल ओहि युगमे मिथिला, तिरहुतक नामे राजनैतिक आ सांस्कृतिक अस्तित्व सुरक्षित रखबामे सफल रहल, मिथिलामे संस्कृत भाषामे विभिन्न विषयमे प्रचुर लेखन भेल आ एहि लेख सभमे यत्र-तत्र लक्ष्मण संवतक प्रयोग दृष्टिगोचर होइत अछि। महाकवि विद्यापति सेहो अपन लेखनीमे बार-बार एकर प्रयोग कएलन्हि अछि। एहि संदर्भमे ऐतिहासिक तथ्य बहुत बारिकी सँ रखलाह अछि। मुदा लक्ष्मण संवत बेसी समयधरि प्रचलने नहि रहल, कारण मिथिला पर मुगलिया अधिपत्य के बाद नव संवत प्रचलनमे आयल। भारतमे शक संवत्, विक्रम संवत् आ ईस्वी सनक चलनसारि तँ अछिए मुदा विशाल भारत देशमे नववर्षक लेल भिन्न-भिन्न तिथि अछि। मिथिलाक पंचांगक अनुसार सालक प्रथम दिन अछि साओन मासक कृष्ण पक्षक प्रतिपदा। एकर कारण अछि मुगल सल्तनत तेसर बादशाह अकबर द्वारा महेश ठाकुर के मिथिलाक कर-प्रभार साओन मासमे देल गेल रहैन्ह। एकर ऐतिहासिकता केँ दर्शाबैत लेखक कहैत छथि जे भनहि अनजानहिमे, मिथिला-पंचांगक संबंध पैगंबर मोहम्मदक मक्कासँ मदीना जएबाक साल आ अकबर के राज्यारोहणक साल सँ जुड़ल अछि।
मैथिली भाषा आ मिथिलाक्षर:
बचपन सँ जल आ अछिंजल दू पृथक वस्तु वुझैत अयलहुँ अछि। इ मिथिलाक संस्कृति केँ विशिष्टता अछि। तहिना लेखक मिथिला आ मिथिलाक्षरक विशिष्टताक बात कएलाह अछि। लेखक कहैत छथि जे भाषा ओकर लिपि संस्कृतिक एकटा विशिष्ट अंग होइछ। मुदा समयक साथ मिथिलाक्षर कमजोर होइत गेल। लेखक कहैत छथि जे स्वतंत्रता प्राप्तिके पछाति धरि मिथिलाक्षरक प्रयोग स्वजनके निमंत्रण-आमंत्रण पत्रमे होइत छल, बाबा लोकनिक कालमे आपसी पत्राचार मिथिलाक्षरमे होइत छल, जे शनैः शनैः विलुप्त भऽ गेल। लेखक कहैत छथि जखन ओ विद्यार्थी छलाह तखन स्नातकक पाठ्यक्रममे 50 नम्बर के प्रश्नपत्र मिथिलाक्षर सँ संबंधित रहैत छल। लेखक मिथिलाक्षर मिथिला मिहिरक अन्तिम पृष्ठ पर देल गेल मिथिलाक्षर वर्णमाला सँ सीखलाह। हुनक मिथिलाक्षर सीखब व्यर्थ नहिं गेलन्हि, मिथिलाक्षर ज्ञान होयबाक कारणे बांग्ला साहित्य पढ़ैमे कोनो दिक्कत नहि भेलैन्ह। मैथिलीक स्वतंत्र अस्तित्वक रक्षार्थ परम आवश्यक जे एकर विशिष्टता के संरंक्षण करी। लेखक कहैत छथि जे आँजीक प्रयोग मैथिली आ मिथिलाक्षर के अन्य भाषा-लिपिसँ विशिष्ट बनबैत अछि।
निष्कर्ष:
मिथिलाक इतिहासक लेल मैथिली साधनक हेतु खोज करए पड़त कारण एकर एकटा अविच्छिन्न प्रवाह वैदिक कालसँ अद्यावधि बनल अछि। मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु उपरोक्त सभ साधनक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण अपेक्षित अछि। एहि भूमि हेतु प्रयुक्त विदेह तथा मिथिला नामक उत्पत्ति विशुद्धत: पौराणिक अछि। जूलियस एग्लिंगक अनुसार प्राचीनकाल में ई भू-भाग आर्यलोकनिक निवासस्थल अतिपूर्व में छल। कहल जाईत अछि जे उक्त प्रदेश अपन नाम सरस्वती तीरसँ आगत राजा विदेघ माथव अथवा विदेह माधव सँ पओलक। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार विदेघ माथव अपन पुरोहित गौतम रहुगणक संग सरस्वतीक तटसँ सदानीराक (गण्डकीक) तटपर आबि सर्वप्रथम अग्निकेँ प्रज्वल्लित क’ एहि भूमिकेँ पवित्र कयलनि। ई सत्य जे माथवक आगमनक पश्चात अनेक ब्राह्मण एतय अयलाह। फलत: एहि भूमि पर कृषि प्रारंभ भेल तथा यज्ञ द्वारा अग्निकेँ सन्तृप्त कयल गेल। महाकाव्य तथा पुराणसभक वंशावलीमे द्वितीय राजाक रूपमे परिगणित मिथि वैदेह माथव विदेघक परिलक्षक थिक। पौराणिक वंशावलीक अनुसार अयोध्याधिपति मनुक पुत्र निमि एहि यज्ञ-भूमिमे अयलाह। हुनकर पुत्र मिथि अपन नामपर मिथिला नामक राज्यक स्थापना कयलनि। नगर निर्माणक क्षमता रखबाक कारणेँ ओ जनक नाम सँ प्रख्यात भेलाह। ईहो कहल जाइछ जे मन्थनक बाद उत्पन्न होयबाक फलस्वरूप हुनक नाम मिथि राखल गेलनि। असामान्य जन्मक कारणेँ ओ जनक कहओलनि तथा पिता अशरीरी रहबाक कारणेँ विदेह। एहि तरहेँ हुनक नामक आधारपर एहि प्रदेशक नाम मिथिला पड़ल।
संदर्भ:
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8. Jha, Pankaj Kumar (2010). Sushasan Ke Aaine Mein Naya Bihar. Bihar (India): Prabhat Prakashan. मूल से 28 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 4 फ़रवरी 2019.
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अस्तु।
डॉ दीपेश कुमार ठाकुर,
शिक्षाविद, प्राध्यापक (अंग्रेजी) मानविकी
डीआईटी विश्वविद्यालय, मसूरी रोड, देहरादून, भारत
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Suggested citation: डॉ. दीपेश कुमार ठाकुर. “मिथिलाक इतिहासक वैज्ञानिक अध्ययन एवं ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 374, 2023-07-15. https://www.videha.co.in/research/2023/374/मिथिलाक-इतिहासक-वैज्ञानिक-अध्ययन-एवं-ओकर-समीक्षात्मक-विश्लेषण.htm

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