विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

"अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक

कल्पना झा · 2024-06-01 · अंक 395 · पृष्ठ 35–43

पन्ना जीक "अनुभूति" सँ प्रारम्भ भेल "अनुशीलन" आ "अभिलाषा" धरिक साहित्यिक यात्राक अवलोकन करैत एक बातक अफसोच भ' रहल अछि, एक्कहि शहर पटनाक निवासी रहितहुँ हमरा हुनका सँ भेंट, हुनकर लेखनीक माध्यम सँ भ' रहल अछि। सशरीर भेंटघाँट कहियो नहि भ' सकल। भेंटघाँटक क्रम मे गप्पे गप्प मे बहुत किछु बुझितहुँ। हुनकर व्यक्तित्वक सभ आयाम सँ परिचित होइतहुँ। खैर जे-से।
एमहर विदेह टीम जखन "नरेन्द्र झा विशेषांक" निकालबाक घोषणा कएलनि, तखन नरेन्द्र झा जीक अर्द्धांगिनी पन्ना झाक साहित्यिक अवदान पर लिखबाक बात सेहो सुनबामे आएल। देखलहुँ, पन्ना झाक पोथी सभ विदेह साइट पर उपलब्ध अछि। झट सँ डाउनलोड केलहुँ।
सभ सँ पहिने पन्ना जीक "अभिलाषा" पढ़लहुँ। नीक लागल। विशेष प्रभावित भेलहुँ एहि कारणेँ जे सभ टा मनोवैज्ञानिक आधार पर लिखल कथा सभ अछि उक्त पोथी मे। ओना तँ कोनो कथा मे मनोविज्ञान रहिते छै, मुदा मनोवैज्ञानिक आधार पर लिखल कथा मे पात्रक मन:स्थितिक चित्रण, भावनात्मक पक्ष पर विशेष फोकस, सामान्य कथा सँ भिन्न तरहक निश्चिते। मनोविज्ञान चूँकि हमर अपन विषय सेहो रहल अछि, तँ स्वाभाविके बेसी मोन सँ पढ़लहुँ। पात्रक मोन मे पैसबाक रचनाकारक प्रयास केँ भाँफि सकलहुँ। आदरणीय भीमनाथ झा जी, पोथीक 'भूमिका' मे अपन बात राखैत कहलनि अछि "मनोविज्ञानक शिक्षिका प्रो. पन्ना झा व्यक्ति ओ समाजक अध्येता सेहो रहलीह अछि। अध्येते टा नहि निरीक्षिका सेहो। निरीक्षणक संग ई ओकरा मे अबैत परिवर्तनक रेखांकन करैत चलैत छथि-शब्दचित्र रचैत जाइत छथि।आ ओहि मे प्राण फूकि दैत छथि। ओकर प्रत्येक क्रिया-कलाप अहाँक मोन पर ठोकर मारैत अछि।" अक्षरशः सत्य कहलनि अछि आदरणीय। सभटा कथाक सभ पात्रक चयन पन्ना जी समाजक अध्ययन करैत, लोकक मानसिकताक निरीक्षण करैत कएने होएतीह, से स्पष्ट दृष्टिगोचर भेल पोथी पढ़ैत काल। कोनो छोटो सन घटना, कोनो परिस्थिति केँ कथाक रूप देब, हिनकर लेखन कौशलक परिचायक अछि। जेना पोथीक पहिल कथा, "बहन्ना"क नायक बैजूक संग भेल घटना। एहि तरहक घटना देखबालेल तँ बहुत लोक देखैत रहैत अछि, मुदा कतेक लोक देखलथि आ बिसरलथि, सएह हिसाब रहैत छैक। आ ओएह घटना संवेदनशील लोक केँ बहुत किछु सोचबा लेल विवश करैत छै। मुदा बहुत किछु सोचलाक बादो, ओहि परिस्थितिक शब्द-चित्र खींचब सभक बुत्ताक बात नहि। संवेदनशील होएब कोनो रचनाकारक मूल गुण अछि, आ ई गुण स्पष्ट देखाएल हमरा, हिनकर लिखल कथा सभ पढ़ैत काल।
एकटा विशेष बात ध्यान देबा योग्य इहो अछि, जे हिनकर पहिल कथासंग्रह "अनुभूति"क बात हुअए किंवा "अभिलाषा"क बात हुअए। बिनु प्रयोजनक कोनो प्रसंग घुसिया क' कथा केँ नमहर करबाक प्रयास नहि कएल गेल अछि। कहबाक माने पाठकक बहुमूल्य समय बेरबाद करबाक आरोप नहि लगा सकैत अछि केओ हिनका पर। जखन कि मनोविज्ञान आधारित कथा सभ मे पात्रक मानसिक स्थितिक चित्रण करैत अनर्गल प्रलाप करबाक स्कोप भरपूर रहैत छै रचनाकारक समक्ष।
कथासंग्रह "अनुभूति" वास्तव मे रचनाकारक अनुभूतिएक संग्रह थिक। जाहि मे अपन विचार, अपन भावनाक अभिव्यक्ति सहज, सरल भाषा मे देखबा लेल भेटल। चाहे ओ "अनमोल आनन्द" मे अपन पाँच सँ बारह बरखक नाति-नातिन आ पोताक संग बिताओल अनमोल पल केर अनमोल अनुभूति होइन किंवा "असामान्य के" सन संवेदनशील कथा हुअए। सभटा अपन अनुभूतिएक अभिव्यक्ति छनि। "अनुभूति" नामकरणक पाछाँक कारण सेहो इएह छलनि, जे हिनका कथाक पात्र सभक संग जीबाक अवसर भेटल छनि। घटित घटना हिनकर हृदय केँ प्रभावित कएलकनि।
पन्ना जीक "अनुभूति" पढ़ब शुरु करितहि, नजरि गेल "समर्पण" पर। सामान्यतः जेना होइत छै, सभ सँ पहिने नजरि जाइते छै "समर्पण" पर। से नजरि पड़ितहि, मोन मे छपि गेल जेना। "समर्पण-ओहि सभ व्यक्ति ओ पात्र केँ, जिनका सँ कथा लिखबाक प्रेरणा भेटल" बहुत नीक लागल, विशेष लागल, उचित लागल, हृदयतल सँ लिखल शब्द लागल। सामान्यत: रचनाकार लोकनि अप्पन खास लोक केँ समर्पित करैत छथि, से देखल छलए, तैँ आर विशेष लागल। अपन कथाक पात्र सभक प्रति थैंकफुल होएब, हिनकर विनम्रताक द्योतक छनि।
वास्तव मे हिनकर लेखनीक माध्यम सँ हिनकर व्यक्तित्व सँ परिचित होएब बड़ सहज छनि पाठकक लेल। जेना हिनकर स्वीकारोक्ति "कच्छप गतिए लेखन चलैत रहल। संग लागल गृहणी आ प्राध्यापिकाक ड्यूटी बड़ कड़गर छल, तैँ लेखन प्रक्रिया के अवाध गति नहि द' सकलियै" सँ स्पष्ट अछि जे ई अपन सभ जिम्मेदारी कतेक निष्ठाक संग निभाबैत जीवन बितओलनि। हमरा लेखेँ ई बेसी महत्वपूर्ण बात! अवाध गतिए साहित्यिक आवदान दैत जँ दोसर जिम्मेदारीक अवहेलना होइतनि, से अनुचिते बात होइतनि।
दुनू कथासंग्रह "अनुभूति" आ "अभिलाषा" पढ़ला उत्तर "अनुशीलन" पढ़लहुँ। ई बेसी उपयोगी पोथी बुझाएल। ई पोथी निबंध-संग्रह अछि। मुदा निबंध-संग्रह बुझि एकरा उबाउ सन पोथी नहि बूझब केओ। रुचिकर विषय सभ अछि एहि पोथी मे। संगहि एकेडमिक महत्वक सेहो अछि ई पोथी "अनुशीलन" जाहि मे नारी-लेखन सँ संबंधित साहित्य-विमर्श सेहो भेटत। मनोविज्ञान संबंधी आलेख सभ सेहो भेटत। जेना "आत्महत्या:मानसिक विकृति" आ "बाल अपराध:सामाजिक अभिशाप" सन आलेख।
पन्ना जीक एहि निबंध संग्रह "अनुशीलन"क पहिल निबंधक चर्चा मोहन भारद्वाज जी अपन आलेख "साहित्य आ साहित्य दृष्टि"क अन्तर्गत करैत छथि। हुनकर कहब छनि-" साहित्य किएक लिखल जाए"- ई वाक्य प्रश्न मूलक अछि। एहि वाक्य सँ अनेक वाक्य जनमैत अछि। साहित्य किएक आवश्यक अछि, साहित्य की अछि, ककरा लेल अछि, आदि आदि।"
आगाँ ओ कहलनि अछि --"साहित्य-लेखन चिपड़ी पाथब नहि अछि। कहबाक लेल साहित्य लिखा रहल अछि, किन्तु ओहि मे साहित्य-दृष्टि नहि छैक। साहित्यकार लेल अँखिगर होएब जरूरी छैक।" एही स्थितिक प्रतिक्रिया थिक पन्ना झाक ई पोथी "अनुशीलन"। एहि मे साहित्य अछि। साहित्य-दृष्टिक आवश्यकता पर जोर अछि।
पन्ना झा जीक एक टा वक्तव्य सेहो अवलोकनार्थ प्रस्तुत करैत छी,जाहि सँ "अनुशीलन"क अनुशीलन करबाक इच्छा सभक मोन मे सहजहि जागृत होएत। "साहित्य आ समाज मे अन्योन्याश्रय संबंध छैक। एकक बिना दोसरक परिकल्पना नहि कएल जा सकैत अछि। मनोविज्ञान तँ साहित्य आ समाज दुनूक अभिन्न अंग अछि। तैँ समाज, परिवार आ व्यक्ति केँ प्रभावित करए बला किछु मनोवैज्ञानिक तथ्य केँ हम "अनुशीलन"क माध्यम सँ उपस्थित करबाक प्रयास कएल अछि।"
निबंध संग्रह "अनुशीलन"मे संकलित सभटा आलेख सार्थक आ उपयोगी विषय सँ संबंधित अछि। एक दिस प्राचीन भारतीय संस्कृति मे नारी, समाजक सशक्तिकरण मे मैथिल महिलाक योगदान, बेटी:सृजन आ संघर्षक रूप, आधुनिक मैथिली कथा मे नारी, सन अनेक विषय पर साहित्य-विमर्श आधारित आलेख अछि। ओतहि फैशन:एक आवश्यकता, धिया पूताक फूसि बाजब, कामकाजी महिला:सुविधा-असुविधा, विद्यार्थी आ अनुशासनहीनता, हीनताक भावना एवं तकर निदान, सन आलेख समाजोपयोगी विषय पर आधारित अछि।
बिना कोनो लाग-लपेट केँ हमर स्पष्ट मत अछि,जे पन्ना जीक साहित्यिक यात्रा भले छोटे रहलनि मुदा रहलनि निस्सन। तीनू पोथी अपना अपना जगह पर बहुत नीक। पठनीय ओ संग्रहनीय । मुदा जँ सभ सँ नीक पोथी चुनबाक गप्प करी, तँ हम "अनुशीलन" केँ चुनब। ई पोथी सभ केँ पढ़बाक चाही। चाहे ओ लिखनाहर होइथ कि पढ़नाहर, माने लेखक/पाठक सभ लेल समान रूप सँ उपयोगी सिद्ध हेतनि।
एकटा गप्प आरो कहिए देब ठीक। मोनक बात मोन मे किएक राखी। ई तँ सर्वविदित अछिए, हरेक व्यक्तिक, हरेक रचनाकारक अपन फराक दृष्टिकोण होइत छै। समाज मे घटित घटनाक अवलोकन करबाक, ओहि पर मंथन करबाक,अपन नजरिया होइत छै। ओहि विषय पर किछु लिखबाक, अपन शिल्प होइत छै, अपन शैली होइत छै। आ अपन अपन स्थान पर सभ सहीए रहैत अछि, एहि बात केँ सेहो नकारल नहि जा सकैत अछि। हम अपन बात राखि रहल छी। हमरा हिसाब सँ "माता क्वचिदपि..."क शिप्रा आ "एक टा आर समिधा"क गायत्रीक खिस्सा (अभिलाषा कथासंग्रह सँ) केँ एकटा भिन्न दिशा देल जा सकैत छलए। निस्संदेह दुनू पात्रक जीवन मे घटित घटना झकझोरने हेतनि रचनाकार केँ, तखने एकरा अपन कथाक विषय बनओलनि अछि। मुदा एहि विषय केँ एकटा एहन संदेश दैत कथा बुनबाक प्रयास समाजक लेल बेसी हितकर भ' सकैत छलए, जाहि मे मात्र समस्या सँ जुझैत आ फेर हारि मानि, जान देब टा उपाए नहि देखाओल जाइत। समस्या सँ जुझैत ओहि सँ बहरेबाक उपाए करितथि, कथाक मुख्य पात्र। ओना बेटीक प्रति निष्ठुर समाजक चित्रण सेहो बहुत किछु सोचबा लेल विवश तँ करिते अछि। संगहि स्थिति मे सुधार लेल जागरूक सेहो करैत छै लोक केँ। तथापि हमरा बुझाएल जेना कथा केँ दोसर मोड़ सेहो देल जा सकैत छलैक।
ओना एहि ठाम हमरा इहो बात स्पष्ट करब आवश्यक अछि जे, जेना अधिकतर महिला साहित्यकारक रचना मात्र स्त्रीक शारीरिक-मानसिक पीड़ा केँ 'हाइलाइट' करबा पर देखैत छी (जकरा साहित्यिक भाषा मे स्त्री विमर्शक संज्ञा देल जाइत अछि) तेना पन्ना जीक रवैया नहि देखाएल। किछु कथा छोड़ि, स्त्री केँ निरीह प्राणी देखएबाक प्रयास करैत नहि देखएलीह हमरा। सत्य कही तँ मात्र स्त्रीक दुख पर फोकस करब नीक बात अछिओ नहि। स्त्रीक जीवनक अपन महत्व छै, अनेक सुख सेहो छै। कखनो स्त्री होएबा पर गौरव-बोध कएनिहारि स्त्री-पात्रक खिस्सा सेहो हुअए। स्त्री होएब, मतलब मात्र दुख भोगब, से अविश्वसनीय सन बात भेल आ पुरुख मतलब महिला के दुख देमएबला, प्रताड़ित करएबला, सेहो ओतबे अविश्वसनीय।
पन्ना जीक साहित्य मे विविध विषयक समावेश छनि। जे देखि/पढ़ि हम तँ बड़ आह्लादित भेलहुँ। हिनकर रचना संसार लेल अंग्रेजीक शब्द "remarkable" एकदम उपयुक्त बुझा रहल अछि हमरा। बेसी सँ बेसी लोक पन्ना जीक रचना पढ़थि, गुनथि, लाभान्वित होइथ, हमर कामना!

Suggested citation: कल्पना झा. “"अनुशीलन"क अनुशीलन आवश्यक.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 395, pp. 35–43, 2024-06-01. https://www.videha.co.in/research/2024/395/अनुशीलन-क-अनुशीलन-आवश्यक.htm

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