रमेश (संपर्क-दरभंगा)
मिथिलाक अर्थव्यवस्थाक विरल व्याख्या करैत लेखक: नरेन्द्र झा, सी.ए
साहित्यकारो लेखक होथि, तें 'गैर-साहित्यिक लेखन' केनिहार लोक, 'लेखक' नहि होथि, से बात नहि! ई सत्य आ तथ्य नहि थिक। 'गैर-साहित्यिक लेखन केनिहार', 'असली लेखक' आ 'लेखके टा' होइत छथि! मैथिली भाषा मे, से गैर-साहित्यिक लेखन, अदौकाल सँ कमजोर रहल, आ एहेन लेखकक संख्या दयनीय रहल। कारण, साहित्य-लेखने मात्र, साहित्यकारगणक 'समर्पणपरक जिद्द आ निजी व्यय' सँ होइत रहल, तँ 'साहित्येतर आन क्षेत्रक लेखन' पर विद्वान सब, सामूहिक रुपें, कोना सक्रिय होइतथि? समाज, शासन आ मिथिलाक प्रजातान्त्रिक धन्नासेठ सबहक, कोनो सहयोग नहि रहल, साहित्य वा साहित्येतर लेखन के। तें, भाषा, भाषा आन्दोलन, सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्थाक लेखन, राजनैतिक मीमांसा करैत लेखन, समाजक अभगदशाक आ धर्मक्षेत्रक लेखन, देस-दुनियाँ आ विज्ञान-आधारित लेखन, मिथिलाक प्राकृतिक आ मनुष्य निर्मित आपदाक लेखन, आदि क्षेत्र पर आलेख आ पोथी-लेखनक धारा, जे कोनो समाजक, 'प्रत्यक्ष आ वास्तविक अयना' होइत अछि, से उपेक्षित रहल, मिथिला समाज आ मैथिली भाषा मे! ई बहुत दुर्भाग्यपूर्ण, लेखन-घटना भेल अछि!
एहेन सन दयनीय स्थिति मे, जे किछु गोटे,फाँड़ बान्हि क', गैर-साहित्यिक लेखनक माटि स्वीकार केलनि, ताहू मे अग्रगण्य छथि, श्री नरेन्द्र झा, सी.ए, पटना! ओ जहिया कहियो, कतहु भेटला, भेटिते देरी सब दिन, पहिल पाँती कहलनि- 'हम त' 'लेखक' नहि छी, अहाँ सब जकाँ!' हुनकर ई पाँती, हमर साहित्यकार पर प्रहार करैत रहल, आ हमरा हीया सालैत रहल, मैथिली भाषाक गैर-साहित्यिक लेखनक दयनीय दशा पर, आ नरेन्द्र झा एहेन विशेषज्ञ लेखकक उपेक्षा पर! हुनकर लेखनक उचित संज्ञान नहि लेल जायब, उचित मूल्यांकनक कोनो टा आयोजन आइ धरि नहि कयल जायब, मैथिली भाषाक लेखन-संवर्गक बड़का त्रुटि थिक। अइ पैघ अभाव अभियोगक, आइ उत्तर थिक, 'ई-विदेह'क' ई आयोजन'! जखनकि ओ 'मैथिली लेखक संघ', पटनाक, संस्थापक आ अध्यक्षे छथि, हुनका ई अबिनखेद आइ धरि किए छनि, जे मैथिली-संसार हुनका 'लेखक' किए नहि मानलक? तकर एकमात्र कारण थिक, हुनकर लेखनक मूल्यांकन लेल, लेखन-संवर्गक कलम नहि उठब। मैथिली मे कोनो लेखकक उपेक्षाक ई परिस्थिति, बहुते क्लेशदायक अछि! हम मुदा, हुनका सब दिन कहलियनि, जे 'हम अहीँ के 'असली लेखक' मानैत छी, साहित्यकार लोकनि के, 'साहित्यकार' मानैत छियनि'! ओ कहथि, 'लिखि क' कहिऔ'! सैह लिखि क' कहबाक, आइ हमरा अवसर भेटल अछि, 'विदेह'क अइ सार्थक आयोजन मे।
लेखक नरेन्द्र झा, मैथिली आन्दोलन मे सेहो, खूब सक्रिय रहलाह, अपना जीवन मे। दरभंगा मे रहथि, त' डा. लक्ष्मण झाक संग काज केलनि, आ स्वभावत: 'मिथिला राज्य निर्माण'-आन्दोलनक समर्थक बनलाह। से पटनो मे, आ कोलकाता मे सेहो। तें, पैघ आन्दोलनी, स्व.बाबू साहेब चौधरी, आ स्व.प्रबोध ना.सिंह सँ घनिष्ठता रहलनि। तहिना कोलकाता आ दरभंगा मे निरंतर, आजीवन, आन्दोलनात्मक आयोजन केनिहार, 'मिथिला संघर्ष समिति,दरभंगा' आ 'साक्षर', दरभंगा, के कर्त्ता-धर्त्ता, एकटा आन्दोलनी श्री कमलेश झा, सेहो छथि। ओ हमरा चारि-पाँच बर्ख पूर्व कहलनि, जे 'बच्चा रौ, अइ बेरक विद्यापति पर्व मे, हम किनका सम्मानित करियनि? कोनो तेहेन समर्पित नाम सुझाब' हमरा!' हम छुटिते कहलियनि- 'नरेन्द्र झा, तरौनी/पटना(सीए)आ हुनकर कथाकार पत्नी डा.पन्ना झा(आब स्व.)!'
भाइ कमलेश झा, आ हम सब बजौलियनिन, अ.भा.मै.सा. परिषद्, दरभंगाक, डीह पर (दिग्घी पच्छिम, दरभंगा) आ मिथिलांचल विकास परिषद्, लहेरियासराय (डा.एस एम नवाब/डा.शंभुनाथ मिश्र/श्री कमलेश झा बला संस्था) दिस सँ हुनका दुनू बेकती (आब स्व.डा.पन्ना झा, मैथिलीक कथाकार)क स्वागत करैत, एकटा मर्यादित सादा समारोह मे ''वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान'', 2019 ई. आह्लादपूर्वक देल गेल। तहिया, हुनकर समस्त लेखन, जीवन, आ आन्दोलनी कार्यकलाप पर, प्रथमहि चर्चा भ' सकल! परम आश्चर्यक गप्प जे, जाहि मैथिली लेखक संघ, पटनाक ओ अध्यक्ष छलाह आ अपन निजी कार्यालय मे, लेखक संघ के, कार्यालय आ बैसार लेल, एकटा कोठलीयो देलनि, से हुनकर समग्र लेखन पर, कम सँ कम ओहू कोठली मे, एकटा 'समीक्षा-गोष्ठी' धरि, आयोजित नहि क' सकल, अपन 'लेखक-अध्यक्ष' लेल! मुदा ओ कार्यक्रम-समाप्तिक बाद कहलनि- 'अइ सँ हम कमलेश जी के त' मोजर आ धन्यवाद द' देबनि,मुदा, अहाँ के नहि! अहाँ लिखब हमरा पर, तखने मोजर देब हम!' हम फेर गछलियनि। आइ आत्मसंतोष भ' रहल अछि, जे, हुनकर लेखन पर, लीखि पाबि रहल छी! ओ आ हुनकर अनुज अग्निपुष्प जी, हमर एहेन अपन साढ़ूक पितिऔत छथिन, जे हुनकर घराड़ीयो छीनि लेलखिन, गाम मे! तकर व्यथा, हमरा, हुनका लग लज्जित क' दैत अछि! मुदा आब से हमर तकर अबिनखेद, कहियो दूर नहि भ' सकत!
मुदा, तकर कहियो,अपन पितिऔतक शिकाइति, हमरा लग नहि केलनि। पटना-दिल्लीक एम एल एफ (मैथिली साहित्य उत्सव)मे भेटलाह, त' कहलनि- हम देखैत छी, जे कहिया अहाँ हमरा, लिखित रुपें, लेखक मानैत छी..? आइ 'विदेह'क ई आयोजन, हुनका पर नहि होइतय, त' 'जुलुम' भ' जइतय! लेखक नरेन्द्र झाक लेखन-क्षेत्रक चयन, खूब तर्कसंगत, आ हुनक विशेषज्ञता-आधारित अछि। मिथिलाक अर्थव्यवस्था-आधारित पाँच-पाँच टा पोथी, कोनो गैर-साहित्यिक लेखकक आबय, से अपना-आप मे, 'असाधारण घटना' होइत अछि! आ तकर समीक्षा-मूल्यांकन नहि होअय, से मैथिली मे 'साधारण घटना', भेल करैत अछि! तद्विषयक हिनकर महत्वपूर्ण पुस्तक सब अछि :-
1. मिथिलाक आर्थिक विकास (2000 ई.) 2. मिथिलाक जनपदीय विकास (2005 ई.) 3. मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबंधन (2006 ई.) 4. विकास ओ अर्थतंत्र (2008 ई.) 5. अर्थतंत्र ओ भ्रष्टाचार (2012 ई.)। नरेन्द्र झाक अर्थव्यवस्था-आधारित लेखनक, अनेक आयाम अछि। जेना, मिथिलाक भूगोल, विकास, भ्रष्टाचार, अर्थतंत्र, जल संसाधन आ तकर प्रबन्धन! ताहू मे, 'विकास'क दू मुख्य आयामक, हिनक दू टा स्वतंत्र पोथीए अछि :-1.आर्थिक विकास आ 2.जनपदीय विकास। पुस्तक सब,आलेखेक संग्रह सब अछि। हिनकर, अपन चयनित विषयक, एतेक रास मात्रात्मक लेखन, पाठक के चकविदोर लगा सकैत अछि, जखनकि सबटा छपियो नहि सकलनि अछि। मिथिलाक अर्थतंत्र पर खूब जमि क' काज केनिहार लेखक नरेन्द्र झाक विकासक अवधारणा सुस्पष्ट आ तार्किक छनि। आलेख-लेखन मे, हुनकर दृष्टिकोण, सामान्यत: समाजवादी छनि। ओ 'अनियोजित विकासक' 'दुष्परिणाम' सँ 'वाकिफ' छथि, आ हरदम, 'मिथिलाक नियोजित विकास'क पक्ष मे,(अपन अनेक आलेख मे) रहैत छथि। 'विकास आ अर्थतंत्र'क 'अन्तर्सम्बन्ध' हो, अथवा 'अर्थतंत्र आ भ्रष्टाचार'क अन्तर्सम्बन्ध हो, एक-दोसराक अन्तर्सम्बन्धक प्रसंग मे, हुनकर 'दृष्टि', साफ छनि। ई कोनो लेखक लेल पहिल शर्त्त होइत अछि, जकरा ओ पूरा करैत छथि।
अर्थतंत्र पर लेखनकार्य केनिहार लेखकक परिश्रम अपरिमित होइत अछि, जतेक मौलिक लेखन केनिहार लेखक के परिश्रम नहि होइत अछि। कारण, मौलिक लेखन मे, 'नैसर्गिक आ अर्जित सृजन-प्रतिभा', बेसी महत्वपूर्ण भेल करैत अछि! मुदा, 'अर्थतंत्र-परक लेखन' मे, 'आँकड़़ा-जुटानी' सँ ल' क', 'अर्थव्यवस्थाक क्षेत्रीयताक अध्ययन' आ 'स्थानीयताक उपयुक्तता' देख' पड़ैत छै, ताहि लेल अनेकानेक जमीनी यात्रा करय पड़ैत छै! तखन जा क' कोनो आलेख आँकड़़ा-पूरित आ तथ्यपूरित भ' पबैत अछि। तें, एतेक 'परिश्रमसाध्य लेखन' केनिहार, 'लेखके नहि, प्रणम्य देवता', भेल करैत छथि! से ताहि अर्थ मे विरल आ एकल लेखक छथि, नरेन्द्र झा! अइ विषयक आन कोनो लेखकक लेखन/पोथी/आलेख, खाहे त' अंग्रेजी/हिन्दी मे छनि,अथवा, एतेक संख्या मे पोथी नहि छनि, अथवा, मैथिली मे, एहेन गुणवत्ताक पोथी सब नहि छनि। नरेन्द्र झा, अपना विषयक, मैथिलीक सब स' पैघ लेखक छथि। हिनकर आरंभिको लेखन, 'मिथिलाक आर्थिक विकास '(2000 ई.) अपना विषयक संग न्याय केलक अछि, जाहि मे, मिथिला मे आर्थिक विकासक विविध आयाम सबहक, सैद्धान्तिक निरुपणक संग, तकर सबहक दयनीय जमीनी स्थिति सेहो वर्णित भेल अछि। तहिना, मिथिलाक क्षेत्रीयताक प्रति न्याय करैत, 'मिथिलाक जनपदीय विकास'(2005 ई.) मे, उप-क्षेत्रीय उपस्थापन, आलेख सब मे केलनि अछि। सेहो, 'स्थानीय अर्थ-विशेषता' सबहक चित्रण करैत!
मिथिला मे जल संसाधनक कहियो 'नियोजित प्रबन्धन' भेबे नहि कयल। अनियोजित रुपें, हठात्, राजनैतिक लाभक दृष्टि सँ, अनावश्यक रुपें, कहियो नदी सबहक तटबन्ध-संस्कृति, आम जनजीवन पर थोपि देल गेल, आ कहियो 'चारि-दशकीय'/ 'पांच- दशकीय' 'नहरि-परियोजना' चला क', लूटि-लटबाक बहन्ना बना, परियोजनाक अर्थे, निरर्थक क' देल गेल, जखन कि मिथिलाक भूगोल जल संसाधन सँ, सदा भरल-पुरल रहल। ताहि ठाम, अर्थतंत्रक विशेषज्ञ लेखक नरेन्द्र झा, स्वभावत: 'जल संसाधनक न्यायपूर्ण वितरण' के, 'तार्किक प्रबन्धन' द्वारा, सुनिश्चित करय चाहैत छथि, जे एकदम विशुद्ध वैज्ञानिक सोच थिक ओ बर्खाजल, नदी-जल, झील आ बाढ़िक जल, सब तरहक जलक प्रबन्धनक रस्ता देखौलनि अछि, सेहो मैथिली मे! अइ विषयक ईहो पोथी, मैथिली मे, असगरे भेटल अछि, एखन धरि! ('मिथिला मे जल संसाधन ओ प्रबन्धन', 2006 ई.)
स्वाभाविक अछि, जे नरेन्द्र झा सन जमीनी लेखक, मिथिला राज्यक पक्ष मे होथि, आ राज्य- निर्माणे मे, मिथिलाक सब समस्याक समाधान देखैत होथि! से कोनो अनुचितो बात नहि थिक, जखन कि प्राय: हिनकर सब पोथीक कवर-फ्लैप पर, अपन अनुशंसा लिखनिहार अनुज, मैथिलीक कवि भाइ अग्निपुष्प जी, मिथिला राज्यक अवधारणाक विरोधी छथिन। 'विकास ओ अर्थतंत्र' (2008 ई.)क पहिल खंडक पहिल निबंध, 'सुख-समृद्धिक लेल अपन राज्य', 'मिथिला राज्य निर्माण'क माँगक औचित्य साबित क' दैत अछि। अही खंड मे, ओ मैथिलीसेवी संस्था सब के, 'किछु' कहैत छथि, मिथिला सँ 'प्रतिभा-पलायनक कारण' पर विमर्श करैत छथि, आ 'मिथिला मे पंचायती राज व्यवस्थाक' मूल्यांकन सेहो करैत छथि! यद्यपि अइ पोथी मे संस्मरण-आलेखक स्थान उचित नहि छल, तथापि,डा.लक्ष्मण झा, स्व.बाबू साहेब चौधरी, आ डा.प्रबोध ना.सिंह, जे लोकनि मिथिला-मैथिली लेल अपन-अपन जीवन होम क' देलनि, तिनकर सबहक सामाजिक कार्यकलापक संस्मरण, कतहु सँ अप्रासंगिक नहि बुझाइत अछि। 'मिथिलाक सर्वतोमुखी विकासक मार्ग' पर, जतेक आलेख लेखक नरेन्द्र झा लिखलनि अछि, ततेक मैथिली मे क्यो एकगोटे नहि लिखलनि अछि।
मिथिलाक समन्वित विकास हो, मिथिलाक आर्थिक विकास मे कृषिक भूमिका हो, पटौनीक समस्या/समाधान हो, नदी योजना,गंडक परियोजना, सप्तकौशिकी डैम परियोजना, सब साल विकास के पोछैत बाढ़िक विनाश-लीला, खाद्य संकट, विद्युत अव्यवस्था, जर्जर सड़क, चीनी उद्योग अथवा कृषि-आधारित उद्योगक समस्या हो, मखानक व्यवसाय, मत्स्यपालन व्यवसाय हो, अथवा, संगठित उद्योगक परिकल्पना, नरेन्द्र झा, विकासक कोनो आसंग के विश्लेषण छोड़ैत नहि छथि। सेहो, आलेखक संग न्याय करैत नरेन्द्र झा, समस्याक आधारभूत कारण, सुझाव,आ समाधानक प्रावधान सेहो, करैत छथि! मिथिलाक 'विकासक विविध आसंग'क, ओ 'मास्टर-लेखक' छथि! साहित्येतर लेखक नरेन्द्र झा, जहिना मिथिलाक सर्वतोमुखी विकासक सब आसंग, तकर परिस्थिति, दिशा,आ समाधान पर खूब लिखलनि अछि, तहिना मिथिलाक अर्थतंत्रक घून (भ्रष्टाचार)पर, खूब धरगर आ धुरझार लिखलनि अछि। भ्रष्टाचार आ कारी धन, विकासक पैघ बाधक तत्व थिक, आ बाजारवाद तकरा आर प्रश्रय दैत अछि। ई महगी के चरम पर पहुँचा दैत अछि। लेखकक एहेन विचार अकाट्य अछि! मिथिलाक अर्थतंत्रक एतेक विशद् परिचय, आइ धरि कोनो लेखक मैथिली मे देबे नहि केलनि अछि, जतेक आर्थिक विशेषज्ञ लेखक नरेन्द्र झा देलनि अछि। कमला-कोसीक बाढ़ि, तकर व्यथा-आलेख, अनावृष्टि आ रौदी-दाही, विद्युत संकट आ माओवाद सँ तबाह मिथिला, खाद्य असुरक्षा आ विफल भूमि सुधार सँ बेदम भेल मिथिला, मिथिलाक एक-सँ-एक कटु यथार्थ, हिनकर आलेख मे प्रथमहि उतरल अछि!
मूल्यवृद्धि सँ पीड़ित जनमानस, फेर वैश्वीकरण सँ थकुचल जाइत अछि। गरीबीक मापदंड दोषपूर्ण अछि, से आइ धरि मैथिलीक कोनो आन लेखक, आलेख लिखि क' नहि कहलनि। 'लोकपाल बिल' के धोखपाल कहि, आलेखो त' नरेन्द्रे झा लिखलनि! आर्थिक उदारीकरणक दुष्परिणामक, एतेक नीक विश्लेषण केलनि अछि, जे मैथिली मे विरल अछि 'आरटीआइ'क बेचैनी, सँ ल' क', 'महगी आ विकासक चुनौतीक बीच झूलैत वित्तमंत्रीक बजट' धरिक यथार्थक आलोचनात्मक विवेचन, पढ़' योग्य अछि। अर्थतंत्रक अर्थनीतिक बहन्ने, किछु राजनैतिक आलेख सेहो ओ लिखलनि अछि, जे मोनगर अछि! जेना, 'तृणमूल कांग्रेसक रेल बजट', 'भंवर मे मनमोहन सिंहक अर्थनीति', 'नितीशक शासन मे खोटहि-खोट', 'दिवालिया लाल दुर्ग मे ममता बनर्जी', 'लोकतंत्रक महापर्व आ मिथिला'!
उपर्युक्त निबंध सब, राजनैतिक स्वाद त' बिलहलक, मुदा, 'उदासीन पाठक' आ 'भौतिक-सुख-भोगीन्द्र पाठक' लेखें, धैनि सन! 'मिथिला मे नदी, संगम सँ समृद्धि तक', बहुत नीक बाट देखबैत अछि, समृद्धिक! मुदा सरकार लेखें धैनि सन! 'सरकारी जोड़-तोड़ मे घुरियाइत मिथिलाक विकास', मिथिजनक भ्रम तोड़ैत अछि। मुदा कुभकर्णी निंद मे सूतल मिथिजन लेल,धैनि सन! मिथिलाक अर्थतंत्र पर लिखल, एहेन-एहेन महत्वपूर्ण पाँच टा पोथीक, साहित्यकारगण आ आन क्षेत्रीय बुद्धिजीवीगण द्वारा संज्ञान नहि लेल जायब, मैथिली लेखन-जगतक विडंबनापूर्ण परिस्थिति थिक, जे व्यथित करैत अछि! यद्यपि, आ.लेखक नरेन्द्र झा, अनेक बेर 'मिथिला' शब्दक पर्यायवाची बना क' 'मिथिलांचल' सन विखंडनवादी शब्दक प्रयोग केलनि अछि, जे आलोच्य अछि आ हुनका सँ अपेक्षित नहि अछि। तखन अइ सँ कोसिकांचल, कमलांचल, सीमांचल, आदि मिथिलाक भूगोलक विखंडनवादी शब्द-समूह के, अनुचित औचित्य आ अनुचित प्रश्रय भेट' लगैत छै। से नहि हेबाक चाही। तहिना, अनेक आलेख कनेक 'विस्तार'क मांग करैत छल, आ 'संक्षिप्त' रहि गेल! मुदा आजुक परिस्थिति मे, जखन कि हुनका सँ लेखनक अपेक्षा, आब नहि कयल जा सकैछ, हुनका द्वारा कृत-कार्य आ हुनकर कृतिक सम्यक् मूल्यांकने, हुनकर लेखनक प्रति, कृतज्ञता-ज्ञापन भ' सकैछ!
एतेक मूल्यवान अर्थक्षेत्रीय लेखक, मैथिली संसार सँ, 'ततबा न्यूनतम अपेक्षा', त' राखिए सकैत छथि!