मैथिलीमे मौलिक कथाक रचना बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्धमे प्रारंभ भेल।स्वतंत्राक पश्चात् जाहि कथाकार लोकनिक महत्वपूर्ण योगदान अछि ओ लोकनि छथि --- पंडित गोविन्द झा, कुमार गंगानन्द सिँह,स्व. मनमोहन झा, उपेन्द्रनाथ झा व्यास, प्रो उमानाथ झा, हरिमोहन झा, मणिपद्म, डॉ.कांचीनाथ झा किरण आदि ।
डा. शैलेन्द्र मोहन झा, स्व. योगानन्द झा, सुधांशु शेखर चौधरी , विवेच्य कथाकार सभक बादक पीढ़ी में प्रो. मायानंद मिश्र, हंसराज, ललित, राजकमल, राधाकृष्ण 'बहेड़ प्रभास कुमार चौधरी जीवकांत, डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र, सोमदेव डा. रामदेव झा, श्रीमती लीली रे, गंगेश गुजन, रामकृष्ण झा किसुन, छत्रानन्द, उग्रानन्द, रामानन्द रेणु, नीरजा रेणु, शेफालिका वर्मा, श्रीमती आद्या झा, बलराम, राजमोहन झा, सुभाषचन्द्र यादव, मन्त्रेश्वर झा, रमेश, नारायणजी , गौरीकान्त चौधरी कान्त शिवशंकर झा 'कान्त' श्रीमती गौरी मिश्र आदिक नाम उल्लेखनीय अछि।
स्वतंत्रता - प्राप्तिसँ पूर्व आ पश्चात दुनू समयमे समस्यामूलक कथाक प्रणयन भेल। परंच स्वतंत्रता - प्राप्तिक पश्चताक रचनामे भोगल यथार्थक व्यापक चित्रण भेटेछ । सम्प्रति मानवक जीवनमे जे किछु नीक वा अधलाह बीति रहलैक अछि लोकक मनोवृत्ति किंवा दृष्टि, परिस्थितिक विवशता अथवा युग-परिवर्तनक कारणे जेना जेना बदलाव आबि रहलैक अछि, ताहि सभक यर्थाथ ओ प्रभावोत्पादक चित्रण आजुक कथा सभमे भेटैछ । आजुक कथाकार मात्र 'विवाहक परिधि में घेराएल नहि छथि। अपितु हिनका लोकनिमे परम्परावादी दृष्टिकोणक अछैत बदलैत युगक संग बदलेत मनोवृति तथा लोकक भिन्न-भिन्न अवस्थामे परिवर्तनक विभिन्न रुपक चित्रण देखबा मे अबैछ।
प्रो. हरिमोहन झाक विभिन्न कथामे पाँच पत्र' कन्याक जीवन, निकट पाहुन, ग्रामसेविका, मर्यादाक भंग ग्रेजुएट पुतोहु अलंकार- शिक्षा आदिक प्रमुख स्थान अछि, जाहिमे सुधारवादी दृष्टिकोण परिलक्षित होइछ । अन्धविश्वास, ओ रुढिवाद एवं अशिक्षाजन्य रोगक स्थायी निदानक दिशामे हिनक एहि कथा सभक महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । हिनक पाँच-पत्र सम्पूर्ण जीवनक दुख-सुखक चित्र प्रस्तुत करैत जीवन-दर्शन पर आधारित ई सर्वोत्कृष्ट' कथामे परिगणित अछि ।
"किरणजीक' मधुरमनि "आ 'कोन महल नाम रखबै एकर "मैथिलीक अनुपम निधि मानल जाइत अछि । मधुरमनि निम्नवर्गक एकटा महिला आ ओकर रूग्न पतिक प्रति प्रेमक आदर्श स्थापित करैत अछि ।
नागेन्द्र कुमरक कथा संग्रह - दृष्टिकोण (1954), शिकार (1955)आ फलेना जामुन (1985) मे भेटैत अछि । हास्य व्यंग्यक माध्यसं सामाजिक कुरीति पर प्रहार करब हिनक विशिष्टता रहल अछि।
व्यासजीक बिडम्बना (1952) कथा-संग्रहमे उत्कृष्ट कथा सभ अछि। सामाजिक समस्यासँ प्रभावित व्यक्तिक जीवन ओकर द्वंद तथा संघर्ष दिशि ध्यान दिएबाक श्रेय सर्वप्रथम बंगाल ओ अंग्रेजी कथा साहित्यक छै। एकर प्रभाव व्यासजीक कथा सभ मे देखल जा सकैत अछि।
स्व. मनमोहन झाक रचना मूलतः 'करुणा सं भरल रहैत छनि। हिनक अश्रुकण 1949 ई. मे प्रकाशित भेलनि। तकर बाद वीरभोग्या, गंगापुत्र संग्रह प्रकाशित भेलनि। गंगापुत्र पर हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार सेहो प्रदान कयल गेलनि। हिनक किछु प्रमुख कथा अछि -- 'रुना', झगड़ा, खिड़कीक गप्प, आहत, चन्द्रहार, राजगीर- यात्रा आदि जे मैथिली साहित्यक अद्वितीय रचना थिक । हिनक अधिकांश कथामे पारिवारिक कलह, अकस्मात दुर्घटना, प्रकृतिक मानवीकरण, प्रेमक पावन स्वरुप आदि कें सहजता सँ देखल जा सकैत अछि।
पाश्चात्य कथाक विन्यासकें मैथिलीमे अनबाक श्रेय प्रो. उमानाथ झाकेँ जाइत छनि । हिनक रचनामे शिल्पक नवीन प्रयोग एवं मनोदशाक विश्लेषण विशेष रूपसँ परिलक्षित होइछ। हिनक रेखाचित्र ' 1951 ई. मे प्रकाशित भेल, जकर 'आध घंटा', माधवजी, ओहि दिनक यात्रा, नीलाम्बर, आदि कथा समस्या मूलक अछि, जे लोकक दैनन्दिनी संबन्ध पर आधारित उत्सुकता सं भरल आ प्रेरणादायक सन्देश प्रेषित करबाक सामर्थ्य अछि ।
सिद्धहस्त कथाकार योगानन्द झाक 'आम खाएबाक मुँह' सामाजिक जीवनपर आधारित अमर कथा थीक, जे घटना - संयोजनके रोचक बनबैत दू प्रेमी- हृदयकेँ मिलयबाक स्तुत्य काज करैछ ।
सुधांशु शेखर चौधरीक 'एक सिंघाड़ा एक चाय' नितान्त वैयक्तिक ओ अर्थाभावक प्रतीकात्मक रूप प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि, जे परिस्थितिक प्रतिकुलता दिशि संकेत करैछ।
स्वतंत्र्योतर मैथिली कथाकार लोकनिकमे ललितक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनक कथा 1950 ई. सं प्रकाशित होमए लागल जाहिमे विविध प्रकारक सामाजिक समस्याक सटीक चित्रण भेटैछ। हिनक कथा सभमे मध्य एवं निम्नवर्गीय जीवनक घूसखोरी आ भ्रष्टाचार चित्र भेटैछ। प्रतिनिधि कथाक रूपमे हिनक ओवरलोड कें देखल जा सकैछ। "कथा - नायक दीनानाथ दरोगा छथि, जे अपराधके रोकबाक लेल प्रतिनियुक्त छथि। मुदा ओ स्वयं ओहि अपराधमे लिप्त भ जाइत छथि।' ललितक अन्य कथामे मुक्ति, रमजानी, कंचनिया, प्रश्नचिह्न आदि प्रमुख स्थान रखैत अछि। अनमेल विवाहक परिप्रेक्ष्यमे लिखिल हिनक कथा
'जयगणेश' हृदयविदारक अछि ।
प्रो. मायानन्दक मिश्रक प्रतिनिधि कथा अछि -- गाड़ीक पहिया, चन्द्रविन्दु, मिझाइत दीप आदि जे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, फ्लैशबैक आदि शिल्पगत आधुनिक प्रयोग पर आधारित अछि। मध्यवर्गक नेह-प्रेम, ओकर टूटैत सामाजिक मर्यादा, अभिजात्य तथा संघर्षशील जीवनक विविध पक्षकेँ अपन कथाक केंद्रमे रखलनि अछि, जे हिनक विशेषता कहल जा सकैत अछि।
स्वातंत्र्योत्तर विभिन्न काल खंडक कथापर बिहंगम दृष्टि देला उत्तर कतेको चित्र समक्ष अबैछ, जे समाजक हेतु यक्ष-प्रश्न बनल अछि । एहि दृष्टिमे पूँजीपति ओ सामान्य वर्गक मध्य दूरी, बेरोजगारी, जमाखोरी, कालाबजारी, महगी, भ्रष्टाचार, दहेज- प्रथा, भूमि-विवाद, सीमा-विवाद, क्षेत्रीयवाद, जातिवाद आरक्षण, साम्यवाद, अस्पृश्यता निवारण, वर्ग- संघर्ष प्रति स्पर्धा भौतिकवादी मानसिकता, विरक्ति, आक्रोश, आत्महत्या, राजनीतिक उथल -पुथल, नक्सलवादी, माओवादी प्रभृति संगठनक आतंक समानान्तर सरकार स्वरूप नैतिकवाद ह्रास, मानव- -मूल्यक अवमूल्यन,अन्तर्जातीय विवाह सम्बन्धक टूटन, पारिवारिक कलह, आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या द्वेष , राग विराग, जनसंख्या- दृष्टि, आर्थिक संकट, मनोवैज्ञानिक दवाव, प्रतिभाशाली युवा पीढ़ीक हताश जन्य वेदना, विज्ञानक चमत्कार, बेईमानी आ घुसखोरी बढैत ग्राफ, ईमान्दारक शोषण आ पारिवारिक ओ सामाजिक दबावजन्य ओकर मानसिक असंतुलन, कुंठा, त्रासदी बाह्याडम्बर, ढोंग पाखंड, चोरी-डकैती, अपहरण, बलात्कार खूनीखेल, शिक्षा- जगतक प्रति विभिन्न स्तरपर उदासीनता वा अन्यथा भाव, श्रमिक समस्या, बाल- मजदूरी देहातसं शहर दिशि पलायन, नारी- उत्पीडन, नशा-पान, उदासीनता का अन्यथाभाव आधुनिकताक चाकचिक्य मांग आ पूर्तिक मध्य खींचातानी, अपसंस्कृति प्रति आकर्षण, चिर- संचित मर्यादा-प्रतिष्ठ कें तिलांजलि , पाश्चात्य संस्कृति आ भारतीय संस्कृति,मिथिलाक संस्कृतिमे प्रवेश आ तज्जन्य विकृत्क आविर्भाव, अफसरशाही ममिला - मोकदमा, हल-प्रपंच, धोखाधड़ी, जालसाजी, महत्वाकांक्षा, देखादेखी, प्राकृतिक आपदा , महामारी? महामारी एड्स एन्सी फैलाइटीस आ स्वाइन फ्लू सदृश संक्रामक बीमारीक प्रकोप भूखमरी, आ एही प्रकारे अनन्त समस्याक चक्रव्यूही धेरल-बेढ़ल मानव-समुदाय, त्राहि कृष्ण करैत दृष्टिगत होइत अछि ।"
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. श्रीश, डा. दुर्गानाथ झा- मैथिली साहित्यक इतिहास-भारती पुस्तक केन्द्र दरभंगा, 1986ई , पृष्ठ -187
2. झा, डा. वासुकीनाथ- संपादक - मैथिली कथाक विकास - साहित्य अकादमी नई दिल्ली,2003ई , पृ०-46,47.
3. झा, डा. रमानन्द झा रमण-संपादक - मैथिली कथाक समाज- चेतना समिति, पटना, 2016ई . पृ०-38,39.
4. मिश्र, डा. धीरेन्द्र नाथ - मैथिली कथाक सामाजिक परिवर्तनक प्रभाव, पृ०-179, 180.
- अम्बालिका कुमारी, शोधप्रज्ञ(JRF), विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय कामेश्वरनगर, दरभंगा।
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