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पाथरपर दूभि उपजाबैत राग-भावक अन्वेषक लक्ष्मण झा 'सागर'
लक्ष्मण झा 'सागर' चिर-परिचित रचनाकार छथि। ओ कोनो परिचयक मोहताज नहि छथि। ओ जे लिखैत छथि से जमि कऽ लिखैत छथि। फेसबुक होअए वा कि पोथी। पत्र-पत्रिका सभमे हिनक रचना 1968 ई. सँ प्रकाशित होइत अछि। ओ मिथिला मिहिरसँ अपन रचना प्रकाशित भेनाइ प्रारंभ केलनि। कविता, कथा, संस्मरण, भेंट-वार्ता, टिप्पणी इत्यादि ओ लिखलनि। युगक अनुकूलें समयकेँ देखैत टटका-टटकी विभिन्न विषयादिपर हिनक रचना आएल अछि। ओ चिंतन-मनन कऽ सचेत ढंगे कागतपर रचनाकेँ उतारैत छथि। ज्वलंत मुद्दापर कलम चलाएब हिनक लेखनीक विशेषता कहल जाएत। हिनक जीवन पारदर्शी अछि। स्वच्छ अयनामे अंकित होइत छवि जकाँ झलकैत। मुदा रचनामे गतिमयता अछि आ जीवनक स्पन्दन हिनक रचनाकारकेँ ऊर्जस्वित करैत अछि। जँ हिनक रचनाकेँ पढ़ैत जाएब तँ अनायासे हिनक व्यक्तित्व ओ कृतित्व संबंधी विषय-वस्तु सभ झलकिये उठत। ओ घटित घटनाकेँ आधार बना कऽ लोकक सोझाँ प्रस्तुत करैत छथि। सामान्य लोकक अभिव्यक्ति हिनक रचनामे प्रस्फुटित होइत अछि। लोक व्यवहारक भाषाकेँ उठा कऽ लोक माध्यमे जन-समर्थन देब हिनक विशेषता छनि। तँइ जन सामान्यक प्रति हिनक लोक व्यवहारपरकतामे साकारात्मक आ भावनात्मक रहल अछि। कही तऽ योग्य पिताक प्रभाव योग्य पुत्रपर पड़बे कएल अछि। हिनक नाम लक्ष्मण झा थिकनि। 'सागर' तऽ ओ लेखक-बंधु लोकनिक देखा-देखी वा कही तऽ श्रद्धेय साहित्यकार जीवकांतजीसँ प्रेरित भऽ रखलनि। भेल ई जे मिथिला मिहिरमे कतिपय लेखक जनकेँ अपन नामक संग उपाधि रखबाक चलन बेस भऽ आएल छल। ओहो अपन उपाधि रखबाक हेतु लुसफुसेलाह। जीवकांतजीक साफ कहब रहनि जे अहाँ ऊर्जस्व रचनाकार, अपन पहिचान बोध करेबाक लेल एकटा स्वतंत्र उपाधि राखू। ओ 1969 ई. मे रमानंद सागर"सँ प्रभावित भऽ कऽ अपन उपाधि 'सागर' रखलनि। दोसर ईहो प्रमाणिक तर्क छलनि जे एक गाममे एक नामक आनो लोक रहैत छथि। तँइ लोक नै धोखाए एहि हेतु ओ लक्ष्मण झा 'सागर' नाम राखि रचनारत भऽ गेलाह। ई नाम लेखनमे जगजियार होइत चर्चित भऽ गेल अछि।
हिनक गाम ठढ़बितिया छनि जे घोघरडीहा प्रखंडमे मधुबनी (बिहार) जिलान्तर्गत अछि। एहि गाम चौहद्दी अछि-उत्तर सांगी, दक्षिण-पिरोजगढ़, पूब-तिलाठ, आ पश्चिममे सुदइ। हिनक जन्म मामा गाम बेलौंचा जे मधेपुर, मधुबनी अंतर्गत अछि ताहि ठाम 1 अप्रैल 1953 ई. केँ भेल छलनि। ओ अपन मामाक ओहिठाम रहि कऽ बेलौंचासँ प्राथमिक शिक्षा- दीक्षा ग्रहण केलनि आ पिरोजगढ़ मध्यविद्यालयसँ होइत भोला उच्च विद्यालय ड्योढ़सँ 1969 ई. मे मैट्रिक उतीर्ण भेलाह। 1962 ई. जखन ओ पाँचम वर्ग छात्र रहथि तही समयमे भारत-चीन युद्ध भेल छल। मारवाड़ी समाजक धीया-पूता सेहो पिरोजगढ़ मध्यविद्यालयक छात्र छल। ओ सभ अपन फोटो खिचबौलक। बालक लक्ष्मण झा मोन सेहो फोटो घिचएबाक लेल ललचा गेल। ओ अपन माएसँ चारि आना कैंचाक माँग केलनि। हिनक माए गंगा देवी अपन पति तारकेश्वर झाकेँ पाइ लेल कहलखिन। हिनक बाबूजीक स्पष्ट उत्तर छलनि-"फोटो घिचएबाक एहन सौख छैक तऽ एहन कूबत हासिल करए जे लोक अनायासे फोटो घिचबाक लेल उद्धत होअए। तँइ हिनका पहिने किछु बनबाक छनि से बात सुनिते लक्ष्मण झाक जीवनमे एकटा नव मोड़ एलनि जे ओ आब फोटो नहि घिचेताह। ओ तेहन बनताह जे आने लोक हिनक फोटो घीचत। हिनक जीवनमे घटित ई अविस्मरणीय घटना आइयो हुनका मोन छनि आ अरबधि कऽ अपन फोटो समान्यतः घिचएबासँ परहेज रखैत छथि। ओ लकीरक फकीर नहि बनलाह आ पठन-मननमे अपन ध्यान केंद्रित कऽ लेलनि। ओ अपन बाबू जीक कहल बातकेँ गेंठ बान्हि लेलनि जे जीवन भरिमे आठ-दस टा सिनेमा देखने होथि तऽ सएह बहुत। 2017 ई. मे जखन अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा "बाबू साहेब चौधरी सम्मान" देल गेलनि तऽ हुनका अपन बाबू जीक कहल बात मोन पड़िते आँखि नोरा गेलनि से बाबू जीक स्वाभवक चलते। जीवनमे केखनो कोनो एहन घटना भऽ जाइत छैक जे अविस्मरणीय होइत छैक। लोक चाहियो कऽ नहि बिसरि सकैत अछि। एक समयक कचोट हिनका चोट की पहुँचेलकनि जे यदा-कदा आइयो मनोमस्तिष्कमे झंकृत भऽ जाइत छनि। हिनका तँइ कहियो तेना भऽ कऽ अपन फोटो घिचएबाक तेहन सौख-मनोरथ नहि रहलनि एवं आइयो ओहि सभमे समय नहि गमबैत छथि। एक तऽ नौकरीक व्यस्तता दोसर पठन-मनन, लेखनमे समय व्यतीत करबाक धुन माथपर सवार छनि। ओ फेसबुक धड़ा-धड़ चलबैत छथि, मोबाइलक भरपूर उपयोग करैत छथि मुदा हृदयक संवेदनशीलता आ तरलता जे प्रवाहित भऽ रचनाक माध्यमे उभारैत छथि से सौख ओ अबस्से पोसने छथि। लक्ष्मण झा जखन भोला उच्चविद्यालय, ड्योढ़क छात्र छलाह 1967 ई. मे तखन 'वनभोज' शीर्षकपर निबंध लिखबाक प्रतियोगिता भेल। आध घंटाक समय छल। ओ सहर्ष भाग लेलनि। लोचन बाबू (महरैल, मधुबनी) आ पशुपति बाबू (माँउबेहट, मनीगाछी) शिक्षक छलाह। लोचन बाबू लग मूल्याकंन हेतु कॉपी जमा भेल। हिनक कॉपी देखबाक भार पशुपति बाबूकेँ भेटलनि। ओ गदगद भऽ 92 अंक दऽ हिनक निबंधकेँ सर्वप्रथम घोषित केलनि। बात ई भेलैक जे लोचन बाबू हिनक कॉपी एहि द्वारे पशुपति बाबूकेँ देने रहथिन जे ओ सत्य-सहज आ सुबोध भाषामे लिखने रहथि। गमैया बोली-चालीक भरपूर प्रयोग केने रहथि। लोचन बाबू साहित्यिक भाषाकेँ महत्व देथि आ पशुपति बाबू ठेठ मैथिलीक पक्षपाती रहथि। जे किछु गुरुक आशीर्वाद कही तऽ हिनक प्रतिभाक लोहा मानि ओ नीक अंक देने छलथि।
हिनकामे सहयोगक भाव बेस प्रबल अछि। से केतेको स्तरपर। ओ लेखन कार्यमे नीकसँ नीक लिखबाक हेतु प्रकाशित करबाक हेतु यदा-कदा नव लेखक-लेखिकाकेँ मार्ग प्रदर्शन करैत छथि तऽ नौकरी किनको नौकरी धरेबामे सेहो सहयोग करैत छथि। ओ जनैत छथि जे पेटक समस्या पहिने लोककेँ कूटैत छै। तँइ हिनक सहयोग भाव ओहन साहित्यिक लोकक लेल प्रबल भऽ जाइत छनि। श्री नबोनारायण मिश्र एवं आजित आजाद आदि तऽ उदाहरणे बनल छथि जे ओ अपन लेखनिमे व्यक्त केने छथि। तहिना अपन सहयोगी छात्र शिव चंद्र झा 'शिव'केँ क्रांतिकारी कविता पढ़बाक उकसौने की छलाह जे सभाकक्षमे थपड़ीक गड़गड़ाहटि गूँजि उठल।
ओ भावुक हृदयक लोक छथि तँइ भावनाक उधियानमे उधियाइत छथि। एहि क्षण ओ जीवन यथार्थक वास्तविकतासँ दूर चल जाइत छथि। कखनो कऽ विद्रोही उफान सेहो जोर मारैत छनि। आवेश आ भावुकतामे लेल गेल निर्णय हिनक जीवनक अंत कऽ देत सेहो ओ बिसरि जाइत छथि। ओ जानि-बूझि कऽ पाथरपर दूभि उपजाबऽ चाहैत छथि कारण 1969 ई. मैट्रिकक परीक्षा समयमे हिनका मात्र एकल पैजामा पहिरबाक लेल छलनि। तमोरिया हाइ स्कूल परीक्षाक केंद्र रहनि। ओ दोसरो पैजामा चाहैत छलाह मुदा आर्थिक विवशता जे दोसर पैजामा नहि भेटि सकलनि तऽ आत्मनिर्णय लेलनि। भागल-पड़ाएल निछोहे बाते ओ ट्रेनमे कटबाक लेल ओ दौगल जाइत छलाह। बाट बीच हिनक संगी अली हुसैनक बाप खट्टर हिनका हकासल-पियासल धड़फड़ाइते देखलकनि तऽ पूछि बैसलनि-"कतऽ पड़ाएल जाइत छह?"
बाल-सुलभ छात्र जीवनक अवस्था। ओ चोट्टहि बाजि उठलाह "कटै लेल ट्रेनमे जकर एबाक समय भऽ गेल छैक" आ ओ पैजामाक बारेमे सेहो कहलखिन। ई सुनिते खट्टर अवाक रहि गेल आ हिनक डेन धरैत कहलक- एही लेल कटबह? चल हम दोसर दैत छियौक। खट्टर दर्जी रहए। ओ परबोधि कऽ अपन घर आनि कऽ दोसर पैजामा देलकनि तऽ हिनको नव उमेरक भूत उतरलनि।
हिनक पिता V.L.W केर नौकरी छोड़ि कऽ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीक सक्रिय अभिकर्ता रहथि। ओ नेपालक जहलमे माननीय कर्पूरी ठाकुर, धनिक लाल मंडल, मधुलिमये , रमानंद तिवारी, रामनारायण तिवारी आदिक संग रहथि। स्वाभिमानी पिताक स्वाभिमानी पुत्र लक्ष्मण झा 'सागर' आइयो इमानदारीक पथपर अग्रसारित छथि। कथनी-करनीमे हद धरि समानता छनि। ओ नेनपनमे चंसगर छात्रमे परिगणित होथि। मैट्रिकमे ओ पैंतीसम स्थान पेलनि जखन कि विद्यालयमे sent up exam मे प्रथम स्थान पेने रहथि। आइ.ए मे द्वितीय श्रेणी भेल छलनि। तकर कारण जे ओ ट्यूशन ओहि प्राध्यापकसँ नहि पढ़लनि। प्रो. सत्यनारायण सिन्हाजीक ट्यूशन केर धंधा रहनि आ विद्यार्थीकेँ नीक अंक दिएबामे महारत हासिल छलनि।
हम पूर्वहि कहि चुकल छी जे हिनक आर्थिक स्थिति नीक नहि रहनि। बेरोजगार पिता से आन्दोलनी। राष्ट्रभक्तिक खातिर अपन भविष्यकेँ देश-प्रेमक पीड़ीपर चढ़ौलनि। जान-मालक परवाह नहि केनिहार। ई गौरव बोध जइँ रहलनि तँइ हुनके प्रसादात् किछु बनबाक जोर मारैत रहलनि। मैट्रिकमे ओ छात्रावासमे रहैत छलाह। तकर कारण छल जे छात्रावासक शुल्क आ भोजनक समस्या हिनका छात्रवृतिक कारणे माफ कऽ देल गेल रहनि। कॉलेज जीवनमे सेहो अपन छात्रवृतिक भरोसे पढ़ि सकलाह। 1973 ई. मे रामकृष्ण महाविद्यालय, मधुबनीसँ बी.कॉम प्रतिष्ठा उतीर्ण कऽ कलकत्ता गेलाह जे ओतऽ चार्टर एकाउंटेंट बनब। ओ 1 जनवरी 1974 केँ कलकत्ता एलाह। समस्या नाम लिखेबाक रहनि। सिफारशी पत्र जीवकांतक रहनि। ओ बाबू साहबे चौधरीक नामे सहयोग करबाक हेतु पत्र देने रहथिन। जीवकांतजीक कृपापात्र एहि हेतुएँ छलाह जे एक तऽ ओ मेधावी छात्र रहथि, दोसर गामक पड़ोसिया आ तेसर ड्योढ़ अर्थात जीवकांतक गामक हाइस्कूलक छात्र। सर्वोपरि इएह भाव मोनमे एलनि जे ओ साहित्यकार रहथि। स्थापित साहित्यकार जीवकांतजीक ई पत्र हिनक संबल छलनि। ओना ए.सी.दीपक (नेहरा)क "मातृवाणी" पत्रिकामे प्रकाशित होइत छलनि ताहिमे हिनको आ बाबू साहेब चौधरीक रचना प्रकाशित भेल छलनि। हिनका तऽ चौधरीजीक नाम सुनल छलनि मुदा भेंट-घाँट नहि। ओना ओ अपन श्वसुरक डेरापर राजा बजारमे रहथि। हिनक विवाह जे बेलौंचा गाममे भेल छलनि माने मामे गाममे। मामा सभ जमींदार रहथिन आ श्वसुर सभ दबंग रहथिन गामक। विवाह हेबाक कारण जे मामा सभ अपन स्वार्थ आ सुरक्षा हेतु भागिनक विवाह करौलनि जे सागरजी अनिच्छापूर्वक कएल। दोसर, ओ विवाहसँ भागले रहथि। मुदा पढ़ाइक खर्च वहन करबाक भार श्वसुर गछने रहथिन। 10 मार्च 1972केँ हिनक विवाह भेलनि। जे किछु हिनक ससुर बाबू साहेबकेँ चिन्हैत रहथिन। चौधरीजी ततेक लोकप्रिय रहथि जे कलकत्ताक मैथिल समाज हिनका तरहत्थीपर रखैत छलनि। कारण छल जे ओ दस-उपकारी रहथि। दसगर्दा लोककेँ नौकरी रखबौलनि। मिथिला-मैथिलीक आन्दोलनी रहथि आ समर्पित संगठनकर्ता। हिनक ससुर जिला निरीक्षक रहथि से अंग्रेज जमानाक। वएह हुनका चौधरीजीसँ खेलात घोष लेन, कलकत्तामे भेंट करबौलखिन। जीवकांतजीक पत्र छलनि- हिनका मदति करबनि तऽ से हमर मदति होयत। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक अछि जे सागरजीक पहिल मैथिली रचना 'कोयलाबाली' अछि। 1969 मे मिथिला मिहिर रचना 'बुढ़िया' प्रकाशित भेलनि। हिंदीमे कविता 'चाय के बाद' 1968क आर्यावर्तक रविवारीय अंकमे प्रकाशित भेलनि। जें कि लक्ष्मण झा 'सागर' सचर साहित्यकार रहथि तँइ चौधरीजीकेँ ई नाम सुनल-बुझल छलनि। चौधरीजी हिनका ठाकुर एंड कंपनीमे नाम लिखबा देने रहथिन बाँकी खर्च हिनक ससुर वहन करैत छलखिन। हिनक ससुरक डेरा राजा बाजारमे रहनि।
हिनका बाबू साहेब चौधरीजीसँ संपर्क की भेलनि जे चुम्बकीय पदार्थकेँ जेना कोनो चुम्बक अपना दिस आकर्षित कऽ लैत अछि तहिना चौधरीजी हिनका अपना दिस आकर्षित कऽ लेलखिन। फेर की छल, ओ मिथिला-मैथिलीमे निःस्वार्थ भावें लागि गेलाह। मिथिला दर्शनमे ओ अप्रैल 1974सँ सहयोग करऽ लगलखिन। 1975 ई. केर घटना थिक जे हिनक नाम सह-संपादक रूपमे चौधरीजी प्रकाशित करऽ चाहैत छलखिन मुदा आरो दोसर नाम जेना शुकदेव ठाकुर, रामलोचन ठाकुरक पक्षमे छलाह। दूनू गोटेक बीच मत पड़ल। सागरजीकेँ 44 आ ठाकुरजीकेँ 30 टा मत भेटलनि। बाबू साहेब चौधरीकेँ रामलोचन ठाकुरसँ कनारि रहनि। ओना तऽ चौधरीजी कोनो खास पंथी नहि छलाह मुदा ठाकुरजी वामपंथी रहथि से विचार आ दृष्टि दूनूमे। जे किछु, सागरजी पढ़ेबो करथि। सी.ए इंटर केर एकटा ग्रुप उतीर्ण भेलथि आ किछु ट्यूशन कऽ धनोपार्जन करथि। छात्रवृतिमे मात्र 60 टाका भेटनि। आर्थिक अभावकेँ देखैत बाबू साहेब चौधरी, हनुमान झा (Vice president, Hindustan Development Corporation) मे नौकरी धरा देलखिन। हनुमान झा गंगाद्वार गामक रहथिन। ओ नौकरी पकड़लनि।
1983 सँ 1997 धरि ओ आसाममे सेहो वएह नौकरी केलनि। ओहि समयावधिमे उल्फा उग्रवादी चरमसीमापर छल। जँइ कि लक्ष्मण झा 'सागर' ओहि कम्पनीमे नीक पदपर छलाह, भव्य वक्तित्व रहनि तँइ उच्च ओहदाक व्यक्ति बूझि उग्रवादी लोकनि कथन जे कंपनीसँ बेसी धन दियाउ नहि तऽ सपरिवार काटि देब। हिनका धमकाओल-डेराओल गेलनि। ओहना आसामक दुःस्थिति इएह जे उग्रवादी चरमविन्दुपर नृशंस काज करैत नहि हिचकैत छल। सागरजीक सशंकित परिवार। संयोगवश 2006 मे हिनक कंपनी बंद भऽ गेल मुदा हिनक कर्मनिष्ठ आ इमानदार हेबाक गुणकेँ देखि-परेखि रामगोपाल रमगड़िया मारवाड़ी हिनका एही कम्पनीक सिस्टर कंसर्नमे रखबा देल कलकत्तामे। ई नव कंपनी छल Neo Metaliks (रूपा होजियरी एकरे छै)। एहि कंपनीसँ 2012 ई. मे सेवानिवृत होइतो आइ धरि सागरजी सलाहकार रूपमे कार्यरत छथि। ईहो कहब अतिश्योक्ति नहि हएत जे ओ सी.ए केर पढ़ाइ-लिखाइसँ बेसी बाबू साहेब चौधरीक प्रश्रयमे पत्रिका एवं अन्य गतिविधिमे विशेष समय देबऽ लागल रहथि। स्वाभाविक छैक जे पठन-पाठनमे कमी बोध भेलनि आ समयाभाव कारणे सी.ए पूरा नहि कऽ सकलथि। तें कि, जाहि लेल जे पार्ट सी.ए केर केलनि ततबेमे नीक यश, प्रतिष्ठा आ ओहदा भेटलनि। हिनक मूँह केखनो मलिन नहि भेलनि आ ने पछताइते रहलथि। मिथिला-मैथिलीक अखंड ज्योति जे हृदयमे धधकैत छलनि से आइयो छनि। हिनका संतोष रहनि जे मिथिला-मैथिलीक लेल ओ किछु कऽ रहलाह अछि आ से करबे केलनि।
रहरहाँ देखल जाइत अछि जे नीक पद आ नीक पाइ लोककेँ गौरवान्ध बना दैत अछि। ओहन लोक मदान्ध भऽ अपनोकेँ बिसरि जाइत अछि। मुदा, लक्ष्मण झा 'सागर'केँ कहियो कोनो घमंड नहि भेलनि। सरल हृदयक लोक। ओना प्रशासनिक क्षमता अबस्से गुरू-गंभीर बनौने रहलनि। ओ जहिना मिथिला-मैथिलीक लेल अपन शोणित सुखौलनि तहिना दक्ष भऽ कंपनीक काज सुतारैत छथि। ओ बहुभाषी छथि। हिनका बंगला, अंग्रजी, हिंदी, संस्कृतक सेहो नीक ज्ञान छनि।
ओ कोनो आन भाषासँ परहेज नहि रखैत छथि मुदा मातृभाषा मैथिलीक मूल्यपर कोनो समझौतावादी गप्प पसिन्न नहि छनि। इएह अटूट प्रेम हिनका आन भाषाक प्रति उदासीन बना दैत छनि। तें मैथिलीमे बाजब, पढ़ब-लिखब आ उन्नतिक बाट प्रशस्त करबामे अपनाकेँ झोंकि देने छथि। खास कऽ गमैया ठेठ शब्द आइयो पियरगर छनि। ओ गाम-घरकेँ नहि बिसरल छथि। ओ अपन रचनामे कतिपय हेराएल-भुतिआएल शब्दकेँ मोन पाड़ि कऽ प्रयोग करैत छथि जाहिसँ अर्थ-ध्वनिमे, छवि-छटा आरो सुरभित भऽ अबैत छनि। ईहो कहबामे हमरा परहेज नहि अछि जे मैथिलीमे जतेक शब्दकोश अछि से प्रायः हिन्दी शब्दकोशक उल्टा अछि। ओना डा. रामदेव झा अबस्से ठेठ मैथिलीक किछु शब्दकेँ संजोगने छथि। आइयो जे मोनमे साबिकक शब्द उचरत तऽ से साइते शब्दकोशमे भेटत। मैथिलीक अपन शब्दकोश हेबाक खगता अछिए। एहि लेल हिनके सन-सन आरो रचनाकारक ठेठ मैथिली शब्दक ताक-हेर करऽ पड़त। गाम-घरक साक्षर-निरक्षरक मुँहसँ बहराइत ठेठ शब्दकेँ लोढ़ए-बीछए पड़त। ई श्रमसाध्य काज थिक। जा धरि सुच्चा मैथिलीक शब्दकोश नहि होएत ता धरि बहुतो बिलाइत शब्दसँ लेखक-पाठकगण अनभिज्ञ रहबे करत। ईहो गछैत छी जे शहरुआ भाषा मिश्रित संस्कृति थिक। शहरमे विभिन्न भाषाक फेंट-फाँट भऽ गेलासँ अपन मैथिली भाषा दुर्बल भेल अछि। कहब जे भाषामे गतिमयता हेबाक चाही, से अबस्से हेबाक चाही मुदा जखन अपन भाषामे नीकसँ नीक शब्द अछि से नहि छोड़बाक अछि। अपन भाषाक मूल्यपर आन भाषा वा शब्दकेँ अपनाएब गलत हएत। लेखक-साहित्यकारक दायित्व थिक जे ओ अपन भाषाक शब्दकेँ ताकि-हेरि कऽ आनथि तखने रचनात्मक सौन्दर्य आ महत्ता बढ़त। हिनका आन भाषाक भाषिक आ सांस्कृतिक गुलाम होएब से मैथिलीक मुद्दापर कहियो पसिन्न नहि छनि। लोक भाषक प्रयोग हेबाक चाही। इएह कारण थिक जे हिनक व्यावहारिक भाषा सामान्यो जन बुझैत अछि। हिनक भाषा अपन शब्द विन्यासक फलस्वरूप अर्थवाही आ जनबोधक अछि तँइ सर्वमान्यो अछि। जँ आनो भाषाक शब्द अछि तऽ सेहो रचि-पचि कऽ आएल अछि। तँइ ओ मैथिली भाषाकेँ उच्च स्थानपर प्रतिष्ठापित करैत अछि, नहि कि दोयमपर। नव मूल्य आ नव दृष्टिक स्थापनामे हिनक निष्ठा आ प्रतिबद्धता झलकैत अछि। ओ स्वयं अपन पोथी आ पत्र-पत्रिकादि कीनैत छथि आ दोसरोसँ एहन अपेक्षा रखैत छथि। ओ संस्था आ संगठनादिक आकांक्षी छथि जे मिथिला-मैथिलीक हितमे होअए। ओ एहन कर्मठ लोककेँ धन-बलसँ सहायतो करैत छथि मुदा जखन धनकेँ ऐंठबाक वा अपव्यय हेबाक होइत अछि, अपन घर भरबाक बात होइत अछि तऽ ओ फाँड़ बान्हि कऽ कलमसँ ललकारितो छथिन। प्रायः देखल जाइत अछि जे गलत बात हिनका नहि सोहाइत छनि। तँइ लल्लो-चप्पो पसिन्न नहि पड़ैत छनि। ओ स्वार्थमे आकंठ डूबल लोकसँ घृणा करैत छथि। प्रायः देखल जाइत अछि जे लोक तिकड़म बलें सम्मान आ पाइ केर उगाही करैत छथि। चमचागिरीमे एहन लोक जी-हजूरी करैत अछि। जें कि ई सभ हिनका पसिन्न नहि छनि तँइ ओहि सभसँ कन्नी काटि अपने धुनमे मस्त रहैत छथि। एहन कतिपय दुर्जन लोकक आँखिमे फुटलियो नहि सोहाइत छथि। सुच्चा साहित्य, साहित्यकार एवं आन्दोलनकारीक प्रति हिनक हृदयमे शुद्ध प्रेम अछि तऽ नकलचीक प्रति घृणा-भाव अपार। ओ जनैत छथि जे मिथिला-मैथिलीक लेल जे केओ काज करैत अछि से किछु ने खिछु खेबे करत। पेटमे जुन्ना बान्हि कऽ काज नहि करत। मुदा सभटा भकोसि लेत अर्थात धनदास वा दासी बनि भोगवादी बनत तऽ एहन लोकसँ ओ घृणा करैत छथि। खास कऽ हिनक मोन आरो दुखी भऽ जाइत छनि जखन ओ देखैत छथि आ अनुभूतिक स्वरें कहि उठैत छथि-
"साहित्यिक ठीकेदार जहन जोंक भऽ जाइ छै
तँ बड़ दुख होइ छै
छपायल पोथी जखन फोंक भऽ जाइ छै
तँ बड़ दुख होइ छै
"बड़ दुख होइ छै" नामक कवितांश (एहि गदहबेरमे)
हिनक एखन धरि चारि गोट पोथी प्रकाशित छनि- उचरि बैसू कौआ (2010), एहि गदहबेरमे (2020) ई दूनू कविता संग्रह, कनसोह (2021, मैथिली कथावार्ता) आ चारिम छनि जेना ओ कहलनि (2021, साक्षात्कार संग्रह)। प्रकाशन पथपर प्रेसमे छनि- मिथिलाम (निबंध संग्रह), अक्षत चानन (संस्मरण), जखन जे जेना (टिप्पणी संग्रह), घुघरू मट्ठा श्याम (कथा संग्रह) आ पत्राचार (पत्र संग्रह) आदि। जे ओ लिखैत छथि से गद्य आ पद्य दूनू। हिनक लिखल बेसिए गद्य अछि आ से गद्य हिनकर रुचिगर छनि। पद्यमे ओ तुकांत पसिन्न करैत छथि। ओ स्वयं कहैत छथि जे अरुचिमे हम अतुकांत लिखै छी। हमरा जनैत ओ बात-बातमे बखलोइया छोड़बैत, बातक बतलोलामे तेना कऽ सामान्यो बातकेँ रखै छथि ओ असामान्य भऽ जाइत छै। तँइ ओ किछु नहि कहितो बहुत बेसी कहि दैत छथि। ओ विशिष्ट कवि छथि जे सामाजिक विसंगतिकेँ उठबैत सामान्यो भाषामे सपाट ढंगे आम जनक पीड़ा आ छटपटाहटिकेँ उधेसि कऽ राखि दैत छथि।
खास कऽ संघर्ष आ जिजीविषा अबस्से प्रकट होइत अछि। आर जे-से भखरैत आपसी संबंध, टूटैत परिवार, आ अपन सभ्यता-संस्कृतिकेँ जड़िसँ उखड़बाक बोध संगहि सत्ता आ पूँजीक आपसी गठजोड़ आदि उभरि कऽ हिनक समकालीन रचनाक क्षमताकेँ आरो मारक बना दैत अछि। ओ कुव्यवस्थाकेँ चिर्रीचोंत करबाक उद्येश्यें लिखैत छथि- हम काठी खड़रब, दीपशिखा लेसबाक लेल, अगरबत्तीक सुगंधि लेल, आ मोमबत्ती जरेबाक लेल, अपन समस्त समानधर्माक अर्धशताब्दीपर (अपन अर्धशताब्दीपर, उचरि बैसू कौआ)। प्रतिरोधी साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपराकेँ ओ आधुनिकतामे राखि कऽ वैचारिकताक माध्यमे ओ कविताक स्वर बुलंद करैत छथि। सहज भावें कविताक सपाटताकेँ लेबाक थिक। जँ मात्र कथनक रूपमे हएत तऽ ओ कविता ठीक नहि थिक। ओ बतकहीमे छोट-छोट बतकथनकेँ लऽ कऽ छोट-छोट कथा लिखैत छथि। एहिमे दैनिन्दिन जीवानाभूतिपरक घटना अबस्से देखल-भोगल यथार्थानुभूति परक अछि। कथाकारक ई विशेषता जे ओ समसामान्यपरक घटनाकेँ जनानुभूतिक बना दैत छथि। जँइ जनसमूह अपन जीवनक कथा बुझैत अछि तँइ जनसंवेदना मानवीय मोनकेँ छुबैत अतल गहराइ धरि पहुँचि पबैत अछि। कही तऽ पहिचान बनबैत अछि संगहि पाठकीयतामे अपन उपस्थितिबोध करबैत अछि। हिनका जखन जे मौका भेटैत छनि तकरा अपन कथासूत्र बना कऽ ताहि ढंगे प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य लोकक चित्तमे बैसि जाइत अछि। हिनक व्यग्रता तखन आरो बढ़ि जाइत छनि जखन "अपन भाषा आ संस्कार तऽ अलोपित भऽ रहल अछि" (कनसोह-59)। वस्तुतः ओ साहित्यकेँ साधना बुझैत छथि, साधन नहि। तँइ हिनक विचार बुझबाक योग्य थिक। ओ साक्षात्कार लेल मिथिला-मैथिलीक विभिन्न विभूति, विद्वतजन, लेखकगण आ नव भविष्यक नवीन डेग उठौनिहार सभसँ विचार लऽ ओकरा कागतपर उतारैत रहै छथि। नव समाज, नव राष्ट्र आ खास कऽ मिथिला-मैथिलीक उत्थानमे सहायक हुअए। कैक ठाम ओ कैकटा कटु सत्य सेहो उभारैत छथि जे ओहि साक्षात्कर्ताक आत्ममुविमुग्धताकेँ सेहो प्रदर्शित होइत अछि। तात्पर्य जे हिनक रचना बहुत किछु कहि दैत अछि। जँइ ओ जनसरोकारसँ संबंध रखैत छथि तँइ आइयो हिनक रचनाकार सक्रिय छनि। ओ तऽ स्वयं एहन राजनेता चाहैत छथि जनिक एक स्वरमे संपूर्ण मिथिलावासी फाँड़ बान्हि कऽ समरमे कूदि पड़ए।
ओ केकरो किछु बिगाड़ै नहि छथि। मुदा ठाँहि-पठाँहि कटु सत्य बजबाक कारणे अपन कतिपय दुश्मनकेँ पोसि लेने छथि। भावुक हृदयक ओ लोक कतबो विवेकशीलताक संग संयममे रहऽ चाहैत छथि, रहितो छथि तैयो हिनकासँ कतिपय जन नफा उठा कऽ पीठ पाछाँ अवहेलित करैत छथि। मुदा सागरजी अपन काजमे मग्न-मस्त रहैत छथि। ज्ञानीजनक आगाँ धनबल, बाँहिबल अर्थात मुँहगर-कनगरकेँ के पूछए? धन-विभव आ वैभव सेहो फीका भऽ जाइत अछि। तँइ सागरजी उफनितो सागर सदृश शान्त भऽ जाइत छथि। हिनक मनमे रंचमात्रो लेश नहि रहि जाइत छनि आ दुश्मनोकेँ गरा लगा लेबाक लेल आतुर रहैत छथि। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक अछि जे ओ सामाजिक लोक छथि। समाजक लोककेँ नीक जकाँ चिन्हैत-बुझैत छथि। समाजक, देशक सीदित-पीड़ित लोकक मानसिकताकेँ अपन रचनामे उभारैत छथि। बात-बातमे दुख भेलापर जँ ओ व्यथित होइत छथि तऽ से स्वाभाविके। कारण अपन बाबूजीक किछु कहल-सुनल बातपर सेहो गेंठ बान्हि कऽ भागि पड़एबाक हेतु विवश भेल रहथि। तँइ की, हुनकहि प्रेरणा स्रोत पाबि ओ कहियो अपन स्वाभिमानकेँ बन्हकी नहि धेलनि आ ने सत्यपथक बाट छोड़लनि। ओ जनकल्याणक भाव लेने संपूर्ण परिवेश आ वातावरणकेँ गमगमाबऽ चाहैत छथि।
ओ अपनाकेँ साहित्यकार मानथु वा कि नहि मुदा ओ सुच्चा रचनाकार छथि। कोनो रचनाकारक रचना जखन अपन बुत्तापर प्रकाशित होइत छै तऽ रचनाकारक पतक्खा ऊँच होइत अछि। कही तऽ अपन पहिचान बनबैत अछि। रचनाकारक बीच समादृत लक्ष्मण झा 'सागर' अपन रचनात्मक क्षमतासँ उपस्थिति बोध करौने छथि। मिथिला-मैथिलीक एहि ध्वजवाहककेँ के नहि समादृत करत? खास कऽ हुनक यश, कीर्ति, लोकप्रियता, यथाशक्ति तथाभाव बेस प्रबल आ असीम अछि जखन कि हुनक सोझाँ हमर कलम आ बुद्धि ससीम अछि। एहिना ज्येष्ठ-श्रेष्ठ पाथेय बनथि से अभिलाषा बनल रहिते अछि। हिनक किछु इच्छा एना छनि- मिथिला, रहए, मैथिली पढ़ए, कृषि-प्रधान रहए, आ सर्वोपरि प्राथमिक शिक्षासँ लऽ कऽ उच्च शिक्षा धरि मैथिली हो।