२.२.परमानन्द लाल कर्ण- कातिक मासक माहात्म्य (पृ. ४७-५०)
२.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३१ (पृ. ५१-५६)
२.४.सूर्य नारायण कामत- भवितव्य (पृ. ५७-५९)
२.५.'गणित डायरी'- सदानन्द पाल/ बिहैन कथा - दुर्घटनाक पछोर/ मैथिली लघुकथा- बत्तीस गामाक सर्रे/ पोथी चर्चा- स्पेशल परमिट (पृ. ६०-७१)
२.६.नन्दविलास राय- संस्कार (पृ. ७२-७३)
२.७.रबीन्द्र नारायण मिश्र- हमर साहित्यिक यात्रा (पृ. ७४-९१)
२.८.डा. किशन कारीगर-मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपन/ चोरनुकबा गोंसाई (हास्य कटाक्ष) (पृ. ९२-९८)
२.९.कुमार मनोज कश्यप- लघुकथा- समयक चक्र/ संवेदना/ ओ सत्ते बताह छल (पृ. ९९-१०२)
२.१०.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक) (पृ. १०३-१२२)
पद्य
३.१.आचार्य रामानंद मंडल-आदिकवि सरहपा/ मिथिला धरती/ कपूत!/ राम!/ गीत लिखूं (पृ. १२४-१३३)
३.२.लालदेव कामत- तानल घोघ (पृ. १३४-१३६)
३.३.पवन मिश्र "गोनौली"-अगहन मास/ संस्कारक चूकल (पृ. १३७-१४२)
३.४.जगदानन्द झा 'मनु'- ४ टा गजल (पृ. १४३-१४७)
३.५.प्रमोद झा 'गोकुल'- आङ उघार छी हम/ पुरना पाजी (पृ. १४८-१५०)
𑒀
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म
𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧
ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय।
ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक।
𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨।
𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏।
𑒀
ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्।
𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂।
स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥
𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥
हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ।
प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥
𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥
पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्।
𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂।
मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति।
❀ (White Florette- innocence and purity)
☸ (Wheel of Dharma)
࿕(Swastik)
𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts)
꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji)
ঀ (Bengali Anji, Siddham)
𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something)
𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
१.२.अंक ३८२ पर टिप्पणी
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
दोहा/ रोला/ कुण्डलिया/ छन्द विचार
दोहा
दोहा मात्रिक छन्द अछि। दोहामे दू पाँती आ चारि चरण होइत अछि। पहिल चरणमे १३,दोसर चरणमे ११,तेसर चरणमे १३आ चारिम चरणमे ११ मात्रा होइत अछि। पहिल आ तेसर चरणक आरम्भ जगणसँ (जगण U। U) नै हएत आ दोसर आ चारिम चरण अन्त हएत दीर्घ-ह्रस्वसँ।
रोला
रोला सेहो मात्रिक छन्द अछि। रोलामे चारि पाँती आ आठ चरण होइत अछि। पहिल चरणमे ११, दोसर चरणमे १३, तेसर चरणमे ११ आ चारिम चरणमे १३ मात्रा, पाँचम चरणमे ११, छअम चरणमे १३ मात्रा होइत अछि। सभ पाँतीक पहिल चरणक अन्तमे दीर्घ-ह्रस्व, वा ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व होइत अछि। सभ पाँतीक दोसर चरणक अन्तमे चारिटा ह्रस्व, वा दूटा दीर्घ, वा दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व (भगण । U U), वा ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ (सगण U U ।) होइत अछि। रोलाक प्रारम्भ ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वसँ नै करू।
कुण्डलिया
दोहा आ रोलाक कुण्डली (मिश्रण) भेल कुण्डलिया। दोहा लिख दियौ, फेर दोहाक अन्तिम चरणकेँ (११ मात्रा बला) रोलाक पहिल चरण बना दियौ (पुनरावृत्ति) आ फेर रोला जोड़ू। खाली ई ध्यान राखू जे दोहाक पहिल चरणक पहिल शब्द आ रोलाक अन्तिम चरणक अन्तिम शब्द एक्के रहए। कुण्डलियाक पहिल शब्द आ अन्तिम शब्द एक्के होइए। कुण्डलियाक चारिम आ पाँचम चरण सेहो एक्के होइए।
छन्द विचार
साहित्यक दू विधा अछि गद्य आ पद्य।छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल-एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए।
छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक।
मात्रिक गणना
मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।
शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।