विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ'

रमेश · 2023-11-15 · अंक 382 · पृष्ठ 106–114

रमेश-संपर्क-7352997069
सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ'
वरीय कवि लक्ष्मण झा 'सागर'क पहिल काव्य-संग्रह 'उचरि बैसू कौआ', जे 2010 ई.मे छपल छल, तकर आलोचक आ विद्वत्वर्ग द्वारा, उचित आ गंभीर संज्ञान अतेक वर्ष धरि प्राय:, नहिए लेल गेल। आब आइ एक-एक रचना के इकाइ मानि, विस्तृत समीक्षा भ' रहल अछि, से मैथिली समीक्षा-आलोचनाक जड़ताक भयावह आ दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितिकेँ प्रमाणित करबाक लेल, एकटा तथ्य थिक। स्व.सत्यानन्द पाठक द्वारा 'मंजू पाठक मेमोरियल ट्रस्ट' केर सौजन्य सँ प्रकाशित, साठि टा कविताक संग्रह मे, लेखकक व्यय नहि भेल छलनि,..आ से संग्रह कोनो टा नामवर समीक्षक द्वारा अ-मूल्यांकित रहि गेल, जखन कि कविक अपेक्षा छल, जे 'पोथी छपलाक बाद ओ वस्तुतः कवि बनि सकताह'। से 'अपेक्षा-पूर' कतेक भेलनि, आ कि पोथीक संग कवियो उपेक्षित आ अचर्चित रहलाह ?
मुदा एहन ओ मैथिली मे असगर नहि छथि। आइयो अपन वित्त-व्यय सँ, लेखकगण एक-सँ-एक पोथी छपबैत छथि आ तकर गंभीर समीक्षा-समालोचना नहि लिखा पबैत अछि, अपितु साहित्यो- क्षेत्रक सभ व्यक्ति पढ़ैत नहि छथि। एना सागरजीक 'गुट-निरपेक्ष' रहलाक कारणे भरिसक, भेल अछि। कारण, कविता-संग्रहक कविता सभक आधार पर, सागरजी नव, आधुनिक आ प्रगतिशील विचारधाराक कवि प्रमाणित भेलाह अछि। त' की, अल्प-सक्रिय वा 'गुटबन्दी-क्रियाकलापहीन कविक' मूल्यांकन नहि हो?
ई केहन परंपरा विकसित भ' रहल अछि मैथिली मे? पुरातनपंथी जीर्ण-काव्यक समीक्षा, अतिशयोक्तिक संग, यत्र-तत्र छपि जाइत अछि, आ अपन युगक, समकालीन युग-सत्यक व्याख्या करैत कविता-संग्रह उपेक्षित रहि जाय, त' सक्षम समीक्षकगण आ समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लागब, स्वाभाविके अछि। कारण, विमर्श त' अनेक कारणे, भइये नहि पबैत अछि। पोथीक अपन सारगर्भित 'अनुशंसा' मे, डॉ.वीरेन्द्र मल्लिक एहि ’प्रखर चेतना-सम्पन्न, समकालीन, बेछप नाम' बला कविक पोथीक, 'हुलसि क' स्वागत करबाक अपेक्षा' केलनि, से त' 'अपेक्षे' रहि गेल। एहना स्थिति मे, स्व.सत्यानन्द पाठक (गुवाहाटी) सन आन प्रकाशक, दोबारा कोना 'साधंस' करताह?
तखन कविक पोथी-'समर्पण' मुदा, ध्यातव्य जरुर अछि। ओ 'अक्षर-बोध करा, सक्षम कवि' बनौनिहार, ’सम्पूर्ण समाज आ परिवार' के, पोथी समर्पित करैत छथि। आ अपन 'आहे-माहे' मे, 'लेखनक रणनीति'क सुस्पष्ट खुलासा करैत छथि, जे ओ 'स्वान्तः सुखाय नहि लिखि, झोंकियल लेखन' सँ परहेज करैत, एकटा 'अक्षर-पुरुषक धर्म जकाँ, लिखैत छथि। हुनका कवि बनबाक रहनि, तँ पत्नीक प्रेरणा सँ, 'पोथी-प्रकाशन-ब्योंत' धरौलनि अछि।
आ तेहन साहित्यिक प्रतिबद्धता बला कविक पोथीक, आलोचना-संवर्ग द्वारा संज्ञाने नहि लेल जायब, मैथिली साहित्यक नैराश्यपूर्ण परिस्थितिकेँ साबित करैत अछि, जखन कि कविगण कोनो आर्थिक- अपेक्षा नहिए रखैत छथि। मैथिली मे अप्पन पाइ सँ पोथी छपाब' बला जतेक लेखक छथि, ताहि सँ कम क्रेता-विक्रेता आ प्रकाशक छथि। पाठक त' घटले जा रहल छथि, आ 'स्वर्गारोहित लेखक' बढ़ले जा रहल छथि। तखन समीक्षक कतेक हेताह? आ हेबो करताह, त' अपना गुटक लेखकक समीक्षा लिखताह। ककरो कर्जा थोड़े खेने छथिन, जे...?
समीक्ष्य काव्य-संग्रह मे, पोथीक शीर्षकक नाम सँ कोनो कविता संकलित नहि अछि। तें पोथीक शीर्षकक नामकरण, रचना-आधारित नहि अछि। शीर्षक के, 'कुचरि, बैसू कौआ' हेबाक चाहैत छल, जे मिथिला-समाज मे, 'विद्यापति गीत' अथवा 'परदेसी पिया'क माध्यमें, जनमानस मे पूर्व-स्थापित अछि। 'उचरनाइ वा उचारनाइ' त', 'खड़ी उचारि भविष्यवाणी करबाक परंपराक, अवशिष्ट'- शब्द थिक।
तखन बंगाल-असम मे,एहन वैकल्पिक शब्द, भइयो सकैछ। मुदा पैघ बात ई थिक जे, सागरजीक 'कौआ', काकभुशुण्डी जकाँ, मिथिलांगन मे काव्य कुचरैत अछि, रंग-विरंगक सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि। सागरजीक कौआक काव्यमय सामाजिक सरोकार, संग्रहक मोटा-मोटी सभ कविता मे व्यक्त भेल अछि।
संग्रहक आरम्भहि मे, काव्य-सम्बन्धी अपन अवधारणा के, पहिले कविता मे व्यक्त करैत, अपन काव्य- लेखनारंभक, अनेक प्रारूपक व्याख्या करैत छथि। किशोर-वय मे सौन्दर्य-शृंगार सँ उद्भूत कविता, सम्पूर्ण जीवनक रंग-विरंगी 'कोलाज' बनबैत, 'कैंची-बला कतरनी-भूमिका' के खारिज करैत, 'माला गँथबाक सुइया' बनि जाइत अछि।
ई सृजनात्मक दृष्टि, हिनक कविता-संग्रहक 'प्रस्तावना' थिक। कोनो औसत व्यक्ति आ कवि जकाँ, हिनको जीवन मे, मायक महत्वपूर्ण स्थान भेलनि अछि। आ तें तत्सम्बन्धी तीन टा कविता (माय, माय हमर गंगा, सिरमा लग टाँगल मायक फोटो) संकलित अछि, जे पाठक के झकझोड़ि क' राखि दैत छै। तीनू कविता मे, मायक पारिवारिक हैसियतिक आ विविध प्रारूपक यंत्रणा-भोगक कारूणिक चित्रण आ संवेदनाक घनीभूत अभिव्यक्ति भेल अछि। मिथिला समाजक माय- संवर्गक, पिता द्वारा आ परिवारक सभ सदस्य द्वारा शोषण होयब, जीवनक विविध चरणक कारुणिक चित्र अंकित करैत अछि। 'मातृरूपेण संस्थिता' बाली मिथिलाक माय त', गंगे होइते छै, जकर कचोटैत स्मृति सँ, बेटा नजरि नहि मिला सकैत अछि। मैक्सिम गोर्कीक 'माय' हो वा अशोकजी (आलोचक- कथाकार) के, रूस-प्रवास मे भेटल 'माय' (धरती गोल छै), वा होथि सागरजीक माय, माय संवर्गेक विश्वजनीन रूप, एहने होइत रहलैए। तें यंत्रणा भोगैत पारंपरिक मायक वात्सल्य-स्वरूप, 'नीक' त' अछि, मुदा, 'नव' नहि। एहेन अनेक लेखक/लेखिका अपन 'महान मायक' एहने 'त्यागी आ यंत्रणा-भोगी मायक छवि' अपना कविता-कथा मे, स्थापित केलनि अछि। से 'वात्सल्य-स्वरूपा' होइतहिं छै 'माय', अपना संतान लेल, बरु अनका लेल जेहेन हो। तखन 'आजुक मिथिलाक मायक संवर्ग' मे, 'खलनायकीक घुसपैठ' भेल अछि, सेहो एकटा तथ्य थिक। भाय-भाय, बेटा-बेटा आ पुतोह-पुतोहु मे विभेद करैत 'माय', पौत्र-पौत्री, पुत्र-पुत्री आ नाति-नातिन मे 'विभेद करैत' 'माय'/मैयाँ केर संज्ञान, के लेत? मैथिली काव्य-साहित्य सँ, अनुपस्थिते जकाँ अछि, से यथार्थ। तखन जिबैत मायक, विविध सृजनात्मक स्वरूप सँ ल' क', 'मुइल मायक सकारात्मक आ जीवंत स्मृति'क उद्घाटन, मार्मिक आत्म-स्वीकृतिक संग, जखन कोनो 'सागर-हृदय' कवि करत, त' ओकर अनुभूति वैयक्तिक नहि रहि, सामूहिक भइये जाइत छै।
मुदा पिताक चरित्र-चित्रण मे, एकभगाह नहि रहलाह अछि कवि। पिताक जीवनक विविध प्रारूप आ चरणक वा विरोधाभासी क्रियाकलापक, संक्षिप्त आ शब्द-विन्यासी काव्य-शिल्प ('बाप') मे, पिताक 'पीड़ित' आ 'पीड़क', दुनू यथार्थ स्वरूपक काव्य-चित्रक संयोजन केलनि अछि कवि। 'चाण्डाल-स्वरूप, तसफेंट्टा आ थाड़ी फेकैत बाप, किंवा पति', रहरहाँ अछि, गाम- गाम मे।
से ताहि पुरुष-संवर्गक काव्यमय उपस्थापन, 'बेसी इमानदारीक संग', भेल अछि-'सागर-काव्य' मे। ताही पुरूष-संवर्गक अभगदशा जखन, वृद्धावस्था मे बेटा-पुतोहु द्वारा, 'निरसू काकाक सुखरात्रि' के, 'भुक्खल दुःखरात्रि' मे बदलि क' होइत अछि दियाबातीक राति मे, त' जीवनक चारिमपन मे व्यंग्य आ करूणा मिझहर भ' जाइत अछि। आ मेंही शोषण सँ, 'दुर्दशा-काव्यक' जन्म होइत अछि, मिथिला समाज आ मैथिली साहित्य मे, एक संग। वैह पुरुष-संवर्ग, पचासो विरोधाभासी स्वरूप मे, 'भाइ' बनि क' प्रवहमान तुकबन्दी काव्य-शिल्प मे, सक्षम शब्द-संयोजन मे, काव्य-रूपायित होइत छथि, त' पुरुष-संवर्गक खलनायकी सँ, निर्मल-पाठक परिचित भ' जाइत छथि। सम्बन्ध-बन्धक कड़ी मे, अग्रिम काव्य-लक्ष्य बनैत अछि पति-पत्नी सम्बन्ध, जकरा काव्य-वस्तु बनायब कोनो कविक लेल अत्यधिक साधंस के बात थिक। बहुत कवि 'प्रेम-व्यथा' भोगितो, अइ विषय के अस्पृष्य मानैत रहैत छथि, त' कएटा कवि 'नाढ़र' भ' क' 'प्रेम' के 'सेक्स' बना क', ताजीवन भोगैत छथि। आ ताहि विषय के गोपन बना क' रखबाक रणनीतिक अन्तर्गत, विमर्श करबाक लेल, 'नाक पर माँछी' नहि बैस' दैत छथि।
नाढ़र' नामक कविता, 'स्त्री-पुरुष सम्बन्ध' मे, व्यभिचारक सुन्दर काव्य-व्याख्या करैत अछि, त' 'अहाँ, हमरा आब नहि सोहाइत छी' मे, नैहरक वासंती-कोमलांगी 'चन्द्रमुखी', जे सासुर (पतिक गाम) मे आबि क' 'सूर्यमुखी', हन-हन-पट-पट करैत, नाक सुकरैत, '63' स' '36' बनैत, बढ़ैत अद-पद-दायित्व सँ, करुणा सिरजैत अछि। विभिन्न चरण मे, प्रेमक पतझड़क सनगर काव्य-वर्षा, 'धूआँ मूआँ' लग आबि क', प्रेमक अतीत-वर्तमानक सौन्दर्य-बोधक व्याख्या लग आबि, हारि मानि लैत अछि। प्रेम-वर्णन मे, हिनकर कविता मे वीभत्स-रसक प्रयोग, विरल भेल अछि।
'नाक पर माँछी', नामक कविता मे, 'पति-पत्नी सम्बन्ध' मे, विभिन्न चरण मे, वयस्क-प्रभावक आकलन करैत, एक-सँ-एक झाँपल आ गोपन रहस्यक, काव्यमय अभिव्यक्ति भेल अछि, जे पति-पत्नीक पैघ रसगर/नीरस जीवनक, सप्रसंग व्याख्या प्रस्तुत केलक अछि।
'औजी महाराज' मे, 'जीवनक सौन्दर्य-बोध' मे 'काव्यक सौन्दर्य-बोध' आ 'स्त्री-पुरुष सम्बन्धक सौन्दर्य-बोध' मे, आस्थाक गुंफन एना उतरल अछि, जेना जनवादी- काव्य मे शृंगार- रसक परिपाक भेल हो। तहिना, सासुरक परिवर्तित होइत स्नेह-समीकरण, ’होटल मे रहैत', पारिवारिक जीवनक स्नेह-सूत्रक स्मृति, 'सेहेन्ता' मे पतिक सेहेन्ताक सार्वजनीन दर्द, 'आह। आह।' क' उठैत अछि। एतावता, दाम्पत्यक संग, सम्पूर्ण पारिवारिक जीवनक टूट, परिवारक सभ सदस्यक पीड़ा- भोग, सम्पूर्ण सम्बन्ध-बंधक समकालीन यथार्थ, विरोधाभासी विडंबनापूर्ण परिस्थितिक करुण काव्यमय अभिव्यक्ति, अनेक कविता मे, जमि क' भेल अछि। 'बेवस्था' आ 'कहबौ त' लगतौ छक् द', दुनू गजल थिक, जकर एहि संग्रह मे स्थान नहि हेबाक चाहैत छल। तहिना 'बरखा' 'हथचिट्ठी' आ 'बकरीक आत्मालाप', विशुद्ध गीत हेबाक कारणें,अइ संग्रह मे उकड़ू अछि, तें एतय विवेच्य नहि अछि। नवकविताक दृष्टिएँ, ई कविता-संग्रह अपना-आप मे, परिपूर्ण अछि। मैथिली आन्दोलनक पोखरि मे, मरसम्पय माँछ रहलाक बावजूदो, बिनु बोरेक बन्सी पाथल जेबाक कारणे, बेर-बेर मछहरि विफल भ' जाइत अछि। ताहि पाखण्डक दोसरो कविताक, दुनू लजकोटरि कुमारि-कन्या, सम्पुष्टि करैत अछि, जकर आपसी प्रेमक कोनो परिणाम (समलैंगिक हेबाक कारणें) असम्भव अछि।
एहि पाखण्ड के पुनः 'नहि चाही पाखण्ड' केर पाँचो कविता, प्रकारान्तर सँ, देखार करैत अछि, जे मिथिला समाज मे विद्यमान अछि। आकंठ मोह-ग्रस्त सासुक अध्यात्म-पाखण्ड हो, वा मैथिलानीक व्रत-उपवास आ सोमालियाक भूखमरी वा 'अहिंसा-भावें' भरिपेट्टा माँछ खेनाइ,वा महींस आ गायक दूहब मे अन्तर करबाक पाखंड हो, बात एक्कहि थिक। तहिना पुरुषक पाखण्डग्रस्त मानसिकता, जे,घर मे जकरा 'सरभेंटनी' कहैत अछि, तकरे सड़क पर 'कोमलांगी' बुझैत अछि, कें, देखार करैत अछि कविता- 'काजक लोक'। समाज मे बहसल लोकक विभिन्न प्रकारक भ्रष्ट आ व्यभिचारी प्रवृत्ति पर, रंडी-प्रवृत्ति पर(रंडी) कविता लिखय मे कमाल के कथ्य-चयन भेल अछि। जानवरो सँ गेल-गुजरल प्रवृत्ति, मनुक्खक भ' गेल अछि।
तहिना भरुआ-प्रवृत्ति (हाँजी- हाँजीबला मानसिकता)पर, आक्रामक चोट अछि, 'भरुआ' नामक कविता मे। पंचसाला राजनीति-तंत्रक खलनायकी-हिजरापनकेँ धरगर आ गहींर व्यंग्य सँ नाथल गेल अछि, 'हिजरा' नामक कविता कें। 'अपन अर्द्ध-शताब्दी पर' कवि कें, कोनो औसत परिवार-प्रधाने जकाँ अनुभव होइ छनि छिन्नमूल हेबाक, जिनगीक कटु यथार्थक परिभाषा बुझबाक, सन्तानरूपी टटका दहीक अम्मत भ' जेबाक। तें मरीचिका भगेबाक लेल वा समानधर्माक अर्द्ध-शती मनेबाक ब्योंत मे मोमबत्ती जरेबाक लेल, सलाइक-काठी खरड़ब, सृजनात्मताक प्रतीक थिक। जिनगीक 'एक लग्गा सुरुज' ऊपर उठि गेला पर, जखन झलफल मे आँखि चील्ह कें हवाइ जहाज बूझ' लगैए, उदास प्रिया के खड़खड़ तरहत्थी सँ, पीठक घम्हौड़ी कुड़िएबाक आह्वान, सकारात्मक आ आशावादी आह्लादक प्रतिपादन थिक। 'पन्द्रह अगस्त'क दर्द, आम जनजीवन मे, न' अगस्त (नागासाकीक विध्वंस)क दर्द ल' क' अबैत अछि आ लोक, निवासी मनुक्खक बदला 'खरबन्ना डीह' केर भाग्य देखैत अछि। 'महाप्रयाण', पूर्ण ध्वंसक भयावह विस्तारित यथार्थक परिकल्पना थिक। 'सन्तति' मे, गागर मे सागर भरल गेल अछि। सेहो, बेटीक पक्ष मे। 'प्रदूषण' सामाजिक विकृति के प्रमाणित क' दैत अछि, त' बाध पर बाढ़िक 'बलात्कार', पाठक कें चौंका दैत अछि। 'साती' मे, निम्नवर्गीय कनियाँक ग्रामीण औद्योगीकरणक सेहन्ता व्यक्त भेल अछि, जाहि सँ पियाक पलायन परदेस मे नहि हो। 'चिन्ताक कोनो बात नहि' मे, समाज मे होइत नकारात्मक आ सकारात्मक, दुनू प्रकारक परिवर्तनक संज्ञान लैत, समाज पर सार्थक व्यंग्य भेल अछि। 'त्यागक' शब्द-विन्यास, 'बेंत'क विम्ब-विन्यास, 'जिज्ञासाक' ग्राम-नगर-विरोधाभास मे सेराइत नव पीढ़ीक उत्साह आ 'मातमपुर्सीक' भयावह यथार्थ, पाठकीय आनन्दप्रदाता भेल अछि। कवि 'परम्परा' पर प्रहारो करैत छथि आ 'प्रगतिक' छद्म- आवरण मे नुकायल सामन्ती मानसिकताक अवशेष पर, व्यंग्यो करैत छथि । 'हम अहाँ कें नहि चिन्हैत छी' मे, वर्ग-विभेदक यथार्थक समर्थन भेल अछि, त' किछु पाँती, 'कवि नारायणजीक नाम' मे, ग्रामीण जीवनक सौन्दर्यक पक्ष लैत, कविक शहरी जीवनक सन्ताप व्यक्त भेल अछि।
कविता कोनो समस्याक तुरंत समाधान, राजनीति आ शासन जकाँ करबाक लेल सक्षम नहि अछि, आ समस्याक कारणों समाजेक लोक अछि। तें 'कविक आत्मसमर्पण', उचिते अछि। खाँटी मैथिली मे मार्मिक 'समस्या'-काव्य, वैयाकरणी-शैली मे,एकवचन सँ बहुवचन' भ' जाइत अछि। तामस मे भोजन 'सानी' बनि जाइत छै, आ यथार्थक जमीन सँ कटल 'नागुल परहक गाछ', ऑक्टोपसी उपभोक्तावाद पसारैत अछि। कवि सागरजीक शुभ सकारात्मक 'दृष्टि', प्राचीन कवित्त मे नवीन कथ्यक गुंफन थिक, त' 'नेंत' आवरण फाड़ि क' देखार भइये जाइत अछि। 'चुट्टीधारी' मे मनुक्खक हीन आ जीव-जन्तुक उच्च संस्कार, काव्यमय वर्णन पौलक अछि, त' 'सड़कक कतबहि मे कटैत जिनगी', अभिजात आ सर्वहारा वर्गक विरोधाभासी जीवन- यथार्थक मार्क्सवादी सौन्दर्य- शास्त्रीय व्याख्या, सामाजिक थाड़ी मे साँठल भातक डिजाइन जकाँ, प्रस्तुत भेल अछि। 'एना किए होइए?' मे, पुरुष समाजक व्यभिचार आ भ्रष्ट मनोवृत्ति, कोनो पतिक तिमनचक्खा प्रवृत्ति आ बोनहुल्लुक-संस्कार, बेपर्द भेल अछि। सम्पूर्ण काव्य-संग्रहक काव्य- कथ्यक परीक्षण सँ, कथ्य तथ्यात्मक आ यथार्थवादीए नहि, वर्ग-संघर्षो के आधार दैत, उपस्थापित भेल अछि।
सागरजीक 'दृष्टि-कैमराक कैनवास' चकित करैत अछि। हिनक जीवनानुभवक क्षेत्र-विस्तार पैघ छनि, आ शब्द-संचयक बखारी पैघ आ भरल-पुरल शब्द-सामर्थ्य सँ ल' क', शब्द-विन्यास धरि, चमत्कारिक आ खाँटी तृणमूलीय अछि। हिनक काव्य-भाषा, अपन अभिव्यक्ति मे टनाटन अछि, मुदा सहज अछि। किछु कविता मे, सहज-प्रवाह मे, तुकबन्दी स्वयमेव आबि गेल अछि। मुदा सेहो कवित्त आ शब्द-विन्यासक क्रम मे, आयल अछि। हिनकर कविता के सर्वरस-परिपुष्ट मान' पड़त। सौन्दर्य-शृंगार आ वीभत्स रसक जनवादी-वर्गवादी कविता मे, एहन पचल समावेश केनाइ, कोनो परिपक्वे कवि सँ संभव अछि, जखन कि ई कविक पहिल संग्रह थिकनि। सामाजिक मूल्यक प्रति आबद्ध लेखनक, कएटा मैथिली काव्य- प्रतिमान मे सँ, एकटा ईहो संग्रह थिक, जकर काव्य-तथ्य, कथ्यक अयना मे, मिथिला समाजक विम्ब-प्रतिबिम्ब-उपविम्ब,द्रष्टव्य अछि। उपमा-उपमान सँ सजल पुष्प-गुच्छ त' थीके ई पोथी, सम्पूर्ण संग्रहक मूलभाव, कविक हाथ मे एकटा धरगर हथियार जकाँ अछि, जाहि सँ कवि वस्तुतः अपन स्वभावक अनुकूल, 'अनर्गल आ अनसोहाँत क्रियाकलाप'क निरंतर काव्य-विरोध करैत जाइत छथि।
से हिनकर 'मिथिला-वास आ कलकत्ता-निवासक जनवादी संस्कारक उपलब्धि' नहि, त' आर की थिक?

Suggested citation: रमेश. “सुकाव्यमय सामाजिक व्याख्या: 'उचरि बैसू कौआ'.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 382, pp. 106–114, 2023-11-15. https://www.videha.co.in/research/2023/382/सुकाव्यमय-सामाजिक-व्याख्या-उचरि-बैसू-कौआ.htm

मूल विदेह अंक / Original issue