३.२.संतोष कुमार राय 'बटोही'-भजन (पृ. ११२-११३)
३.३.राज किशोर मिश्र-प्रायश्चित (पृ. ११४-११७)
३.४.किशन कारीगर- हिल मिल के रहै जाह (पृ. ११८-११९)
३.५.कल्पना झा- कोना कहू (पृ. १२०-१२०)
३.६.आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल (पृ. १२१-१२२)
𑒀
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ग्वंग शान्तिः पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म
𑓇 𑒠𑓂𑒨𑒾: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒢𑓂𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭 𑓅 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑓁 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒰𑒣: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑒼𑒭𑒡𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒨: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹 𑒠𑒹𑒫𑒰: 𑒬𑒰𑒢𑓂𑒞𑒱𑒩𑓂𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧
ब्रह्मणसँ प्रार्थना जे द्युलोकमे, अंतरिक्षमे, पृथ्वीपर, जलमे, औषधमे, वनस्पतिमे, विश्वमे, सभ देवतागणमे आ ब्रह्ममे शांति हुअय।
ॐ-ब्रह्मण, द्यौ-सूर्य-तरेगण, अंतरिक्ष- पृथ्वी आ द्यूलोकक बीच, आप:-जल, विश्वेदेवा- सभ देवता, ब्रह्म- सर्जक।
𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝𑒮𑒿 𑒣𑓂𑒩𑒰𑒩𑓂𑒟𑒢𑒰 𑒖𑒹 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒧𑒹, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭𑒧𑒹, 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲𑒣𑒩, 𑒖𑒪𑒧𑒹, 𑒎𑒭𑒡𑒧𑒹, 𑒫𑒢𑒮𑓂𑒣𑒞𑒱𑒧𑒹, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒧𑒹, 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰𑒑𑒝𑒧𑒹 𑒂 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒧𑒹 𑒬𑒰𑓀𑒞𑒱 𑒯𑒳𑒁𑒨।
𑓇-𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧𑒝, 𑒠𑓂𑒨𑒾-𑒮𑒴𑒩𑓂𑒨-𑒞𑒩𑒹𑒑𑒝, 𑒁𑓀𑒞𑒩𑒱𑒏𑓂𑒭- 𑒣𑒵𑒟𑓂𑒫𑒲 𑒂 𑒠𑓂𑒨𑒳𑒪𑒼𑒏𑒏 𑒥𑒲𑒔, 𑒂𑒣:-𑒖𑒪, 𑒫𑒱𑒬𑓂𑒫𑒹𑒠𑒹𑒫𑒰- 𑒮𑒦 𑒠𑒹𑒫𑒞𑒰, 𑒥𑓂𑒩𑒯𑓂𑒧- 𑒮𑒩𑓂𑒖𑒏।
𑒀
ॐ, स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः। स॒ह॒स्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्।
𑓇, 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒬𑒲𑒩𑓂𑒭𑒰↓ 𑒣𑒳𑒩𑒳↑𑒭𑓁। 𑒮↓𑒯↓𑒮𑓂𑒩𑒰↓𑒏𑓂𑒭𑓁 𑒮↓𑒯𑒮𑓂𑒩↑𑒣𑒰𑒞𑓂।
स भूमिं॑ ग्वंग वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा। अत्य॑तिष्ठद् दशाङ्गु॒लम्॥
𑒮 𑒦𑒴𑒧𑒱𑓀↑𑓅 𑒫𑒱↓𑒬𑓂𑒫𑒞𑒼↑ 𑒫𑒵↓𑒞𑓂𑒫𑒰। 𑒁𑒞𑓂𑒨↑𑒞𑒱𑒭𑓂𑒚𑒠𑓂 𑒠𑒬𑒰𑒓𑓂𑒑𑒳↓𑒪𑒧𑓂॥
हजार माथ, हजार आँखि, हजार पएर संग विश्वकेँ आच्छादित केने अछि, दस आंगुरक गनतीक वशमे नै अछि ओ।
प॒द्भ्याग्ँ॑ शू॒द्रो अ॑जायत॥
𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑒑𑓂𑒿↑ 𑒬𑒴↓𑒠𑓂𑒩𑒼 𑒁↑𑒖𑒰𑒨𑒞॥
पएरसँ शूद्रक उत्पत्ति भेल॥
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा᳚त्।
𑒣↓𑒠𑓂𑒦𑓂𑒨𑒰𑓀 𑒦𑒴𑒧𑒱↓𑒩𑓂𑒠𑒱𑒬𑓁↓ 𑒬𑓂𑒩𑒼𑒞𑓂𑒩𑒰↑↑𑒞𑓂।
मुदा पएरेसँ भूमियोक उत्पत्ति।
❀ (White Florette- innocence and purity)
☸ (Wheel of Dharma)
࿕(Swastik)
𑓅 (Gwang ग्वंग- two small circles connected by u and a dot placed over it, used in reference of Vedic texts)
꣼ (सिद्धिरस्तु, सिद्धम 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒱𑒩𑒮𑓂𑒞𑒳, 𑒮𑒱𑒠𑓂𑒡𑒧 Devanagari Anji)
ঀ (Bengali Anji, Siddham)
𑒀 (Tirhuta Anji, Ankush of Ganeshji, placed at the beginning of something)
𑒀
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
१.२.अंक ३८६ पर टिप्पणी
१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरी, जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरी/ जेक्स डेरीडा- उत्तर संरचनावाद माने विखण्डनात्मक सिद्धान्त
कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि, आ से मैथिलीयो मे अछि।
ऐ सम्बन्धमे सुभाष चन्द्र यादवक निम्न विचार छन्हि:
मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक, जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब गलत भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि । मैथिली मे लोक-गीत, लोक गाथा आ लोक देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक पुश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संरक्षण जरूरी अछि । लोकसाहित्यक संरक्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक, भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी। तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि । लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि। ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि। जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उपस्थित कयल गेल अछि। लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोककथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक, से कम आयल अछि। रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि। लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि- एकटा बुढ़िया रहय आ एकटा चिनिया खेलिऐ रओ भैया। एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि। दुनूक विमर्श, आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि। दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि। पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा, रानी, आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक। कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि- हाथी हाथी हाथी! समुद्र सोखू समुद्र। समुद्र ने अगिन मिझाबय, अगिन। अगिन ने रानी डेराबय, रानी। रानी ने राजा बुझाबथि, राजा । राजा ने बरही डाँड़थि, बरही। बरही ने खुट्टी चीड़य, खुट्टी। खुट्टी ने दालि दिअय, दालि। की खाउ, की पीबू, की लऽ परदेस जाउ। जाइत अछि। खुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक। फेर तऽ खुट्टीक डरेँ हाथी, हाथीक डरेँ समुद्र, समुद्रक डरेँ आगि, आगिक डरेँ रानी, रानीक डरेँ राजा, राजाक डरेँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक। ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनने छलाह। ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक। लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि। हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू खुट्टी धरि जाइत अछि। बुढ़िया केँ खुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक। लेकिन लोक कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि? एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि, सएह एहि कथाक आत्म वाचन थिक। एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि। राजा-रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा मोतीक दान नहि लैत अछि। दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि। तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही। भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही। दान लेब नीक नहि। स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही। कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक। एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि। मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक रूपमे चलैत छैक, जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक ।
बरदवला भाइ!
परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता
भुखै मरै छै बच्चा
एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया
तइ लए पकड़ने जाइए।
फेर घोड़ावला अबै छै, हाथीवला अबै छै, खुद्दी-वला अबै छै। मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि। ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक; छोड़बाक बदला मे बड़द, घोड़ा, हाथी देबऽ लेल तैयार छैक, लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि। जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक, तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि। मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि। मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल। इएह कथाक आत्मवाचन थिक। कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक। एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही।
कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि सोप ओपेरा जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिये बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नै दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नै तँ खरापे-खराप।
कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना ऐ तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे देवी को बलि सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नै।
वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कऽ विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्द्वात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक डिसकसन वा द्वन्द्व जइमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहियेसँ विद्यमान छल।
से इतिहासक अन्तक घोषणा कयनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कयने छलाह- बादमे ऐसँ पलटि गेलाह। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ा (द्वन्द्व) सँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन बाद ओ ऐ मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य अखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स डेरीडा भाषाकेँ विखण्डित कऽ ई सिद्ध केलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नै लगा सकैत छी।
उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भऽ अपन अस्तित्व बचेने अछि।
साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्द्वात्मक प्रणाली जकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत।
आधुनिक कथा अछि की? ई केहन हेबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि हेबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाय ?
कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे हेबाक चाही। मुदा संगमे ओइ समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ ऐमे ओइ समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि।
जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कऽ रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि।
मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक मसनवी फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।
आजुक कथा ऐ सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नै अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित हेबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत।
मनोविश्लेषण आ द्वन्द्वात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ डेरीडाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भऽ समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत।
ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नै। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जायत ? गीताक सप्पत खा कऽ झूठ बजनिहारक संख्या कम नै। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भऽ जायत ?
सभ प्रबुद्ध नै हेताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओइ दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध हएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नै, तँ ओकर ओइ परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि ऐ तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत।
आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जइसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन हुअए। आकि ऐ परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि्? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। ऐमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नै अछि जे रोशनाइसँ कागचपर जेना-तेना उतारि देलिऐ। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि।
तँ कथा आदर्शवादी हुअय, प्रकृतिवादी हुअय वा यथार्थवादी हुअय। आकि ई मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमयबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी हुअय? आ नै तँ कथा प्रयोजनमूलक हुअय। ऐमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त केनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि।
तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कऽ गढ़ल जायत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि पाओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबय पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करय पड़तन्हि।
स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित हएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत।
जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नै छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह।
कथा क्रमबद्ध हुअय आ सुग्राह्य हुअय तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कय देलक।
आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास हेबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नै, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। ऐसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल।
प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओइसँ पृथक ओ किछु नै अछि, स्वतंत्र हेबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर हएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग।
क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित केने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करय पड़ैत अछि।
तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कऽ रहल अछि कारण ऐसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आयल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा (बीहनि कथा), कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत?
जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नै पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओइ मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नग्र-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आयल अछि।
होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करय पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।
पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नै वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नै होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नै होइत अछि।
ऐ सम्बन्धमे सुभाष चन्द्र यादवक निम्न विचार छन्हि:
कोनो लेखक सँ ई अपेक्षा केनाइ जे ओ अपन रचनाक स्पष्टीकरण आ व्याख्या करए एकटा अनुचित अपेक्षा होएत। ई काज लेखकक नहि थिकैक। रचना चाहे कतबो दुर्बौध्य आ विवादास्पद हो, लेखक ओहि लेल जिम्मेदार तऽ होइत अछि, मुदा ओकर भाष्यकार हेबाक लेल बाध्य नहि। लेखक ककरा-ककरा अपन रचना बुझेने फिरत आ किएक? की ई सम्भव छैक? लेखक जँ चाहए तऽ अपन जीवनकालमे रचनाक संदर्भमे किछु सम्वाद स्थापित कऽ सकैत अछि, मुदा मृत्योपरांत? पाठक अपन बोध आ विवेकक अनुसार रचनाक पाठ करैत अछि। हरेक युगक सेहो अपन भिन्न बोध होइत छैक। तँ ई पथ भिन्नता आ परिवर्त्तनशीलता हरेक समर्थ रचनाक आनिवार्य गुण होइत अछि। समय के संग-संग रचनाक संवेदनात्मक अभिप्राय बदलैत रहैत छैक। तँ ई युग बदलला पर रचनाक व्याख्या सेहो बदलि जाइत छैक। एहि तरहेँ कोनो एकटा रचना के एक्के टा आ समान पाठ नहि होइत अछि; मूल्यवान रचनाक पाठ अनंत होइत अछि। पाठ पर लेखकक नियंत्रण नहि होइत छैक। तँ ऐ पाठ भिन्नताक लेल ओकरा सफाइ आ स्पष्टीकरण देबाक कोनो बेगरता नहि हेबाक चाही। हमर अपन अनुभव तऽ ई अछि जे जाधरि कोनो घटना कलात्मक विजनसँ दीप्त नहि होएत ताधरि ओ रचनामे रूपांतरित नहि भऽ सकत। ओहि आरंभिक विजनकेँ पाठक भिन्न-भिन्न रूपेँ पकड़ैत अछि आ अलग-अलग व्याख्या करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे कोनो रचनाक विजन आ दर्शनकेँ पाठक भले नहि बुझि पबैत हो, ओकर मर्मकेँ जरूर पकड़ि लैत अछि; ओकर संवेदनात्मक तत्वकेँ हृदयंगम कऽ लैत अछि। लोककथा सँ उदाहरण ली तऽ बात बेशी स्पष्ट होएत। एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइ ले पकड़ने जाइए- एहि उक्तिमे न्याय आ समानताकेँ जे विमर्श आ दर्शन छैक, तकरा पाठक भले नहि बूझि पबैत हो, मुदा स्वतंत्रताक लेल जे फुद्दीक आर्तनाद छैक तकर अनुभव पाठक अवश्य कऽ लैत अछि। तहिना हमर कथा नदी आ कनियाँ पुतरामे जीवनदायिनी शक्तिक रूपमे प्रेमकेँ जे विजन (दर्शन) छैक तकरा बूझब ओतेक आसान जँ नहियो होइ, तैयो नेहक अनुभूति तऽ पाठक करिते अछि। साहित्यमे असली चीज ईएह संवेदना या मर्म होइत छैक। कोनो विचार (या दर्शन) संवेदनेक माध्यमसँ पाठक धरि पहुँचबाक चाही; कोनो नीरस विमर्श या नाराबाजीक रूपमे नहि। हमरा बुझने धर्म आ संस्कृतिक भित्ति प्रेमे थिक। प्रेमसँ बढ़ि कऽ एहि संसारमे कोनो दोसर भाव नहि अछि। हमर कथा सभ कोनो विचारधारात्मक या आचारशास्त्रीय आग्रह लऽ कऽ नहि चलैत अछि। ओ अपन समयकेँ आचार-विचारकेँ व्यक्त तऽ करैत अछि, मुदा ओहि सँ बद्ध नहि अछि। हमर धारणा अछि जे कलाकृति कोनो क्रांति नहि अनैत अछि। ओ मनुक्खक भावात्मक अभिवृत्ति आ दृष्टिकेँ बहुत सूक्ष्म ढ़ंगसँ बदलैत अछि आ दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्त्तनक घटक होइत अछि। एकर अतिरिक्त आर किछु नहि। जे आलोचक एहिसँ इतर कोनो अपेक्षा आ आग्रह (जेना मैथिलीक चेतनावादी हठ) लऽ कऽ साहित्य लग जाएत, से अपनोकेँ ठकत आ दोसरोकेँ धोखा देत।
आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल। मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आयल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आयल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल।
पाठमे नुकायल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ ऐ सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आयल पोस्टमॉडर्निज्म।
कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जइमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कऽ ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नै कयने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ ऐ वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नै होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लऽ ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट !
पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। २००८क कोसीक बाढ़िमे गौरीनाथजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहय मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भऽ गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? गुलोमे सेहो अहाँ मोबाइल चार्ज करबाक बिजनेसक चर्चा देखैत छी।
डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नै मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भऽ सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था।
मैथिलीमे नीक कथा नै, नीक नाटक नै? मैथिलीमे व्याकरण नै? पनिसोह आ पनिगर ऐ तरहक विश्लेषण कतऽ अछि मैथिली व्याकरण मे, वएह अनल, पावक सभ अछि ! सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल।
जइ समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नै भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भऽ, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कऽ कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि।
जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्मक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि।
ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ ऐ तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नै कएल गेल अछि- ऐ तरहक अनर्गल प्रलाप !
क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कऽ स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जइ कवि-कथाकारकेँ विचलित कऽ रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे एबाक बाद जइ गतिसँ ओ ई सभ करतब कऽ रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जेतन्हि से नै जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ ऐ तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन ऐ भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दऽ कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ?
मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल हएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कऽ हम कहि सकैत छी। तइ स्थिति मे- ई विवाद रहय ऐ कवितामे आ ऐ कथामे- ऐ तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दऽ अपन लेखनी चमकायब?
आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल।
मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा ऐ सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतऽ पाठक आ कोन विवाद !
जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक ऐ भाषासँ प्रेम करथि तइ लेल कथा आ कविता कतऽ आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि।
सय-दू सय कॉपी पोथी छपबा कऽ , तकर समीक्षा करबा कऽ, सय-दू सय कॉपी छपयबला पत्रिकामे छपबा कय, तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कयल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जा स्थिर भऽ गेल अछि।
जे अपन घर-परिवार नै सम्हारि सकला से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लऽ बैसल छथि, मिथिला राज्य बनेबामे लागल छथि , पता नै राज्य कोना सम्हारि सकताह ।
मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नै अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नै, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नै छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ ऐ द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कऽ समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नै। पाठक नै रहयमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ ऐ पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन ऐ सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि ।
जिनकर सन्तान साहित्यमे नै अयलाह हुनकर चरचा फेर केना हएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? मैथिली साहित्यक ऐ सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कऽ सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि।
कथा-कविता-नाटक-निबन्ध संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि । पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जइ भाषामे लिखल जाइत हुअय, ओतय ऐ तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि।
मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक ऐ तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वएह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नै भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यएह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा ऐ वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार हेबे टा करत।
मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नै। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे विदेह ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भऽ हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट ऐ कथा सभकेँ भेटलैक जइमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल। एतऽ ईहो गप सोझाँ आयल जे शिक्षाक अभावक कारण सेहो, भाषाक उच्चारण आ वाचन मे अंतर अबै-ए। तकर ई मतलब नै जे बलचनमाक भाषा एखनो यादव जी बजैत छथि, आब जे ओ भाषा कथाक यादव पात्र लेल प्रयोग करब तँ शांकुन्तलम् केर संस्कृत नाटकक बीच जनसामान्यक लेल प्रयुक्त प्राकृत जेकाँ लागत, आ ओइ वर्गक लोककेँ अपमानजनक सेहो लगतन्हि। भाषा चलायमान होइत अछि आ लेखन परम्परा ओकर मध्य स्थिरता अनैत अछि। से सुभाषजीक भाषामे सेहो ई अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि, हुनकर कथाक भाषा आ निबन्धादिक भाषा मध्य।
जूलिया क्रिस्टोवा अपन प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मे इण्टर-टेक्स्टुअलिटी माने अन्तर-पाठ्यताक संकल्पना देलन्हि, मने कोनो पाठ एकटा देबारमे बन्न नै रहि सकैए। से ओ पाठकेँ संकलन कहै छथि।
आब गुलोमे देखू, रंजीता रंजनसँ छह वोटक एक हजार टका नरेशबा दियेतै। मुदा ओ निपत्ता भऽ जाइ छै। फुलबा मोदीकेँ जितेतै। एम.पी. केर एलेक्शन छिऐ।
से सुभाष चन्द्र यादव टेक्स्टक कनटेक्सट ताकि लेने छला २०१५ मे। से हुनका भीतर घुरियाइत हेतन्हि आ से विस्तृत रूपमे बहार भेल "भोट"मे एम.एल.ए. केर भेल एलेक्शनक संग २०२२ मे।
से अन्तर-पाठ स्थापित करैत अछि अन्तर-विषयक विषय-वस्तु। ई सभटा पाठ आ विषय एक दोसरासँ रगड़ा लैत रहैए आ एक दोसराक प्रभावकेँ खतम करैत रहैए, कखनो कोनो पाठ आगाँ तँ कखनो दोसर। आ ऐ पाठकेँ अहाँ समाज आ संस्कृतिक आधारसँ अलग नै कऽ सकै छिऐ। से समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यक पाठ मिज्झर भऽ जाइत अछि।
पाठ अभ्यास आ उत्पादनक विषय अछि। से पहिनेसँ समाज-संस्कृतिक पाठ आ साहित्यिक पाठ दू तरहक स्वर निकालैत अछि।
विचारधाराक संघर्ष आ तनावकेँ पाठ समाहित करैत अछि।
जुलिया क्रिस्टोवाक अनुदैर्घ्य सम्बन्ध बला धूरीमे सोझे लेखक आ पाठकक बीच वार्ता होइ छै। माने लिफाफक बौस्तु आ लिफाफपर लिखल पता केर बीच सोझे वार्ता होइ छै। मुदा जुलिया क्रिस्टोवाक उर्ध्वाधर सम्बन्ध बला धूरीमे "पाठ" मूलधाराक साहित्य संगे सेहो आ एकटा छोट कालावधिमे भेल घटनाक बीच वार्ता करैत अछि। माने पाठ आ ओकर सन्दर्भक बीच वार्ता होइ छै, एक लेखकक पाठ दोसरक लेखकक पाठ संग वार्ता करैए।
ई दुनू धूरी जखन एक दोसराकेँ काटैए तखन शब्द बा पाठ उत्पन्न होइए जइमे कमसँ कम एकटा आर पाठ पढ़ल जा सकैए।
जुलिया क्रिस्टोवा बोली-बानीकेँ यथावत राखबाक आ किछु पाठ, जे मनुक्खसँ अलग अछि, केर रूपमे लेखकक अधिकार आ कर्तव्यक वर्णन करैत छथि।
जूलिया क्रिस्टोवाक प्रस्तुति "वर्ड, डायलॉग एण्ड नोवल"मिखाइल बाखतिनक संकल्पनाकेँ आगाँ बढ़बैत अछि। संगहि जुलिया क्रिस्टोवा भाषाक संकेत आ प्रतीकक रूपमे सेहो विश्लेषण करैत छथि। जखन बच्चा संकेतक रूपमे, लयसँ गप करैत अछि तँ ओइमे संरचना नै होइ छै, अर्थ नै होइ छै। मुदा जखन ओ पैघ होइए तँ ओकरा अपना आ आनमे अन्तर बुझाइ छै, ओ बाजऽ लगैए आ अङनासँ बहराइए। आ तकरा बाद ओ अपनाकेँ मायसँ दूर करैए। मुदा ओ लाक्षणिक सँ एकदम्मे दूर नै होइए वरन् लाक्षणिक आ प्रतीकात्मकक बीचमे झुलैत रहैत अछि। लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ युक्त; आ प्रतीकात्मक पुरुष गुण, विधि आ संरचनासँ युक्त रहैत अछि। से चलचित्र आदिमे महिलाक शरीरक आ ओकर किरदारक जे अवमूल्यन पुरुष द्वारा कएल जाइत अछि से मायक शरीर द्वारा ओकर अस्तित्वक खतराक डर अछि। मुदा बेबी चाइल्ड अपन मायसँ लग रहैत अछि से ओ लाक्षणिक स्त्री गुण, संगीतमय, कविता आ लय सँ बेशी युक्त रहैत अछि, से ओ मायकेँ अस्वीकार तँ करैत अछि मुदा ओकरेसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि।
जेक्स डेरीडा योनि केन्द्रित विखण्डनात्मक सिद्धान्तसँ नारीवादी विचारधारामे जे हस्तक्षेप करै छथि तकर कोर्नेल समर्थन करैत छथि आ गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक स्वागत। किछु दार्शनिक विचारधारा जइ प्रकारसँ योनीकेँ अप्रत्यक्ष रूपेँ महत्व दइए ततऽ डेरीडा द्वारा योनि-केन्द्रित दृष्टिकोणक सीमाक प्रति ध्यानाकर्षण एकटा सार्थक हस्तक्षेप अछि आ तइसँ प्रतीकक घटकक फेरसँ एकटा प्रक्रियाक अन्तर्गत परिभाषा देब सम्भव भेल अछि।
डेरीडा आपसमे होइबला सम्वादक गुणनखण्डक असम्भाव्यताकेँ देखबै छथि, ओकरा सरल नै कएल जा सकैए। से स्त्रीकेँ अनुमान आ ज्ञानक वस्तुक रूपमे नै देखल जेबाक चाही। पुरुषत्वक सापेक्ष नारीवादकेँ नै देखबाक चाही वरन नारीवाद लेल एकटा अलगे मोहाबरा बनेबाक खगता अछि।
से पाठ, डेरीडा कहै छथि, मोटामोटी एकटा राजनैतिक कार्य अछि जे शक्ति-सम्बन्ध बा तकरा लेल होइत वार्ताक रूपमे परिभाषित कएल जा सकैए। मुदा डेरीडापर आरोप अछि जे ओ नारीक अबाजकेँ पुरुष द्वारा अधिगृहीत करबाबय चाहैत छथि, नारीक एतेक यत्नसँ जे बकार फुटल छन्हि, जे ओ अपना लेल बाजि रहल छथि, से अधिकार ओकरासँ छीनऽ चाहैत छथि। डेरीडाकेँ महिलाक दिन-प्रतिदिनक होइत समस्या आ शक्तिहीनतासँ कोनो मतलब नै छन्हि। डेरीडा विखण्डनात्मक पद्धतिकेँ नीक आ धनात्मक रूपमे लइ छथि आ नारीवादकेँ अस्तित्वक तत्त्वमीमांसाक/ तर्कक द्वैधक रूपमे राखैत छथि, जेना पुरुष स्त्री।
डेरीडा पाश्चात्य दर्शनक केन्द्र आधारित संरचनाक मोहकेँ उघार करैत छथि। सुसियोक भाषाविज्ञानसँ प्रेरित संरचनावाद सांस्कृतिक अस्तित्वक वैज्ञानिक विश्लेषणक प्रयास करैत अछि। लेवी स्ट्रॉसक संरचनात्मक मानव विज्ञान सएह लोकगाथा लेल करैत अछि। तहिना साहित्यमे गद्य आ पद्य लेल संरचनात्मक विश्लेषणक प्रयास कएल जाइत रहल अछि। मुदा डेरीडा एकरा उघार करैत छथि, संरचनावाद अपन विश्लेषण लेल एकटा ठोस आधार ताकैत अछि, व्यवस्थाक बाहर एकटा केन्द्र जइसँ ओ एकर वैज्ञानिक विश्लेषण कऽ सकय, मुदा से मात्र दार्शनिकक आभास मात्र अछि। माने कोनो लोकगाथाक कोनो स्थायी बा निर्धारित संरचना केना भऽ सकैए। से लोककथा बा लोक गाथाक संरचनाक अध्ययन करबा लेल अहाँकेँ ओ विचार बा ओ केन्द्र, जकर आधारपर अहाँ एकर विश्लेषण करऽ चाहैत छी, निर्धारित करऽ पड़त। डेरीडा कहै छथि जे कोनो संरचना लेल ओकर संकल्पना-विचार आवश्यक अछि, फेर टुकड़ी-टुकड़ी जोड़ि कऽ अहाँ ओकरा बनायब। मुदा बिनु अन्त सोचने संरचना सम्भवे नै अछि। आ से साहित्यमे सेहो अछि। यावत अहाँ कोनो रचना लेल एकटा स्वयंसिद्ध अर्थ नै ताकि लैत छी ओकर संरचना अहाँ नै ताकि सकै छी, कारण अर्थ माने अन्त ओकर संरचनाकें निर्धारित करैत अछि। से संरचनावादीकेँ अर्थ पहिनहियेसँ पता रहै छै आ तखने ओ ओकर विभिन्न अंग आ तकर आपसी सम्बन्धकेँ विश्लेषित कऽ सकैए। आ यएह विश्लेषणसँ पहिले ज्ञात स्वयंसिद्ध अर्थ अछि डेरीडाक केन्द्र। आ डेरीडा कहै छथि जे यएह निर्धारित करैत अछि जे पाठक संरचना केना बनत, कोन अंगकेँ लेल जायत आ कोन अंगकेँ छोड़ल जायत। से जखन हम साहित्यक संरचनाक विश्लेषण करैत छी तँ ओकर अर्थ आ ओकर प्रभावक गप करैत छी तँ हम ओइ संरचनासँ ओइ तत्त्व सभकेँ चिन्हबाक, फराक करबाक प्रयास करैत छी जे ओइ प्रभाव लेल उत्तरदायी अछि, से ओइ सम्भावित पैटर्नकेँ हम छोड़ि दैत छी जे ओ प्रभाव नै आनत। से ई केन्द्र आरम्भिक स्थल अछि संरचनाकेँ बुझबाक हेतु। मुदा ई विश्लेषणकेँ सीमित सेहो करैत अछि। कारण केन्द्र अपनाकेँ स्थिर रखबाक लेल स्तरीकरणक निर्माण करैत अछि, आ ओकरा पर नियंत्रण करैत अछि। आ ई अर्थक पूर्व ज्ञान पाठकक पूर्व इतिहास आ समकालीन आलोचना सिद्धान्त आ विचारधारापर निर्भर सेहो करैत अछि, ईहो सभ तँ संस्कृतिक अंग अछि तखन केना एकरा सभकेँ संरचनासँ दूर राखल जाइए जे एकरा सभकेँ सीमित करैए मुदा अपने एकरा सभसँ सीमित नै होइए? से अपन विश्लेषणक आधार कोनो स्थायी केन्द्रकेँ बनायब एकटा नुस्खा देब सन अछि आ ई प्रतिक्रियावादी बा यथास्थिवादी स्थिति अछि। आ ऐ सँ मानक आ गएर-तुलनात्मक स्वतंत्र अर्थ निकालबाक मात्र इच्छा सिद्ध होइए। से ई भ्रम जे हम संरचना ताकि रहल छी भ्रमे अछि, वास्तवमे अहाँ पाठ्य सामग्रीसँ संरचनाक निर्माण कऽ रहल छी।
से डेरीडाक उत्तर संरचनावादमे सेहो केन्द्रक बिना प्रारम्भ नै भऽ सकैत अछि मुदा ओ ऐ सिद्ध नै भेल स्वयंसिद्धक विखण्डनात्मक विश्लेषणक आधारपर ओइ केन्द्रकेँ दोसर केन्द्र द्वारा स्थानापन्न करैत अछि मुदा ई नव केन्द्र सेहो स्थायी नै रहत।
तहिना सुसियो (Saussure) अपन प्रतीक सिद्धान्तमे प्रतीकक विश्लेषण करैत छथि जे कोनो शब्द जेना बिलाड़ि- बिलाड़ि बिलाड़ि अछि कारण ओ किछु आन नै अछि। से शब्द अछि प्रतीक चिन्ह आ जकरा ओ दर्शाबैत अछि से अछि बौस्तु/ प्रतीक। मुदा डेरीडा कहै छथि जे अहू लेल पहिने एकटा संकल्पना आनऽ पड़ैत अछि। आ जँ अहाँ प्रतीक चिन्हकेँ निरपेक्ष बना देब जे ओकर कोनो प्रतीकसँ सम्बन्ध नै छै, जे स्वयंमे एकटा स्वतंत्र संकल्पना अछि आ कोनो प्रतीक/ बौस्तुसँ ओकर कोनो प्रत्यक्ष सम्बन्ध नै छै, मुदा तखन ई संकल्पना सभ प्रतीक चिन्हकेँ पार कऽ जायत आ किछुओ सूचिते नै करत। आ जँ हम प्रतीक आ प्रतीक चिन्हकेँ एक्के मानी तँ प्रतीक चिन्हक जड़ियेपर चोट पहुँचत।
से सुसियोक सिद्धान्त तर्काधारितक विपक्षमे अछि जखन ओ कहैत अछि जे प्रतीक चिन्हमे अहाँ प्रतीकक कोनो लक्षण नै देखू। मुदा जखन ओ कहैत छथि जे प्रतीक चिन्ह प्रतीककेँ लक्षित करबा लेल मात्र प्रयुक्त होइत अछि आ तेँ ओकर अधीन अछि ओ तर्क आधारित सिद्धान्तक पक्षमे बुझाइत छथि। से डेरीडा कहैत छथि जे प्रतीक आ प्रतीक चिन्हक ई स्पष्ट भेद मान्य नै अछि, आ प्रतीककेँ प्रतीक चिन्हक ऊपर देल वरीयता सेहो उनटबाक खगता अछि।
प्रतीक चिन्हमे अर्थ पहिनहियेसँ विद्यमान नै रहै छै। आ पूर्ण अर्थ कोनो एकटा प्रतीक चिन्हमे नै भेटत। से पाठकेँ अहाँकेँ घोर-मट्ठा करऽ पड़त, आ ई अनन्त खोज दिस अहाँकेँ धकेलत। से ई प्रतीक चिन्ह दोसर प्रतीक चिन्हसँ अपन अन्तरक आधारपर प्रतीक निर्धारण करैत अछि, जतेक बेशी अन्तर ततेक लग अहाँ प्रतीकसँ होइ छी। मुदा ई कहियो नै हएत जे अहाँ सभटा अन्तर ताकि सकब। मुदा प्रतीक चिन्हमे बारम्बारता हेबाक चाही, तखनो जखन एक प्रतीक चिन्ह भिन्न प्रतीकक निर्धारण करैत अछि। आ ऐ लेल ओइ प्रतीक चिन्हक लिखित इतिहास जानब आवश्यक। से प्रतीक चिन्ह विभिन्न अर्थ आ कखनो काल उल्टा अर्थ सेहो देत।
डेरीडा लिखै छथि जे प्लेटोसँ सुसियो (Saussure) आ लेवी स्ट्रॉस धरि सभ लिखलाहासँ ऊपर बजलाहाकेँ राखै छथि, कारण लिखब एकटा माध्यम अछि, असल चीज तँ वाणी अछि। सुसियो लिखित रूपमे उच्चारण त्रुटिपर ध्यान दियाबैत छथि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सभ विशेषता जे वाणीमे छै से लेखनमे सेहो छै। आगाँ ओ कहै छथि, प्रतीकक विलुप्ति वाणीमे विचारक प्रत्यक्ष रहबाक भ्रम उत्पन्न करैए। मुदा जँ बाजल वाणीकेँ हम रेकॉर्ड कऽ कय सुनी तँ ओहो लिखल अक्षर सन प्रतीकक शृंखले अछि, जइमे विभिन्न प्रतीककेँ ओकर एक-दोसराक अन्तर सँ चिन्हल जा सकैए। आ लेखन सेहो सामान्य लेखन आ चित्रसँ बुझा कऽ कएल लेखन, ऐ दू तरहेँ भऽ सकैए। 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा' एकर सभक पाछाँ अछि।
पाश्चात्य दर्शनक 'अपन अवस्थितिक तत्त्वमीमांसा'मे जे मुख्य अछि से अछि सद्यः अनुभव- मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे एहेन कोनो अनुभव परा-भाषा स्तरपर नै होइत अछि, कारण ई अनुभव भाषाक माध्यमेसँ चिन्हल जाइत अछि। फेर ई जे दैवीय चेतनासँ हम परम सत्यकेँ बुझैत छी मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे ई मात्र सर्जकक सृजन अछि। फेर ईहो जे कोनो बौस्तुक पाछाँ सत्य नुकायल अछि, मुदा विखण्डनवाद कहैत अछि जे तेहन कोनो स्वतंत्र अस्तित्व नै होइ छै, सभटा निर्माण आ पुनर्निर्माण व्यवस्था द्वारा होइ छै। से सुसियोक स्वतः उपस्थिति किछु नै अछि कारण सभटा व्यवस्थाक अन्तर्गत निर्मित अछि।
डेरीडा कहैत छथि जे तर्क ऐ सभटा दार्शनिक चिन्तनक आधार अछि, से कोनो अन्तिम सत्य आ विश्वात्माक परिकल्पना देल जाइत अछि जे सर्वज्ञानी अछि। मुदा डेरीडा कहै छथि जे ओ सिद्ध नै भेल केन्द्रकेँ कखनो गॉड, कखनो विचार आ कखनो विश्वात्मा कहल गेल आ ओ अपनासँ नीचाँ विभिन्न स्तरक निर्माण केलक। से धर्म गॉडकेँ परम सत्य मानलक आ मनुक्ख आ आन रचनाकेँ ओ अपूर्ण, विरोधी आ ई सभटा केन्द्र बनल जे अपना हिसाबे विचार-व्यवस्था बनेबाक दावा केलक। मुदा एकरा सभकेँ व्यवस्थासँ ऊपर हेबाक चाही। से गॉडक स्वतंत्र रूपसँ धर्मक बाहर उपस्थिति हेबाक चाही। उत्तर संरचनावादी विखण्डनवाद एहेन कोनो परासत्यक उपस्थितिकेँ आभासी मानैत अछि उत्तर संरचनावादी भाषाक सिद्धांतक परिणाम मानैत अछि । से ऐ प्रतीक चिन्ह सभक आपसी खेलमे किछु अर्थ कोनो विचारधाराक हस्तक्षेपसँ उच्च स्थान प्राप्त करैत अछि आ ओकर दोसर अर्थ तकर पाछाँ जेबा लेल धकेल देल जाइत अछि। स्वतंत्रता, गणतंत्र, न्याय आदि सन विचारधारा हमरा सभक जिनगीक भाग छी मुदा लागैए जे ओइ सभसँ हमरा सभक जिनगीक बहुत रास अर्थ निकलल मुदा अन्वेषणक उपरान्त ओ सभ दोसर विचारसँ बहार भेल बुझायत। कोनो संकल्पना एहेन नै अछि जइमे दोसर विचारक अवशेष नै भेटय।
देखी गुलोक पाठ केना शुरू होइत अछि, ई शुरू होइत अछि तिला सकरांति सँ, आङन नीपि रहल अछि गुलोक छोटकी बेटी रिनियां। गुलो उपन्यासक आरम्भ रिनियाँ सँ किए भेल, गुलोक बेटासँ किए नै भेल। कारण जुलिया क्रिस्टोवाक अनुसारे बेटा अपनाकेँ मायसँ दूर करैत अछि, मुदा बेटीमे ओ लय, ओ गुण रहिते छै से ओ दूर होइतो मायसँ, संस्कृतिसँ लग रहैत अछि। कोनो आन प्रकारसँ ऐ उपन्यासक एतेक नीक आरम्भ नै भऽ सकैत छल। गीत गाबि रहल अछि रिनियाँ, फेर पानिक फाहा जकाँ ओस, पछिया हवा आ मायक चिन्तित हएब। "गे चद्दरि ओढ़ि ने ले।"
बादोमे बेटी आ बेटामे अन्तर छैहे- छौड़ी असकरे कखून घर तऽ कखनू गाछी दौड़ैत रहइ छइ। छौड़ा आठ बजे धरि सुतले रहै छै।
आ फेर अबैए जुलिया क्रिस्टोवाक पुरुख, ओकर ऐंठी।"ने चिन्है छिही तऽ चीन्ह ले।"
की ई हेंठी अहाँ लुटियन्स जोनमे नै देखै छिऐ, सगरे ई हेंठी भेटत। मानव समाजमे, खास कऽ पुरुख पात्रमे।
अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कऽ आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आयल अछि। ऐ एकमात्र आ पहिल शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध विदेह ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर ऐ गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जायत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की हेतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ ऐ रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतऽ ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक फिक्शन कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लऽ लगातार आबि रहल अछि। आ ई घटना मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि।
-Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.)
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१.२.अंक ३८६ पर टिप्पणी
मणि आमारूपी
करोट फेरैत गामक निदर्शकः के.एन.टी- सियाराम झा 'सरस'- बहुत सुन्दर लिखलाह अछि सरस जी.. हम एके साँसमे पढ़ि गेलहुँ।
लक्ष्मण झा सागर
बहुत उत्कृष्ट अंक भेल अछि।
करोट फेरैत गामक निदर्शकः के.एन.टी- सियाराम झा 'सरस'-सरस जीक रचना अमुल्य अछि। निचेनसं पढ़बाक बेगरता अछि!!
विदेह पेटार: विदेह पोथी: प्रीति कारण सेतु बान्हल (सम्पादक-आशीष अनचिन्हार): विद्यापतिक पांती पर पोथीक नामकरण अतिशय शोभनीय आ आकर्षक अछि। चिर प्रतिक्षित पोथीके उनटाबयमे आइ दिन भरि लागि गेल।पुरा पढ़बामे साल भरि त जरूर लागत।अपना 71 बर्खक जिनगीमे एहेन गतगर पोथी किनको पर लिखल एहिसं पहिने हमरा नै अभरल अछि।एहि पोथीक रचनाक संकलन आ सम्पादनमे आशीस अनचिन्हार जीक मेहनति आ भुमिका सराहनीय अछि।हुनका प्रति बहुत बहुत आभार! अहाँक सपत्नीकें हार्दिक बधाइ! शुभकामना!!
रामाधार झा रमण
करोट फेरैत गामक निदर्शकः के.एन.टी- सियाराम झा 'सरस'- बहुत नीक आलेख सरस जीक। उत्कृष्ट अंक।
प्रोफेसर उषा चौधरी
करोट फेरैत गामक निदर्शकः के.एन.टी- सियाराम झा 'सरस'- वाह बहुत सुन्दर संस्मरण। प्रेरणादायक खूब नीक लागल।हमरा अपन नेनपनक कयटा बात सेहो मोन परि गेल।एहि मे कय टा पात्रके संभबत: हम चिन्हैत छी। साधुवाद।
कल्पना झा, पटना
विदेह पेटार: विदेह पोथी: प्रीति कारण सेतु बान्हल (सम्पादक-आशीष अनचिन्हार): बहुत नीक संकलन। नीक संपादन। जबरदस्त तरीका सँ बिगुल बजा देल गेल अछि - "मेंहथ गाम,कृपानंद ठाकुर क आँगन मे बैसि एखन धरि अहाँ सभ जे पढ़लहु से मात्र प्रस्तावना छल। आब एहि ठाम सँ डेग उठा रहल छथि दंपति रचनाकार 22म शताब्दीक मैथिली साहित्यिक कोबर लेल जे पूर्णतया सजि कऽ तैयार छनि खास हिनके लेल। इएह कोबर घर साक्षी बनत नव-नव योजना-परियोजनाक। इएह कोबर घर साक्षी बनत भाषा-साहित्य केर सिनेहक। इएह कोबर घर साक्षी बनत वचन केर, चुपचाप वचन निमाहि देबाक। इएह कोबर घर साक्षी बनत ओहि नेंओं केर जाहि पर ठाढ़ हएत 32म-35म शताब्दीक मैथिली............."
प्रतीक्षा रहत,एहि कोबर घर सँ केहन नव नव योजना परियोजना बहराइत अछि,तकर।
भीमनाथ झा
विदेह पेटार: विदेह पोथी: प्रीति कारण सेतु बान्हल (सम्पादक-आशीष अनचिन्हार): विहंगम दृष्टिएँ देखल अछि। हुनक व्यक्तित्व-कृतित्वक प्रसार आ अहाँक संयोजन-सम्पादनकलाक विस्तार सहजहिँ झलकि जाइत अछि। एहि महत्वपूर्ण काज लेल भूरि-भूरि धन्यवाद।
प्रोफेसर देवशंकर नवीन
विदेह पेटार: विदेह पोथी: प्रीति कारण सेतु बान्हल (सम्पादक-आशीष अनचिन्हार): आभार आशीषजी। अइ सुविचारित आ सुलक्षण-सुदर्शन पोथी लेल बधाइ। एखन तऽ पल्लवग्रहिए नजरि दौड़ा सकलहुँ अछि, एतेक मेहनतिसँ कएल काजक अवगाहन लेल गम्भीर अध्ययनक प्रयोजन अछि, से पूर होइते फेरसँ गप करब। शुभाकांक्षी।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.गद्य
२.१.धनाकर ठाकुर- विषाणु: विष वा नव-जीवनक निर्माण
२.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव
२.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३५
२.४.लालदेव कामत-प्रगति के पथ पर/ मटाएल ज़िन्दगी/ प्रीति कारण सेतु बान्हल/ कर्पूरी ठाकुर जीकेँ भारतरत्न
२.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
२.६.कुमार मनोज कश्यप-श्रेय
२.७.आशीष अनचिन्हार- सार्थक बतकुच्चन (पोथी परिचय)
२.८.संतोष कुमार राय 'बटोही'- संतोष कुमार राय 'बटोही' केर डायरी 'लव यू टू'
२.९.डॉ. जय नारायण गिरि- पाठकीय दृष्टिमे 'रम्या'
२.१०.आचार्य रामानंद मंडल- पोथी परिचय: डा राम चैतन्य धीरज कृत मैथिली भाषाक वैचारिक अस्मिता
२.१.धनाकर ठाकुर- विषाणु: विष वा नव-जीवनक निर्माण
धनाकर ठाकुर
विषाणु: विष वा नव-जीवनक निर्माण
प्रस्तुत आलेखक लेखकक अनुसार ई लेख मैथिलीक पहिल मानक वैज्ञानिक आलेख भऽ सकैए जे कि राँची कॉलेज केर पत्रिकाक 1972-73 अंकमे छपल रहै। एहि आलेख केर प्रस्तुतिकरणक पाछू उद्येश्य जे जखन आइसँ 40-50 बर्ख पहिने एहन आलेख सभ आबि सकैए तखन वर्तमान समय जाहिमे मैथिल सभ बेसी शिक्षित भेल छथि तखन एहन आलेख किएक ने आबि रहल अछि। दोसर उद्येश्य ईहो जे एहि बातक निस्तुकी हो जे मैथिलीक पहिल मानक वैज्ञानिक आलेख कोन अछि? जा धरि कोनो आन दोसर आलेख प्रमाण सहित नै आबैए ता धरि निश्चिते ई आलेख मैथिलीक पहिल मानक वैज्ञानिक आलेख मानल जाएत। ई आलेख तीन रूपमे देल जा रहल अछि- 1) मूल मैथिली आलेख, 2) मूल आलेखक स्वयं लेखक द्वारा अंग्रेजीमे अनुवाद आ 3) राँची कॉलेज पत्रिकामे प्रकाशित आलेख केर पन्ना। लेख केर मूल पन्नाक वर्तनीकेँ हमरा लोकनि टाइप करैत काल अक्षुण्ण नहि राखि सकल छी ताहि लेल खेद अछि। ई सभ सामग्री लेखक द्वारा विदेह लेल भेटल अछि-संपादक)
"जीवन"क परिभाषा देबा मे जीव वैज्ञानिक आद्यावधि सफल नहि भऽ सकलाह अछि। वस्तुतः "जीवन" की कि? एहि प्रश्नक उत्तर मे एखन धरि टालमटोल चलि रहल अछि। "जीवन" निर्जीव वस्तु मे उत्पन्न भेल अछि। ई परिकल्पना विश्व मे प्रायः सर्वमान्य छैक। विषाणु (Virus) के अनुसन्धान एक क्रान्तिकारी अनुसन्धान थिक जे सम्भवतः "जीवन"क रहस्य खोलबा मे निकट भविष्य मे समर्थ होएत।
'वायरस, लॅटिन भाषा के एक शब्द थिक जे एक प्रकार के 'जहर'क नाम छैक। विषाणु या वायरस संसारक ज्ञात क्षुद्रतम, सरलतम ओ मौलिकतम प्राणी थिक। विषाणु जीवित ओ जीवित वस्तु के बीच एक कड़ी थिक से मुक्त अवस्था मे 'निर्जीव' अछि, किन्तु कुनो जीवित कोशिका में प्रविष्ट होइत देरी 'जीवित भऽ जाइत अछि। विषाणुक ज्ञान पहिले जीवाणु (बैक्टीरिया) मौलिकतम जन्तुक रूप मे सर्वमान्य छल। फ्रांसक प्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई पास्चर एवं जर्मन वैज्ञानिक राबर्ट कोय जीवाणु के अनेक रोग लेल उत्तरदायी ठहरोलन्हि। सन् 1866 में मेयर नामक वैज्ञानिक तम्बाकूक 'मोजाइक रोग' केर खोज कएलन्हि। सन् 1792 ई. में एक रूसी वानस्पतिज्ञ दिमिति इवानोवस्की 'तम्बाकूक मोजाइक रोग सँ ग्रसित तमाकूम पातक रस के विशेष विधि सँ छानि कऽ जीवाणु मुक्त केलाह। ओ एहि रस के किछु स्वस्थ तमाकूक पात पर छीटि देलखिन्ह।
पुनः स्वस्थ पात रोगाक्रांत भऽ गेल। छह वर्ष बाद किछु पशुक पैर एवं मुँह मे उत्पन्न एक रोगक कारण सेहो एक प्राणी के मानल गेल जे जीवाणुओं सँ छोट छल।
सन् 33- 34 तक एहन सैकड़ों मामला प्रकाशित भेल। आब वैज्ञानिक सब के एहि क्षुद्रतम प्राणीक अस्तित्व स्वीकार करए पड़लन्हि और ई विषाणु सैकड़ों मानव एवं पादप रोगक कारण मानल जाइत अछि। विषाणु एक मिलीमिटरक दू हजार भाग सँ लऽ कऽ एक लाख भाग तक होइत अछि। ई अतेक छोट होइत अछि जे एकरा बिना इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी सहायता से देखलो नहि जा सकैत अछि। विषाणुक संरचना सम्बन्ध मे मानव पूर्ण ज्ञान नहि प्राप्त कए सकल अछि। एखन धरि भेल अनुसन्धान सँ ज्ञात होइत अछि जे जन्तु एवं पादप मे विभिन्न रोग उत्पन्न कएनिहार विषाणु में केवल नाभकीय अम्ल एवं प्रोटोन रहैत छैक। विषाणु तीन मुख्य वर्ग में विभाजित अछि विषाणु, जन्तु विषाणु एवं जीवाणु (बैक्टीरिया) के भोजन कएनिहार जीवाणुभोजी विषाणु।
सब विषाणु प्रोटीनक बाह्य आवरण सँ निर्मित रहैत अछि जाहि मे राइबो न्युक्लिक (R.N.A.) वा डी-आक्सी-राइयो युक्तिक (D.N.A.) रहैत छैक। किछु पादप विषाणु आर.एन.ए सँ निर्मित रहैत छैक जखन कि किछु मात्र डी.एन.ए सँ। जीवाणुभोजी मे कोनो एक अम्ल रहैत छैक। एहि मे गोल 'माथ' एवं प्रोटीन निर्मित 'पूछ' पाओल गेलैक अछि। ई पूछ प्रचलनक काज मे अबैत छैक या नहि ई अज्ञात छैक- कारण इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शीक उपयोग सँ जीवित वस्तुक अध्ययन नहि कएल जा सकैत अछि।
सन 1935 में अमेरिकाक प्रसिद्ध विषाणु विज्ञानी स्टेनले सर्वप्रथम एक पादप विषाणु के खा कऽ रूप में प्राप्त कए सकलाह। आब तऽ अनेक विषाणु खाकृत कएल जा चुकल अछि। सन् 55 मे स्टैनले बच्चा मे 'पोलियो' रोग उत्पन्न करएवला प्रथम जन्तुज विषाणु के खाकृत कए मानव जातिक महान् सेवा केलनि अछि ।
विषाणुक उत्पत्तिक सम्बन्ध मे दू मत छैक प्रथम मतानुसार विषाणु सरलित (सरल भेल) जीवाणु छथि, आ द्वितीय मतानुसार विषाणु प्ररसीय या नाभिकीय कण अछि, जे स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त कए लेलक अछि। वस्तुतः एहि दुनू मतक मध्य मे कोन सत्य छैक ई कहनाइ असंभव। एकर उद्घाटन भेला पर शायद "जीवन"क रहस्य सँ एक पर्दा हटि जाएत।
चूँकि विषाणु नाभिकीय अम्ल सँ निर्मित अछि तेँ ई जीवित मानल जा सकैत छथि। किन्तु मुक्तावस्था मे ई निष्क्रिय रहैत अछिए तेँ हिनका अजीवित नहि मानल जा सकैत अछि। वस्तुतः ई सजीव ओ निर्जीवक मध्यस्थ छथि। जीवाणुक बीजाणु (Spore) सेहो किछु समय तक निष्क्रिय रहैत छैक।
विषाणु, सत्य मे विषक अणु अछि। हिनका द्वारा सैकड़ों रोग उत्पन्न होइत अछि। और एहि मे अधिकांश संक्रामक रोग अछि। ई छथि काफी छोट किन्तु रोग करक अतुल सामर्थ्य हिनका मे छन्हि।
मनुष्य मे अहिला, पोलियो, पीयर बुखार, अत्यन्त लाल (Scarlet) बुखार, इनफ्लूएंजा, सामान्य सर्दी, कैंसर, हाइड्रोफोबिया (जलांतक), विविध चर्म रोग, डेंगू बुसार, पंथ एवं छोट चेचक आदि बीमारी माल-जाल के मुख एवं पाद रोग, हैजा आदिक कारण यैह जन्तुज विषाणु मानल जाइत छथि। संगहि पादप विषाणु सेब, सीम, चुकन्दर, कोबी, खीरा, चिनिया बादाम, सरिसों, मटर, आलू, मुरई, टमाटर, टेपिओका, तम्बाकू, गहूँम आदि में 'मोज़ाइक' रोग उत्पन्न कए सम्पूर्ण पात के सुखा दैत छथि जाहि सँ खेती मे काफी नुकसान होइत छैक। कोबी मे कारी धब्बा, गाजर, चुकन्दर के पीयर भए जाएब, धान के लाल पीयर होयब आदि लक्षण यैह विषाणुक द्वारा उत्पन्न रोगक कारण देखना जाइत अछि।
यदि विषाणुक पूर्ण संरचना ज्ञात भए जाएत तऽ संभव अछि जे शरीर मे प्रतिपिण्ड (Antibody) उत्पन्न करा कैन्सर आदि भयंकर रोग सँ मनुष्य के त्राण होएत। प्रतिपिण्डक अणुक संरचना के बारे मे सेहो अनुसन्धान चलि रहल अछि। एहि वर्षक जीवशास्त्रक 'नोबल पुरस्कार' सेहो डा.जिराल्ड एम. एडेलमन एवं डा रोडने पोर्टर के 'प्रतिपिण्ड' के अनुसन्धान पर भेटलन्हि अछि।
ओ सर्वप्रमुख गप्प तऽ ई अछि जे यदि स्टैनले साहब द्वारा खाकृत निष्क्रिय विषाणु सँ वैज्ञानिक नव विषाणु बना सकताह, तs निश्चित रूप सँ मनुष्य नवीन "जीवन" के निर्माण (Creation of new- life) क बहुत समीप पहुँचि जाएत और प्रकृतिक रहस्य भेदन में समर्थ हएत।
Virus: Poison Particle or Genesis of New Life
Dhanakar Thakur
(An English rendering of the original article in Maithili published in the Ranchi College Magazine 1972-73, Dhanakar Thakur, Botany (Hons-Ist yr), 1973 batch, Ranchi College, Ranchi 834008)
So far biologists have not been able to give a definition of ‘Life’. Actually ‘What is life?’- So far there continues only procrastination answering this question. ‘Life’ has evolved from the non-living objects- this hypothesis is almost universally accepted. Search of virus, is a revolutionary research, which probably will be able to unfold the mystery of ‘life’, in near future.
‘Virus’ is a word from Latin language, which is the name of a type of poison. Poison particles or Viruses are the known tiniest, the simplest and the most fundamental beings. Viruses are a link amongst the living and the nonliving beings which are ‘non-living’ in Free State, but become ‘living’ as soon as they enter in any living cell.
Before the knowledge of viruses bacteria were universally accepted as the most fundamental organisms. The eminent scientist from France, Louis Pasteur and the German scientist Robert Koch held bacteria responsible for many diseases. A scientist, named Mayor in 1866 searched the ‘Mosaic disease’ of tobacco. In 1792, a Russian botanist Dmitry Ivanovsky by a special method filtered the juice of the leaves afflicted with the ‘tobacco mosaic’ disease to make it organisms-free and he sprinkled this juice on some healthy tobacco leaves. Again healthy leaves became diseased. After six years, an organism, smaller than the bacteria, were held as the cause of a disease in the feet and mouth of some animals. Till 1933-34, hundreds of such cases were published. Then the scientists were forced to accept the existence of such smallest organisms and such viruses are thought to the cause of such hundreds of human and plant diseases.
Viruses are from 2000th to 100000th parts of a millimeter. These are such tiny that they cannot be seen without the assistance of an electron microscope.
Man has not been able to have the complete knowledge of the structure of a virus. The research done so far suggest that the viruses casing different diseases in human and plants have only nucleic acid and protein.
Viruses are divided in three main divisions- plant viruses, animal viruses and Bacteriophage viruses which devour bacteria as their food.
Every virus is made of the outer layer of protein in which there is ribonucleic acid (R.N.A.) or deoxyribonucleic acid (D.N.A.). Some plant viruses are made of only R.N.A. while some others are made of only D.N.A. Bacteriophage has either of the acid. In these circular ‘head’ and protein-made ‘tail’ has been found. This ‘tail’ is used or not in the movement is not known because with the use of the electron microscope a living thing cannot be studied. In 1935, an eminent virologist of America, Stanley could be able to get a plant virus in the form of a crystal. Now many viruses have been crystallized. In 1955 Stanley did a great service to the humanity by crystallizing the first animal virus producing ‘polio’ in children.
There are also two views about the genesis of viruses. According to the first view, the viruses are the simplified (becoming simper) bacteria sand according to the other view viruses are cytoplasmic or nucleic particle which have attained free existence. In fact, which is the true in between these two views is impossible to say. Its revelation may probably will remove a curtain from the mystery of ‘life’.
Because viruses are made of nucleic acid they can be accepted as living. But in Free State they remain non-active so they cannot be taken as non-living. In fact, they are the mediators between the livings and non-livings. Spores of bacteria also remain non-active for some time.
Viruses are in fact ‘poison particles’. Hundreds of diseases are produced by them. And most of them are infectious. These are very tiny but they have immense potential to produce diseases. In man warts, jaundice, yellow fever, scarlet fever, influenza, common cold, cancer, hydrophobia, different skin diseases, dengue fever, smallpox and chicken pox etc. diseases and among domestic animals mouth and foot disease, dysenteries, etc. are caused by these animal viruses. Plant viruses as well in apple, beans, beet, cabbage, cucumber, groundnut, mustard, pea, potato, radish, tomato, tapioca, tobacco, wheat etc. are producing ‘mosaic disuses’ in leaves to make dry all leaves which does a substantial harm to the crop. Black spots in cabbage, turning yellow of carrot, beet, turning red-yellow of paddy- etc. symptoms are due to the diseases produced by these viruses.
If the full structure of viruses are known then it is possible that producing antibody in the body man can get rid of the scourge like cancer. The research is going on for the structure of the antibody. The Nobel Prize in the Life Sciences of this year has also been awarded to Dr. Gerald M. Edelman and Dr.Rodney R. Porter on the research of ‘antibody’.
And the most important thing is that if from the crystallized non-active virus of Stanley Saheb, scientists can be able evolve new virus, then certainly man will be reaching to very near to the creation new life and will be able to the unraveling of the mystery of the nature.
(It is probably the first standard scientific article in Maithili which can be used by anyone wherever liked. I was then of 17 years and even not a medical student. Everything is possible in Maithili or in any Indian language. I Received original photo of Maithili article on 21.1.2021 and translated same day. The Ranchi College Magazine in 1975 might have been soiled when my room was sealed in the National Emergency or not returned by someone taken was kindly retrieved by Sri Manikant Thakur of the BBC, from his friend Mr. Sushil Jayswal of Bakhtiyarpur. My gratitude to them as well as to also to my class friend Dr. Leelachand Saha, ex-Vice Chancellor, Tilka Manjhi Bhagalpur University who hinted me to contact Shri Manikant Thakur who was the editor of the Ranchi College Magazine 1972-73.).
(संभवतः ई मैथिलीक पहिल मानक वैज्ञानिक लेख अछि जकर उपयोग केओ कतहु करथि हमरा नीक लागत | अहाँक सूचनार्थ हम तखन 17 वर्षक रही आ 1973 क हमर ई वैज्ञानिक लेख अछि। मैथिलीमे सब संभव छैक। हम तखन मेडिकल छात्रहुँ नहि छलहुँ । मैथिल मे वा कोनहुँ भारतीय भाषामे सब किछु संभव अछि । मैथिली लेखक मूल फोटो 21.1.2021 क प्राप्त भेल आ ओही दिन अनुवाद भेल, 1975 मे राँची कॉलेज पत्रिका राष्ट्रीय आपातकालमे हमर कोठरी सील भऽ गेल छल से नष्ट भय गेल या किनकहुँ द्वारा लेल गेल वापस नहि देल गेल तखन बी.बी.सी.क श्री मणिकांत ठाकुर द्वारा कृपापूर्वक वापस प्राप्त कयल गेल छल बख्तियारपुरक अपने मित्र श्रीसुशील जयसवालसँ। हुनका सबक संग-संग हमर क्लास फ्रेंड डॉ. लीलाचंद साहा, पूर्व कुलपति, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्याल क प्रति सेहो धन्यवाद।- धनाकर ठाकुर
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.२.परमानन्द लाल कर्ण-एकादशीक उद्भव
ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.३.निर्मला कर्ण- अग्निशिखा खेप ३५
निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन।
(अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)
अग्निशिखा खेप -३५
पूर्वकथा
दानव राज केशि के पुत्री चित्रसेना उर्वशीक रूप धारण कs छल सौं राजा के संग अभिसार करवा हेतु आबि जाइत अछि। मुदा संदेह भs जयवाक कारण राजा ओकर अपमान कs दैत छथि। अपमान सs क्रोधित भय ओ श्राप दs दैत अछि राजा के।
आब आगाँ
जखन राजा पुरूरवा आ चित्रसेना के बीच संवाद चलि रहल छल,ओहि समय मधुवन में गंधर्वराज विश्वावसु सेहो अदृश्य रूप में उपस्थित छलाह।ओ उर्वशी सौं बात केलाक पश्चात ई सोचि-सोचि चिंतित छलाह जे कोना उर्वशी के अपना संग स्वर्ग में लs जयताह। कारण! हुनका नीक सs बुझल छलनि,ओ कतबो बुझा कs कहथिन परंच हुनका कहब सौं उर्वशी स्वर्ग नहि जेतीह। एतेक आसान नहि छैक उर्वशी के स्वर्ग लs गेनाई। हुनका कोनो एहन सूत्र नहि भेटि रहल छलनि जाहि सँs ओ उर्वशी केँ राजा सँ अलग कs सकथि।
ओ राजमहल के बाहर एहि चिंतन में डूबल ठाढ़ छलाह। तखन उनका मोन में विचार एलनि किएक नहि हिनका दुनू के निकट रहल जाय लगातार। हिनकर निकट रहबाक कारण भs सकैत अछि हुनका लोकनि के अलग करबा हेतु कोनो ने कोनो सूत्र भेटि जानि ।ओ एहि विषय पर सोचि रहल छलाह तखन देखलनि राजा पुरूरवा राजभवन सँs बाहर आबि रथ मे बैस रहल छथि । मुदा राजा असगर छलाह! तखन उर्वशी कतय छथि!
निश्चित अंतः पुर में होयतीह! किएक तs विश्वावसु किछु समय पूर्व स्वयं उर्वशी केँ अंतः पुर में देखने छलाथि । एतेक जल्दी हुनकर कतहु आर गेनाई सम्भव नहि छैक। यदि ओ एखनि फेर सौं उर्वशी केँ देखय जेताह तs हुनका देरी भs जेतैन्ह!राजाक रथ एतेक समय मे ओतय सँs दूर भs सकैत अछि। गन्धर्व राज सोचलनि,जँ राजाक रथ कतहु चलि जायत तँs राजा कतय गेलाह से नहि जानि सकब,तेँ हुनका उर्वशी के देखवाक विचार छोइड़ मात्र राजाक पाछाँ-पाछाँ चलबाक चाही।आ ओ राजाक पाछू वायु मार्ग सौं अदृश्य रूपेँ चलय लगलाह। अदृश्य रूपेँ चलैत-चलैत जंगलक बाहर रुकि गेलाह। कारण वन-प्रांत के बाहर कनिक काल धरि पुरूरवा के रथ रुकल छलनि। किछु समय उपरांत जखन पुरूरवा धीरे-धीरे वन में प्रवेश केलथि । गंधर्वराज हुनकर पाछाँ-पाछाँ वन में पहुँचि गेलाह। ओ राजा के पाछू लागल रहलथि।
ओतह ओ राजा पुरूरवा ओ चित्रसेनाके बीच घटित सब बात सुनलनि,संगहि सब व्यवहार सेहो देखलनि। हुनका प्रारम्भ सँs ज्ञात छलनि जे ओ उर्वशी नहि छथि,मुदा ईहो देखि रहल छलाह जे राजा भ्रमित छथि।ओ चित्रसेना के उर्वशी बूझि रहल छथि,ताहि कारण ओ दुनूक बीच घटित सबटा व्यवहार देखलथि एवं हुनक बात ध्यान सँs सुनैत रहलाह । ओ सब बात जे राजा पति-पत्नी के बीच घटित होइत बुझैत छलाह।पति-पत्नी के बीचक गुप्त बात जे आन केओ नहि बूझि सकैत अछि। मुदा ओsss .. गंधर्व राज! हुनका लोकनि के सभ बात सुनलथि,हुनकर भेद आ बात बड्ड नीक सs बुझलथि। एहि बात सँs ओ अत्यंत प्रसन्न छलाह,कारण हुनका हाथ किछु सूत्र जे लागि गेल छलनि जाहि सँs ओ उर्वशी केँ अपना संग स्वर्ग लs जा सकैत छलाह।
उर्वशी द्वारा राजाक संग लगाओल गेल विचित्र शर्तक विषय में हुनका ज्ञात भेलनि। एहि विचित्र शर्तक विषय मे जानि ओ आश्चर्यचकित भs गेलथि । उर्वशीक अभिभावक होयबाक कारणे हुनका बूझल छलनि जे उर्वशी अपन मेमना सs अत्यधिक प्रेम करैत छथि,अपन जान सँs बेसी ! मुदा ई बात! राजा के नग्न देखला पर हुनका छोड़ि स्वर्ग चलि जायब ? विचित्र शर्त छल!वनक बीचोबीच ठाढ़ गंधर्व राज अपन भविष्यक योजना बनेबा में व्यस्त भs गेल छलाह।
उर्वशी के पुरूरवा सs अलग करब अत्यंत कठिन छल! पुरूरवा सदिखन सतर्क रहय वाला व्यक्ति छैथ! ओ अपन चेतन अवस्था आ जागृत विवेक में रहैत उर्वशी के सामने नग्न कोना आबि सकैत छलाह! एहन दोषपूर्ण कार्य ओ सपनहुँ में कहियो नहि करताह ।
तखन.. ओ केवल यौन संबंधक समय मे नग्न रहि सकैत छथि!आ उर्वशी के एहि पर तs कोनो आपत्ति नहि छलनि!त.. त..तखन.. ..आ... .असमय में राजा कोना नग्न रहताह ? की शौच के समय ? आकि.. स्नानक समय में ? मुदा ओहि समय उर्वशी तs उपस्थित नहि रहतीह! हँ!जँ दुनू गोटेक संग स्नानक समय एहन भ' जाय तs .. अथवा भs सकैत अछि.. जल-क्रीड़ाक समय में! मुदा उर्वशी के संग जल-क्रीड़ा करैत काल राजा नग्न किएक रहताह ! एहन भयंकर गलती कहियो नहि करताह ओ । तखन की होयत?.. उर्वशी केँ राजा सँ कोना अलग कयल जाय।जहिना आइ भेलैक! ओना भ सकैत अछि! मुदा आइ चित्रसेना धोखा सँs अपन हाथ सँs नग्न कs देने छलैक। उर्वशी किएक करतीह एहेन काज ! ओ तs स्वयं राजा केँ छोड़य नहि चाहैत छथि,तखन ओ कहियो असमय में राजा केँ अपन हाथ सs नग्न कदापि नहि करतीह,तखन की करबाक चाही?
की चित्रसेना के मदद लेल जाय!की हम ओकरा सs भेंट करी आ ओकरा सs अपन मदद के लेल आग्रह करी? मुदा ओ एहि बात पर किएक सहमत हेतीह! आइ जतेक अपमानित भेल छथि,ओतेक अपमानित भेलाक बाद कहियो राजा लग एहि तरहेँ आबय के सोचबो नहि करती! स्त्रीअपन अपमान करय वाला के माफ नहि करैत छथि,बदला लैत छथि।चित्रसेना सेहो ई काज केलथि .. राजा के श्राप दs कऽ बदला लेने छथि । जौं नारी बदला लेबऽ मे सक्षम नहि भs पाबि सकथि ई काज ईश्वर पर छोरैत छथि,तखन हुनकर आह स्वयं शत्रु के जरा भष्म कs दैत अछि ।
मुदा स्त्री अपन प्रेमी के ककरो दूसर द्वारा छल के शिकार नै बनय द सकैत अछि,ताहि लेल चित्रसेना सs कोनो सहायता नहि भेटत! चित्रसेना के संग मिल कs ई काज नहि भs सकैत अछि।एहन स्थिति में की करबाक चाही,कोन माध्यम सs अपन वांछित लक्ष्य प्राप्त करबाक चाही! गंधर्वराज सोचैत रहलाह।
अचक्के एकटा विचार मोन में आबि गेलनि,जेना झमटगर बिजली चमकि गेल होनि।हँ! ई ठीके अछि! एकदम सही अछि! एहि बाट पर चलला सs उर्वशी पुरूरवा सँs विलग भs सकैत छथि।आ उर्वशी गंधर्वराज संग स्वर्ग आपस चलि जेतीह! ई काज भs सकैत अछि!
मन मे उठैत एहि विशेष विचार पर गंधर्वराज संतुष्ट भs मुस्कुराइत रहलाह। आब मात्र उचित समयक प्रतीक्षा छनि हुनका। आब गंधर्वराज प्रसन्न भs शान्त मुद्रा मे धीरे-धीरे राजभवन दिस बढ़य लगलाह। राजाक रथ पहिने चलि गेल छल,तेँ आब गंधर्वराज असगरे राजप्रासाद दिस जा रहल छलथि।
क्रमशः
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.४.लालदेव कामत-प्रगति के पथ पर/ मटाएल ज़िन्दगी/ प्रीति कारण सेतु बान्हल/ कर्पूरी ठाकुर जीकेँ भारतरत्न
लालदेव कामत
प्रगति के पथ पर/ मटाएल ज़िन्दगी/ प्रीति कारण सेतु बान्हल/ कर्पूरी ठाकुर जीकेँ भारतरत्न
१
प्रगति के पथ पर
'प्रगति के पथ पर' पढलहुँ एकसय आठ पन्नाक सद्यप्रकाशित पोथी ' प्रगति के पथ पर ' मैथिली प्रेरणा परिषद श्रीपुर (दरभंगा) सँ लेखक श्री मोहन यादव जीक हिन्दी पोथी सन् २०२३ मेँ बहराएल अछि। ई प्रिंटवेल टावर चौक दरभंगा (बिहार) सँ छपेलनि, एकर दाम ४०० टाका छैक। एहि गद्य पोथीके ओ अपन माता-पिता,काका-काकी, भाय-भौज'क सम्मान मेँ समर्पित कयने छथि। श्री मोहन जी वैज्ञानिक आधार पर समाजक लोकमे सुधार आनबाक लेल अपन जीवनके अनुभव गनबैत ई पोथी रचलैन हन्। एहि सँ पहिने हिनक २०१३ मेँ कारू चालीसा , २०१५ मे गजल संग्रह ' जे गेल नहि बिसरल' आ कविता संग्रह २०१८ मे ' समयक गति से' तथा २०२१ मे कथा संग्रह - सारांश निकलल य। एहि रचनाशीलता केँ देख हिनका भुवनेश्वर सिंह ' भुवन' राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान, साहित्य साधना सम्मान, पं० विपिन पाण्डेय हिन्दी सेवा सम्मान आओर यात्री पुरस्कार भेट चुकल छन्हि। दरिभंगा जिलाक सकरी कन्हौलीके निकट श्रीपुर गाममे स्नातक पास मोहन जीक जन्म सुकमारी देवी आ परमेश्वर यादव जीक घर ३१ दिसम्बर १९५० ई० केँ भेलनि। आओर स्व० मंजू गोपाल संग बियाह भेल रहनि। श्री यादव जी सहरसा सँ " सूत्रधार" पत्रिका केर सम्पादन करैत आबि रहलाह अछि। हिनक कहब छैन- " व्यवहारमे हम देखैत छी जे मंडील - महजीत , गिरिजाघर, आओर गुरूद्वारा'क संख्याँ जतेक बढ़ल य ,ओहिक खराय आ तामझाम जतेक राश बढ़लैक,तै सँ सहस्त्र गुणबेसी पापी लोकक संख्या बढि गेलैक हन्। ओकर दुःख द्रद मेँ खूबे बृध्दि भेलैक मुदा कष्ट निवारण किछ नै। गंगामे नहाति - नहाति अधिकतर लोक गंगाजलकेँ घोंकलक आ गन्दा केलक अछि। परंच किनको मोनक मोइल नहि मोलल गेल छैक। से सरिपहु आरो अधिक मोन मलिन होईत विचार- वेवहार दुर्गन्धित भेलैक अछि। लक्ष्मी पूजा भारतमे होइतो गरीबी छैक। मुदा रूस, अमेरिका,चीन, जापान, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, डेनमार्क, इजरायल, अरबके देश आ सिंगापुर धनिक छै,जहनकि ओतय लक्ष्मीजी नै पूजित होईछ। संगहि ओतुका देश म सरस्वती पूजन सेहो नहिं चलैन रहैत विद्वान तँ घनेरो छैक। हिनक पोथी पढ़ल लिखल समाजमे नवजागरण करय आ अंधश्रधा हटावय जे विस्वास जगैत अछि। पोथीमे यात्रा वृत्तांत'क एक रोचक दृष्टांत हिनका रचनामे इहो छैक,यथा-: १ जून २०१३ ई० । हमरा जीवनक एक एहेन परावकेर सुखद मुरेठ आयल जे आई ऐ मुकाम पर आबि गेल छी, जतयधरि पहुंचय ले जानि नै लोक कतेक जतन आ खरच करबाक वादो नहिये टा जा पबैत छैक। लोकक नियारल सपने धरि बनल रहि जाईछ, सपना साकार नहि भ' पबैछ। थाकि हारि लोक परियास करबो केनाई तखन छोड़ि दैछ। वा ई कहू जे ओ कालक भेंट वृध भ' चढ़ि जाईछ। ओई दिन हम बाबा रामदेव जीक पतंजलि केर फेज-२ स्थित पारकके मंडपमे बैस केँ लोकक आध्यात्मिक, मूर्तिपूजा, अंधविश्वास, पाखंड आ कर्मकाण्ड सँ संवंधित सबालके जवाब द'रहल छलूँह। हमरा समक्ष आ अगल-बगल बैठल लोकमे सँ एक रहथि बनारस जिलाके सारनाथ थाना अंतर्गत व्यासपुर निवासी जे दिल्ली संगम विहार केर रहयवाला बाबू प्रेमचन्द यादव जी। लगधक दूई घंटा धरिके प्रश्नोत्तरी केर वादे कियो कतौह गेलाह। सबसँ आखरिमे ओ हमर नाम पता पुछलनि,अपन सेहो नाम पता जनेलाह। इहो बतौलाह जे ओहो एतय वाल्मीकि आश्रममे टिकल छथि। कनिये कालक गप्प - सप सँ बुझना गेल जे हमरे जँका इहो मूर्तिपूजक नहिँ छैथि। आ प्रकृति आ विज्ञानमे विसबास करय बाला विद्वान छथिन। तेँ हमरा दूनूक बीच आत्मीयता क' भावना अंकुरित भेल जाइत रहय। रतुका खाना पतंजलि'क भोजनालय " प्रसादम् " मेँ कयलाक वाद दूनू गोटेए वाल्मीकि आश्रम केर अपन-अपन कोठलीमे सुतय चलि गेलहुँ। प्रातः भने भोजनालय केर उपर बनल योग साधना कक्षमे योगासन कयल,संगहि प्रभात कालीन सैर करैत बहरेलौँ। लगधक दू घंटा टहलबाक क्रममे एतेक लगीच आबि गेलहुँ जे आगू यात्रा संग - संग करबाक निठाही कएल। औतय सँ जलपान कयलासन्ता आश्रम डेरा पर एके कक्षमे आबि रहैत १० दिन ओहिठाम सँ हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून एवं मसुरी भ्रमण कयलहुँ । ताहिक्रममे केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमनोत्री आ गंगोत्री घुमय जेबाक नियार भेल। हरिद्वार सँ रिजर्व टैक्सी गाड़ी हमसब लैत गौरीकुंड पहुँचलौं। अगिला दिन भोरे जलखई खेलाक बाद पैदल केदारनाथ दिस विदा भेलहुँ। साँझमे केदारनाथ पहुँचल, घुमैत-फिरैत राति विश्राम कए अगिला दिन १६ जून 2०१३ केँ दुपहर 2 बजे गौरीकुंड लेल विदा भेलौ। करीब दस किलोमीटर चललाक बाद एकटा जोरदार हल्ला सुनबामे आयल। निकटमे कतहु भारी विस्फोट भेल अछि। एकर बाद एकटा अजीब आवाज लोकक पीछा करय लागल। आवाजक तीव्रता बढ़ि रहल छल। हम सभ तीस गोटे एक संग चलैत रही। कोनो अप्रिय घटनाक चिन्ता सँ हम सब डेराए गेल रही। हमरा सभकेँ किछु बुझबासँ पहिने सँ आगू बहैत मंदाकिनी नदी उग्र रूप लेबऽ लागल छल । उँच - ठाढ़ पानिक धारा करीब पन्द्रह-बीस फीट धरि सब किछु अपना संग ल' क' जा रहल छल। खतराके अशंका करैत हम सब तुरंत पहाड़ पर चढ़ि गेलहुँ। जे चढ़ि नहि सकल, ओ मृत्युक पचड़ामे खसि पड़ल। पहाड़क नीचाँ तबाही देखि हम सब खूब डरा गेल रही। ऊपर सँ लगातार बरखा हमरा सब लेल माथ दर्द बनि रहल छल। सबहक सोझाँ मृत्युक तबाही मचा रहल छल । किछ गोटेय नीचाँ नहि जा सकल आ ने ऊपर चलि सकल। जंगली शिकारी जानवरक डर अलगे-अलग परेशान करय बला छल। साँझ होबय बला छल आ राति मे भोजन, पीबय लेल शुद्ध जल आ आराम करयके जगह नहि छल. हमसब भय सँ अक्रान्त पहाड़ पर जागल राति बिता देलहुं। सब कियो भूख-प्यास सँ कानि रहल छल। जाड़सँ सिहरि रहल छलाह। चलबाक सामर्थ्य ककरो नहि छल। तैयो एखनो लोक चलैत छल। 'हर हर महादेव' सुना क' चारि गोटे केदारनाथ केँ प्यारा भ' गेल छलाह। रास्ता मे आओर कतेको मृत शरीर देखल गेल। नीचाँक बाट पानि मे डूबल छल। एकोटा घर कतहु नहि देखाइत छल। तेँ पहाड़ पर चलैत आगू बढ़ब हमरा लोकनिक मजबूरी छल । मरैतो पर लोक की नै करै छै। गाछक पात चीबाबैत आगू बढ़ैत छी। तेसर दिन हमरा लोकनि केँ जीवित रहबाक आशा फेर सँ भेटल। हेलीकॉप्टर सँ भोजनक पैकेट आ पानिक बोतल खसा देल गेल। किछु दवाई सेहो छल। भोजन केलाक बाद फेर आगू बढ़लहुं। चारिम दिन सेहो पहाड़ पर जंगल मे रातिजगा कय बिताबय पड़ल। पांचम दिन ४ बजे हमरा सबके हेलीकॉप्टर रेस्क्यू सँ बचा क' देहरादून केर कैंपमे आनल गेल। तुरत भोजन देल गेल आ जांच के बाद दवाई देल गेल। चारिमे दिन हमरा दुनू मित्रके एक-एक हजार रुपैया देल गेल आ घर जेबाक अनुमति भेटल रहय। ओहि त्रासदीमे करीब दस हजार लोकक मृत्यु भ गेल रहैक । किछु लोकक मृत शरीर तक नहि भेटलैक। हजारो घर तबाह भ' गेल। लोकके अरबों टाकाके नुकसान भेल छल, सड़क टूटि गेल छल। लगधग सबटा पुल नष्ट भ' गेल छल। बिजली आ इंटरनेट सेवा पूर्णरूप सँ बाधित भ' गेल। विनाशक मलबा चारू कात छिड़िया गेल छल। ककरो ख्याल रखनिहार कियो नहि छल। बाबा केदारनाथ सेहो एकदम सँ चुप भ’ गेलाह। आइ फेर केदारनाथ चर्चामे छथि , तेँ पुरान स्मरण तरो ताजा भ' गेल अछि । समाचारके अनुसारे मंदिरके अभयारण्यमेँ अरबों टाकाके सोनाकेँ पीतैरमे बदलल गेल अछि। चोरी आ बेईमानी करय वालाके हिम्मतके प्रशंसा महादेवके सामने गर्भगृह मेँ करय पड़त। हमरा लगैत अछि जे चोर, बेईमान, भ्रष्ट, बलात्कारी आ हत्यारा सोचैत अछि जे महादेव ओकरा कोनो नुकसान नहि क' सकैत अछि ! यैहटा कारण अछि जे मंदिरमे सेहो बिना कोनो भयके पाप होइत रहैत अछि | दोसर दृष्टांत सेहो देखू-: शनिपुराके शनिदेव मंदिर बहुत प्रसिद्ध छै | नित्यदिन देश भरि सँ भारी संख्याँ मे लोक पूजाक लेल एतय अबैत छथि । एक अनुमान केर अनुसारे एतय रोज दस क्विंटल सरसबके तेल, साठि सँ सत्तर हजार फूलडाली भरल आ करीब एक सौ क्विंटल मिठाई बिकाइत अछि। एकर अतिरिक्त लोक एहि मंदिर सभमे रोज करीब चालीस लाख टाकाक' दान दैत छथिन्ह. एहि ठाम होटल आ वाहन 'क कारोबार सेहो नीक अछि। पनपैत अछि। किराना, कपड़ा, फल, फूल आ सइंगआर- पेटारके दोकान सेहो कतौह सँ कम नहि अछि। हम अपन व्यवसायिक काज समाप्त कए अपन गाड़ी मे बैसि गेलहुँ। ड्राइवर साबुन कीनय लेल किराना दोकान पर ठाढ़ छल। एम्हर धरती एहि तरहेँ काँपय लागल आ काँपय लागल ऐ तरहेँ जे मीनटके भीतरे समस्त शनिपुरा खंडहर मे बदलि गेलै । मंदिरक अतापता सेहो गायब भ’ गेल। जे घरमे छल ओ मलबा केर नीचा दबि गेल आ जे बाहर छल ओ भागय लेल एम्हर-ओम्हर दौड़ैत हकमैत छल । हमर ड्राइवर भागि गेल। मुदा गाड़ी करीब सौ मीटर आगू बढ़लाक बाद फँसि गेल। ओतय सड़क फाटि गेल छल। किछुए कालमे हजारों गाड़ी आगू-पाछू फँसल। सब ठाम चिचियाहटि आ घबराएल के दृश्य छल। किछु लोक अपन जान बचाबय लेल गाछ पर चहैर गेल छलाह. हमहूँ ड्राइवरक संग गाछ पर चढ़ि गेलहुँ। बीस मिनटक बाद गाछ फेर काँपि उठल। जे किछु बचल छलैक धरती, ओकरा सेहो भस्म करबा पर झुकल छलैक। हजारो गाछ खसि पड़ल आ हजारो गाड़ी जमीन मे दबि गेल। धन्य हो। जाहि गाछ पर हम सभ शरण ल' रहल छलहुँ से नहि खसल। भरि राति ओही गाछ पर भोरक प्रतीक्षा करैत रहलहुँ । धरती बीच-बीच मे काँपैत रहल। मुदा एकर कोनो असरि नहि भेल। कम्पन कमजोर भ’ गेल छल। भोर होइते स्थानीय लोक गाछ पर स उतरि अपन परिजनके हालतके विषयमे पूछताछ केलक। जे बाहरक छल आ गाड़ी छलै, से अपन-अपन गाड़ी तकबा लेल निकलि गेल। हमहूँ ड्राइवरक संग गाड़ी खोजबा लेल निकललौं। गाड़ी दरारिमे एहन तरहेँ पैसल छल जे झट बाहर नहिँ निकालल जा सकल। आब हमरा सभकेँ खाली समस्ये समस्या छल। हमर घर साठि किलोमीटर दूर छल। ओतय पहुँचब आसान नहि छल। हमरा काफी भूख आ पियास लागि रहल छल। कतौह पानि नहि देखाइत छल। किछु खायके कल्पना तक करब असंभव छल। तखन हम ड्राइवरके संग घर दिस बढ़य लगलहुं। मुदा आगू बढ़ब बहुत कठिन छल। सड़क पर मलबा छिड़िया गेल छल। खसल गाछ सँ सड़क सेहो जाम भ गेल छल। कतेको ठाम दरारि पड़ल रोड सेहो हमरा सब कए आगू बढ़बा सँ रोकि रहल छल। तइयो मुईला पर की नहि होइत छैक? आगू बढ़बाक प्रयास करैत रहलौं। बाट ततेक कठिन छल जे एक घंटामे दू किलोमीटर पैदल तक नहि चलि सकलहुँ । भूख, प्यास आ अशोथकित देह ततेक ने बढ़ि गेल छल जे ठाढ़ रहब बढ़कठिन भ' रहल छल। खाइ-पीबैक कोनो सम्भावना नहि छल। बुझायल जेना बाँचल लोक भूख-प्यास सँ मरिए जायत। चारू कात कानखीज आ चिचियाहटि के कारण माहौल भारी भ रहल छल। ककरो सँ किछु माँगबाक वा मांग करबाक स्थितिमे कियो नहि छल । अन्हारमे सब कियो दौड़-धूप क’ रहल छल। खसल गाछ पर किछु काल आराम केलाक बाद फेर आगू चलय लगलहुँ । मुदा दस मिनट चललाक बाद हमर पैर जबाब दैत बाहर भ’ गेल। तखन ओतहि खसल गाछ पर बैसल। ओतहु किछु लोक बैसल आ लग मे पड़ल छल। करीब 12 बजे एकटा हेलीकॉप्टर हमरा सब पर पानिक बोतल आ बिस्कुट केर पैकेट खसौलक। हमर ड्राइवरकेँ चारि बोतल पानि आ पाँच पैकेट बिस्कुट भेटल। तखन हमरा लोकनि केँ किछ होश आबि गेल। हमसब फेर बिस्कुट आ पानि ल' क' आगू बढ़लहुँ। साँझमे एकटा शौचालयक आगू सड़क पर बैसि जाय गेलौह। ओतय बड़का भीड़ छल। शौचालय एतेक गंदा छल जे ओतय रहब कठिन छल। कतहु एक बूंद पानि नहि छल। ई सोचि हम सभ आगू बढ़लहुँ। कतहुँ बिजली नहि छल। चारू कात अन्हारक साम्राज्य स्थापित भेल। करीब सय मीटर आगू बढ़लाक बाद सड़कक कातमे एकटा छोट सन पोखरि देखबामे आयल। एतय सेहो बहुत भीड़ छल। दुरगंधसँ हमर नाक फाटल जा रहल छल। एखनो लोक जमल छल। ई ओकर मजबूरी छलैक। हमरा सभकेँ सेहो एहने मजबूरी छल। तेँ एतहि राति बिताबय नीक मानल गेल । अगिला दिन सूर्योदयसँ पहिने आगू बढ़लहुँ । दू घंटा चललाक बाद जान बचेबाक आशा छल। ओतय ग्रामीण केर सहयोग सँ भोजन बांटल जा रहल छल। खूब खयलहुँ। एतेक स्वादिष्ट पुरी तरकारी हमरा कहियो नहि नशीब भेल छल। गामक लोकक आग्रह पर गामक पोखरिक महार पर बनल स्कूलमे गेलहुँ । शौचालयमे शौच केलाक बाद पोखरिमे नहा लेलक सब। दू-तीन घंटा सुतलाक बाद फेर आराम सँ घर दिस विदा भेलहुं। मुख्य सड़क पर पहुँचलाक बाद फेर पुरी आ तरकारी खा कए आगू बढ़लहुं। पाँच किलोमीटर पैदल चललाक बाद हम सब सुखपुरमे राति बिताबयके निर्णय लेलहुं। एतय सेहो गामक लोक द्वारा राहत शिविर चलाओल जा रहल छल | अगिला दिन फेर सूर्योदय सँ पहिने आगू बढ़लहुँ। एखन धरि सवारी सड़क पर नहि चलि रहल छल। सड़क पर बड़का-बड़का दरारि पड़ल छल। किछु मोटरसाइकिल चलैत देखल गेल। बिजली आ इंटरनेट क सुविधा बाधित भ गेल। सात किलोमीटर पैदल चललाक बाद गामक लोक द्वारा संचालित राहत शिविरमे भोजन केलाक बाद फेर आगू बढ़लहुँ। एहि तरहेँ रस्तामे गामक लोक द्वारा संचालित राहत शिविरमे भोजन आ आराम केलाक बाद छठम दिन अपन घर पहुँचलहुँ । गाम आ घरक हाल सेहो नीक नहि छल। मुदा शनिपुरा सन स्थिति एतय नहि छल । एतय जान-मालके नोकसान कम छलै। किछु घर ढहि ढनमना गेल छल। मुदा बेसी घर मे दरक्का लागल छल। किछु घर आवासक लेल एकदम योग्य नहि छल । एतहु मोटरबला सड़क नहि छल। एहि ठाम सेहो बिजली आ इंटरनेटक सुविधा बाधित भ' गेल। तइयो एतय सेहो गामक लोक द्वारा राहत शिविर चलाओल गेल रहय | हमर परिवारक सभ सदस्य सुरक्षित रहथि। मुदा घर क्षतिग्रस्त भ' गेल। ओ रहय जीबय योग्य नहि छलैक। तेँ घरक बाहर एकटा अस्थायी शेडमे सब कियो रहैत छल । रातिमे सुतैत काल मोनमे किछु प्रश्न चमकय लागल। आखिर एहि देव-देव-देवताक कोन काज? एतेक मंदिर-मस्जिद आ चर्च-गुरुद्वारा किएक बनल अछि? एतेक पूजा, प्रार्थना आ इवादत कियैक होइत अछि? एतेक पाबनि आ व्रत किएक होइत छैक? एहि सबहक बादो चोरी, डकैती, बेईमानी, भ्रष्टाचार, ईर्ष्या, बलात्कार, हत्या, भूख, कुपोषण, रोग, महामारी, भूमकंप, बेसी बरखा, रौदी, अशिक्षा, महंगाई आ गरीबी किएक बढ़ि रहल अछि? ई देवता-देवता अपन घर किएक नहि बचा सकैत छथि ? मंदिरक मूर्ति चोराबय वालाके चोरी करय सँ किएक नहि रोकि सकैत छथिन्ह। हम भरि राति एहि सभ तरहक प्रश्नक उत्तर ताकैत रहलहुँ । अंत मे एकटा उत्तर छल - दृश्यमानक प्रमाण की अछि ? जे होइ छै, किछु दैत अछि। जे नहि होइत छैक से उ की देत खाक ! जातिय आधार पर भारतमे श्रेष्ठता बोध मानवता पर प्रश्नक नम्हर चेनहासि ठार करैत अछि। जातीयता संकीर्णता सँ ऊपर ऊठि मोहन यादवजी पैघोत बोधकेँ हीन भावना कहैत बुझू जे सिरे सँ खारिज करैत छैथ।
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मटाएल ज़िन्दगी
टटका मैथिली पोथी सगर राति दीप जरय'क कथा गोष्ठी बेरमामे दि० ३०-१२-२०२३ केँ सुसम्पन्न भेल रहय। ओहिठाम लोकार्पित 'मटाएल ज़िन्दगी' १०६ पृष्टक पोथीक दाम २०० टाका छैक। दू दर्जन नवकथा'क संग्रह , वयोवृद्ध कथाकार श्री कपलेश्वर राउत जी अपन स्व० पिता,माय ओ पत्नी केँ समर्पण कयने छथि। से पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ प्रकाशित करेबामे अपन ग्रामीण , दिल्ली हाईकोर्ट केर चर्चित अधिवक्ता बरमानन्द प्रसाद जीके सौजन्य सँ भेल छन्हि। सद्यप्रकाशित एहि पोथीक' आमुखमे वरेण्य साहित्यकार श्री नन्दविलास रायजी विस्तार सँ लिखने छथि - जे प्रायः सभ कथा पर संक्षिप्त रुपेँ प्रकास डालने छथि। ई सर्वश्री कपिलेश्वर बाबूक चारिम मैथिली भाषा साहित्यमे प्रकाशित पोथी छी। अपन बातमे लेखक महोदय परता परल सब कथाक प्रकाश्य लेल आभार जतेने छथि। पाठककेँ हिनक कथामे समाजक रीति-कुरीति, भेदभाव, अंधश्रद्धा, कट्टरपंथी जे गाम देहातमे देखबामे अबैछ ; ताहि संदर्भमे नव दिशा देखबैक आगू डेग बढेला अछि। पोथिक चर्चा करैत कहब एहिने पहिल कथा आयल अछि - दाही रौदी' कमलाक छहर टुटने तीन दिन पहिले ५०-६० गाममे बाढ़ि आयल ' भुटकून मचान पर गर लागल रहैछ, कारण आँगनघर जल सँ उबडूब भेल छै। ओ करिया काका लग जाकए काकीक चाह पिबैत बाढ़ि समस्या सँ खेती आ दहनाल केर गप्प चलेने छैक। बिरारक उंचका खेत पर करबाक काका अपन अनुभव गनबैत रौदी सँ दाहीके नीक बतबैत रहैछ। पहिले ओहि खेतमे तरकारी उपजाबैत रहय, से ऐबेर धान उबजाएत । प्रल्यंकारी जे भीषण बाढ़ि २०-२५ दिन धरि बढ़ल रहलैक ताहिमे नरुआर आ गोपलखामे बेसी क्षतिक बनसव्त एने एको कोन उपजबे करतैन जजात से आश जगैत छै। आन उपकथाक अंशत: चर्च सेहो भेल छैक। गंगालाभ शिर्षक - बाबाक संस्कारमे जहिना मास करैत जीबीतेमे बेटा ठोठमोकिया दैत सिमरियामे गंगालाभ केने रहथि, तहिना श्यामचरण बुढ़ मायके जीवतेमे गंगाजीक अगम पानिमे धकेलैत देखेलाह। धरि गाममे श्राधकर्म आ रसगुल्लाक भोजक बाद निनमे सपन देखैत चौकैत छै। खराप शीर्षक - कथामे कहलगेल छैक जएह वस्तु ककरो लेल नीक, सयह वस्तु अनको ले बेजाय होइछ। सुलोचना दादीक बालपनमे रविन्दर खीसा सुनने रहय बीरबल बाला। से मल सँ घीननै , जैविक उर्वरक खेतीलायक आ पैघ वयस भेलासन्ता दिल्ली पंजाब पलायन नहि कय गामेमे कृषिकार्य उन्नत रुपेँ करैत जिला स्तरीय सम्मान धरि पबैत छैक। गोलमाल पंचायत चुनाव शिर्षकमे - बिकासपुर पंचायतमे जीबकान्त बाबाक वार्तालाप उदयकान्त सँ होइछ, जाहिमे टाका पाबि कर्मचारी बोटक गनतीमे कोना हेड़फेर करैत हारल केँ जीता दैत छैक। से समस्या प्रखंडमे धरणा आ जिलामे अनशन कार्यक्रमके जरीय भष्टाचारक देखार कयल गेलैक। अनेक विकासकार्यमे धांधली बावत चर्चामे आजादीक लड़ाई क' पुरान संघर्ष संदर्भ सेहो विस्तार सँ चर्चा भेल छै। मराएल जिनगी शिर्षक - केन्द्रीय कथामादे नन्दविलास रायजी कथाक एक अंश लेखकक लेखनी द्रष्टव्य रुपेँ रखने छथि; यथा-ऐ कथाक मादे कथाकारक एकटा कहब छैन जे जँ समयकै चिन्ह कऽ नइ काज करब तँ पछाइत जीवनमे निराशा आ पछतावाक अतिरिक्त आर किछु नहि भेटत। आ दोसर कहब छैन जे खराप काजक नतीजा खरापे होइ छइ। फूलचन्द्र काकाकै तीन लड़कामे मोहन माझिल अछि जे बी.ए. धरि पढ़लैन, माने बी.ए. पास केलैन।कलिकापुर आओर संतनगरमे पिताजी फूलचन्द काका आ मामा रामअवतार हाईस्कूलमे नौकरी करए लेल मोहनसँ कहलकैन तँ मोहन बजला- "अतेक जे पढ़लों से नौकरीए करैले।" मोहनक बातसँ फूलचन्द काका चुप्पे भऽ गेला। की बजितैथ? मुदा रामअवतार भागीन मोहनकै कहि देलखिन- "जा नीक नइ बजलह हेन।" तीन भाँइक भैयारीमे मोहन बेसी पढ़ल-लिखल रहैथ तँए परिवारक जुति-भाँति वएह लगाबए लगला। सामन्ती सोचक मुताविक चलए लगला। नियतमे बदनियत आबि गेलैन। अपना धिया-पुताकें नीक नजैरसँ आ भाय सबहक धिया-पुताकें हेय दृष्टिसँ देखए लगला। नतीजा भेलै जे परिवारमे खटास उत्पन्न भऽ गेलै आ किछु दिनक पछाइत परिवारमे भिनभिनौज भऽ गेलइ। मोहन बेटा सभकें पढ़ौलैन-लिखौलैन। जेठ बेटा नेनादत्त कौलेजमे प्रोफेसरीमे गेला आ छोट बेटा किसान सलाहकारक पदपर रोजी-रोटीक जोगार केलैन। मोहनक दुनू बेटा अप्पन-अप्पन परिवार लऽ बाहरे रहए लगलैन। मोहनकै कोनो तरहक आर्थिक सहयोग नहि करैन । तखन मोहनकें गुजर-वसर करैमे दिक्कत होमए लगलै। तखन ओ नौकरीक लेल परियास करए लगला। तावत उमेरो 57-58 वर्षक भऽ गेल रहेन। 'का बरखा जब कृषि सुखानी' बला कहावत भऽ गेलैन । पछाइत मोहन गामक खानगि धिया-पुताकँ पढ़बए लगला। किछु दिनक बाद पत्नी मरि गेली। आब तँ आर दिक्कत भऽ गेलैन। आब ओ बिक्षुब्ध भऽ गेला। अपनेसँ भानस-भात केनाइ, धिया-पुताकें पढ़ौनाइ, कनी-मनी खेती केनाइ। आब ई सभ हिनका जपाल बुझना जाइ छेलैन, मुदा बेटा सभ लेल धैनसन । एक दिन मोहन बेमार पड़ि गेला। पैखाना-पेशाव बन्द भऽ गेलैन। छटपट्टीमे ओसारपर सँ गिर पड़ला आ पैरक घुट्ठीक एकटा हड्डी टुटि गेलैन। जखन समाजक लोक आ परिवारक भाए-भैयारी सभ डॉक्टर लग लऽ गेलैन तँ मोहन डॉक्टरकै कहलखिन- "मरैबला सुइया दऽ दिअ, डाक्टर साहेब।" मोहन अपना जिनगीसँ तेतेक निराश भऽ गेला जे अस्पतालोमे डॉक्टर जे दवाइ खाइ लेल देने रहेन से नहि खा अगल-बगलमे फेक दैत रहथिन। अन्न-पानि त्यागि देलैन, नतीजा पनरहे दिनक भीतर प्राण-पखेरु उड़ि गेलैन। ऐ संग्रहक सभ कथा रुचिगर आ प्रेरक अछि। श्री कपिलेश्वर राउतजीकें सहृदय धन्यवाद। घुसखोरी, ओझरी, उच्छन्नर, महामारी करोना, जन आन्दोलन, मायबापक कर्ज, चेफरी, त्रिशंकु, कपटीबाबा, कदीमा एवं जाइतिक बन्हन खूबनीक कथा अछि। लोड़ही आ गोबरकढ़नी, गीदर भभकी, बेइमान नेता, बापक आंगा बैटाक योग्यता, कोरा कागज तथा मशीनबाला चाउर लघुकथा सनियाएल छैक। कथा क्रम सुचिमे कपिलेश्वर राउतजीक चारिम पोथी 'मराएल जिनगी' पृ. ९ आ अपनबात -१४ पृष्टपर अनुपयुक्त ठाम लगौनाई प्रकाशकक भुल थीक। संगहि चौदह गोट कथा पृष्ट १० पर आ २२ टा कथा पृ. १४ मेँ उल्लेखित अछि जे भ्रामक य।
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प्रीति कारण सेतु बान्हल
एकटा नव चर्चित मैथिली भाषा साहित्यमे प्रकाशित पोथी 491पृष्टक एकरा आई एस बी एन (9789334009569) प्राप्त भेल छैक। सद्यप्रकाशित एहि पोथीक' रचियता आशीष अनचिन्हार जीके साहित्य जगतमे खुब विशेष रूप सँ वाहवाही भेटैत छैन। आशीष अनचिन्हार जीके मूलनाउ थिकैन -: आशीष कुमार मिश्र,जिनक जन्म 4 दिसम्बर 1985 ई० केँ भटराघाट, बिस्फी (मधुबनी) निवासी कृष्ण चन्द्र मिश्र आ गमभीरा देवी जीक घर भेल छन्हि।एहि पोथीमे पाठककेँ ई-विदेह केर सम्पादक वरेण्य साहित्यकार श्री गजेन्द्र ठाकुर जी आ प्रीति ठाकुर जीक साहित्यिक योगदानक विस्तार सँ चर्चा कयल अनेकों संदर्भ पढबाक सुअवसर भेटैत छैक। हमर एकटा छोटसन आख्यान सेहो छपल भेटत ऐ पोथीके सार्वजनिक पुस्तकालय आ घरेलू पुस्तकालय मेँ सहेजकेँ राखल जा सकैछ छी आ वर्तमान मैथिली साहित्य आन्दोलनक गतिविधि सँ सरोकार जोड़ी सकैत छी।
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कर्पूरी ठाकुर जीकेँ भारतरत्न
सादगीके प्रतिमूर्ति ,महान् व्यक्तित्वके पुतला , अतिपिछड़ा 'क बेटा दिवंगत कर्पूरी ठाकुर जीकेँ भारतरत्न केर उपाधि भेटला सँ हम अत्यंत प्रसन्न छी। समरासन लाखों पढल - लिखल लोक अत्यंत खुशी मनाबैत हुनक जन्मशती समारोहके पूर्व संध्या पर मोदीजी के केन्द्रीय सरकार दिश सँ महामहिम राष्ट्रपति कार्यालय केर विज्ञप्ति जारी होइते स्वत: धन्य -धन्य कहलनि अछि। गुदरीके लाल वीर कर्पूरी ठाकुर जीकेँ मरणोपरांत चिरप्रतीक्षित माँग हुनक जन्म शताब्दी वर्षमे " भारत रत्न" भेटला सँ अतितमे हुनक कयल संघर्ष सदा स्मरण भ' उठलैक। जननायक केँ जानय - बूझय लेल 'कर्पूरी संग्रहालय ' पटना पहुँच अवलोकन कय सकैत छी। ओतय निहरला सँ हुनक सरकारी निवासमे राखल हुनकर डेबल १५० वौस्त धरोहर रूपेँ व्यवस्थित राखल छन्हि। से सहजे बुझाइत अछि जे ओ केहन सादगीक मनुख छलाह। ओ अपन राजनीतिक जीवनमे कारी कोठलिक दाग अपना उपर नहिं लागए देलनि। बिहार क' राजधानी पटना शहर स्थित सूबेक दोसर उपमुख्यमंत्री आओर दूबेर एगारहम मुख्यमंत्री रहल जननायक कहौलाह। हुनका नामे आवंटित सरकारी बंगला केँ १९९० ई०मे स्मृति संग्रहालय बनावल गेलैक। देशरत्न मार्ग स्थित अवस्थित राजभवन आ मुख्यमंत्री आवासके एकातमे ठाढ़ ई ढ़ांचा आब कला संस्कृति आ युवा विभागक देखरेखमे छैक। ओहि शासकीय डेरापर १७ फरबरी १९८८ धरि जीबैत काल पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, डॉ ० राममनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, धनिक लाल मंडल जी सन - सन राजनेता हुनका सँ भेंट परामर्श लेल अबैत रहलाह। प्राथमिक कक्षाक' हमरा पाठ्यक्रम मेँ पढ़ौनी भेल रहय ' पटने का वाढ : संकट का सामना ' से १९ सितम्बर १९६९ केर प्रल्यंकारी भीषण वाढिमे हुनक निरीक्षण करयबला भरिडांड़ पानिमे ठाढ़ हेबाक अनोखा फ़ोटो देखल जाईछ। प्रसिद्ध संग्रहालयमे डेढसय हुनक कठिणताक दस्तावेज रूपेँ सजाओल राखल चीजवस्तु अवलोकन करय लेल छैक। सयनकक्ष सँ ल' के वस्त्र,बेग, घड़ी, कलम, स्नातक पढाय केर अंकपत्र आ इसकूलके प्रमाण पत्र ओ चेशमा लौकैत छै।
राजनीति केँ सामाजिक बदलावके ओजार मानैत ओ अपन राजनीतिक यात्राके क्रममे उपेक्षित आ वंचित वर्गक लेल अगूआ सदन सँ सड़कधरि बनल रहलाह। ओ निजी जीवनमे मिलनसार लोक रहथि ,ताहि कारणेँ सरकारी कामकाज पछुवा जाईत रहनि। सन् १९६० बैचके बिहार कैडरके आईएएस यशवंत सिन्हा जी हुनक प्रधान सचिवक हैसियत सँ दैनिक रूटीन बना देने रहैनि , मुदा ओ तैयो लोकसभ सँ भेँटघांटमे अधिक समय लगाबैत रहलाह। वादमे १९५१ बैचके बिहार कैडर आफिसर पीएस अप्पू केँ अपन मुख्य सचिव बनौलनि आ हाईकोर ईमानदारीके बेमिसाल परिचय देलनि। स्व० कर्पूरी जी व्यक्तिगत जीवनमे एकदम साधारण लोक रहथि। सधारण जीवन यापन आ सधारण भोजन पसीन करथि। जनताक भीड़ सँ बचबाक परियास करथि मुदा लोक अपना बेगरते शौचालय पर्यन्त तकके गेट लग कतार लगा दैन। ताहि कारणेँ ओ समय सँ जलखै कलौ धरि नै क' पबैत छलाह। दोसरो ठामक मुख्यमंत्री हुनक बात मानि अगिला डेग बढाबैक। मुंगेरी लाल कमीशन आ कोन कोन न आयोगके परता परल प्रतिवेदन केँ जनहित मेँ समक्ष आनबामे कसरि नहिं रखलाह। आरक्षण आ अधिक पछुआएल लोकक ओकालति खातिर हुनका अपमानों सहय पडलनि। हुनक जातिगत फार्मूला केँ देशभरिमे पहचानिके लागू करबाक खगौट छै। तखने समानताके अधिकार संवैधानिक लक्ष्य प्राप्त करत। जय कर्पुरी!
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
रबीन्द्र नारायण मिश्र
ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
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हम आ रमा भोरे उठि गेल रही। ओसारापर बैसल बाहरक दृश्य देखैत रही। भोरे मुरली सेहो आबि गेल। राति होटलमे बितओलक। एहिठाम ओकरा असोकर्ज होइतैक। अबिते अपन खेरहासभ कएह लागल-
"हम की करू। हमर संगिनी धोखा दए देलक। अखन धरि जे किछु कमेने छलहुँ सभपर हाथ मारि निपत्ता भए गेलि। ओना हमरा ओकर गतिविधिपर बहुत दिनसँ सक रहए, मुदा एना करत से उम्मीद नहि रहए। हम तँ सभकिछु ओकरे नामे केने रही । ओ गेलि, संगे हमर सभकिछु लेने चलि गेलि। आब हम करू तँ की करू? रच्छ भेल जे एकटा लाकर बाँचि गेल। ओहीमे किछु रहि गेल अछि। बैंकसँ से किछु कर्ज भेटि जाएत। किछु अहाँसभ मदति कए दितहुँ तँ हम एक बेर फेर जीबाक प्रयास करितहुँ । नहि तँ हम गेल घर छी। बुझबैक जे मुरली नामक केओ छलै जे आब एहि दुनिआमे नामो निसान मेटा गेल। भावी प्रबल।"
ओ तेना-तेना ने बाजल जे रमा कानए लगलीह।
"एना नहि बाजह। हमरासभ लग जे किछु बाँचल अछि से तोरेसभक छह। जाहिसँ जान बाँचि जाह से करह।"
ताबे शालिनी सेहो ओहिठाम आबि गेल। रमाक बात सुनितहि ओ बीचेमे लपकि लेलक।
"से कोना हेतैक। हमरोसभक तँ हिस्सा होएत कि नहि? श्याम जहल काटि रहल अछि, ओकरो तँ बचेबाक छैक। सभसँ ऊपर अहाँसभ अपन जीवनक तँ सोचू।"
शालिनीक बात सुनितहि मुरली ओकरापर झपट्टा मारलक। लागल जेना आब ओ शालिनीक जान लेलक। बीचमे हम कुदि गेलहुँ। मोसकिलसँ थोड़-थाम लगओलहुँ ।
"तूँसभ अनेरे परेसान छह। हमरा लगमे कोनो अथाह संपत्ति नहि अछि जे तोरासभक आवश्यकताक पूर्ति करैत रहब। हमरासँ बेसी उम्मीद राखबे व्यर्थ थिक।"
हमर बात सुनि कए मुरली ओहिठामसँ उठि गेल आ धरधरा कए नीचाँ चलि जाइत रहल। रमा सेहो उठि गेलीह। शालिनी बकर-बकर हमर मुँह देखैत रहलि। मुरलीकेँ एहि तरहेँ तमसाएल आ खिन्न चलि गेलाक बाद रमाक रक्तचाप अचानक बहुत उच्च भए गेलनि । मोन एकदम व्याकुल भए गेलनि। माथ लागनि जे फाटि जाएत। हमसभ तुरंत एम्बुलेंस बजओलहुँ आ हुनका उठा-पुठा कए अस्पताल लए गेलहुँ। हुनका तँ दस तरहक बिमारी पहिनेसँ छनिहे। ऊपरसँ ई तनाओ सभ जहरक काज केलक। ओमहर श्याम जहलमे बंद अछि,श्यामक स्थिति डमाडोल भए गेल छैक,शालिनी सेहो रहि-रहि उत्तेजित भए जाइत अछि। कहि नहि ओकरो मोनमे की छैक? ओना ओकरा कोनो चीजक कमी तँ नहि छैक। हमरासभक प्रतिए आदर आ सहानुभूतिक भाओ सेहो छैक।
रमा अस्पतालमे भर्ती छथि। हम असगरे प्रतीक्षालयमे हुनकर नीक हेबाक समाचारक हेतु प्रतीक्षारत छी। सामनेमे महादेवक मंदिर अछि । ओहिठाम केओ भक्त नचारी गाबि रहल छथि-
"शिव हे उतरब पार कओन बिधि..।"
नचारी गओनिहारक स्वरमे अद्भुत माधुर्य अछि। तुरंते मोनकेँ घिचि लेलक। हमहूँ महादेवक आराधनामे तल्लीन भए जाइत छी। ओएह पार लगओताह।
"वृद्धावस्थामे आर केओ अपन नहि ...।"
हम ध्यानमग्न छलहुँ,नचारी सुनैत छलहुँ कि माइकपर रमाक नाम सुनि चौकलहुँ-
"रमाक संगे जे आएल छथि से हुनकासँ वार्डमे भेंट करथि। ओ आब ठीक छथि।"
रमाक हालतिमे सुधार भए गेल छलनि। आब डाक्टरसभ हुनका घर लए जेबाक अनुमति दए देने छलनि। बहुत रास दबाइ आ परहेज करबाक छलनि। से सभ बात सिस्टर हमरा बुझा देलक। शालिनी सेहो आबि गेल छल। हमसभ रमाक संगे अपन घर वापस पहुँचलहुँ। आब शालिनीकेँ सेहो अफसोच होइक जे अनेरे ओ माएक सामनेमे मुरलीसँ विवाद कएलक। माएक जानसँ फाजिल किछु नहि भए सकैत अछि। अस्तु,ओ मोने-मोन सोचि लेलक जे आब ओ माए-बेटाक बीचमे नहि पड़ति। जे लिखल छैक से हेतैक । ओकर उद्येश्य सदिखन नीके रहैक। ओ चाहैत छलि जे एहि बएसमे हमरासभकेँ आर्थिक भार नहि पड़ए। मुदा जखन जाने नहि बाँचत तँ टाका रहिए कए की होएत? अस्तु,ओ आब एहि विवादसँ कात भए गेलि।
क्रमशः रमाक हालतिमे सुधार भेलनि। मुरलीकेँ ई सभ किछु पता नहि रहैक। ओ ओहि दिनक चर्चाक बाद बेंगलुरु चलि गेल। ओकर कारखाना स्थापित करबाक धुन आर तेज भए गेलैक। जतए ततएसँ टाकाक जोगारमे लागि गेल। हमसभ दिल्लीमे अपन फ्लैटमे भने रही मुदा रमाक ध्यान सदिखन कखनहु मुरलीपर ,कखनहु श्यामेपर लटकल रहनि। हम लाख बुझेबाक प्रयास करिअनि रमाक मोन शांत नहि होनि । आखिर हमही कहलिअनि-
"एना तँ अहाँ अनेरे मारल जाएब? एहिसँ बढ़िआँ जे मुरलीकेँ बजा कए जे करबाक होअए से कए लिअ। श्यामकेँ तँ हमसभ किछु नहि कए सकैत छी। ओ तँ अमेरिकाक कानूनसँ बंद अछि आ ओही कानूनसँ छुटि सकत तँ छुटत।"
आखिर रमा मुरलीकेँ फोन कएलनि। मुरली तँ जेना बाटि ताकि रहल छल। ओ सँझुकाक फ्लाइटसँ दिल्ली बिदा भए गेल। एमहर मुरलीक अएबाक कार्यक्रम बनल,ओमहर शालिनी ,नम्रताक संगे मुम्बई चलि जाइत रहलि । हम ओकरा रोकबो नहि केलिऐक। आखिर एक-ने-एक दिन तँ ओकरा वापस जेबेक रहैक,से गेलि।
रातिमे दसबजे मुरली पहुँचल। एहि बेर ओ बेस विनम्र छल। एहि बातसँ प्रसन्न छल जे शालिनी वापस मुम्बई चलि गेल । आब ओ जे चाहत से कए सकत।
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प्रात भेने हम दुनू बेकती मुरलीक योजनाक बारेमे चर्च कए रहल छलहुँ । आपसी चर्चाक क्रममे मुरली बेर-बेर इएह कहए जे ई योजना सफल हेबे करत। एहिसँ हमरसभक भाग्य पलटि जाएत। बस शुरु करबाक देरी अछि । एकहु बेर ओ नहि कहए जे ओकरा हमरासभसँ कतेक टाकाक दरकार छैक। हमसभ तकर बाद कोना रहब तकर कोनो चर्चा नहि होअए? ओ बेंगलुरुमे रहत कि बादमे कतहु आर चलि जाएत तकर कोनो ठेकान? ने ओ कहिओ स्पष्ट केलक जे ओकर संगिनीसँ विवाद भेलैक किएक? ओकर आपसी संबंधक लक्ष्मण रेखा की छल,किछु छलहो कि नहि?मुदा रमाक हालति विचार करैत हमहूँ बहुत मोसकिलमे रही। यदि ई अखने चलि गेलीह,हिनका किछु भइए गेलनि तखन हम ई टाकासभ राखिए कए की करब? मुदा शालिनीक बातोमे बहुत दम छलैक। ओकरा कोनो लोभ-लालच नहि रहैत छैक। ओ तँ हमरेसभक हेतु चिंतित रहैत अछि। से बात मुरलीकेँ किएक नीक लगतैक? ओ तँ शालिनीकेँ देखिए कए तमसा जाइ छल । आब तँ ओ गेल। हमहूँ किछु बजबाक स्थितिमे नहि छी। मुदा एकटा काज हमरा फुराएल । हम अपन नामक सभटा एफडीकेँ बचा लेबाक निर्णय केलहुँ । एकर जनतब तँ रमोकेँ नहि छनि। आइ भोरे जखन मुरली हमरासभक लग बैसल तँ तुरंत ओएह बातसभ शुरु कए देलक।
" हमरा कम सँ कम चालीस लाख टाका चाही। आर सभटा जोगार भए गेल अछि। "
"एतेक टाका किएक चाही?"
"कारखाना लगतैक, कोनो माछक दोकान थोड़बे खुजतैक।"
"रमा हमरा दिस बकर-बकर ताकि रहल छलीह।"
हम कहलिऐक-
"हमरासभ लग कुल पचीस लाख टाका अछि। ओहो संयोगेसँ बाँचि गेल। ओहिमेसँ किछु तोरा मदति कए सकैत छी।"
"हद भए गेल। लगैत अछि जेना हम भीख मागि रहल होइ। अहाँक टाकामे कोनो बरक्कति तँ नहि भए रहल अछि। बैंकमे राखल अछि। आइ-काल्हि एफडीपर कोनो फएदा तँ छैक नहि। कारखाना चलि जाएत तँ कैक गुना कमा लेब।"
आखिर हमसभ पचीस लाख टाका ओकरा देबाक हेतु तैयार भए गेलहुँ । आखिर ओहो एतेकपर मानि गेल।ओ बैंकक खाताक जानकारी देलक। हमसभ बैंक जा कए ओकर खातामे पचीस लाख टाका पठा देलिऐक। तकर बाद हम दुनू बेकती सोचि रहल छलहुँ जे आब मुरली हमरासभक जान बकसि देत। मुदा ओ तँ प्रात भेने फेर एकटा नव प्रस्ताव लए उपस्थित भए गेल। कहैत अछि-
"अहाँसभक उपकार बिसरल नहि जा सकैत अछि । लगैत अछि जे आब कारखाना शुरु भए सकत। मुदा एकटा काज रहि गेल।"
"की?"
"बैकसँ कर्ज लेबामे एकटा भांगठ भए रहल अछि।"
"की कहि रहल छह?"
"प्रबन्धकक कहब जे कोनो अचल संपत्ति जेना मकान, खेत, बैंकक नामे बंधक राखए पड़त। तखनहि बैंकक कर्जा भेटि सकत। जखन कारखना चलि जाएत तँ ओहि संपत्तिकेँ मुक्त कए देल जाएत आ कारखनाक कागजेसँ बैंक काज चला लेत।"
हम चुप रहि गेलहुँ । किछु सोचेबे नहि करए? रमा से अबाक रहथि। "वृद्धावस्थामे यदि मकानो चलि जाइत रहल तखन हमसभ कोना जीब?कतए रहब?"-हम कहलिऐक।
"अनेरे बेसी नहि सोचू। मकान तँ ठामहि रहत। हम कोनो ओकरा उठा-पुठा कए बेंगलुरु थोड़े लेने जाएब । हमर कारखाना चलबाक देरी अछि। जहाँ से भेल कि अहाँक मकानक कागज लौटा देत बैंक।"
"हमरा किछु समय दएह। हमसभ आपसमे बिचारि लैत छी।"
एतबे बाजल होएब कि मुरली तमतमा कए ओतएसँ उठि गेल । बिना किछु आर बजने अपन झोरा उठओलक आ फ्लैटसँ बाहर निकलि गेल ।
मुरली भने बाहर रहैत छल। कम सँ कम ओकरासँ निचैन रहैत छलहुँ । जहिआसँ ई बेंगलुरु आएल,हमरासभकेँ परेसान कए देलक अछि। टाका तँ लइए गेल । आब मकानोपर हाथ साफ करए चाहैत अछि। की करी,की नहि करी किछु फुराए नहि रहल अछि। रमा से तखनसँ चिंतित छथि।
हम तँ ओकरा टाका देबाक पक्षमे नहि रही। कारण ओकर कोनो अपने ठेकान नहि छैक से कारखाना की चलाओत? यदि ततबे होसगर रहितए तँ लंदनमे ई गति किएक होइतैक। फेर एहि बातक कोन ठेकान अछि जे कोनो नव लफड़ा नहि कए लेत? की पता कइए लेने होअए?कहीं हमरासभकेँ अन्हारमे रखने होअए?
"बात सहीओ भए सकैत अछि? मुदा करबे की करबैक? यदि अपने बेटा शत्रु भए जाएत तखन तँ भगवाने मालिक।"
हमसभ रातिमे किछु नहि खेलहुँ। दुनू बेकती पेटकुनिआ देने रहलहुँ। भोरे कहुना कए रमा चाह बनओलीह। दुनूगोटे रातुक जगरणासँ बेदम भेल छलहुँ । होअए जे ठामहि खसि पड़ब । चाह पीबए लगलहुँ तँ कनीक मोन फरीछ भेल । एतबेमे शालिनीक फोन आएल-
"कोना छी?"
"कोना की रहब?"
"अबाज बहुत भारी बुझा रहल अछि।"
"की की कहियह? बाजलो नहि भए रहल अछि।"
"माए कहाँ अछि।"
"कतए रहथुन? एतहि छथि। चाह पीबि रहल छथि।"
हम फोन शालिनीकेँ पकड़ा दैत छिऐक।
माए-बेटीमे बड़ीकाल धरि गप्प होइत रहल। हम ताबे सहटि कए मंदिर चलि जाइत छी।
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हम मंदिरसँ लौटलहुँ तँ रमा सुति गेल रहथि। मोबाइल फोन बगलमे राखल छल। लगेमे फोटोसभक एलबम राखल छल। ओहिमे मुरली,श्याम,शालिनीक नेनाक फोटोसभ छल। हमसभ कतहु-कतहु घुमए जाइ तकरो फोटोसभ छल। एकटा फोटोमे पड़ोसी आ हमरपरिवारक समेकित फोटो सेहो छल। हम बेरि-बेरि ओकरा देखि रहल छलहुँ कि हमर फोनक घंटी बाजल।
"ई तँ पड़ोसीक फोन लागि रहल अछि।"
हम तुरंत फोन उठबैत छी।
"बहुत दिनपर मोन पड़लिअह।"
"की कहैत छह? हमर पत्नीक स्वास्थ्य खराप रहैत छलनि । ओहीमे लागल रही।"
"आब की हाल छनि?"
"की रहतनि?"
"से की?"
"काल्हि हुनकर केओ हत्या कए देलक?"
"से केना?"
"हम तँ दबाइ आनए बाहर गेल रही। घरमे केओ नहि रहए। हमर पुतहु सेहो कतहु गेल रहथि। बेटा तँ मास दिनसँ सहरसँ बाहर गेल अछि। एहन परिस्थितिमे केओ हुनका असगर पाबि कए हत्या कए देलक। घरमे जे किछु सामान छल से सभ लूटि लेलक। की करी किछु नहु बुझा रहल अछि?"
"हे भगवान!ई तँ बड़ जुलुम भेल। एतेक वृद्ध आ दुखित आदमीकेँ के हत्या केलक?"
पड़ोसी फोनेपर कानए लागल। ओकरा की कहितिऐक?कोना कए बुझबितिऐक? किछु फुरेबे नहि करए। रमा सेहो ओतहि रहथि। ओहो पड़ोसीसँ गप्प करए चाहलथि। हम हुनका फोन देबो केलिअनि। मुदा गप्प नहि भए सकलनि। फोन कटि गेलैक।
हम आ रमा पड़ोसीक पत्नीक अकाल मृत्युक समाचारसँ बहुत दुखी भए गेलहुँ। एहन नीक लोककेँ एतेक कष्ट ? किछु बुझा नहि रहल अछि जे एहि संसारक की नियम अछि? दुष्टलोकसभ सुखी देखाइत अछि आ नीक लोकसभ जीवन भरि कष्ट काटैत रहि जाइत अछि।
हम आ रमा पड़ोसीक जिज्ञासाक हेतु बेंगलुरु जेबाक विचार करैत छी। दोसर दिन भोरे हबाइ जहाजसँ बेंगलुरु बिदा होइत छी। दुपहरमे हमसभ पड़ोसीक ओहिठाम अचानक पहुँचि जाइत छी। हमरासभकेँ आएल देखि ओ कनी शांत भेल। अपन दुख कहए लागल। हमसभ ओकर बात ध्यानसँ सुनि रहल छी। एतबहिमे पुलिस आएल । ओ पड़ोसीक पुतहुकेँ बजबैत अछि। ओकरासँ प्रश्नपर प्रश्न पुछैत अछि। अपना भरि ओ बहुत सफाइ देलकैक मुदा पुलिस संतुष्ट नहि बुझाइत छल। ओ सीसीटीभीक डिस्क निकालि कए अपना संगे लेने गेल। पड़ोसीक पुतुहुकेँ सेहो साँझमे थाना आबए कहलकैक। एहि बातसँ पड़ोसी आर चिंतित रहए। एक तँ पत्नी चलि गेलखीन ऊपरसँ पुलिसक चक्कर से लागि रहल छल। की करितए? कोनो उपायो नहि छलैक। साँझमे पड़ोसी पुतहु संगे थाना बिदा भेल। हमरोसभकेँ संगे चलबाक आग्रह केलक। हमसभ ओकरा संगे थाना पहुँचैत छी। लागल जेना पुलिस बाटे ताकि रहल छल। पड़ोसीक पुतहुकेँ देखितहि थानेदार चिचिआ उठल- "दुष्टा कहींके? तोरा एतेक वयोवृद्ध महिलाकेँ मारैत दया नहि भेलौक?"
"की बाजि रहल छह?"-पड़ोसी चिकरल।
"अहाँ चुप रहू। सीसीटीभीमे सभटा बात फरिछा गेल अछि। बूढ़ीक हत्या इएह केलक अछि।"- पुलिस ओकर पुतहु दिस इसारा करैत छैक।
"ई तँ हद भए गेल? तोरा लगमे एकर कोनो प्रमाण छह?"
"बिना प्रमाणकेँ हमसभ किछु नहि करैत छी?"
पुलिस हमरासभकेँ सीसीटीभीक फुटेज देखाबए लागल। सचमुचमे पड़ोसीक पुतहु बूढ़ीकेँ असगर पाबि कए गला दबा देलकैक। बुढ़िआ बहुत छटपटेलैक। फेर निःशब्द भए गेलैक। एहि दृश्यकेँ देखि हमसरासभकेँ ठकबिदोर लागि गेल । बजले नहि होअए। पड़ोसी तँ तामसे आगि भए गेल छल। पुतहुकेँ गला पकड़ि लेलक। बहुत मोसकिलसँ पुलिस ओकरा हटओलक।
"की कए रहल छी? जहलमे सड़ि जाएब। कानूनकेँ अपन काज करए दिऔक।"
पुलिस ओकर पुतहुकेँ गिरफ्तार कए लेलक। पुलिस हमरासभकेँ थानासँ बिदा कए देलक । हमसभ पड़ोसी संगे वापस आबि गेलहुँ ।
कहि नहि सकैत छी जे पड़ोसीक की हाल छल?पुतहु एना करथिन से तँ ओ सोचिओ नहि सकैत छल? दिल्लीसँ ओ बेंगलुरुक अपन घरमे आबि गेल छल। बेटा पुतहु पहिनेसँ ओहि घरमे रहैत छलैक। ओ सभ कोनो व्यापारमे लागल छल। नीक गुजर होइत छलैक। मुदा कोरोना कालमे ओकरसभक व्यापार बैसि गेलैक। अर्थाभावमे परिवारमे दिन-राति कलह होमए लगलैक। ओही बीचमे पड़ोसीक पत्नीकेँ बिमारी बढ़ि गेलैक । ओकरा चलते पड़ोसीक बेटा-पुतहुमे दिन-राति झंझटि होइ रहैत छलैक। मुदा तकर अंत एहन दुखद होएत से के सोचि सकैत छल। हमसभ अपना भरि ओकरा बहुत बुझेबाक प्रयास केलहुँ। मुदा गुड़क मारि धोकरे बुझैत अछि। कहला-सुनलासँ की होमएबला छलैक? एक तँ ओकर पत्नी मरि गेलैक दोसर पुतहु जहल चलि गेलैक । देखिते-देखिते ओकर पूरा घर बरबाद भए गेल रहैक।
हमसभ बेंगलुरुमे एक सप्ताहसँ रही। से जनतब मुरलीकेँ नहि रहैक। आब जखन पड़ोसीक हालति कनी-मनी सुधरलैक,ओ परिस्थितिसँ उबरि रहल छल तँ हमसभ वापस दिल्ली जेबाक विचार केलहुँ । दिल्ली वापस हेबासँ पहिने एकबेर मुरलीक हाल-चाल लेबाक मोन भेल। हम ओकरा फोन लगबैत छी। मुदा ओमहरसँ किछु उत्तर नहि अबैत अछि। फोनक घंटी बजैत रहि जाइत अछि।
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हमरासभकेँ दिल्ली जेबाक हेतु बिदा देखि पड़ोसी भोकारि पारि कए कानए लागल। आब की करू? ओकरा की कहिऔक?कोना कए बुझबिऔक? ओकरा संगे भेलैक तँ बहुत अन्याय,सेहो अपने लोक द्वारा । मुदा आब की कएल जाए? कानून अपन काज कए रहल छल,ओकर पुतहु जहल गेलि। आब ओकरा वापस हेबाक कोनो संभावना नहि रहैक। तखन रहि के गेल जे पड़ोसीक संग देत? एहि घटनाक बाद बेटा से बौराएल छैक। कखनहु पत्नी तँ कखनहु पड़ोसीकेँ गरिअबैत रहैत छैक । मुदा आब तँ ई सभ चलिते रहत। हमसभ कइए की सकैत छी? अस्तु,बहुत अछता-पछता कए हम दुनू बेकती बेंगलुरुसँ बिदा भेलहुँ । भोरके हबाइ जहाज छल। एहनो हालतिमे पड़ोसी हबाइ अड्डा धरि जेबाक आग्रह करैत रहए। हमही बहुत जोर दए ओकरा मना कए देलिऐक।
"परेसानीमे पड़ि जेबह। हमसभ चलि जाएब। तूँ कथुक चिंता नहि करह।"
जेना-तेना हमसभ हबाइ जहाजपर चढ़ि गेलहुँ । घरमुँहा रही,अपन कर्मभूमि दिल्ली वापस होइत रही। नीक लगैत रहए। मुदा पड़ोसीक चिंता रहबे करए। मुरलीसँ से भेंट नहि भए सकल। तकर अफसोच से रहए।
"पड़ोसीक मोनक व्यथा बूझल जा सकैत छल। जीवन भरि ओ अपन परिवारक कल्याणक हेतु काज करैत रहल। एक मात्र संतान छलैक ओकर पुत्र। ओकरा नीक सँ नीक शिक्षा देबाक प्रयास केलक। ओ व्यापार करए चाहलक, ताहूमे मदति केलक। ओ अपन पसिंदसँ बिआह केलक, सेहो सहर्ष स्वीकार केलक। दिल्लीक नौकरीसँ सेवानिवृत्तिक बाद बेंगलुरुमे अपन मकानमे बेटा, पुतहुक संगे रहबाक इच्छासँ ओ अपन पत्नीक संगे आएल छल। मुदा अपन सोचलाहा थोड़े होइत छैक। घटनाक्रम एहन रूप धए लेत, ओकर अपने पुतहु ओकर दुखित, वयोवृद्ध पत्नीक हत्या कए देतैक,से के सोचि सकैत छल? आब तँ जे हेबाक से भए चुकल छल । ओहिपर घमरथन केलासँ की फएदा? मुदा ई बातसभ सोचि कए मोनमे कष्ट तँ होइते छैक,हेबेक चाही।"
हम इएहसभ सोचैत रही कि हबाइ जहाजमे जलखै भेटि रहल छलैक। हमरोसभक सामनेमे जलखैक डिब्बा राखि देल गेल छल। हमसभ किछु नहि खेलहुँ। डिब्बाकेँ ओरिआ कए राखि देलिऐक जाहिसँ बादमे ओकर उपयोग कए लेब। चाह जरूर पीबि लेलहुँ। दुनू बेकती दबाइसभ सेहो खा लेलहुँ आ अखबार पढ़ए लगलहुँ । थोढ़े कालक बाद आँखि लागि गेल। जखन निन टूटल तँ हबाइ जहाज दिल्ली हबाइ अड्डापर उतरि रहल छल। यात्रीसभ उतरबाक हेतु साकंछ भए रहल छलाह। हमहूँ अपन झोराकेँ ठेकानैत छी। रमाकेँ सतर्क करैत छी। हबाइ जहाज आब स्थिर भए चुकल अछि। यात्रीसभ अपन-अपन समानक संगे उतरबाक व्योंतमे पाँतिमे लागि चुकल अछि। हमहुँसभ पाँतिमे ठाढ़ भए जाइत छी। यात्रीसभक संगे लगीचेमे ठाढ़ भेल बसमे चढ़ि जाइत छी। हबाइ अड्डासँ बाहर हेबाक हेतु तत्पर छी। सामने प्रीपेड टैक्सी केन्द्रपर टैक्सीक टिकट लेबाक हेतु पाँतिमे ठाढ़ होइत छी कि सामनेमे मुरलीए सन लोक देखाइत अछि। हम नीकसँ ओकरा ठिकिअबैत छी। हँ,हँ ई मुरलीए अछि। आब ओ अपन टैक्सी आरक्षित कराओत। ओहीक्रममे पाछू दिस देखैत अछि तँ हमसभ देखाइत छिऐक।
अहाँसभ कतएसँ आबि रहल छी?
"बेंगलुरु गेल रही। पड़ोसीक हाल-चाल लेबाक हेतु।"
"मुदा हमरा कहबो नहि केलहुँ?"
"कैकबेर फोन लगेलिअह। मुदा फोन नहि लागल।"
"हम बेंगलुरुसँ बाहर रही। रातिएमे वापस अएलहुँ ।"
तकरबाद तँ ओ बहुत भावुक भए जाइत अछि। माएकेँ गोर लगैत अछि। हमरो गोर लगैत अछि। हमसभ एके टैक्सीमे वापस अपन डेरा दिस बिदा होइत छी।
हमरासभकेँ घर पहुँचा कए मुरली कतहु चलि जाइत रहल। जाइत-जाइत कहैत गेल-
"हम किछु जरूरी काजसँ निकलि रहल छी। साँझ धरि फेर आएब।" हमसभ किछु नहि बाजि सकलहुँ। रमा एक बेर जरूर कहलखिन-
"जलखै तँ कए लितह?"
"कोनो बात नहि। साँझमे एतहि भोजन करब। कारखानाक काजे आएल छी। कनीके लेल काज रुकल अछि। अहाँसभ मदति करितिऐक तँ काज जल्दीए सलटि जाइत। अखन प्रबन्धक नीक लोक अछि। ओकर बदली होमएबला छैक। यदि ओ चलि गेल तखन फेरसँ प्रयास करए पड़ि सकैत अछि।"
हमसभ किछु उत्तर नहि देलिऐक। ओ चलि जाइत रहल। हमसभ सोफापर चुपचाप बैसल रहि गेलहुँ ।
मुरलीकेँ चलि गेलाक बाद दिनभरि हमसभ गुनधुनमे रही। ओकर बात मानि कए मकानक कागज ओकरा सुंझा दिऐक। यदि किछु गड़बड़ भेल आ मकान चलि जाइत रहल ,तखन एहि बएसमे हमसभ कतए जाएब? यदि ओकरा मकानक कागज नहि देबैक तँ ओ घरमे अशांति केने रहत?एही माहौलमे रमा शालिनीकेँ फोन लगबैत छथि। तूँ सभ बेंगलुरु गेल रहए तँ मुम्बई किएक नहि आबि गेलैं?"
"ओहिठाम माहौल बहुत गड़बड़ भए गेल रहैक। तकर बाद कतहु जेबाक मोन नहि भेल। सोझे अपन डेरापर चलि अबैत रहलहुँ । दिल्ली हबाइ अड्डापर मुरली भेटि गेल। ओहो दिल्लीए अबैत रहए।"
"तँ ओकरासँ बेंगलुरुमे भेंट नहि भेल रहौक की?"
"कहाँ भए सकल । हमसभ पड़ोसीक ओहिठाम रहि गेलहुँ । ओ ततेक परेसान रहए जे ओकरा असगर छोड़ब संभव नहि भेल।"
"मुरलीक की हाल छैक?"
"ओकरा तँ ओएह धुन सबार छैक। कारखाना लगाओत। ताहि लेल मकानक कागज चाही।"
"एहन गलती हरगिज नहि करिहैँ। मकान हाथसँ निकलि जेतौक तँ कतहुकेँ नहि रहबैं ।"
"हमहूँ तँ सएह सोचि रहल छी। मुदा... ।"
"मुदा की? अड़ि जो ।"
"मोसकिल छै ।"
"तखन भोगबैं ।"
शालिनीक फोन कटि गेल कि ओ काटि देलक। हम रमाक मुँह बकर-बकर देखैत रहि गेलहुँ । रमा सोफापर बैसि गेलीह निःशब्द,चेष्टाहीन, जेना कोनो मुरुत राखल होइक।
40
साँझमे हम महादेव मंदिर चलि गेल रही। दिल्लीमे रहैत हमर ई दैनिकचर्यामे सामिल छल। घरसँ थोड़बे फटकी महादेव मंदिर छल। हम आ हमर किछु मित्रसभ ओहिठाम साँझमे एकत्रित होइत छलहुँ । महादेवक आरतीक बाद भजन,कीर्तन तँ होइते छल,आपसमे दुख-सुख सेहो बतिआइत छलहुँ । एक हिसाबे ओ हमरसभक क्लब छल ।
ओहि दिन जखन हम मंदिरपर रही तँ मुरली हमरसभक घरपर आएल आ माएक पैर पकड़ि कए कानए लागल। माए तँ माए भेलि। पुत्रक कष्ट नहि देखल गेलनि। ओ द्रवित भए गेलीह। पुछलखिन-
"आखिर तूँ चाहैत की छह?"
"से कोनो तोरा बूझल नहि छौ?"
"बुझौअलि नहि बुझाबह। फरिचा कए बाजह।"
"कहलिऔक तँ जे कारखानाक काज रुकल अछि। बैंकमे तोहर मकानक कागज किछु दिनक हेतु जमा कएल जाएत तखने हमरा बैंक कर्ज देत।"
"ठीक छै।"
से कहि रमा भीतर गेलीह । आल्मीरासँ मकानक कागज निकाललीह आ ओ मुरलीकेँ थम्हा देलखिन। मुरलीक प्रसन्नताक अंते नहि छल। ओ कागज झोरामे रखलक आ तुरंत ओहिठामसँ घसकि गेल। जाबे हम घर वापस आबी ताबे सभकिछु साफ छल। हम जखन घरमे प्रवेश केलहुँ तँ रमाकेँ बहुत उदास देखलिअनि। पुछलिअनि-
"की बात? अहाँ बहुत दुखी बुझा रहल छी।"
"मुरली आएल छल।"
"मुदा ओ अछि कहाँ?"
"चलि गेल।"
"एतेक जल्दी।
"ओ मकानक कागज लेल बहुत कानि रहल छल। परेसान छल। हमरा नहि रहल गेल। हम ओकरा कागज दए देलिऐक। कागज भेटितहि ओ इएह-ले ओएह-ले चंपत भए गेल।"
"जुलुम भए गेल। आब तँ मकानो गेल। एहि बएसमे रहब कतए?"
"एहनो केओ सोचए। सोचिते छी तँ नीक सोचू। अपन संतान अछि। ओकर कष्टपर हमसभ ध्यान नहि देबैक तँ के देत?"
"आब तँ जे हेबाक छल से भइए गेल। आब चिंता केलासँ की होएत? आगू ईश्वरक इच्छा।"
आखिर हमरसभक दिल्लीक मकान बन्हक पड़ि गेल। आब इएह आशा छल जे मुरलीक कारखाना चलि जेतैक, ओकरा अपन कारबारमे नफा हेतैक आ हमरसभक मकानक कागज ओ बैंकसँ वापस आनि देत। हमसभ बहुत दिन धरि एही आशामे रहलहुँ । मुरलीक फोन प्रतीक्षा करैत रहलहुँ । रमा हमरा बुझाबथि आ हम रमाकेँ । मुदा एहिठामसँ गेलाक बाद मुरली कहिओ फोन नहि करए। हमसभ फोन करिऐक तँ ओकर फोन "नाट रिचेबल" बाजए लगैक। संभवतः ओ फोन बदलि लेलक,अथवा कतहु चलि गेल। किछु तँ कहबाक चाहैत छलैक? तरह-तरहक बात मोनमे अबैत रहैत छल। रच्छ छल जे किछु टाका हम बचा कए रखने रही। फेर हमरा दुनूगोटेकेँ पेनसन भेटैत छल। तेँ तत्काल कोनो आर्थिक परेसानी नहि छल। मुदा घर तँ घर होइत अछि। घर एकटा परिचय थिक,थाकल-ठेहिआएल लोकक आश्रय थिक।
हमसभ गाहे-बगाहे मुरलीक चिंता करैत रहैत छलहुँ । एक दिन एहिना ओसारापर बैसल रही कि रमा कहलीह-
"हमरासभकेँ एक बेर बेंगलुरु चलाबक चाही। ओतए मुरलीक हालचाल सद्यः लए सकैत छी। देखिओ सकैत छी जे ओकर कारखाना कोना चलि रहल अछि। पड़ोसीसँ सेहो भेंट कए लेब। यदि पार लागत तँ ओहीठामसँ मुम्बई सेहो चलि जाएब । घरमे रहैत-रहैत थाकि गेल छी। मोनो बदलि जाएत।"
"ठीके कहलहुँ। हम टिकटक ओरिआन करैत छी।"
हम तुरंत हबाइ जहाजक टिकट कटेबाक हेतु एजेंटसँ गप्प केलहुँ ।
"परसूक टिकट भेटि गेल।"
"ठीके रहल। दू दिनमे एहिठामक चीज-वस्तुसभ सरिआ लेब। किछु बैंकक काज सेहो अछि। सेसभ निपटा कए एहिठामसँ निचैन जाएब।"
देखिते-देखिते दूदिन बीति गेल। हमसभ हबाइ अड्डा बिदा भए गेलहुँ । एहिबेरक हमरसभक यात्राक जनतब शालिनीकेँ नहि रहैक । रमाकेँ ओकरा फोन करबामे संकोच होनि। ओ नहि चाहथि जे मकानक बन्हक पड़ि जेबाक समाचार ओकरा भेटैक। कारण ओ एहि बातसँ बहुत दुखी भए सकैत छलि।
दिनमे चारि बजेक लगभग हमसभ बेंगलुरु हबाइ अड्डापर पहुँचि गेलहुँ । ओहिठामसँ मुरलीक पतापर टैक्सी आरक्षित करओलहुँ । घंटा भरि जिलेबी जकाँ टैक्सी घुमैत रहि गेल। मुदा ओहि घरक कोनो अता-पता नहि लागल। तकर बाद हमसभ ओकर कारखानाक पतापर पहुँचबाक प्रयास केलहुँ । मुदा ओकरो कोनो थाह-पता नहि लागि रहल छल। टैक्सीबाला बहुत तमसा गेल छल। आखिर हमसभ एकटा होटल लग ओकरा छोड़ि देलिऐक । थाकि तँ गेले रही। भेल जे पहिने किछु आराम करी । तकर बाद देखल जेतैक। होटलमे एकटा कोठरी आरक्षित करओलहुँ आ समान संगे ओहि कोठरीमे चलि गेलहुँ ।
हमसभ होटलमे पहुँचि थोड़ेल काल आराम केलहुँ। तकर बाद भोजन केलहुँ । रमा बहुत थाकि गेल रहथि। ओ सुति रहलीह। हमहूँ ओतहि टगि गेलहुँ । तंद्रित अवस्थामे सपनाइत छी। देखैत छी जे हमसभ एक बेर फेर अमेरिका श्याम लग पहुँचि गेल छी। ओकरा जहलसँ छोड़ा लैत छी। फेर ओकरा संगे बेंगलुरु अबैत छी। एतए मुरलीक कारखना पर मुरली भेटि जाइत अछि। हमसभ श्याम,मुरलीक संगे मुम्बई शालिनीक डेरापर पहुँचि जाइत छी। मुदा ओतए ने शालिनी अछि ने ओकर पति। नम्रता असगरे कानि रहल अछि। चिचिआ रहल अछि। हमर मम्मी-पापा कतए चलि गेलाह। ओकर करुण क्रंदनसँ हमर आँखि खुजि जाइत अछि। सपना बिला जाइत अछि। हम किछु-किछु बड़बड़ा रहल छी। हमर अबाज सुनि कए रमाक निन टूटि जाइत छनि। कतहु किछु नहि छल। मुरली,श्याम,शालिनी केओ नहि। सभटा हमर मतिभ्रम छल, आर किछु नहि।
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२.६.कुमार मनोज कश्यप-श्रेय
कुमार मनोज कश्यप
श्रेय
'गुदड़ी मे छिपल लाल' ई मुहावरा ओकरा मामला मे सत्ये अक्षरशः चरितार्थ भेलै। ओकर घरक दयनीय आर्थिक हालत पर की कहल जाय? मुदा पढ़बाक आ किछु करबाक तेहन ओकर ललक जे भुखलो पेट हाथ मे किताबे! अपन सीनियर सभ सs माँगल किताब, नोट्स आ ओकरे सभक छोड़ल पुरान कॉपी के सादा पन्ना जमा कs कs बनल कॉपी ....! परीक्षा फीसो पर तs आफते छलै; कोचिंग के भारी-भरकम फीस ओ जुटबितै कतs सs ......? एहन गरदनिकाट प्रतियोगिता मे बिनु कोचिंग आ मार्गदर्शन के सफलता ओकरा स्वयं कहुखन सन्दिग्धे बुझाईत छलै। तैयो ओ हारि नहिं मानलक आ जुटल रहल अपन मेहनत मे .... राति-दिन एक केने। विधिक विधान! ओकरा नहिं केवल सफलते भेटलै अपितु अखिल भारतीय दोसर रैंक सेहो।
आब पैघ-पैघ पत्र-पत्रिका मे नामी कोचिंग संस्था सभ के सम्पूर्ण पृष्ठ विज्ञापन एकर पैघ मुस्कियाईत फोटोक संग धरा-धर छपि रहल छै।
-सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com
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२.७.आशीष अनचिन्हार- सार्थक बतकुच्चन (पोथी परिचय)
आशीष अनचिन्हार
सार्थक बतकुच्चन (पोथी परिचय)
सौरभजी मूलतः भोजपुरी भाषाी छथि मुदा मैथिलीमे वाचिक आ लेखन दूनू छनि। बचपन केर तौरपर हिनका मैथिले मानू।
हिंदीमे हिनक कतिपय पोथी यथा छन्द मञ्जरी (छन्द शास्त्र), आ एक हिंदी कविता संग्रह 'इकड़ियाँ जेबी से' प्रकाशित छनि। संगहि हिनक संपादनमे दू गोट काव्य संग्रह छपल छै 'परों को खोलते हुए-1' एवं 'परों को खोलते हुए-2'। हिंदीमे हिनक पहिल दू पोथी हमरा लग अछि मुदा स्वाभाववश हम ओहिपर किछु नै लीखि सकलहुँ। सौरभजीक अपन मातृभाषा भोजपुरीमे हिनक ई पहिल संग्रह एलनि अछि "बात प बात बतकूचन" केर नामसँ। ई बतकूचन मूलतः भोजपुरी पत्रिका आखर केर एक स्तंभ छल जाहिमे सामयिक टिप्पणी ओ व्यंग्य रचना रहैत छल। ओही स्तंभ केर रचना सभकेँ समेटि "बात प बात बतकूचन" संग्रह बनल अछि। जँ मैथिलीक हिसाबें देखी तऽ ई 'बतकुच्चन' कहल जाएत। माने भोजपुरीक बतकूचन आ मैथिलीक बतकुच्चनमे बेसी अंतर नहि अछि। बतकुच्चनमे हास्य कम आ व्यंग्य बेसी रहैत छै। अथवा ई कही जे व्यंग्ये टा रहैत छै।सौरभजीक एहि 'बतकूचन'मे कुल 25 टा बतकुच्चन अछि। सौरभजी अपन भूमिकामे लिखैत छथि जे "ई समाज एकमुड़िये आजु ले ना सोचलस" तऽ हमरा मोन पड़ल जे मैथिल आ बेंगकेँ सेहो एक तराजूमे जोखब संभव नहि छै। अर्थात भाषे नहि व्यवहारोमे मैथिल आ भोजपुरिया एकसमान अछि।