विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी

संतोष कुमार राय 'बटोही' · 2024-09-15 · अंक 402 · पृष्ठ 62–65

मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी

मैथिली साहित्य आदिकालीन साहित्य अछि। विद्यापति सँ लऽकऽ अखन धरि ढेर रास पोथी लिखल गेल। मैथिली साहित्यक सभ विधा मे लिखल जा रहल अछि। टाकाक कमी कहियौन्ह की ईमानदार प्रयासक कमी मैथिली मे पत्र-पत्रिकाक कमी अछि। लोकक साहित्य मे रुचि सेहो कम भेलैन्ह अछि। उत्तर आधुनिक काल मे हम अहाँ जीवि रहल छी। औखन टाकाक बेसी महत्व बढि गेलैए। समाजवाद पर पूँजीवाद हावी भ गेल छै। सभ कियो 'आनंद' खोजबा मे लागल छथि। जत्ते टाका रहतै ओतेक मौज मस्ती केल जा सकैए ई अवधारणा विकसित भऽ रहल छै।भौगोलिकरण केँ अई घिच्चम-तिरा मे साहित्य सेहो पिसा रहल छथि। टाकाक अभाव मे रचना सभ पड़ल अछि। ओकर मुद्रण नहि भऽ रहल छै। बाजारवाद ततेक ने बढ़ि गेलैए जे आमजन आओर साहित्यिक प्रेमी टाकाक जेब सँ निकालै मे तेरह बेर सोचैत छथिन्ह।

'सगर राति दीप जरय' साहित्यिक गोष्ठी मे जे कथाक वाचन होयत छै, तेकर तत्क्षण समीक्षा केल जायत छै। ई समीक्षा हमरा कहियो पचल नहि। समीक्षा केर आधार की होयत छै एकरे कोनहुँ अता-पता नहि रहैत छै। फुसियौंह केर कथाक समीक्षा होयत छै। समीक्षा केँ आधार कथा केर प्लॉट यानी कथावस्तु, पात्र, देशकाल आओर वातावरण, संवाद, भाषा- शैली, लेखन-शैली, उद्देश्य वगैरह-वगैरह हेवाक चाही। परञ्च मैथिली भाषा केर आलोचक सभ कथावस्तु केँ कथाकार किया चुनने होयतिन्ह अई पर कोनहुँ विचार नहि करैत छथिन्ह। देशकाल आओर वातावरण केँ आधार पर कथा केर समीक्षा नहि भऽ रहल छै। मैथिली साहित्य मे काल-विभाजन नहि केल गेल औखन धरि। देखवा मे ई आबि रहल अछि जे राजकमल चौधरी, यात्रीजी, हरिमोहन झा, उषा किरण खान, जगदीश प्रसाद मंडल वगैरह-वगैरह कथाकार लिखलाथि आओर लिख रहल छथि, परञ्च हुनकर साहित्य पर एकटा नीक साहित्यिक समीक्षा नवका समयानुकूल नहि भऽ रहल छै।

पात्र कथा केँ प्राण होयत छै। पात्रक चुनाव कथाकार कोन उद्देश्य सँ केलथिन्ह आओर पात्रक चालि-चलन ओइ कथावस्तु केँ अनुसार कतअ टिकैत छै, पात्र केँ हिसाब सँ भाषा केर अदायगी करैत छथिन्ह। शब्द केर चुनाव कथाकार पात्र केँ हिसाब सँ कोना करैत छथि एकर समीक्षा हेवाक चाही।

देखल जायत अछि जे आलोचक मैथिली भाषा मे टाट लगाबै केर प्रयास करैत छथि जे हिन्दी आओर अंग्रेजी भाषा मैथिली मे घुसि रहल छै। ई कहनै नीक गप्प नहि छियैय। आजु अंग्रेजी अतेक आगा बढि गेल अछि ओकर पीछा मे किछु काज भ रहल छै। अंग्रेजी शब्दकोश मे फारसी, अरबी आओर दोसर भाषा केर शब्द जोडल जा रहल छै ,तें ओकर स्वीकारोक्ति बढि रहल छै। हम अहाँ टाट लगाबैत रहु।

कथा केर औखन धरि विभाजनक कोनहुँ परिपाटी विकसित नहि भेल अछि वा मैथिली साहित्य केँ आलोचक अइ पर मौनी बाबा बनल छथि। कथावस्तु, देशकाल आओर वातावरण केर आधार पर सेहो कथा केर समीक्षा केल जेवाक चाही। कथा ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक, पूँजीवादी अछि वगैरह-वगैरह एकर विभाजन हेवाक चाही। से मैथिली केर आलोचक अइ विषय पर विचार नहि रखैत छथि। समीक्षक कहअ लगैत छथि हम ठीक सँ नहि सुनलियै ओ की कथा पढलाथि। हमरा जंतबे ई अनठियौनै भेलै। कियो कहअ लागैत छथि कथा हमरा पसंद नहि भेल । यौ विद्वज्जन कथा अहाँ केँ पसंद केँ लेल तोड़े लिखल जायत छै। अहाँ कथाकार सँ असहमत भऽ सकैत छी, परञ्च अहाँ केँ लेल ओ कथा नहि लिखैत छथि। ओ अपना लेल लिखैत छथि। अपन मोनक तृप्ति लेल कथा लिखैत छथि । हुनकर मोन मे कोनहुँ बाजारवाद हावी नहि रहैत छै। हँ, किछु कथाकार बाजारवाद केँ दृष्टिकोण सँ कथा केर प्लॉटक सृजन करैत छथि।

मौलिक गप ई छियैय जे जखन कथाकार कथा लिखैत छथि तँ हुनका जेहन मे कथा लिखवाक किछु उद्देश्य तँ रहैत छन्हि,परञ्च लिखवाक क्रम मे कतेक बेर नियंत्रण नहि रहैत छै। कथा कोनहुँ दिस ससैर जायत छै। अइ मे कथाकार कोनहु दोख नहि छै। किया तँ कथा जखन ओ लिखअ लगैत छथि तँ कोनहुँ साँचा नहि रहैत छै। ओ सिर्फ लिखैत छथि। कतेक बेर लिखैत-लिखैत भसिया जायत छथि, परञ्च ओ कथा कथा रहैत छै। कथा कथाकारक फसल छियैय । ओ नीक आओर खराब भ सकैए ।

'सगर राति दीप जरय' कथा गोष्ठी केर उद्देश्य नीक छै जे एकटा मंच केँ ऊपर आओर नीचा बैस क अतेक मैथिली साहित्यिक लोकनि कथा केँ सुनैत अछि आओर पोथीक लोकार्पण होयत छै। परञ्च अपन कथा पढिकऽ सुइत रहब आओर दोसरक कथा सुनबे नहि करब इ गप नहि पाचि रहल अछि। किछु लोकनि मंच पर कब्जा केने रहैत छथि इ हमर आरोप अछि, से नहि हेवाक चाही। नहि तँ मैथिली साहित्यक विकास रुकिए जेतै। मैथिली साहित्य केँ पत्र-पत्रिकाक विकासक लेल सिर्फ गप्पे टा होयत अछि, कोनहुँ अइ लेल ठोस रस्ता नहि बनौल जायत अछि।
-संतोष कुमार राय 'बटोही' , ग्राम - मंगरौना, पोस्ट - गोनौली, भाया - अंधराठाढ़ी, जिला - मधुबनी, बिहार सम्प्रति - शिक्षक

Suggested citation: संतोष कुमार राय 'बटोही'. “मैथिली साहित्य मे समालोचक केँ कमी.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 402, pp. 62–65, 2024-09-15. https://www.videha.co.in/research/2024/402/मैथिली-साहित्य-मे-समालोचक-केँ-कमी.htm

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