REFERENCE OF SHUDRAS IN VEDAS [Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: Samaveda: Yajurveda: Rigveda; English Translations]
ATHARVA VEDA (3 references)
KANDA-14
(MARRIAGE AND FAMILY) Kanda 14/Sukta 1 (Surya's Wedding)
Devata: Dampati; Rshi: Surya Savitri
60. Bhagastataksha caturah padanbhagastataksha catvaryuspalani. Tvasta pipesa madhyatonu vardhrantsa no astu sumangali.
Bhaga, lord sustainer and ordainer of life, has framed the value orders of life: Dharma, Artha, Kama and Moksha; four social orders: Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra; four stages of personal life: Brahmacharya, Grhastha, Vanaprastha and Sanyasa. Tvashta, lord maker and organiser of life, has placed the woman as partner of man in matrimony in this order and organisation. May the bride be good and auspicious for us.
भाग- पालनकर्ता आ जीवनक अधिष्ठाता- जीवनक मूल्य क्रम तैयार केने छथिः धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष; चारि सामाजिक क्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र; व्यक्तिगत जीवनक चारि चरण- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आ सन्यास।त्वष्टा- स्वामी निर्माता आ जीवनक आयोजक- एहि क्रममे आ सङ्गठनमे स्त्रीकेँ विवाहमे पुरुषक साथीक रूपमे रखने छथि। से वधू हमर सभक लेल नीक आ शुभ होथि।
Kanda 19/Sukta 6 (Purusha, the Cosmic Seed)
Purusha Devata, Narayana Rshi
6. Brahmano sya mukhamasid bahu rajanyo bhavat. Madhyam tadasya yadvaishyah padbhyam sudro ajayata.
Brahmana, (man of knowledge, divine vision and the Vedic Word in the human community) is the mouth of the Samrat Purusha. Kshatriya, man of justice and polity, is the arms of defence and organisation. The middle part is the Vaishya who produces and provides food and energy. And the ancillary services that provide sustenance and support with auxiliary labour are the feet, the Shudra that bears the burden of society.
ब्राह्मण (ज्ञानी, दिव्य दृष्टि आ मानव समुदाय लेल वैदिक शब्द) सम्राट पुरुषक मुख अछि। क्षत्रिय -न्याय आ राजनीतिक लोक- रक्षा आ सङ्गठनक हाथ छथि। मध्य भाग वैश्य छथि जे भोजन आ ऊर्जाक उत्पादन आ आपूर्ति करैत छथि। आ सहायक सेवा जे सहायक श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहायता प्रदान करैत अछि, ओ अछि पैर, शूद्र जे समाजक भार वहन करैत छथि।
Kanda 19/Sukta 32 (Darbha)
Darbha Devata, Bhrgu Ayushkama Rshi
8. Priyam ma darbha krunu brahmarajanyabhyam sudraya charyaya cha. Yasmai ca kamayamahe sarvasmai cha vipasyate.
O Darbha, destroyer and preserver, eternal sanative, render me dear and loving to and loved by all Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras, whoever we love and desire, and all those who have the eye to see (and discriminate right and wrong).
हे दर्भा, विनाशक आ संरक्षक, शाश्वत विवेकशील; हमरा सभकेँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सभक प्रिय आ प्रेमी बना दिअ। संगे ओ सभ हमरा सभसँ प्रेम् करथि जिनका सँ हम प्रेम करी बा जिनकर कामना करी; आ ओ सभ जिनका लग देखबाक दृष्टि अछि (आ सही आ गलतमे भेद बुझैत छथि)।
SAMAVEDA (o reference)
YAJURVEDA (7 references)
CHAPTER- VIII
30. (Dampati Devata, Atri Rshi)
Purudasmo visuruupa indurantarmahimanamanaja dhirah. Ekapadim dvipadim tripadim chatupadimastapadim bhuvananu prathantam svaha.
The man of mighty deeds, who eliminates suffering and creates joy, of versatile attainments, bright and honourable, constant and resolute, should wait for the great new arrival. Men of the household, cultivate the vaidic culture of one, two, three, four and eight steps of attainment: one: Aum; two: worldly fulfilment and the freedom of moksha; three: the joy of the truth of word and the health of body and mind; four: the attainment of Dharma, wealth, fulfilment of desire, and moksha; eight: the joy of all the four classes and all the four stages of life (Brahmana, Kshatriya, Vaishya and Shudra, Brahmacharya, Grihastha, Vanaprastha and Sanyasa). Build homes for the people and advance in life.
शक्तिशाली कर्मक पुरुष, जे दुःखकेँ समाप्त करैत अछि आ आनन्द उत्पन्न करैत अछि, बहुमुखी उपलब्धिक, उज्ज्वल आ सम्मानजनक, स्थिर आ दृढ़ संकल्पित, ओकरा महान नव आगमनक प्रतीक्षा करबाक चाही। घरक लोक, उपलब्धिक एक, दू, तीन, चारि आ आठ चरणक वैदिक संस्कृति विकसित करैत छथिः एकः ओम; दुइः सांसारिक पूर्ति आ मोक्ष रूपी स्वतन्त्रता; तीनः वचनक सत्यक आनन्द आ शरीर आ मस्तिष्कक स्वास्थ्य; चारिः धर्मक प्राप्ति, धन, इच्छाक पूर्ति, आ मोक्ष; आठः जीवनक चारि वर्ग आ चारि चरणक आनन्द (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वनप्रस्थ आ सन्यास)। लोकक लेल घर बनाउ आ जीवन मे प्रगति करू।
CHAPTER- XVIII
48. (Brihaspati Devata, Shunah-shepa Rshi)
Rucham no dhehi brahmanesu rucham rajasu naskrudhi. Rucha vishyesu shudreshu mayi dhehi rucha rucham.
Brihaspati, lord of the universe, eminent teacher and master of vast knowledge, inspire our Brahma section of the community-scholars, scientists, teachers and researchers with brilliance and love. Infuse brilliance, love and justice into our Kshatrias, defence, administration and justice section of the community. Bless with light, love and generosity our Vaishyas, producers and distributors among the community. And bless our Shudras, the ancillary services, with light, love and loyalty. Bless me with light and love toward us all.
बृहस्पति- ब्रह्माण्डक स्वामी, प्रख्यात शिक्षक आ विशाल ज्ञानक स्वामी- समुदायक ब्रह्म वर्ग- विद्वान, वैज्ञानिक, शिक्षक आ शोधकर्ता- केँ प्रतिभा आ प्रेम सँ प्रेरित करू। हमर क्षत्रिय-रक्षा, प्रशासन आ न्याय- समुदायक वर्गमे प्रतिभा, प्रेम आ न्यायक संचार करू। हमर वैश्य-समुदायक निर्माता आ वितरक- सभकेँ प्रकाश, प्रेम आ उदारतासँ आशीर्वाद दियौ। आ हमर सभक शूद्र -समुदायक सहायक सेवी- केँ प्रकाश, प्रेम आ निष्ठा सँ आशीर्वाद दियौ। हमरा सभ केँ प्रकाश आ प्रेम सँ आशीर्वाद दियौ।
CHAPTER- XXV
23. (Dyau etc. Devata, Prajapati Rshi)
Aditirdyauraditirantarikshamaditirmata sa pita sa putrah. Vishve deva aditih pancha jana aditirjatamaditirjanitvam.
In the essence: Light is indestructible; sky is indestructible; mother Prakriti (matter-energy-thought) is indestructible; Father, the Cosmic Spirit is indestructible; Son, the soul (jiva), is indestructible; all the divinities of nature and humanity are indestructible; five people, Brahmana, Kshatriya, Vaishya, Shudra, others, are indestructible; whatever is born is indestructible; whatever will be born is indestructible. (All that was, is and shall be is indestructible in the essence.)
सारमे: प्रकाश अविनाशी अछि; आकाश अविनाशी अछि; माता प्रकृति (पदार्थ-ऊर्जा-विचार) अविनाशी अछि; पिता, ब्रह्मांडीय आत्मा अविनाशी अछि; पुत्र, आत्मा (जीव) अविनाशी अछि; प्रकृति आ मानवताक सभ देवत्व अविनाशी अछि; पाँच व्यक्ति, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आ आन अविनाशी अछि; जे किछु जन्मल अछि से अविनाशी अछि; जे किछु जन्मत से अविनाशी अछि। (जे किछु छल, अछि बा रहत/ आओत से सार मे अविनाशी अछि।)
CHAPTER- XXVI
2. (Ishvara Devata, Laugakshi Rshi)
Yathemam vacham kalyanimavadani janebhyah. Brahmarajanyabhyam Shudraya charyaya cha svaya charayaya cha. Priyo devanam dakshinayai daturiha bhuyasamayam me kamah samrudhyatamupa mado namatu.
Just as this blessed Word of the Veda I speak for the people, all without exception, Brahmana, Kshatriya, Shudra, Vaishya, master and servant, one's own and others, so do you too. May I be dear and favourite with the noble divinities and the generous people for the gift of the sacred speech. May this noble aim of mine be fulfilled here in this life. May the others too follow and come my way beyond this life.
जेना वेदक ई धन्य वचन हम बिना कोनो अपवादक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, स्वामी आ सेवक, अपन आ अन्य लोकक लेल कहैत छी, तहिना अहाँ सेहो करैत छी। पवित्र भाषणक ऐ उपहारक लेल हम महान देवत्व आ उदार लोक सभक प्रिय आ मनभावन रही। हमर ई महान उद्देश्य ऐ जीवन मे पूर हुअय। आन सभ सेहो हमर मार्गक अनुसरण करैत बढ़ैत जाय आ से ऐ जीवनसँ आगाँ धरि बढ़य।
CHAPTER- XXX
5. (Parameshvara Devata, Narayana Rshi)
Brahmane brahmanam kshatraya rajanyam marudbhyo vaishyam tapase Shudram tamase taskaram narakaya virahanam papmane klibamakrayayaayogum kamaya punshchalumatikrustaya magadham.
Give us, we pray, the Brahmanas for education and research, culture and human values; the Kshatriyas for governance, defence and administration; the Vaishyas for economic development, and the Shudras for assistance and labour in the ancillary services. Remove, we pray, the thief roaming in the dark, the murderer bent on lawlessness, the coward disposed to sin, the armed terrorist bent on destruction, the harlot out for pleasure of flesh, and the bastard fond of scandal.
Note: In mantras 5-22 in which various aspects of organised life are listed, there is repetition of 'asuva' and 'parasuva' from mantra 3, which means: 'Give us, we pray, what is good', and, 'Remove, we pray, what is evil'. This is the prayer. Also, there are echoes of 'havamahe' from mantra 4, which means: 'We invoke and develop', and, 'we challenge and fight out'. This is the call for action under the divine eye.
शिक्षा आ शोध, संस्कृति आ मानवीय मूल्यक लेल ब्राह्मण; शासन, रक्षा आ प्रशासनक लेल क्षत्रिय; आर्थिक विकासक लेल वैश्य; आ सहायक सेवामे सहायता आ श्रम लेल शूद्र हमरा दिअ से हम प्रार्थना करैत छी। हम प्रार्थना करैत छी जे अन्हारमे घुमैत चोर, अराजकता पर बिर्त खूनी, पाप पर बिर्त कायर, विनाश पर बिर्त सशस्त्र आतंकवादी, दैहिक सुख लेल बाहर गेल वेश्या, आ कलंकक शौकीन नाजायजकेँ हटा दियौ।
नोटः मंत्र 5-22 मे, जइमे संगठित जीवनक विभिन्न पक्ष सूचीबद्ध अछि, मंत्र 3 सँ 'आशुवा' आ 'परशुवा' क पुनरावृत्ति होइत अछि, जकर अर्थः 'हमरा सभ केँ दिअ, हम प्रार्थना करैत छी, जे नीक अछि', आ, 'हटाउ, हम प्रार्थना करैत छी, जे अधलाह अछि'। ई प्रार्थना अछि। सङ्गहि, मंत्र 4 सँ 'हवामाहे' क प्रतिध्वनि अछि, जकर अर्थः 'हम आह्वान करैत छी आ आगू बढ़बै छी', आ, 'हम माँटि दइ छी आ लड़ै छी'। ई दिव्य दृष्टिक अन्तर्गत काज करबाक आह्वान अछि।
CHAPTER- XXX
22. (Rajeshvarau Devate, Narayana Rshi)
Athaitanastauau virupanalabhateitidirgham chatihrasvam chatisthulam chatikrusham chatishuklam chatikrushnam chatikulvam chatilomasham cha. Ashudra abrahmanaste prajapatyah. Magadhah punshchali kitavah kliboshudra abrahmanaste prajapatyah.
The good human being accepts and works with these eight classes of people of different forms and colours: too tall, too short, too fat, too thin, too white, too dark, too hairless, too hairy. Also they are neither Brahmanas nor Shudras (nor the others). They too, all of them, are children of God, Prajapati. Even the bastard and the 'despicable', the wanton, the gambler, and the coward and the eunuch, neither Shudras nor Brahmanas (nor the others), they too are children of God, Prajapati, father of all.
नीक लोक विभिन्न रूप आ रङ्गक ऐ आठ वर्गक लोकक संग स्वीकार करैत अछि आ काज करैत अछिः खूब लम्बा, बड्ड छोट, बड्ड मोट, खूब पातर, बड्ड गोर, बड्ड कारी, बहुत कम केशबला, खूब केशबला। ओ सभ ने ब्राह्मण छथि, नहिये शूद्र (आ नहिये आन कियो)। ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि। एतऽ धरि जे नाजायज बा 'घृणित', ऊधमी, जुआरी, आ कायर आ नपुंसक, ने शूद्र, नहिये ब्राह्मण (नहिये आन कियो), ओ सभ सेहो भगवान प्रजापतिक सन्तान छथि, प्रजापति- सभक पिता।
CHAPTER- XXXI
11. (Purusha Devata, Narayana Rshi)
Brahmanosya mukhamashid bahu rajanyah krutah. Uru tadasya yadvaishyah padbhyam Shuudro ajayata.
The Brahmana, man of divine vision and Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. The Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family.
दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचनक लोक ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय-क मुख छथि। न्याय आ शिष्टताक लोक क्षत्रियकेँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ श्रमक सङ्ग निर्वाह आ सहारा देबऽबला व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवार सभकक भार वहन करैत छथि।
RIG VEDA (2 references)
Mandala 10/Sukta 90
Purusha Devata, Narayana Rshi
12. Brahmano sya mukhamasidbahu rajanyah kritah. Uru tadasya yadvaisyah padbhyam sudro ajayata.
The Brahmana, man of divine vision and the Vedic Word, is the mouth of the Samrat Purusha, the human community. Kshatriya, man of justice and polity, is created as the arms of defence. The Vaishya, who produces food and wealth for the society, is the thighs. And the man of sustenance and ancillary support with labour is the Shudra who bears the burden of the human family as the legs bear the burden of the body.
दिव्य दृष्टि आ वैदिक वचन बला ब्राह्मण, सम्राट पुरुष-मानव समुदाय- क मुख छथि। क्षत्रिय- न्याय आ राजनीतिक लोक- केँ रक्षाक हथियारक रूपमे बनाओल गेल अछि। वैश्य, जे समाजक लेल भोजन आ धन उत्पन्न करैत छथि, जांघ छथि। आ जीविकोपार्जन आ श्रमक सङ्ग सहायक व्यक्ति शूद्र छथि जे मानव परिवारक भार वहन करैत छथि जेना पैर शरीरक भार वहन करैत अछि।
Mandala 10/Sukta 124
Devata: Agni (1); Rshi: Agni, Varuna, Soma
1. Imam no agna upa yajnamehi panchayamam trivritam saptatantum. Aso havyavaluta nah puroga jyogeva dirgham tama ashayishthah.
Agni, yajnic light of life, come to this life yajna of ours: which has five divisions, i.e., Brahma-yajna, Deva-yajna, Pitr-yajna, Atithi-yajna, and Balivaishvadeva-yajna; conducted by five people, i.e, four socioeconomic classes of Brahmans, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras and others like chance visitors from other groups there might be; which is threefold, i.e., paka yajna, haviryajna and somayajna; and which has seven extensions, i.e., Agnishtoma, Atyagnishtoma, Ukthya, Shodashi,Vajapeya, Atiratra and Aptoyami. You are our leader and pioneer, Agni, and you are the carrier of our yajna to the divinities as well as harbinger of the fruits of yajna to us. Pray come and be our all-time dispeller of the cavern of deep darkness from life. (Yajna is a creative process of development in life from the individual to the social, national, global and environmental level of life. The explanation above is related to the social level. Swami Brahmamuni explains the yajna at the individual level, and that is also suggested in Rgveda 10, 7, 6: 'Svayam yajasva', and yajurveda 4, 13: "Iyam te yajniya tanu", which means: Develop yourself by yajna according to the seasons of your growth, and remember your life in body, mind and soul is worthy of yajnic service for your personal development, your body being the first instrument of your wider yajna of life. This personal yajna is fivefold, for the elemental balance of earth, water, heat, air and ether; threefold for the balance of vata, pitta and kaf, and also for balanced growth of body, mind and soul; sevenfold for the growth of rasa, rakta, mansa, meda, asthi, majja and virya. Thus yajna is the process of growth beginning with the individual, accomplished at the cosmic level.)
अग्नि -जीवनक यज्ञक प्रकाश- हमर सभक ऐ जीवन-यज्ञमे आउ, जइमे पाँच विभाग छै, अर्थात, ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, अतिथि-यज्ञ, आ बलिवैश्वदेव-यज्ञ; पाँच लोक द्वारा संचालित, अर्थात, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र क चारि सामाजिक-आर्थिक वर्ग आ पाँचम आन समूह कखनो काल आयल आगंतुक। आ से तीनटा छै- अर्थात, पाक यज्ञ, हविर्यज्ञ आ सोमयज्ञ; आ जकर सात विस्तार छै, अर्थात, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्त्या, षोडषी, वाजपेय, अतिरात्र आ अप्तोयमी। अग्नि, अहाँ हमरा सभक नेता आ अग्रगामी छी, आ अहाँ देवत्व लेल हमर यज्ञक वाहक छी आ सङ्गहि हमरा सभक लेल यज्ञक फलक अग्रदूत छी। प्रार्थना अछि जे आउ आ हमरा सभक जीवन तरहरि सन अन्हार सदाक लेल दूर करैबला बनू। (यज्ञ व्यक्तिगतसँ जीवनक सामाजिक, राष्ट्रीय, वैश्विक आ पर्यावरणीय स्तर धरि जीवनक विकासक एकटा रचनात्मक प्रक्रिया अछि। उपरोक्त व्याख्या सामाजिक स्तरसँ सम्बन्धित अछि। स्वामी ब्रह्ममुनी व्यक्तिगत स्तर पर यज्ञक व्याख्या करैत छथि, आ ई ऋग्वेद 10,7,6 मे सेहो सुझाओल गेल अछिः 'स्वयं यज्ञ'; आ यजुर्वेद 4,13: 'इयम ते यज्ञीय तनू', जकर अर्थ अछि- अपन विकासक ऋतुक अनुसार यज्ञ द्वारा अपना केँ विकसित करू, आ मोन राखू जे शरीर, मन आ आत्मा युक्त अहाँक जीवन यज्ञक सेवाक लेल अछि, आ तइसँ अहाँक व्यक्तिगत विकास हएत; अहाँक शरीर अहाँक जीवनक व्यापक यज्ञक पहिल साधन अछि। ई व्यक्तिगत यज्ञ पाँच प्रकारक अछि, पृथ्वी, जल, ऊष्मा, वायु आ आकाशक मौलिक संतुलनक लेल; तीन प्रकारक- वात, पित्त आ कफक संतुलनक लेल; आ शरीर, मन आ आत्माक संतुलित विकासक लेल सेहो; सात प्रकारक माने रस, रक्त, मानस, मेधा, अस्थि, मज्जा आ विर्यक विकासक लेल। ऐ तरहेँ यज्ञ व्यक्तिसँ शुरू होइत विकासक प्रक्रिया अछि, जे ब्रह्मांडीय स्तर पर सम्पन्न होइत अछि।)
आब आउ यूरोपक विद्वान लोकनि द्वारा वेदक गलत अनुवादक किछु उदाहरण देखू:-
EXAMPLES OF SOME MISTRANSLATIONS OF VEDAS BY WESTERN SCHOLARS
I
W.D. Whitney's translation of the Atharvaveda (7, 107, 1) edited and revised by K.L. Joshi, published by Parimal Publications, Delhi, 2004:
Namaskrutya dyavapruthivibhyamantarikshaya mrutyave.
Mekshamyurdhvastisthaan ma ma hinsishurishvarah.
"Having paid homage to heaven and earth, to the atmosphere, to Death, I will urinate standing erect; let not the Lords (Ishvara) harm me." I give below an English rendering of the same mantra translated by Pundit Satavalekara in Hindi:
"Having done homage to heaven and earth and to the middle regions and Death (Yama), I stand high and watch (the world of life). Let not my masters hurt me."
An English rendering of the same mantra translated by Pundit Jai Dev Sharma in Hindi is the following:
"Having done homage to heaven and earth (i.e. father and mother) and to the immanent God and Yama (all Dissolver), standing high and alert, I move forward in life. These masters of mine, pray, may not hurt me."
I would like to quote my own translation of the mantra now under print:
"Having done homage to heaven and earth, and to the middle regions, and having acknowledged the fact of death as inevitable counterpart of life under God's dispensation, now standing high, I watch the world and go forward with showers of the cloud. Let no powers of earthly nature hurt and violate me."
'Showers of the cloud' is a metaphor, as in Shelley's poem 'the Cloud': "I bring fresh showers for the thirsting flowers", which suggests a lovely rendering.
The problem here arises from the verb 'mekshami' from the root 'mih' which means 'to shower' (sechane). It depends on the translator's sense and attitude to sacred writing how the message is received and communicated in an interfaith context with no strings attached (or unattached).
[Dr Tulsi Ram, 2013, Atharveda: English Translation; Page xxvi]
II
The idea that there was slavery in the Vedic Society originated with the Western Indologists with their intentional or careless translation of a Sanskrit word into "slave". For example, in the Taittiriya Samhita (Krishna Yajurveda), [7.5.10] [kanda 7,prapathaka 5, verse 10], a part of translation by Keith reads "slave girls dance around the fire". But in a footnote in the same page [pg., 628, Vol. 2] the author Keith says that the verse describes the dance of maidens. Suddenly the maidens have become "slave girls". Both Paranjape and Avinash Bose point to the mistranslation of the word 'yosha' as courtesan by the indologist Pischel [Bose, Hymns from the Veda, p. 36].
[Veda Books,SRI AUROBINDO KAPALI SHASTRY INSTITUTE OF VEDIC CULTURE, page 240]
III
In 1795, H.T. Colebrooke, then a young scholar, wrote his maiden paper, "On the Duties of a Faithful Hindu Widow," for the Asiatic Society (Asiatic Researches IV 1795: 205-15). He cited the hymn from the Rig Veda as sanctioning widow burning, which William Jones immediately contested (Canon 1993 I:lxx). Colebrooke translated the end of the hymn as "let them pass into fire, whose original element is water." A quarter of a century later, the Orientalist, H.H. Wilson pointed out that the hymn had been distorted (Wilson 1854: 201-14; Cassels 2010: 89). Wilson translated the verse as per the reading corroborated by Sayana, the authoritative medieval commentator on the Vedas, and demonstrated that it did not refer to widow burning (Rocher and Rocher 2012: 24-25).
[Meenakshi Jain,2016; Sati: Evangelicals, Baptist Missionaries; and the Changing Colonial Discourse, Page 5)
मुदा आगाँ जा कऽ समस्या बढ़लै आ ओइमे आदि शंकराचार्य किछु कऽ सकै छला, सामर्थ्य छलन्हि मुदा ओ नै केलन्हि। तकर चर्चा आगाँक कोनो अंकमे हम करब।
-Gajendra Thakur, editor, Videha (be part of Videha www.videha.co.in -send your WhatsApp no to +919560960721 so that it can be added to the Videha WhatsApp Broadcast List.)
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१.२.अंक ३८९ पर टिप्पणी
कल्पना झा, पटना
बहुत नीक अंक। नीक आलेख सभ। कविता,गजल सभ सेहो नीक। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' जी गजल नीक लिखैत छथि। एहि अंकक विशेष आकर्षण अछि आशीष अनचिन्हार जीक आलेख "की तारानंद वियोगीजी मंचपर अप्रमाणिक वाचन करै छथि?" बहुत नीक,तथ्यपरक आलेख । पहिने वियोगीजीक लेखन,आ आब हुनक वाचन पर सेहो प्रश्नचिन्ह ! आ से प्रश्नचिन्ह बिनु कोनो आधारक,ओहिना नहि उठाओल गेल। बहुत रास गीतक उदाहरण दैत अपन बात रखलनि। जाहि पोथीक मददिसँ ई सिद्ध केलनि अपन बात,तकर पूरा विवरण ("साहित्य अकादमी" द्वारा प्रकाशित विद्यापति गीत संचय' प्रथम संस्करण-1999)संगहि एही पोथीक चयन किएक केलनि,तकर कारण सेहो फड़िछा क' लिखि देलनि अछि।आ तखन सिद्ध केलनि अछि, जे तारानंद वियोगीजीक संपूर्ण साहित्य अप्रमाणिक अछि। एकटा स्थापित साहित्यकारक साहित्यकेँ एतेक प्रमाणिक ढंगसँ अप्रमाणिक सिद्ध करब वास्तव मे बहुत नीक लागल। आशीष जीक एहि बातसँ ककरो असहमति नहि भ' सकैए-"दिक्कत तऽ ईहो छै जे ओहि समयमे प्रचलित बहुत रास छंदक विवरण आब नहि भेटैत छै आ तकरो अनेक कारण छै। मुदा नै भेटै छै विवरण तँइ ई मानि लेब जे छंद छहिये नहि अथवा अमुक रचनाकारक रचनामे छंद नै छै से कतहुँसँ उचित नै।" एतेक नीक आलेखक लेल आशीष जीकेँ साधुवाद ! [प्रीति कारण सेतु बान्हल: सम्पादक- आशीष अनचिन्हार- विदेह पेटार] मैथिली भाषा-साहित्य मे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक विवेचन बला पोथी "प्रीति कारण सेतु बान्हल" Redefining Maithili हमरा घर आबि गेल अछि। लेखकीय प्रति पठएबालेल बहुत बहुत धन्यवाद ज्ञापित करैत छिअनि। पोथी देखि मोन प्रसन्न भ' गेल। बहुत नीक डिजाइन कएल गेल अछि। छपाइ,कागज के क्वालिटी सभ किछु बहुत नीक। पढ़बामे सुगम, सभ बएसक लोकलेल(फॉन्टक कारणेँ) एहि पोथीक सभ सँ बड़का विशेषता वा आकर्षण कहि सकैत छी,जे हमरा ठीके बड्ड आकर्षित केलक,ओ अछि मैथिली लोकगीतक किछु पाँतिक माध्यम सँ पोथी मे संकलित लेख सभ केँ कैटगराइज करब। एकहक टा गीतक पाँति एकहक टा खंडलेल आ से यथोचित चुनाओ,गज्जब..जेना ---- आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे..अनुक्रम लेल प्रथम गणेश पद गाओल देवता मनाओल हे..संपादकीय लेल सभटा गीतक बोल बेजोड़ चुनलनि अछि। बनही मे मुँगिया जनमि गेल बनही लतरि गेल हे.. पीपरक पात अकासहि डोलए शीतल बहए बसात यौ.. पहिल पहर गौरी पूजल.. तोड़लनि धनुष कठोर हे परिछन चलू सखिया..कवन नगर के सेनुरिया सेनुर बेचे आयल रे आहे कवन नगर के कुमारी धिया सेनुर बेसाहल हे.. करमी के लत्ती जकाँ लतरथु पुरैन जकाँ पसरथु हे.. जतबा मोटामोटी पढ़लहुँ/देखलहुँ पोथी, ताहि सँ ई अनुमान सेहो भेल,जे संपादक महोदय रचनाकारक क्षमताक अनुरूपेँ हुनका सँ ओहि विषय पर लिखबाक आग्रह केलनि आ ताहि मे सफल भेलाह। कहबाक माने संपादक बला काज बखूबी केलनि अछि। जेना एकटा सिनेमाक डाइरेक्टर केँ हाथ मे रहैत छै,एक्टर सँ कोना नीक सँ नीक काज लिअए,तहिना एकटा संपादकक महत्वपूर्ण रोल रहैत छै एहि तरहक पोथीक प्रकाशन मे। हमरा मोन अछि कहियो संपादक महोदय ई बात अपन पोस्ट मे कहने छलथि "ई पोथी हमर संपादन कलाक परीक्षा हएत।" तँ से हमरा तरफ सँ संपादक जी 'विथ- डिस्टिंक्शन' उत्तीर्ण भेलाह अछि,एहि परीक्षा मे। ई सर्टिफिकेट हम ओहिना नहि देलिअनि अछि। पोथी जे सभ पढ़ताह/पढ़तीह सभ हमर बात सँ सहमति रखताह/रखतीह। जे लिपिक जानकार छथि हुनका सँ लिपि संबंधी लेख लिखबओलनि,जे समाजशास्त्त्रक ज्ञाता छथि हुनका सँ दूषण पञ्जी पर विस्तृत विवरण बला आलेख। ई संपादकीय कौशल भेल। इंटरनेट, पञ्जी, शब्दकोश, लिपि, संपादन, साहित्य, नव लेखक केर प्रोत्साहन आदि बहुत विषय पर बहुत रास स्तरीय लेखक संकलन अछि ई पोथी। गजेन्द्र ठाकुर-प्रीति ठाकुर किछु एहन केलथि जे मैथिली भाषा-साहित्य लेल पहिल काज छलै, आ एहन-एहन पहिल काजक सूची नमहर छनि हिनका लोकनिक। हुनकर सभ काजक सूचना भेटतनि पाठक केँ एहि पोथी मे,संगहि विभिन्न लोकक द्वारा ओहि काजक मूल्यांकन करैत आलेख सभ। एहि पोथी मे हुनकर कएल काजक गुणगान मात्र नहि अछि। गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक संग पोथीक संपादक आशीष अनचिन्हार जी केँ बहुत बहुत शुभकामना
कैलाश कुमार मिश्र
[प्रीति कारण सेतु बान्हल: सम्पादक- आशीष अनचिन्हार- विदेह पेटार] हमरा हाथ मे हार्ड बॉण्ड कॉपी आबि गेल अछि "प्रीति कारण सेतु बान्हल" नामक पोथी केर। एहि पोथी केर संपादक छथि श्री आशीष अनचिन्हार। पोथी केर कवर पेज, एकर कागत केर क्वालिटी, फॉण्ट, फॉण्ट साइज़, मुख्य आवरण आ पृष्ठ पेज केर रंग संयोजन, डिज़ाइन, फॉरमेट अलग-अलग विषय हेतु मैथिली लोकगीत केर आखर सँ विभिन्न खण्डक नामकरण इत्यादि एहि पोथी के विशिष्ट आ संग्रहणीय बनबैत अछि। जिज्ञासा बढ़ि गेल ने? यैह छैक एहि पोथी केर विशिष्टता। देखू कने नामकरण: विषय सूची केर नाम छैक: आजु जनकपुर मंगल भुप सभ आओल हे.. प्रथम गणेश पद गाओल देवता मनाओल हे..: अतय आशीष अनचिन्हार जी अपन बात एहि पोथीक संपादक के रूप मे रखैत छथि। बनहीमे मूँगिया जनमि लेल बनही लतरि गेल हे..: अतय संपादक महोदय गजेन्द्र ठाकुर आ प्रीति ठाकुर केर परिचय दैत छथि। परिचय सटीक, इमानदारी सँ सभ बातक चर्च करैत अछि। केना एक व्यक्ति अपन जीवनसाथी केर सहयोग सँ असम्भव के संभव बना लैत अछि तकर रेखाचित्र थिक इ अंश। उपरोक्त नामकरण तँ खण्ड सँ पूर्वक अछि, खण्ड केर नामांकरण त आब निम्न तरहेँ होइत अछि: खण्ड-1: पीपरक पात अकासहि डोलय शीतल बहए बसात यौ..एहि खण्ड मे गजेन्द्र जीक पिता, हुनक पारिवारिक एवं सामाजिक विवरण देल गेल छैक। खण्ड-2: पहिल पहर गौरी पूजल.. : एहि खण्ड मे प्रीति ठाकुर केर काजक आलोचना 10 गोटे द्वारा भेल अछि जे साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता एवं अन्य विधा सँ जुड़ल लोक छथि। खण्ड-3: तोड़लनि धनुष कठोर हे परिछन चलू सखिया..: एहि खण्ड मे गजेन्द्र ठाकुर केर काजक आलोचना 29 गोटे केने छथि। ओना हमर मानब अछि जे गजेन्द्र जी मैथिली संस्कृति आ साहित्य केर एहेन मनीषी छथि जिनका पर 29 आलेख झुझुआन लगैत अछि। हिनका पर 29 आलेखक बाते छोड़ू 29 पोथी लिखब, सेहो न्यून होयत। जे गोटे गजेन्द्र जीक अवदान सँ परिचित छी से हमर बातक अर्थ लगा लेने हएब ! उपरोक्त बात भेल तीन खण्डक। एकरा अलावे जे इण्डेक्स इत्यादि देल गेल छैक, संपादक महोदय जे अपन बातक सार संक्षेप लिखैत छथि ताहू सभ मे गीतक आखरे नहि प्रथम पंक्ति छैक। तकर उदहारण देखल जाय: कवन नगर के सेनुरिया सेनुर बेचे आयल रे आहे कवन नगर के कुमारी धिया सेनुर बेसाहल हे..: अतय भेटैत अछि गजेन्द्र ठाकुर आ प्रीति ठाकुरक संपूर्ण परिचय। करमी के लत्ती जकाँ लतरथु पुरैन जकाँ पसरथु हे..' अतय संपादक महोदय अर्थात श्री आशीष अनचिन्हार जी अपन सार संक्षेप एहि पोथीक विषय मे लिखैत छथि। 490 पृष्ठक इ पोथी जकर अँगरेजी केर टैग लाइन एकर अर्थ आरो फरिछा दैत छैक - Redefining Maithili - श्री गजेन्द्र ठाकुर केर मैथिली साहित्यक विभिन्न विधा पर योगदान, हुनक इ-पत्रिका - विदेह केर सतत प्रकाशन, तथाकथित मुख्यधारा सँ धकेल देल गेल अथवा तिरस्कृत साहित्यकार आ हुनक रचना के प्रकाशित करब, अधिक सँ अधिक पाठक धरि ल जाएब, संगहि कियोक अगर लिखैत छथि आ विदेह लग छपबाक हेतु भेजैत छथि तँ हुनक रचना के बिना कुनो पूर्वाग्रह के छापब; आ गजेन्द्र जीक एहि साँस्कृतिक यात्रा मे हुनक पत्नी प्रीति ठाकुर केर परिवारिक संग-संग साहित्यिक साहचर्य। इ पोथी जहिया सँ हमरा भेटल अछि तहिया सँ हमारा मोन मे गजेन्द्र जीक संग-संग आशीष अनचिन्हार लेल सम्मान पहिने सँ अधिक भ गेल अछि। कहबाक अर्थ इ जे गजेन्द्र जी मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम केर अनेक पक्ष पर बिना कोनो कुनो तरहक सरकारी अथवा संस्थागत आर्थिक सहयोग के मिशन मोड पर काज क रहल छथि। देख रहल छी जे कनौसी भरि काज केला सँ आ सफलता सँ लोक आत्म श्लाघा मे बताह भ जाइत छथि, मुदा चरैवेति-चरैवेति केर नाद लगबैत गजेन्द्र जी अपन यात्रा मे लागल छथि। हमर परिचय हिनका अर्थात गजेंद्र जी संग 2007 -08 सँ अछि। पोथीक पन्ना उनटबैत काल हम जेना एक-एक क्षण के स्मरण करय लगलहुँ। भोगल अतीत के वर्तमान मे देखैत सभ बातक अख्यास करैत गेलहुँ। हम ताहि समय नार्थ ईस्ट भारत पर गहन काज करैत रही। गजेंद्र जी हमरा बेर-बेर लिखबा लेल आग्रह करथि। हम लिखय लगलहु। एक नव आ रचनातम्क सम्बंध बनय लागल। मैथिली साहित्य, संसार आ लेखन सँ सिनेह होमय लागल। फेर लोकक आलेख, अनेक पक्ष पर विचार, विचार आ आलेख केर अति वैज्ञानिक समायोजन एहि पोथी मे एक नव फॉरमेट , नव सोच, नव प्रयोग संग लागल। सभ आलेख केर अक्षर-अक्षर मे गजेन्द्र जी व्याप्त छथि आ संग छथिन हुनक पत्नी श्रीमती प्रीति ठाकुर। एकर महत्त्व आरो पैघ भ जाइत छैक जखन पता चलैत अछि जे पोथी केर सारथी अर्थात संपादक श्री आशीष अनचिन्हार जी छथि जे हमरा जनतब सँ 18 वर्ष सँ गजेन्द्र जी, हुनक परियोजना आ विदेह सँ 100 प्रतिशत समर्पण भाव सँ जुड़ल छथि। संपादक सही अर्थ मे एहि पोथी रूपी प्रदर्शनी अथवा exhibition केर क्यूरेटर छथि। क्यूरेटर कियैक? कियैक तँ अलग-अलग विषय आ बिंदु पर अलग-अलग विद्वान अथवा रिसोर्स पर्सन्स के ताकब , हुनका सँ बात करब, आ लेख लिखा लेब बहुत दुष्कर कार्य थिक। उदहारण केर लेल हमरा दूषण पंजी पर लिखबा लेल कहने छलाह। हम एहि विषय पर नहि लिखय चाहैत रही। दस दिन धरि आशीष जी सँ वार्तालाप होइत रहल आ अंततः आशीष जी हमरा बुझा देलनि जे हमरे लिखक चाही एहि विषय पर। परिणाम इ भेल जे पञ्जी विधा पर हमर ज्ञान बढ़ल आ एकर वैज्ञानिकता, लोक पक्ष, लोक द्वारा शास्त्रक दोख दूर करबाक प्रयोग आ प्रमाण, पञ्जी केर यथार्थ आ थोथेबाजी, पञ्जी प्रबंध सँ सम्बंधित भ्रान्ति, स्त्री मनोदशा, भविष्य हेतु पञ्जी केर व्यवहार, मिथिलाक अन्य जाति मे पञ्जी केर स्कोप, डिजिटल युग मे पञ्जी आदि अनेक बिंदु पर जेना हमर भक खुजय लागल। हमरा स्वीकार करबा मे कोनो शंका नहि अछि जे हम जेना-जेना गजेन्द्र जीक काज सभ पढ़ैत छी तेना-तेना हमरा अपन अज्ञानता केर भान भेल जा रहल अछि ! "माधब- तुम समान आरो नहि दोसर !" यैह उक्ति गजेन्द्र जी लेल उचित बुझना जा रहल अछि हमरा। एहि पोथी मे सभ किछु भेटत - फोटो, तथ्य आ नहि जानि की-की! अगर फ़ोकट मे पढ़य चाहैत छी तँ लिंक सँ पढ़ि सकैत छी। मुदा एहि पोथी केर पढ़बाक मजा पन्ना उलटि-उलटि क चाहक चुश्की संग छैक। पोथी पढ़बाक, ओकर सज्जा देखबाक आनन्द सही अर्थ मे परमानन्द छैक। से तखन बुझबैक जखन पढ़बैक। अथवा जिनका सभके पोथी भेटल छनि से सभ कहता। पोथी मे अतेक लोकक आलेख अछि आ सभक नाम लेब संभव नहि , ताहिं किनको नाम नहि ल रहल छी। एक बात मुदा कहब, इ पोथी जोगा क रखने अछि बात, विचार आ आलोचना (समालोचना ) सभ जाति , वर्ग, समुदाय, लिंग, आ भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश केर लोकक। एक बात आरो, जे पहनहि कहि चुकल छी - सभ ठाम गजेन्द्र जी अपन पत्नी संग विद्यमान छथि। किताबक USP छैक एक समर्पित, अन्वेषी, प्रोगशील संपादक केर curation जाहि कार्य मे आशीष अनचिन्हार जी अपन दक्षता प्रमाणित कएलनि अछि। एखन अतबे शुभम भूयात।
शिव कुमार झा टिल्लू
[प्रीति कारण सेतु बान्हल: सम्पादक- आशीष अनचिन्हार- विदेह पेटार] मैथिली साहित्यमे झाँपल प्रतिभा सभकेँ जगजियार केनिहार आदरनीय गजेन्द्र ठाकुरजी आ हिनक धर्मपत्नी श्रीमती प्रीति ठाकुरजीक कृत्य आ आधुनिक मैथिली साहित्यमे हिनक अपन तन मन आ धनसँ परहित प्रवृतिकेँ प्रति समर्पित एहि अलभ्य ग्रंथकेँ आत्मासँ नमन क' रहल छी .जौं गजेन्द्र जी नहि होइतथि त' हम किन्नहु अपन रचनाकेँ संसुचित नहि क' पबितहुँ . कतेक साहित्यकार अपन- अपन रचना सभकेँ प्रकाशित नहि क' पबितथि .कवि बूचकेर काव्यकेँ हुनक मृत्युकेँ उपरांत सदगति. एहेन सन कतेक साहित्यकार, बिनु गजेन्द्रकेँ असम्भव. हिनक प्रयास आधुनिक मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा देलक.. सम्पादक आशीष अनचिन्हारकेँ हीयासँ आभार, बहुत नीक काज।
लक्ष्मण झा सागर
[नित नवल सुशील- विदेह पेटार] बहुत नीक काज हैत ई। सुशील जी पहिल मैथिलीक साहित्यकार छथि जे मैथिलीक संरक्षण लेल आन्दोलन करैत पुलिसक लाठीसं अपन कपार फोरोने छथि पटनामे। कलकत्ताक लेल ई कोनो नव बात नै अछि जे लोक ( साहित्यकारे) दोसर साहित्यकारके कात कय दैत छथि जकर शिकार राजकमल चौधरी आ वीरेंद्र मल्लिक सेहो भेल छथि। कमोबेस ई स्थिति प्राय: सम्पूर्ण मैथिली वाङमयमे पसरल अछि।हम अहाँक माध्यमे श्री गजेन्द्रजीके कोटिश: धन्यबाद दैत छियनि जे ओ नित नवल सुशील लीखिकें मैथिलीक कथा साहित्यक लेल बर पैघ उपकार करताह!!
किशोर केशव
[नित नवल सुशील- विदेह पेटार] शुभकामना हिनक नाटक भामतीक पहिल मंचन पटनामे हमहीं सब कयने छी, प्रायः 1991-92 मे। तकर बाद अपन पत्रिका मे एकरा प्रकाशितो कयने रही।
प्रेमकान्त चौधरी, गुवाहाटी
बहुत बहुत बधाई श्री मान जी। अनवरत जारी विदेहक नियमित अंक।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.गद्य
२.१.ग्रुप कैप्ट (डा.) वी एन झा- अंतरिक्ष मे उपग्रह (सॅटॅलाइट) टकराव के आशंका
२.२.परमानन्द लाल कर्ण-चैत मासक एकादशीक माहात्म्य
२.३.कुन्दन कर्ण- दोहैनि (बीहनि कथा)
२.४.लालदेव कामत-गूलो'क स्वच्छ चरित्र/ पोथी चर्चा: मंथन
२.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
२.६.कुमार मनोज कश्यप-पेट-बोनिया
२.७.निर्मला कर्ण अग्निशिखा- ३७
२.८.प्रमोद झा 'गोकुल'-ओलतिक पानि (बीहनि कथा)
२.९.डॉ किशन कारीगर- मैथिल पेटपोसुआ के गोंधियागिरी
२.१०.फगुआ उपाधि २०२४-प्रस्तुति टीम विदेह
२.१.ग्रुप कैप्ट (डा.) वी एन झा- अंतरिक्ष मे उपग्रह (सॅटॅलाइट) टकराव के आशंका
ग्रुप कैप्ट (डा.) वी एन झा
अंतरिक्ष मे उपग्रह (सॅटॅलाइट) टकराव के आशंका
-प्रस्तुत अछि ग्रुप कैप्ट (डा.) वी एन झा जी क पहिल मैथिली आलेख अंतरिक्षपर। ग्रुप कैप्ट (डा.) वी एन झा (MBBS, AMD, MD, FeISAM) पूर्व वायुसेना अधिकारी व चिकित्सा अनुसंधान प्रमुख; बैंगलूर विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर व स्नातकोत्तर परीक्षक तथा DRDO मे वरिष्ठ वैज्ञानिक (Sc 'F') व सह निदेशक छलाह I अंतरिक्ष विज्ञान मे हिनकर लिखल पुस्तक "Design Concepts in Human Space Missions) देश विदेश मे प्रचलित छन्हि- सम्पादक
'विदेह मे विज्ञान' विषय-वस्तु पर एक नवीन प्रयोग शुरू कए रहल छी। ओहना तँ विदेह पत्रिका मैथिली साहित्य मे एक विशेष प्रतिष्ठा राखैय अछि, मुदा कोनों भाषा के, ख़ास केँ प्राचीन सांस्कृतिक भाषा के विकास आओर सामूहिक ग्रहण-विग्रहण तावत समुचित नहिं होएत यावत् ओहि मे आधुनिक व समकालीन ज्ञान-विज्ञान व परिवेश के समुचित स्थान नहिं भेटत। जाहि समय सॅ आधुनिक शिक्षा प्रणाली मे मैथिली के समावेश भेल अछि, अधिकतम विद्यालय व महाविद्यालय मे मैथिली प्रायः अपन गद्य व पद्य मे प्रगति अवश्य कएलक किन्तु भाषा के गुणवत्ता मे प्रगति समीक्षा व चर्चा के विषय अवश्य रहैछ, जाहि मे मैथिली भाषाविद के विश्लेषण विशेष महत्त्व राखताह।
हम मैथिली भाषा के एक अदना छात्र रहल छलहुँ और गत ५० वर्ष सं मैथिली-भाषी के संपर्क सं विहीन छी। ओहु सं विशेष जे वायुसेना समाज मे रहि प्रायः अंगरेजी माध्यम मे ही बातचीत व लिखल-पढ़ल रहल। गत ४० वर्ष मे वातांक्षरिक्ष विज्ञान मे रत छी। बारम्बार मन मे आएल जे मैथिली मे वैज्ञानिक विषय-वस्तु पर किछु लिखल जाए। विज्ञान के विषय मे लिखैक हमर ई प्रथम प्रयास अछि । अतः भाषा व्याकरण आदि त्रुटि हेतु क्षमाप्रार्थी छी।
अंतरिक्ष मे उपग्रह (सॅटॅलाइट) टकराव के आशंका
आबए वाला दिन मे अंतरिक्ष मिशन के सफल व सक्षम होय लेल भगवान के आशीर्वाद के अवश्यकता बहुतहि बढ़त । वैज्ञानिक के अपन निष्कंटक शिल्प संरचना (डिजाइन) व निर्माण मे 'पूर्णता' प्राप्त करय के संग-संग विशिष्ट उद्देश्य पूर्ति (मिशन प्लानिंग) के निष्पादित करय के बावजूद परमेश्वर के ई आशीर्वाद सभु हितधारक के लेल आवश्यक होयत। पाठक लोकनि सोचि सकैत छथि जे किए? लगभग सभु अंतरिक्ष तकनीक उन्नत राष्ट्र ई आशंका स॑ सशंकित अछि । कारण काफी सरल छैक। अनेक प्रक्षेपण के दौरान किछु अप्रत्याशित घटनाक्रम के संभावना रहैत छैक चाहे ओ 0.001 प्रतिशत सँ कम किए नेँ हुए। एहि कारण अक्सर प्रक्षेपण सँ पहिनें परमेश्वर के आशीर्वाद सेहो लेल जाएत अछि। एहि मे प्रमोचनयान के टक्कर के संभावना सेहो अछि चाहे ओ प्रक्षेपण के दौरान होए अथवा अंतरिक्ष के कक्षा (orbit) मे उपग्रह स्थापन मे। पिछु किछु दशक मे अंतरिक्ष मे अनेकानेक उपग्रह के तैनाती के कारण अप्रत्याशित टकराव के आशंका प्रबल भ गेल अछि ।
भारत मे इसरो के अधिकाँश उपग्रह प्रक्षेपण के समय हम प्रायः बहुतहुँ टीवी चॅनेल पर तकनिकी विशेषज्ञ के तौर पर अपन मंतव्य व्यक्त कएलहुँ। मुदा आय ओहि घटना सम्बंधित विषय-वस्तु मैथिली मे वर्णन करए मे किछु दिक्कत भ रहल अछि।
सम्प्रति अंतरिक्ष मे कार्यरत व कार्यविहीन उपग्रह, नष्ट भेल उपग्रह के कल पुर्जा, उपग्रह के प्रक्षेपण करय वाला राकेट के मोटर व अन्यान्य अंश अनेकों स्थाई व अनियंत्रित अस्थाई कक्षा मे चक्कर लगा रहल अछि। ओहि मे सँ जे कार्यरत नहिं अछि, ओ सभु उपग्रह व ओकर टूटल अंश-प्रत्यांश अनियंत्रित अछि जे कोनो उपग्रह अथवा राकेट सॅ टकरा सकैत अछि। एहना मे कोनो प्रक्षेपित उपग्रह वा राकेट (जेना चंद्रयान या मंगलयान) के ओ अनियंत्रित टूटल पुर्जा या कर्कट, जेकर गति प्रायः २५००० - ३०००० किमी प्रति घंटा छैक, टकराव के आशंका व अनिश्चितता बढ़ि जाय छैक। एतैक तेज गति सॅ घुमैत एक छोट धातु कण सेहो उपग्रह या राकेट सॅ टकरा कैं ओकरा अत्यधिक क्षति पहुंचा सकैत अछि।
अंतरिक्ष मे प्रक्षेपित हर रॉकेट, चाहे ओ पृथ्वी के कक्षा मे होए या सुदूर अंतरिक्ष / अंतरग्रहीय गतिविधि मे जाय वाला; उपरोक्त टकराव के आशंका सँ ग्रस्त रहैत अछि। रॉकेट या ओकर 'वैज्ञानिक सामिग्री' (पेलोड) के किछु अंश प्रक्षेपण के दौरान पाछू छुटि जाय छै या अलग भ अंतरिक्ष मे काफी अवधि लेल अनियंत्रित कक्षा मे घुमैत रहै छैक। ई सभु किछु दिन, माह या साल मे गैर-कक्षीय या ऊर्ध्वाधर / झुकाव वाला प्रक्षेपण पथ सँ यथोचित रूप स॑ कम समय म॑ पृथ्वी, समुद्र या ऊपरी वायुमंडल मे प्रवेश भ के नष्ट भ जाय छै । ई तरह सँ नष्ट होवे वाला पेलोड अलग होय के ऊंचाई व पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के क्वांटम पर निर्भर करै छै । ई ज्ञात होएब आवश्यक छै कि सुदूर अंतरिक्ष मे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण नें सिर्फ पृथ्वी के केंद्र स॑ ओकर दूरी व ओकर मात्रा पर प॑ निर्भर छै बल्कि सौर मंडल के बाहर सॅ आवै वाला अन्यान्य ग्रहीय गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव पर सेहो निर्भर छै । दोसर तरफ पृथ्वी के कक्षा मे स॑ प्रत्याजित वस्तु या कक्षा म॑ नष्ट उपग्रह के टूटल भाग, पर्याप्त अवधि तक ओहि ऊँचाई पर अंतरिक्ष मे वायुमंडलीय घर्षण के अभाव मे घूमै रहैत छैक ।
पृथ्वी कक्षा मे कार्यरत व कार्यविहीन उपग्रह के भरमार
संयुक्त राष्ट्र के 'बाहरी अंतरिक्ष मामला के कार्यालय' (UNOOSA) द्वारा संचालित बाहरी अंतरिक्ष म॑ प्रक्षेपित राकेट, कार्यरत व कार्यविहीन उपग्रह व ओकर अंश-प्रत्यांश के सूचकांक के अनुसार जून २०२३ के अंत म॑ पृथ्वी के परिक्रमा करै वाला ११,३३० उपग्रह छेलै।
पृथ्वी कक्षा मे उपग्रह तथा अन्य मलबा
जनवरी २०२२ के बाद स॑ कक्षीय उपग्रह मे ३८% के भारी वृद्धि भेल अछि (पढू "२०२३ म॑ कतेक उपग्रह पृथ्वी केरऽ परिक्रमा करि रहलऽ छै?", https://www.pixalytics.com/satellites-orbiting-earth-2023/) जेकर रेखांकन निम्नांकित चित्र मे अछि। ई संख्या आबै वाला साल म॑ उपग्रह के प्रक्षेपण आरू स्थापन के साथ तेजी स॑ कई गुना बढ़त॑। अमेरिका के SpaceX व ब्रिटैन के OneWeb के हजारों उपग्रह निकट भविष्य मे मुख्य रूप स॑ LEO मे स्थापित होवै वाला अछि ।
विभिन्न देश के उपग्रह
आबै वाला साल व दशक म॑ LEO म॑ एतना भीड़ लगै वाला छै कि विभिन्न कक्षा म॑ मौजूद उपग्रह केँ एक-दूसरा के बहुत नजदीक ऐला के अलग-अलग संभावना छै। यदि किछु उपग्रह म॑ अप्रत्याशित मार्ग विचलन या ओकर वेग कम होवै पर यदि कक्षीय क्षय भेल त॑ टकराबै के भी अलग संभावना छै । ई टक्कर तखन गंभीर होयत जँ दू वस्तु विपरीत दिशा मे वा एक दोसराक प्रति विपरीत या बेसी झुकाव (inclination) वाला कक्षा मे चलैत हो । ई तँ पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष छै कि ऊपरी वायुमंडल के बढ़ल एब्लेशन के साथ LEO म॑ उपग्रह के क्षय म॑ तेजी आबै वाला छै (पढ़ऽ "Massive Shock Waves of Space Launches : Big Threat to Atmosphere", https://thecounterviews.in/articles/massive-shock-waves-of-space-launches-big-threat-to-atmosphere/).
अंतरिक्ष मलवा के खतरा
अंतरिक्ष मलबा मे, अकर्मक व कार्यविहीन उपग्रह व रॉकेट स्टेज/मोटर के भाग सं बेसी, नष्ट उपग्रह के टुकड़ा भरपूर अछि। ई मलबा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण सॅ शनैः शनैः नीचला कक्षा मे उतरि रहल अछि जे अंत मे वायुमंडल मे प्रवेश करय काल घर्षण के अतिशय तापमान मे जरि जाएत। 2007 म॑ चीन अपन फेंग्यून 1C उपग्रह केँ नष्ट कएलक जाहि मे ओकर >3000 टुकड़ा भेल, जेकरा म॑ सँ अधिकांश एखनहुँ अंतरिक्ष म॑ घूमि रहल छै । ई मानल जा रहल अछि जे सम्प्रति लगभग 55000 मलबा अंतरराष्ट्रीय एजेंसी द्वारा ट्रैक कयल जा रहल अछि (https://fas.org/publication/how-do-you-clean-up-170-million-pieces-of-space-junk/) । ई सब अप्रत्याशित रूपेण अस्थिर कक्षा मे घूमि रहल छै जाहि मे सँ किछु तँ संभावित मिसाइल के रूप मे सेहो व्यवहार कऽ रहल छन्हि । तहिनहिं अन्य राष्ट्र सब सेहो अपन-अपन उपग्रह के प्रयोगात्मक विध्वंश अपन तकनीक क्षमता के प्रदर्शन के रूप मे केने अछि आ एहन बहुतहिं मलबा अखनो अंतरिक्ष मे तैरैत व चक्कर लगा रहल अछि ।
एक दोसर व अन्य उपग्रह के बीच या मलबा सँ टक्कर तँ पहिनहि सँ प्रत्याशित आरू अपरिहार्य छै । एकहि दिशा वाला उपग्रह / टुकड़ा के बीच टकराव कम नुकसानदेह अछि मुदा ओहि वेग पर विपरीत/ अलग-अलग दिशा मे टकराव अत्यंत विनाशकारी भ सकैत अछि। एहि सं टक्कर के एक श्रृंखला शुरू भ सकैत अछि जाहि के चपेट मे अनेकों उपग्रह आवि सकैत अछि। यदि कोनो टक्कर होय जाय त॑ अंतरिक्ष के घर्षण रहित/वजन रहित 3-D कक्षा म॑ अनियंत्रित टक्कर के चेन रिएक्शन (अक्सर 'केसलर सिंड्रोम' कहल जाय छै) होय के संभावना छै जेकरा स॑ आसपास के बड़ऽ संख्या म॑ अन्य उपग्रह के नष्ट होएक संभावना होय जाय छै । प्रभावित पिंड के टक्कर के बाद के आगाँ के राह (trajectory) अक्सर जटिल होय छै । लंबवत या उर्ध्व गति सं चलय बला मलबा गुरुत्वाकर्षण सं तेजी सं खींचल, वायुमंडलीय घर्षण मे जरि सकैछ मुदा कक्षा मे घूमि रहल मलबा या उपग्रह के दिशा अलग होए छैक। अंतरिक्ष मे टक्कर के बाद उपग्रह के दिशा बिलियर्ड के गेंद समान होए छैक। पूर्व मे यदा-कदा टक्कर के बाद उपग्रह कार्यरत रहल; जेना 'सेरिस', फ्रांस के एक माइक्रोसैटेलाइट जे २४ जुलाई १९९६ क॑ एरियन रॉकेट के हिस्सा स॑ टकराएल छेलै ।लेकिन १० फरवरी २००९ क॑ मोटोरोला के 'इरिडियम ३३' कॉस्मॉस २२५१ (रूसी सैन्य उपग्रह) स॑ टकराबै स॑ दोनों नष्ट भ गेल ।
नव प्रक्षेपित उपग्रह केँ सेहो समान जोखिम होएत, खास क॑ जखन ओ अपन कक्षा केँ बढाओक हेतु चक्कर लगाओत । ई दौरान अन्य उपग्रह आरू विभिन्न मलबा स॑ LEO (200-2000 किमी) म॑ प्रवेश करै या बाहर निकलै समय टक्कर के अधिक संभावना अछि जे निम्नांकित चित्र मे रेखांकित करय के प्रयास भेल ।
Probabilities of collisions during Payload entry/exits of EBMs/ORMs
इ तरह के जोखिम ओ पेलोड मे बेसि निहित छै जे कम ईंधन के कारण उपरोक्त ऑर्बिट ऊंचाई बढ़ाओल मे ईबीएम (Earth Bound manoevres) / ओआरएम (Orbit raising manoevres) कें दौरान LEO सँ बारम्बार पास करय छै। अपन गंतव्य प्रक्षेपवक्र के तरफ सीधा जाय वाला पेलोड प॑ भीड़भाड़ वाला LEO के माध्यम स॑ बार-बार प्रवेश व निकास करैत छैक I एहि LEO मे पास कराए के दौरान अप्रत्याशित टक्कर के कारण असुरक्षा वांछनीय होइछ ।
अंतरिक्ष म॑ अंतर्राष्ट्रीय कानून के अभाव
अंतरिक्ष म॑ अंतर्राष्ट्रीय कानून क॑ बहुत कम ही सख्ती स॑ लागू करल जाय छै जेकरा स॑ एहन स्थिति उत्पन्न होइछ कि अंतरिक्ष सुरक्षा खराब होय गेल छै । P-5 के वर्चस्व के कारण संयुक्त राष्ट्र (UN) आरू सुरक्षा परिषद् (UNSC) लगभग मृत भ गेल छै जे अपन सुविधा लेली वीटो अधिकार के प्रयोग क रहल छै । एकर परिणाम ई छै कि P5 पृथ्वी व ओकर संसाधन क॑ खराब कए क॑ जलवायु परिवर्तन आरू एहन तरह के अनेकों कुकृति स॑ अंतरिक्ष के भी दोहन करैछ जाहि सँ आबै वाला समय म॑ पृथ्वी पर प्राणी बेहद असुरक्षित हो जेतै (पढू "Climate Change: Some Divergent Views", https://thecounterviews.in/articles/climate-change-some-divergent-views/) । भविष्य म॑ आउरो बड़ चिंता के बात ई होतै कि आंशिक रूप स॑ जारल पैघ मलबा वायुमंडल म॑ पुनः प्रवेश कए पृथ्वी के सतह प॑ गिर क॑ प्राणी के चोट व मृत्यु के कारण बनि सकैछ । भविष्य मे अंतरिक्ष क़ानून द्वारा गलती करै वाला पक्ष क॑ ई तरहे मजबूर करल जाय कि हुनका अपन द्वारा पैदा कएल अंतरिक्ष मलबा हटाय पड़तन्हि । ओहि टक्कर सं भेल नुकसान आओर व्यवधान के भरपाई करय लेल कानून सेहो बनाबय के जरूरत अछि।
सारांश
मैथिली मे वैज्ञानिक विषय वस्तु लिखए के ई हमर प्रथम प्रयास थीक I ई आलेख मे अंतरिक्ष मे लाखों उपग्रह व अन्य मलबा के कारण हर प्रक्षेपण, ओ चाहे LEO मे होए या सुदूर अंतरिक्ष मे, टकराव के आशंका तँ अवश्य रहैत अछि I एक पुख्ता अंतर्राष्ट्रीय क़ानून अत्यावश्यक अछि जाहि सँ अंतरिक्ष मे कम सं कम मलबा रहै जाहि सँ भविष्य मे प्रक्षेपित राकेट व उपग्रह के सुरक्षा सुनिश्चित कएल जा सकए I
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२.२.परमानन्द लाल कर्ण-चैत मासक एकादशीक माहात्म्य
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२.३.कुन्दन कर्ण- दोहैनि (बीहनि कथा)
कुन्दन कर्ण
दोहैनि (बीहनि कथा)
आयं हो सोहन , तों पैंच तकने छलहक से कोनो बेबस्था भेलह ? हं भय गेल, घूरन बाबूसँ भेट गेल, हुनकासँ डाँड़ दर्द के दवाई लिखबा लेलियैन संगे पैंच मांगि लेलियैन, बाहर जाक' दवाई वाला पुर्जी फाड़ि देलियैक !! से कियैक ? घूरन बाबू मलेरिया उन्मूलन विभाग के चपरासीक नौकरीसँ रिटायर भेल छथिन, जँ केयो हुनका डॉक्टर साहेब कहि कोनो बिमारिक इलाज़ पुछि लैत छनि त' ओकरा पर घूरन बाबू न्यौछावर भय जाइत छथिन !! हम हुनक ओहि कमज़ोरी के दोहैनि कय लेलियैन!!
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२.४.लालदेव कामत-गूलो'क स्वच्छ चरित्र/ पोथी चर्चा: मंथन
लालदेव कामत
गूलो'क स्वच्छ चरित्र/ पोथी चर्चा: मंथन
१
गूलो'क स्वच्छ चरित्र
गुलो उपन्यास'क आवरण पृष्ठ सज्जा देखि लागल जे एहि नायिकाक फोटोक नाम होएत गुलो। मुदा से नहि, एहि ललनाक बापके नाम थिकैन गुलो। गुलो बहुचर्चित उपन्यासक रचियता छथि वरेण्य साहित्यकार डॉ०(प्रो०) सुभाष चन्द्र यादव जी। उपन्यास विधामे पहिल पोथी मैथिली भाषा मेँ लिखलनि सुभाष चन्द्र बाबू,ताहिक दाम एकसय टाका, आ पृष्ठ सं० ८२ गोट छैक। पुस्तिकाक दरजामे रहैत 'गुलो' साहित्य लेखन जगतमे खुब विमर्श सेहो पौलक अछि। एहिक प्रकाशक - किसुन संकल्प लोक, किसुन कुटीर - सुपौल छैक। पोथीके आरंभमे 'आखरी विपन्न मनुक्खक गाथा' प्रसिद्ध साहित्यकार श्री केदार कानन २०१५ ई०मे १४ जनवरी केँ एहि उपन्यास मादे बहुत किछु लिख पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक जिज्ञासुकेँ कुतूहुलता वा कहू हलहली पइसा देलनि अछि। आओर जे मिथिलाक तिलासंकराति पावैन दिन'क रंगीनियां 'क तिलासंकरातिक आंगन-दुआरि निपिया सँ ओकरा बाबूक अंतिम क्रियाकर्म केर जीवन यात्राक धरि संप्रसंग व्याख्या संक्षेपमे कयने छथि। गुलो मंडल एक अत्यंत रोगाह चाहबला,जे अपन तीन पीढ़ीक पारिवारिक माली हालति सं लड़ैत अपनामे निठाहे धैरज गहने छैक। कोसी पूर्वी बान्हक भीतर- बाहरके लोकक लोकवाणी केँ मैथिली भाषा मेँ कहैत लोककथाक ई उपन्यास 'गुलो' पाठकके अन्त:करणकेँ छुबैत सिहरा दैत छैक। संवेदना केँ झखझोरैत अत्यंत पिछड़ल तबकाक गरीबी जीवनक एक मर्मस्पर्शी गाथाक विरूदावली केँ अपनामे समेटने ' गूलो' एक सूराहे पढ़ैत चलि जाएब ; मात्रे ई दीर्घकथा पढ़बाक लेल शूरूआत करैक देरी अछि। पाठक केँ समीचीन वातावरण समाजक कमजोर आर्थिक पक्षधरता क' जे कथानक अछि,एहि 'गुलोमे' से आन उपन्यासक करूणा सँ अलग बेढप छाप छोड़ैत छैक। डॉ०(प्रो०) यादव जीक शव्द चयन बेजोर छन्हि जे शुरू सँ अन्तधरि प्रवाह बनेने रहैछ। पिछड़ल, दलित वर्गक नहि,बरू सम्पूर्ण सुपौल,सहर्षा, मधेपुरा, अररिया , पूर्णिया आ कटिहार जिलाक टीशनी भाषा कहू वा अक्षरकटू ठेंठी मैथिली मेँ मातृभाषा 'क स्वर एहि उपन्यासक भाषा सौन्दर्यमे सुभाष चन्द्र बाबू चारिचान लगबैत लिखलनि अछि। भाषायी मानक केर विशद् विवेचनाक चुनौती रूपेँ सभक ' देसील वयना' संपृक्ति थीक। तेँ एहि धाराके परिशुद्ध मैथिली लेखन नहिं मानय बाला स्थापित साहित्यकार'क वानगिक कमियो नहिँ छैक। मुदा सवर्णक भाषाके छोड़ि , समस्त पछुआएल लोकक मातृवाणी इयह अछि -: मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, बेगूसराय जनपदमे । तेँ सुभाष चन्द्र बाबू'क 'गुलो' हाथों-हाथ लैत सराहल गेल य। एहिक मुख्य पात्र गुलोक नान्हिटा महिमा मंडित व्यक्तित्वकेँ जाहि उंच्च निष्कलंक चरित्र चित्रण रुपेँ पाठक बीच घटना दर घटना परोसल गेल हन् से सरिपहु रेखांकित करय योग छै। सुच्चा - सुधंग लोक जेना बजैत अछि,ताहि बोली शैलीमे ग्राम्य आंचलिक खिस्सा शुरू करैत विश्वक श्रेष्ठ परिधिमे आनलनि अछि। तहिना सुवासक -सुगंधके वास्तविक रसास्वादन अभिजातो वर्गकेँ वहुभाषाविद् आदरणीय सुभाष जी कराबैत छथि। लेखक किशन कारीगर ओहन लेखकके उकटैत छै जे अपना मायक मुखारविंद सँ बहराएल भाषाक जगह लेखन काज संस्कारित ओ बभनौआ मैथिली शैलीमे लिखैत पैघौत बनय चाहैक लोभी होय। मैथिली व्याकरण आओर रचना'क अध्येता कदाचित अपन कथन वा लेखन जौं शुद्ध -शुद्ध करैत रहल तँ अपने समाजक गैर साहित्य सेवी पढ़ल लिखल लोकक बीच हास्यास्पद ओ छुतहर सन एकात लागल आ असगर देखाईत रहैछ। जाहि लोभे पैघ लोकक समकक्ष आबय चाहैत होय , ताहूठाम कोनू मोजर नहिं रहैत छै। पाठकके गुलोक चरित्र विश्लेषण जानबाक आकांक्षा अवश्य हेतैन, से संक्षेपण रूपेँ एहि तरहें बुझल जा सकैत अछि। बगय सँ लिकलिक पातर ,दम्मा -खोंखी बेमारी सँ तंगहाल गुलो ५०-५५ वरखक अपन जवानिये वहिक्रम सँ गाजा सोंटैत छैक। चाहक दोकान नव उपनिवेश पर आबि झुग्गी - झोपड़ी बान्हि करैत य । सपरिवारो सतत् संगे रहैत छै। जेठका बेटा धरि पंजाब खटैत छैक। पहिले ओहो रिक्शा सुपौले में चलबैत पियाक सबके मजरौटीमे रहैत करजा बोझि लेने छलैक। ओकर पत्नी कन्दाहावाली आ दू सालक बेटा सूजीतके ल'के' बोईनक तीन मोन गहुँमके ड्राममे रखैत तालाकुजी भरैत नचार सासु बेलाबाली केँ छोड़ि नैहरा पराय चलि जाईछ। छोट ननैद रिनिया आ १० सालक दियर छोटुआ सँ अटबज्जर झगरा कयने रहैक।
दू सेर दूधक चाहमे सँ नितरोज तीन पौवा- एकसेर तकके तँ अपने सब पलिवारक समांग पीब जाईक। टुटदुम - टुकदुम दोकान छलैक,जतय भंगेरी नसेरी श्रमिक तबकाक गंहाकि अधिकतर जुटैक। रजुआ उठौना भोरके चाह पीयैत रहैछ,तगेदा देलो सँ कैँचा खातिर १० वजेक समय मोहलत लैछ। पायके अभावे लाय नै बनैत छै आ तिलासंकरातिक खिचरी खायले छाल्हि सँ गई टांसल जाई छै। चाहक दोकान पुश्तैनी डीह पर गुलोक बाबु मन्नीलाल पहिले सँ करैत रहय। ओकरा तँ रेलवेमे पैटमैनके नोकड़ी छलै। स्त्री असमय मरि गेने छोट बेटी आ -बेटा गुलोक परवरिश खातिर सहरसामे रेलवेके बड़ा बाबू बनर्जी साहेबके सब वृतांत कहि नौकरी छोड़ने छलैक। धरि लोहाक समान खंती,खुरपी,कोदारि,दबिया,कुरहैर,भाला आ बरछी गुलोक घरमे इयह पुश्तैनी सम्पैत नाम पर कायम छै। गोठ सिपौलमे बासडीक जगहधरि गुलोक बपटुअर भागिन नाना सँ ठकिकेँ केबला लिखा लेलकै। तैँ न गुलोके ओतय सँ उपटय पड़लैक आ बिहार सरकार केर रोड कातक जगहमे कोसी चौक पर गुजर बसर करय पड़ि रहल छैक। कहुनाके सुन्दरि जेठकी बेटी रूनियांके वियाहि लेने अछि। छोटकी अपरूप रिनियां तँ बारहे तेरह सालके छैक, जेकर सरकारी स्कूलमे नाउँ छठमामे लिखल छैक। पोशाक राशि भेटैत रहैत छैक से टाका पानसय आश्रमेमेँ खरच कऽ दैत छै। ताहि लेल रानियां' के लोहछब बात सेहो गुलोके सहय पड़ैत छै। मरैत दमतक अर्थाभावमे रहयबला गुलोक मृत्यु औषधिक ओरियान नहि धेला सँ होईछ,आ बेटी रानियांक अति सुन्दरताक कारणेँ नेपाल सँ वियाहक खोरचार भेलोपर ओकला शंख लगले रहि जाईछ। बालश्रम करैत छोटुआ साठि टका रोज देहारी कमबैत परिवार चलाबैके गुलोक आधार बनै छै। अरजुनमा छह हजार करजा माथ पर देने पैनजाब गेलै मुदा बापकेँ टाका नै पठबैत,अपना सिर दिया पत्नी के टका पठबैत य। गुलोक मालिक खएरहई ले खेत आ आमगाछी ओगरै ले देने रहैछ,जाहिमे बांसकोठि सेहो बेगरता पर काज अबैत छै। ओकरा भंगठल कल आ आंगनक टुटुल बेपर्द टाट आ दूनू घरक भासल खुटा मुंह दुसैत रहैत छै। ठीक करनाई निहायत आवश्यक बुझाइछ। विविध चिन्तामे डुबल गुलोकेँ अनवर सँ सुइया दवाएमे , मोबाईल सँ गप्प करेबामे ,ओकरा पोताकै किछ पाई पबैमे सहानुभूति पूर्वक मदैत भेटैत रहैछ। पाँच मास सँ बंकियौता पेंशन दूनू प्राणिक गुलोके दू हजार भेटबाक आश छै,ताहि बले सब काज आगु बढतैक। पलाय मालिक दशरथके देल १००० टाकामे सँ छोटुआ ९०० मे पुरना साईकिल धरि बेसाहि लैत अछि। ईमानदार गुलो मंडल कोन उपजाति 'क छीऐ? मंडल तँ केवोट , धानुक,अमात,कैवर्त , खतबे,ग्वाला, गंगौता,सूड़ी आ बंगाली आदि सेहो उपाधि रखैत छैक! ऐ भूमंडल पर अनेकों मंडल केर गरीबी गुलो मंडलके बावत् देखाबैत उपन्यासकार एक सामाजिक ताना- बाना बुनलनि अछि। गुलो सन राति-रातिभरि निन नै पड़ैबला घनेरो मंडल समाजक बेबसी- गरीबी जर्जर रूपेँ अखनो देशक आजादीक एतेक साल वादो ओहिना संकट अक्षुण्ण छै। ग्रामीण परिवेश'क विशद् वर्णन संग जे आभा देखाईछ से पटल पर सुभाषे बाबू सं बनि पड़ल हन् । हिनक लेखन शैलिक हम कायल छी, यथा -:
एक दिन फुलबा एलै। कहलकै -" गुलो भाय, आई सांझमे हरेरामक दुआर पर मीटिंग छिऐ। चलि आबिहह। अइ बेर मोदी कए जितेनाइ छै।" गुलो उकटि देलकै-' मीटिंग - फिटिंग सए हमरा की? तोरा मोटका गड्डी भेटल हेतौ । तू कर गए।'
दूटा कदमक गाछमे सँ एकटा बेचिकय कल ठीक करेनाई आ दूनू घरके सरल टुटल खुटा बदलनाई आ निफाह भेल चाहखन्नाक टाट जे आंगनोंके बेपर्द केने छैक से काज करबाक मशविरा अनवर दैत छै। मुदा गुलो तँ घरक मर्यादित ' रिनियां ' वियाह खातिर ई बड़का गाछ लगौनै रहैछ। भुमकम सँ नहियो मरने गुलोक नामपर छुटभैया नेताक बिचौलियागिरी सँ आपदाकोषके राशि बढ़ तिकड़म सँ भेटैत छै।आ बन्दरबांट केर भेंट चढैत सरकारी पाईके जूलूम - धांधलीक फरिच्छ छवि आ गुलोके भागिन महिन्दर केर ठकपनीक रहस्य खुजैत छैक....l
२
पोथी चर्चा: मंथन
मैथिली - हिन्दी साहित्य जगतमे चर्चित कवि श्री राजकिशोर मिश्र जीक अनेकों काव्य पोथी प्रकाशित भेल छैन। ताहि बीच गद्य विधामे रचना करैत आबि गेल छथि ' मंथन' केर संग। ई पोथी दसगोट आलेख 'क संग्रह छी। एहिक दाम दुसय टाका छै, जाहिमे 110 पृष्ठ छै। पोथीके आवरण रंगील आ आधुनिक छैक। ऐ आकर्षक पोथीक आई एस बी एन 978-93-5636-760-9 अछि,जे स्वयं लेखक अपन गामक पता सँ प्रकाशित ओ भारतमे मुद्रित कयने छथि। श्री मिश्र जी बिहार प्रान्तीय मधुबनी जिला अन्तर्गत अड़ेर डीहके निवासी रहैत,रहैत छथिन गुड़गांव, हरियाणा मे। हिनक जन्म दि० 27-1-1960 ई०मे भेल रहनि। ओ बी.टेक. (विद्युत) ,बीएचयू.आई टी , ( वर्तमान मे आई आई टी वाराणसी) सँ शिक्षा प्राप्त कय इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा -1982 पास करैत भारत संचार निगम लिमिटेड सँ मुख्य महाप्रबंधक (विजली) पद सँ सेवा निवृत्ति पाबि साहित्य सेवामे रमल छथि। मैथिली भाषा मेँ हिनक पोथी मेघपुष्प, चाननि छपल रहनि। हिन्दी साहित्यमे प्रकाशित पोथीक यथा -: प्रवाहिनी , ऊर्जा - वर्णन , संवेग, प्रदूषण, जल संकट, पुष्परेणु, शतभिषा, जल-लता, वेणुपत्र खूब चर्चा मे रहल अछि। सन् 2019मे ऊर्जा -वर्णन "खण्ड-काव्य" केँ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स आ एशिया बुक आफ रिकार्डड्स आओर वर्ल्ड बुक आफ रिकार्डड्स दिश सँ ' ऊर्जा पर प्रथम हिंदी काव्य ' घोषित कयल गेलैक। सन् 2020 मे प्रदूषण " खंड काव्य " केँ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड द्वारा ' कम्प्रेहेन्सिभ डिटेल्स आफ पाल्लूसन पर प्रथम हिंदी काव्य ' घोषित कयल गेलैक। श्री मिश्र जीकेँ 2022 ई० मे एशियन एजूकेशनल अवार्ड, इंडिया प्राइम एवार्ड, सार्क रीजनल ब्रिलिएन्स अवार्ड, इण्डियन एचीवर अवार्ड आ नेशनल एजूकेशन ब्रिलिएन्स अवार्ड भेट चुकल छन्हि। हिनक रचना संसार देखि मन गदगद भऽ उठैत अछि। अपन वांगमुख मे पाठकवृन्द लेल सार्थक अभिमत रखलनि हन्। ऐ पोथीक प्रकाशनमे अपन सुपुत्री सुश्री शिक्षा मिश्रक आ टंकण कार्य ले पत्नी श्रीमती अनीता जी'क प्रशंसा कयलनि अछि। मंथन पोथीक छपाई सुलेख आ फुटकल अक्षर रहला सँ अधिक कागतके उपयोग भेल छैक। पृष्ठक चारू भाग चौथाय छोड़ल सेहो गेलैक । निवंध पढ़ैत पाठकके अकक्ष नहिँ लागत, वरण पढ़ैक जिज्ञासा बढिते चलि जाएत। मिथिलांचल केर ज्वलंत समस्या,देशक समस्या आ विश्व संकट दिश लेखक महोदयके कलम चललनि आ तकर समाधान अपना जनैत देखेबाक परियास एहि पोथीमे केलनि अछि। मिथिलाक संस्कृति पर संचार माध्यमक प्रभाव ,जल संकट, पलायन, मैथिली भाषा : वर्तमान स्थिति , मिथिलांचल'क आर्थिक परिदृश्य, विज्ञान ओ समाज, मिथिलांचल सांस्कृतिक अवधारणामे परिवर्तन, हाट : एक गोट वाणिज्य - केन्द्र, मिथिलामे ग्रामीण जीवन आओर जीवन - शैली पर आधुनिकीकरणक प्रभाव विषय केँ रोचकताक संग आंकड़ावध्द लिखलनि अछि। एहि विषय पर हिनक काव्य सेहो खूब प्रसंशा पौने रहनि,ताहिक गहिंरपन सँ आलेख लिखल गेल छैक।वर्णित तथ्य पर अनेकों समीक्षकक पोथी चर्चा पूर्व मे आयल रहैक। एहिक रसास्वादन केँ विशेष रूप सँ अखियासैत ललित निबंध लेखन कविजी कयलाह,आश जगैत अछि हुनक दोसरो गद्य पाठकगण बीच समय सँ आबैनि। इयह शुभेच्छाक संग बधाय दैत छीयैन हम।
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२.५.रबीन्द्र नारायण मिश्र- ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
रबीन्द्र नारायण मिश्र
ठेहा परक मौलाएल गाछ (धारावाहिक)
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हमसभ नम्रताक मुम्बईक फ्लैटमे ताला लगा कए दिल्ली चलि अएलहुँ। ओकर एकटा कुंजी नम्रता लगमे पहिनेसँ छैहे। एतेक जल्दी कोनो आर व्यवस्था करब संभव नहि छल। कैकटा किरायेदार अभरल जरूर मुदा साहस नहि भेल। यदि केओ गलत आदमी निकलि गेल तखन के की करत?बैंक द्वारा प्रायोजित घरक निलामीमे हम भाग लेलहुँ। संयोगसँ ओहि फ्लैटक केओ आर लेनिहार नहि रहए आ हमर प्रस्ताव स्वीकार भए गेल। हम निर्धारित समयमे सभटा टाका जमा कए देलिऐक । बैंक हमरा नामे फ्लैट रजिष्ट्री कए देलक। ओकर कुंजी दोबारा हमर हाथमे आबि गेल।
-एकबेर फेर गृहप्रवेशक बिध कएल जेतैक की?
-एके मकानमे बेर-बेर गृहप्रवेश की हेतैक? सत्यनारायण भगवानक पूजा कए लेब ।
-ठीके कहलहुँ।
हमसभ तकर बाद सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक ओरिआनमे लागि गेलहुँ । ताहि हेतु सभकिछु ओरिआन हमसभ केलहुँ । इच्छा रहए जे पड़ोसीकेँ सेहो बजाबी। नम्रताकेँ सेहो खबरि केलिऐक। मुदा ओकर किलास चलि रहल छलैक।
हमसभ सत्यनारायण भगवानक पूजा करैत छी। लगपासक लोकसभ जानि कए नहि बजलिऐक। भेल जे अनेरे तरह-तरहक खोद-बेध करत। ओना तँ सभ बुझैत छलैक जे हमसभ बाहर रही तेँ फ्लैट बंद छल। घरक अधिकांश सामानसभ बाँचि गेल छल। किछु सामान जे खराप भए गेल तकर जोगार कएल गेल। एकसप्ताहक भीतरे हमसभ अपन दिल्लीक फ्लैटमे एकबेर फेर स्थापित भए गेलहुँ ।
हमसभ अपन फ्लैटमे दोबारा आबि कए बहुत प्रसन्न छी। लागल जेना हमसभ फेरसँ जीबि गेल छी। हमसभ फेर अपन पुरनका दिनचर्यामे लागि जाइत छी। साँझमे नित्य महादेवक मंदिर जाइत छी। ओहिठाम महादेवक नचारी गबैत छी। भजन-कीर्तनसँ मोनक भार हल्लुक कए लैत छी। सभकिछु तँ ठीक चलि रहल अछि मुदा रमा बहुत चिंतित रहैत छथि। फ्लैटक एकांत जेना हुनका काटि रहल छनि। एमहर किछुदिनसँ विस्मृति सेहो भए रहल छनि। दबाइ खेलहुँ कि नहि? स्नान करैत छथि आ किछु कालक बाद दोबार स्नानगृह पहुँचि जाइत छथि। भोजन कए लेतीह आ बिसरि जेतीह। ई समस्या पहिनो कनी-मनी छलनि। मुदा एमहर जेना बढ़ि गेलनि अछि। हमरो स्थिति क्रमशः गड़बड़ा रहल अछि। ठेहुनमे दर्द करैत रहैत अछि । डाक्टरक कहब जे ई सभ वृद्धावस्थाक लक्षण थिक । एहिना चलैत रहू। दबाइसभ खाइत रहू।
घरमे सभकिछु छल तथापि हमसभ किछु रिक्तताक अनुभव करिते रही। केओ संगमे रहितए तँ ओकरासँ दुख-सुख बतिआ लितहुँ । केओ रहितए तँ बेर-कुबेर अस्पताल लए जाइत,दबाइ आनि दैत,बैंकसँ टाका छोड़ा अनैत। मुदा ककरा एतेक पलखति छैक जे हमरासभमे लागल रहत?
हम पड़ोसीकेँ फोन करैत छी। ओकर हाल-चाल लैत छी। ओ वृद्धाश्रम छोड़ि चुकल अछि। दोबारा घर वापस नहि गेल। गुरुद्वारामे ठहरल अछि। ओना ओअिठाम सभकिछुक ओरिआन छैक,मुदा ओतए कतेक दिन रहि सकत? अपनो संकोच होइत छैक । ई सभ बात बूझि हम ओकरा अपना संगे दिल्ली फ्लैटपर रहबाक आग्रह केलिऐक।
-किछु दिनक लेल तँ ठीक छैक मुदा ई व्यवस्था असालतन तँ नहि भए सकैत अछि। जीवनक कोन ठेकान? कतेक दिन जिअब से के जनैत अछि?
-पहिने आबह तँ। आगूक-आगू देखल जेतैक। हमहूँसभ एहिठाम परेसाने छी। तोरा आबि गेलासँ भए सकैत अछि किछु सहुलियत भए जाए।
-ठीक छैक ।
पड़ोसी अपन झोरा उठओलक आ दिल्ली बिदा भए गेल । दोसर दिन साँझमे ओ ट्रेनसँ दिल्ली उतरल। आ सोझे हमर डेरापर चलि अबैत रहल। हमसभ ओहि समयमे मंदिरसँ लौटले रही। भोजनक ओरिआनमे लागल रही कि घंटी बाजल। हम केबार खोलैत छी। सामनेमे पड़ोसीकेँ ठाढ़ देखि हम अतिशय आनन्दित छी। ओ रोगा कए काँट-काँट भए गेल अछि। आँखि धसल छैक। लगैत छैक जेना ओ बहुत थाकि गेल अछि,झमारल अछि। तथापि हमरासँ बहुत हुलसि कए भेंट करैत अछि। हम ओकरा भीतर बजबैत छी-
-आबह, आबह।
पड़ोसी फ्लैटक भीतर अबैत अछि। रमा सेहो ओतहि आबि जाइत छथि। हमसभ बैसकीमे बैसि जाइत छी। बड़ीकाल धरि गप्प-सप्प करैत रहि जाइत छी। एहि बीचमे घटित भेल तरह-तरहक घटनासभक चर्च करैत छी।
राति बढ़ल जा रहल अछि। पड़ोसी आश्वस्त होइत अछि। अपन झोरा रखैत अछि। फेर हमसभ संगे भोजन करैत छी। पड़ोसी बहुत थाकल रहए। ओकरा निन लागि रहल छलेक। हमहूँसभ औंघा रहल छलहुँ। सभगोटे विश्राममे चलि जाइत छी।
भोरे घंटीक अबाजसँ हमर निन टूटि जाइत अछि। पड़ोसी सुतले अछि । रमा सेहो हमरे संगे उठैत छथि। फ्लैट खोलैत छी तँ अमेरिकाक पार्कमे भेटल किछुसंगीसभ सामने ठाढ़ देखाइत छथि।
-एना अचानक?
-सही कहलहुँ। असलमे हमसभ दूमाससँ विश्वभ्रमणपर निकलल छी। भारत पहुँचलाक बाद अहाँसँ भेंट करबाक इच्छा भेल । हमसभ अहाँकेँ संपर्क करबाक प्रयास केलहुँ। मुदा अहाँक फोन लगबे नहि करए। किछु-किछु संवाद अबैत रहल। काल्हि रातिेमे संयोगसँ अहाँक फोनक घंटी बाजल, मुदा लागल नहि। भेल जे अहाँ सुति गेल होएब ।
-बातो सएह रहैक।
-तेँ हमसभ अपने चलि अबैत रहलहुँ । भेल जे डेरापर होएब तँ भेंट भइए जाएत आ यदि नहि होएब तँ घुरि जाएब।
-बहुत नीक केलहुँ । हमरो अहाँसभ बहुत मोन पड़ैत रहैत छी। कैकबेर फोन करबाक इच्छा भेल। मुदा किछु-ने-किछु होइते रहल।
-कोनो बात नहि। आब चैनसँ बतिआएब।
हमसभ हुनकासभकेँ अंदर अनैत छी। रमा चाह-पानक जोगारमे लागि जाइत छथि।
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बूढ़ होएब कोनो अपराध नहि थिक। ईहो जीवनक एकटा अनिवार्य अंग थिक। जे आइ बच्चा अछि,सएह काल्हि जा कए युवक होएत,ओएह बादमे बूढ़ो होएत । ई जीवनक क्रम छैक। जे समाज बनतैक,जेहन व्यवस्था हेतैक तकर नीक-बेजाए सभकेँ भोगहि पड़ैत छैक। अपना समाजमे बूढ़क बहुत आदर छल,प्रतिष्ठा छल। परिवारमे ओकर सम्माननीय स्थान छल । आब सभ किछु बदलि रहल अछि। पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न भए गेल अछि। संतानसभ माता-पिताकेँ वृद्धावस्थामे संग छोड़ि दैत छथि। जाहि समयमे हुनकासभकेँ संतानक काज पड़ैत छनि,तखन केओ नहि रहैत अछि। केओ विदेशमे अछि तँ केओ मुम्बईमे। लगमे केओ नहि। यदि अपने हुनकासभ लग जाएब तँ परिस्थिति एहन भए जाइत अछि जे बरदास करब मोसकिल भए जाइत अछि। एहन परिस्थितिमे बूढ़ जाथि कतए? की करथि जाहिसँ सम्मानपूर्वक जीवनक संध्यामे जीबि सकथि? ई प्रश्न यत्र-तत्र -सर्वत्र पसरि गेल अछि। विदेशमे तँ एहि परिस्थितिक हेतु लोक पहिनेसँ तैयार रहैत अछि,ओहिठामक समाजे एहने छैक। तेँ बेसी परबाह नहि रहैत छैक। अपनासभक ओहिठाम समाज संक्रमणकालीन अवस्थामे अछि। तेँ समस्या बेसी गहींर भेल छैक। हमहूँसभ एही परिस्थितिसँ गुजरि रहल छी।
हम आ रमा एही विषयपर अमेरिकासँ आएल पार्कक दोस्तसभसँ विमर्श कए रहल छी। पड़ोसी सेहो ओतहि बैसल रहए। यद्यपि ओकर हालति ठीक नहि रहैत छैक ,तथापि हमरा ओहिठाम आबि गेलाक बाद ओ बेसी प्रसन्न रहैत अछि। एकटा आँखि तँ वृद्धाश्रममे चलि गेलैक। दोसरो आँखिमे बहुत कम ज्योति बाँचल छैक। एहि बातसँ ओ बहुत चिंतित रहैत अछि। मुदा खाली चिंता केलासँ की होमएबला छैक? समाधान ने चाही। ताहि हेतु हमरसभक विदेशीमित्रसभ प्रयासरत छथि। विदेशमे रहितो ओ सभ अपन माटि-पानिसँ लगाओ रखने छथि। भेलनि जे अपन पैतृकभूमिपर चली। एतए वृद्धलोकनिक हालति देखि कए किछु करबाक मोन भेलनि। हमरासँ तँ बहुत रास सुननहि रहथि। भारतभ्रमण केलाक बाद स्वयं सेहो बहुत रास घटनासभक अध्ययन केलनि। बहुत किछु बुझलनि। दिल्ली आबि हमरासँ भेंट करबाक एकटा उद्येश्य ईहो छलनि। ओ सभ चाहैत छथि जे देशभरिमे वृद्धलोकनिक स्वयं सहायता समूहक निर्माण कएल जाए जाहिमे ओ सभ स्वयं अपन-अपन आवश्यकताक सभवस्तुक व्यवस्था करथि। केओ ने अपन घर छोड़त,ने कतहु आन ठाम रहत। वृद्धाश्रम जेबाक तँ प्रश्ने नहि उठैत अछि। कारण ओ सभ वृद्धाश्रममे वृद्धलोकनिक दुर्गति देखि चुकल छथि। प्रश्न अछि जे एहि कल्पनाकेँ साकार कोना कएल जाए?
अमेरिकासँ आएल हमर दोस्तसभ अपन-अपन अनुभवसँ हमरालोकनिकेँ अवगत करैत छथि। ओ सभ प्रचूरमात्रामे आर्थिक सहयोग करबाक हेतु सेहो इच्छुक छथि। सर्त एतबे जे ओकर सही उपयोग होइक । हुनकर विचारसँ हमसभ बहुत प्रभावित छी। महादेव मंदिरपर साँझमे बूढ़सभ नित्य अबिते छथि। ओतहि हिनकोसभकेँ लेने गेलिअनि। लगपासमे रहनिहार किछु आर बूढ़सभकेँ सेहो सूचना देल जाइत छनि। महादेव मंदिरपर तँ भजन-कीर्तन होइते छल । ओहिदिन आर उत्साहपूर्वज भगवान शिवक नचारी गाओल गेल ।
-शिव हो उतरब पार कओन बिध ...।
विदेशी पाहुनसभ भजन सुनि कए बहुत प्रभावित भेलाह । आखिर ओहोसभ तँ एही-माटि-पानिसँ जुड़ल छथि। हुनकरसभक पूर्वज एतहिसँ अमेरिका गेल रहथि आ ओतए बसि गेलथि। आब एहि माटि-पानिक कर्ज सधेबाक भावनासँ आएल छथि। से बात ओ सभ मंदिरोपर बेर-बेर दोहरओलथि। हुनकालोकनिक एहि माटि-पानिसँ सिनेह देखि सभ प्रसन्न रहथि, उत्साहित रहथि। बूढ़सभकेँ जेना नूतन जीवन भेटि गेल रहनि। सभ एक-दोसरकेँ आशासँ देखि रहल छलाह।
-बात तँ सही कहि रहल छथि। हमसभ ककरो मुँहतक्कीमे किएक रही। एक-दोसरकेँ मदति कए, आपसमे सहयोग कए वृद्धावस्थाकेँ आनन्दमय बना सकैत छी।
-सभक मुँहमे एतबे बात छलैक । भेबो कएल सएह। ओहिठाम उपस्थित वृद्धसभ आपसमे मिलि कए एकटा स्वयं सहायता समूह बनेबाक निर्णय केलनि। ओकर नाम राखल गेल- जीवन संध्या । ओहिठाम उपस्थित वृद्धसभ तँ ओकर सदस्य बनिए गेलाह, जे ओहिदिन नहि आएल रहथि सेहो क्रमशः ओहिसँ जुड़ैत गेलाह। एक सप्ताहक बाद ओहि ट्रस्टक फेर बैसार ओही महादेव मंदिरपर भेल। हमर विदेशी दोस्तसभक सहायताक प्रस्तावपर चर्चा भेल। मुदा सभगोटेक विचार रहैक जे एहि संस्थाकेँ चलेबाक हेतु हमसभ स्वयं पर्याप्त छी। हमरासभकेँ कथीक कमी अछि जे विदेशीसभक सहायता लेब।
मुदा ओसभ कहलखिन-
-हमसभ कोनो आन नहि छी। हमरो पूर्वज अहींसभक जकाँ एहि माटि-पानिमे जन्म लेलथि। एतहि शिक्षा प्राप्त केलथि। विदेश जा कए ओ सभ विकास केलाह। तकरबाद हमसभ ओतहि रहि गेलहुँ । आब यदि हमसभ एहिठामक ॠण उतारए चाहैत छी तँ ताहिमे की हरजा? अहाँसभ तँ अपन काज करबे करू। हमरोसभकेँ जे पार लगैत अछि से करए दिअ। हमसभ जे सहयोग करब ताहिसँ अस्पताल,मनोरंजन गृह, सांस्कृतिक केन्द्र आदि बना लेब ।
सभगोटे हुनका लोकनिक मोनक भाओ बूझलथि। देखिते-देखिते दिल्लीक बूढ़सभक कायाकल्प भए गेल। भोर होइतहि वातावरण आनन्दमय भए जाइत छल । सभगोटे एकठाम उठथि,बैसथि,आपसमे दुख-सुखक चर्चा करथि। लगबे नहि करेक जे केओ असगर अछि। सभकेँ एहि संस्थाक रूपमे नव आश्रय भेटि गेल छलैक। सभ प्रसन्न छल। सर्वत्र उत्साहक माहौल छल।
एहि तरहेँ सभकिछु व्यवस्थित भए गेलाक बाद विदेशी मित्रसभ वापस अपन देश चलि गेलाह। जाइत-जाइत कहि गेलाह-
हमरासभकेँ बिसरब नहि। जहिआ कहिओ कोनो मदतिक काज होइक हमरासभकेँ अबस्स मौका देब। हुनका लोकनिकेँ आदरपूर्वक बिदा कएल गेल। ताहिलेल विशेष कार्यक्रम कएल गेल। गीत-नाद भेल। हुनकासभकेँ स्मृति चेन्ह देल गेलनि। एहि तरहेँ सभगोटे बहुत संतुष्ट भए अमेरिका वापस चलि गेलाह।
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जीवन संध्या स्थापना कालेसँ दिल्ली सन महानगरमे विख्यात भए गेल। ओहिठाम चलि रहल नीक काजसभसँ प्रभावित भए एक सँ एक लोकसभ आगू बढ़ि-बढ़ि कए ओहि संस्थासँ जुड़ैत गेलाह। ओहिमे यथासाध्य योगदान केलाह। जकरा जएह छल सएह लेने तैयार भए गेल। आब केओ वृद्ध असगर नहि छलाह। ओसभ नित्यप्रति आपसमे भेंट-घाँठ करैत छलाह । जिनका अपन घर नहि छलनि से एहि संस्थाक आवासमे रहि सकैत छलाह। जिनका अपन घर छलनि से अपन घरमे रहि संस्थासँ जुड़ल रहि सकैत छलाह। जकरा जे सामर्थ्य छल से एहि संस्थाक विकास हेतु समर्पित केने छल। जकरा जाहि प्रकारक सुविधा चाही,मदति चाही से परस्पर सहयोगसँ एतए भेटि जाइत छल। एक आदमी वृद्धलोकनिक हेतु टैक्सी चलबैत छलाह । जिनका जतए जेबाक छनि ,बस फोन कए देलासँ ओतए टैक्सी एक आदमीक संगे चलि अबैत आ जतए चाहथि ओतए पहुँचा देतनि। संगमे एकटा सहायक सेहो रहतनि। जिनका अस्पतालक काज छनि ,तिनका हेतु सेहो सहायता उपलब्ध छल। संस्थासँ जुड़ल व्यक्ति सदिखन हुनका संगे रहतनि। अस्पताल तँ लइए जेतनि,अपितु ओहिठाम डाक्टरसँ देखाएब,जरूरी जाँच कराएब, फेर घर वापस आनब,सभकाज ओसभ करतनि। जिनका मोन नहि लगैत छनि,कोनो कारणसँ उदास छथि तिनको हेतु ओतए वाचनालय छल। वृद्धलोकनिक हेतु संकीर्तन भवन,विचारगोष्ठीक व्यवस्था सेहो छल। कहबाक माने जे अहाँ जीवन संध्यासँ जुड़ि जाउ तकर बाद कहिओ असगर नहि होएब । लागत जेना सौंसे दिल्ली एकटा परिवार भए गेल अछि।
एहि सुविधाक प्रत्यक्ष फएदा पड़ोसीकेँ भेलैक। ओकर दोसरो आँखिक ज्योति क्रमशः चलि गेलैक। ओ निठ्आह आन्हर भए गेल। आब की होएत? केना ओकर जिनगी चलतैक। बेटा तँ घुरिओ कए नहि तकलकैक। उनटे ओकर फ्लैटो हरपि लेलकैक। मुदा धन्य कही जीवनसंध्याकेँ। ओ पड़ोसीक सभ भार उठा लेलक। सदिखन एकगोटे ओकरा संगे रहबे करत। ओकरा रहबाक जोगार जीवन संध्याक परिसरमे कएल गेल। एहि तरहेँ एकटा आन्हरक दृष्टि बनि कए ई संस्था ठाढ़ भए गेल। एहन-एहन बहुत उदाहरण छल। आब वृद्धसभ घर-परिवारक मोहसँ उबरि अपन स्वतंत्रताक आनन्द उठा रहल छलाह। जीवनक सही आनन्द उठा रहल छलाह। आखिर हमहूँ जे एतेक कष्ट उठओने रही से किएक? मोहेक कारण ने? रमाक परेसानीक कारण की रहनि?पुत्रमोहे ने। जखन कि आब हमसभ अपन दायित्वपूर्ण कए चुकल रही।
आब जखन समय-साल बदलि रहल छैक,पारिवारिक नियंत्रण शिथिल भए रहल छैक,संतानसभ चिड़ै जकाँ जबान होइतहि फुर्र भए जाइत छैक तखन तँ ई जरूरी छैक जे लोक वृद्धावस्थाक हेतु तैयार रहए । अनावश्यक मोहसँ बचए। जीवनसंध्या सन-सन कल्याणकारी संस्थाक निर्मान होइक आ लोक एकर बेसीसँ-बेसी फएदा उठाबए। एहि ठामसँ केओ किछु उठा कए नहि लए जाइए। सभकिछु एतहि रहि जाइत छैक। तेँ अनावश्यक ओकर पाछू पड़ि जीवनकेँ कष्टकर नहि बनाबए। अपितु,जीवनमे आध्यात्मिक भाओ आनए। सकारात्मक सोच राखए।
जीवन संध्यामे हमरा सन-सन हजारो वृद्धलोकनि जुड़ि गेल छथि। सभ आनन्दमय जीवन बिता रहल छथि। लगैत अछि जेना हुनकरसभक कायाकल्प भए गेल होइक।
जीवन भरि तँ परिवारक हेतु काज करिते अछि। ओ जरूरीओ अछि। जाहि संतानकेँ जन्म देलिऐक ओकरा सही नागरिक बनेबाक कर्तव्यक निर्वाह तँ हेबेक चाही। संतानकेँ उचित शिक्षा,स्वास्थ्यक व्यवस्था करब तँ कर्तव्य थिक जकर अनुपालन अवश्य हेबाक चाही। परंतु हमसभ मोहवश तकरबादो संतानसभक पाछू भागैत रहि जाइत छी। ओकरा बेसी सँ बेसी धन होइक,कैकटा मकान रहैक, खेत-पथार रहैक ताहि चक्करमे अपन जीवनकेँ अशांत कए लैत छी। संतान जखन आत्मनिर्भर भए गेल तकर बाद ओकर मोहसँ हटक चाही। तेँ अपनसभक समाजमे बाणप्रस्थ आ सन्यासक परिकल्पना कएल गेल अछि। जीवन संध्याक निर्माण एहीदिशामे मजगूत प्रयास अछि जे बहुत सफल भए रहल अछि। वृद्धलोकनिक तँ जेना कायाकल्प कए देलक अछि।
(समाप्त)
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.६.कुमार मनोज कश्यप-पेट-बोनिया
कुमार मनोज कश्यप
पेट-बोनिया
- "अबै जाई जाह ... अबै जाई जाह! एम्हरे बीच मे .... कुर्सी सभ खालिये छै। बैसs सब।" व्यवस्थापक सभ मजूर सभ के हाँकि-हाँकि कs पंडाल के भीतर बैसेबाक यत्न करै लगलई।
- "नईं यौ सरकार ... हमरा आउर पेट-बोनिया छी। काज ताकs लेबर चौक जाई छली तs एहन पैघ दीव टेंट देखते रहि गेली। अतs बैसने की पेट भरत?" मेट के कहब के सभ मजूर मुड़ी हिला कs मौन स्वीकृति देलकै।
- "धुर्र मर्दे! केहन बात करै छह!! पेट कियै ने भरतs? भरी पेट पूरी-तरकारी कचरि कs खईहs ... देखै नै छहक ओम्हर हलुआई लागल! आ बालो-बच्चा के खेबा-खर्चा लै तीन सय टाका जेबा काल नगदी भेटतs। आब कहs?!! अबै जाह एम्हरे।"
सभ आपस मे एक दोसरा के आँखि मे तकलक आ क्षणे मे पूरा पंडाल खचाखच भरल छलै ... ठाढ़ो हेबाक जगह नहिं!
-सम्प्रति: भारत सरकार के उप-सचिव, संपर्क: सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023, # 9810811850 ईमेल: writetokmanoj@gmail.com
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.७.निर्मला कर्ण अग्निशिखा- ३७
निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन।
(अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)
अग्निशिखा खेप -३७
पूर्व कथा
राजा पुरूरवा आ उर्वशी मेमना के आर्तनाद सुनि जागि जाइत छथि। देखैत छथि जे उर्वशी के दुनू मेमना के संग लs एकटा दस्यु भागि रहल अछि, ई देखि दुनू गोटे डेरा जाइत छथि।
आब आगू
राजा पुरूरवाक आँखि सs निन्न विलुप्त भs गेल छलनि,मुदा आलस्य किछु-किछु बाँचल छल।उर्वशी के चित्कार सुनि स्थितिक बोध होइतहि हुनकर ह्रदय काँपि गेलनि। ओ भयभीत भs गेलथि,कारण हुनका मेमना सभक संबंध मे उर्वशीक शर्त स्मरण भs गेलनि। हुनका लेल दुनू मेमना केँ ओहि दस्यु सभ सs बचा कs आपस आनब अत्यंत आवश्यक छलनि। मेमना के बचाबs के वास्ते अपन सुधि-बुधि विसारि ओ अपन हाथ में तलवार लs कs दौड़ल दस्यु के पाछू लागि गेलाह। घबड़ाहट में वस्त्र पहिरब सेहो मोन नहि पड़लनि हुनका।
किछु आगू गेला पर ओ देखलथि जे दूटा दस्यु छल,दुनू गोटे एक-एक मेमना अपन हाथ में लs कs भागि रहल छल। राजाक हाथ में तलवार देखि ओ दुनू मेमना केँ जमीन पर राखि देल,तखन किछु क्षण ओ ओतहि ठमकि कs ठाढ़ भs गेल।
ताबत धरि उर्वशी सेहो लग में पहुँचि गेल छलथि।तखनहि अचक्के ओ असंभाव्य अलौकिक घटना घटित भs गेल।अन्हार के बेधैत चमकदार विद्युत प्रकाश ओहि एकांत वन के सम्पूर्ण क्षेत्र के जगमग रोशन कs देलक आ राजा के नग्न रूप उर्वशी के आँखि के समक्ष चमकि उठल छल ! बस किछु क्षण! तत्पश्चात पुनः सब किछु अन्हार में विलुप्त भs गेल।
ई सब अपन नेत्र के समक्ष होइत देखि उर्वशी के सर्वांग काँपि उठल।ओ अपन दुनू हाथ छाती पर राखि सिसकि उठलथि।
"हा दैव!" ओ अपन दुनू हाथ सs हृदय केँ दृढ़ता सs दाबि रहल छलीह,हुनक प्रयास छलनि
,हुनक हृदय बाहर निकलि भूमि पर लोटि धूल-धूसरित नहि भs जानि । हुनक ज्ञान चक्षु खुजि गेल छलनि। संपूर्ण घटना के पाछु रचल गेल रहस्यक छद्म जाल हुनका बुझबा में आबि गेलनि। विश्वावसु! हुनक धर्म पिता के द्वारा हुनका संग छल भेल छलनि!ओ बूझि गेलथि! इन्द्र विश्वावसु के माध्यम सौं हुनका संग छल कs देलथि ! कारण ओ दुनू दस्यु केँ चीन्हि गेलथि । भला ओ अपन धर्मपिता के कोना नहि चिन्हितथि!ओ दुःखित भय राजा सँs बजलीह - .
"प्रियतम,ई दुनू दस्यु विश्वावसु आ हाहा छलथि! गंधर्व राज आ हुनकर सहायक ! दुनू गोटे अपना सभ संग योजना बना कs छल कयलथि। अहाँक आ हमर मात्र एतबहि दिनक संग-साथ छल संभवत:! आब हम जा रहल छी,अहाँ अपन ध्यान राखब प्रियतम!"
क्षण भरि लेल एकटा तेज ज्योतिपुंज आकाश में चहुँ दिशि पसरल आ किछु क्षण चम-चम चमकि विलुप्त भs गेल संगहि विलुप्त भेली राजाक प्राणप्रिया हुनक धर्म संगिनी! प्राण संगिनी उर्वशी !
घबराहट मे पुरुरवा अपन प्रियतमा केँ अंतिम विदाई तक नहि दs सकलाह ! ओ चकित आ दिग्भ्रमित भs कs ठाढ़ रहि गेलथि। किछु क्षण धरि हुनकर इन्द्रिय शून्य भs गेलनि जेना। फेर ओ चिहुँकि उठलथि! जेना स्वप्न भंग भs गेल होनि, अचक्के ओ पीड़ा भरल स्वर में क्रंदन करs लगलथि - "प्रिये,हमरा छोड़ि नहि जाऊ! एतेक निष्ठुर नहि
बनु! एतेक क्रूर व्यवहार नहि करु! हमरा छोड़ि कs नहि जाउ...हमरा छोड़ि कs नहि जाउ... उर्वशी... उर्वशी..."
कहि-कहि उच्च स्वर में विलाप कs ओ भूमि पर बिलखति खसि पड़लथि । हुनकर चेतना विलुप्त भs गेल छलनि। बहुत काल धरि ओ अचेतावस्था में भूमि पर परल रहलथि।
पुनः जखन पुरूरवाक चेतना आपस आबि गेलनि,आ ओ आँखि खोललथि तखन भुवन भास्कर धरतीक सतह के चुम्बन लs रहल छलथि। सघन वन्य प्रांत में सूर्यक प्रकाश आ छायाक बीच लुका-छिपीक खेल चलि रहल छलनि। राजा विकल विह्वल भेल उठि कs बैसि छलाह। तखन ओ अपना के नग्न देखि आश्चर्यचकित भs गेलथि ।ओ अपन अधोवस्त्र के तलाश करय लागलथि । हुनका अपन वस्त्र पाषाण शिला के लग में राखल भेटलनि,ओ पहिर लेलथि।ओ मोन पाड़बाक प्रयास करय लागलथि जे कोना ओ एहि वन में पहुंचल छलथि। तखन देखलथि जे एकटा मुद्रिका भूमि पर पड़ल अछि,ओ ओकरा उठा लेलथि। उठा कऽ ध्यान सौं देखलथि।ओहि पर राजाक अपन नाम उकेरल छल।राजा मुद्रिका देखि आश्चर्यचकित भs गेलाह -
'ई मुद्रिका ? ओ प्रेम सँ अपन प्रिया उर्वशी केँ स्वर्ग में दs देने छलथि प्रणय चिन्ह के रूप में! एतय कोना खसि पड़ल अछि ?
मन मे विद्युत तरंग लहरा गेलनि,रातिक घटना चलचित्र सन् आँखिक सोझाँ चमकय लगलनि,ओ दर्द आ दुःख सँ विचलित भs गेलथि,हाथ सँs अपन छाती दबाओल आ पुनः क्रंदन कs उठलाह -
"उर्वशी... उर्वशी... प्रियतमे! हमरा छोड़ि किएक चलि गेलहुँ! नहि! अहाँ हमरा छोड़ि नहि सकैत छी!अहाँ एतेक क्रूर कोना भ' सकैत छी!"
ओ बिलखि-बिलखि कs कानि-कानि उर्वशी केँ आवाज दs रहल छलथि। कानैत-कानैत अचक्के ओ विक्षिप्त सन् हँसs लगलथि । हुनक हँसीक ओ आवाज! अत्यंत भयंकर आवाजक गूँज! बुझाइत छल जेना सुखायल-फाटल बाँस सँs भs कs जाइत होय आवाज! ओ आवाज शून्य वन क्षेत्र मे गूँजि उठल। पुरूरवा विचलित भs गेलथि ।ओ क्रोधित भs कs चिचिया उठलथि ।-ओ माथक केश जोर-जोर सँs नोचय लगलथि ।ओ माथक केश शक्ति लगा कs नोचि उखाड़बाक असफल प्रयास करय लागलथि ।ओ केश नोचैत रहलथि, चिचियाइत रहलथि,आ पुनः चेतना विलुप्त भs गेलनि।आ ओ चेतनाहीन भs भू-लुंठित भय गेलथि किछु-किछु विक्षिप्त सन!
*****
सूर्यक तप्त किरण अपन तीक्ष्ण गरम स्पर्श सs पृथ्वी केँ उद्वीप्त करय लागल छल। मुदा उर्वशी आ राजा पुरूरवा एखन धरि राजमहल आपस नहि पहुँचल छलाह। राज कर्मचारी गण के चिन्ता बढ़य लागल छल। महामात्य राजाक अनुपस्थिति सँ अत्यंत चिंतित छलाह। एकर कारण छल! एक महीना सs बेसी काल सs राजा राजमहल में छलाह,ओ कतहु बाहर नहि गेल छलथि। आ काल्हि अचक्के रथ लs भ्रमण हेतु महारानी संग निकसि गेल छलाह। कतय जा रहल छथि आ कखन आपस अओताह,एकर कोनो जानकारी किनको नहि छल।
राजधानी के निकटस्थ सब प्रसिद्ध वनस्थली जतह सम्राट के जयवाक कनेको संभावना छल ओ सेनापति के नेतृत्व में सेना के अनेक टुकड़ी सम्राट अथवा महारानी के अन्वेषण हेतु पठा देलखिन। किनको किछु ज्ञात नहि छल जे सम्राट राति में कोन वन में गेल छलथि। सब निराश भs कs आपस आबि गेल। जेना-जेना सैनिक सब आपस आबि रहल छल आ सम्राट एवं महारानी के नहि भेटवाक संबंध मे हुनका लोकनि सँ सूचना भेटि रहल छलनि, महामत्यक व्यग्रता आ चिन्ता बढ़ल जा रहल छलनि। दिवस ढललाक उपरान्त कुमार वन दिस जे रथ गेल छल से स्वयं सेनापति केँ लs कs आपस आबि गेल। सब के बुझायल राजा एवं महारानी ओम्हरहु नहि भेटलथि,सेनापति निराश भय आपस आयल छथि,मुदा जखन रथ राजमहल लग रुकि गेल,सब आश्चर्यचकित भs गेलथि रथ में देखि कs। किएक तs हुनका लोकनिक राजा ओहि रथ मे बैसल छलाह। मुदा महाराजक ई दुर्दशा कोना भेलनि! हुनक ई हाल कोन कारण सौं भेलनि! कोन एहेन मानुस अथवा कोनो देव-दैत्य छल जेकरा कारण हुनकर ई हाल भेल छनि?
राजा पुरूरवाक हाल अत्यंत करुण छल,हुनक हालत देखि सबहक आँखि में नोर भरि गेल छलनि। ओ बताह सन् भs गेल बुझाइत छलथि!मुदा किएक? एहि प्रश्नक उत्तर किनको लग नहि छल। महारानी गेल रहलथि संगे,मुदा एखनि नहि छथि राजाक संगे।महारानीक संग कतs छूटि गेलनि! ओ संग किएक नहि छथि! अंत:पुर में महारानीक अन्वेषण कएल गेल मुदा रानी ओतहु नहि भेटलीह।
सब कियो अत्यंत चिंतित भs गेल छलथि। की रानीक अनुपस्थिति राजाक मानसिक अवस्थाक कारण छल? मुदा ओ कतय चलि गेलीह? काल्हि दुनू गोटे एक संग बाहर निकलल छलथि,राजाक स्थिति एहन कोना भ' गेलनि ? की रानी राजा केँ छोड़ि स्वर्ग चलि गेलीह? एहन अनेकों प्रश्न सबके हृदय में उठि रहल छलनि मुदा एहि सब प्रकार के कोनो प्रश्नक उत्तर ककरो लग नहि छल।रानी के अनुपस्थिति आ राजा के दयनीय स्थिति देखि सब कियो अत्यंत दु:खी भs गेलाथि।
अवचेतन अवस्था में राजा केँ देखि महामत्य ओहि रथ मे आबि रहल सेनापति सँ पुछलथि-
"महाराज के एहन हालत कोना भs गेलनि ?"
"हमरा सेहो किछु नहि बुझल अछि महामत्य! हम हिनका कुमार वन में अचेत अवस्था में भूमि पर पड़ल देखलहुँ,तखन हिनका रथ में एकटा सैनिक के मददि सs बैसा कs कोनहुना आपस अनलहुँ।"
एकर बाद कियो किछु नहि कहि सकल,कारण राजा एहि हालत में कोना आबि गेलाह आ रानी कतय चलि गेलीह से किनको नहि बुझल छलनि। सब गोटे राजा पर ध्यान देब नीक बुझलथि।राज वैद्य के बजाओल गेल आ राजा के चिकित्सा प्रारंभ भs गेल।मुदा कोनो चिकित्सा के किछुओ उपयुक्त प्रभाव राजा पर नहि देखा रहल छल,हुनकर हालत में कनिको सुधार नहि भs रहल छल।
राज वैद्य कहलथि - "किछु गंभीर आघात के कारण महाराज के मोन विक्षिप्त सन भs गेल अछि, ओ संसार आ स्वयं अपना प्रति निर्लिप्त भs गेल छथि हुनका आब कियो स्वस्थ नहि बना सकैत अछि |"
सब उदास भs गेलथि।एतेक पराक्रमी आ महान राजा के ई हाल? आब की होयत! जँs एहन महान चक्रवर्ती सम्राट के हाल नहि सुधरतनि! की राजा आब कहियो ठीक भs सकैत छथि ! की पृथ्वी केँ कहियो पूर्व सम्राट पुरूरवाक शासन पुनः भेटि सकैत अछि ? सब प्रश्न अनुत्तरित रहल! किनको एहि में एको प्रश्नक उत्तर ज्ञात नहि छल! मात्र समय ओकर उत्तर दs सकैत अछि!
क्रमशः
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२.८.प्रमोद झा 'गोकुल'-ओलतिक पानि (बीहनि कथा)
प्रमोद झा 'गोकुल'
ओलतिक पानि (बीहनि कथा)
दस साढ़े दसक समय होइत हेतै ।बनियान देह सँ निकालिके असघनी पर रखलक देवन ,आ कान्ह पर गमछी लटकाके विदा भेल नहाइले।घेँट उठाके आसमान देखलक ते बुझेलै जेना कैयेकटा मेघक टुकड़ीक रूप मे गगन पड़ी कड़िया झुम्मैर खेला रहल अछि ।कखनो पुरवा तँ कखनो पछवा ओकरा सब के हुमचि हुमचिके आलिंगन कय रहल छै आ बेर बेर धरती पर अपन श्रम स्वेद विन्दु टपकबैले एक दोसरा के धकेलि रहल छै तैहना बुझेलै।
देखिते देखिते बरखा जोर पकैर लेलकै ,तेँ अथ उथ मे पड़ि गेल देवन ।आब कयल की जाय ?जाड़ो बेस होम' लगलैये ऐ झाँट पर ।लगे मे राखल तौनी ओढ़ि मोबाइल टीपय लागल ।ओइ मे तेना ने बोहिया गेल जे कखन बरखा बन्न भेलै आ फेर कखन रौद भकड़ार भ' के उगि गेलै सेहो नै ओ बूझि सकल।
जखन घरनी पूजा घर सँ अपन पूजा पाठ कय बाहर भेलीह ते एतुक्का दृश्य देखि खौंझैत बजली--
देखियौ, ओसरा पर पानिक अहाँर लागि गेलै आ हिनका मोबाइल छोड़ि कथूक सुरते नै! कने पटियो हटाके राखि दितियै से नै!!पत्नीक उलहन भरल स्वर सुनि मोवाइल एक कात रखैत बजलाह देवन--
ऐ मे हमर कोन दोख? ओलतीक पानिके रोकबै ते ओ घरे ढूकत कि ने! चलू तैयो नै कोनो बात! एक कात से हम उपछै छी आ दोसर कात से अहाँ उपछू, खला लिय भरि पोख ऐ बेर जल होली!
-बेसी माथ नै भुकाउ हमर! जाउ झपसिन पहिने कल होली खेला आउ!!थाड़ी परसल अछि । खा पीबि के फेर हमर सौतिन मोवाइल संग जमिके खेलैत रहब ।चुप्पे मूहेँ विदा भय गेलाह देवन नहाइ ले ।नहा धो के भोजन केलैन आ फेर लागि गेलाह औफिसियल काज मे ।
-प्रमोद झा 'गोकुल', दीप, मधुवनी (विहार); फोन -9871779851
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२.९.डॉ किशन कारीगर- मैथिल पेटपोसुआ के गोंधियागिरी
डॉ किशन कारीगर
मैथिल पेटपोसुआ के गोंधियागिरी
ई गोंधियागिरी करनाहर सब त मैथिली भाषा के खंड बिखंड मे बांटि सुडाह क देलकै आ मिथिला मैथिली के नाम पर इ सब अपन पेट पोसै मे बेहाल रहल. परिणाम की भेल मैथिली अपने मे बंटा गेल आ तेकरा बंटनाहर वैह पेटपोसुआ मैथिल सब छै जे अपना फायदा दुआरे मैथिली के दफानने रहल आ मैथिली साहित्य के कहियो समाज स नै जोड़लक आ नै तेकर कहियो बेगरता बुझलकै?
मैथिली भाषा के शुद्ध-अशुद्ध, पछिमाहा-दछिनाहा, मधेश-कोसिकन्हा, बाभन-सोलकन, अगुआ-पिछलगुआ, पुरूस्कारी-होहकारी के लकड़पेंच मे बाँटि देलकै आ आब भवडाह केहेन जे सबटा मैथिली छियै? आ लेखनी पुरूस्कार आयोजन बेर मे मानक छोड़ि?
अनका राड़ सोलकन बना दुत्कारि दै छै किएक??
आस्ते आस्ते अंगिका, बज्जिका सब अलग भेल जा रहल अछि आ हैबो करब जरूरीए की ने? केकरो बोली के ई पेटपोसुआ मैथिल मोजर नै देलकै? मात्र अकादमी पुरूस्कार, मैथिली विभागक नोकरी लोभ, संयोजक पद दुआरे ई सब मैथिली मानक के ओझरी लगा मैथिली भाषा के खंड पाखंड मे बँटैत गेल? आ सब दिन ई पेटपोसुआ सब गोंधियागिरी खेला क भाषा साहित्य पर जबरदस्ती अप्पन कब्जा केने रहल? आ मिथिलाक जन समाज मैथिली सँ दूर होइत गेल.
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२.१०.फगुआ उपाधि २०२४-प्रस्तुति टीम विदेह
फगुआ उपाधि २०२४-प्रस्तुति टीम विदेह
होलीक अवसरपर प्रस्तुत अछि "विदेहक उपाधि"। ई उपाधि धारण करथि साहित्यकर्मी आ विदेहक संग जुड़ि सार्थक काज दिस आबथि से कामना............(प्रस्तुति टीम विदेह)
1. अरविन्द ठाकुर- गाछपर चढ़ा कऽ आलोचक बना देलक।
2. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल- बारल गीतकार।
3. केदारनाथ चौधरी -चमेली रानी पार लगेलकनि।
4. प्रेमलता मिश्र 'प्रेम'- प्रेमसँ संगीत नाटक अकादमी धरि।
5. शरदिन्दु चौधरी- हम उपेक्षित कहियो नै रहलहुँ।
6. कथाकार अशोक-ठोर धिपा देलक।
7. रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर'-मधेशक मठाधीश।
8. लक्ष्मण झा सागर -कियो नै पूछैए।
9. नरेन्द्र झा - हम भने आर्थिक लेखक छी।
10. प्रो. डा. रामावतार यादव - धरना बला सभ भाषावैज्ञानिक बनि गेल।
11. जगदीश प्रसाद मंडल - की छै विदेह?
12. राजदेव मंडल - कविताक राजमिस्त्री।
13. सुभाष चंद्र यादव - घरदेखियासँ मुँहदेखिया धरि।
14. सुशील - कलकत्तामे कियो ने चीन्हैए।
15. वीरेन्द्र मल्लिक - वेदसँ शुरू।
16. परमेश्वर कापड़ि - भ्रमरक डंकसँ बोखार भेल।
17. भीमनाथ झा - खाली आलेख बेरमे खोज करैए हमरा।
18. नचिकेता -पुरने स्वाद देबाक लेल प्रतिबद्ध।
19. गंगेश गुंजन - जँ कियो हमरो चर्च करैत... आह।
20. प्रदीप बिहारी-आब सरोकार बढ़ि गेल अछि।
21. योगानन्द झा- फेस्टीभलक सीढ़ीपर।
22. चन्द्रेश- दुर्भाग्यसँ "मणि" भेटल।
23. मुन्नाजी - बिना पेनी बला बोतलक मुन्ना।
24. प्रीति ठाकुर - चित्रकथा छोड़ि किछु नै।
25. वीणा ठाकुर - साहित्य अकादमीक नेहरू। सभ गलती लेल जिम्मेदार।
26. चन्द्र मोहन पड़वा- एकटा खोंता चाहबे करी।
27. रमेश- कार्यक्रम इनभेस्टमेंटमे अग्रणी।
28. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र - हमर गाम अरेड़ अछि।
29. शिव शंकर श्रीनिवास - आब हमहूँ दंपति रचनाकारक पाँतिमे आबि गेलहुँ।
30. रबीन्द्र नारायण मिश्र - एखन हम उपन्यास लीखब शुरुए केलहुँ अछि।
31. बिनयानंद झा - मधुबनी विलास।
32. शैलेन्द्र आनन्द- कतहुँ नै छी हम।
33. कल्पना झा (पटना)- हम तऽ नव छी।
34. नबोनारायण मिश्र - कोकिल केर ताकमे एखनो।
35. गजेन्द्र ठाकुर -सभकेँ बहसा देलनि।
36. अजित कुमार झा - के पड़त झमेलामे।
37. दिलीप कुमार झा - हम बच्चेसँ आन्दोलन करैत रहलहुँ अछि।
38. नारायणजी- अकादमीक खेती कठिन छै, फसिलक खेती सरल।
39. प्रदीप पुष्प -आब हमहूँ कविता लिखबै।
40. अभिलाष ठाकुर-बिसुखल गजलकार।
41. कुंदन कुमार कर्ण - नेपालक लोक मानि लेलक।
42. कीर्तिनाथ झा -कुरल केर आसा पुरल नै।
43. धनाकर ठाकुर -परिषद्सँ परिषद् धरि।
44. योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' - साढ़ू संसारक सभसँ नीक लोक होइत छै।
45. गौरीनाथ- "दाग" धोआ गेल।
46. शेफालिका वर्मा-हमरोपर विशेषांक निकलि गेल।
47. श्रीधरम- उपन्यासक कहबैका।
48. सियाराम झा 'सरस' - आब गजल नै सम्हरैए।
49. हितनाथ झा- पोथी पठा कऽ कहैए पाठकीय खराप विधा छै।
50. शिव कुमार टिल्लू - मोहन भारद्वाजक सपनासँ एकटा गीतकार धरि।
51. विभा रानी- अपने मनमानी।
52. कुणाल - मानकीकरण नै चाही।
53. विनय भूषण ठाकुर - हरेक विधामे फेल।
54. रविन्द्र कमार चौधरी - सावधान रहलाक बादो अकादमी नै पूछैए।
55. मुकेश दत्त- हम संस्थासँ बाहर नै छी।
56. चंदना दत्त- बेसी लीखि की करब?
57. शैलेन्द्र मिश्र- फेस्टीभल लेल रातियोमे चलि जाएब।
58. रमेश रंजन - साहित्य नाटकेसँ चलैत छै।
59. विजय इस्सर - उताहुल भेल छी।
60. कामेश्वर झा कमल - बिना पानि-कादोक कमल छी।
61. मुन्नी कामत - फाइनलसँ बाहर।
62. केदार कानन - अहूँ "संकल्प" लिअ।
63. डा. शिव कुमार मिश्र - पुरातत्व विभागक कवि।
64. प्रेमकान्त चौधरी-संस्था तऽ व्यक्तिगत काजक संवाहक छै।
65. उदय चन्द्र झा 'विनोद'- सभ किछु विनोदहिमे भेल।
66. लाल देव कामत - छोट पाठकीय
67. आचार्य रमानंद मंडल - सभ ब्राह्मणवादी छै।
68. सुरेन्द्र ठाकुर - बाबू साहेब चौधरीसँ शुरू आ बाबू साहेब चौधरीपर खत्म।
69. चन्द्रमणि झा - पुरस्कार नामक राग बनतै तऽ ओहिमे हमर सुर पक्का रहत।
70. बैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' - अतेक काज केलाक बादो दरभंगिया हमरा शिक्षा माफिया कहैए।
71. दमन कुमार झा - अपन सभ इच्छाक दमन कऽ लेलहुँ।
72. आशा मिश्र - एखनो उचाट लागल अछि।
73. नीरजा रेणु- कहाँ कियो बात करैए।
74. अमरनाथ - कबकब।
75. विश्वनाथ - आब साक्षात्कार नै।
76. विभूति आनन्द - अभिनंदनग्रंथक अभिलाषा एखनो बाँकिए अछि।
77. शैलेन्द्र कुमार झा - हम कथाकारक कथाकार छी।
78. प्रेम मोहन मिश्र- नै सम्हरल।
79. भवेशचन्द्र झा शिवाशं- जूड़ा बन्हलहुँ तँइ जूरी भेलहुँ।
80. मंजर सुलेमान- हो अल्ला, केहन मंजर देखेलह।
81. महेन्द्र नारायण राम - मुख्यधाराक जाति फिलर।
82. सत्येन्द्र कुमार झा - दरभंगे धरि।
83. हीरेन्द्र झा - प्रबंध संपादक बना कऽ सभटा हड़पि लेलक।
84. देव शंकर नवीन - आब पुरान भेल जा रहल छी।
85. रमाकान्त राय रमा- जवानीमे किछु नै भेल तँइ फेसबुकपर ललितगर फोटो दैत छियै।
86. ईशनाथ झा - भाजपाक लोक बिखनाथ कहैए।
87. नाटककार आनन्द कुमार झा - कहुना युवा पुरस्कार भेटल। आब मूल चाही।
88. अजित आजाद - पेनड्राइभमे CM.
89. नील माधव चौधरी-नवीन वियोगी चौधरी।
90. विजय चन्द्र झा- तालकटोराक तालमे।
91. विनोद कमार झा सरकार - फेस्टीभल करबै तऽ कहू।
92. बुद्धिनाथ मिश्र- मैथिलीमे अकादमी भेटब सहज छै।
93. चन्द्र मोहन कर्ण - केकरा कतेक दियै?
94. मधुकान्त झा- हमर लट लीलामे मधु भरल छै।
95. केष्कर ठाकुर - PHD चाही?
96. कामिनी- एक गिलास पानिसँ तृप्त।
97. चन्दन कमार झा - मूल पुरस्कार लेल जगबे करबै।
98. रमानन्द झा रमण - एसाइन्मेंटक महंथ।
99. तारानन्द वियोगी- सरकारी नौकरी बले लेखक बनलहुँ।
100. अंशुमान सत्यकेतु - मुख्यधाराक मोड़पर।
101. निर्मला कर्ण - नुकाएल अग्निशिखा
102. कुमार मनोज काश्यप - हमरा बीहनि कथा नै चाही।
103. परमानन्द लाल कर्ण - लिप्यांतरण करै छी।
104. संतोष कुमार बटोही -लक्ष्यक पता नै।
105. डा. जियाउर रहमान जाफरी - मैथिलीमे गजल लिखनाइ छोड़ा देलक।
106. जगदानंद झा 'मनु' - फेरसँ ताल ठोकब।
107. राजकिशोर मिश्र - पोथी पठबै छी।
108. सुशील लाल दास -दोहा मैन।
109. दयानंद झा (दड़िमा) - हमर अनुवाद कियो ने पढ़ैए।
110. पं. दयानंद झा - छंदशास्त्री माछ भंडार।
111. सत्यनारायण झा - ओहिना किछु लीखि लैत छी।
112. प्रणव झा - बेसी नै लीखब।
113. भैरव लाल दास - गाँधी लाल दास
114. भवनाथ झा - जनकपुर भारतमे छै।
115. अंजय चौधरी - पीढ़ी सह विशेषण सह दशक विशेषज्ञ।
116. संतोष कुमार मिश्र - हम तऽ मैथिलीक पोसपुत छी।
117. धीरेन्द्र झा 'मैथिल' - उपन्यास कीनू।
118. रघुनाथ मखिया - भोजनो बना कऽ भुखले रहलहुँ।
119. डा. आभा झा - संस्कृताह।
120. किशन कारीगर - पुरस्कार लेल अलगे कारीगरी चाही।
121. कुन्दन कर्ण - भाजपा समर्थित बीहनि कथा।
122. धीरेन्द्र कुमार झा - प्राइभेटे सही, कहुना पुरस्कारक लिस्टमे नाम आएल।
123. कमल मोहन चुन्नू - मुन्नू केर प्रतीक्षामे।
124. चण्डेश्वर खाँ- कच्छमच्छी छोड़ा देबनि।
125. ॠषि वशिष्ठ - दानव दल केर ॠषि।
126. मेनका मल्लिक- अनुवाद केर मल्लिका।
127. अनमोल झा - लघुकथाक मोजर नै।
128. किशोर केशव- हमर नाम नै कहबै।
129. डा. राम चैतन्य धीरज - कतेक धरब धीरज।
130. विद्यानन्द झा- आब कलकत्तामे हमहीं छी।
131. मिथिलेश कुमार झा - दस-बीस बर्खपर तऽ मंच भेटैए तकरा कोना छोड़ू।
132. अशोक झा-ईगो विकास परिषद्।
133. कुमार मनीष अरविन्द- जंगले-जंगल महल धरि।
134. आशीष अनचिन्हार - अपने ताल-अगिया बैताल
135. राजकुमार मिश्र - बिठुआमे कोनो दम नहि।
136. कृष्णमोहन झा मोहन - ग्लोबलो गाममे राजनीति छै।
137. शभेन्दु शेखर- मुल्लाक दौर महजिद धरि।
138. बैकुण्ठ झा - गजल बहरमे लीखू मुदा मात्राक्रम किए लीखै छी।
139. बीरेन्द्र कमार झा - हम अहिना लीखै छी।
140. प्रीतम निषाद- आन्दोलन विषाद दैए।
141. महेन्द्र - पातपर बैसल।
142. धीरेन्द्र प्रेमर्षि - माइक बलपर लेखक।
143. मन्त्रेश्वर झा - आब छोड़ि दिअ।
144. गंगानाथ झा गंगेश- अपना मोने नै लीखब।
145. अरविन्द अक्कू - फुटानी चौक केर सरदार।
146. सुस्मिता पाठक- कथा, कविता, अनुवाद- सभमे।
147. अशोक अविचल - किछुए मासमे बिसरि गेल सभ।
148. डा. बासुकीनाथ झा - जीतल बाजी।
149. अमरनाथ झा 'भारती' - भोरुकवासँ पहिने अस्त।
150. दीपक दिनकर - निपत्ता।
151. आनंदमोहन झा - पोथी घर पत्रिका दलान।
152. राजीवरंजन झा -शौकिया।
153. राजीवरंजन मिश्र - सालमे एक मास दर्शन देब।
154. परमेश्वर झा 'प्रहरी' - साहित्यमे पहरे दैत रहि गेलहुँ।
155. काश्यप कमल - अछिंजलेसँ पएर पखारब।
156. रेवतीरमण झा - मैना फुर्ररररररररररररररर
157. अयोध्यानाथ चौधरी - कहू किनकर अनुवाद छूटल।
158. बाबा वैद्यनाथ - आब हिन्दिएमे लीखब।
159. सतीश वर्मा - ने पत्रकार ने लेखक।
160. कुमार राधारमण -अपने वर्ग पहेलीमे फँसल।
161. देवांशु वत्स - कहियो काल चित्रकथा।
162. गंगा झा - टूटल मंचक निर्देशक।
163. दिनेश यादव - नेपालोमे ब्राह्मणवाद छै।
164. किशोर ठाकुर - हमर मिथिला हाट कब्जा कऽ लेलक।
165. सच्चिदानंद सच्चू - बिना कोटेशनकेँ उपन्यास लिखब संभव नहि।
166. बिनीत ठाकुर - कहियो काल उगबै।
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३.पद्य
३.१.कल्पना झा- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
३.२.राज किशोर मिश्र-परीक्षा
३.३.हितनाथ झा-अइ फगुआमे...
३.४.पवन मिश्र "गोनौली"- फगुआ मे गाम
३.५.आचार्य रामानंद मंडल- मचे होरी/ होरी
३.१.कल्पना झा- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
कल्पना झा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
हऽम नोब नय छी,
ने कात क चिंता आ ने बात क चिंता,
लोहछल मोन आई
बडु व्याकुल अति,
सुनलुं आजु "अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस" छै,
केकरा स पुछु आ के कहत,
घोघक तड़ सं मोन धुकचुनंकाईयै,
निर्वाह करैत रहु कि
किछु बाजु,
बिकायल गाय जेका माय छी,
मोन क बात मोने में राखि
पाऊच करयै छी,
समय क बखरा करैत
आब मोन थाकि गेल,
ओरियानी में बसि
उड़ैत चुनमुनियां के देखै छी,
आ आसमान क बाट जोहै छी।
-कल्पना झा, बोकारो, झारखंड
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३.२.राज किशोर मिश्र-परीक्षा
राज किशोर मिश्र
परीक्षा
हम बूढ़ वि द्या र्थी ,
दऽ रहलहुँ, परि स्थि ति क अग्नि -परी क्षा ,
हा रलहुँ , कखनो उत्ती र्ण भेलहुँ,
शि थि ल मो नक आब को न इच्छा ?
कि एक बनू परी क्षा र्थी आबहुँ?
मुदा समय ठा ढ़ लऽ मा न-दण्ड,
अनि च्छुक सा मि ल कयल जा इछ,
पूछल जा इत अछि प्रश्न प्रचण्ड।
सना तन-कर्त्तव्य-सी ढ़ी चढ़ि ,
पहुँचि गेलहुँ का लक एहि ठा म,
परी क्षा -भवन तैओ अछि जि नगी ,
आबहु छो ड़अओ ,दि अओ वि रा म।
मुदा व्यर्थ करब अछि प्रा र्थना ,
गरुड़व्यूह ,समयक हो इत अछि रचल,
ला क्षा गृह, रा वणक सा धु-भेष ,
कते कुहका मय अप्रत्या शि त मचल।
वृद्ध मुनि क तप देखि कि ए,
इन्द्रा सन डो लत?
बूढ़ बड़द केँ क्रयक लेल,
के दा म खो लत?
कखनो उनटा , कखनो सुनटा का लचक्र,
सो झ बा ट छो ड़ा य, पकड़ा बैत अछि वक्र।
ली ल-अका स सँ खसय लगैत अछि अठबज्जर,
आफद, मंगल-पथ पर आबि बनैत अछि मि ज्झर।
कुल -वंश -समा ज -रा ज -देशक परी क्षा ,
हरि श्चन्द्र का शी मे माँ गि रहल छथि भि क्षा ।
रा ज -तंत्र, गण -तंत्र पर समयक फेरी ,
जुग केँ सो झाँ मंगल आ' दुर्दि नक ढेरी ।
अग्नि -परी क्षा दैत-दैत
अछि असो थकि त भेल अर्थतंत्र,
जि नगी स्वयं सा फल्य लेल ,
ता कि रहल सदि खन नव मंत्र।
का ल- व्यूह मे फँसल री ति -
रेबा ज, प्रथा ओ परम्परा ,
नूतन व्या ख्या , नव परि भा षा ,
ओहि मे ओझरा एल धरा ।
समय ककरा -ककरा नहि जाँ चल ?
खसल कि ओ ,कि ओ रहि गेल बाँ चल।
कुरुक्षेत्र मे भी ष्म , पा र्थ वि द्या र्थी ,
जाँ च भेलै के स्वा र्थी , के धर्मा र्थी ।
परि स्थि ति क अछि चमत्का र,
बृहन्नला आ' शि खण्डी ,
अबला ना री बनि जा इत अछि ,
का ली आ' रणचण्डी ।
नि त्य साँ झ मे सूर्य देवक
भऽ जा इत छन्हि अवसा न,
ओगरैत रहैत छथि सगर रा ति ,
अन्हा रक महा मसा न।
मर्या दा -जाँ च समा ज करैत अछि ,
वि पत्ति करैछ धैर्यक जाँ च,
कुम्हा र पका रहल अछि बा सन ,
अहि आबैछ पा कल कि काँ च।
नेतक जाँ च, नि यति के जाँ च,
मुरदा जड़ल ? अचि आ-आँच।
गा छ सँ कूदि मा थ पर बैसि जा एत मर्कट,
पता ल फो ड़ि , पएर डसत तक्षक धरकट।
कतहु को नो नि शि चर अछि ,
कतहु को नो अगि आ बेता ल,
रा म-ना म केँ जप करैत ,
का लनेमि बजबैछ करता ल।
पा ण्डि त्य ओ मूढ़ते टा क नहि ,
अपन -आनक सेहो परेख,
का ल, कुण्डली बना दैत अछि ,
सुदि न आओर दुर्दि नक लेख।
डेगे-डेगे , खने-खने ,
जि नगी प्रश्न-पत्र लऽ ठा ढ़ ,
जुनि पड़ा उ ,उता रा ता कू ,
अबि ते रहतै गरमी -जा ढ़।
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३.३.हितनाथ झा-अइ फगुआमे...
हितनाथ झा
अइ फगुआमे...
चूमि रहल अछि सन्ते सत्ता ,
'आप'क लेल जहलमे हत्ता ।
रंग-अबीरक बोड़ी बन्हले ,
काज न अयलनि दारू सस्ता ।।
अइ फगुआमे 'आप ' निपत्ता ।।
'खड़गे'क - खर्ग बिझायल छनिहें
' राहुल ' नापथि रस्ता।
खसनि-समेटथि-राखथि पुनि-पुनि ,
फाटल छनि जे बस्ता।
अइ फगुआमे हालत खस्ता ।।
उलटि-पलटि, सटि-हटि,
पुनि सटि, सम्बन्ध रखै ई पक्का ।
किए नाम बदनाम गिरगिटे ,
समय-समय पलटै ई कक्का ।।
अइ फगुआमे हक्का-बक्का।।
अइ बसन्तमे हेमन्तक गति ,
ठमकौलक जहल पठौलक ।
एक -एक नहि ,दस-दस चिट्ठी ,
प्रेमक पाँति पढ़ओलक।।
अइ फगुआमे चम्पई ढोल बजौलक।।
ममता दीदी नहि ने सुनलकनि ,
देलकनि जोड़ पटकनियाँ ।
अपन राग ओ अपनहि गाबनि ,
सुर - लय संग नचनियाँ।।
अइ फगुआमे ई.डी. कीर्तनियाँ।।
हम न चौअन्नी उछलब कहियो,
बाबा चरण शरण गहि रहबै ।
रत्न देखाओल गाओल जन-गण ,
कोन मुँहें ना नुक्कुर करबै।।
अइ फगुआमे जय-जय कहबै ।।
इंडी - एनडी. गठबन्धनमे ,
डहकन - गीतक भरल सचारे।
एक - दोसरक ऊपर गाबय ,
सूनि रहल जनता बेचारे ।।
अइ फगुआमे 'नमो' सरदारे।।
महग भेल रंगो -अबीर सभ ,
सभ दल मिलि कादो फेकय।
कुदकि - फुदकि - हुलकै ई-मिडिया ,
दल-दलमे कमले देखय।।
अइ फगुआमे 'नड्डा' रभसय।।
भंगक तरंगमे तुकबन्दीकेँ ,
डर लगुआ - भगुआ - पिछुलगुआसँ ।
यमक - धमक ओत्ते असहज नहि ,
जत्ते सरकारक मुँहलगुआसँ ।।
अइ फगुआमे डर अगलेसुआसँ..
सत्ताक लोलुपेँ मुँहदुसुआसँ ।।
अइ फगुआमे..
अ. इ.. फ. गु. आ. मे ....।।
(हितनाथ झा फगुआ २०२४)
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३.४.पवन मिश्र "गोनौली"- फगुआ मे गाम
पवन मिश्र "गोनौली"
फगुआ मे गाम
आब नहि जाइए छी हम फगुआ मे गाम,
कहाँ रहलै गामोमे ओ मजा आ होरीक शान || आब.. ||
बसंतपंचमीक बादे सँ दलाने - दलाने होइ छल,
फगुआ गायन आ जोगिराक ठहक्क|
साँझ पड़ैत जुटै छल सब,
होइ छल होलीक हुड़दंग,
गुलाल उड़बैत छलाह भैया आ कक्का ||
ढोल- झालि मीरदंग बजै छल,
डंफाक ताल बेताल रहैए छल|
जन- बनिहार दलित किसान झुमै छल,
फागोत्सवक हमर ई परम्परा छल||
रंग - बिरंगी अबीर गुलाल उड़बैत,
लगैत छल सब समान |
भेदभाव लेश मात्र नहि,
होइत छल रंगक मंगल गान ||
रंगक फूहाड़ सँ चौतरफा उमरल उमंग,
सुखक सागर मे पसरल तरंग |
नेना- भुटका, संगी- सहेली संग,
काका- काकी, भैया- भौजी खेलथि रंग ||
सब रंगक संदेश अपन,
केसरिया त्याग- तपस्या हिन्दू सनातन,
लाल- पीयर वियाह- दुरागमनक शुभागमन |
कारी रंग विरोध आ मौन धारण,
उजरा रंग अछि शांति प्रतीक,
गुलाबी धैर्य, हरियर धरा धामक समपन्नता थिक||
समयानुसार सब बितैत गेल,
आय- कमाई सेहो बढ़ि गेल,
पहिले के तुलना मे ,
बेसी शिक्षित आ साक्षर समाज भ' गेल|
हर व्यक्ति मे व्यस्तता चरम छू गेल,
समाजिक सद्भावना संकुचित भ' गेल,
उत्सव- पर्व मे सेहो बदलाव आबि गेल,
फूल फुलै या नै फुलै, बसंतोत्सवक अंत भ' गेल||
[पवन मिश्र "गोनौली", 08-03- 2023 (होली दिन)]
-पवन कुमार मिश्र, शिक्षक, ज्ञानदीप बालिका विद्यालय, कोलकाता प्राइमरी स्कूल कॉनसिल, श्री श्याम सदन, 1, हाटगछिया, धापा, कोलकाता -700105, मो. 9433746295
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३.५.आचार्य रामानंद मंडल- मचे होरी/ होरी
आचार्य रामानंद मंडल
मचे होरी/ होरी
१.
मचे होरी
बृंदावन में खुब मचे होरी।
राधा संग कृष्ण खेले होरी।
बांस फुंचकारी से खेले होरी।
नीला रंग से कृष्ण खेले होरी।
पियर रंग से राधा खेले होरी।
कैलाश में खुब मचे होरी।
गौरी संग शंकर खेले होरी।
भस्म से शंकर खेले होरी।
बरफ से गौरी खेले होरी।
गौरी संग शंकर नाचे होरी।
मिथिला में खुब मचे होरी।
सिया संग राम खेले होरी।
लाल रंग राम खेले होरी।
हरियर रंग सिय खेले होरी।
कनक पिचकारी से खेले होरी।
जगत में खुब मचे होरी।
नर संग नारी खेले होरी।
सभ भेद भाव मिटाबे होरी।
सभ मिल जुल खेले होरी।
रामा सभ मिल गाबे होरी।
२.
होरी
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
रंग अबीर से खेले होरी।
बांस फुंचकारी से खेले होरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
एक ओर खेले राधा गोरी।
सोलह बरस के राधा गोरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
दोसर ओर खेले कृष्ण कन्हैया।
बारह बरस के कृष्ण कन्हैया।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
राधा संग कृष्ण खेले होरी।
ग्वालबाल संग गोपी खेले होरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
हरियर रंग से राधा खेले होरी।
लाल रंग से खेले कृष्ण कन्हैया।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
देव संग भक्त खेले होरी।
परमात्मा संग आत्मा खेले होरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
प्रेमी संग प्रेयसी खेले होरी।
साधु संग गृहस खेले होरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
ईश्वर संग प्रकृति खेले होरी।
मदन संग रति खेले होरी।
बृजकुंज में धमाल मचैय होरी।
पत्नी संग पति खेले होरी।
नर संग रामा नारी गाबै होरी।
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विदेह ३९० म अंक १५ मार्च २०२४ (वर्ष १७ मास १९५ अंक ३९०)|| 109
110 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in
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विदेह ३९० म अंक १५ मार्च २०२४ (वर्ष १७ मास १९५ अंक ३९०) | | 47 PIONS छा FO खनि Aaa उठि Pos -अनक्षीन aA | DOS JA HF Fale WAY Hel HY Ts 2B aR DODD F OE S3 tors NR oe FEAT DIY NPE SETS HS प्कतथिन । one WHEL pO a F vowel Pia ANA Dt मऊ D3 tds PRI प्रिछा Hol Way $3 st ca Vlad TAS । रड़ MBPS NAAT WATS SAS BY BIST WAG TAI Dz GAG APR I WAS BA TSH SAN NY खनन Brey BONE TINT A WA AAC AAT) Dah SOY. MANS CDVET HAT OT ON AHOTAT STAT BAIA ASONTSH OTA NB POS OPO HW धनिया zy NR) MPa कहतनि - TAHA ATT S A AB | नवाज oe QD OB TA THIN WAH NSTGMT THIS” T ? Ds SES कड़तनि : ऊन | NSIT D397 AN कथा मत एज विश Ht पितीक् & Facey BARA! Bad 'पितील abay od ated St कठतथिन VS AGREED a ee एस BTATY YIDYRMIT (BVO 2B) TS a ATE INAS AT अंध्रनक ia ७ प्राज्नानलवण Ale ध्यान 27S fe. Veg TA W संकट as site) ee OF OS मर्ज Ad BAITS SN Wop AT ये Dae Hy TSS BA. TH te aS DIS BAI NPA OAS AAA DIY vis अनिक OIA STAG Ba सश्य्ियों TANSEY ATACY AVA OF एक AST BATS | HAD Sst eng any ot Vey a0 ht ONA BIIGZAVS OG eS ae cise | Ba NTH SB PAI FF Lee 93 I03 | ATICYS ans mer ofS Ad 4050 छत vay ततिए ऊपर (A ततिराक। No Tat To ate VIII AISI G Sods सत्नाचंऊन $3 Tod छताए एन AACS आन, D3 Isa Bd ALY BAS yt ततिजा Epler ast TE BATS SYAG-sVVAG Sree TIA HY Tar | Cet ऊनक ONS अध कक CTT vat ST ASAT AGP IT नाथ तय रखी Brae Te SIS TOS ANSI 7 CHAP | 3 याज़ा PET
48 || विदेह (since 2000) ISSN 2229-547X VIDEHA (since 2004) www.videha.co.in SAMS Wea TUN sn BEERS or firs BE 5 ros eT | कत्कॉर्शिकक SO oe नाजवाऊ I +e थे SIN FT लात D3 TIA NAT BIAS 7 iol THATTA - Aa el EAT onAy A आस BIA THY SATS मं Di tN TS UI TIAA DIGS) — om WATS वीक 5 NUS ie का 3 sma | TRY ho A ७ WS SUNT V3 आना w UT STH PIPING Hol Tafa Vel सन AS RCSA FT THD A IAAT ey NT की करी? व्कान 6ीय STP BSTAS FI A AS ONG om S SU SANSA | वन A BAD NYY सीक OVA tah Tea 373 Ry TANS AR AUT BAS | BAST THVT SHA I RT Als Ba | तविण उठि ST Caras नया Ay AH of-nys} LAST ONY एस ठोढ 53 THGTS | खनि FS TANG BAI उतत्तिए Haat TotW कठतनि - 'अरों ww Gp rey Trt ST DT VN APP BAY WS-NG FOYS|" सतिछा कठतशिन - afd! Sasa Ty Hey SPT छथि | BT BAS AST BY Sa साय तन्तिएाअधि ठयय WAT SST nol PIT VIHA Ds td BUSS Of 2S THT उस WO SDM ! मन SS SSDS ANS Cy AXONS! BAT NTS OG ATS ( सम BYE MS TE जाय TH AVS! वि कठतनि - Sy! ACES GS ANI BR TBS DALY WY F NPG TOIT iP OH ADT Nob sR on Sex oie) vist fart aca HOTS aT NTS pagal wy ea fe 3 SPrTT MY एके प्रशधिउना SPD TAT FT SIOlS Sar 4 AG 3 BSUS! aa सनिक वहन खनि लतिण HAS Se दउ्ननिा४ NPY] (के SOI कर AGU Th DAT AsO Sai SI RSS DONNY उन AP ASS SHE Zea कठ “ST DAT NOTES DO कल हैँ, WE POS WF H BAT os BIH BW उन व; ONT I AGS कडतनि- ततिज एके OS BESS alas oT id Ds Torey ७ HPS TODS (पट NA 3 दतवशि। Sb aay oR Rae 3 rh saad Se eis